एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1393
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मेरी राधा कृष्ण जी में पूर्ण आस्था है। उनमें मैं सखी भाव रखती हूं। महाराज जी नाम जब भी यथासंभव करती हूं। महाराज जी मुझ में घमंड या ईगो नाम जैसी कोई भी चीज नहीं है। फिर भी यही घमंड है। पहले मरीज कह रहा है डॉक्टर से मैं बीमार नहीं हूं। डॉक्टर कह रहा है तुम बीमार कुमार जी फिर भी मुझे सब ऐसा समझते हैं कि मैं घमंडी हूं। सही सही सही समझा सही समझा। इसमें आप भी ऐसा ही समझ रहे हैं। देखो घमंड ना होने पर आपको ऐसा अनुभव होगा कि मैं समस्त जीवों से नीच हूं।
देखो हनुमान जी महाराज को कोई घमंड नहीं तो विभीषण से कैसे कह रहे हैं भगवान के महान भक्त महाबली है जे गिर चरण दे हनुमंता चले सुगा पाताल तुरंता जिम यमोग रघुपति कर बाना यही भात चले हनुमाना बुद्धिमताम वरिष्ठम ज्ञानिनाम अग्रगण्यम बलों में महाबल महाबली हनुमान परम ज्ञानी क्या कहते हैं असमय अधम सखा सुन मोहु पर रघुवीर मैं ऐसा अधम हूं प्रात ले जो नाम हमारा ते दिन ताई न मिले हारा असमय अधम सखास ये अभिमान दहत वाणी शबरी जी महान भक्ता कैसे राम जी से कह रहे अधम ते अधम अधम अति नारी तिनु मति मंद अघारी हे पापों का नाश करने वाले प्रभु मैं मतिमंद नारी में भी बहुत अधम भीलनी जात की प्रभु आपको कैसे प्रसन्न करूं हे भगवान मेरे में अहंकार नहीं है ऐसा आज तक एक भक्त ने नहीं कहा यही अहंकार का लक्षण है कि आपने कैसे फाइनल कर दिया कि आप में अभिमान नहीं किसने अनुभव कराया आपको अहंकार ने ये तो कोई संत बोलेंगे कि ये निराभिमानी है और आप बोलोगे कि नहीं प्रभु सारे दोष मेरे में है मैं तो बहुत नीच प्रवृत्ति का हूं देखो राम जी से
हनुमान जी मिल रहे हैं विप्र रूप में कह रहे एक में मंद मोह बस शब्द पर ध्यान दो एक में मंद मोह बस कुटिल हृदय अज्ञान मुनि प्रभु मोह बिसारउ दीन बंधु भगवान मंद कुटिल अज्ञानी अपने को कह रहे हैं वहां है कौन ज्ञानी नाम वरिष्ठम बुद्धिमताम वरिष्ठम ऐसे तो किसका प्रश्न था हां अब अभी संभाल करो ऐसा शब्द अभिमान जनित है ये किसने अनुभव किया कि मेरे में अभिमान नहीं अनुभव किसने किया किसी ने प्रमाणित किया आपको? आपने आपके मन ने प्रमाण आपके अभिमान ने प्रमाणित कर दिया।
यह शास्त्री शब्द है कि जो ऐसा बोलता है कि मेरे में अभिमान नहीं है। यही अभिमान उसके अंदर है। देखो गोस्वामी तुलसीदास जी लिख रहे हैं जो मैं अपने अवगुण काऊं बाढ़ कथा पार नहीं लाऊं। मैं अगर अपने अवगुणों की कथा कहूं तो पूरा एक ग्रंथ लिख जाएगा। गोस्वामी जी कह रहे हैं जो अभिमान रहित महापुरुष है उनका हृदय ऐसा होता है। प्रियंका जी मुंबई से राधावल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी ईश्वर का ज्ञान बड़ा है या ईश्वर का प्रेम प्राप्त करना बड़ा है अपने हृदय में ईश्वर का बिन जाने न होए प्रतीति बिन प्रतीत होए नहीं प्रीति बिना ज्ञान के प्रेम हो जाएगा क्या जब तक हम आपको जानते नहीं है तो आप पर प्रतीति विश्वास नहीं होगा फिर आपसे प्रेम कैसे होगा तो अगर हम कहें कि प्रेम बड़ा है तो बिना ज्ञान के प्रेम कैसे हो जाएगा आप कौन हैं आपका स्वभाव क्या है?
आपका प्रभाव क्या है? आपकी महिमा क्या है? ये जब हम जानेंगे ना तभी तो आप पर विश्वास होगा। तभी आपसे प्रीति होगी। तो ज्ञान अति अनिवार्य है। बिना ज्ञान के शुद्ध प्रेम नहीं होता। जब यह ज्ञान हो जाता है कि सब में हमारा प्रभु विराजमान है। ये क्रूरा अप पापिनो नसता समस दृश्य सर्वान वस्तुत निरीक्ष परम स्वराध्य बुद्धिमम मेरे आराध्य देव भगवान ही सब रूपों में विराजमान है। पहले यह ज्ञान होना अति अनिवार्य है। इस ज्ञान के बाद आवागमन चक्र से मुक्त हो जाता है। तब वो प्रेमी होता है।
जो बंधन मुक्त होता है तब वास्तविक में प्रेम होता है। ये दो चार बूंद आंसू गिर जाना ये प्रेम का लक्षण नहीं है। प्रेम का लक्षण है। अपने प्रीतम की जो शोभा है, जो रूप गुण माधुरी वो हृदय में, मन में, बुद्धि में, नेत्र में, आम में सब में समा जाए। पी मूरति नैनन बसे ते रस रहा समाए यह लक्षण सुन प्रेम के और न कछु सुहाए और न कछु सुहाए फिरे अपने रस मा तो कुटुंब देह ते जाए छूट सब ही विधि नात तो एकमात्र भगवान के प्रेम में मत वाला वो प्रेमी तभी हो सकता है जब उसे ज्ञान हुआ है।
ये संसार भगवान का स्वरूप है। इसमें भगवान के सिवा कोई नहीं है। जो भी है वो मिथ्या है। ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या यह ज्ञान होने पर ही वास्तविक भगवान से प्रेम होता है और प्रेम हो गया तो ज्ञान सार्थक अगर ज्ञान और प्रेम दोनों जीवन में नहीं है तो फिर पशु जीवन है बस वही निद्रा भय आहार मैथुन यही चल रहा है संपूर्ण संसार आवागमन से मुक्ति थोड़ी है ज्ञान और प्रेम से ही आवागमन की मुक्ति है तो बड़ा छोटा नहीं कह सकते हम क्योंकि ये आंख बड़ी कि ये आंख बड़ी ये हमें प्रिय कि ये प्रिय दोनों प्रिय है ना तो जब तक हमें ज्ञान ना होगा तो प्रेम नहीं होगा तो
ज्ञान अति अनिवार्य है क्योंकि हम जिससे प्रेम करते हैं जब तक उसका ज्ञान नहीं होगा तो प्रेम कैसे हो जाएगा होता ही प्रेम ज्ञान से है जानकारी से ही तो प्रेम होता है आप यहां बैठे तो कैसे आए जानकारी से ही तो आए ना आपने YouTube में सुना आपने बातें सुनी आपको थोड़ा ज्ञान हुआ तो लगा चलो देखते हैं चल के तो आपको आने की जो जिज्ञासा हुई श्रवण सुजस सुन आयो प्रभु भंजन भव भीर जब मैं आपकी महिमा सुनी प्रभु तो आपकी शरण में आए विभीषण जी कह रहे हैं तो बिना श्रवण के ज्ञान नहीं हुआ और बिना ज्ञान के शरणागति और प्रेम नहीं होता इसलिए ज्ञान बहुत महत्वपूर्ण है।
उसको ऐसा नहीं कहा जा सकता कि ज्ञान छोटा कि प्रेम बड़ा नहीं कहा जा सकता। जैसे दोनों आंखें हमारी दो हैं पर दृष्टि एक है और दोनों प्राण प्रिय है। ऐसे ही ज्ञान और प्रेम दोनों समान है। दोनों में अंतर नहीं है। जी महाराज जी सूक्ष्म अहंकार का नाश कैसे होता है? गुरु कृपा ही केवलम जैसे हम साधना करते हैं ना इसका भी अहंकार होता है। इसका अहंकार नष्ट होता है गुरु कृपा से। तो सांसारिक अहंकार तो दूर करना कठिन होता है। उससे भी ज्यादा कठिन होता है भक्ति जनित अहंकार दूर करना।
क्योंकि सांसारिक अहंकार को हम दोष रूप में देखते हैं तो दूर हो जाता है। लेकिन भक्ति अहंकार को गुण रूप में देखते हैं कि मैंने ऐसा किया मैंने ऐसा यह जो सूक्ष्म अहंकार मैंने मैंने मैंने इसका अहंकार का नाश गुरु कृपा से होता है। जब गुरुदेव हमारे अहंकार को धूल धूषित करते हैं तभी हमें मोक्ष मिलता है। इसीलिए ध्यान मूलम गुरु मूर्ति पूजा मूलम गुरु पदम मंत्र मूलम गुरु वाक्यम मोक्ष मूलम गुरु कृपा जो मोक्ष का मूल है वो गुरु कृपा है एक बार अकाल पड़ा तो शिवाजी ने पूरा खजाना खोल के सबको खवाया प्यास अकाल किसी को व्याप्त नहीं कर पाया कोई अकाल में मर नहीं पाया समर्थ गुरु रामदास जी के पास गए और कहा गुरुदेव आपकी कृपा से किसी को भी कष्ट नहीं होने दिया अकाल में हमने सबका पोषण किया शिवबा तुमने पोषण किया उठाओ घन घन एक मजबूत होता है लोहे का उसमें होता है उठाया ले गए कहा इस पत्थर में मारो पत्थर में तोड़ा हटाया पत्थर तो नीचे मेंढक बहुत तंदुरुस्त बैठा है इसको खवाया उन्होंने कहा नहीं ये कैसे पुष्ट है तुम केवल निमित्त मात्र हो भगवान सबको पुष्ट करता है ये गुरु नहीं तो मैंने मैंने अकाल में किसी को भूखे नहीं मरने दिया।
बहुत बढ़िया काम हुआ। लेकिन अंदर एक पुष्ट हो रहा है। अहम मैंने अकाल में किसी को मरने नहीं दिया। मैंने नहीं भगवान ने। ये दिखाया कि इस मेंढक को तो तुम पोषण नहीं कर रहे हो। 8399 योनियां और भी हैं। मनुष्य योनि छोड़कर सबका भरण पोषण कौन कर रहा है? भगवान ही कर रहे हैं तो गुरु वाणी गुरु कृपा ही अहंकार का जो सूक्ष्म अहंकार है उसका नाश करते हैं। सुनील संभाजी राव महाराष्ट्र से महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। गुरुदेव 2023 से आपका सत्संग और एकांतिक वार्तालाप YouTube से माध्यम से सुन रहा हूं और आपके वचनों के बल से नाम जप भी करने की कोशिश कर रहा हूं।
गुरुदेव श्री जी की कृपा से गुरुदेव भगवान तीन दिन व्रत निर्जला और मौन रहकर करता हूं। उस दिन नाम जप निरंतर चलता रहता है और श्री जी में मन भी लगता है। बाकी दिन वैसा नाम जप नहीं चलता। महाराज जी क्या भूख की व्याकुलता के कारण ज्यादा नाम जप में मन लगता है? अगर ऐसा है तो संसार में रहकर यह मार्ग अपनाना सही है क्या महाराज जी देखो बात सुमिरन की है। अगर हम एक रोटी सुबह एक रोटी शाम पावे तो उपवास ही है। निर्जला रहकर कई दिन भजन कर लोगे। जल पीना और जल ना पीना कोई खास बात नहीं है।
खास बात है आपका चित्त कहां है? कितने ऐसे जीव हैं जो केवल जल पीकर रहते हैं। हमारी सृष्टि में क्या उनको भगवत प्राप्ति हो जाती है? ये ऑपरेशन है तीन दिन जल ना पी के उपवास करने का करो। लेकिन उसका कहीं भी रेखा नहीं खींचनी चाहिए। कितने ऐसे जीव जो मिट्टी खाकर जीते हैं? कितने ऐसे जीव जो फल पाकर जीते हैं। कितने ऐसे जीव सृष्टि में जो वायु पीकर रहते हैं। कितने ऐसे जीव है जो नपुंसक हैं। कभी भोग ही नहीं करते हैं। क्या इनको भगवत प्राप्ति हो जाती है? जिसका चित्त भगवदाकार है उसको भगवत प्राप्ति हो जाती है।
अब हमको देखना है मताहार सात्विक भगवत प्रसाद यह व्रत से भी बढ़कर है। मताहार [गला साफ़ करने की आवाज़] माने थोड़ा अगर हम चार रोटी खाते हैं तो दो रोटी खाएं और धर्म की कमाई पवित्र भोजन और भगवान को अर्पित करके और रोज भजन हो रहा है सब कुछ हो रहा है। खास बात भजन है अपने भी ये सब पर बाद में जब समझ में आया तो चित्तवृत्ति का भगवान के चरणों में अर्पित करना। गोपी जनों का सबसे बड़ा पद है हमारे भक्ति राज्य में। अगर भक्ति राज्य में कहीं भी किसी का पद दिया जाता है तो यथा ब्रज गोपिका नाम जैसे ब्रज की गोपिकाएं ऐसा प्रेम कहीं नहीं देखा गया।
बड़े-बड़े महा भागवतों ने इन्हीं का अनुसरण किया है। जैसे महाप्रभु चैतन्य देव गोपी प्रेम की भावना में डूबे हुए आ कृष्ण आ प्रीतम यथा ब्रज गोपिका नाम अब गोपिकाओं की दिनचर्या देखिए। सुबह उठती हैं। गौएं धोना है, घर लिपना है, भोजन बनाना है, पति पुत्र आदि को पवाना पूरा एक गृहस्थ की नारी जैसे करते हैं। भागवत में लिखा हुआ है। वही है दिनचर्या। अंतर क्या है? उनको परमहंसों ने भी पूजा। क्यों? क्योंकि एक एक चित्तवृत्ति श्री कृष्ण के लिए है। क्रियाएं बाहरी संसारी है।
श्रृंगार संसारी है। लेकिन अंदर का अनुराग श्री कृष्ण से है। मुरारी पादारपित चित्त वृत्ति एक एक वृत्ति जैसे समुद्र में तरंगे उठती हैं। ऐसे चित्त में वृत्तियां उठती रहती हैं। हमारी हर वृत्ति सांसारिक उठती है। अगर हर वृत्ति भागवतिक होने लगे। बस यही साधना का लक्षण है। चित्त वृत्ति भागवतिक को होने लगे। दुर्वासा जी दूब का रस केवल पीते हैं। अमरीश जी चक्रवर्ती सम्राट है। नवीन नवीन रानियां हर भोग हर सामग्री दुर्वासा जी तप में अहम है। अमरीश जी कृष्ण साव मन कृष्ण पदारविंद भगवान के चरणों में तो जब भगवान की सभा में देवर्षि नारद जी ने गान किया कि मृत्यु लोक में इस समय सर्वश्रेष्ठ महान भक्त श्री अमरीश जी महाराज तो दुर्वासा जी को जलन हुई कि वो चक्रवर्ती सम्राट अच्छी पोशाक पहनता है सिंहासन पर बैठता है रानी है प्रजा है सुख वैभव है हमारा नाम क्यों नहीं लिया गया धूप का रस पीता हूं बलकल की लंगोटी लगाता हूं।
महान तप से संलग्न हूं। देखता हूं कैसा अमरीश है। अब उनको अपराध ढूंढने में तो कोई मिला नहीं। द्वादशी परायण का समय जा रहा था। तो ब्राह्मणों से पूछा विद्वानों से ब्रह्म ऋषियों से तो उन्होंने बताया भगवान का चरणामृत जलपान कर लेना। परायण भी माना जाएगा और अतिथि सत्कार में कोई विघ्न भी नहीं होगा क्योंकि आपने अतिथि दुर्वासा जी को किया है। वो पान ही किए बस आ गए। दुर्वासा जी को तो दोष देखना था। उन्होंने कहा बहुत बड़ा तू भगत बनता है। अभी मैं तुझे दंड देता हूं और भारी क्रोध करके उन्होंने कृत्या प्रकट कर दी मारने के लिए।
अमरीश जी ऐसे ही खड़े रहे। दैन्यता की मूर्ति भगवान के सुदर्शन चक्र ने प्रकट होकर कृत्या को नष्ट किया और त्रिभुवन में दौड़ाया दुर्वासा जी को। दौड़ाया नहीं तो भस्म तो एक मिनट में कर देते। दौड़ाया केवल भक्त है ना भगवान के। दौड़ाया। अब वो भगवान ब्रह्मा के ब्रह्मा जी ने कहा हरि का सुदर्शन चखम शिव जी ने कहा ये तो भगवान का नित्य पार्षद सुदर्शन इस वो भगवान की शरण में जाओ दुर्वासा जी भगवान भगवान ने कहा अहम भक्त पराधीनो असुतंत्र मैं इस समय असुतंत्र सुदर्शन मेरे कहने से नहीं रुकेगा अंबरीश [गला साफ़ करने की आवाज़] के पांव पड़ो जाके जब अमरीश जी के चरण हूं तो अमरीश जी ने जल लिया और कहा मन वचन कर्म से आज तक मैंने जितना भजन साधन पुण्य किया सब दुर्वासा जी को प्राप्त हो जाए और हे सुदर्शन इसके प्रभाव से आप दुर्वासा जी के आंसू भर गए कि जिसको मैं मारने आया जिसको मैं दुख देने आया अपमानित करने आया उसने पूरे जीवन का भजन मुझे दे दिया बोले आओ आज मैंने देखा हरि के दासों का कितना बड़ा महत्व है।
तो निराभिमान भजन और तपस्या अंतर है। निराभिमान भजन और तपस्या में अंतर है। हम व्रत रहे लेकिन व्रत का अभिमान ना हो और हमारा भजन निरंतर नित्य चले तो हमारा व्रत सही हुआ। एक दिन कस के भजन हो गया और दो दिन प्रपंच रहा तो ठीक नहीं। हमें ऐसा अभ्यास करना चाहिए कि अन्य दिनों में भी भोजन को पवित्र धन के द्वारा कमाया हुआ हो और भगवान को भोग लगाया हुआ हो और हमारा मन बार-बार भगवान के चरणों का चिंतन करें। खास बात चिंतन है। पूरी गीता जी आप उठाकर देखिए। भगवान ने कहीं अन्य साधनों को छुआ भी नहीं है।
अनन्य चिंतो माम अनन्य चेता सततम ऐसा अभ्यास करो अभ्यास योग युक्त चेतसा गामिना मेरे में चित्र मन मनाभ मद भक्तो मा्याद माम नमस्कार भगवान कहते मन आत बुद्धिम निवेश मेरे में मन लगा दो मेरे में बुद्धि लगा दो खास बात यह है सनकाद जब भागवत के परायण की बात कहते हैं तो कहते हैं एक बार फल खा के भागवत सुनो। यदि उसमें विक्षेप पड़ता है तो भोजन पर का। लेकिन आपका चिंतन भोजन का नहीं होना चाहिए। आपका चिंतन भगवान से हटना नहीं चाहिए। खास बात चिंतन है। आप रोटी दाल खा के भजन कर रहे हो।
निरंतर भगवान में वृत्ति आप जैसा कोई महात्मा नहीं। वो आप वायु पीकर रह रहे हो। चिंतन है जल का और भोजन का। बात नहीं। चिंतन कहां है आपका? आंतरिक चिंतन से भगवत प्राप्ति होती। बाहरी क्रियाओं से नहीं। बाहरी क्रियाओं से प्राप्त नहीं होती। बाहरी क्रियाओं का तो कभी-कभी अहम भी जागृत हो जाता है कि मैं निर्जला रहता हूं। रहता है। तो वो जो मैं निर्जला रहता हूं यह भगवत प्राप्ति में बाधा पहुंचा देगा। एकदम दैन्य यही दरबार याद भी नहीं आनी चाहिए। यही दरबार दीन को आदर रीति सदा प्रभु मैं किसी योग्य नहीं।
इसीलिए कहा सुनेरी मैंने निर्बल के बल राम अपबल तप बल ये तप बल और बाहुबल चौथो बल है दाम सूर्य किशोर कृपा ते सब बल हारे को हरि नाम सुन री मैंने निर्बल के बल हम ये नहीं कहते निर्जला ना रहे रहो लेकिन जिस दिन जैसे वैसे भजन होता है ऐसे रोज भजन होना चाहिए कैसे हो अल्पाहार पवित्र आहार और हमारा चिंतन जाए प्रभु की तरफ हमारा चिंतन निर्जला की तरफ ना जाए हमारा चिंतन प्रभु में हो सो सब धर्म कर्म जर जाऊ ज ना राम पद पंकज भाव वो धर्म कर्म में आग लगी भगवान का चिंतन ना हो भगवान का चिंतन हो रहा है सब ठीक हो रहा है मंगल भवन है भगवान अमंगल हारी है उनका चिंतन हो रहा है सब मंगल हो रहा है ठीक है हर समय भजन की वृत्ति बने इसलिए पवित्र आहार और थोड़ा आहार आप देखो एक रोटी पा के चार रोटी की भूख है एक रोटी पाओ आधा पेट पानी से भरो और चिंतन करने का अभ्यास करो तो देखो आपका चित्त भगवान में लगा रहेगा और चार रोटी पानी तो चार रोटी पाए ऊपर से पानी फिर वायु तो बस पचाने में सारी ऊर्जा लग जाएगी भजन में नहीं लगेगी अल्पाहार भजन
के लिए अल्पहार अति आवश्यक सोनी बालाजी महाराज जी मैं एक सरकारी कर्मचारी हूं दिल्ली में वहां मेरा मेरे पास कुछ कर्मचारी काम करते हैं। कई बार प्रेशर में तेज वेग से बोला जाता है। महाराज जी ऐसे में कैसे अपने आप को कंट्रोल करें उस समय नहीं बोलना कोई अपराध थोड़ी है। अगर अपने अनुयायियों को शासन में लेकर हम जो कार्य प्रणाली को ठीक कराते हैं फिर कोई अपराध तो नहीं है। ये तो करना ही पड़ेगा। जैसे अपने बच्चे हैं तो उनको हमें कभी थप्पड़ भी मारना पड़ेगा, कभी शासन भी करना पड़ेगा।
जैसे अपने शिष्य हैं तो कभी उनको शासन में लेना पड़ेगा। ऐसे अपना पद है और 10 20 लोग अपने 50 लोग 100 लोग अपने अनुयाई हैं जिससे हम उस कार्य प्रणाली को ठीक से करा पाते हैं। तो उनमें जो प्रमाद करेगा तो उसको डांटना ही पड़ेगा। क्रोध करना पड़ेगा। ज्यादा प्रमाद करे तो उसके खिलाफ कारवाई भी करनी पड़ेगी। तो यह कोई अपराध नहीं है। इसमें कोई यह नहीं कि गुस्सा आ जाता है या मैं आवेश में बोल देती हूं। नहीं करना ही चाहिए और करना ही पड़ेगा। अगर गुरु कहे कि मैं शिष्य को कभी डांटूंगा नहीं।
टीचर कहे मैं विद्यार्थी को कभी डांटूंगा नहीं। माता-पिता कहे पुत्र को नहीं डांटूंगा तो बिना शासन के इनकी जीवनी व्यर्थ हो जाएगी। इनका जीवन सचिव वैद गुरु तीन जो प्रिय बोले भय आस राज धर्म तन तीन कर हो बेगह नाश। अगर गुरु शिष्य की प्रियता बोलता रहे और डॉक्टर मरीज के अनुकूल चलता रहे और मंत्री राजा के अनुकूल चलता रहे तो तो राज्य का नाश हो जाएगा शरीर का नाश हो जाएगा शिष्यता का नाश हो जाएगा [खांसने की आवाज़] उसमें शासन की जरूरत होती है अब हम रहे चाहे ना रहे हमारा भय रहेगा सबको यहां भले पुलिस मैन जो है चोर से कहे तुम्हारे हाथ जोड़ता हूं पैर छूता हूं चोरी मत किया करो बुरा आचरण है वो मानेगा अब वो सोचे कि यार डंडा मारला अपराध देता है।
ऐसा नहीं है। डर जरूरी है। डर जरूरी है। बिना भगवान के डर के और बिना धर्म के डर के और बिना शासन के डर डर के। अभी राक्षसी भाव का तांडव हो जाए। डर है। डर है। तुम्हें भी डर है। कानून के खिलाफ करेंगे। डंडा बजेगा। आजीवन कारावास मिलेगा। ज्यादा गलती हो गई तो फांसी मिलेगी। बिना डर के अंदर एक राक्षस बैठा हुआ है हम सबके अंदर सुमति कुमति सबके उराई नाथ पुराण निगम अस अगर वो राक्षस चुप है तो डर के कारण चुप है समाज का डर भगवान का डर गुरु का डर शास्त्र का डर और ये कानून का डर अगर यह डर है तो समाज डर के सुरक्षित है और अगर डर ना हो तो अभी तांडव मच जाए राक्षसी डर की कोई सीमा तो नहीं कह सकते तो अपराध की भी सीमा नहीं है ना अपराध की सीमा है क्या?
तो इसलिए डर की सीमा नहीं रखी गई कि तुम जितना बड़ा अपराध सोचोगे उतना बड़ा दंड आपके ऊपर विधान लागू हो जाएगा। पूरे संसार को गौर से देखो तो तुम्हें कर्मों का खेल दिखाई देगा। अगर इस संसार को भागवतिक चश्मे से देखो तो आपको कर्मों का एक खेल दिखाई देगा। जो जैसा कर्म कर रहा है वैसा भोग रहा है। अगर डर भगवान का ना हो। किसी को भगवान का डर नहीं है तो यहां डंडे का डर है। पुलिस का डर है। अगर डर ना हो तो समाज कंट्रोल में ही ना रहे। जहां डर नहीं है वहां आप देख लीजिए।
पत्नी को पति से डर नहीं, पति को पत्नी से डर नहीं तो देख लो दोनों का चरित्र। नहीं हां। तो ये तो चलता है। डर तो रहना ही चाहिए। डर रहना ही चाहिए। डर के बिना समाज सुव्यवस्थित नहीं रह सकती। जो परिकर आपके पास रहता है आप उनको तो हाथ के हाथ दंड दे देते हैं और जैसे हम दूर रहते हैं और हमसे गुरु दंत तो हमें कैसे आपके अगर आप हमारे को समर्पित हो तो आप देखो तुम्हारे हृदय में जलन होती है कि नहीं इनको तो बाहरी तुम्हारे हृदय में इतनी जलन होगी कि मैं कैसे गुरुदेव के सामने जाऊं मैं कैसे उनसे बात करूं और बार-बार हमारा चेहरा नाचेगा और यही आएगा कि मैं बहुत अपराधी हूं मैं ये दंड नहीं मिल रहा ये जलन हो रही मैं आज से कसम खाती हूं कभी ऐसा नहीं करूं
गुरुदेव मुझे क्षमा कर दो भले हमारे सामने सामने नहीं हूं लेकिन तुम एकांत में क्षमा मांगोगे गुरुदेव मुझे क्षमा कर दो मैं आज से गलती नहीं करूंगी तब हृदय में शांति होगी नहीं बाहरी जलन से ज्यादा आंतरिक जलन आपको सताएगी और गुरु संबंध ऐसे तो गुरु हर समय हमारे साथ रहते हैं हमारे माइंड में बैठे हैं हमारे हृदय में बैठे रहते हैं विक्रांत जी प्रयागराज से राधेधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी संसार में किसी के द्वारा आपकी गलती ना होने पर भी किसी के द्वारा आपको उसकी सजा दिलाई जाती है तो ऐसे से इंसान को सफाई देनी चाहिए या यदि सफाई ना दें तो अपने अंतर्मन में उठते द्वंद को कैसे शांत करें?
और अपना कहीं ना कहीं कोई अशुभ प्रारब्ध है जो अपने को गिराना चाहता है [गला साफ़ करने की आवाज़] पूर्व का जैसे जिस पॉइंट पे आपकी निंदा हो रही है या आपको गिराया जा रहा है उस पॉइंट में आप बिल्कुल करेक्ट है लेकिन सत्य मानिए ये कोई प्रारब्ध भोग हमारा पूर्व का पाप का कर्म है जो मुझे दंड दे रहा है अगर वो मुझे दंड ना दे तो अंदर द्वंद ना चले अंदर भी जलो और बाहर भी उसका कष्ट भोगो क्योंकि कोई ऐसा पाप है जिसका दंड नहीं मिला और वो आकर हमें गिरा रहा है। तो इसमें हमें अंदर से विचार करना चाहिए कि मेरा ही प्रारब्ध है।
अगर आपका प्रारब्ध नहीं होगा और आपको कोई नीचा दिखाना चाहे पूरा षड्यंत्र रच ले तो आपके अंदर खुशी रहेगी। वह प्रारब्ध ना होने के कारण आपका कोई अपराध भी नहीं है और पूर्व अपराध भी नहीं है और ऐसे हृदय जलेगा और द्वंद होगा कि मैंने तो पाप किया नहीं है। मैंने गलती की नहीं और आपको नीचा देखना पड़ेगा। यदि वह पाप है तो आप बिल्कुल पूरी सफाई पेश कीजिए। फिर भी आपको नीचा देखना पड़ेगा। तो वो यह जानकर के भोग लेना चाहिए कि मेरा ही कोई पूर्व प्रारब्ध है। और अगर नहीं है तो आप मौन रहिए।
अपने आप प्रकाशित हो जाओगे। आप आपको सफाई देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अपने आप सामने वाले को भगवान नीचा दिखा देंगे जो आपको नीचा दिखाना चाहता है। पर कभी-कभी ऐसा होता है कि जैसे कई हमने पाप किए जैसे बहुत जन्मों में बहुत से पाप हो जाते हैं। ना उस कानूनी दंड मिला और ना भागवतिक दंड मिला। तो वो पाप वैसे सुरक्षित बढ़ता रहता है और हमको ऐसी जगह फंसाता है जहां हम निरपराध होते हैं। पर वो होता हमारे पाप का दंड है। एक सज्जन पुरुष रहते थे तो उनके घर के सामने एक स्वर्णकार का मकान था।
वो अपने मकान में ही दुकान रखे हुए था स्वर्णकार की तो उसका बहुत बेईमानी का स्वरूप था और वो उनके पास जब रात्रि में गश्त [गला साफ़ करने की आवाज़][नाक से की जाने वाली आवाज़] देते आते तो दो कर्म सरकारी कर्मचारी उन्हीं के पास बैठते खाते पीते रात में वहीं शयन करते अब उनको धीरे-धीरे मित्रता हो गई राज कर्मचारियों को पूरा पता चला कौन से बॉक्स में कहां क्या रहता है कैसे अब उनका मन खराब हुआ राज कर्मचारियों का कि अगर इसकी हत्या कर दी जाए तो इसका इतना धन तो उन्होंने ऐसा कर दिया और वह बॉक्स लेकर निकल रहे थे कि वह अच्छा आदमी जो सामने रहता था मकान में उसने देखा तो उन्होंने कहा इसका मतलब है तुम कुछ गड़बड़ करके आ रहे हो तो उन्होंने कहा देखो हम तुम्हें बॉक्स में जितना है इसका आधा दे देंगे चुपचाप अपने घर वापस चले जाओ हम लोग भी चुप चले जाएंगे फिर सुबह आके हम सब बना लेंगे तो उसने कहा ऐसा नहीं होने देंगे हम हल्ला मचाते हैं उसने हल्ला मचा दिया और राजकीय कर्मचारी उनको गणित सब पक्की होती है और जो ही हल्ला मचाए
सो ही उन्होंने पकड़ लिया उसको और बॉस को उसके नजदीक रख दिया और कहा हमें पता है तू मार के आ रहा है और बचने के लिए नाटक कर रहा है अब पूरी समाज में यह बात फैला दी कि इसने स्वर्णकार को मारा और ये बॉक्स ले जा रहा था हमने पकड़ा इसलिए इसने हल्ला बचा दिया पूरा केस उल्टा हो गया और सबको 100% समझ में आया ऐसा ही है किसी और वो वो चिल्ला चिल्ला के कह रहा है लेकिन उसकी कोई बात नहीं सुन रहा। मुकदमा हुआ जज के सामने जब खड़ा हुआ वो तो रो दिया और कहा जिसकी कसम खवा लो यद्यपि मैं फंस चुका हूं।
उनके पास प्रमाण है। मेरे पास प्रमाण नहीं पर मैं आपसे रो के कहता हूं कि मैं सत्य हूं। इस केस में मेरे द्वारा कोई पाप नहीं हुआ। जज ने कहा कि ठीक है इसका हम प्रमाण निकलवा लेंगे। एक जिंदा आदमी मुर्दे का शो बनाया इसे उसमें और कहा लावारिस लाश थी। अब इसका अंतिम संस्कार करने जाना है। उन राज कर्मचारियों को भी आदेश किया। दो चार लोगों को और कहा आप पीछे रहिए। एक तरफ उसको भी पकड़ाया जो मुजरिम था। वो गए जब एकांत देखा तो कहा कहते थे आधा बाग स्वर्ण ले ले तो बच जाता ना फंसा दिया ना अब पूरी जिंदगी जेल भोगेगा और वहां डायरेक्ट वो लगाए हुए थे जिससे उनको सुनाई दे तो उसने कहा चाहे फांसी हो जाए लेकिन हम इसमें दोषी नहीं है दोषी तुम लोग हो और देख लेना भगवान तुम्हें दंड देंगे ऐसी बात अब जज के सामने तो प्रमाण मिल गया कि दोषी राज कर्मचारी है तो उसने कहा इतने दिनों से मैं जेल भोग रहा हूं इतने मेरे दुख और अपमान हुआ ये क्यों?
ऐसा क्यों हुआ? जज से कहा, मैं निर्दोष था। मैं चिल्ला चिल्ला कह रहा था। तो जज ने कहा सही बताओ। हम किसी और जन्म की बात नहीं पूछते। इस जन्म में कोई ऐसा पाप किया है जो गुप्त हो और बड़ा हो। तो उसने कहा हां। हमारी एक प्रेमिका थी। हमारा मनमुटाव हुआ। वो हमारे ऊपर प्रहार किया। हमने ऐसे प्रहार किया तो हम चाहते नहीं थे लेकिन वो मृत तो फिर हम अपने घर में ही गाड़ दिया। तो बोले देखो वो पाप का दंड इस रूप में तुम्हारे आया जो गुप्त पाप हमसे हो जाते हैं जिनका ना सरकारी दंड मिलता है ना भागवतिक दंड मिलते जैसे भीष्म पितामह जी छ महीना बाणों की सया पर है वो कह रहे प्रभु इस जन्म में तो बाल ब्रह्मचारी आपकी भक्ति करने वाला कोई दोष नहीं फिर छ महीना बाणों की सया पर और मैं कई जन्मों तक देख रहा हूं भगवान ने कहा 100 जन्म के बाद का यह पाप है तो हम लोगों के बहुत जन्मों के पापों का क्रम चल रहा है।
जैसे 11 वर्ष से बाबा जी हैं। भगवान के मार्ग में चल दोनों किडनी फेल है। अब क्या है? ये पूर्व जन्म का कोई पाप है जो हमको दंड दे रहा है। तो अब इस जन्म का जो भजन है वो हमारी व्यवस्था की हुई है कि हमारा भजन भी चल रहा है। और बिल्कुल अगर हम संसार में होते तो क्या दुर्दशा होती? और भगवान में है तो ना पैसे की चिंता है ना डॉक्टर की चिंता है। ये क्यों है? ये भगवान की शरण में तभी तो है ना तो हमारे भजन का हमारी शरणागति का यह है और पूर्व के पाप का यह है तो हमको विवेक के द्वारा पता है कि शरीर बदलते रहते हैं जीवात्मा तो वही होता है ना तो जो करता है कर्ता तो वही है ना मान लो वर्दी बदल जाए आप पजामा कुर्ता में आ जाओ पट शर्ट में आ जाओ आप किसी भी तो आप तो आप ही है ना तो अगर दंड या अच्छा काम किया तो पुरस्कार या तिरस्कार आपको ही मिलेगा कपड़े से कोई मतलब नहीं होता तो यह कपड़ा है।
पुरुष का कपड़ा है, स्त्री का कपड़ा है। पशु पक्षियों का कपड़ा है। यह वसा जीर्ण यथा गीता में भगवान ने कहा तो यह शरीर हमारा नया है। लेकिन हम बहुत पुराने हैं। अनेकों जन्मों से हम कर्म करते चले आ रहे हैं। वो हमें हमें धैर्य पूर्वक रहना चाहिए और भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि हमें इतना साहस दो। माना कि मेरा ही कर्म कोई होगा। पर मुझे इतना साहस दो कि मैं बिना [नाक से की जाने वाली आवाज़] विकार के अंदर से सह जाऊं और आगे बढूं और नाम जप करते हैं आप महाराज ऐसे तो नहीं बात नहीं करना पड़ेगा मनुष्य जीवन व्यर्थ हो जाएगा नाम जप ये पद कितने दिन रहेगा विचार करो ये शरीर कितने दिन रहेगा पूर्व में पुण्य भी बना ना तो आप ऐसे पद पर आए आप हमारे भारत की सेवा में है अब आपको ऐसा बनना चाहिए कि इससे भी आगे पद है ना कि अगर हमारा मनुष्य जन्म हो तो हम भारत की उन पदों पर पहुंचे जिससे हम अधिक से अधिक समाज की सेवा कर सके।
कभी भी भय या प्रलोभन से किसी निर्दोष को दंड मत देना और दोषी को बखशना नहीं। इसी कर्तव्य की पूजा को भगवान को समर्पित करना और नाम जप जितना मन में आवे हम कह रहे पैसा तो लगता नहीं नाम जप में ना जैसे आप ऐसे हो राधा राधा राधा राधा राधा राधा आप खुद देखना आपको शांति मिल जाएगी। आपकी बुद्धि प्रवीण हो जाएगी। आपका आत्मबल बढ़ जाएगा। आप नाम जप जो प्रिय हो राम कृष्ण हरि जो नाम प्रिय हो आपको वो नाम जप कीजिए और हर घंटे में अपने एक एक घंटे के समय को श्री कृष्णारपणमस्तु हे प्रभु एक घंटे में जो भी हमारी सांसारिक सेवा हुई वो मैं आपको समर्पित कर कुछ दिन करके देख लीजिए फिर आप हमें बताइएगा कि हर एक घंटे को भगवान के चरणों में समर्पित कीजिए नाम जप जितना बन सके कीजिए कोई नशा तो नहीं है बस फिर आप देख लीजिएगा और कभी भय या प्रलोभन में मत आइएगा।
हमारी यह बात गांठ बांध लेना। कभी प्रलोभन में मत आना। जो भारत सरकार दे रही है उसी में नमक रोटी खाना और अपने अधिकार [नाक से की जाने वाली आवाज़] का शासन पूर्वक पालन करो। अपने द्वारा कभी कोई गलती ना होने पाए। देखो ऐसे सिंघवत चलोगे और चंद रुपए में अगर आपकी बात ओपन हो जाती है तो जिंदगी भर आप कभी ऐसे नहीं चल सकते। तो वह रुपया किस काम का जो हमें इतना झुका दे, रौंद दे। हमको अपने सम्मान से चलना है। कभी प्रलोभन में मत फंसना और कभी भय में मत आना। कोई भी अधिकारी बड़े से बड़ा अधिकारी यदि आपके द्वारा गलत कराना चाहे और भय दे तो हमारी वर्दी भले उतर जाए लेकिन हम गलत नहीं करेंगे।
तो भगवान यही वर्दी थोड़ी है। वो और पोजीशन दे देंगे। इसलिए धर्म पूर्वक चलना और भगवान का नाम जप करना। तो देखो आपको आंतरिक आनंद मिलेगा। बिना आंतरिक आनंद के हम खाली रहते हैं। बस मन चिंतन करता रहता है। और यह मन अगर खाली रहा और ज्यादा चिंतन करने लगा तो ये डिप्रेशन की तरफ ले जाता है। अगर नेगेटिव ज्यादा चिंतन बनने लगे ना नकारात्मक तो ये दिमाग को परेशान करके डिप्रेशन में भी ले जा सकता है। इसलिए इसको खाली मत रखो। राधा राधा राधा कोई भक्ति का बाहरी लक्षण नहीं।
अंदर ही अंदर नाम जप करो। धर्म से चलो और कोई व्यसन नहीं करते। बहुत बढ़िया जीवन भगवान की बहुत बढ़िया आराधना बन जाएगी।
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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