परिवार में रहते हुए साधक की दिनचर्या एक जैसी कैसे होगी?
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
शालिनी शुक्ला जी कानपुर से गुरुदेव आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। गुरुदेव आपने कहा कि साधक की दिनचर्या एक सी होनी चाहिए। परंतु महाराज जी प्रभु मैं परिवार जन की सेवाओं के चलते श्री जी की मंगला श्रृंगार दुप इसमें बात ध्यान देनी है कि सत्संग जब होता है वो सार्वजनिक होता है और एकांतिक होता है यह पर्सनल के लिए होता है पर्सनल आप अपनी साधना में पूछ सकते हैं। अब जो सत्संग में हुआ कि साधक की दिनचर्या आठों आयाम एक सी होनी चाहिए। यह उन साधकों की है जिन्होंने पूरा जीवन विरक्ति मार्ग में भगवान को दे दिया।
गृहस्थ मार्ग में नहीं दो मार्ग हैं। एक निवृत्ति जो विरक्ति मार्ग और एक गृहस्ती। गृहस्ती में जब समय मिला मान लो कभी ऐसा हो सकता है कि सुबह उठते ही पति को कहीं कार्य पे जाना है। अब हमको पहले ठाकुर जी देखना है या पति देखना है। अगर ठाकुर जी की मंगला शुरू करते हैं तो पति की दिनचर्या बिगड़ जाएगी और पति की दिनचर्या बिगड़ जाएगी तो ठाकुर जी की मंगला आगे बंद हो जाएगी। बात समझना है हमें। हमारे गृहस्थ में फिर बाधा खड़ी हो जाएगी। वह पति रुद्ध दृष्टि से देखेगा कहां मतलब हमारे को जाना है और तुम पहला हमारा कर्तव्य होगा कि हम उठ के पूरी दिनचर्या अपने पति की संभालेंगे और वो ऑफिस गए अपने काम से गए अब हमें फुर्सत मिली अब हम अपने ठाकुर जी की सेवा में लगेंगे गृहस्थ और विरक्त की अलग-अलग दिनचर्या है।
गृहस्थ की कभी एक सी दिनचर्या बन ही नहीं सकती। अचानक कोई काम आ गया। रात भर वो पूरा ब्याह में लगा रहा। अब वो सुबह सोएगा। उसकी दिनचर्या अष्टपर कैसे हो जाएगी? रात भर पानी लगाता रहा खेतों में या किसी कार्य से गया या विदेश चार दिन गया। बहुत से कार्य हैं गृहस्ती में। तो यह जो वचन है वो निवृत्ति परक साधक के लिए जो वैराग्य मार्ग का साधक है जिसके एक ही कार्य है प्रातः से सायं सायं से प्रातः तक भगवत आराधना उसकी एक सी दिनच होनी चाहिए क्योंकि उसके लिए और कोई कार्य नहीं है और कोई कर्तव्य नहीं भगवान की आराधना के सिवा और गृहस्ती के बहुत से कार्य हैं।
अब छोटा बच्चा है अब आप मंगला करने जा रहे हैं। अब वो रो रहा है। अब आप पहले उसको चुप हुआ। उसको दुग्ध पान कराओ। छोटा बच्चा हग दिया है। अब ठाकुर की सेवा बाद में पहले वह सेवा करो। फिर पवित्र होकर सेवा भेजा। गृहस्ती में बहुत से ऐसे कार्य हैं जो ठाकुर जी से बढ़कर के हमको पहले उसे प्राथमिकता देनी होगी। तभी आपकी गृहस्ती चलेगी। खाली समय है। माला ले लिया। नाम जप कर रहे हैं। गुरु मंत्र की माला पूरी कर रहे हैं। खाली समय ठाकुर सेवा कर दिया। नहीं पति में भगवान, पुत्र में भगवान, परिवार के सदस्यों में भगवान मान के हम अब वो कह रहे हैं कि हमें ऑफिस जाना है और आप सेवा में हट कर रहे हैं तो बैर विरोध हो जाएगा ना और वो भूखे रहेंगे ना।
उनकी दिनचर्या बिगड़ जाएगी ना। तो कौन से ठाकुर की सेवा कर रहे हो? पति में विराजमान ठाकुर तो असंतुष्ट होकर जा रहे हैं। तो हमें लगता है कि अगर गृहस्ती के हम धर्म को समझें तो फिर हमारी दिनचर्या जो होगी वो कुछ और होगी। भागवती विरक्ति का एक अलग इसीलिए सत्संग में सार्वजनिक हो रहा है। गृहस्थ विरक्त सबके लिए सूत्र फेंके जा रहे हैं। अब जो समझ में नहीं आ रहा तो फिर पर्सनल पूछे कि ये आपने जो बोला है ये मेरे लिए है या विरक्तों के लिए है। गृहस्थों के लिए ऐसा नहीं है कि एक सी दिनचर्या बराबर चलनी नहीं चल सकती है।
उनके पास बहुत से कार्य हैं। बहुत सी घटनाएं हैं। कब क्या हो जाए, कौन सी परिस्थिति आ जाए, उस परिस्थिति को हम संभालें और भगवन नाम जप करते हुए जब समय मिले, तो हम ठाकुर जी की सेवा करें। तभी गृहस्ती चल पाएगी। गृहस्ती का एक अलग नियम है। विरक्ति का एक अलग नियम है। आप समझ पा रहे हैं? जी बाबा। अरे प्रणाम लीजिए। नवदीप धाम से आए हैं। अच्छा। सिद्ध जगन्नाथ दास बाबा उस समाधि मंदिर में सारे सेवा के काम करते हैं। वहां से आए हैं। कृपा बनाए रखें। सिद्ध बाबा का सेवा कर सेवा में जो बाधक भाव है वो केवल अहम है।
मान इसका त्याग हो जाए। चराचर जगत में किसी की भी सेवा करें तो भगवान की सेवा हो जाती है। फिर संतों की सेवा बहुत ही दुर्लभ वस्तु है। गुरु पद पंकज सेवा तीसरी भक्ति अमान मान रहित होकर के ये जो मान है अहम है अपने में श्रेष्ठता का भाव है। यही लाभ नहीं लेने देता। जो है अपने लोगों में है उसका त्याग करना है। आचार्य चरण कह रहे त्रणादप सुनी चैन याद तो सबको होगा तणादप सुनीचे तण से नीच अपने को समझे लेकिन इसको उतारने में पूरा जन्म का जन्म लग जाएगा नहीं लग जाएगा अहम जो है यही भगवत प्राप्ति नहीं होने देता यही दिव्य देवी संपदा नहीं जागृत होने देता संसति मूल शूल प्रद नाना सकल शोकदायक अभिमाना संतों की सेवा समाज की सेवा भगवत भाव से बड़े मुश्किल से हमें यह अवसर मिला नहीं भोग विलासिता में माया फसा लेती भगवान ने सेवा में हमें अवसर दिया अब अहम को नष्ट कर देना हमारे अंदर मान ना रह जाए अमानना मान देन कीर्तनीय सदा हरि सदैव भगवान श्री कृष्ण चंद्र जी के चरणों का ध्यान मुख में नाम और अपने को सबसे छोटा वह महान लगता है।
हम संत सेवा में हैं या भगवत सेवा में हैं। बस एक दृष्टि रहे कि कहीं हम पर अहम ना जागृत हो जाए। मान ना जागृत हो जाए। अगर मान आ गया तो फिर बात नहीं बन पाएगी। बड़े महापुरुषों के समीप रहने पर भी जिनके हृदय में अहम और मान रहा वह खाली रहे। प्रेम नहीं पी पाए। यह है मान और यह है दैन्य पान होता है ऐसे दन्य पान करता है और अहम वो छलका देता है वो पकड़ नहीं पाता वो रस नहीं प्राप्त कर पाता इसलिए महाप्रभु चैतन्य देव जी ने कहा अमानीना मान देना अमानी रहकर सबको मान देना और अपने को तणादप सुनीचे तरोर सहना वृक्ष के समान सहनशील तण से भी नीच अपनी को मानना अहम न जागृत होना दूसरों को मान देना स्वयं अमानी रहना और हर समय नाम कीर्तन नाम जप करना इसी से भगवत प्राप्ति है एक श्लोक ही भगवत प्राप्ति के लिए पर्याप्त है प्रणाद सुनीचे तर शना अमानना मानदे कीर्तन सदा हरि
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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