॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1402

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

महेश कुमार चौबे जी राधे-राधे प्रभु राधे-धे महाराज जी महाराज जी आपकी आज्ञा से मेरे पास कोई रास्ता नहीं बचा भगवान की शरणागति और आश्रित होने के लिए हमने लगभग सारे भोग भोग लिए हैं और थक भी गया हूं। अब पिछले नाम जप ही निरंतर प्रयासरत हूं। महाराज जी शरणागत और आश्रित होने का मतलब क्या है और मुझे अब क्या करना चाहिए? आप कह रहे हैं कि आप एयरफोर्स में हैं। यह तो बहुत बड़ी बात है कि कोई भोग भोग कर थक गया हो। नहीं तो तृष्णा पापिनी ऐसी है। थोड़ी देर लगता है कि अब नहीं चाहिए।

लेकिन फिर चाहिए। फिर चाहिए ऐसा बार-बार लेकिन स्थाई ना चाहिए। अब यह बात आप देख लीजिए। ऐसा है ऐसा है प्रभु बार-बार वही विचार तो भोग भोगने की इच्छा फिर चिंतन फिर भोग भोगने की क्रिया फिर उसके बाद भोग भोगने के बाद चलन हां बिल्कुल बिल्कुल ठीक बात है तो इससे अब बचना चाहते हैं सर हां तो भगवान की शरणागति अंदर से भगवान को पुकारो कि हे नाथ हे करुणामय अब मैं अपने जीवन का भार आपके चरणों में समर्पित करता हूं और तीन काम करो भगवान का चरणामृत भगवान का नामामृत भगवान का लीलामृत तीन का पान करो ठीक हो जाओगे भगवान का नाम जप करो तो नामामृत हो गया और

जब आप महीने दो महीने में समय मिले तो बिहारी जी राधा वल्लभ जी इनका चरणामृत ले लो और एक शीशी में रख लो और उसमें पानी मिलाते रहो तो सालों चरणामृत वो चलेगा रोज एक ढक्कन चरणामृत लो भगवान का चरणामृत भगवान का नामामृत और लीलामृत भगवान के चरित्र सुनो संत महापुरुष गाते रहते हैं तो सत्संग सुनो भगवान के चरित्रों का स्वयं गायन करो जैसे श्रीमद् भागवत है तो दशम स्कंध भगवान के लीला चरित्र से भरा पड़ा है जैसे रामचरितमानस है भगवान श्री राम का पावन चरित्र है और भागवत में दसों अवतार के चरित्र तो भगवान के चरित्रों का जो गायन है वह हमारे हृदय को बहुत जल्दी पवित्र करता है।

तो स्वयं भागवत एक दो अध्याय पढ़ो, रोज चरणामृत पियो और रोज नाम जप करो और हर समय यह चिंतन रखें कि अब मैंने वृंदावन में बैठकर संत के सामने अपने आप को भगवान के हवाले कर दिया। अब मेरा जीवन भगवान की शरण में है। यहीं से शरणागत प्रारंभ होती है। जब हनुमान जी मिले तो विभीषण जी को भरोसा हो गया कि मैं भगवान की शरण में हूं। अब मोह भा भरोष हनुमंता हे हनुमान अब मुझे भरोसा हो गया। क्योंकि अगर आप मिले तो इसका मतलब भगवान की हम पर कृपा है। बिनु हरि कृपा मिले नहीं संता।

यदि भगवान की कृपा ना हुई होती तो आप जैसे महापुरुष ना मिलते। तो शरणागति संत मिलन से होती है। तो आज से आप अपने को भगवान की शरण में मानो और खूब नाम जप करो। भगवान का चरित्र सुनो। भगवान का चरणामृत पियो। ठीक है? कोई गलत आचरण अब मत करना। क्योंकि भगवान के भक्त के द्वारा भगवान के विरुद्ध आचरण नहीं होता। अगर विरुद्ध आचरण करोगे तो हमारी बात का रंग ही नहीं चढ़ेगा आपके ऊपर। और बात का रंग चढ़ गया तो फिर उसका रंग नहीं चढ़ेगा। मतलब केवल धोखा है। केवल धोखा। एक मन का जाल है जो हमें चिंतन में फंसाता है और कहता है इसमें सुख है।

और जब हम भोगते हैं तो जैसा चिंतन में सुख मिला था वैसा मिला नहीं। फिर लगता है अब इस प्रक्रिया से भोगेंगे। अब इस शरीर को भोगेंगे। अब इस वस्तु को भोगेंगे। ऐसे भ्रम में पूरा जीवन नष्ट हो जाता है और कभी हमें भोगा आनंद से जो हमें आनंद चाहिए वह नहीं मिल पाता। वो भगवान में ही आनंद मिलेगा। पर मन जो है वह चिंतन के द्वारा हमको गिराता है। क्रिया में उतना सुख नहीं है। चिंतन में सुख है। जब हम किसी गलत क्रिया का चिंतन करते हैं तो आवेश आता है। अब ऐसा करेंगे। तो अब जब उसको भोगते हैं तो वह आवेश मिलता नहीं।

वो सुख मिलता नहीं। क्योंकि मन को सुख चाहिए और मन को सच्चिदानंद सुख चाहिए। मन को नित्य निरंतर सुख चाहिए और वो भोगों में है नहीं। तो इसलिए अनेक जन्म व्यतीत हो गए भोगते भोगते लेकिन आज तक कभी हमें तृप्ति नहीं हुई। हमारा रुपए के प्रति जो लगाव है उससे विषय मिलते हैं इसलिए लगाव है। विषयों के प्रति जो लगाव है मुझे सुख मिलता है इसलिए लगाव है। और जो सुख के प्रति लगाव है वो हम भगवान के अंश हैं। इसलिए ईश्वर अंश जीव अविनाशी चेतन अमल सहज सुख राशि पर गलत जगह सुख ढूंढ रहे हैं।

सुख भगवान में भ्रम संसार में तो अब आज से सुधार शुरू कर दो। ठीक है? प्रेम प्रकाश पांडे जी झारखंड से राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधावल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आपकी कृपा से लगभग नियमित सत्संग और एकांतिक वार्तालाप श्रवण कर रहा हूं। मन के समाधान आपकी कृपा से हो चुके हैं। महाराज जी एक जिज्ञासा है पूज्य अष्टावक्त जी राजा जनक जी को जब मन का समाधान हो गया तो जिज्ञासा कैसी रही? चित्त का समाधान होने के बाद कोई जिज्ञासा नहीं रहती। अभी समाधान नहीं हुआ है।

समाधान का मतलब होता है लक्ष्य में स्थित हो जाना। चित्त का परमात्म तत्व में स्थित हो जाना समाधान होता है। वो शायद शब्द का प्रयोग कर रहे हो लेकिन उसका अर्थ नहीं जानते हो। इसलिए अब जिज्ञासा कीजिए क्या कहना चाहते हैं? पूज्य अष्टावक्त जी राजा जनक जी को अष्टावक्त गीता में कहते हैं कि आत्म आत्मा स्थित है। गुणों से लिपटा हुआ शरीर उठता है, बैठता है, खाता है, जगता है, सोता है। मुझ आत्मा में कोई क्रिया नहीं होती। तो फिर कहां जन्म, कहां मरण, कैसा स्वर्ग, कैसा नर्क ये सब तो देह भाव में है।

मेरी जिज्ञासा है कि स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर, यातना देह, देह, देवह देह क्या होता है और मन, क्र प्राण, जीवन और मरण से कैसे संबंधित है? देखो जब हम स्वप्न में होते हैं तो यह ज्ञान नहीं होता कि एक स्थूल शरीर पड़ा है सया पे और स्वप्न में पूरा विलास होता है। दुखद या सुखद अनुकूल या प्रतिकूल कोई ना वस्तु होती है ना कोई व्यक्ति होता है। वहां एक मन केवल जागृत रह गया। सुशुप्त में नहीं गया तो स्वप्न की रचना कर दी। जे ही जाने जग जाएगे जथा स्वपन भ्रम जाए जिस तत्व के जान लेने पर यह संसार खो जाता है ऐसे जैसे जगने पर स्वप्न पूरा झूठा दिखाई देता है एक बार जनक जी ने स्वप्न में देखा कि वो बहुत गरीब हो गए हैं और वो भिक्षा मांगा भूख से व्याकुल होकर एक हाड़ी में कुछ दाल चावल पकाया खिचड़ी इतने में दो साण प्राण लड़ते हुए आए वो खिचड़ी फैल गई।

बड़े भूख से व्याकुल आंख खुली तो महाराजा धीराज की सैया तो उन्होंने कहा यह सत्य कि वो सत्य सभा में जाकर बड़े-बड़े विद्वानों से बस यही पूछते यह सत्य कि वो सत्य अब यह वो का कुछ थोड़ा सा इशारा करें तो समझ में आवे बड़े-बड़े विद्वान चुप हो जाते हैं तो उन्हें नजर बंद कर देते हैं। आप जाओगे नहीं जब तक उत्तर नहीं मिलेगा खाओ पियो मौज मस्ती से रहो। तो एक दिन बच्चों के साथ अष्टावक्र जी खेल रहे थे। बड़े विद्वान थे। गर्भ से ही विद्वान थे। कहोड नाम के ऋषि इनके पिता थे।

तो वेद पाठ कर रहे थे। तो अष्टावक्र जी मां के गर्भ से बोले अशुद्ध बोल रहे हो। तो उन्होंने पत्नी से कहा कौन है जो मुझे टोक रहा है। बोले आपका पुत्र गर्भ में बोले बड़ा टेढ़ा है। बड़े नाराज हुए कहा अष्टवक्र हो जा। तो गर्भ वैसे आठ जगह से टेढ़े तो बड़े विद्वान थे। वाक्षपालता भी थी। तो बच्चों से जब कहते उन्होंने कहा इतने बड़े विद्वान हो तो राजा जनक जी के कैद में नजर बंद है। तुम्हारे पिता छुड़ा लो ना। माता से कहा आज तक तो आप कहती थी पिता परदेश गए हैं। आज मुझे पता चला कि नजरबंद है और सीधे जनक जी के दरबार में गए तो जो देखे वो हंस दे अष्टवक्त बोले जनक मैंने तो सुना था तुम्हारी सभा ज्ञानियों की सभा है लेकिन यहां तो सब चमड़ा मांस और हड्डी देखने वालों की सभा है।

उनका कहा ऐसे कैसे उपवास कर सकते हो आप हमारी सभा का? ब्रह्म ऋषि के बालक होकर तो उन्होंने कहा क्या देखकर सभा हंस रही है? हमारी आत्मा को देखा क्या? शरीर देखा, मांस देखा, त्वचा देखी, हड्डी देखी, टेढ़ी इसीलिए तो हंसी आई। सब चुप। बोल तेरा प्रश्न क्या है? उन्होंने कहा यह सत्य के कि वो सत्य। बोले ना यह सत्य ना वो सत्य। जो कुछ ही क्षणों में असत्य हो जाता है। स्वप्न में जाते हो तो जागृत असत्य हो जाता है। जागृत में आते हो तो स्वप्न असत्य हो जाता है। यह दोनों असत्य हैं।

अष्टावक जी गुरु हुए कहा घोड़े की प्रकाप में पैर रख के केवल बैठने मात्र से मैं ब्रह्म बोध करा दूंगा उतने समय में। ऐसे महापुरुष तैयार भूमि तो शिष्य तैयार जनक जी तो गुरु दाता तैयार बोध कराने वाले अभी तो अपने फंसे हैं देह में बात ब्रह्म ज्ञान की करेंगे लेकिन पोषण देह और इंद्रियों का होगा मन की गुलामी होगी सच्चाई से यदि गुरु शरण हुआ जाए और गुरुजनों की कृपा हो जाए तो फिर हमारे में जो नाम मंत्र उपदेश गुरु जी ने दिया वो स्फुरित हो और हमारे अंतःकरण का मार्जन हो तो जैसे पवित्र और निर्मल जल में नीचे की तह की बात दिखाई देती है।

ऐसे निर्मल और सम अंतःकरण में वो प्रतिबिंब आत्मा का जो पड़ता है सबकर परम प्रकाशक जोई उसी के सहारे वो वापस लौटता है। मन बुद्धि अंतःकरण आत्म स्वरूप का चिंतन नहीं कर सकते। इनको चिंतन रहित करने के बाद जो स्वरूप बचता है वो आत्मा है ना उसका कभी जन्म है ना उसका कभी मरण है पर जैसे स्वप्न में कुछ ना होने पर भी जो सपने सिर काटे कोई बिन जागे दुख दूर ना होई ऐसे ही जड़ चेतन ग्रंथि पड़ गई यद्यपि मृष छूटति कठिनाई ऐसा ये बंधन है जो केवल गुरु प्रताप से छूटता है क्योंकि साधन करोगे तो अहंकार और पुष्ट होगा और गुरु कृपा नमत्मा प्रवचने लभन मेध बहुतेन तो गुरु कृपा से अहंकार का समन हो देहा अभिमान का और उनकी कृपा से ही अंदर वो बोध रूप परमात्मा स्वयं स्पुरित होता है।

आत्म चिंतन अपने आप में अपने आप का चिंतन है। अंतःकरण के द्वारा चिंतित प्रकृति होती है। अंतःकरण के द्वारा अचिंत तत्व है। आत्म तत्व उसका ना कभी जन्म है ना मरण है। पर जन्म मरण ना होते हुए भी जब तक देहाभास है देहाभिमान है जीवत्व है तब तक उसको बरबस पुनरपि जननम पुनरप मरणम पुनरपि जननी जठरे शयनम उसको भोगना पड़ेगा। अब इसी के शुभ कर्म के अन्य लोक हैं। अशुभ कर्म के अन्य लोक हैं। शुभ कर्म का देव देह है। अशुभ कर्म का जो है यातना देह है। ये सब केवल मायाकृत है। इनकी सत्ता नहीं है।

ना स्थूल की ना सूक्ष्म की ना कारण की ना यातना की ना देव की। समझ पा रहे हो आप? हां। ये सब केवल कल्पनात्मक है। मायात्मक है। जैसी जैसी हम सोच करते जाते हैं वैसा वैसा। एक सोच कर रहा है राम में तो पूरी सृष्टि राम में दिखाई दे रही। एक सोच कर रहा है काम में तो पूरी सृष्टि काम में एक सोच कर रहा है श्याम में तो पूरी सृष्टि श्याम में एक ब्रह्म में तो ब्रह्म में है क्या जैसी दृष्टि वैसी हमारी सृष्टि है और दृष्टि खत्म हो जाए तो सृष्टि है ही नहीं केवल ब्रह्म सर्वम भी नहीं सर्वम तो समझाने के लिए है सर्वम खलमिदम ब्रह्म समझाने के लिए केवल ब्रह्म सर्वम भी मायामय है तो गुरुजनों का आश्रय ले उपासना मार्ग में चले तो उपासना से ही वासना मिटती है और निर्वासनिक हृदय में ही तत्व ज्ञानित होता है।

नहीं पहले खूब नाम जप करो अच्छे आचरण करो गुरुजनों की शरण में रहो समाज की सेवा करो तो तुम्हारा अंतःकरण पवित्र हो पवित्र अंतःकरण से ही चला जा सकता है। आप गृहस्थ हो इसलिए आपको ऐसा कह रहे हैं। अगर विरक्त हो तो फिर उसके लिए दूसरा मार्ग है। कठोर जितेंद्रियता ततीक्षा लोक परलोक के भोगों से वैराग्य इंद्रियों का समन मन का दमन तब जाकर के चित्त का समाधान घोर मुमुक्षता मुझे बस मुक्त होना है। तब ब्रह्म बोध ब्रह्म बोध ऐसे हलवा चटली थोड़ी ज्ञान के पंथ कृपाण के धारा परत खग लगे बारा जो निर्विघ्न पंथ निर्भाई सो कैवल्य परम पद लाई सो वही परम पद हमारा स्वरूप है कोई और नहीं है जीवन मुक्तता हमारे अंदर है बस मसा छूटति कठिन बहुत कठिन यही गुरु कृपा से छूटता है इसीलिए चाहे शिव विरंच सम हो गुरु बिन भव निधि पहले ना कोई गुरु कृपा प्रसाद से ही इस माया पर विजय प्राप्त की जा सकती है।

समझ पा रहे हो भाई? कौशल वशिष्ठ जी गाजियाबाद से राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी प्रभु ने इस संसार में नदी, पहाड़, झरने, समुद्र जैसे सुंदर और प्राकृतिक चीजों की रचना की है। जिन्हें देखकर हमें खुशी मिलती है और देखने की लालसा भी बढ़ जाती है। महाराज जी हम देश-विदेश भी इस अनुभव को पाने के लिए जाते हैं। तो क्या आध्यात्म की दृष्टि से विषय भोगों की अंतर्गत माना जाएगा? जैसे कहीं पहाड़ देखने जा रहे हैं, कहीं समुद्र देखने जा रहे हैं। हां, आंखों का चराना है।

कोई अध्यात्म थोड़ी है। ये आंखों का इंद्रियों का चराना है। इंद्रियां है उनकी। आज इस होटल का चेक करके देखते हैं। भोजन आज उस प्रांत में जाकर आंखों को चराते हैं। ये आंखों का चराना है। अब उसी में भावना कर लो। अब इस पहाड़ में देखा। पहाड़ में भावना कर लिया कि पद्मासन लगाए। भगवान शंकर तप कर रहे हैं। अरे इसमें तो भगवान विराजमान है। अब वही हमारी भक्ति बन गई। तो हम भगवान तो देखने जाते नहीं। हम तो प्रकृति का सुंदर दृश्य देखने जाते हैं। तो वो नेत्रों को चराना हुआ।

नेत्रों का पोषण हुआ ना कि भक्ति हुई। भावना कर ले। झरना गिर रहा है। बड़ी सुंदर लताएं हैं। अब हम लोग जैसे कोई भी दृश्य देखा तुरंत उसे भावना में ले आए। चार पेड़ सुंदर हरेभरे हैं। झुके हुए पृथ्वी को छू रहे हैं। अब वही अपने प्रिया प्रीतम की भावना कर ली। हमारे श्यामा श्याम यहां ऐसे गलबैया देख के ऐसे घूमते हुए इस पेड़ के नीचे ऐसे बैठेंगे। ऐसे बात करेंगे। अब हम अपनी भावना में घूम रहे हैं। दृश्य बाहरी है और आंतरिक चिंतन चल रहा है। और यहां आंतरिक और बाह्य दोनों मायाकृत है।

जो भगवान ने सुंदर सुंदर लता झरना पहाड़ दृश्य बनाए हैं। तो ये हमारे नेत्रों को सुख मिलता है। लेकिन आध्यात्मिक सुख नहीं प्राकृतिक सुख मिलता है। और प्राकृतिक सुख नाशवान है। नहीं नाशवान है। कभी भूकंप आया तो सब ढह गए प्रांत के प्रांत। कभी जल का प्रलय आया मान लो जैसे समुद्र की उताल तरंगे तो प्रांत का प्रांत डुबो दिया तो यह प्राकृतिक टिकाऊ नहीं है सच्चिदानंद नहीं है ये परिवर्तनशील है तो ये नेत्रों को चराना हुआ कोई अध्यात्म या भक्ति नहीं है अध्यात्म भक्ति तो भाव के द्वारा दृश्य देखने पर होती है अब जैसे आप पहाड़ देखने गए लेकिन बद्री नारायण चित्रकूट अभी आंखों का चराना नहीं है अब भक्ति जुड़ गई कि यहां भगवान श्री राम चित्रकूट में यहां ये लीला की।

यहां भगवान ने ये मंदाकिनी अनुसूया जी के तप से प्रकट हुई। इस पर्वत पर भगवान ने अब भगवान जुड़ गए ना तो विदेशों में जाना तो आंखें चराना है लेकिन जैसे हिमालय की यात्रा है गंगोत्री आदि स्थानों में जाना है चित्रकूट आदि जो भी ब्रजधाम जहां जो भी भगवान से संबंधित स्थानों का दर्शन करना ये परम पूर्णिमा है। तीर्थ यात्रा कही जाती है। नहीं कही जाती। विदेश को तीर्थ यात्रा तो आप नहीं कह सकते। क्यों? तीर्थ यात्रा तो जहां भगवान की लीलाएं हैं, भगवान के पावन चरित्र हैं, वही तो कह सकते हैं आप।

तो इसलिए अगर हमें आंख चरानी है तो बहुत बढ़िया अपने देश में है। पहाड़ देखने हैं तो आप देखो चित्रकूट में हरियाली देखनी है तो देखो कितनी सुंदर मंदाकिनी जी बह रही और लाखों और हिमालय तो फिर हिमालय ही है। वहां तो सुंदरता की कहानी है। एक से एक हिम के पहाड़ भी हैं। एक से एक लताएं वृक्ष झरना गंगोत्री यमुनोत्री नदियां परम पावन। तो अपना देश जो है इसकी समानता कोई नहीं कर सकता। जहां की नदियां भी भगवान की प्राप्ति कराने की सामर्थ्य रखती है। गंगा जी का सेवन, यमुना जी का सेवन ये सब भगवान की प्राप्ति कराने वाला है।

जहां की भूमि भी भगवान की प्राप्ति कराने की सामर्थ मान लो अयोध्या भूमि, वृंदावन भूमि, ब्रजभूमि कितने ऐसे महान क्षेत्र है काशी है कि केवल भूमि में पड़े रहो तो भगवान की प्राप्ति हो जाएगी। राकेश कुमार गुप्ता जी भरतपुर से राधा वल्लभ श्री हरिवंश श्री हरिवंश गुरुदेव गुरुदेव जब से नाम जप और अध्यात्म मार्ग पर चलना शुरू किया है मन में इंद्रियों ने अपना शासन उतना ही मजबूत किया है। इंद्रियां बुरे कार्य की तरफ आकर्षित होते हैं। नाम जप और इंद्रियों की इच्छा इन दोनों के बीच मन उलझा रहता है।

कहीं मैं हार ना जाऊं। इस युद्ध में कैसे जीता जाए महाराज जी? लक्ष्य जब तक नहीं बनता तब तक यह समस्या बनी रहती है। जैसे आपका लक्ष्य बन जाए एक अरब रुपया तो हम ₹1 आपको दें तो जलन लगेगी। समझ रहे हैं ना? अगर लक्ष्य बन जाए कि मुझे प्रभु की प्राप्ति करनी है। तो किसी भी भोग की तरफ मन जाए हम थोड़ी जाएंगे। मन जा सकता है। हम नहीं जा सकते। हम ना जाए तो मन कुछ बिगाड़ नहीं सकता है। वो शांत हो जाएगा। इसकी इच्छाओं की पूर्ति करते रहोगे तो ये भारी तृष्णा का बोझा लाद करके फिर नरक जाना पड़ेगा।

फिर जन्म मरण होगा। हमको एक बार ना करना है। इससे एक बार ना करना है। अच्छे से ना करना है। आप सोचो मन कहता है शराब पिए। आपने दृढ़ता पूर्वक नियम ले लिया नहीं पिएंगे। कुछ दिन बाद जाना ही बंद कर देता है। समझिए। फिर कभी दृश्य ऐसा देखा तो फिर मन जा सकता है। पर हम जब ना कह दिए तो मन उसमें राजी हो जाता है। धीरे-धीरे तो यम ही न व्यथते पुरुषम पुरुष सम दुखा सुखा धीरम स्वमृतत्वा कल्पते जो मन और इंद्रियों के द्वारा विषय आकर्षण से दी हुई वृथा को अंदर जो क्लेश होता है उसको सह लेता है लेकिन गलत नहीं जाता वो भगवान को प्राप्त होता है वो अमृत पद को प्राप्त होता है तो अपना लक्ष्य दृढ़ रखिए आप कैसे फिसल सकते हैं हमारा जब लक्ष्य ही नहीं है तो हम फिसल कैसे सकते हैं महाराज जी कशमकश रहती अंदर से ऐसा लगता है कि मतलब नहीं जीत पा रहे हैं, नहीं जीत पा रहे हैं।

फिर नाम जप रोकता है। नाम जप अच्छा तो हरा भी क्या दे रहा है आप हमें यह बताओ। ऐसे बड़ी कोई भी भूल नहीं हो पा रही है। लेकिन छोटी-छोटी भूल हो रही है और वो भी आप चिंता ना करो। आप चिंता ना करो। ये तरंगे हैं। मन की तरंग मान ले। बस हो गया भजन। इसको मारना है। बस शांत रहो। कुछ नहीं बिगड़ेगा तुम्हारा। शांत रहो। तुम गिरोगे भी तो गोद में। भगवान की शरण में हो। उनका नाम जप करते हो कोई चूक भी हो जाए तो भगवान उधर देखते भी नहीं रहत ना प्रभु चित चूक किए की करत सूरत से बारिए की तो आप गृहस्ती में हो ब्याह हो गया है अगर काम की वेदना आती है और आप अपनी पत्नी का संयोग करते हैं तो पाप नहीं करते हैं लेकिन पराई माता बहन की तरफ गंदी दृष्टि से भी देखना पाप हो जाएगा तो आपको भगवान ने जीतने के लिए एक सुविधा दे दी संत महात्माओं की सोचो उनको तो पूरे जीवन युद्ध करना होता है।

अगर 50 वर्ष लड़े और पांच सेकंड फेल हो गए तो 50 वर्ष में पानी फिर गया कोई माफ नहीं करेगा। कोई नहीं माफ करेगा कि ये साधक 50 वर्ष से लड़ रहा है। 5 मिनट में चूक हो गई। कोई बात नहीं। उठो चलो। ये तो गुरुजन बोल सकते हैं। संसार नहीं बोल संसार तो बस उसको उसी दिन से उसी दृष्टि से देखेगा। यह बहुत बड़ी चढ़ाई का मार्ग है और आपको बड़ी सुविधा है। आपको भूख लगी तो भोजन मिल जाएगा। आपको जो वेदना लग रही धर्म युक्त पूर्ति का आपके पास उपाय है। जरा कभी-कभी उनके लिए भी सोच लिया करो।

जैसे पूरी जिंदगी दिए हुए संत महात्मा है। कि इनकी सोच में भी कुछ नहीं आना। सोच में भी क्रिया तो बहुत दूर की बात है। जहां सोच में आया तो फिर क्या रह गया? धतो विषय पुसा अगर विषयों का ध्यान हो रहा है तो संगते सुपते संघात संजयते कामात क्रोध विजयते क्रधा सम्रति भ्रसा बुद्ध नास बुद्ध ना प्रसति आप तो बड़े सुविधा में हो किले के अंदर से युद्ध कर रहे हो नाम जप करो डरो मत करो सदा दिन के रखवारी जिम बालक राखे महतारी हमारे भगवान के वचन है बस सहना होगा सहत सहत बा भगत ग तन गुरु हितगार अंदर जो आक्रमण हो रहे हैं उनको सह जाओ तो महात्मा और टूट गए तो फिर बिखर जाओगे फिर भगवत मार्ग से अलग हो जाओ लगभग 18 19 वर्ष की आयु शरीर की होगी तो ब्रह्मावर्त बिठूर में गंगा किनारे भ्रमण कर रहे थे तो हमने कई बार सुनाया है एक शराबी ने हमको बुलाया नजदीक गए तो देखा शराब पिए हुए दुर्गंध आ क्या कहना चाहता है?

बोला ए हमारे पीछे आओ। तो हम कौतिक स्वभाव के कि आखिरकार क्या करेगा ये? देखते हैं वो पीछे ले गया और वैुंठ धाम में ले गया और भगवान श्री हरि की छवि को ऐसे। बोले देखते हैं इस मूर्ति को। हम कहा हां बोले नीचे क्या है? कहा संगमरमर ये मूर्ति किसकी है? हम कहा संगमरमर की। बोले समझा कुछ? हम कहा नहीं बोले इस मूर्ति को तिल तिल काटा गया टूटी नहीं तो भगवान बन के पूज रही और ये टूटा तो पैरों के नीचे रौंदा जा रहा है संगमरमर वही है और संगमरमर वही है हे तू बाबा जी बना टूटना नहीं तो हमने उसको उसी समय पंचांग प्रणाम किया था कि भगवान मुझे इस रूप में शराबी का अभिले करके और हमें जब कभी ऐसी समस्या मानसिक शारीरिक हुई तो उसके शब्द गूंजने लगते टूटना नहीं टूटना नहीं जो टूटा वो बिखर गया रौदा जाएगा जो टूट जाएगा बस तो कहीं से भी शब्द मिले ना वो भगवान के ही शब्द होते हैं बहुत जगह भगवान विविध उपदेश देते हैं एक बार हम परिक्रमा कर रहे थे तो वृंदावन में वो मतलब तटिया स्थान के इधर ऐसे अखाड़ा है व सामने पीपल का वृक्ष है तो ठीक पीपल के वृक्ष के ऊपर लघुशंका कर रहा था तो पहले तो मुझे लगा अर्घ दे रहा है क्योंकि ऐसी सोच ही नहीं थी कि कोई लघु शंका कर सकता है।

और जब नजदीक गए परिक्रमा करते हुए तो देखा कि लघु शंका वासुदेव भगवान का स्वरूप पीपल का वृक्ष है। लघु शंका करता है। हे बड़े ज्ञानी बनते हो। इसमें वासुदेव दिखाई दे रहा। मेरे में वासुदेव नहीं दिखाई। गलती हो गई। अब कहा गलती हो गई। गलती हो गई। तुरंत प्रणाम किया और कहा भगवान धन्य है। आप आप ही सच्चा ज्ञान देने वाले हो। तुम्हें एक वृक्ष पे वासुदेव दिखाई दे रहा। मुझ में वासुदेव नहीं दिखाई दे रहा। अब प्रणाम किया। कहा प्रभु गलती हो गई। जगह-जगह भगवान उपदेश देते हैं।

अपने को बहुत सावधान रहना है। सहना है और भजन बढ़ाना है। हारना नहीं है। हारना नहीं। एक जीवन में स्वभाव बना लो। हार के भी नहीं हारना है। अगर 100 बार हारेंगे तो 101 बार चढ़ेंगे हम। हम रुकेंगे नहीं। हम भगवान की प्राप्ति करेंगे इस जन्म में। इसलिए धैर्यवान बनो। यह आक्रमण तो होंगे। अगर विजय श्री के लिए चले हो युद्ध में तो आक्रमण तो होंगे। काम के, क्रोध के, लोभ के, मोह के, मद के, मत्सर के चतुर सुजान वही है जो साक्षी भाव से सह जाए। उसके अनुसार क्रिया ना करें।

अगर हो भी जाए तो फिर सावधान हो। फिर चलो। ये बहुत बड़ा मजबूत हृदय वाले का मार्ग है। कायरों का मार्ग नहीं। भगवान का मार्ग। कायरों का नहीं काम बनाने के लिए पहले काम का नाश करना होगा। ऐसे नहीं होता। कोई भी कार्य ऐसे नहीं बनता। पहले कामना का मर्दन किया जाता है। 10,000 वर्ष दाहिने पैर के अंगूठे केवल खड़े होकर ऐसे पत्नी प्राप्त करने के लिए करदम जी ने तपस्या की थी। तब उनको भगवान ले आकर के देहुती जी के तो हम लोग कामना करते क्या तपस्या करते हैं? क्या भजन करते हैं?

क्या भगवान के लिए अर्पित करते हैं? लोग समझते हैं केवल मंदिर गए हो भगवान से कह दिया तो हमारा काम पूरा हो जाएगा ऐसे तो धैर्य पूर्वक रहो आगे खुद आप देखना मतलब आप तो आए और आपको उत्तर मिल गया हम लोग तो ऐसे भटक रहे थे गंगा किनारे कि कैसे धीरे धीरे धीरे धीरे धीरे धीरे जब हार गए हृदय से और प्रभु का आश्रय लिया तो जीत गए जब तक अहंकार साधना का था तब तक कुछ नहीं बना और जब रोना शुरू हुआ तो फिर सब बात बदल जाती है उनके चरणारविंद के बल से बिन रोए किन पया प्रेम पियारा मीत तो सही पूछो तो एक काम बढ़िया हो रहा है आपका अहंकार नष्ट हो रहा है कि मैं किसी योग्य नहीं हूं ये काम क्रोध को भी हम धन्यवाद देते हैं कि इन्होंने हमें भगवान तक पहुंचाने में बहुत सहयोग किया क्योंकि जब ये आकर ताल ठोकते हैं तो हम घुटने के बल हो जाते तो अपने आप पता चला हम कुछ नहीं है तो ऐसे ही जैसे कोई भयावत चीज आवे तो भाग के अपना जो रक्षक उसी की तरफ जाएंगे ना तो इन्होंने शरणागति हमारी पुष्ट कर दी।

काम क्रोधा आदि ने हमारी शरणागति पुष्ट कर दी। अगर हम ऐसे देखे तो सामने उधर वो खड़े तो हमें किधर देखना पड़ेगा? प्रभु की तरफ ही देखना पड़ेगा। तो भागे प्रभु की तरफ कि प्रभु बचाओ तो हमें प्रभु की तरफ भगाने वाले यही तो हुए ना तो हम इनको भी प्रणाम करते हैं कि यह भी हमारी शरणागति में बड़ा भारी सहयोग किए। ये हमने ऐसा अनुभव किया कि ये लोग हमारे अहंकार का नाश करके भगवान की तरफ दौड़ाते हैं। यहां खड़ा मत रह दौड़ क्योंकि आग है ये तो शीतलता तो भगवान के चरणों में तो उधर भागा आने का काम ये किए तो इसलिए बहुत धैर्य पूर्वक चलो अब जो भी हो रहा है मंगल ही होगा।

अमंगल नहीं हो सकता। बिल्कुल आप आनंद पूर्वक रहिए। खूब नाम जप कीजिए। थोड़ा सहनशील बनिए। सहनशील आशय उदार धीरज सहित विवेके ये सहत सहित बाढ़ भगत गृह तन गुर हितगार जो सहन कर गया बहुत आगे बढ़ गया चुप शांत ऐसे कोई तुम्हारे ऊपर थोड़ी है आप जब व्यक्त करोगे तभी है आप जब अनुमति दोगे मन को तभी वो कुछ कर पाएगा नहीं कुछ नहीं कर पाएगा वो केवल जलाता रहता है वो परम धन स्वभाव की इंद्रियां परम धन स्वभाव का मन है साधक को जलाता रहता साधक सोचता है ये काहे को जलन जले भोग भोग ले और भगवान कहते त्यागा शांतम भोग भोगों का त्याग करने पर शांति प्राप्त होती है

और गलत सलाह बुद्धि दे देती है कि भोग ले यार दो मिनट में शांति प्राप्त हो जाएगी बस वो तो क्रिया हो गई लेकिन उसका जो संस्कार बना वो जीवन भर तुम्हें काटता रहेगा भगवान से विलख करता रहेगा इसलिए बहुत सावधान रहना चाहिए राहुल सेठी जी राजपुरा पंजाब से राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी एक बार आपने किसी को कहा था एकांतिक में कि ये देह 35 साल का हो गया है कभी अपने से मिले हो अपने आप से कैसे मिला जाता आता है महाराज जी यही साधना जब गुरु के चरणों का आश्रय ले लेते हैं और उनके गुरु मुख से नाम मिलता है और साधना मिलती है जब उस पर लगते हैं तो हमारी बुद्धि पवित्र होती है।

अब यह अपवित्र बुद्धि है। जिस बुद्धि में संसार सत्य नजर आवे, भोगों में सुख नजर आवे, मान सम्मान अच्छा लगे, परिवार प्रिय लगे, वह अपवित्र बुद्धि है। और जिस बुद्धि में केवल वाह गुरु प्रिय लगे, परमात्मा प्रिय लगे और सब बेकार लगे वह बुद्धि पवित्र बुद्धि है। केवल परमात्मा प्रिय लगे अपना शरीर भी प्रिय ना लगे। देखो महापुरुषों के शरीर को कितना कष्ट दिया गया। अपार कष्ट जो हम सोच के थर्रा जाते हैं और वो कह रहे तेरा किया। यह है वाहेगुरु की प्रीति। यह है पवित्र बुद्धि जो परमात्मा में लगी हुई।

वाहगुरु के सिवा आह नहीं निकला। तेरा किया मीठा लागे मतलब तेरा किया सह सकता हूं। यह बात तो कहीं तक समझ में आती है कि भाई मालिक हो साहब हो। अब जैसा निर्णय कर रहे हो तो दास को सहना पड़ेगा। सहना पड़ेगा और तेरा किया मीठा लगे। इसमें जमीन आसमान का अंतर है। सहना पड़ेगा। अब क्या करें? और उसमें तेरा किया मीठा लागे। तेरा किया मीठा लगे। वाह वाह गुरु जैसे आप कर रहे हो मुझे बहुत अच्छा लगा। यह शरीर रहित महापुरुषों ने केवल प्रवचन नहीं दिया करके दिखा दिया। अपनी गर्दन उड़वा दी।

सामर्थ्य इतनी कि सब कुछ कर सकते हैं। लेकिन चुप होकर सह गए। बोले निहाल सत श्री अकाल। जब हम शरीर को प्रिय मानकर और भोगों का चिंतन करते हैं तो हमारी बुद्धि अपवित्र हो जाती है। और जब हम परमात्मा को प्रिय मान के संसार में बर्ताव करते हैं तो हमारी बुद्धि पवित्र हो जाती है। पवित्र बुद्धि अपने स्वरूप का अनुभव कर सकती है। अपवित्र बुद्धि देह का दर्शन करा सकती है। अपवित्र बुद्धि में मैं पुरुष हूं। मैं स्त्री हूं और अपवित्र बुद्धि में मैं भोगता हूं। मैं करता हूं।

अपवित्र बुद्धि में मैं करूंगा, मैं भोगूंगा। यह सब मायाकृत है। पवित्र बुद्धि में जो कराओगे वह होगा। जैसे रखोगे वैसे रहूंगा। आपके सिवा मेरा कोई नहीं। जब अंदर से रहता है कि आपके सिवा कोई नहीं। तब हम यह जान पाते हैं कि हमारा स्वरूप क्या है। और स्वरूप में जो स्थित होता है वही देह की धज्जियां उड़ जाने पर भी आ नहीं बोल सकता। और जो स्वरूप में स्थित नहीं तो जरा से काट तो रहा निकल जाएगा। नहीं मतलब गजब की निष्ठा गजब की निष्ठा तपते हुए तवे पर बैठाल दिया गया।

ऊपर से जलती हुई बालू डाली जा रही है और विविध प्रकार के क्लेश दिए जा रहे हैं लेकिन आह नहीं है। वही चेहरे पर मुस्कुराहट वही वाहेगुरु का नाम दूसरी कोई तो यह है शरीर स्थिति से ऊपर उठे हुए स्वरूप में पहुंचे महापुरुष को तो हमें चाहिए किसी समर्थ गुरु का पहले आश्रय ले क्योंकि यह अपने मन से नहीं होता है। यह गुरुमुख से होता है। समर्थ गुरु का आश्रय ले। उनके चरणों में अपना जीवन समर्पित करें और उनकी आज्ञा के अनुसार साधना करें। तो साधना करते करते जब बुद्धि पवित्र होती है संसार और संसार के भोगों का त्याग हो जाता है तब अपने स्वरूप का ज्ञान होता है।

वो भी भगवान की कृपा समझो। जान सोई जाने जे देहु जनाई और जानत तुम्हें तुम्हें हो जाए। जिसे सद्गुरु जना दे वही जान सकता है और जो जान गया वह सद्गुरु में हो गया वह गुरु में हो गया अब वो जीव नहीं रहा वो परमात्म स्वरूप हो गया जानत तुम हो जाए जैसे वेद कहता है ब्रह्म ब्रह्म भवती जो ब्रह्म को जान लेता है वो ब्रह्ममय हो जाता है वो ब्रह्म स्वरूप हो जाता है तो पहले हम खूब भजन करें गुरु के चरणों का आश्रय तब हम जान पाएंगे अपने को नहीं तो शीशा देखो तो यही लगता है यही मैं हूं नहीं लगता है।

स्वरूप की तरफ तो नहीं जाता। यही लगता है यह मैं पुरुष हूं। यही ढांचा मेरा है। जबकि यह मायाकृत ढांचा है और मैं परमात्मा स्वरूप हूं और ये प्रकृति स्वरूप है। प्रकृति को परमात्मा मानना यही माया है। प्रकृति को परमा इसी को तो हम आत्मा मान रहे हैं कि यही मैं हूं। नहीं यह प्रकृति का एक यंत्र है और मैं इसका संचालन करने वाला हूं। और जो मैं है वही परमात्म स्वरूप है। उस मैं को जो मैं है वह उसी को ब्रह्म कहा गया है वेद में उसी को वाहगुरु कहा गया है उसी को परमात्मा कहा गया उसी को भगवान कहा गया उसी को कृष्ण कहा गया उसी को राधा कहा गया है जो नाम लो वो वाहेगुरु ही है दूसरा कोई तो है नहीं तो जब तक हम भजन नहीं करेंगे तब तक केवल बातें सीख कर सुना सकते हैं या सुनकर सुना सकते हैं लेकिन अनुभव नहीं होगा अनुभव के लिए हमें भजन करना पड़ेगा खूब गुरुजन जनों के चरणों के आश्रित होकर गुरु वाणी के अनुसार चलना पड़ेगा।

तब हम वो बात समझ में आएगी।

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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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