॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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भगवान के भक्तों के जीवन मे इतने कष्ट क्यों आते हैं ? | Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

कि ऐसा नहीं है कि जो भगवत शरणागत है जो भगवत्प्रेमी महात्मा है उसके शरीर में कोई व्याधि या पीड़ा है या पुरूषौं को आदि के द्वारा पीड़ा पहुंचाई जाए पीटा जाए बोले तुम भगवान के जन्म किस-किस सामर्थ है कि के साथ ऐसा व्यवहार कर सके इन अपराधों की सामर्थ है कृषि कुओं कर्मा हिंसक शुभ वालों की सामर्थ कि प्रभु की रक्षा करते तो इसे जिससे पीटा गया जिसके शरीर में भारी प्रतिकूल रूप से मुझे लगता है कि क्या तरफ नहीं करना है में श्री सनातन जी भगवत अवतारों में शहर कोई जीव कोटि के महापुरुष ने पूरे शरीर में कि वह माओवादी युक्त खुजली जैसे करो पीव निकल पड़े ऐसे पूरे शरीर में श्री रामकृष्ण परमहंस जी भगवत स्वरूप महापुरुष है बड़ा भयंकर कष्ट गले में कैंसर किसी भी महापुरुष के जीवन चरित्र को देखो जिनके आप चरित्र को प्रकाशित रूप से थोड़े अंश में देख पा रहे हैं तो सकता उसमें वह विवरण ना हो जो उनके जीवन में आया कृष्ण पक्ष वाला उसको न रखा गया हो वर्कर हर भक्त की जीवन में स्वयं हरिवंश महाप्रभु की भी शरीर में ब्राह्मण हुए

घाव हुआ दिखाई दिया बड़े-बड़े पुरुष या पूरे शरीर में निकल आया तो वह विद्वानों ने कि व्यास मिश्र जी अद्भुत विद्वान ज्योतिषाचार्यों और लोक प्रिय और ऐश्वर्य संपन्न 19 अलावा करके ज्योतिष विचार विकास कि हरिवंश चंद्र जी के ग्रह विपरीत है इसलिए शरीर में ऐसा है वह महापुरुष कहा गया गृह शांति के लिए कुछ उपाय कीजिए जो बताए जाएं महाप्रभु ने 21 जो बदल लिखे हैं इस फुट वाणी में इसमें ही लिखा है एक पल में है कि दूसरे ग्रह विपरीत है और श्रीकृष्ण की शरण में होकर श्रीकृष्ण नाम जपकर रहा है तो बेचारे गरीब बलिदान यह बिगाड़ पद में कहा कि सारे ग्रह अनुकूल है लेकिन गोविंद से विमुख होकर तुम्हारा जीवन व्यतीत हो रहा है तो यह ग्रह तुम्हारा क्या कर लेंगे ने कहा प्यारी जी रे जी के चरणों के सिवा में किसी ग्रह नक्षत्र की शांति के लिए को निष्क्रिय करने की आवश्यकता है कि बड़े-बड़े भागवतों के जीवन में भी अनंत जन्मों की कर्म परिणाम से विपरीत परिस्थितियां देखी गई जैसे परम पवित्र परम जितेंद्रिय भीष्म पितामह महा भागवत जिनके

द्वारा स्वप्न में भी शास्त्र विरुद्ध आचरण की वृत्ति ने उदय हो सकती जागृत में तो संभव ही नहीं स्वप्न में इसलिए करें कि उसमें शक्ति अपनी पूर्ण बुद्धि की नहीं लगती क्या मन संकल्प कर लें लेकिन यह उच्च कोटि के महापुरुष है जिनकी स्वप्न में भी कभी शास्त्र विरुद्ध वृत्ति का उदय नहीं हो सकता क्रिया और चेष्टा तो बात जाने दो और आजीवन श्री कृष्ण प्रेम में उन्मत्त रहने वाले महा भूतों में भीष्म पितामह जी और छह महीने बाणों की शैय्या पर शयन और आश्चर्य है इसीलिए यहां अगला जियो जो ब्रह्मा जी तवर में महिमा में सूत्र दे रहे हैं उबले हुए वातमत कि तंबाकू हम इस जीव विविध स्तरों में गया है पीछे हो सकता है इसके द्वारा ऐसी गलतियां ऐसी त्रुटियां हुई हो जो अच्छा में हो उन महान अक्षम्य अपराध का मार्जन करने के लिए अतिशय दुलार करके मेरे प्राण प्यारे प्रभु ने जो विधान किया और वह इस शरीर में आकर प्रगट हुआ उसे उत्साह युक्त होकर के यह नहीं कि निराशा इस होकर के त्यौहार प्रभु का भक्त हूं प्रणाम करता हूं फिर भी मुझे शारीरिक

कष्ट मेरे सामने ऐसी व्यवस्था गई है ऐसी परिस्थितियां भक्त कि नहीं करता है है और ना ही करना चाहिए यह व्यक्ति जब परिस्थितियां आती है तब आप की स्थिति ही काम करती है बुद्धि काम नहीं करती आपकी जो इस स्थिति होती है कि अगर आपने वास्तविक अपने आपको शरणागत कर दिया है तो आपको समझाना नहीं पड़ेगा उस समय हो इस पूर्ण ही वही होगा जो शास्त्र कह रहा है कि उक्त कृपा का भली-भांति अनुभव करने वाला उपासक निर्विकार भाव से प्रारंभ का भोग लेता है एक दुखद या सूखा दोनों प्रारब्ध विकार पैदा करते हैं अनुकूल और शुद्ध प्रारब्ध आता है तो हर्ष विकार पैदा करता है प्रतिकूल और दुर्गंध आता है तो सूख यह हर्ष और शोख भक्त के हृदय पर विस्तृत होते हैं अपना अधिकार करते हैं शरणागत भक्तों ने और प्रेमपूर्ण अ अ कि गदगद वाणी से और पुलकित शरीर से समर्पित हुआ भी प्रतिपल समर्पित होता रहता है समर्पित हुआ भी प्रति पल्सर प्रभु की कृपा का अनुभव करते हुए उपर प्रतिपल हे श्यामा श्याम मैं आपकी शरण में हूं एक यदि नहीं समझ में आ रही बात हमें को

इतनी तो समझ में आ रही चाय सुगंध परिस्थिति हो चाहे दुर्गंध हमारे श्यामा श्याम ही हमारे जीवन आधार है और उनकी तरफ से जो पास होगा वहीं आपके पास आएगा वह यह दुखद परिस्थितियों चैन सुखद परिस्थिति हो और दोनों में कृपा का भरपूर विधान है पक्का मानिएगा तो बिल्कुल कहीं संसार मत कीजिएगा का यह कि अगर यह जीते तो कृपा होती यह जीना मरना सोने-जागने जैसा सो गए मर गए जगह पुनर्जन्म हो गए खास बात नहीं हमारा विश्राम स्थल नहीं है विश्राम स्थल है प्यारी प्यारी है कि हम जीतेंगे के लिए इस जीवन की करके और अपने दाम में अपने लीला में प्रवेश ढेर तो तुमको लग सकता है कि रहते तो अच्छा था लेकिन अ कि इनका रहना अगर अच्छा होता तो प्यारी जो पहले जो रहने देते प्यारी जू प्यारे जून को अपने समीप बुलाना समझते हैं कि किसी भी स्थिति में हमारे हृदय में संशय नहीं उत्पन्न होना चाहिए भगवत विरूद्ध प्रश्न नहीं खड़ा होना चाहिए ऐसा क्यों हो गया इस तरह जो जीवन व्यतीत करता है उसे महा भागवत निर्भर भक्त कहते हैं कि वह प्रभु के परम पद का

परमानंद का रस में लीलाओं में प्रवेश पाने का अधिकारी ऐसे हो जाता है बोले जैसे पिता की संपत्ति का पुत्र अधिकारी हो जाता है

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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