॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #61 · 4 जनवरी 2023

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

वृंदावन चंद्र जी सतगुरु देव भगवान आपके चरणों में कोटि-कोटि वंदन सद्गुरु भगवान मैन में यह बात आती है मैन कहता है गुरुदेव ने कहा है हम सबको श्रीजी के पास ही जाना है इसी जन्म में ऐसा सोचता है की भजन किया तो भी वही जाना है और ना किया तो भी वही जाना है भजन किया तो जाना भजन नहीं करोगी तो कैसे जा पाओगे गुरु के वचनों पर सवार होकर तो जया जाता है तो केवल इतने तो नहीं कहा है ना ऐसा करोगे ऐसा समर्पण करोगे इस मार्ग में चलोगे तो निश्चित भागवत प्राप्ति हो करके रही बेपरवाह हो जाए आपको भागवत प्राप्ति हो जाएगी तो शरणागत का स्वरूप क्या है तन वांग manobhir अमली सोहम तवायफ से ता शरीर से मैन से वाणी से अमलाई वासना कामना गंदी बातें गंदी क्रियाएं गंदा कंपन गंदी cheshtaen होंगी जो गुरु आज्ञा है जो शास्त्र आज्ञा है तो तन समर्पित होगा अब मैन से हम वही ओपन करेंगे जो आज्ञा है विपरीत चिंतन का त्याग प्रतिकूल अश्व वर्जन ना शरीर से प्रतिकूल चेष्टा होगी नमन से प्रतिकूल चिंतन होगा और मैं तन मैन वचन से आश्रित हो गया तो जो

मल था वो गया और जब मार गया तो निर्मल हो गए फिर प्राप्त करना थोड़ी होता है फिर जो प्राप्त है उसी का बोध हो गया अब गुरु वाक्य को ना समझने के कारण मनमानी आचरण को तो शरणागत कहां रहे गुरु शरणागत कहां रहे गुरु आज्ञा पालन रूपी रथ पे ही तो बैठकर भागवत प्राप्ति होती तो यहां तो मैन को प्रमादी होने का चांस ही नहीं चिंतन करता है जो अन्य आश्रित हो भागवत प्राप्त निश्चित हो जाएगा कैसे क्योंकि गलत करेगा तो जलेगा ऐसी तप आएगी की उसे उससे बड़ा दुख नहीं होगा धिक्कार

हमारा जीवन को साधु वेश है रोज सत्संग सुनता हूं bhagwadasi तो फिर भी एक गंदे चिंतन ये गंदी बात जब वो अंतर से दुखी होगा तो उसको नाश करने का उपाय उसको मिल जाएगा वहीं उसको नष्ट करके निर्मल हो जाएगा उसको छोड़ कौन नहीं पता जो उसमें सुख बुद्धि होती है हम उसे बात को बहुत सेफ्टी से सुखमय मानकर छुपा के रखते हैं सब कर रहे बुरा नहीं लग रहा बुरी आदत बुरी बातें बुरा चिंतन अच्छा लग रहा है कभी वो निकल नहीं पाएगा शरणागत भजन मार्ग में चल रहे हो गंदी बात है आपके हृदय में तो आपको अश्विनी हो जाएगी ऐसा कुछ नहीं पहले यह हते आपको दृढ़ भाव आने लगेगा कुछ नहीं है भागवत प्राप्ति हो या नो पहले ये दुष्ट द ये हमें रोज जलता है रोज हमारे अंदर ऐसी बात आती वह है जाएगा जब आप अंदर से दुखी होंगे अंदर से पश्चाताप करोगे तो वो आपके बाल से ही बलवान है आपको मार्ग दिखाई देगा की ये मार्ग गए इसमें विकारों का प्रवेश नहीं होगा अंदर ही मार्ग मिल जाता है शायद बच जाता है तो अब जैसे का दिया गया आप नाम लेना शुरू करो निश्चित आपको

बहुत-बहुत प्राप्ति हो जाएगी तो नाम लेने से भागवत प्राप्ति तक क्या यात्राएं रोज सत्संग होता है लेकिन वो सब हमारे जीवन में ए जाएगा आप वृंदावन वास्को और आपको भागवत प्राप्ति हुई तो वृंदावन वास भागवत प्राप्ति के बीच में जितनी रास्ता है वो सब सत्संग वृंदावन दिलाएगा और उसको आचरण में धारण करो आप वृंदावन से भागवत प्राप्त नहीं तो ऐसा बीच-बीच में चर्चा भी होती थी dhamvas करते हुए भी कुछ लाभ नहीं ले पाएंगे यदि आप ऐसा नहीं रहे भजन आज की चर्चा क्या थी आज सुना सत्संग की आप भजन करते हुए भी आप भगोड़ा आनंद का को अपने कर पाएंगे जैसे चलनी से कोई पानी को किसी पत्र में भरना चाहे तो केवल चलनी गीली होगी पत्र नहीं मरेगा क्यों चलनी से आप पानी भरना चाहती हो ऐसे विषय भोग और भजन तो आपको केवल अहंकार होगा की मैं बजाना नंदी हूं मैं महात्मा होते हूं| वस्तुतः आपके पास कोई भी आध्यात्मिक ऊर्जा शक्ति नहीं रहेगी क्योंकि चलने की तरह आपका मैन है विषय वासना में ऊर्जा शक्ति बा जाएगी समझ रहे ना परमत की तो कोई गुंजाइश ही नहीं है

सतगुरु देव भगवान आपकी सिमुक से बहुत बार सुना है की सबका साथ निरंतर भागवत चिंतन ही है तो गुरुदेव भगवान भागवत चिंतन का स्वरूप क्या है मैं कैसे जानू की मेरा भागवत चिंतन हो रहा है प्रभु के आश्रित होना सबसे पहला अब यही बहुत बड़ा बिग है शरीर के आश्रित मैन के आश्रित भोगों के आश्रित जगत के आश्रित कैंची चलाओ सत्संग के द्वारा प्राप्त विवेक से सवेरे काटा केवल भगवद से अब भजन का जो स्वरूप है वह केवल माला चलाना नहीं है जैन से लेकर सोने तक जितनी cheshtaen हैं मैन वचन कर्म से वो अपने आराध्य देव के लिए हो वही भजन है गोपी जैन घर को लिप्त है रसोई बनाती है सारी चेष्टा पति को प्रसन्न करने की पुत्र को दुलार करने की गई गोवा डन की सौफ cheshtaen हो रही है लेकिन सबके साथ भगवती स्मृति चल रही मुरारी padarthrit व्यक्ति तो जहां प्रभु का वहां होता है सब एक सेकंड में छूटा और प्रभु के पास पहुंच गए क्योंकि शरीर रागनी बच्चे को dularkari बंसी बजे वही छोड़ दिया चल दिया क्योंकि पुत्र में ममता ने ममता तो श्री कृष्ण में यह सब

भजन है हर चेष्टा हमारा स्नान करना हमारा शरीर को स्वस्थ रखना भोजन करना शरीर से cheshtaen करना सांप भजन पर वो प्रभु के लिए अगर आप भजन जिसे माला जप ना कहते हो वो भी कर रहे हो पर आपका लक्ष्य विषय हो वो भजन नहीं है आप विषय सेवन कर रहे हो लेकिन प्रभु के लिए जीवन धारण कर रहे हो तो आपका भोजन पाना भी यज्ञ है आपका हर कदम चलना परिक्रमा है आपका हर शब्द स्तोत्र है आपका नींद लेना समाधि है क्योंकि आप भगवद आश्रित और भागवत पारायण हो भागवत पराए ये बात समझना होगा कभी नाम चल रहा है कभी सेवा में कभी जैन समुदाय की सेवा में क्योंकि हम अपने लिए नहीं कर रहे अपने गुरु के लिए अपने इश्क के लिए हर चेष्टा भजन हो गई अपने लिए अगर कर रहे हैं कुछ भी शरीर मैन कर इंद्री सुख इस भजन का फल ये होगा अभी भजन में प्रवेश नहीं हुआ भजन है जहां शरीर राग मिट जाए इंद्रियों के विषयों की sanyogjanit सुखो की अंदर से ragavriti का नाश उसे पैदा कहते हैं जहां इंद्रिय भोगों में वैराग्य हो जाए आपको इसका परिचय बोले जितेंद्र जो श्रद्धा से इस

मार्ग में चला उसे ज्ञान प्राप्त सम्मिट है तो तट पारायण जो सत्य जाना उसमें पारायण हुआ तो फिर अपने आप इंद्री ए गई अपने स्वरूप में श्रद्धावन लगती ज्ञानम तत्पर सहित इंद्रिय अब इसके बाद फिर ज्ञान प्राप्त हुआ तो उसका अनुभव हुआ अब जेहि बोध हुआ पर शांति मुझे आनंद द्वार परम शांति हो गया पहला ज्ञान जो हुआ उससे वो सत्य वस्तु को जाना और जानकर उसके पराए हुआ असत है उससे उसका राग छूटा सत्य को ग्रहण किया सत को ग्रहण करती हुई जितेंद्र हो गया क्योंकि सत्य में महत्व बुद्धि होने से इंद्रिय गई थी उसको ज्ञान असली ज्ञान अब हुआ उसको अनुभव हुआ यही परमात्मा तत्व का अनुभव हुआ paraaham शांति अब मृत्यु भी उसे आसान तने कर सकती और दुखों की बात जाने दो ये है परमलाल चुपचाप रात दिन केवल भागवत प्रसन्नता के लिए सारी चेष्टा करना भागवत प्रसन्नता के लिए जीना भागवत प्रसन्नता के लिए ही हमारे विचार बात कर रहे हैं किसी भी व्यक्ति की सेवा कर पहले उसमें आराध्या दे देखा इसमें प्रभु है उनको सुख मिलेगा इसलिए मैं बात कर रहे हैं

उसको आदर दे रहे हैं बस हो गया और व्यक्ति देखकर के कभी तो यह हमारे को प्रणाम करेगा कभी तो मानेगा की हान तो मैन प्रतिष्ठा लाभ या आगे किसी भी तरह की kritgyta प्राप्त करने की इच्छा की हमारे साथ ये स्वर सुख वंश ये उपासना नहीं बना ये भजन नहीं बना ये संसार एकता में ही आग है बड़ा सूक्ष्म भजन का मल समझ गए ना वैन मोड सर्जरी सदगुरुदेव भगवान आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम भगवान आज सत्संग में आपकी सुमुख से सुना की किसी भी मंगल कामना के लिए शिव भगवान से प्रार्थना नहीं करना चाहिए महाराज जी कई बार दूसरों के हिट के लिए उनकी मंगल कामना भी श्री भगवान से कर सकते हैं दूसरों का मंगल सोचना से सुख लेना यह दूसरों को मंगल सोचना का मंगल तुम सोच ही नहीं सकते तुम उसी का मंगल सोचो की जिससे तुम्हारी ममता जिससे ए सकती है जिस दिन तुम दूसरों का मंगल सोचने की बात समझ में ए जाएगी तो आपके हृदय से निगरे का सर्वे भवंतु सकिना अब ये बात कोई महात्मा बोल सकता है साधारण नहीं बोल सकता आप जांच के देखो दूसरों में कौन है पति

पुत्र रिश्ते नाते पड़ोसी वही जो आप से ममता रखता है ऐसे की मंगल की नहीं सोच सकती तो मैं गली दे और तुम सोचो तुम्हारा मंगल हो जाए ये संत है यह हृदय भगोड़ा नंद से ही इसको समझना होगा अच्छा और की आप चलो किसी भी भाव से सही अपने शरीर के संबंधियों से सही पर उनका मंगल तो सोच रहे मंगल तब होगा जब मंगल भवन को उसमें तुम देखोगे उसमें तो तुम मंगल भवन नहीं देख रहे अपनी ममता का आरोप करके स्त्री पुरुष देख रहे हो मंगल कैसे उसका हो सकता है मंगल तो मंगल भवन के आने पर ही होगा ना मंगल भवन की भावना पर ही होगा ना क्योंकि वही तो मंगल है और क्या मंगल है कोई मुकदमा जीत जय भीम मंगल है हमारी बात समझ में नहीं आएगी घर मंगल है इतने विषयों पर तो उसकी दुर्दशा हो रही है और उसको प्राप्त हो जाएंगी तो नेकी मिलेगा और क्या होगा ये कोई मंगल भावना थोड़ी इसको बढ़िया कपड़े मिल जाए खाने को मिल जाए स्वस्थ हो जाए अरे आश्वस्त है तो पाप नहीं कर रहा है उसके पाप नष्ट हो रहे हैं अब मंगल हो रहा है और इस स्वस्थ हो जाएगा फिर पाप करेगा मंगल

कहां रह जाएगा बड़ी sukshmiyata है परमार्थ के शब्दों को समझने के लिए बहुत शुद्ध विवेक शुद्ध बुद्धि जाइए तभी समझा जा सकता है तो सत्संग में जो कहा जाता है आपको किसी के लिए भी कोई कामना करने की जरूरत नहीं है क्योंकि सब में भगवान राम हुआ है हमको चाहिए की सब में अपने प्रीतम को देखना है और उन्हें की भावना मगन रहना है अगर हमारे पास मंगल भावना कोई है तो यही है की तुम भी कृष्ण कहो तुम भी राधा राधा को तुम्हारा मंगल हो जाएगा ही भगवान कहते हम तो दूसरे का हिट करते क्या करते हम रोड में हलवा पुरी और सब बताते दूसरे का हिट करते हैं उसमें हमारी कोई कामना नहीं अंदर से भगवान को साक्षी करके देखो मैन की कामना है की नहीं इसके बदले में कुछ मिले कामना है की नहीं पुण्य मिले आगे चलकर के हम आज 10000 की पुरी बात करें कल 1 लाख की बैठने लगे और हमारे पास ₹1 करोड़ स्टाफ है की नहीं गणित देखो सर्वज्ञ भगवान तुम्हारे हृदय में बैठा देख रहा है अपने आप पोल खुल जाएगी भाई सत्यता को आप प्रदर्शन नहीं होता प्रदर्शन कुछ और होता पर्दे

के पीछे कुछ और होता है तो पर्दा माया के लगा हुआ है उसके पीछे जो उसको तो तुम जान नहीं का रहे पर्दे का प्रदर्शन होता है पोस्टर पर्दे का होता है जो अंदर वस्तु होती है उसको पोस्टर में प्रदर्शन में ला ही नहीं सकते जहां तुम प्रश्न कर रहे हैं अंदर की बात को समझने के लिए उत्तर मिलना है तो सबका मंगल सबका कुशल तभी हो सकता है जब वो भजन करें अपने स्वरूप को जाने गोस्वामी जी का रहे तबला की कुशल एन जीव कहूं सपनेहु मैन विश्वास करके जब तक कोई भगवान का भजन नहीं करेगा स्वप्न में भी उसका कुशल मंगल नहीं हो सकता अब बोलो भगवान की बात सुनाओ उसको नाम जप करने की प्रेरणा दो तुम नाम कीर्तन करो उसको करवाओ जबरदस्ती करवाओ मानो चाहे नमन उसका मंगल स्वयं हो रहा है जिससे हमारा स्वार्थ का डिक्सल होता है तो वो मंगल स्वार्थ की पूर्ति हुई वो तो अपने भजन को बेचना हुआ भजन का बेचना हुआ भजन का मंगल स्वरूप इस सर्वे भवंतु सकिना हम जो भजन कर रहे हैं चला चल जीव सुखी रहे स्वस्थ रहे निष्पाप रहे सब कुछ शांति मिले सब कुछ ये उसे महात्मा

के हृदय से निकलेगा जो निरपेक्ष मुनीम शांतम nirvairam samdarshan भगवान जिसकी लिए कहते हैं anupraja में हम नित्यं पुरी नित्यं गृह भी मैं उसकी चरण लेने के लिए स्वयं घूमता हूं उसे महात्मा के हृदय से निकलेगा वचन की बात करें तुम्हारे वचन से सर्वे भवंतु सकिना थोड़ी हो जाएगा जब तुम सर्वे भवंतु जो सब में है उसमें जब तुम डूब के कहोगे सर्वे भवंतु तुम्हारी करने निकलेगी परमाणु निकलेंगे और failengi सबको आनंद प्रदान करेंगे जैसे पुष्प में सुगंध ए जाती है मस्त हो

जाते हैं लेकिन कागज का फूल बना लो किसी को मंगल हो जाएगा मंगल तुम्हारा और सब का मनाने की जरूरत नहीं अगर माना रहे हो तो बेच रहे हो कभी कोई किसी गली चलते बीमार को उठाकर अस्पताल ले जाओ और उसके लिए फिर सोचो जिसको जानते भी नहीं हो जो कभी तुम्हें नमस्कार ना किया है ना करेगा मेरे प्रभु है जो भी भजन है इसको सुख मिले यह कोई महात्मा बोल सकता है दूसरा नए जहां भजन की बात जांच समर्पण की बात तो जिसने अपने आप को प्रभु का पार्षद मैन लिया कुछ भी दे सकता है जैसे अपराध किया दुर्वासा ने परमवीर जी के आज तक यदि हमारी संतों में निष्ठा है भगवान का भजन किया है जो भी हम नियम निष्ठा की उसके प्रभाव से सुदर्शन चक्र आप शांत हो जाएं और दुर्वासा की जलन में तत्काल मिट गई उनके लिए जो उनके लिए मरने के लिए कृपया पैदा कर रहे हैं उनको भस्म करना चाहते उनके लिए सारा भजन तो चरणों में गिर के आज देखा भगवान की भक्ति की महिमा क्या होती है अभी तक तो हम तपस्या की गर्व में द पर आज मैं जान गया हरि के दसों में कितनी शमा कुलजीत जी लखनऊ

से श्री हरिवंश महाराज जी महाराज श्री असत वस्तुओं में स्वीकृति तुरंत होती है साथ में इतनी शीघ्रता से क्यों नहीं हो पाती क्योंकि शत बहुत नजदीक है पर हम अभी तक बाहरी भटकते रहे असत में भटकते रहे अपने को असत ईमान में आप जो प्रश्न करता है शरीर भाव से तो बोल रहा है प्रश्न करता कोई भी स्त्री पुरुष शरीर भाव से तो बोल रहा है शरीर क्या है ना तो जब जिसका परिचय नहीं होता उसे प्रीति नहीं होती बिन जाने एन होय पार्टीटी हो नहीं प्रीति बिन प्रीति त्वचा ने विश्वास था और बिन विश्वास भगत ही नहीं ते विनम कृपालु विश्राम जाना ही नहीं तो फिर पार्टीटी कैसी है तो पार्टीटी जिसे जाना है तो तुम अपने को सतना है तो आप सत को जान जाओगे तो शत को स्वीकार सेकंड के कम भाग में हो जाएगा पर आपने असत अपने को माना है असत को जला है तो फिर स्वीकृति सत की कैसे हो जाएगी यदि सत्य से पहले इसकी सत्ता नहीं थी मैन के गर्भ में आया और कुछ समय बाद इसकी सत्ता नहीं रहेगी सत्य ही रहेगी त्रिकाल में नहीं रहेगा ये एन रूप रहेगा नए शब्द रहेगा तो बीच

में भास रहा है ना तो जो बीच में बाहर से आए हो असत है जो इस समय है वह था वह रहेगा और वही है केवल तुम्हें दिखाई दे रहा है नष्ट हो रहा है प्रतिपाल समझ में नहीं ए रहा है तो हमारा सत्य से माना हुआ भाव जुड़ गया मेरा पति है अगर आप अपने स्वरूप को जान जाए तो आपको हंसी आएगी शीशे के महल में खड़े हो जाओ उसको बताएं की यह जो रूप है तुम्हारा पति यह जो रूप है तुम्हारा पुत्र यह जो रूप तुम्हारा मित्र यह तुम्हारा शत्रु itwajega नहीं की पागल है मेरे ही तो सब रूप है इस शीशे के महल में दूसरा कॉल है बस सत्य जान गए तो मीरा जी जैसे कहते हैं मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरों अभी दूसरों माना है उसमें आपको छोड़ना पड़ेगा तो पहले अपने को मानो अपने को मानना असद देखो आप अपनी शब्द आने पर शिक्षा में जो रूप आपने देखा अपना वही आएगा समझ में यही आएगा दर लगता है क्यों की वही पति पुत्र जिसे एकांत में आप अपना मानते द नहीं वो चले गए कौन उन्हें जानती पर वह चले गए जानती तो शरीर को थी उसको तो जाना ही नहीं ना कभी तो आप शरीर को क्यों अपना

नहीं मैन रहे अनजाने में भी वह सत्य वस्तु को मैन रहे द पर स्वीकृति पर जला दो क्यों जिसको जानती नहीं थी उससे कहा तुम्हारा प्यार तो इसी से था ठीक है पर वो नहीं रहे अब वो को ले जपी हो अगर वो कोई जाल लेना तो हमने तुम दफ्तर गम एक ही है दूसरा कोई है नहीं बस अब ये थोड़ा ऊंचाई की बातें है खूब नाम जप करो सत्संग करो धीरे-धीरे

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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