॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #588 · 21 जून 2024

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

पूनम जी कोट कपूरा से श्री हरिवंश गुरुदेव आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम गुरुदेव आपकी कृपा से जितना भजन बन पाता है उतना कर लेते हैं पर फिर भी मन प्रसन्न क्यों नहीं रहता अभी जब तक हमारे हृदय में नता है पाप है कामना है वासना है तब तक प्रसन्नता नहीं आती प्रसन्नता तो ब्रह्म भूत होने पर आती है भगवत साक्षात्कार होने पर ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा न सोचत न कांक्षा जो सर्वत्र अपने प्रभु का ज्ञान हो जाता है और निरंतर बिना किसी कामना के भगवत अखंड स्मृति चलती

है तब प्रसन्नता आती है वो एक बार आती है प्रसन्नता तो जीवन में कभी जाती नहीं कोई दुख उस प्रसन्नता को बा नहीं कर सकता इसलिए खूब भजन करो अभी जलन हो अशांति हो आनंद ना मिले मन ना लगे इसकी परवाह मत करो भजन करते जाओ यह सब क्षीण होता चला जाएगा और आप आगे बढ़कर उस आनंद को उस प्रसन्नता को प्राप्त होंगी जो संत महापुरुषों को प्राप्त होती है और उसी आनंद के बल से बड़े-बड़े कष्टों को सहते हुए मुस्कुराते हुए जीवन व्यतीत करते हैं तो नाम जप का प्रभाव आएगा पर पहले पापों का नाश करेगा पाप की प्रवृत्ति का नाश करेगा मलिन वासना कामना का नाश करेगा अनर्थ निवृत्ति के बाद ही हमें सत्संग का रंग भगवत नाम का रंग और फिर जब हमारा भाव बनता है तब आनंद की प्राप्ति होती है इसलिए सब बन जाएगा तुम्हें चिंता नहीं करनी भाव कु भाव अन खाल सह नाम जपत मंगल दिश दस जपते जाओ जपते जाओ आनंद की अनुभूति हो जाएगी जैसे कई दिनों का भूखा आदमी हो और उसे दो चार कवल पवा करर रोक दिया जाए तो भूख की जलन बढ़ जाएगी ऐसे ही हम बहुत जन्मों से से भगवान से

बिछड़ हैं अभी थोड़ा भजन करते हैं तो अभी जलन शांत नहीं होगी और जब वही आदमी आ पेट हो जाए अच्छे से पा तो उसको फिर स्वाद आने लगता है कि खीर कैसी पूड़ी कैसी कचौड़ी कैसी भूखे आदमी को स्वाद नहीं पहले पेट भरना होता है हम लोगों को पहले नाम जप एकत्रित करना है राधा राधा राधा राधा राधा राधा राम कृष्ण हरि जो नाम प्रिय लगे जब नाम रूपी धन एकत्रित हो जाएगा तब स्वाद आएगा क्योंकि सब पाप नष्ट हो जाएंगे हृदय निर्मल हो जाएगा तो फिर हमें पहचान क्या हो कि उतना नाम जप हमारे अंदर आ गया जब नाम जपते जपते रोमांच होने लगे व आंसू बहने लगे और बे विचार के कोई विचार नहीं पर हमें रोना आ रहा है तो आप जान लो हृदय निर्मल हो रहा है अब हमारे अंदर आनंद आने वाला है अब आनंद श्रु से अभिषिक्त कपूल भगवान के चिंतन में जब अंदर से आर्थ भाव से रुदन करते हैं तो भगवान कृपा करके हृदय में स्वयं प्रकाशित होते हैं आनंद रूप से प्रसन्नता रूप से वो अखंड होती है वोह किसी घटना किसी द्वंद में बाधित नहीं होती है इसलिए वह भक्त द्वंती हो जाता है

गुणात हो जाता है राम मोहन शर्मा जी विदिशा से श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी मैं 1988 से वृंदावन आ रहा हूं मुझे स्मरण आ रहा है कि मैंने श्रीधाम वृंदावन में मर्यादा का उल्लंघन किया है मैं अब क्या करूं क्योंकि मैंने यहां मर्यादा विहीन कर्म कर दिया था जिससे लाडली ज क्या मुझे क्षमा कर सकेंगी हां बिल्कुल क्षमा कर देंगी वृंदावनी प्रभाव सुन अपनो ही गुण देत जैसे बालक मलिन को मात गोद भर लेत जैसे बेटा विष्ठा लगाए हो तो दूसरों की दृष्टि में तो विष्ठा लगाए बालक दिखाई देगा पहले विष्ठा दिखाई देगा फिर बालक दे गंदा है लेकिन मां को केवल अपना बालक दिखाई देता है तो बोले वृंदावन का प्रभाव सुनो वृंदावन प्रभाव सुन अपनो ही गुण देत वृंदावन अपना गुण देता है जैसे बालक मलिन को मात गोद भर ले ऐसे अगर कोई अपराध बन जाए और धाम से अंदर से जलन करते हुए क्षमा मांगे तो माता की तरह व क्षमा ही कर देता है या मानता ही नहीं कि अपराध हो गया है तो आपके हृदय में जो प्रश्चित हो रहा है जो जलन हो रही कि मेरे से अपराध बन

गया धाम कृपालु है वोह क्षमा कर देगा पर बात यह कि पुनः फिर ना हो वह पुनर्व ना होनी चाहिए हां और कितना भी बड़ा अपराध बन जाए जो धाम का वासी है जो अपना शरीर धाम में छोड़ता है धाम कृपा कर करके उसके सारे अपराधों को क्षमा करके भगवत प्राप्ति कराता है यह धाम की विशाल महिमा है वृंदा टवी मां की तरह प्यार करती है अपने वास करने वालों को हां वृंदावनी प्रभाव सुन अपनो ही गुण देत जैसे बालक मलिन को मात गोद भर ले तो जो अपराध बन गया उसके लिए जो जलन हो रही है जो पश्चाताप हो रहा है यही उसका प्रश्चित है और ये अपने आप नष्ट हो जाएगा आपको उसकी चिंता नहीं करनी पर पुनरावृत्ति ना हो धाम में यह बस ध्यान रखने की बात है हर्षवर्धन सिंह जी गुजरात से हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में डंड प्रणाम गुरुदेव भगवान शरीर की 10 इंद्रिया रजोगुण रजोगुण तत्व और पांच अंतःकरण सतोगुण पांच अंतक पांच अंतःकरण इन्होंने ऐसा लिखा सतोगुण पाच अंतक का पांच अंतःकरण कहां नाम बताओ सत्व गुण मूलक पांच अंतःकरण सत्व गुण तो अंतःकरण कहां है पांच बताओ

नाम बताओ पाच अंत अंतःकरण चतुष्टय चार है मन बुद्धि चित्त अहंकार अंतःकरण चार है पांच ज्ञान इंद्रिया है पांच कर्म इंद्रिया है तीन गुण है सतोगुण रजोगुण तमोगुण कहना क्या चाहते हो कह रहे कि जब ये इंद्रिया और अंतःकरण माइक है और भगवान तो माया से परे हैं तो इस माइक अंतःकरण से प्रभु का आश्रय कैसे ले महाराज जी देखो माइक माया में लगाने के कारण है नहीं तुम्हें गीता का श्लोक नहीं याद इंद्रिया मनम इंद्रियों में मैं मन हूं और विभूतियों में पढ़ो मैं ही इंद्रिया हूं मैं ही त्रिगुण माया हूं जो सतोगुण रजोगुण तमोगुण मैं ही हूं पढ़ के तो देखो विभूतियां जब तुम माया को देखोगे तो माया दिखाई देंगे और जब कृष्ण की तरफ चलोगे तो ये सब कृष्णम है यह सब कृष्ण स्वरूप है बच्चा जब सृष्टि नहीं थी तो केवल प्रभु थे और जब सृष्टि नहीं रहेगी तो केवल प्रभु रहेंगे तो बीच में क्या है प्रभु ही तो प्रभु है ना यही बात समझाने के लिए दो विभाग किए गए पहला है और दूसरा नहीं तो जिसमें हम फंसे हैं उसमें पहले उसे अन्वय व्यतिरेक कहते हैं तो

व्यतिरेक माने नहीं यह नहीं यह नहीं और जब हम हटाते हटाते आ जाते है और जब वहा है में बैठकर देखते तो सब कुछ है जैसे ब्रह्म सूत्र कहते हैं कि ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या कहते हैं ना उसको मिथ्या को हटाते चले जाओ और जब गुरु प्रसाद से है तत्व ब्रह्म तत्व का अनुभव होगा तो फिर वही कहते सर्वम लमदम ब्रह्म ना नास्ति किंचन ब्रह्म के सिवा कुछ है नहीं किंचन मात्र केवल वही ब्रह्म ही ब्रह्म है तो बच्चा ये इंद्रिया ये मन सब कुछ भगवान ही है पर जब तक माया का चिंतन माया में चिंतन भोग में चिंतन कामना में तब तक इनको हटाने की बात इनको अपना मत मानो इनको दो मार्ग हैं इनके साक्षी बनो तो ज्ञान मार्ग में जाओ और इन्ह भगवान में लगा दो तो भक्ति मार्ग में चले जाओ और जब भगवान में लगाई जाती है तो भगवान में हो जाती है जैसे अगर अगर ना समझ पाओ लोहा है जब उसे आग में रखते हैं तो आग में हो जाता है कि नहीं हो जाता और विष्ठा आग में रख द तो भी आग में हो जाएगा चंदन रख दे तोव भी आग में क्योंकि आग अपना स्वरूप उसे प्रदान करती है ऐसे

इंद्रिया मन जब भगवान में लगती है तो सब भगवत स्वरूप हो जाते हैं क्योंकि भगवान अपना स्वरूप उसी को दे देते हैं अब मन मन नहीं बुद्धि बुद्धि नहीं चित्त चित्त नहीं अहम अहम नहीं श्री कृष्ण भक्त का मन श्री कृष्ण भक्त का चित्त श्री कृष्ण भक्त का अहम श्री कृष्ण और भक्त की बुद्धि श्री कृष्ण पूरा अंतःकरण श्री कृष्ण अब गुणों का प्रभाव नहीं अब श्री कृष्ण का प्रभाव चलेगा वही सतोगुण वही रजोगुण वही तमोगुण जो माया के हैं जब हम भगवान में लगते हैं तो गुणात होकर सब भगवत स्वरूप हो जाते हैं भगवान में लगने से चूंकि भगवान ही पहले थे भगवान ही बाद में रहेंगे तो बीच में जो कुछ है व सब भगवान बने हुए हैं इसी को जानने के लिए दो विभाग किया गया एक नहीं है और एक है और जब है में पहुंचते तो सब कुछ ऐसा समझ में आता है और जब हमें काटना होता है मोह तो पहले ये सब माया है तो हम नाम रूप भगवान की लीला भगवान के धाम भगवान की महिमा जब इसमें लगे और जब अनुभव हुआ तो सब कुछ भगवान है ऐसा सबको अनुभव हुआ सीराम में सब जग जानी सब कुछ प्रभु

ही है चाहे संस्कृत में बोल लो सर्वम लमदम ब्रह्म वासुदेवा स्मति ईवास मदम सर्वम यत किंच जगम जगत और चाहे हिंदी में बोल दो जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम में वही प्रभु ही है ऐसा अनुभव होता है हर भक्त को समझ पा रहे हो शिवम जी मध्य प्रदेश राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी वृंदावन में जब श्री विग्रह बांके बिहारी लाल राधा वल्लभ लाल राधा रमन जब भी कहीं दर्शन करने जाता हूं तो अंत आत्मा में आनंद नहीं होता महाराज जी जिससे कक भजन नहीं बच्चा भजन के बिना आनंद नहीं बढ़िया बात कह रहे हो कहीं भी चले जाओ आनंद होगा जब अपने हृदय में भजन होगा भजन नहीं तो आनंद नहीं अच्छा बिहारी ज राधा रमण ज राधा वल्लभ ज यह कोई मूर्ति नहीं बच्चा ये साक्षात प्रिया प्रीतम बने हैं यह कहीं जयपुर से बन के ले आए य यही वृंदावन से स्वयं प्रकट स्वयं बाके बिहारी जू श्यामा कुंज बिहारी स्वयं मूर्तिमान है लेकिन हमारे भजन ना होने के कारण हमको देखो उनके पास भी आनंद नहीं मिलता इसीलिए हम कहते भजन करो कहीं भाग के चले जाओ भजन नहीं है तो

तुम्हें आनंद नहीं मिलेगा शांति नहीं मिलेगी आनंद और शांति यहां है तो बाजार में घूम आओ तुम शांत रहोगे आनंदित रहोगे और अगर आनंद शांति नहीं तो गुफा में बैठ जाओ तो अशांत रहोगे भगवान के समीप भी अशांत रहोगे अगर भजन नहीं है इसीलिए हम खास बात कहते हैं अंदर ही अंदर भजन करो जो नाम तुम्हें प्रियो खूब नाम जप करो जो गुरु ने नाम दिया है उस परे प्राण समर्पित कर दो आनंद आने लगेगा जहां भी जाओगे आनंद ही आन बात है आनंद अपने अंदर है अपने अंदर तो आनंद है नहीं तो फिर बात आनंद कैसे अनुभव में आएगा आनंद के मूर्तिमान रूप है बिहारी ज राधा रमण ज राधा वल्लभ लाल ज लेकिन आनंद तब मिले ना जब हमारा दर्शन ठीक हो हमारे दर्शन के लिए हमारा भजन बल चाहिए भजन बल है नहीं तो कैसे अनुभव में आवे ये था कि जिस तरह आपको मैं देखता हूं आप साक्षा शी जी है वो अनुभूति प्राप्त तो ये भाव है तुम्हारा अगर यही बात बिहारी जी को होज कि साक्षात है तो ऐसे आनंद तो कोई बात नहीं भजन करो एक जगह अगर कहीं बन जाए तो एक जगह अगर सवाल हमारा हल हो जाए तो सब

जगह हल होने लगता है जैसे हम गुरु को भगवान मान लिए परब्रह्म तो अब हमारा जब ज्ञान आगे बढ़ेगा तो अखंड मंडलाकारं व्याप्त मेन चराचर तत् पदम दर्शित मेन तस्मै श्री गुरुवे नम सवाल हमारा हल होने लगा एक जगह माना कि हमारे परब्रह्म है तो अब हमारे फिर भाव बढ़ेगा कि सब जगह गुरुदेव हमारे विराजमान है फिर आनंद की अनुभूति हो जाएगी एक जगह मान लो परब्रह्म है तो आगे भावना बढ़ती चली जाएगी अच्छा अभी क्या है कि कितना भी समझाए लेकिन बिहारी जो राधा वल्लभ जी के लिए हमारे भाव मूर्ति रूप है मूर्ति रूप तो जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरति देखी तिल तैसी अब हमारी भावना की तो मूर्ति है तो फिर वो मूर्ति ही है अगर भावना हो जाए कि साक्षात प्रभु है तो अभी रोना आ जाए हो कितनी कृपा आज मुझे बिहारी जी के दर्शन मिले आज मुझे राधा वल्लभ लाल खूब नाम जप करो बढ़िया है आगे चलकर के भाव वही कृपा पा करके देंगे उन्हीं के दिने भाव से हम जब देखते हैं तब रोना आ जाता है उनको देख के कि हाय मेरे प्रभु देखो कितने करुणा में है कि हमारे दर्शन के

लिए हर समय खड़े रहते हैं हमारे दर्शन देने के लिए हर समय खड़े रहते हैं हमारे वृंदावन के जितने ठाकुर सब खड़े रहते हैं नहीं खड़े रहते दर्शन के लिए कि आओ आओ तुम्हारा कल्याण हो तुम्हारा मंगल इसीलिए तो खड़े तो हमारे भाव नहीं बन पाते तो हम आनंद नहीं ले पाते आनंद भाव का है जितना हमारा भाव बढ़ गया उतने ही आनंद का अनुभव होगा एक बार महाप्रभु चैतन्य देव श्री जगन्नाथ जी के दर्शन कर रहे थे तो बड़ी भीड़ थी तो एक जो बुढ़िया माई थी बगल में ख खंबा था उसमें पैर लगाकर महाप्रभु के कांधे प चढ़ के ऐसे दर्शन भक्त लोग एकदम बिग तब महाप्रभु ने कहा कि इस बुढ़िया माई के भाव तो देखो जगन्नाथ जी के दर्शन की लालसा तो देखो महाप्रभु तो भाव देखते हैं ना दर्शन की लालसा तो देखो कि उनको कुछ नहीं दिखा बस दर्शन और हम क्या है हम सामने देखते हुए भी कोई सुख नहीं मिल रहा इसका मतलब हमारे अंदर भाव की कमी है तुम नाम जप करें प्रभु से प्रार्थना करें कि हमें भाव दे जिससे हम बिहारी जी को देख पाए हम राधा वल्लभ जी को देख पाए ये मूर्तिमान

प्रभु साक्षात विराजमान है र्चा विग्रह के रूप में प्रिया प्रीतम स्वयं परिणित हुए हैं बिहारी जी राधा वल्लभ राधा रमण राधा रमण जी तो शालिग्राम थे ना तो जब आचार्य चरण बड़े व्याकुल हुए जब एक भगत पोशाक दे रहा था तो पूछा आपके ठाकुर जी की पोशाक कितनी कैसी लगेगी उ कहा हमारे ठाकुर जी तो शालिग्राम है और मन में आया कि अगर ठाकुर जी अंगरूप प्रकट करके विराजमान होते तो आज हम भी पोशाक पहनाते देखा जब श्री ठाकुर जी को उठा ले गए तो शालिग्राम की जगह राधा रमण जी महाराज

भी राजमान थे य साक्षात ऐसे ही निधिवन राज में श्री स्वामी हरिदास जी रोज दंडवत करके ऐसे गान पद किया करते थे तो विट्ठल विपुल देव जी ने कहा कि प्रभु इधर इस उनका देखो वो रंग भवन है इसमें देखो प्रिया प्रीतम विरा देखा साक्षात अब जब कहा देखो तो दृष्टि भी प्रदान की ना प्रिया प्रीतम और कहा जाओ झारी लेके आओ कि ये केवल भावना में नहीं दिखा रहे साक्षात विराजमान तो झारी उठा के लाए फिर विट्ठल विपुल देव जी ने प्रार्थना की कि जगत के प्राणियों को यह दर्शन कैसे हो तब स्वामी जी ने प्रार्थना की तो श्यामा कुंज बिहारी एक में हो गए वही साक्षात बिहारी जो निधिवन में प्रकट हुए तो कोई मूर्ति थोड़ी साक्षात बिहारी ज राधा वल्लभ लाल ज राधा रमण ज राधा गोविंद देव ये साक्षात प्रभु है हमारे अब देखो हमको अपने प्रभु को देखने में भी सुख नहीं मिलता क्योंकि हमारा हृदय मलिन है हमारे नेत्रों में अभी वो भाव नहीं जागृत है हमारे कहीं ना कहीं हृदय के कोने में बैठा ये तो मूर्ति है मान लो इधर देख रहे हो तो लग रहा है चैतन्य रूप में

विराजमान है वो तो मूर्ति तो जैसे हम भावना करेंगे वैसे ही प्रभु हमें दर्शन देते वैसे ही हमें अनुभव कराते हैं मूर्ति ने साक्षात विराज मान है गुरु जी एक हमारे मन में संदेह है हमारे मन में संदेह है गुरु जीी अब हमारी एक बात सुनलो जो तुम्हें गुरु जी ने नाम दिया है उसमें विश्वास है कि नहीं विश्वास है गुरुजी तो आप संदेह मत करो संदेह के लिए अवसर नहीं है संशय आत्मा विनश्यति आप शब्द को समझिए साधन और इष्ट के नाम पर संदेश शब्द हटा दीजिए कोई कृष्ण जपता कोई राम

जपता है कोई शिव जपता है कोई हरि जपता है कोई वाहेगुरु जपता है सबके वही परमात्मा तत्व दूसरा लेकिन हमको जो गुरुदेव ने दिया है हम उसी का जप करते हम वही जपते गुरुजी हमारा ये प्रश्न है जैसे कृष्ण नाम में जो अड़ है अड़ कोई उच्चारण नहीं करता अलग जगह ना उच्चारण करते असली बात आप दोष दर्शन आप दोष दर्शन क्यों करते हैं हम आपसे पूछ रहे हैं आप साधु होकर दोष दर्शन हम व्याकरण जाते हैं गुरुजी ना आप अपने को देखिए आप छात्र को समझाइए पर आप जपने वालों के प्रति दोष दर्शन क्यों कर रहे हैं आपके छात्रों उनको आप समझाइए आप स्वयं शुद्ध जपि लेकिन अगर भक्त कनुआ बोल दे ना तो उतने में प्रसन्न हो जाते कनुआ बोल दे आप समझ रहे हो ना ये तो भाव की बात हो गई गुरुजी ना तो वो कृष्ण नहीं उच्चारण कर पा रहा अगर किशन कहता है तो वो बढ़िया भगवान की प्राप्ति कर लेगा क्योंकि भगवान जान रहे उसको पुकार रहे हैं अगर आप गलती करोगे तो आपको नहीं मिलेंगे क्योंकि आप व्याकरण पढ़ रहे हो और वो व्याकरण नहीं पढ़े और किशन किशन किशन बोले उसको भगवत

प्राप्ति हो जाएगी क्योंकि वो उतनी ही योग्यता से वो केवल भगवान को पुकार रहा है भगवान जान रहे हैं मेरा नाम ले रहा है भगवान ये बातें व्याकरण आचार्यों के ऊपर देखते हैं कि तुम वेद पढ़े हो तुम शास्त्र पढ़े हो तुम त्रुटि कैसे कर रहे हो अगर एक आदमी ना कृष्णो कृष्णो कृष्णो ऐसे बोले ना तो उसमें भगवान प्रसन्न हो जाएंगे आपको चाहिए कि अपने व्याकरण और विद्वता का प्रयोग अपनी सुधार में करें और आपके अंडर में जो साधक हो उनको सुधार करें लेकिन जो भोले भाले नाम जब कर

रहे हैं उन पर दोष दर्शन ना करें क्योंकि भगवान उतनी ही पुकार से उसको मिल जाएंगे और आपको नहीं मिलेंगे क्योंकि आप विद्वान हो आपको वैसे ही चलना पड़ेगा बिल्कुल शुद्ध बोलना पड़ेगा और वो अशुद्ध बोल रहा है तो उसे भगवान मिल जाए कर्माबाई बिना स्नान के खिचड़ी बना के खती थी भगवान पाते थे ना के कह दो भाव तो आप क्या जानते हो किशन किशन कर रहा उसका अंदर कितना का भाव है आप इस बात को समझिए एक नंग धड़ंग यमुना के किनारे हमारे वृंदावन में रहते और राजकुमारी राजकुमार राजकुमारी राजकुमार आप लोग तो जानते होंगे ब्रजवासी राजकुमारी राजकुमार कैसे जानोगे किसके भाव को अगर वो किशन किशन बोल रहा है तो भगवान देख रहे हैं कि मेरे लिए बोल रहा है दोष दर्शन करोगे तो आपकी बुद्धि भजन से रहित हो जाएगी गुरु जी हम आपको किसी शास्त्र से कम नहीं समझते हमारे गुरु जी हमारे लिए भगवान है रही बात हम आपको किसी शास्त्र से कम नहीं समझ आपको निकला हुआ शब्द हम उसको यहां रखते हैं तो अड़ की जगह अगर हम ना बोल रहे सही है ना ब्रज में ण का प्रयोग है

नहीं ना है ना है ना जैसे सरण जहां भी जहां भी शब्द आएगा वहां ना की जगह ना आएगा अभी ब्रज भाषा को आपने समझा ले जितने पद हैं आचार्यों के अधिकतर ना का प्रयोग हुआ है जहां ना का प्रयोग होना चाहिए ना वहा ना का प्रयोग हो य से हमारा मर हो हा जितनी ब्रज भाषा देखो तू त सखी सयानी जहां ऐसे लिखा है तो तू ते सखी सयानी हर जगह ना का प्रयोग हमारे पचास ब्रज भाषा के जैसे पद है उनमें जहा ला है स्पष्ट जैसे अगर ब्रज भाषा का पद वृंदावन दास जी लिख रहे हो नारायण शब्द भगवान

का नाम है तो नारायण बोले नारायण नारायण नहीं बोले नारायण बोले बो तो अगर यह बोल रहे कृष्ण कृष्ण कृष्ण और है कृष्ण और कृष्ण बोल रहे तो ब्रज भाषा में कृष्ण वही माना जाएगा तो ना शब्द जो है हमारी ब्रज भाषा में ना हटा कर के ना बोला गया बोल किशन कन्हैया लाल की जय ऐसे जैसे बोलते हैं ना तो यह ब्रजवासी भाषा है इसमें ना का प्रयोग बहुत किया गया है ना शब्द की जगह यहां ना का प्रयोग किया गया है हा अब जैसे एक पद में है शुद्ध शब्द है राधा रमण और राधा रमन सकल सुख धामा अपने खेलत रास रसिक ब्रज मंडन जतिन दिए भुज दन ज सत हरिवंश मगन मन श्यामा और राधा रवन सकल सुख धामा राधा रवन राधा रवन सकल सुखमा और शुद्ध शब्द है अगर उच्चारण करते हैं राधा रमण राधा रमण और राधा रमण राधा रमन णा को हटा के ना ब्रज भाषा में ना का ही प्रयोग तो हमें चाहिए कि जो अगर ना भी बोल रहे तो हमें पता है कि कृष्ण बोल रहे अब शुद्ध शब्द में है कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण और जब हम इसी फसे थे हा और जब हमारे ब्रजवासी या ब्रज भाषा के अंदर तो

कृष्ण हे कृष्ण ना का प्रयोग हजारों जगह हम दिखा सकते हैं आपको हजारों जगह जहां ना की जगह ना का प्रयोग किया गया है तो इसको हटाओ हा और संदेश शब्द उपास में मत करना भक्तों के जो प्रश्न होते हैं वह जगत कल्याण के लिए होते हैं व जगत मंगल के लिए ऐसे प्रश्न तो कीजिए अपनी उपासना के शब्द में जैसे एक दो बार राधा ऐसे की श्यामा राधा हमारा था गुरु हमें राधा नाम से ज्यादा प्रेम है और हम निग संप्रदाय से हैं हम गुरुजी से सवाल किए कहीं ना जो आचार्य सं क्यों राधा राधा

तुम हमारे कहने का मतलब है गुरुजी कि जो युगल नाम है राधे कृष्ण राधे कृष्ण जितनी शक्ति युगल नाम है क्या उतनी शक्ति राधा नाम पूरी पूरी हां जानते हो क्यों कि रा में रस दात्री और धा में रस पान करने वाले हैं और जब राधा कहते तो श्री जी देखती और लाल जू बिक जाते हैं लाल जू बिक जाते अच्छा यह केवल जपने हम लोग जानते हो जितने भी वृंदावन वासी सब जुगल उपासना है नवल उपास नवल किशोर उपासना जुगल मंत्र को जाप जुगल मंत्र को जाप वेद रसक की वाणी श वृंदावन धाम इष्ट श्यामा महारानी ये हमारी उपासना का स्वरूप है लेकिन राधा नामु कार्यम नदन मिल साधना घीस कोटि त्याज निराज राधा ये श्लोक लिखा हुआ है अगर राधा राधा केवल कहने को मिल जाए तो करोड़ों साधना का फल त्याज्य हो जाए ऐसा प्रेम रस प्रकट हो जाए राधा नाम कार्यम राधा राधा जब हम बोलते हैं तो हमारे युगल सरकार मुस्कुराते हैं राम श्री जी विराजमान धाम धारण करने वाले रस श्री लाल जू विराजमान अरे वृंदावन राधा नाम एक एक पत्ता एक एक वायु का कण कण यहां राधा राधा राधा राधा बोल

रहा है युगल हमारे राधा है ना श्याम और ना धा वही राधा वही श्याम समझ रहे अलग-अलग है ही नहीं केवल दो तन एक प्राण एक मन एक स्वभाव एक रुचि एक वैस अगर हम श्याम श्याम बोल रहे तो राधा जी समाई है और राधा राधा बोल रहे तो श्याम समाय है बिल्कुल अंतर नहीं है और जब हम राधेश्याम बोल रहे तो युगल को बोल रहे गुरु जी आज मुझे आईसी साब निकाल दिए हम बिल्कुल संदेह में पड़े थे गुरु नहीं नहीं बकुल हा और खूब बड़ी कृपा है आपके ऊपर जो प्रभु के नाम रूप लीला धाम में चल रहे हो

बड़ी कृपा बहुत आनंद है और जैसे यह जैसे होता कि सामर्थ्य आप देखो सामर्थ्य होती संसार का चिंतन छोड़कर प्रभु का चिंतन करने से तो राधा प्रभु की प्रभु है मानते हो कि नहीं नहीं इतना तो परिचय होही गया है आप जब ब्रज में वृंदावन में उपासना में हो कि सबके प्रभु श्री कृष्ण सबके प्रभु श्री कृष्ण और श्री कृष्ण की प्रभु है राधा इतना मानते हो कि नहीं चरण से चात चरल मोहल लाल कुरी राधे पलग पोड़ी सुंदर देखो ये सखा बोल रहे हैं लाल जू के ये नंददास जी का पद है और कुंभन दास जी कह रहे नंद सुत मन मोद कारी विर सागर तरण धनी धनी राधिका के चरण श्री स्मली जी के अब तुम्हें क्या कहला तुम तो अपने अपने उपासना के रंग में ही हो और बड़े सौभाग्यशाली उपासक हो निश्चल जी राधा वल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी अगर हम भक्ति पथ पर है भक्ति करने की विधि कर रहे हैं और उसमें जो भी क्रियाए हैं उन्हें भी करने का प्रयत्न कर रहे हैं और भक्ति के उस स्तर तक नहीं पहुंचते तो क्या हमें भगवत प्राप्ति नहीं होगी या कब होगी वैसे पहली बात

तो य कि जब हम सही ढंग से चलेंगे सही रास्ते में चलेंगे तो मंजिल क्यों नहीं मिल जाएगी दूसरी बात यह है कि यदि हमारा कहीं शरीर पूरा हो जाता में भगवत साक्षात्कार नहीं हुआ है तो नष्ट भ्रष्ट नहीं होता नाम भक्ता प्रणति अगर हमने 100 नाम जप किए हैं तो हमारा जो अगला जन्म होगा तो पुण्यवान और जहां भक्ति के माहौल भक्ति का बहुत सुंदर व्यवस्था है ऐश्वर्य भी है भोग सामग्री भी है वहां जन्म होगा और 101 से भजन शुरू होगा एक से नहीं होगा अगर 100 नाम जप किए तो 1001 से शुरू होगा पर हमें लगता है कि हम ऐसा छोड़े क्यों इसी जन्म में क्यों ना भगवान को प्राप्त करें और भगवान को प्राप्त करने का इसी जन्म में पक्का विश्वास पूर्ण तरीका ये है कि नाम जब छूटने ना पावे हर श्वास में नाम तो जो आज शवास आखिरी होगी उसमें भगवत प्राप्ति हो जाएगी जब पुत्र के निमित्त से नारायण बुलाया तो अजामिल को भगवत प्राप्ति हुई कि नहीं तो अगर हम जानबूझकर कृष्ण बोलेंगे हरि बोलेंगे राधा बोलेंगे हमारे प्राण निकल जाते तो हमें भगवत प्राप्ति पक्की हो

जाएगी हमें अभ्यास करना है प्रति शवास नाम जप करने का हमें अभ्यास करना है प्रति सेकंड भगवत में चरणारविंद में उनके रूप में उनके लीला में उनके गुणगान में हमारी वृत्ति लग जाए हमारी वृत्ति लग जाए कोई पद चल रहा है कोई भगवान की रूप माधुरी का ध्यान कर रहे हैं कोई नाम जप कर रहे हैं और सेवाएं सब संसार की करो कोई व्यापारी है कोई नौकरी करता है कोई किसानी करता है या घर में रसोई बना रहे हैं या झाड़ू पूछ जो भी हम कार्य कर रहे हैं वो सब श्री कृष्ण के लिए कर रहे हैं और उनका नाम जप करते हैं तो हमें भगवत प्राप्ति क्यों नहीं होगी पहली बात तो हमको इतनी दृढ़ रखी कि इसी जन्म में भगवत प्राप्ति होनी है हमें आगे के लिए सोचना ही नहीं पर यदि ऐसा नहीं होता तो भगवान ने कहा है जो मेरा योग भ्रष्ट होता है वैसे आप बादलों की तरह छिन्न भिन्न नहीं हो जाता कि नष्ट हो गया नहीं उसका श्रीवान कुलवा भक्ति का जहां माहौल है वहां जन्म होगा और प्रारंभ से ही उसमें भक्ति के परमाणु जितने पहले थे वहीं से ऊपर उठता चला जाएगा और उस जन्म में

भगवत प्राप्ति कर लेगा पर हमें आगे का भरोसा हमको इसी जन्म में प्राप्त कर आसा बंधा समुद कंठा नाम गाने सदा रुचि ये दृढ आशा इसी जन्म में मुझे भगवत साक्षात्कार करना है उत्साह पूर्वक खूब नाम जप करो भगवत साक्षात्कार हो जाएगा लगन लगनी चाहिए हमें लगन लगनी चाहिए लगन लग जाए तो अभी भगवान मिल जाए पूरा जन्म तो बहुत बड़ी बात है हमें लगन बढ़ानी है अब हम जैसे संसार भोगों को भोगते हुए आनंदित हो रहे हैं बीच-बीच में थोड़ा नाम जप कर लिया तो थोड़ा ये बहुत धीमा रास्ता है अगर हम श्री कृष्ण के लिए व्याकुल हो रो कर के भजन करने लगे आंसुओं से भिगो बिंगो कर हे प्रभु अब मुझे आगे जन्म के भरोसा इसी जन्म में मुझे भगवत साक्षात्कार हे श्री कृष्ण मिल जाओ हे कृपा सिंधु और उनकी कथाएं सुन रहे उनकी कथाएं गा रहे हैं नाम कीर्तन कर रहे हैं नाम जप कर रहे हैं तो निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाएगी हम आगे के लिए क्यों टाले इस ये जन्म पर्याप्त भगवत प्राप्ति के लिए जितना समय आप अभी हो अभी से जितना समय होगा हर शवास पर्याप्त है भगवत प्राप्ति

के लिए हमारी बात को समझ लीजिए अगर हर शवास नाम ले रहे हैं तो कोई भी श्वास आखिरी होगी हमें भगवान से मिला देगी वो भगवत प्राप्ति करा देगी ज्योति जी दिल्ली से राधा वल्लभ श्री हरिवंश गुरुदेव आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम गुरुदेव आपकी कृपा से अज्ञानी व अवगुण से भरा जीव आपका शरणागत है महाराज जी आपके द्वारा प्रदत श्री जी की उपासना व आपके द्वारा की गई आज्ञा का पूर्ण रूप से पालन करने की कोशिश करते हैं परंतु बार-बार संशय और डर बना रहता है कि इस आदमी से कोई

त्रुटि तो नहीं बन रही हर समय डर बना रहता है ये डर तो अच्छा है कि हमसे कोई अपराध ना बन जाए हमसे कोई गलती ना हो जाए पर इतना डर ना हो जाए कि भजन छूट जाए डर ही हाथ लगे इतना डर नहीं देखो हम कई बार बताया सत्संग में कि 10 नामा अपराध होते हैं 32 सेवा अपराध होते हैं वैष्णव अपराध होते हैं धामा अपराध होते हैं अब हम इतना डर जाए कि नामा अपराध से डर कर नाम जप ना करें वैष्णव अपराध से डरकर वैष्णव संग ना करें धामा अपरा से डर कर धाम ना आवे सेवा प्रा से डर कर सेवा ना करे तो हमारा तो जीवन ही बर्बाद हो गया हमें डरना है लेकिन उचित हमसे कोई गलती ना हो जाए ये हमें डर इस डर का मतलब यह नहीं कि हम इतना भयभीत हो जाए कि हमारा भजन ही छूट जाए हमारा भगवत मार्ग छूट जाए तो यह संशय नहीं रखना चाहिए और संशय क्या मन में है आप कहते संशय और डर है तो क्या संशय आपके मन में गुरुदेव जैसे कुछ गुरुदेव पहले तो क्षमा आपके आगे बोलने की मुझे मुझे हिम्मत सी नहीं हो रही पर फिर भी क्षमा कर दीजिए और जैसे कुछ भी करती हूं कुछ जैसे मैंने अपनी

दिनचर्या की तो उस समय अगर थोड़ा भी आगे पीछे हो जाए तो मुझे नहीं इसमें नहीं डरना इसमें तो बिल्कुल नहीं डरना मान लो गृहस्ती में आपकी मंगला की सेवा 8 बजे हो रही है श्रृंगार की सेवा 11 बजे हो रही इसमें नहीं डरना बहुत सुलझे प्रभु कोई गैर है क्या अरे प्रभु हमारे हैं हमारा मन आया हम 12 बजे दिन में उनको उठाएंगे हमारा मन आया हमम हम अगर हम भजन में डूबे या हम किसी क्रिया में लगे किसी कार्य में फस गए तो शाम के अपने ठाकुर जी को नैला लाकर भोग लगा हमारे घर के ठाकुर जी उसमें डरना क्या है उसमें थोड़ी कर भारी अपराध बन गया ऐसा नहीं नहीं एकदम एकदम भाव में आओ ठाकुर जी कौन है हमारे हैं ना हमारे ठाकुर जी हैं आप ठाकुर जी को ऐसे देखेंगी तो फिर डर जाएंगे फिर उन और इनका खेल ऐसा कि आप जैसा मानोगे वैसे ही अनुभव में आएंगे अपने घर के ठाकुर हैं अपनी प्रिया प्रीतम है अब लो पति को नौकरी जाना है पुत्र को स्कूल जाना है तो हम पहले मंगला नहीं करेंगे हम पहले अपने पति और पुत्र का सब व्यवस्था कर दिया और भोग बनाया और फिर हम एक

मिनट में ठाकुर जी को विराजमान करके दिखाया उनको पाया उनको भेजा फिर आराम से सेवा की अरे अपने घर के ठाकुर जी हैं पति में भी तो ठाकुर जी है पुत्र में भी तो ठाकुर जी है हमको ऐसे भाव से चलना है ये ज्यादा य भगवान मानकर डरने से फिर भाव खत्म हो जाता है फिर वो केवल यही रह जाता है कि ऐसा ना करें कहीं अपराध ना बन जाए कहीं ऐसा ना बन जाए अरे तो क्या अपराध बन जाए तो हमारे जैसे अपनी मां अपने पिता तो थोड़ी अदब तो रखी जाती है कि माता-पिता पर इतना डरा थोड़ी जाता है

कि हम घरही में ना जा पाए कि अपराध बन जाएगा माता-पिता से ऐसे ही तुम्हे माता से पिता तुम्हे तुम्हे बंदु सखा तुम्हे तुम्हे विद्या द्रविंग तुम्हे तुमे सर्व मम देव देव हमारे प्रभु माता-पिता है हमारे दोस्त हैं हमारे सब कुछ है हम उनके साथ व्यवहार अपनेपन का करें ये डर वाला माहौल तो हटा देना चाहिए नहीं तो भक्ति में भाव कहां आएगा डर ही बैठा रहेगा हमारे प्रभु है नरसिंह भगवान से सब डर रहे थे प्रल्हाद जी नहीं डरे प्रल्हाद जी लीडर होके जाके गोद में बैठ गए मेरे

प्रभु है नरसिंह बने तो मेरे प्रभु तो बने हैं तो मेरे प्रभु हैं उनमें डरना क्या घर में जो ठाकुर है मेरे घर के ठाकुर हैं हमें जब समय मिलेगा घर परिवार की सेवा से तब उनको भोग लगा रहे हैं उनकी आरती कर रहे हैं उनको प्रणाम कर रहे हैं अब यह भी नहीं घर गृहस्ती में होना चाहिए कि अब ऑफिस उसको जाना है पति को पुत्र को स्कूल जाना है अब तुम पूजा फैलाए बैठे हो अब वो परेशान तो ऐसी पूजा गृहस्थी में नहीं होती गृहस्थी में पहले परिवार को सुख पहुंचाने क्योंकि सबके अंदर भगवान है और सब समय से अपने अपने ऑफिसों में जाना है ये घर वाली पूजा तो आप जब सब चले गए तो उस समय आप घरवाली पूजा करो आराम से नहीं सब में भगवान देखकर पूजा करो पति में भगवान है पुत्र में भगवान पूजा ही तो हो रही सबकी तो बिल्कुल डरो मत एकदम निश्चित हां पापा चरण से डरो जो धर्म विरुद्ध पापा आचरण है वो बिल्कुल मत करो नहीं फिर वो भक्ति दम नाटक हो जाएगी पापा आचरण करने वाला फिर ठीक नहीं है कोई भी हो पापा आचरण से बचो अच्छे आचरण करो हर आचरण भगवान को

समर्पित करो नाम जब करो अभी आनंद आ जाएगा आनंद का जो मार्ग है उसी से आनंद की प्राप्ति होती है डरना और संशय करनाय ज्यादा ठीक नहीं इतना डर जरूर बना रहना चाहिए कि हमसे कोई पाप कर्म ना हो जाए हमसे कहीं भगवान का विस्मरण ना हो जाए ऐसे बने और ज्यादा नहीं हमारे प्रभु हैं हम उनके बच्चे हैं हम उनके अंश हैं हमसे तो गलती होगी ही होगी 100 गलतियां होंगी तो हमारे प्रभु का स्वभाव भी ऐसा जन अवगुण प्रभु मान न काऊ दीन बंधु अति मृदुर स्वभाव प्रभु अपने जनों के इन दोषों

को नहीं देखते उनके हृदय की बात को देखते हैं वह दोष करना नहीं चाहता स्वभाव संस्कार व दोष हो गया तो प्रभु क्षमा कर देते हैं बहुत करुणामय हमारे प्रभु हैं बहुत करुणामय म जीी तरुण स्वामी जी यह पूछ रहे हैं कि जब कोई गलती या गुरु अपराध बन जाए और फिर गुरुदेव से मतलब अपनी समस्या या अपना यह बात कैसे रखें कि गुरुदेव आप से रखे क्यों प्रकट में अगर मन में ही मन में ही अंदर रख कर के क्षमा मांग ले ज बाहर रहते हैं ना गुरु हां हां तो मन में ही क्षमा मांग ले बार-बार कहने की जरूरत नहीं किसी से भी अगर किसी संत के प्रति वाणी का अपराध बना है तो वाणी से मांगो शरीर का अपराध बना तो शरीर से क्षमा मांगो मानसिक अपराध बना तो मानसिक चल जाएगा नहीं अपने गुरुदेव से हां तो फिर वो मानसिक ही प्रार्थना कर ले सर्वज्ञ गुरुदेव है हे गुरुदेव मुझसे गलती हो गई आगे से मैं सुधार करूंगा गलती ना होने पाए फिर भी प्रभु मैं जीव हूं अगर गलती हो जाए तो क्षमा करते रहना ऐसे चला जाता है बार-बार गुरुदेव को अगर हम अपनी बात प्रपंच की बताएं

गलती की बताए तो विक्षेप पड़ता है नहीं अब सब लोग अपनी अपनी गलतियां बताने लगे तो श्री जी का चिंतन छूटेगा ना तो अंदर ही अंदर से प्रार्थना कर दी तो आपके अंदर भी गुरु बैठे हैं वो क्षमा कर देंगे क्षमा तब मानना जब हृदय शीतल हो जाए मान लो क्षमा कर और जब तक शीतल ना हो अपना भजन ना च तब तक जलन हो तो समझ लो अभी हमारी प्रार्थना पहुंची नहीं है तो बार-बार प्रार्थना ना करते र आर्त भाव से प्रभु क्षमा तो समन हो जाएगा हृदय शीतल हो जाएगा आनंदित होकर भजन में मन लग जाएगा गणेश शर्मा जी वृंदावन से जी श्री हरिवंश श्री हरिवंश चरण स्पर्श महाराज जी महाराज जी एक वर्ष पूर्व मैंने आपसे प्रश्न किया था कि पारिवारिक जनों के समझाने के बाद भी यह मन वृंदावन से बाहर जाने को आंदोलित होता है तब आपके वचनों को मानकर हट पूर्वक रुक गया था और आपकी कृपा से राधा रमन लाल जी की सेवा में भंडारी रूप में संलग्न हूं महाराज जी शरीर तो 12 घंटे की सेवा होती है किंतु मन शरीर संसार में होता है और श्री कृष्ण भगवत गीता में कहते हैं क्रम

इंद्रियानी सय मिथ्या चार स उच्च कहा है मन वचन कर्म से पूर्णता समर्पित कैसे हो उनके ऊपर छोड़ दो ना वो कह रहे हैं उन्हीं के ऊपर छोड़ दो भगवान ने कहा देवी हेसा गुणमककुम माया में ताम तरते उपाय बता रहे हैं जो हमारे अंदर मिथ्या चार है कि शरीर से तो हम भगवान में लगे हैं मन से हम संसार की तरफ जा रहे हैं ये तन मन वाणी जीवन उन्हीं को अर्पित कर देते हैं बेपरवाह हो जाते हैं जैसे उनकी सेवा में भंडार सेवा में बेपरवाह हो जाओ शरणागति में बहुत बड़ी सामर्थ्य है हर

समय स्मरण करने का अभ्यास डाल लो तो आपके हर प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा अगर आपको जो नाम मिला है जो नाम प्रिय है आप बार-बार उसी नाम को जपि और अंदर से सोच लीजिए कि अब मैंने अपने जीवन का भार प्रभु के हाथों दे दिया व कल एक बोर्ड में सज्जन लिखे खड़े थे हम कई बार हमें स्मृति में आया बहुत आनंद आया उन्होंने लिखा था कि दरिया तू है लहर भी तू है नैया भी तू है और खिवैया भी तू है अब डूबने का भय कैसा बहुत आनंद आया उसी समय मतलब चिंतन में बैठ गया हम सैकड़ों बार इस बात का चिंतन क्या सुंदर बात है दरिया भी तू है तरंग भी तू है नैया भी तू है और खिवैया भी तू डूबने का भय कैसा क्योंकि मैं तुम्हारा हूं और तू ही नैया तू ही खिवैया तू ही दरिया तो अब डूबने का क्या कोई और हो तो मैं डरू अब तो आप ही है भगवान की शरण में होकर उनका नाम जप करो कोशिश करो मन जब जब संसार में जहां जहां जाए वहां वहां भगवान को देखो या वहां से हटा के नाम में लगाओ धीरे-धीरे परेशान बिल्कुल नहीं होना नाम भक्ता प्रणति भगवान कहते मेरे भक्त का नाश नहीं

होता अगर हमारे पास वाणी है मन है तन है इनमें से एक जुड़ गया है तो सबको घसीट लेंगे तन जुड़ गया है सेवा में वाणी जुड़ गई उनके नाम जप में रह गया मन तो कितना भागेगा कहां तक भागेगा आना तो इसे प्रभु के चरणों में पड़ेगा घबराए नहीं साधक घबराए नहीं जब मन विषयावर हो रहा हो भोगों में भाग रहा हो तो घबराए नहीं उस समय भगवान की याद में अपने को तन्मय करें राधा राधा राधा राधा व मन मन को अच्छा नहीं लगेगा पर आप उच्चारण करो नाम देखो अपने आप भाग के आ जाएगा और हम भगवान की शरण में है गोस्वामी तुलसीदास जी ने एक जगह लिखा कि हो हार करि जतन विविध विधि अतिशय प्रबल अजय तुलसीदास बस होए तब जब प्रभु पेरक बर जाए बोले हे प्रभु ये मन जो है मेरा हठ नहीं छोड़ रहा मैंने बहुत उपाय कर देख लिया अब एक बात समझ में आई कि जिसने मन को रचा है और जो मन को प्रेरणा देते हैं वह है आप अब आप ही रोक दे तो रुक जाए मेरे बनाए ना बनेगी कोटि कलप लो आपके बनाए बनेगी पल पाव में शरणागत हो जाए अंदर से आप संभाल लो प्रभु तो सभाल लेग डॉक्टर साधना

पराशर जी राधे राधे श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी ठाकुर जी मेरे छोटे पुत्र हैं और राधा रानी बहु रानी है महाराज जी संतों और ग्रंथों से महात्म जानने के बाद ईश्वर से प्रेम करना क्या निजी स्वार्थ नहीं है निजी स्वार्थ क्या अपनी देह से प्यार करना मतलब अज्ञान की धारा में कह रहा हूं क्या अपनी देह से प्यार करना अपनी देह को स्नान कराना अपने देह को भोजन पवा अपने देह से आराम करना यह क्या स्वार्थ कहा जाएगा हमारी देह क्या अपने बेटे को हम स्नान कराते हैं दूध पिलाते हैं शयन कराते हैं क्या इसमें हम स्वार्थ भाव रखते हैं अगर आपसे कोई पूछे कि किस कामना से कर रहे हो आप कहोगे डांट दोगे उसके मेरा बेटा इसकी कामना की क्या और अच्छे से जितना छक के बेटा पा ले और जितना आराम से सो जाए उतना माता को सुख होता है क्योंकि मेरा बेटा है मेरा बेटा है अब दूसरे को पवा ना हो मान लो संतई को पवा ना हो अब कामना लग जाएगी साधु महात्मा है पुण्य होता है पाप नष्ट होते हैं भगवान की दया है आ जाएगा कि नहीं आ जाएगा लेकिन बेटे के पवा में

तो आपने जब प्रभु को बेटा माना है और प्रियाज को बह माना है तो अपने बेटा बहु से जैसा बर्ताव करते हैं वैसा क इसमें स्वार्थ की बुद्धि क्या है हा स्वार्थ लगता है क्या नहीं अपने बेटा बह एकांत में बैठे हंस खेल रहे हो तो कैसा हृदय होगा मान लो मां जाकर के देखे कि बेटा हंस रहे विनोद कर रहे बातचीत कर रहे तो ऐसे ही कहेगी हे भगवान मेरे बेटा बह ऐसे ही आनंद से खेलते रहे मैं देखती र ये दोनों सुखी रहे आशीष निकले गला तो वहां स्वार्थ कहां है स्वार्थ तो तब जब हम लेने की कोई बात करें हम तो देने की बात कर रहे हैं हम तो आशीष देते हैं हम तो उनको सुख देने की चेष्टा कर रहे हैं हम तो उनकी इच्छा पूर्ति के लिए चल रहे हैं आज सत्संग में यही कहा था कि भक्त के लिए भगवान कह रहे हैं कि योगक्षेम बाहम में हम और भक्ति ऐसा रंग ला उनके योग क्म का वान भक्त करने लगते जो प्रेमी भागवत जल होते हैं व उनको दुलार करते हैं उनसे कभी मांगने की जरूरत ही नहीं तो प्रेम में कहीं स्वार्थ थोड़ी होता स्वार्थी कभी प्रेमी नहीं होता है प्रेम

में स्वार्थ नहीं होता और स्वार्थी कभी पर अपने भाव में डटा रहे वही लिखा कि म ईष्ट की भगवता का स्मरण व्यवहार और सेवा में कु संयोजन पैदा करता है कृपया मा भगवता का तो ज्यादा ख्याल नहीं आना चाहिए और स्वार्थ व्यवहार में बिल्कुल ऐसे जैसे अपने बेटा बह से आनंदी माता थी राधा वल्लभ जी के पीछे लाडली जी को बह मानती थी लालजी को बेटा मानती थी एक दिन साड़ी पहनाई तो साड़ी बारबार फिसल जाती बोले बह अब कौन सी तुम्हें साड़ी पसंद जितनी उतने तो सब पहरा डाला कलकत्ते गई थी और कलकत्ते में दुकानों में साड़ी देखे मन पसंद आए ना एक वैश्या निकली रिक्शा से वह ऐसी साड़ी पहले बोले यह बह के लायक होगी पीछे रिक्शा लगवाया और जब रोका कहा बेटी तोब वो संत एकदम आनंदी भाई उसने कभी ऐसा दर्शन नहीं किया था वो तो वैश्या थी जब बेटी शब्द निकला तो एकदम हृदय कौन उनको बेटी बोलता तो उ कहा माता जी आप कहां से आए तो कहा वृंदावन से आए आज्ञा कीजिए तो बोली मेरी बहू को तुम्हारी साड़ी पसंद आएगी यह साड़ी कहां मिलती मुझे खरी दवा दो तो उन्होने कहा कि

मैया आज तक हम अपनी बहू को ऐसी प्यार करने वाली सास तो ले देखा कि वृंदावन से बहू के लिए सास ले ले कलकत्ता है इसका मतलब तोत उन्होंने कहा हम श्री कृष्ण को अपना पुत्र मानते हैं किशोरी जी को अपना बहु तोत उन्होंने कहा आप हमारा परिचय जानकर हमारी बात ठुकराना मत मैं एक वैश्या हूं और आप पता दीजिए मैं यही साड़ी नई खरीद कर के वृंदावन आया तब उनको समझ में आया नंदी भाई को कि अच्छा बहु कृपा वैश्या पर करना चाहती थी इसलिए साड़ी ले पैल रही थी वो साड़ी लेके आई और फिर

श्री जी को पहला तो हमारी हमारी भाव की भावना इतनी दृढ़ होनी चाहिए कि कोई भी बिल्कुल नहीं सुनना किसी की यह था माम प्रपद्यंते ताथ भजमन को जिस भाव से बजा जाता है उसी भाव से भगवान हा एक अयोध्या में उनका में नाम नहीं याद है बहुत बड़े विद्वान थे तो सियाज को अपनी बह मानते थे राम जी को लाला तो जब वह जाते तो पुजारी से कहते कि बहू वाला दरवाजा थोड़ा सा पर्दा कर दो तो एक दिन नए पुजारी थे तो उन्होंने ददा नहीं किया तो दरवाजा फटाक से अपने आप ऐसे हो गया फटाक तो उन्होंने कहाय कैसे बोले बहू है ना हमारी ऐसे एक जाते थे तो राम जी को अपना शिष्य मानते थे तो जब जाते तो नया माला लेकर जाते हो सामने पहनते हो फिर कहते पहनाओ तो यह विरोध किया बहुत भक्तों ने कि आप भगवान को अपना पहना ठीक है आप कुछ भी मानो लेकिन मंदिर में आप ऐसा नहीं कर सकते तो एक दिन लिए ऐसे बोले पहनाओ जो पहनाया टूट के माला गिर गया बोले और पहनाओ फिर टूट के माला गिर गया बोले पहन नहीं सकते क्योंकि हमारे शिष्य हैं पहनेंगे तो हमारी प्रसादी और फिर ऐसे करके

दिया तो प्रभु धारण यह थाम प्रप ते तास तते भगवान को जैसे भाव से भजो भगवान वैसे तो अपने भाव से उनको भगवान नहीं मेरे लाला मेरे यही बात ध्यान रखली अगर भगवान तब तो कांप जाओगे अर्जुन कांप गए जब देखा भगवान का भगवता स्वरूप विराट अरे मैंने हे सखा हे कृष्णा ऐसा काम मुझे क्षमा करो तुम आद देवा पुरुष पुराणा विश्वस्य परम निधानम तास विद्यम परमम च धाम तया तत विश्व अनंत रूपम वायुर मनि वरुणा सशंका प्रजापति स्तम प्र पिता मस नमो नमस्ते शस्त्र भूल गए कि मेरा सखा है भगवान का जो विराट रूप है भगवान की जो महिमा अगर वह याद रखेंगे तो यह याद नहीं रहेगा कि वो मेरे हैं बहुत महान है पर वह इतने कृपाल है कि देख लो े यशोदा मैया नंद बाबा कौशल्या दशरथ जी भावना किए आप जैसा पुत्र चाहे तो भगवान आंगन में वैसे भाव कर सको बिल्कुल दृढ़ भाव किसी के समझाने पर जब हमारा भाव नहीं टूटे तब समझना चाहिए कि भगवान हमारे पुत्र है और प्रिया जो हमारी बहू है बस इसमें दृढ़ रहो और किसी की कोई भी व्यवहार और भगवता हां अब यह है तुम्हें यह ध्यान

रखना है कि जैसे अपने बेटा बहू को वैसे ही व्यवहार करना है कोई भी उत्सव कोई बधावा कोई तो पहले अपने बेटा बहु को सजा के श्रृंगार करके खवा पिया के हां आज हमारे यहां उत्सव है तो हमारे बेटा ऐसे भाव में रखना है ऐसे उत्सव मलाला है ऐसे ही तो वो वही भाव देखते हैं भगवान भाव को देखते भाव का भूखा हूं मैं भाव ही एक सार है भाव से मुझको भजे तो भव से बेड़ा पार भाव बिन सुनी पुकारे मैं कभी सुनता नहीं भाव पूरत टेर ही करती मुझे लाचार बहुत भाव भगवान स्वीकार करते हैं बड़ा सौभाग्य है जो आप ऐसे प्रि भाव से प्रभु से जुड़े हुए लोग जब उत्सव में आते हैं लाला से कुछ कहते हैं ये इनसे कह दो ऐसा कर दे याय कृष्णर्पण मस्तु भी क तो मुझे अच्छा नहीं लगता मुझे लगता है सब परेशानी क्यों दे रहे हो उसको आपको अच्छा नहीं लगेगा लेकिन यह भी ध्यान रखना कि आपके जो लाला है वो दूसरों के भगवान भी है नहीं यह तो ध्यान रखना है तो आपको और छाती फुला के बैठ ली अपने लाला से कोई मांगे तो अपने को कैसा लगेगा अच्छा लगेगा हां मेरा लाला इतना बड़ा

आदमी है कि बड़े-बड़े आके घुटने टेकते मांगते हैं तो यह भी तो गर्व रखला है उसमें दुखी थोड़ी होला कि मेरे लाला से मेरा लाला गरीब है क्या लक्ष्मी पति है तो आपको तो ठसक में रहना है ज्यादा कोई तुमसे गिड़गिड़ा है तो तुम भी कह दोगे देख लो भाई लाला देख लो तुम हां अरे हमारा लाला कोई कमजोर है गरीब आदमी है कि उसकी इच्छा की पूर्ती कर देगा बेचारा गरीब हो जाएगा अरे वो महाल सवर साली भी है तो भाई हमारे लिए हमारा लाला है लेकिन दूसरों के लिए भगवान है तो दूसरों की भाव की रक्षा करनी है कि जैसे आकर प्रणाम कर भगवान हमारी बात तो तुम मुस्कुरा ला है कि मेरा लाला भगवान है इनके लिए मेरा लाला इनकी कामनाओं की पूर्ति करने वाला है तो ठसक में रहना मेरा ही है ना इसलिए उसमें विपरीत का तो सोच ली नहीं नहीं तो दुखी हो जाओगी वो लाला जरूर आपका है लेकिन दूसरों के लिए भगवान भी है ना तो यह बात देखना है आपके घर में कोई आया है और आपके लाला से मांग रहा है तो बड़ी भाग्य की बात है लाला खुद पूरा करे देखे हिसाब किताब बड़े आदमी लाला है

कोई छोटे मोटे थोड़ी पूरा हिसाब किताब उली का तो है अनंत ब्रह्मांड का स्वामी भी तो वही है ना अपले भाव में रहे अपले भाव में रहे हां बिल्कुल खूब आनंद से ठसक रहे और क्या जैसे मान लो खरब पति का लड़का है और उसके सामने 10 20 गरीब आके बोले कि हमें बाबू जी दे जब वो दे रहा है तो तुम्हें मुछ में ताव आएगा किले आएगा तो ऐसे तुम्हारे हदय में कि हा हमारा ठाकुर और क्या हमारा हमारे ठाकुर की ठाकुरा चल रही वो मेरा बेटा है कोई छोटा मोटा है मांगो भाई जिसको मांगना है मांगो सुनेगा देगा पूरी करेगा उसमें परेशान थोड़ी हो जाला है उसमें और आनंदित होला है हा जय शिव मिश्रा जी राधे राधे महाराज जी प्रात स्मरणीय पूज्य गुरुदेव आपके चरणों में दंडवत प्रणाम पूज्य महाराज जी मेरी एक जिज्ञासा है क्या इन चरम चक्षु से भगवान दर्शन हो सकते हैं देखो तीन प्रकार के नेत्र होते हैं एक होते हैं चर्म चक्षु और बुद्धि में प्रकाशित होते ज्ञान चक्षु और हृदय मन में प्रकाशित होते प्रेम चक्षु जब प्रेम चक्षु खुलते हैं तो नेत्र यही होते हैं पर यह

नेत्र नहीं रह जाते इनमें प्रेम प्रकाश हो जाता है हृदय के प्रेम चक्षु जैसे हमारा हृदय किसी और चिंतन में हो तो ये नेत्र खुले रहेंगे लेन दृश्य नहीं देख पाएंगे ऐसा होता है ना कि हम सुन नहीं पाते बैठे हुए भी और देखते हुए भी देख नहीं पाती यदि हमारा मन कहीं और हो ऐसे ही हमारा मन जब प्रेम से युक्त हो जाता है तो हमारे इन्हीं नेत्रों में प्रेम चक्षु प्रकाशित हो जाते हैं तो इनन नैनन सब सुख देखे ये हम अपनी बात नहीं कह रहे आचार्यों की बात कह रहे हैं इनन नैनन सब सुख देखे अपनो जन्म सुफल कर लेख है इन्हीं नेत्रों से प्यारी जू और प्यारी जू को देखते हैं जबकि ये नेत्र होते नहीं हैं होते हैं प्रेम नेत्र हृदय के चक्षु जैसे ज्ञानियों के ज्ञान नेत्र जागृत होते हैं बुद्धि में ऐसे प्रेमियों के प्रेम नेत्र जागृत होते हैं हृदय में और हिय के नैन निहार ही के नेत्रों से देखते हैं तो प्रेम नेत्र इन नेत्रों में समा जाते हैं तो इन नेत्रों में प्रिया प्रीतम विराजमान हो जाते हैं तो जिधर देखते हैं उधर श्याम ही श्याम दिखाई

देते हैं उधर राम ही राम त देखु तित श्याम मही अपना प्रीतम दिखाई देता है समझ रहे ना यह चर्म चक्षु फिर चर्म चक्षु नहीं रह जाते ये प्रेम नेत्र हो जाते हैं जैसे भगवान ने अर्जुन को विराट रूप देखने के लिए दिव्य दृष्टि दी ऐसे नाम और लीला गुणगान परम पावन चरित्रों का गायन और महापुरुषों की कृपा तो फिर हमारे प्रेम नेत्र प्रकाशित होते इन्हीं नेत्रों में तो इन्हीं नेत्रों से हमें प्रियालाल का साक्षात्कार होता है जो हृदय में खुलते हैं और प्रकाश इन्ही नेत्रों से

होता है पी मुरति नैनन वस इन्हीं नेत्रों में तेरस रा समाय ये लक्षण सुन प्रेम के और न कछु सुहाय इन नेत्रों का दर्शन बदल जाता है अभी त्रिगुणात्मक माया का दर्शन है स्त्री पुरुष जड़ चैतन्य और फिर जड़ चैतन्य कछु नहीं दित जित दित तित श्याम खड़े बुहल विकल सारण तन की घूमत नैना रूप भरे ये स्थिति उस प्रेमी के नेत्रों की होती है नहीं जब यह नेत्र आपको अभी जो दिखाई दे रहे हैं इनमें जैसे भगवान ने दिव्य दृष्टि दी तो विराट रूप केवल अर्जुन देख पा रहे हैं और कोई नहीं देख पा रहा ऐसे ही गुरुदेव रसिक महापुरुष जन इष्टदेव कृपा करते हैं तब प्रेम नेत्र देते हैं और प्रेम नेत्रों से अपने प्रियतम का साक्षात्कार होता है पर नेत्र यही होते हैं पर नेत्र का सामर्थ्य बदल गई त्रिगुणात्मक माया से परे अब इनमें प्रेम सामर्थ्य जागृत हो गई जैसे महाराज पृथु भगवान से प्रार्थना करते हैं वरदान मांगते हैं कि मुझे 10000 कान हो तो 10000 कान तो पूरे शरीर में कान ही कान हो जाएंगे ना भाव य कि मेरे कानों में 10000 कानों की सुनने की

सामर्थ्य हो कान यही है पर सामर्थ्य 10000 कानों वाली है ऐसे ही नेत्र यही है पर सामर्थ्य प्रेम नेत्रों की हो गई अब वो भगवान के प्रेममय स्वरूप का अवलोकन ध्रुव दास जी ने हमारे यहां लिखा है इनन नैनन सब सुख देखें अपनो जन्म सुफल करि लेखे जीवन सार्थक हो जाता है जब प्रेम नेत्र इन्हीं नेत्रों में समझ पा रहे हैं ना और ऐसे देखते हैं जैसे हम आपको देख रहे हैं और छूते हैं और भगवान से खेलते हैं भगवान से संभाषण करते हैं ये भगवान कपिल देव जी ने श्रीमद् भागवत में लिखा पढ़ के देख लीजिएगा मेरे प्रेमी अनन्य भक्त मुझसे संभाषण करते हैं मुझसे खेलते हैं मेरे साथ वो वार्ता करते हैं समझ पा रहे हैं आप जी राकेश गर्ग जी कुरुक्षेत्र से राधे राधे राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराजी श्री राधा दामोदर जी का निम्न कोटि का दास हूं जो चारों तर ओर से भयंकर प्रतिकूलता से घिरा हुआ हूं कई बार ऐसा डर लगता है किय प्रतिकूलता मुझे प्राथना कर कौन सी प्रतिकूलता ऐसी हो सकती है जिसमें आप डर रहे हो दिमाग स्वस्थ है

तो क्या फर्क पड़ेगा दिमाग बीमार शरीर स्वस्थ है तो फर्क ही फर्क है नहीं डिप्रेशन में नहीं चले जाएगा तो आप अपने दिमाग को स्वस्थ रखिए और जहां श्री कृष्ण है वहां विपत्ति नहीं आज के सत्संग में कहा था कि विपत्ति की की पहचान क्या है जब भगवान को भूल जाए कहे हनुमंत विपत प्रभु सोई जब तो सुमिरन भजन होई अगर भजन चल रहा है आप वैष्णव हो आपने बताया कि राधा दामोदर जी का शरणागत हू तो विश्वास करो राधा दामोदर मंगल नहीं होने देंगे ये विपत्तियां जो है व हमारे किसी कर्मों का फल दे रहे हैं हम उसको आनंद पूर्वक भोग रहे हैं राधा राधा राधा कृष्ण कृष्ण कृष्ण जो नाम प्रिय नाम जप रहे अगर नाम चल रहा तो कोई विप नहीं और नाम छूट गया तो कोई संपत्ति नहीं विपत्ति ही विपत्ति है तो विपत्तियां घेरे जरूर आपको हैं लेकिन विपत्तियों का प्रभाव आप पर नहीं होना चाहिए क्योंकि आप भगवान के दास हैं अगर उसे स्वीकार कर लेंगे तो फिर आप टूट जाएंगे टूटना नहीं है बहुत मजबूत रहना है जब ऐसा कष्ट हो अब आप उससे क्या बताए जब शरीर में कष्ट होता है

ना उस प्रभु की तरफ मन होता है कि आप कितना बढ़िया है कष्ट में मन कहा होता है प्रभु की तरह अच्छा इस कष्ट में कौन हमारा है आप कौन हमारा भगवान के सिवा कौन है कोई भाई आप बैठ के पैर दबा सकते हो हाथ दबा सकते हो लेकिन पीड़ा को थोड़ी रोक सकते हो वह भगवान का भरोसा व भगवान का हर पीड़ा हर कष्ट एक मीठा मठा आनंद देती है क्योंकि प्रभु का प्रसाद है ना प्रभु ने ही तो पास किया है ये कष्ट जाओ तभी तो हमारे पास है नहीं तो हम हरिदास है भगवान के दास है कोई विपत्ति हमारे पास आ कैसे सकती इसका मतलब मेरे प्रभु ने भेजा है और प्रभु ने भेजा है तो स्वागत है मीरा जी को कहा कि गिरिधर का चरणामृत है तो पी गए जबकि दासी ने बताया कि जहर है चरणामृत ने उनका नहीं जब कहा गिरिधर का चरणामृत तो पी गए तो ऐसे ही हमको हर जहर पीना है अपमान निंदा कर्मों के प्रारब्ध अनुसार शरीर भोग हम इनको कष्टों को भोगते हुए नाम जपते हुए अपने स्वामी के समीप पहुंच रहे बिल्कुल चिंता मत करो हमारी प्रार्थना को समझना बिल्कुल कोई विपत्ति आपका बाल बांका

नहीं कर सकती आप हरिदास है प्रियालाल के दास है आप हा परिस्थितियां होती है उस परिस्थिति में भी झाक के देखो एक रास्ता है जो आनंद का है व भगवान का सम उस समय बस लग जाओ कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण हे करुणामय हे प्रभु हे नाथ मैं आपका हूं आप देख लो प्रभु हम ये नहीं कह रहे कि हमारे कष्ट मिटा दो लेकिन मुझे ऐसी मथ दो कि इस कष्ट में भी मैं आपको याद कर सकूं आपका सुमिरन कर सकूं यही आनंद का विषय है कि हर कष्ट में तुम्हारा हम सुमिरन करें कि हे प्रभु आपके द्वारा दिया

हुआ हर गम हर कष्ट और किसी से नहीं कहेंगे क्यों क्योंकि आप हमारे हो और आप सर्वज्ञ हो सर्वत्र हो तो मेरे स्वामी आपने ही पास करके तो दुख भेजा है तो मुझे उस सुख की क्या जरूरत जो आपने दुख भेजा वो हमारे लिए करोड़ों सुख से बढ़कर है मैं आह भी नहीं करूंगा और उस दुख को सोऊंगा और राधा राधा राधा कृष्ण कृष्ण कृष्ण ऐसा गाऊंगा हमें क्या परेश देखो प्यार किया जब प्रभु से तो फिर अब तन की और धन की और लोक की परवाह है एक बार तो मरना ही है अब प्यारे के लिए मरूंगा ज हमें वैसे ही कर्म भोगने थे तोब आपके होकर भोग रहे हैं हमें क्या परेशानी है आप मत मिटाओ लेकिन हमारे दुख में आप की याद बनी रहे इतनी कृपा कर दो यह जरूर मांगना चाहिए कि दुख मिटा दो ऐसा तो हम नहीं कहेंगे आपसे आपने भेजा ही है पर ऐसे दुख में मैं आपकी याद ना भूलूं आपको पुकार पुकार करके जीवं इतनी मुझे सामर्थ्य दे दो कि हर दुख में मैं आपका नाम बहुत आनंद है सही आपसे कहते प्रेम में बहुत आनंद है जब एकांत में दुख होता है कोई अपने पास ना हो तब बातें करो प्रभु से

देखो कैसा रोना आएगा हे नाथ आपके सिवा कोई हम भले नहीं देख पा रहे लेकिन आप तो सुन पा रहे हैं आप सर्वज्ञ हैं आप सब जगह हैं आप सब दर्शी हैं तो आप मुझे देख रहे हैं तो प्रभु देख लो आपके सिवा कोई नहीं नाथ मुझे एक सामर्थ्य दे दो कि मैं आपको पुकारूं आपकी याद में डूबा रहूं भले और चाहो तो और कष्ट दे दो पर उस कष्ट में मैं आपको भूलूं नहीं बस शर्त यह है और जिसको भगवान की स्मृति प्राप्त है उससे बड़ा धन्य भाग कोई नहीं है शरीर चाहे गलित कुष्ठ से युक्त हो लेकिन भगवत स्मृति तो आनंद रहता है और शरीर बहुत स्वस्थ है और विषय विकार नाना प्रकार के पापा चरण तो कभी आनंद को नहीं प्राप्त हो सकता है आप तो भाग्यशाली है आप तो भगवान की शरण में क्या विपत्ति कर लेगी चार दिन बाद जितनी जिंदगी है शरीर छूटा भगवान के धाम गए क्योंकि भगवान के रजिस्टर्ड दास है गुरु ने मुझे साक्षी करके दास बनाया है जैसे आचार्य नहीं पाणी ग्रहण कराते तो गुरु ने पाणी ग्रहण कराया है हमारा और हमारे प्रभु का संबंध कि ये पकड़ो ये तुम्हारा सेवक है और

देखो ये तुम्हारे स्वामी है तो अब हमको तो पहुंचना है अपने स्वामी के पास ऐसा सोचा करो ये चार दिन की यहां की विपत्ति जैसे हम विदेश से अपने देश लौटना हो वहां बड़ी समस्या हो तो हम काट लेते हैं कि यार बस वो तारीख आ रही जाने वाली बस तब लग सह लेते हैं हमको यहां रहना तो है नहीं रहना नहीं क्योंकि देश बिराना है तो ऐसे ही ये बिराना देश है यहां तो रहना नहीं हमें तो भगवान के पास जाना है चलो भैया तो रा मन आता है तुम गाली दे दो तुम्हारा मन आ रहा विपत्ति दे दो जैसा है हम समय काट लेते हैं इसके बाद आना तो आपके पास ही है गोविंद आपके सिवा कोई है ही नहीं हमारा अब ये आनंद का जो अंदर भक्तों के रहता है ना वो ये आनंद का विषय रहता है इसलिए उसी को आप धारण करो बलवान बनो निराश उदा कभी कोई पूछे कैसे हो बहुत अच्छे हैं नहीं सुना हम नहीं हमें हमारे ऊपर श्री कृष्ण की बहुत कृपा है जो आए हुए प्रारब्ध के सुख दुख को भोग लेता है और हर समय भगवान की कृपा मनाता रहता है उसको भगवान की ऐसे प्राप्ति होती है जैसे अपने बाप की

प्रॉपर्टी सरकार के विधान से बेटे को प्राप्त हो जाती है यह भागवत में लिखा हुआ है जो अपने प्रारब्ध में आए हुए सुख दुख को भोग लेता है हर समय भगवान की स्मृति में भगवान की कृपा मनाता रहता है उसको परम पद की प्राप्ति ऐसे होती है जैसे पिता की संपत्ति पर स्वयं पुत्र का अधिकार हो जाता है ऐसे भगवत प्राप्ति हो जाती है जी

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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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