॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #624 · 2 अगस्त 2024

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

अमृत कुमार पांडे जी हलवानी राधे राधे श्री राधे राधे महाराज जी गुरुजी गृहस्थ जीवन में शरीर से जुड़ा कोई भी प्राणी यदि बीमार है तो समस्त ग्रस्त जीवन में उससे जुड़े समस्त व्यक्ति उससे जैसे पुत्र माता-पिता इत्यादि सबकी सेवा में रहते हैं उनकी तो क्या यह उसके प्रारब्ध में है दुख है या सभी के प्रारब्ध में दुख पूरे परिवार का क्योंकि वो जमेगा इसी तरह अनेक जन्मों के कर्म संस्कारों को मिला कर के वह पिता बनेगा वह पुत्र बनेगा व पत्नी बनेगा व अब पुण्य है तो पत्नी ऐसे स्वभाव में होगी ऐसे आचरण में होगी कि देख देखकर तुम्हें सुख होगा और अगर पाप है उसी के द्वारा ऐसे आचरण होंगे ऐसा स्वभाव होगा कि जलो ग पुत्र आएगा ऐसा पुण्य आत्मा अगर पुण्य तो वह ऐसा आचरण करेगा ऐसा पढ़ लिखकर स्वस्थ ऐसा आपको देख देख देखकर आनंद होगा पूरे परिवार को नहीं ऐसा रोगी होगा ऐसा क्लेश देने वाला रुपया पैसा भी खर्चा है हृदय भी दुखी हो रहा पूरा परिवार दुखी हो रहा है ये कर्म संयोग है म जी बहुत सूक्ष्मता से देखा जाए तो इसमें बस ही नहीं है

महाराज जी कौन सी पत्नी आनी है बच्चा आना है क्या कहीं बस लगता ही नहीं अपना कर्म के अनुसार है ना कर्म के अनुसार अवश्य में भोग तव्य वैसे रूप रख के भगवान आएंगे अरे पूरा परिवार नष्ट हो जाता है पूरा परिवार जेल में बंद हो जाता है ऐसे आचरण हुए ऐसा ऐसा ऐसे लीला और ऐसी ऐसी बहुए आती हैं कि परिवार की बहुत नीची स्थिति है और उतने में ही आनंद है पूरा परिवार आनंद तो कर्म के अनुसार है ना पूर्व के कर्मों के अनुसार वो जीव आत करर पत्नी बना और वह महान दुख देता है या सुख देता है पुत्र बना व दुख देता है या सुख देता है कर्म के अनुसार ही सारा खेल होता है यहां जितना जो कुछ हो रहा है कर्म शुभ और अशुभ दो कर्मों का खेल हो रहा है पाप और पुण्य और इस खेल से जिसको निकलना है तो शुभ अशुभ से परे भगवान का भजन कर ले तो निकल जाएगा अगर भजन नहीं है तो शुभ अशुभ फासे रहेगा व अवश्य में भोग तव्य कृतम कर्म सुभ सुभ ऐसे मित्र मिल जाते हैं ऐसे पशु मिल जाते हैं हर चीज कर्म से जुड़ा हुआ है अब हम नवीन कर्म ऐसा कर ले कि हमारी पुराना सब

भस्म हो जाए तो वह है भजन वह है परोपकार वह है भगवान की आराधना नहीं तो जीव दुख को प्राप्त होता ही है यहां कोई बराबर सुखी नहीं रह सकता दुख को प्राप्त होता ही है बराबर दुखी नहीं रह सकता थोड़ा सुख भी मिलता है ऐसा कोई भी दुख नहीं तो सुख और दुख अगर दोनों से ऊपर उठना है तो भगवान का नाम जप करें वह पूरे परिवार का संयोग होता है यहां तक कि रिश्ते नातेदार का भी कर्म संयोग हो जाता है जैसे आपने कोई कानून विरुद्ध आचरण किया तो आपकी ससुराल का पता लगाया जाएगा वहां जाएगी पुलिस वहां गाली गलोज करेगी पूरी चेकिंग करेगी सब करेगी आपके मामा कहां रहते हैं आपके रिश्तेदार कहां है आप पूरी जगह खोज होगी और गाली गलौज ढूंढ ऐसा होगा कि नहीं होता है तो अब उनका क्या उसमें अपराध था लेकिन रिश्ता है तो रिश्ता कैसे बना कर्म से कर्म का संयोग है ना भाई पीट रहा है रिश्ते नातेदार गालियां पा रहे परिवार के लोग दुखी हो रहे एक आदमी ने मोहल्ला गांव रिश्ता नाता सबको दुखी कर दिया और एक आदमी सुखी कर गर्व से कहते नहीं हमारे गांव के हैं ऐसे

बोलने लगते हमारे एरिया के हैं उनको भी सुख हो रहा है कि हमारे एरिया का आदमी जो है ऐसा तो ये क्या हुआ कर्म ऐसे कर और ऐसे ऐसे कर्म करने वाले लोग हैं जो अभी सोच नहीं रहे अब जैसे मुर्गा मुर्गी बकरा बकरी काट के जिंदा भून के खा रहे अब यह सब कर्म क्या करेंगे तुम्हें जिंदा भुंगे माया भगवती सर्व सामर्थ शली आद्या शक्ति वह तुम्हें ऐसे भून दगी तो अवश्य में भक्तवत्सल का बड़ा संयोग लगा होता है बड़ा जोर लगा होता है देखो जैसे हमने गांव में देखा जुआ खेल रहे हैं चार लोग और 20 लोग खड़े देख रहे हैं और जब कानून के लोग आए ना पुलिस के तो पहले उन 20 लोगों के डंडार मारा अब बोले जुआ तो हम खेल नहीं रहे क्यों मार रहे हो बोले तुम देख रहे हो उस मतलब कर्म का कितना बड़ा दंड है वो कर नहीं रहा उसका उससे कोई संबंध नहीं लेकिन वो देख रहा है तो भी भोगना पड़ा डंडा हमारे साहब हम तो तो भाग यहां खड़ा क्यों दो चार डंडे तो पर ही जाएंगे नहीं पर जाएंगे तो अब आप सोचो उसका क्या अपराध था अपराध था क्योंकि वह अपराधियों को देख रहा था

अपराधियों के पास खड़ा हुआ था कर्म का बड़ा संयोग फ माता-पिता पुत्र परिवार य तो बहुत घने संबंध है तो अब जीव को तो भोगना ही पड़ेगा मार जी दुख का सहयोग बन गया अगर परिवार में अगर य ऐसा दुख का संयोग बन गया तो नाम आप जब आप कहते हैं कि नाम जप से सब मंगल हो जाएगा तो मराज जी इसका विधान क्या है नाम जप से कैसे जैसे हम भगवान का नाम जप कर रहे हैं तो हम पहले सबसे पहले हमारी बुद्धि शुद्ध होगी हमारी बुद्धि में विवेक आएगा तो भजन करने से पहले बुद्धि शुद्ध होती है और विचार आते हैं विवेक आते हैं धैर्य पूर्वक और भजन फिर संयोग भी बना देता है अगर आप परिवार में भी हो गृहस्थ में भी हो तो भगवान आपकी व्यवस्था कर देंगे पक्का कर देंगे जब भगवान से जीव जुड़ा नहीं होता तो उसे कष्ट ही कष्ट भोगना होता है इसलिए गृहस्थी में भी रहकर भजन करो भगवान का आश्रय लो वो सब व्यवस्था कर देते हैं वो समझा देते हैं वो हर व्यवस्था सबसे बढ़िया बात है दिमाग का फ्री हो जाना बोझा ना ला देना दिमाग अगर स्वस्थ है आप लोगों का तो बड़े से बड़ा कष्ट

आप झेल सकते हैं बड़े से बड़ी समस्या का निदान कर सकते हैं और अगर दिमाग बीमार हो गया तो फिर आप परेशान लोगों के दिमाग बीमार हो रहे हैं धन है संपत्ति है लेकिन जिसे डिप्रेशन कहते हो ना वो दिमाग बीमार हो रहा है क्यों भगवान से विमुख है इसलिए नहीं तो हर परिस्थिति कष्ट सहित सही जा सकती है धैर्य पूर्वक सही जा सकती है अगर भगवान का आश्रय भगवान का भजन है तो सब ठीक हो जाएगा हमें लगता है सबको भगवान का भजन करना चाहिए तभी आनंद के अनु भगवान से विमुक्त तो बहुत ही कष्ट है बहुत है कष्ट संसार में हर परिस्थिति को बदलते हुए देर नहीं लगेगी भगवान बहुत बलशाली है अरे जब सारी सृष्टि उन्होंने तो हमारी समस्या का समाधान नहीं कर देंगे क्या बिल्कुल पक्का समझो भगवान के भजन से एक अलौकिक आएगी वो दिव्य निर्वाह करने वाले सुदामा को दे देते हैं जैसे द्वारिका पुरी वैसे सुदामा पुरी थी तो भगवान का भरोसा कर लो ये केवल कहानी की बात नहीं उनको करना होता है ना वो एक अलौकिक ढंग से करते हैं और अपने जब कर्ता बनोगे तो परेशान हो जाओगे सब

परेशान है नहीं परेशान है कर्ता परेशान है और जिसने करता भगवान को मान लिया अपने आप व्यवस्था हो जाती है इसलिए नाम जप करो दूसरों का हित करो जो दुख सुख आवे उसे सह लो भगवान की कृपा से पार हो जाओगे कोई ऐसा नहीं है जिसको दुख सुख ना आता हो साधु महात्मा भगवान जिनके यहां अवतार लिए वहां भी देख लो ना देवकी वसदेव कंस कारागार में दशरथ जी का प्राण त्याग देना भगवान का 14 वर्ष का वनवास सीता जी का अपरण ये सब देखो ना आप ये दुख सुख कितने जोर के भगवान की लीला में है तो हम लोग तो जीव है वो तो भगवान है जब वो यहां अवतरित हुए तो दुख सुख का खेल चला तो हमारा आपका तो चलेगा ही थोड़ा मजबूत बन कर के चलो टूटो मत हारो मत झुको मत इस बात से कि अब तो मैं किसी काम का नहीं गया नहीं सच्ची बात हम उन्हीं प्रभु के चरणों में चित्त जोड़ने की बात कहते हैं यह सबसे बड़ा जादू है सबसे बड़ा जादू है भगवान से चित्त का जुड़ जाना ये जंतुर मंत्र इनसे कुछ नहीं होने वाला राम राम जपो कृष्ण कृष्ण जपो हरि हरि जपो तुम्हारा पक्का मंगल हो जाएगा भाव

कु भाव अनख आल सह नाम जपत मंगल दि पक्का समझ लो अच्छा सबसे आखिरी दुख है मृत्यु का मरना तो है ही हम आपको सच्ची कहते 100 में 100% हमें दुख नहीं क्यों अपने घर जाना है हमें शरीर छोड़ के जिन प्रभु का हम जीवन भर भजन करते रहे जिनके लिए तरसते हैं शरीर छोड़कर हमको उनके पास जाना तो हमें दुख लगेगा कि कि शरीर छ दुख तब लगे जब हमारा कोई हो हमारे जो हैं हम उनके पास जा रहे हैं तो अभी शरीर छूट जाए तो अभी आनंद अभी अपनी प्रियाज के पास अभी लाल जू के पास पहुंच गए तो मरना निश्चित है तो हम मरने की तैयारी कर ले राधा राधा राधा भी जप रहे और अभी प्राण निकल जाए अभी प्रभु को प्राप्त हो जाएंगे अब जीव भूला हुआ मार मकान दुकान रुपया पैसा घर परिवार सात जन्म तक का इकट्ठा कर रहा है कि पूरी सात पीढ़ी जो है हमारी खा भरोसा मिनट का सात का नहीं सा मिनट का भरोसा नहीं इसलिए नाम जप करो भगवान के आश्रित रहो और सच्ची बात हमारी मान लो दुख सुख सबको भोगने पड़ते हैं उनको भोग लो उबो मत जो हमने कर्म किए वो हमको भोगने पड़ेंगे भोग के कर्मों

को काट लो और भजन से भगवान को रिझा लो भगवान की प्राप्ति कर लो यह सच्चा मार्ग है अगर यह नहीं समझ पाओगे तो फिर दुख ही दुख है बिना भगवान के भरोसे के इस दुख समुद्र से पार नहीं हुआ जा सकता कृष्ण गोपाल जी इंदौर से राधे राधे शीश महाराज जी गुरुदेव आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम गुरुदेव भगवान जब माया स्वयं भगवान की है तो जब उपासक गुरु कृपा से भगवान को पाने के लिए उपासना में लगता है तो यह माया उसे और अधिक परेशान क्यों करती है परेशान नहीं करती है कक्षा एक में जब विद्यार्थी को पढ़ाया जाता है तो पांच का प्रश्न नहीं दिया जाता वही मास्टर वही पढ़ाता है और वही प्रश्न चयन करके देता है आप उत्तर देते हो तो क्लास बढ़ जाता है बस ऐसे भक्ति में भगवान पढ़ाते हैं और जो प्रश्न है वही माया है जो उत्तर है वही भक्ति है सही उत्तर दे दो आगे की अध्यात्म उन्नति में चले जाओगे तो यह कोई परेशान होने वाली बात माया परेशान करती कहां परेशान माया क्या है हमें बताओ क्या परेशान करके माया गुद भगवान जैसे श्री जी की बात कर रहे हैं

तो उसम फिर ऐसा कर दे कि देखो हम तो श्री जी की बात तो आप उसे माने हुए हो कि करा देग आपकी चाहत है आपकी चाहत है इसलिए आपका मन जाता है आप फिल्म देखते तो कभी मन जाता है कहीं क्योंकि आपकी चाहत भी वही है और आप देख भी वही रहे हैं तो मिल गई ना रुचि मिल गई और हमारा लक्ष्य मिल गया मन नहीं जाएगा अब लक्ष्य बनाया भगवान और रुचि है माया तो विक्षेप पड़ रहा है अगर रुचि भी भक्ति हो जाए भगवान में हो जाए तो माया है कहां मा माने नहीं या माने जो कोई माया नहीं ये सब भगवान के स्वरूप रचे हुए हैं अपने आप से आप अपने आप में भगवान खेल रहे हैं कोई और है नहीं माया माने जो नहीं है उसे माया कहते हैं जो नहीं है वह दिखाई दे रहा है यही भगवान की माया है माया हमको घसीटते नहीं है हम माया को पकड़ते हैं आरोप कर देते हैं जैसे हम एक राजा का उदाहरण देते हैं कि एक राजा से एक महात्मा ने कहा अब आपकी अवस्था हो गई है राज का छोड़ी और भजन कीजिए उनका माया नहीं छोड़ने देती उत्तर दिया माया नहीं छोड़ने देती साथ टहलने जा रहे थे तो एक पेड़

में ऐसे महात्मा मा जी पकड़ के चिपक गए और कहा राजन आप छुड़ाओ या अपने बलवान को बुलाओ मुझे पेड़ नहीं छोड़ रहा है तो हंसने लगे उन्होंने कहा महाराज क्या आप लीला करते हैं कहीं जड़ पेड़ आपको पकड़ सकता है आपने पकड़ रखा है तो बोले कहीं जड़ माया आप चैतन्य को पकड़ सकते आपने पकड़ रखा है आपसे कहा भजन करो तो कहते माया ने पकड़ रखा है कहां माया है ऐसे माया ने पकड़ रखा है जैसे हमने पेड़ को पकड़ लिया अब बोले छुड़ा दो कोई हमें माया पकड़े हुए पेड़ पकड़े हुए तो हंसी की बात है ना कहां माया है शरीर ये माया है इसको आपने पकड़ा है कि मैं पुरुष पकड़ा है नहीं इसने तो आपको नहीं पकड़ा यह तो बाल्यावस्था जवानी अपने आप नाश को प्राप्त हो रहा है आपसे कोई स्वीकृति थोड़ी ले रहा है लेकिन आप स्वीकृति करते चले जा रहे हैं मैं बालक मैं जवान मैं बूढ़ा असमर्थ मैं पापी मैं पुण्यात्मा मैं धनवान मैं निर्धन माया ने पकड़ा कि आपने पकड़ा हैले आप ही छोड़ दो कोई माया नहीं यह बात समझ में या रहस्य रघुनाथ कर वेग न जाने कोई जो जाने रघुपति कृपा

तो सपन मोहन हो हम जो जो छोड़ते जाते हैं माया मुक्त है जो जो पकड़ते जाते हैं माया आसक्त है तो गलती हमारी है ना हम ही को तो सुधार करना है इसीलिए भगवान उपदेश करते हैं जीव को गीता में शास्त्रों में संतो के हृदय में बैठकर भगवान ही तो उपदेश कर रहे हैं तो आप समझ पा रहे हो खूब नाम जप करो सत्संग सुनो और उसके बल से जो ज्ञान प्राप्त है उससे माया का त्याग करो जो जो माया ब्रह्मा क्मक भोग आकर्षण करके हमारी दुर्गति करा रही उसका हम त्याग कर दे अभी माया मुक्त हो जाएंगे पहले खूब नाम जप करो शास्त्र स्वाध्याय सत्संग सुनो तो ज्ञान बढ़े तब बात समझ में आवेगी भजन करते हो ना हां नाम जब जितना करोगे उतने अध्यात्म को समझ पाओगे समझने के लिए जो हमारी बुद्धि प्रवीण चाहिए वो भजन से होती वो किसी और कार्य से नहीं होती श्री जी के आपके हो ग तो पक्का निकुंज श्री जीी ले जाएगी ना आश्रित हो जाए पक्का तन तनु वांग मनो भीर मल सुहम त वाता हृदय से मन से वाणी से शरीर से अपने आप से भी प्रभु मेरी सामर्थ्य रहे आप ही मुझे पार करो यह

विश्वास दृढ़ रखना तो आपका अध्यात्म मार्ग देखना पुष्ट होता चला जाएगा क्योंकि संभालने वाले भगवान है ना वो सब संभाल देंगे ब गंदा भोजन ना करना गंदे आचरण मत करना गंदे लोगों का संग ना करना तो आप निकल जाओगे माया को हमने पकड़ रखा है हमें माया ने नहीं पकड़ा नहीं माया कोई ऐसा भूत जैसा नहीं है हमने पकड़ रखा है हम इतने असमर्थ हो जाते हैं जैसे छोटी सी बात ले लो एक तंबाकू तंबाकू आके हमारे मुंह में घुस गए क्या अब इतनी छोटी सी वस्तु है उसके लिए किसान आधा किलोमीटर खेत से दूर किसान तंबाकू वाला है ना उसके पास खत्म हो गई तो वहां जाएगा बोले देखो ये माया दौड़ा रही है माया नहीं दौड़ा रही आपने व्यसन पकड़ा और व्यसन के कारण आप दौड़ रहे हैं ऐसे हर जगह एक हम छोटा उदाहरण ऐसे हर जगह जीव फंसा हुआ है नहीं जहां वो नहीं निकल पा रहा है आसक्ति कारण वहां थोप देता है माया बोले माया ने फसा लिया अब माया बहुत जोर की है मैं निकल नहीं पा रहा हूं वो आपने स्वीकार किया है आपने आप तमाकू खाना छोड़ दो खत्म आप व्यसन करना छोड़ दो

आप गंदी आदते छोड़ दो धीरे धीरे हृदय पवित्र होगा आप माया मुक्त हो जाएंगे आपने ही पकड़ रखा है आपको ही छोड़ना है और जिसे पकड़ रखा है वह भगवान ही है हम जान नहीं पा रहे हैं स्त्री पुरुष पुत्र पिता माता वस्तु पदार्थ सब भगवान बने वासुदेवा सरोव मिति सब कुछ भगवान ही है आकाश भारद्वाज जी मेरिट राधे राधे राधे राधे गुरुदेव गुरुदेव आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम गुरुदेव श्री जी कृपा से आप मिले आपसे नाम महत्व और महिमा को जाना मुझ पर और मेरे जैसे लाखों लोगों पर

आपके द्वारा की गई कृपा की इस अतु कृपा से हम सदैव आपके ऋण रहेंगे गुरुदेव आप अपने अंदर पूर्ण समर्पण भाव कैसे लाऊं मैं नहीं चाहता कि मन दौड़े क्योंकि अगर यह दौड़ेगा तो गलत दिशा में ही भागेगा महाराज जी नाम जप के अलावा खुद को सीधे रखने के लिए और क्या करना चाहिए देखो पहली बात है कि जब तक हमारे हृदय में प्रभु के प्रति महत्व नहीं बढ़ जाएगा तब तक यह कमी हम में बनी रहेगी महत्व जैसे हमको रुपया एक घंटे में 5 हज लाभ मिला लेकिन हम एक घंटे प्रभु को भूल गए तो महत्व रुपए का हुआ ना प्रभु छोटे हो गए महत्व जहां हमारा महत्व होगा वहां हमारी स्मृति होगी हमारी स्मृति महत्व पर होती है अगर हमारा महत्व स्त्री में है पुत्र में है परिवार में है धन में है मकान में है मित्र में है पद में है तुम्हारा मन वहीं जाता है प्रभु में महत्व माना हुआ है लेकिन है नहीं ऐसा हमारे हृदय में है अगर प्रभु सबसे ज्यादा महत्व हो जाए जैसे श्रीमद् भागवत में लिखा है कि त्रिभुवन की राज लक्ष्मी देने पर भी जो आधे पल के लिए भगवान को ना भूले

उसे महा भागवत कहते हैं तो हमारी दशा तो ये है कि छोटे से खानपान के भोग में हम इतना सुखी अनुभव अपने को करने लगते हैं कि भगवान को भूल जाते हैं अभी भगवान को हम भगवान मान कहां रहे हैं भगवान के आगे जब ब्रह्मादेवी तो हम कभी इस समय की पूर्ति नहीं कर सकते जैसे अब हमारी अंतिम स्वास है तो 50 वर्ष में जितनी स्वास खर्चा की उसमें हमने 50 अरब कमाए अब एक भी शवास हम 50 अरब देक नहीं खरीद सकते इतनी कीमती स्वास है अगर उस कीमती विश्वास को हम कीमती नाम में लगाए होते राधा राधा राधा तो हम जीवन मुक्त हो जाते तो हमारा प्रभु में मन इसलिए नहीं लगता कि प्रभु से बढ़कर कोई प्यारा है अंदर से देख लीजिए प्रभु से बढ़कर किसी को हम स्थान दिए हैं प्रभु से बढ़कर तो कोई नहीं है पर हमने स्थान दिया है चाहे वो काम संबंधी हो चाहे वो धन संबंधी हो चाहे वो शरीर मान संबंधी हो चाहे जाओ आप देखो जब हम भजन के लिए चलते हैं तो मन कहां जा रहा है जहां जहां बिजली वहीं जाएगी जहां तार है ऐसे ही मन वहां जाएगा जहां कनेक्शन है संबंध है महत्व है बस

हमको सारे महत्व सारे संबंध जो भगवान कह रहे हैं जननी जनक बंध सुत दारा तन धन धाम शहद परिवारा सबकी ममता ताग बटोरी मम पद मन बांध बर डोरी कनेक्शन एक मात्र भगवान से सप्लाई पूरे विश्व में पूरा विश्व हमारा है पूरा विश्व सबसे प्यार सबसे ठीक व्यवहार धर्म युक्त व्यवहार लेकिन संबंध केवल भगवान से गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं नाते नेह राम के मनियत शहद सुसे जहां लो जहां लो हम संबंध बनाए तो भगवान के संबंध से लेकिन भगवान के संबंध बहुत छोटा हम मान लिए और संसार का

संबंध बड़ा मान लिए तो भगवान का भजन नहीं होता संसार का भजन होता है देखो हम शरीर की कभी याद करते हैं नहीं भाई हम शरीर को माला लेकर या ध्यान लेकर नहीं लेकिन हम कभी भूलते भी नहीं क्यों क्योंकि शरीर को मैंने मैं मान लिया शरीर को अपना मान लिया ऐसे जिस दिन हम भगवान को अपना मान लेंगे तो हमारा भजन स्वाभाविक होने लगेगा उस दिन के लिए हमें क्या करना है कि हमें केवल भगवान प्यारे लगे तो जब बहु काल करी सत्संगा तब होए सब संशय भंगा पहला नियम हम बहुत काल तक सत्संग

सुने अधिक से अधिक शास्त्र स्वाध्याय करें तो नाम जप के प्रभाव से और सत्संग के प्रभाव से मेरा मन प्रभु में महत्व कर ले जिस दिन महत्व हो जाएगा सच्ची मानिए जैसे रूप का महत्व तो रुपय का चिंतन करना नहीं पड़ता स्वाभाविक होता है ऐसे भगवान के नाम का महत्व जब जागृत हो जाएगा तो स्वाभाविक भगवान का अब देखो भजन हमारा प्राण है भजन हमारा सर्वोपरि है तो भजन छूट जाने पर क्या हमको व्याकुलता होती तद स्मरण परम व्याकुल भगवान का भजन छूट गया आधा घंटा से हम भजन नहीं कर रहे हमारे अंदर व्याकुलता है अगर व्याकुलता है है तो भजन छूट नहीं सकता भजन छूट गया इसका मतलब व्याकुलता नहीं तो जैसे हम कोई धंधा करते हैं व्यापार करते उसमें घाटा पर घाटा लगता जाए तो हमें परेशानी पैदा होगी कि नहीं तो हम जब भजन करने चले भजन हमसे छूट रहा है तो हमें परेशानी होनी चाहिए ना व्याकुलता होनी वही व्याकुलता भजन कराएगी पर हम लोग राजी है हमें व्याकुलता नहीं होती छूट गया छूट गया साधना ऐसे नहीं होती निरंतर भजन करने के लिए सबसे पहले भगवान का महत्व

और दूसरी बात तद स्मरण परम व्याकुल तेत जहां भगवान का विस्मरण होने लगे तो व्याकुलता आ जाए रोना आ जाए प्रभु मुझे कृपा करके आप अपना भजन दो कि निरंतर मेरा भजन सतत चलता रहे तो भजन फिर हमसे होने लगे भगवान से प्रार्थना करो और खूब सत्संग सुनो शास्त्र स्वाध्याय करो परिवार को भगवान की सेवा मानकर उनकी सेवा करो उनसे सुख लेने की चेष्टा नहीं उनको सुख देने की चेष्टा अभी भजन में आगे बढ़ोत्तरी हो जाए अगर हमसे पापा चरण भी होते रहेंगे तो फिर भजन में बढ़ोत्तरी तो नहीं होगी और प्राया यही होता है बैलेंस बना के चलते हैं कुछ माला भजन तो फिर मनमानी आचरण तो भजन का कोई अनुभव नहीं होता है भगवता अंद का कोई अनुभव नहीं होता है जो अनंत ब्रह्मांड का भरण पोषण करता है वह तुम्हारा भरण पोषण नहीं कर पाएगा क्या वही अब भी कर रहा है केवल भ्रम आपको है कि अगर हम नहीं करेंगे तो नहीं हो पाए नहीं पक्का हो जाएगा वह आपके अंदर ब बैठ कर के जैसे अर्जुन का रथ आक रहा है ना वैसे तुम्हारे द्वारा सारे कार्य करवा लेगा आप विश्वास करो वो अच्छे

से अच्छा कार्य करवा लेगा वो मुखम करोति वाचाल पंगम लंगते गिरिम यत कृपा तम हम वंदे परमानंद माधवम वो मुक को भी वाचाल कर दे वेद जो क कारा नहीं पड़े उससे वेद पढवा दे लूले लंगड़े से पहाड़ फवा मच्छर से जो ना ब्रह्मा ब्रह्मा से मच्छर ये सब काम उनके मसक करे रंच अज अज मसक ते ऐसे समर्थ भगवान है फिर हम उनका स्मरण कर रहे हैं तो हमारा कुछ घाटा हो सकता है हमारा कोई नुकसान हमारी कोई हानि हो सकती है महा आनंद सच्ची मानिए सच्ची मानिए इसमें कोई नाटक पाखंड की जरूरत नहीं कोई पैसा नहीं लगता मधुर मधुर राधा राधा राधा और सब बात बन जाएगी आप देख लो राधा राधा राधा अंदर से जपते र मालामाल हो जाओगे हम तो बात कह रहे लोक परलोक सब ये नहीं कि लोक में दुखी रहोगे नहीं नहीं अगर हम भगवान की शरण में ना होते तो हम बहुत दुखी होते आज हम भगवान की शरण में इसलिए बहुत सुखी है उसी का हम आपको प्रवचन कर रहे हैं उसी सुख का हम आपको निर्देशन कर रहे कि आप उसी दिशा में चलो एक अद्भुत आनंद एक अद्भुत सुख एक अद्भुत दुलार हमें भगवान का मिल रहा है

हर तरह आनंद की अनुभूति हमको हो रही ना लौकिक व्यवस्था की चिंता है ना पारलौकिक व्यवस्था की च क्या उन भगवान के आप बच्चे नहीं हो जैसे हम उनके हैं वैसे जैसे आप उनके हो बस आपने संसार को अपना बनाया हमने भगवान को अपना बनाया अंतर जो आप सुनने आए हो जो आप हाथ जोड़े हो तो केवल उसी बात का हाथ जोड़े हो नहीं जो तुम्हारा पांच भौतिक शरीर वो ये पांच भौतिक शरीर जो तुम्हारे अंदर भगवान का अंश वो इसके अंदर जो तुम्हारे अंदर शक्ति वो इसके अंदर आप संसार को अपना मान लिए हमने भगवान को अपना मान लिया आप संसार का चिंतन करते रहे हम रात दिन भगवान का चिंतन करते रहे तो उसका जब परिणाम आया तो आज हम परम सुखी ना मरने का डर है मर के कहां जाएंगे और ना जीने की व्यवस्था की चाह है सब भगवान अपने आप कर रहे हैं अच्छा भगवान में जब चित्त जुड़ा है तो एक अल्लाद है एक विश्वास है एक भरोसा है एक पकड़ है भगवान में चित्त नहीं जुड़ा तो किसको पकड़े यहां सब धोखा ही धोखा है पाए जान जगत में सब जन कपटी कुटिल कलयुगी टंच आपके सामने हाथ मिलाकर आपसे

सर बहुत धोखे बाज संसार है विश्वास करने योग्य सिर्फ भगवान है नहीं तो हम बिल्क हम कह रहे हैं कई जगह हमने देखा है कोई नहीं आचार्य कह रहे हरिवंश महाप्रभु पाए जान जगत में सब जल कपटी कुटिल कलयुगी टंच सबको कलयुग ने टच कर रखा है अपने अधीन कर रखा है एक मात्र भगवान का भरोसा और वो रक्षक होते हैं ना तो बहुत जोर की रक्षा करते हैं काल मृत्यु एकमात्र भगवान रक्षक है दूसरा नहीं इसलिए भगवान का भरोसा रखो मात भगवान पर रखो सत्संग सुनो नाम जप करो आनंद में जीवन रहेगा पाप आचरण न बनने पावे पाप आचरण अगर होंगे तो फिर ये हमारा प्रवचन रंग नहीं लाएगा आपके जीवन में फिर तो दो चार बार के बाद आपका आना भी बंद हो जाएगा कि अरे यार कोई लाभ नहीं होता क्योंकि यहां जंतुर मंत्र वाला तो कोई लाभ है नहीं यहां तो सीधे सत मार्ग की बात है अध्यात्म की बात है और आप सुधरोगे तब आपको आशीर्वाद मिलेगा तुम धर्म से चलो नाम जप करो सब संतों का अपने आप आशीर्वाद है पैसे से बनिया की दुकान की सामान मिलती आशीर्वाद नहीं मिलते ध्यान रखना और जो पैसे से

आशीर्वाद मिलता है वह आशीर्वाद होता नहीं है यह भी बात समझो मां अपने बच्चे को जैसे दूध पिलाती तो किसी स्वार्थ से थोड़ी पिलाती है ऐसे संत महात्मा अपनी तपस्या रूपी दुख जो समाज को देते हैं वो कभी स्वार्थ से नहीं देते और जिनके अंदर स्वार्थ होता है वो दे नहीं सकते और जिनके अंदर देने की सामर्थ्य वहा स्वार्थ नहीं होता तो अगर आप सच्चाई से चलोगे तो सुर नर मुनि प्रसन्नता ऊपर भगवान का भजन करते जितने देवता ऋषि मुनि है वो सब आपके अनुकूल हो जाएंगे क्योंकि भगवान का भजन कर रहे हो मनीष यदुवंशी जी बिहार से बैठ श्री हरिवंश महाराज जी गुरु जी आप मुझे पाच वर्ष पहले मिले इनमें भगवान काशी विश्वनाथ जी की असीम कृपा रही मैं उनके पास जाकर प्रार्थना करता था कि मुझे कोई गुरु मिल मिला दो उनकी कृपा से आपसे मिलना हुआ महाराज जी मुझे दुख इस बात का है कि इतने समय हो जाने के बाद भी ऐसा क्या कारण है कि श्री जी के लिए कभी विकल होता नहीं आ रही रोना नहीं आ रहा श्री जी मिल जाए ऐसा सु कारण जो हमारी मना खटानी इंद्रियानी प्रकृति

स्थान कर सती माया की तरफ जा रहे हैं भोगों में उतर रहे मनमानी आचरण हो रहे हैं यही हमें प्रभु के लिए विकल नहीं होने देते हम कहीं राजी हैं राज वही होता है हमारे जी जैसे ना कि ऐसा नहीं कभी नहीं होता कि मुझे श्री जी ही श्री जी चाहिए श्री जी को सिवा मुझे कुछ नहीं चाहिए ऐसा नहीं होता कभी मन भोगों में चला जाता है सो श्री जी तो मिल ही जाएंगे तो मतलब ऐसा नहीं आता चाहिए यही यही फेल करने का यही स्वरूप है हमारे भ्रम के द्वारा यह गलती हो रही हमारे अ हां हमारे अंदर महत्व भोगों का अधिक है श्री जी कले मतलब एक होती है ना सूक्ष्म अंदर में कहीं ना कहीं बना रहता है वही बना रहता है वो इसलिए बना रहता है कि अभी सत्संग और नाम जप का रंग नहीं आया हां नहीं तो नहीं तो खानपान नहीं भावे है नहीं कोमल वसन सुहावे है सब विषय लगे ते खारा है हरि आशिक का मग न्यारा है नारायण हरि भजन में पाचन सुहात विषय भोग निद्रा हसी जगत प्रीति बहु बात तड़पन आ जाएगी रोना आ जाएगा प्रभु अब जिया नहीं जाता आपके सिवा आप मिलो हे नाथ आप मिलो पर बात

यही बच्चा कि हमारा मन हमको भोगों में कि भगवान तो दयामय है वो तो मिल ही जाएंगे आखिरी तक और यही करते करते हमारा जीवन व्यतीत हो जाता है कभी भगवान नहीं मिलते एक आदमी संत सेवा में गया तो बहुत दिन संत सेवा की तो उसने एक दिन कहा कि महाराज हम आपसे कह नहीं रहे हमारे अंदर कोई ऐसी श्रद्धा से हम सेवा आपकी नहीं कर रहे हमें धन चाहिए और सुना संत सिद्ध पुरुष होते हैं वह चाहे तो धन दे सकते हैं तो उनका अगर सेवा का फल तुम धन चाहते हो एक डिबिया में पारस मणि रखी थी दिया बोले जाओ सात दिन तुम्हें देते हैं जितने लोहे में चाहोगे छुआ दो सोना बन जाएगी पारसमणि का प्रभाव होता है जाओ सात दिन के शाम को हम वापस ले लेंगे अब उसने विचार किया कि मणि तो हमारे पास आए गए हम सब खेती बेच डाले और लोहा खरीद करके और घर में सब बंद कर ले और आखिरी में पूरे लोहा में छुआ देंगे सोना ही सोना हो जाएगा अब खेती बेचने में कई दिन लगे तीन चार दिन भाई गाहक भी ढूंढना है खेती बेचा फिर लोहा एकत्रित करके व मतलब वो यह भूल गया कि शाम के पारसमणी ले

जाएंगे शाम तक सब लोहा घर में अंदर डाल कर के तो डाल ही रहा था लोहा महात्मा जी आ गए उन्होंने कहा बेटा पारसमणि वापस करो बोले स्वामी जी पूरी खेती बेच डाला सब कर डाला अब लोहा तो अंदर ही डाल ले थोड़ी देर रुक जा बोले सात दिन में नहीं एक कील भी सोना नहीं बला पाए सीधे वापस कुछ नहीं हुआ समझ पाए ऐसे ही भगवान ने स्वास रूपी पारसमणि दी है किसे नाम में राधा राधा राधा तो ये लगता है यार अभी तो बच्चा है थोड़ा जवान अभी तो जवान है थोड़ा भोग भोग लेते अभी तो यह कर लेते फिर बाद में सत्तार में बैठ के नाम जप करेंगे जब कोई कहा और आ गई मृत्यु और लेके चली गई कुछ नहीं बन पाया ऐसे पूरे संसार के लोगों का जीवन इसी में चला जा रहा है चतुर वो है कि जितना है पहले उसमें छुआ लेते हैं समझ में आया ना अगर हमारे घर में एक दो बाल्टी है तो पहले उसे सोना बना के तो देखें हम ऐसे हमारा अभी वर्तमान का समय राधा राधा में जा रहा है भगवान का चिंतन कर रहे हैं अच्छे कर्म कर रहे हैं भोग तो कभी भोग लोगे भोग तो सुवर कुत्ता चिड़िया पंछी सबको

मिल रहा है यार इस जन्म में मुझे भगवान चाहिए लेकिन हमारा मन गलत सलाह दे देता हम राजी हो जाते यह हमारे दिमाग में जो बात बैठी हुई है यही हमें भगवत प्राप्ति के लिए रुदन नहीं आ रहा नहीं तो रुदन क्या हृदय फटने लगता है हम जिससे प्यार करते हैं इतने दिन हो गए वो हमें दिखाई नहीं दिया और हम चैन से जी रहे कैसा प्यार फि ऐसा हो नहीं सकता ये था माम प्रपद्यंते तास बजम भगवान के लिए जो रुदन करता है उसी समय भगवान साक्षात्कार दर्शन देखो गोपी जन रोई ना भगवान रुदु सुम

राजन कृष्ण दर्शन लालसा तो तासा महावीर भूत छोरी इसम मान मुकाम बुजा पीतांबर धरा सगवी साक्षात मनमत मन मता करोड़ करोड़ कामदेव को मूर्चित करने वाले श्री कृष्ण रोती हुई गोपियों के बीच में उन्हीं के बीच में प्रकाशित हो गए प्रकट हो गए यही भगवान प्रकट हो जाएंगे पहले भोग भोग त्याग भगवान के प्रति कुछ त्याग तो करो तब तो भगवान कृपा करके तुम्हारे हृदय में स्पित हो जी महाराज जी मैं प्र करता लेकिन अंदर से बनी रहती है नाम जप नाम जप इसीलिए हमारे हर प्रश्न के उत्तर

में नाम जप मिलेगा क्योंकि भजन के बिना कुछ नहीं होना बच्चा बातों से माया पर विजय प्राप्त नहीं की जाती भजन से की जाती है जितना भजन करोगे उतने अरुचि बढ़ती चली जाएगी भोगों में आप करके देखो अच्छे नहीं लगेंगे भोग अरुचि होने लगेगी जब भोगों में अरुचि और भजन में रुचि अभी क्या है हम चाहते कहीं ना कहीं तो चाहते हैं भगवान को लेकिन रुचि भोगों की है इसीलिए भगवत प्राप्ति के लिए रुदन नहीं आ रहा और अगर हमारी रुचि और उद्देश्य दोनों एक हो जाए तो अभी रोना आ जाएगा तो

हम भजन करें भोगों में अरुचि हो जाए और भगवान में रुचि हो जाए कभी-कभी सात्विक भाव आती है तो लगता है कि हां अब श्री जीी ही चाहिए लेकिन फिर बा वो स्थाई नहीं है सतोगुण रजोगुण तमोगुण इनका चक्र चलता है स्थाई एक रस तो बहुत आगे चलकर आएगा अभी नहीं खूब नाम जप करो अच्छे से चलो सानवी जी अमेरिका राधे राधे महाराज महाराज जी महाराज जी मैं परिवार सहित अमेरिका में रहती हूं आपका सत्संग एवं एकांतिक वार्तालाप पिछले दो सालों से सुन रही हूं अगले वर्ष कॉलेज जाने वाली हूं

जहां मुझे अकेले रहना होगा अपने भविष्य को लेकर चिंता होती है कि कहीं कोई गलत निर्णय ना ले लूं क्योंकि मित्रों के साथ होते ही उनकी बातें ज्यादा रुचिकर व प्रभावशाली लगती है मुझे भय है कि मैं भक्ति मार्ग से दूर ना चले जाऊं महाराज जी मेरा मार्गदर्शन करें कि मैं कैसे स्थिर रहू सबसे पहली बात है कि पूरी लंका में एकमात्र महा भागवत भी विषण जी रहते थे और रावण भी नहीं जान पाया उनके दरबार में जाते थे पूरा घर परिवार ऐसे मिलमिला के रहते थे लेकिन विभीषण जी बिल्कुल अलग थे सबसे लंका निश्चल निकर निवासा और यहां कहां सज्जन करवा सा तो अगर हम यह सोचे कि हमारे मित्र सब भगवत विमुख है संसार है और मुझे भक्ति से गिरा ना दे तो पहली बात तो मुझे ये संशय ही नहीं करना चाहिए क्योंकि मैं भगवान के आश्रित हूं जब लंका में रहकर विभीषण जी भक्ति कर सकते हैं तो हम भी भगवान के अंश अमेरिका या कहीं भी रहे भगवान की भक्ति बहुत अच्छे से हो सकती है जब हमारा निर्णय कमजोर होगा तो हम भारत में रहे वृंदावन में रहे तो भी भ्रष्ट हो

जाएंगे क्या वृंदावन में नहीं भ्रष्ट हो जाएंगे हमारा निर्णय कमजोर है तो हम कहीं भी गिर सकते हैं अगर हमारा निर्णय कमजोर नहीं है पक्का है तो कोई भी हमें नहीं गिरा सकता जो रहीम उत्तम प्रकृति का कर सकत कुसंग चंदन विश् व्यापत लपटे रहत भुजंग चाहे जितना कुसंग मिल जाए कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हम अपने पर इतनी निष्ठा दृढ़ होनी चाहिए पहली बात बच्चा यह है चाहे बच्चा हो चाहे बच्चे हमारी हाथ जोड़कर प्रार्थना है कि आजकल य जो गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड रूपी विष चला है इससे अगर पहले अपने आप को परिपक्व रूप से बचा ले तो आगे का मार्ग बहुत प्रशस्त हो जाएगा हम दोस्ती का विरोध नहीं करते दोस्ती करो बच्चा बच्ची से दोस्ती करे बच्ची बच्चा से दोस्ती करे जैसे मित्रवत खेल हंसना बैठना उठना चरित्र ता नहीं तुम्हारा अगर दोस्त बढ़िया बन जाए तो अपने माता-पिता से सलाह लेकर के उसे आजीवन का साथी बना लो आजकल छोटे-छोटे बच्चे चरित्र तो अगर चरित्र हीनता है तो फिर भक्ति का फिर व निष्ठा वाली बात नहीं रहेगी कहीं भी चले जाओ आप अपने

चरित्र को बचा लो बस पहले य कहा जाता था कि जिसका धन गया तो कुछ नहीं गया और जिसका मतलब स्वास्थ गया तो कुछ गया और जिसका चरित्र गया तो सब कुछ चला गया मनी इ लॉस नथिंग लॉस और हेल्थ लॉस्ट समथिंग लॉस और करैक्टर इज लॉस्ट एवरीथिंग लॉस्ट सब कुछ नष्ट हो गया और आज है उल्टा चलता है ले और जबकि विज्ञ जनों ने कहा धन का नाश कोई नाश नहीं माना जाता स्वास्थ्य का नाश थोड़ा नाश माना जाता है लेकिन यदि चरित्र का नाश हो गया तो सब कुछ नाश हो गया कुछ नहीं बचा तो हमें लगता है जो आज समाज में हमारे फैल रहा है वायरस गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड लिविन रिलेशन वाला ये बहुत हानिकारक है इससे हमारे पवित्रता हमारे विचार हमारी धार्मिकता हमारी निष्ठा सब नष्ट हो रही है माता-पिता रोते रह जाते हैं बच्चे बच्चियां एक भी उनकी बात ना मानकर मनमानी आचरण कर लेते हैं अब वो रो के क्या करें ये आज की पढ़ाई लिखाई है तो हमें यही प्रार्थना बच्चा कि आप तो भक्त हो तभी तो आप यहां आकर प्रश्न कर रहे हो तो आपको ये चाहिए पहला सबसे कि हम अपने चरित्र की रक्षा

करेंगे दूसरा भगवान का स्मरण तीसरा सत्संग सुनते रहेंगे तो बुद्धि शुद्ध बनी रहेगी फिर तुम्हें कोई नहीं गिरा पाएगा आप पक्के रहो तो आपको कोई नहीं गिरा लेगा और आप पक्के नहीं हो तो कोई किसी की जरूरत नहीं अपने आप से अपने आप में आप भ्रष्ट हो सकते हैं नष्ट हो सकते हैं इसलिए हमें अपना पक्का इरादा पक्का भगवान का भरोसा नाम जप सत्संग सुनना तो हमें फिर कोई परेशानी नहीं रहेगी कोई नहीं गिरा पाएगा किसका प्रश्न हां बच्चा आप पवित्र रहिएगा चरित्र पर जरूर ध्यान दीजिए

आजकल चरित्र को कुछ समझा नहीं जा रहा यही बहुत आगे चलकर के नासका बन जाता है जब चरित्र हीनता होती ना तो बच्चों को ब्लैकमेल किया जाता है बच्चे कमजोरी के कारण क्योंकि उनका आत्मबल कमजोर हो चुका ना वो फिर निर्णय सही नहीं ले पाते वो अपने जीवन तक को खत्म करने की बातें सोचने लगते हैं इसलिए कभी इस मार्ग में गलत पैर ना रखें और मा माता-पिता जैसा मित्र कोई है नहीं हम आपको बता दें अपने माता-पिता को अपनी बातें शेयर करना चाहिए और माता-पिता को बच्चों को इतना भयभीत

नहीं कर देना चाहिए कि वो आपसे बात ना कर सके तो इसलिए कभी कोई ऐसी गलती ना करें और कभी अगर गलती हो जाए तो अपने माता-पिता से गुरुजनों से शेयर कर दे तो वह बचाने के पक्ष में सारी कोशिश करके हमको बचा ही लेंगे पक्का क्योंकि वह पूरा जीवन जिए हैं तो उनको हर रास्ता पता है कि यहां से कैसे निकला जा सकता है जशवंत चौधरी जी राजस्थान से राधे राधे महाराज जी महाराज जी हमारे मन में भगवान जी के विराजमान होते हुए भी हमारे मन में कई बार गलत विचार गलत आचरण किसी के प्रति क्रोध घृणा के भाव क्यों आ जाते हैं बच्चा इसके दो रूप है एक है सत मन और एक है असत मन जैसे एक होती बुद्धि सुबुद्धि और एक होती कुबुद्धि बुद्धि में ही दो पार्ट है सुमति कुमति सबके उर राहे नाथ पुराण निगम अस काहे जैसे विभीषण जी वर्णन कर रावण से सुमति और कुमति दो होती है ऐसे सुमन और कुम होता है एक कुमार्ग गामी मन होता है एक सुमार्ग गामी मन होता है वही मन तुम्हें बुरा महसूस करेगा देखो जैसे तुमने पाच मिनट नाम जपने का नियम लिया अब उस पाच मिनट में

आपसे कोई बात करने आवे तो आपके मन को बुरा लगेगा कि मेरे पा मिनट के भजन में हमसे बात करने क्यों आ रहा है तो मन का एक अच्छा पार्ट है और एक बुरा पार्ट है जैसे बुद्धि में एक सुबुद्धि है एक कुबुद्धि है तो अच्छे पार्ट में भगवत भाव सच्चाई की बातें भरी हुई जितना तुमने अनंत जन्मों में किया है और बुरे पार्ट में बुराई की है ऐसा कोई नहीं है जिसमें अच्छाई ना हो और ऐसा कोई नहीं है जिसमें बुराई ना हो क्योंकि शुद्ध स्वर्ण का आभूषण नहीं बनता उसमें मिलावट होती है ये मानव शरीर बना ही मिलावट से है पाप और पुण्य से अब हमको इसको शुद्ध करना है जैसे कसौटी में कस के सोना शुद्ध किया जाता है ऐसे तपस्या और भजन से हमें अपने मन को शुद्ध करना है उसके उस गंदे विभाग को हमें पवित्र करना सबका मन कितना भी गंदा आदमी हो कितना भी गंदा हो उसमें थोड़ा सा अंश पवित्रता का जरूर होगा बहुत कतली है बहुत चोरी करता है लेकिन उसका एक पार्ट पवित्र होता है अब अधिकतम या न्यूनतम ये इसमें देखा जाता है कोई अधिक पाप वाला स्वभाव वाला होता है कोई

अधिक पुण्य वाला होता है लेकिन ये दोनों पार्ट होते हैं तो देखो कभी-कभी मन अच्छी सलाह देता है जैसे आपको वृंदावन लाया साधु संग करवा रहा है ये मन ही तो करवा रहा है करवा रहा है नहीं मानते हो ना अगर मन ना कहता तो तुम नहीं आ सकते थे जबरदस्ती नहीं आए हो मन राजी हुआ तब तुम आए हो अब वोह गलत मार्गों में जो ले जा रहा है यह गेम रचा है भगवान ने दो विभाग करके ग एक सत एक असत असत के आकर्षण से बच जाओ सत में स्थित हो जाओ तो भगवान के पार्षद और असत में स्थित हो गए तो

फिर पुनरपि जनन पुनरपि मरणम पुनरपि जननी जठरे सनम अब कहते खेल क्यों रचा है तो फोन करके भगवान से पूछ लेना क्यों रचा है क्योंकि वह स्वयं से स्वयं की रचना की किसी दूसरे की नहीं वो आप भी वही हो अब भूल गए अपने आप को शरीर राग के कारण तो आपको लगता है कि परमात्मा कान समम कैसे हो सकता हूं मैं परमात्मा स्वरूप कैसे तू परमात्मा स्वरूप ही है अंश नहीं सीधे परमात्मा स्वरूपी है इस शरीरों के राग में अपने को भूल गया है इसलिए जो मन में असत भाव है उनको निकालने के लिए बच्चा मानव देह मिला है अब मन कह रहा है कि गंदी बात करना है आप निश्चय कर लिए नहीं करना है आप जीत गए वही भगवान बैठे इंद्रिया मनशास्त्र में पर वो जिस भाग में बैठे हैं वो सत्य और पवित्र और सच्चिदानंद है अब असत्य भाव को छोड़ो श्री कृष्ण अनुकूल लेन प्रतिकूल स्य वर्जन प्रतिकूल आचरण का त्याग करो पूरा मन भगवान बन जाएगा पर करनाय तुम्हें पड़ेगा यह गेम है यह खेल है यह तुम्हें करना पड़ेगा गंदी बातों का त्याग करने के लिए तुमको तत्पर होना पड़ेगा जैसे अभी पीछे

वाले ने कहा कि हमें माया पकड़े तो हमें बताओ कौन सी माया पकड़े क्या पकड़े आप पकड़े हो आपको माया नहीं पकड़े आप पकड़े हो रुपया से आप प्रेम करते हो स्त्री से आप प्रेम करते हो शरीर से आप प्रेम करते हो नाना प्रकार की वासना व्यसन आप करते हो आपको जबरदस्ती किसने पकड़ा है आपने सबको पकड़ रखा है आप छोड़ दो काम आया है कौन पकड़े हुए आप ही शरीर राग से आप ही नाना प्रकार के आ चरणों से फसे हो तो समझ पा रहे हो बच्चा ये खेल है इस खेल में आपको जीतना है नाम जप करते हुए सत्संग सुनते हुए हमें गंदे आचरण वाला जो पार्ट है मन को उसको शुद्ध करना अगर उसको शुद्ध कर लिए तो इंद्रिया नाम मनस्सम मन भगवान श्री कृष्ण वही तुम्हें अनुभव हो जाएगा और आप परम पद के अधिकारी हो जाओगे भगवत पार्षद बन जाओगे अब जैसे योग्यता के बिना कोई पद मिलता है क्या आप विचार अयोग्य आदमी पद में बैठ भी जाए तो व टिक नहीं पाएगा तो ऐसे ही भगवान का जो परम पद है वह परमेष्ठी ब्रह्मा के भी पद से श्रेष्ठ है जैसे अपने भारत में राष्ट्रपति पद है तो इससे

श्रेष्ठ जो है देवलोक के पद है लोकपाल वरुण लोकपाल अग्निदेव लोकपाल वायु देव इनसे भी बड़ा पद इंद्र का है देवराज इद्र फ इनसे भी बड़ा पद जो है ग धर्मों को और प्रजापति हों का फिर इसके बाद सबसे बड़े प्रजापति पर्मेट पद ब्रह्मा जी और उससे भी बड़ा पद है भगवान का पर्षद पद भगवान का दासत पद तोब काम विजय क्रोध विदेय लोभ विजय मोह मद इनसे विजय प्राप्त किया हुआ सब में भगवान की भावना वो भगवत स्वरूप माना जाता है तो अब उसी मन में भगवान है उसी में भगवान है परव प्रक्रिया के द्वारा मन की असत वासनाओं को हटाकर भगवान को प्रकट करना होगा यही साधना है जैसे दूध में घी है पर दूध में पूड़ी निकाल के दिखाओ दूध में पूरी डाल के नहीं निकलेगी प्रक्रिया है दूध गर्म करो उसको दही जमाओ फिर उसका मंथन करो फिर मक्खन निकालो फिर उसका दही वो निकलेगा घी ऐसे मेहंदी में लालिमा है जोर की और पूरे पेड़ को पूरे पत्ते को चीर के देख लो कहीं लाली नहीं दिखाई देगी प्रक्रिया है बांटो उसको बांट के कुछ क्षण हाथ में लगाए रखो फिर बो देखो लाल हो

जाएगा ऐसे परमात्मा तुम्हारे मन में है पर उसकी प्रक्रिया है साधना करो असत वासनाओं को हटाओ व प्रकाशित हो जाएगा समझ पा रहे हो बच्चा ये गेम है अब कह दे कि भगवान ने ऐसा रचा क्यों तो भाई फिर इसका उत्तर भगवान से ले के क्यों रचा अब हम भगवान की बात अगर तुम्हें बताएंगे तो तुम्हारी समझ में नहीं आएगी भगवान ने अपने आप से अपने आप को रचा है किसी और को ले वो अपने आप से अपने आप को रचा है अपने आप से अपने आप का पालन करता है अपने आप से अपने आप का संघार कर लेता है अब

इतना ज्ञान कहा है कि यह बात तुम समझ पाओ क् वो तुम भी वही हो तत्वम आश वेद का महावाक्य है तत् माने वो त्वम माने वह तुम आश माने हो तुम भी वही हो पर भूल गए अपने को हम शरीर मानने लगे अपने को मन मानने लगे अपने को अंतःकरण मानने अब थोड़ा भजन करो तब आगे समझ में आएगा नाम जप करो सत्संग सुनते रहो गलत आचरण से बचो मेरी बात मान कोई नशा तो नहीं करते पक्का कुछ अगर नशा करोगे तो सब बकवास हो जाएगा मान लो कोई भी गंदे आचरण करोगे खानपान गलत करो यह सब बकवास हो जाएगा परमार्थ नहीं रहता बकवास तो बहुत होता है शुद्ध आचरण और सही ढंग से भजन तो बहुत जल्दी लाभ प्राप्त हो जाता है बहुत जल्दी ज्यादा समय नष्ट नहीं होता ज्यादा समय नष्ट ऐसे होता है कि हम थोड़ा भजन करते जैसे हम चुल्लू चुल्लू भर मटकी में पानी डालते जाए और चार पांच साइड से छ हो जाए कभी नहीं भरेगी ऐसे पचास वर्ष साधना करते हो जाते लाभ नहीं मिलता क्योंकि अगल बगल छेद रहते हैं वो सब निकलता छेद बंद कर दो और एक एक बूंद डालने लगो तो भर जाएगा एक दिन घड़ा तो छेद बंद

करना य असत आचरण पापा चरण को रोकना है ठीक है राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा धा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा राधा

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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