जानिये परस्त्री गामी,शराब-चोरी,सब तरह का नीच, पापी केवल इस एक बात से कैसे भगवद् प्राप्त हो गया ?
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
पूर्व काल में तुंग भद्रा नदी के तट पर एक अनुपम नगर बसा हुआ था उसमें सभी वर्णों के लोग अपने अपने धर्म आचरण करते सत्य में तत्पर रहते थे उस नगर में समस्त वेदों का ज्ञाता सौत स्मार्थ कर्मों में निपुण एक ब्राह्मण रहते थे जिनका नाम था आत्मदेव तेज तो ऐसा था मानो दूसरे सूर्य भगवान ही हो ब्राह्मण तेजस्वी वैद ज्ञ सत्कर्म अनुष्ठान करने वाला और कभी उसके दरवाजे से कोई भिक्षुक वापस नहीं लौटा इतना उदार हृदय वाला देगा ही कुछ ना कुछ पर पूर्व प्रारब्ध के अनुसार उनकी जो पत्नी थी उनका नाम था धुंधली पति का नाम आत्मदेव और पत्नी का नाम धुंधली था सुंदरी थी कुलीन थी पर लड़ाकू स्वभाव था अपनी बात पर अड़ जाना अब वोह बड़े ज्ञानी थे वदज वेद के ज्ञाता इसलिए वह शांत रहते थे लड़ाई घर में नहीं होती वह लड़ने वाली ही बात करती थी पर वह शांत रहते थे जब घर में नहीं होती तो पड़ोसी से जाकर भिड़ना जरा जरा से कारण में क्रूर स्वभाव वकवादी स्वभाव ग्रह कार्य में निपुण लेकिन कंजूस और झगड़ालू प्रारब्ध है भोग विलास की कमी नहीं थी खूब
संपत्ति थी घर बढ़िया सुंदर परंतु सुख नहीं था क्योंकि जब आत्मदेव घर में आते तो बस उपद्रव लड़ाई झगड़ा सब बड़ा नरक समझो जिसकी घर में अशांति हो झगड़ा होता बड़ा नरक है चैन से नमक रोटी खाए प्यार से जीए तो गृहस्ती धन्य और खूब बढ़िया सब व्यवस्थाएं हैं पर कल अशांति मन नहीं मिल रहा एक दूसरे ये बहुत धीरे-धीरे अवस्था डल गई कोई संतान नहीं हुई बड़े-बड़े पुण्य कर्म किए खूब दान पुण्य किया लेकिन संतान नहीं हुई अब वो ब्राह्मण बड़े चिंता तुर हुए आत्मदेव की जिसके संतान ना हो तो फिर उसको पिंड दान कौन करेगा गृहस्थी में विचार होता कुल परंपरागत चलाने वाला तो कोई होना चाहिए अ बड़े चिंता तुर हुए हर उपाय करके हार गए थे तो एक दिन उनके मन में आया कि एकांत जंगल में चलते हैं और अपने प्राणों को त्याग देते हैं क्योंकि घर में जाओ तो कले है ना कोई संतान है अब क्या सब कुछ करके देख लिया बुढ़ा आ रहा है पुत्र तो हुआ नहीं तो कम से कम पुत्र होता तो कुल परंपरा चलाने अब क्या वह ऐसी भावना में थे कि जीवन व्यर्थ है जंगल को चल दिए
उधर एक सरोवर में प्यास बुझाने के लिए एक महान संत आ रहे थे जब कोई धर्मात्मा पुरुष दुखी होता है तो भगवान अव्यक्त रूप से संतों से मिला देते हैं व सन्यासी महात्मा थे ब्राह्मण देखा कि वो जब जल पी चुके तो जाकर साष्टांग दंडवत किया शास्त्रों का ज्ञान था हाथ जोड़कर खड़े हो गए तो कथम रोदसी वि प्रतम काते चिंता बलिसी वदम सवत सत्म महम स्वस दुख कारण ये लंबी लंबी सास खीच रहे हो उदास खड़े हो दुखी दिखाई दे रहे हो देखने से तो लगता है कि तुम ब्राह्मण हो क्योंकि तेजस्वी हो क्या चिंता है तुम्हारी जो तुम जल्दी जल्दी स्वास खींच रहे हो लंबी और दुख प्रकट कर रहे हो ब्राह्मण ने कहा महाराज आखिरी उपाय आप है वैसे तो मैं बताऊं अपने जीवन से निराश हो चुका हूं आपको देखा तो आशा बन गई पूर्व जन्म का कौन सा प्रारब्ध मुझे पता नहीं पर संतान योग नहीं अब मेरे पितर गरम गरम आंसू चिंता जनित छोड़ रहे हैं क्योंकि पिंड दान करने वाला हमारे कुल में कोई नहीं रहा संताने नहीं उत्पन्न हुई बहुत दुखी हो गया हूं सही बताओ मैं आम प्राण
त्यागने आया हूं जंगल में मेरा मन मुझे धिक्कार होता है कि तुम्हारा सब कुछ बेकार जब संतान नहीं और यहां तक कि मैं जिस गाय को पालता हूं वो भी बछड़ा देती वो भी बाज हो जाती है यहां तक कि जो पेड़ लगाता हूं उसमें भी फूल फल नहीं आते कितना मैं दुर्भाग्य बड़ा भागा हूं अब मैं अपने प्राण त्यागने आया हूं फूट फूट करर रोने लगे संत का हृदय बड़ा करुणामय होता है संत चाहे तो नवीन प्रारब्ध तत्काल रख सकते हैं क्योंकि भगवान के भजन में अपार सामर्थ्य है उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा कहा आत्मदेव ब्राह्मण पुत्र का मोह तो छोड़ दे आप विवेक का आश्रय लो भजन करो मैं तुम्हारी रेखा को देख रहा हूं एक जन्म नहीं सात जन्म तक कोई संतान है ही नहीं देखो संतान के पीछे मत पड़ो राजा सगर महाराज अंग बड़े-बड़े संतान में बहुत दुख भोगे हैं अब तुम भजन करो जंगल में निकल आए भजन करो संतान की आशा छोड़ो ब्राह्मण ने कहा कि मुझे उपदेश नहीं यह उपदेश नहीं सब पढ़ा हूं मुझे पुत्र चाहिए पुत्र देव नहीं मैं आपके सामने अभी प्राण त्याग हूं मुझे
पुत्र चाहिए ब्राह्मण का ऐसा आग्रह देख कर के सन्यासी जी ने कहा कि देखो विधाता के लेख को कोई मिटा नहीं सकता चित्र केतु का चरित्र पढ़ के देख लेना दवी जिसके उद्योग को कुचल देता है वह सफल नहीं होता तुम्हें पुत्र सुख नहीं है उन्होंने कहा फिर हम कह रहे बस अब पुत्र का आशीर्वाद देही देले तो प्राण त्याग देंगे आपके सामने सन्यासी जी ने देखा है तुम मानने वाले नहीं उन्होंने योग बल से एक फल प्रकट किया तपो बल से और कहा लो योग तो नहीं तुम्हारे पुत्र का पर मैं फल देता हूं अपनी पत्नी को खिला देना इससे बड़ा ज्ञानी महात्मा पुत्र पैदा होगा तुम्हारी स्त्री एक साल तक सत्य सोच दया दान ब्रह्मचर्य का पालन करें एक टाइम अन्न खाए तो और यह फल पाने के बाद एक वर्ष के बाद ऐसा महापुरुष प्रकट होगा जो तुम्हारा कल्याण भी कर देगा तुम्हारे पितरों का भी उद्धार कर देगा वो योगीराज सन्यासी फल दिए अब तो आत्मदेव बड़े प्रसन्न हुए क्योंकि कामना पूर्ण हो गई फल लेकर आए धुली उनकी पत्नी थी जो लड़ाकू स्वभाव की बड़ा क्रूर स्वभाव दुष्ट
स्वभाव वैसे ही क्रूर स्वभाव था आके कहा हो भाग्य एक सन्यासी मिले फल दिए और उन्होंने नियम बताया है कि एक साल तक सत्य बोलोगी पवित्र रहोगी दूसरों को दान करोगी एक समय तुम अन्न खाओगी और बहुत शुद्ध स्वभाव वाला महात्मा बालक पैदा होगा यह फल खा लो तो उन्होंने कहा कि फल तुरंत थोड़ी खाया जाता ना हो के बड़े पवित्रता से खाया जाता लाओ और जाओ आप निश्चिंत रहो बोले अगर हमारे सामने तुम्हे विश्वास नहीं डरते भी थे घर के बाहर हो गए अब वो कुटिल स्वभाव की थी क्रूर स्वभाव की उन्होंने अपनी बहन को बुलाया और रो रो के कहने लगी कि बहन मुझे बड़ी चिंता हो गई समस्या आ गई क्या बोले पंडित जी जो य फल लाए हैं फल से गर्भ रह जाएगा पहले तो नियम बता गए हैं कि एक साल तक झूठ नहीं बोलना पवित्र रहना है और दूसरों को दान देना है एक समय अन्न खाना है अब हम तो बड़ी भयभीत है कि जब पेट में गर्भ बढ़ेगा तो भोजन कम हो जाएगा पेट बढ़ेगा तो भोजन कम हो जाएगा यह तो मैंने कर नहीं सकती क्योंकि तीन बार तो हमको अच्छा भोजन चाहिए पंडित जी ने कहा
एक बार खाना यह तो हो नहीं सकता अच्छा गर्भ बढ़ा पेट बढ़ा खाया पिया जाएगा नहीं बहुत परेशानी उसमें लगेगी और कहीं दवव से अगर डाकू आ गए तो भाग भी नहीं पाऊंगी चलो डाकू ना आए कहीं आग लग गई घर में तब तो हम जल के मरही जाएंगे क्योंकि गर्भ पेट में यह तो हमसे नहीं और फिर गर्भ निकलते समय सुना बहुत कष्ट होता है यह सब हमसे नहीं होने वाला देखो य क्रूर स्वभाव की नकारात्मक सोच और कहीं प्रसव काल में गर्भ टेढ़ा हो गया तो हम तो मरही जाएंगे यह तो हमसे नहीं होगा अगर गर्भ हमारा बड़ा होने लगा और घर में ननंद आ गई सब माल मता समेट की रहेगी हम तो कुछ लड़ ही नहीं पाएंगे क्योंकि लड़ने लायक नहीं रहेंगी यह सब विचार करके उका यह सब हमसे नहीं होने वाला उनकी बहन ने कहा सोच क्यों करती हो ठीक इसी समय हमें अनुभव हुआ है दो चार दिन में इसी महीने में कि हमारे पेट में है तुम हमारे पति को धन दे देना और गर्भवती का नाटक करो जब हमारे बच्चा होगा हम तुम्हारे यहां पहुंचा देंगे हम अपने आ सोर गोल कर देंगे बच्चा मर गया कौन देखने आता है और
पति को पैसा दे देना हा यह तो बढ़िया बात रही बढ़िया विधान बन गया जैसे को तैसे मिले तो बढ़िया विधान बन गया तू गर्भवती का नाटक कर आज से कि फल पा लिया और मैं गर्भवती हो गई मैं अपने बालक को मरा घोषित कर दूंगी और यह जो फल लाए हैं इसकी परीक्षा के लिए जो गौ है उसको पवा दो जैसा उनकी बहन ने कहा था वैसे धुंधली ने सब कर दिया देख लो कहा था स्वामी जी ने तुम्हारे सात जन्म बालक नहीं तो देखो बुद्धि कैसी खराब हुई गाय को पवा अब जब उसकी बहन के पुत्र हुआ तब तक व कपड़ा पड़ा पेट में लगाकर नाटक करती रही होगी कि हमारे गर्भ है फिर एकदम घोषणा कर दी जब वो पुत्र रातो रात पहुंच गया कि हमारे संतान हो गई उसके पिता को अच्छा धन दे दिया वह धुंधली को लाकर के बहन का बेटा दे आत्मदेव तो बहुत आनंद हो गए जानी न जाए नारी गति भाई उनको क्या पता कि घर में क्या रहस्य हुआ वो तो बहुत सुखी हो गए कि संत भगवान के द्वारा दिए हुए फल से हमारे पुत्र हो गया बड़ा आनंद बड़ा उत्सव मनाया बालक के जात कर्म संस्कार कराए खूब दान पुण्य किया
मांगलिक कृत किए धुंधली ने अपने पति से कहा पता नहीं क्या कारण मेरे वक्षा स्थल में दूध तो है नहीं और अभी नया बालक बिना मां के दूध के जीवित नहीं रहेगा तो हमारी बहन के बालक हुआ था पधार गया है उसको बुला ले क्या अरे उन्होंने कहा बिल्कुल लाओ हम और पैसे देंगे स्वागत करेंगे हमारा बच्चा पुष्ट होना चाहिए बहुत बुद्धि लगाते क्रूर स्वभाव के लोग कैसा एकदम फिट कर लिया विधान अब उसको बुला लिया बालक का पालन पोषण करने के लिए पैसे के व असली मां तो वही है ही है पुत्र की रक्षा के लिए जो जो कहा आत्मदेव ने व सब स्वीकार कर लिया तीन महीने इस बालक के तीत होने के बाद उन्होंने कहा था एक साल बाद होगा तीन महीने व्यतीत होने के बाद गौ के बच्चा हुआ मनुष्य का केवल कान गौ के पूरा मनुष्य का सर्वांग सुंदर दिव्य तेजों में स्वर्ण की सी कांति क्योंकि वह योगी के तप का ब्राह्मण देवता नाच पड़े कि भगवान जब दिए तो कितना आनंद घर में भी बच्चा गौ के भी बच्चा ही हुआ खूब संस्कार करके मंगलदा बड़े प्रसन्न है सब लोग कहते आत्मदेव का देखो कैसा
भाग्य बदला कि घर में भी पुत्र हुआ गौ के भी पुत्र हुआ बछड़ा नहीं केवल कान भर कैसे आश्चर्य की बात दिव्य बालक उत्पन्न हुआ पर इस गुप्त रस्य का किसी को पता नहीं आत्मदेव ने देखा कि बालक पूरा मनुष्य आकार केवल कान गाय के तो नाम रखा गोकर्ण और धुंधली ने किसी शास्त्री पद्धति से नहीं अपनी पद्धति से हमारा नाम धुंधली तो हमारे लड़के का नाम होगा धुंधकारी उसका नाम रखा धुंधकारी कुछ काल व्यतीत हुआ दोनों जवान होने लगे गोकर्ण में पूर्ण वैदिक सिद्धांत धर्म पूर्वक बड़े
ज्ञानी महात्मा और धुंधकारी पूर्ण दुष्ट सौचा चार का तो नाम भी नहीं था पवित्रता का धुंधकारी में खानपान पशुओं वाला क्रोध नाक में चढ़ा गंदी वस्तुओं से प्यार करने वाला बहुत ही गंदा स्वभाव चोरी बचपन से द्वेष पीट देना लड़ाई करना यह उसका चलते स्वभाव दूसरों खेती में आग लगा देना घरों में आग लगा देना गौशाला में आग लगा देना जैसे किसी का बालक खेल रहा है आसपास देखा कोई उठाया कुए में फेंक दिया बड़ा दुष्ट स्वभाव और बड़ा हुआ हिंसक स्वभाव अस्त शस्त्र धारण करके जैसे कोई अंधा जा रहा है तो आओ बाबा तुम्हें रास्ता बता दे कुए में जाकर ढकेल देता है बहुत ही गंदा स्वभाव दुष्ट स्वभाव अब वो शिकार करने लगा पशुओं का और मांस खाने लगा जहां आत्मदेव कितनी पवित्रता से वहां दुष्ट कितना अब धीरे-धीरे य विचार करने लगा वैश्या से संपर्क रखने लगा संपत्ति थी ही सारी संपत्ति वै श्याओ को एक दिन पिता ने कहा आत्मदेव ने की तुम्हारे आचरण इतने आसुरी प्रभाव के हमें लगता है कि तुम हमारा सर्वनाश करने के लिए प्रकट यह क्यों करते हो तो खूब
गिरा गिरा के मारा आत्मदेव को सन्यासी की बात या अब याद आई कि तुम्हारे भाग्य में पुत्र सुख नहीं है खूब मारा आत्मदेव को जब इतनी जोर से मार रहा था तो थोड़ी तो दयाई की पति है बचा ले तो धुंधली गई तो फिर धुंधली की धम जम के पिटाई की अब वो तो राक्षसी स्वभाव और घर के जितने जेवर बर्तन सब उठाकर बेच दिए वैश्या गामी हो अब जब सारी संपत्ति स्वाहा खाने को भी नहीं तो धुंधली बैठ के रोती रोना इससे तो अच्छा कि मैं बांझ रह जाती दुष्टता की ना पति ने जब तुम्हें एक दिव्य
फल दिया था खाना चाहिए था मैं कहां जाऊं कौन मेरा सहयोग करे बड़ी विपत्ति बड़ा दुख ना खाने को ना पीने को अतरे दिन पिटाई करता दुकारी आत्मदेव की भी और धुंधली की भी पिता बैठकर रो रहे थे मैं सन्यासी की बात मान जाता तो गोकर्ण जी आए और उन्होंने कहा पिताजी आप जैसे विद्वान पुरुष को ऐसा शोक करना उचित नहीं तुम शास्त्र के ज्ञाता हो तुम्हें चाहिए कि संसार की असार आता का तो थोड़ा विचार करना हो यह दुख रूपी मोह में फंसकर आप एक अज्ञानी पु की तरह रो रहे हो पीट रहे हो पिताजी क्या शास्त्रों में नहीं पढ़ा पुत्र किसका धन किसका पत्नी किसकी शरीर किसका यह मोह के कारण अज्ञानी जन रात दिन दीपक की तरह जल रहे पिताजी ना सुख इंद्र को है ना चक्रवर्ती राजा को है सुख है तो एकांत में भगवान का भजन करने वाले को है यह देखो गोकर्ण य मुंचा ज्ञानम प्रजा रूपम मोहतो र के गति ये नरक जाने वाली बात पुत्र के मोह में फस कर के आप छोड़ो इसे आपका शरीर नष्ट हो जाएगा इसलिए मेरी प्रार्थना मानो आज से निकलो घर से और वन में जाओ भगवान का चिंतन
करते हुए जीवन व्यतीत करो गोकर्ण जी के वचन सुनकर आत्मदेव वन में जाने के लिए तैयार हो गए उनका बेटा आज तक तो कभी वन में तपस्या भजन किया नहीं बड़ा शरीर से राग है क्या करूं कैसे भगवत प्राप्ति करूं तो देहे स्थि मानस धिरे मतिम तत्वम जाया सुता दि सु सदा ममता विमु च पस्या निसम जगद दम क्षण भंग निष्ठ वैराग्य राग रस को भव भक्ति निष्ठा धर्मम भज स्व सततम तज लोक धर्मा सेव स्व साधु पुरुष जहि काम तृष्णा अन्यस दोष गुण चिंतन मा सु मुक्त सेवा कथा रसम हो तरा पवम संत समागम कभी व्यर्थ नहीं होता देखो संत समागम का फल है गोकर्ण जी गोकर्ण जी ने कहा पिताजी जिस शरीर को को आप मैं मान रहे हो आप मैं नहीं हूं यह शरीर हड्डी मांस रुधिर का पिंड है इसे आप मैं मानना छोड़ दे आपकी स्त्री आपका पुत्र यह कभी आप मत माने यह आपके नहीं थे ना पहले और ना बाद में बीच में भास रहे कि आपके हैं यह संसार रात दिन नाश को प्राप्त हो रहा है क्षण भंगुर है किसी भी कोई वस्तु में ममता मत करो या कुछ स्थाई नहीं है सब नष्ट होने वाला है बस एक मात्र
वैराग्य रस के रसिक होकर भगवान की भक्ति में लग जाओ कैसे भक्ति करें धर्मम भज सततम सदैव धर्म का भजन करो कौन सा धर्म बोले तज लोक धर्मानगर का आश्रय लो भागवत धर्म का आश्रय कैसे प्राप्त होगा बोले सेव साधु पुरुष सदैव संत पुरुषों का संग करो उनकी सेवा करो उनके संग से उनके वचनों से उनकी कृपा से तुम्हारे हृदय में भागवत धर्म का परिचय जागृत हो जाएगा तुम महा भागवत हो जाओगे पर संतों का सेवन करने के लिए जो सबसे बड़ा दोष है काम और तृष्णा यह नहीं संतों के पास टिकने
देती इसलिए जही काम तृष्णा कामना और भोगे हुए भोगों को जो भोगने की इच्छा तृष्णा इनका त्याग करके संत संग करो और जब संत संग होने लगे तो सावधान हो जाओ अन्यस दोष गुण चिंतन मासु मुक्त दूसरे के गुण दोषों का चिंतन न करके श्री भगवान का चिंतन करें भगवान की सेवा करें भगवान की कथा लीला सुने तो उसको नित्य भगवत धाम की प्राप्ति हो जाती हे पिताजी शरीर से म पन छोड़ दीजिए और शरीर संबंधियों से मेरा पन छोड़ दीजिए और भागवत धर्म का आश्रय लेकर संत समागम कीजिए सदैव संतों
की सेवा भगवत सेवा नाम जप लीला कथा श्रवण गायन इसी से भगवत प्राप्ति हो जाएगी बस उसी समय गोकर्ण को मन से प्रणाम करके कि भगवान गुरु रूप से इसी रूप में आकर मुझे उपदेश दे रहे उसी समय आत्मदेव जी ने तो घर छोड़ दिया और वन की यात्रा की 60 वर्ष की आयु हो चुकी थी पर ज्ञान था शास्त्रों का बड़ी निष्ठा से अपनी बुद्धि को समेटा संसार से रात दिन भगवान के चिंतन में लगा दिया भगवान के चिंतन और भागवत के दशम स्कंध का रोज पाठ पूरा जो भागवत का दशम स्कंध श्री कृष्ण लीला चरित्र से भरा हुआ है पूरा प्र पाठ और निरंतर नाम जप इसके प्रभाव से श्री कृष्ण चंद की प्राप्ति हुई गोकर्ण जी के उपदेश से आत्मदेव की अब जब पिता बन को चले गए तो और छूट वैसे मानता तो था ही नहीं पर और छूट हो गई अब धुंधकारी ने उठाई लाठी डंडा जो धुंधली की डट के पिटाई की और कहा बता धन कहां है अब जितना धन था तो सब ले गया फिर जलती हुई लकड़ी लुका उससे बता धन कहां है किसी तरह छूट पाई तो भागते हुए जाकर कुएं में गिर कर अपने शरीर को नष्ट कर दिया कि रोज की पिटाई
से अच्छा एक बार दुर्गति को प्राप्त हुई धुंधली दुर्गति को प्राप्त हुई पति आत्मदेव श्री कृष्ण चंद्र को प्राप्त हुए योग निष्ठ गोकर्ण जी ने जब देखा कि धुंधकारी का आतंक बढ़ रहा है तो उन्होंने छोड़ दिया जो ज्ञानी पुरुष होते प्रपंच नहीं स्वीकार करते उनको कोई सुख दुख इससे नहीं उदासीन भाव से तीर्थ यात्रा को निकल गए धुंधकारी ने पांच वैश्या हों को अपने संग में रखा सब नौजवान वैस आए अब उनके लिए पशुओं का मांस चोरी करके उनकी मनोकामनाएं पूरी करना बुद्धि भ्रष्ट थी आचरण भ्रष्ट थे क्रूर कर्मा एक दिन उन वैश्या ने कहा कि हमको तो हार नहीं पहनाया आज तक कामना होती अब पांच को हार लाने के लिए तो बहुत रुपया चाहिए मौत की भी उसको कोई भय नहीं रह गई थी वह जिसको देखता काट कर के जो मिलता धन एकत्रित करके पांचों के लिए सुंदर आभूषण हार अब हिंसा में उतरा जो उसके लिए क्या स्त्रियों ने सोचा कि नित्य नवीन चोरी करता है आज हमने हार के लिए कहा तो पांचों के लिए व्यवस्था कर दिया पकड़ा जाए जब यह पकड़ा जाएगा तो राजा इसे फांसी देंगे
तो हमको भी पांचों को फांसी मिलेगी मरना तो है ही है ना इसे पांचों ने विचार किया मरना तो है ही राजा फांसी देगा तो हम ही फांसी दे देती तो कम से कम हम तो बच जाएंगे बुरे कर्म का बुरा ही परिणाम होता है कुछ भी कोई कर ले धुंधली कुए में शरीर त्याग करके दुर्गति को प्राप्त हुई ये जब जिन वैश्या के लिए प्राणों की बाजी लगा कर के सब कुछ ला रहा जानते हो उनका प्लान क्या बना कि यह चोरी करता है पकड़ा जाएगा पकड़ा जाएगा फांसी की सजा होगी मारा जाएगा और जब यह पकड़ा जाएगा तो हम भी पकड़ी जाएंगे तो फांसी की सजा इसको होगी तो वही हम दे देती है तो हम तो बच जाएंगी और सारा धन लेकर रात्रि में निकल लेंगी पांचों पांचों ने गुप्त रूप से ऐसा संकल्प बना लिया दुं कारी सो रहा था पांचों गए पांच हैं हाथ पैर चार ही तो है पैर दो और दो हाथ चार उसमें लग गए और एक जो है रस्सी से पूरा चारपाई पर बांध दिया और जब उसकी आख खुली तो रस्सी गले में डाल कर के फांसी लगा रही पड़े पड़े वो बहुत पापी आदमी जल्दी मरने वाला तो था नहीं खूब गला दबाया
अब बड़ी चिंता हुई वैश्या को कि अगर मरेगा नहीं तो हमें काट डाले गए तो रसोई से जो कोयला जला हुआ आग था उसके मुंह में भर बगार बगार के समसी से अरे पापी की बहुत दुर्गति होती दहकते हुए अंगारे उसके मुंह में और खूब कस के गला दबा छटपटा छटपटा कर पीट पीट के मार डाला ंद कारी को और उसके शरीर को व घर में ड बना के पांचों ने गाड़ दिया और वह सारा मालमत्ता पैसा सब कुछ उनको पता था स्त्री नाम नत विश्वासम दुष्टा नाम कारे बुधा विश्वा से य स्थि तो मूढ़ा स दुख परि भूते शास्त्र कहता है जो य विचार दुष्ट स्वभाव वाली जो केवल अर्थ पर दृष्टि रख कर के धर्म का त्याग करने वाली है स्त्री नाम नत विश्वासम दुष्टा नाम कारे बुधा ऐसे दुष्ट आचरण चाहे स्त्री चाहे पुरुष ऐसे दुष्ट आचरण वाले को कभी विश्वास में नहीं विश्वास पात्र नहीं बनाना चाहिए और दूसरी बात क रहे विश्वासे या स्थि तो मूढ़ा सा दुखा परि भूते जो विश्वास करेगा अंत में मारा जाएगा पर विश्वास पक्का हो जाएगा क्यों सुधाम अम बचो अमृतम वचन विश्वास हो जाए सुधा मयम बचो या साम
काम नाम रस वर्धनम हृदय में काम रस वर्धन हृदयम छुर धारा भाम प्रिय को नाम योशिता बहुत सावधान उन दुष्ट स्त्रियों ने बहुत तरह से मार मार कर के धुंधकारी मुंह में अंगारा गले में रस्सी मार डंडों से मार मार के मार डाला बहुत बुरी तरह मारा धुंधकारी को अब जब दिन में निकलना चाहा तो लोग आज धुंधकारी नहीं बोले प्रीतम किसी कार्य से बाहर गए और सर लगाकर पांचों मालमत्ता लेकर भाग गए बहुत सावधान संत वित्तम ताया ता कुलटा बहु भरति काहा धुंधकारी बभु वात महान प्रेत कुकर्म जो कई पुरुषों से सहवास करती हैं या कई स्त्रियों से जो सहवास करता है ऐसा अपवित्र हो जाता कि उसके छूने मात्र से पुण्य नष्ट हो जाते हैं फ तो उनके संग से ही रह रहा तो उसे वस्या उसे ही कहते उन श्याओ के संग से सारे सुकृत नष्ट हो चुके थे महान पाप का स्वरूप हो गया था और वह सब भाग चुकी थी तो धुंधकारी को भयंकर प्रेत योनि की प्राप्ति हुई प्रेत योनि भयंकर प्रेत अब व बवंडर रूप जो चक्रवात जैसे बवंडर देखते हो ना वह रूप धारण करके दसों दिशाओं में भटकता और
प्रेत को स्वयम से पानी पीने के लिए कोई सुविधा नहीं ऐसा नहीं नदी के किनारे रह रहा तो पानी पी लेगा वो किसी को पकड़ेगा तब उसके द्वारा जो उसको पानी पिलाया जाएगा वो उसको मिलेगा ऐसे पानी नहीं पी सकता ना कुछ खा सकता है ना कहीं विश्राम कर सकता है वह बस हा द हाद चिल्लाता हुआ रोता हुआ भटकता है प्रतियों बड़ी भयानक होती है जब तीर्थ यात्रा करके गोकर्ण जी लौटे तो सुना कि धुंधकारी का लापता मार डाला गया तब उन्होंने फिर गया गए और वहां पिंड दान किया धुंधकारी के लिए भी बड़े महात्मा थे गक श्राद्ध किया और काफी तीर्थों में मंत्रा अनुष्ठान किया किका कल्याण हो जाए यह सब करके लौट आए अपने पिता आत्मदेव के घर में रात्रि में कोई देख ना पावे इसलिए सीधे अपने घर में गए और शयन किया और वही गड़ा था धुंधकारी प्रेत आत्मा बन के वो मरा रहा था वही प्रेत आत्मा ऐसे को नहीं छूती जो भगवान का भजन करते देखो अब ज धुंधकारी ने देखा कि गोकर्ण आए हैं तो उसको तसल्ली हुई कि महात्मा हमारा कल्याण कर देगा व प्रकट हुआ भेड़ बना धुंधकारी पहले
भेड़ बना बड़ा और ऐसे गोकर्ण जी ने देखा कि दरवाजा तो बंद था भेड़ कहां से आ सकता है तुरंत भैसा बन गया तुरंत इंद्र रूप धारण कर लिया भयावन कहा ये विपरीत अवस्था इसका मतलब य प्रेत है क्योंकि ऐसी विपरीत निंदनीय धारण कर रहा है दुर्गति को प्राप्त हुआ प्रेत आत्मा है व डरने वाले तो थे नहीं ज्ञानी महात्मा थे गोकर्ण ने कहा कस्तो मुग तरो रात्र कुतो या तो द सामि माम किंवा प्रेता पिशाच संन कौन है तू प्रेत है पिशाच है राक्षस है क्या है यह क्या नाटक कर रहा है कभी भेड़ बनता कभी भैसा बनता है कभी इंद्र बनता है कभी यह रूप कौन है तू य अधोगति को प्राप्त कैसे हुआ तू गोकर्ण जी डरे नहीं अगर सच्चा महात्मा ना हो तब तो भयभीत हो जाए गोकर्ण जी सच्चे महात्मा है अब वो चिल्ला चिल्ला के केवल रो रहा है एक शब्द भी नहीं बो पा रहा तो गोकर्ण जी समझ गए अधिक पाप होने के कारण यह बोल नहीं सकता तब अंजलि में जल लिया और कई मंत्रों का जाप किया और फिर उसके ऊपर फेंका ज भी फेंका तब बोल पाया भैया मैं आपका भाई धुंधकारी हूं बचा लो मेरी भारी
दुर्गति हो गई मैं तुम्हारा भाई हूं मैं धुंधकारी हूं अब मुझे बहुत कष्ट हो रहा पश्चाताप हो रहा मैंने सब कुछ नष्ट कर दिया धर्म भ्रष्ट पापा आचारी अब मेरी बड़ी दुर्गति है उन कुलटा वैश्या ने मुझे तड़पा तड़पा करके मारा है मैं कुछ कर नहीं सकता इस समय ऐसा थोड़ी कि प्रेत है जिसको चाहे पटक दे ऐसा नहीं है ऐसा विधान नहीं पहले वैस को मारता जाके मैं कुछ कर नहीं सकता प्रेत योन में पड़कर दुर्दशा भोग रहा हूं अब दय वस केवल वायु से जीवित हूं बहुत प्यास भूखा पर नहीं खा सकता नहीं पी सकता आप दया समुद्र भैया मेरा उद्धार करो गोकर्ण ने कहा कि तुम्हारा उद्धार तो हो जाना चाहिए तुम्हारे लिए तो मैं गया में गया वहां श्राद्ध दिया तीर्थों में भी अनुष्ठान किया फिर तुम्हारा प्रेत उन से उद्धार कैसे नहीं हुआ तो कहा भैया एक दो बार गया श्राद्ध से मेरा कुछ नहीं होने वाला बहुत पापी हूं बहुत बड़े बड़े पाप किए हैं कोई दूसरा उपा छोटे मोटे पिंड दान से दान पुण्य से मेरा उद्धार होने वाला नहीं बहुत स्टक है हमारे पाप का तुमको हम बताए
सैकड़ों बार गया श्राद्ध करो तो भी मेरा कल्याण नहीं हो सकता ऐसा मैं पापी हूं कोई दूसरा उपाय सोचो गोकर्ण जी ने कहा सैकड़ों गया श्राद्ध से तुम्हारी मुक्ति नहीं हो सकती तो तुम्हारी मुक्ति असंभव है कहा भैया मैं तुम्हारे चरणों में पड़ा हूं मुझे मेरा उद्धार करो तो कहा ठीक है तु भी इस घर से निकलो कहीं और रहो हम जब तुम्हें बुलाए तब आ जाना जाओ हटाओ हमारे इस घर से हटो हटा दिया उनको गोकर्ण जी की आज्ञा पाकर धुंधकारी बाहर भटक रहा है रात भर विचार किया कि इसका कल्याण कैसे होगा जब सैकड़ों गया श्राद्ध से कह रहा उद्धार नहीं होगा अब जब प्रात काल हुआ दरवाजा खुला तो बहुत से विज्ञ जन आकर के गोकर्ण जी से मिले गोकर्ण ने सबसे सलाह की कि क्या हो सकता है ऐसे ऐसे स्त्रियों ने उनको मारा और प्रेत योनी को प्राप्त हुए जो लोग विद्वान थे योग निष्ट थे वेदज थे उन्होंने कई शास्त्र पाठ आदि की बातें बताई सबने पर सही उत्तर नहीं मिला गोकर्ण जी महान तपस्वी थे गोक जी ने प्रात काल स्नान अर् दे रहे थे बोले औरों से क्या पूछना सीधे
सूर्य भगवान से पूछे मंत्र का उच्चारण करते हुए सूर्य भगवान को स्थगित कर दिया रोक दिया बहुत बड़ी मंत्रों में तथा सर्व सूर्य वाक्यम तन मुक्तो स्थापित परम गोकरणा स्तंभन चक्रे सूर्य वेगस वत सूर्य की गति को रोक दिया और तोम नमो जगत साक्ष बहि में मुक्ति हेतु कम अब किससे पूछे आप ही बताओ हे जगत साक्षी भगवान सूर्य धुंधकारी का उद्धार कैसे हो सकता है आप कृपा करके बताइए कि धुंधकारी की मुक्ति कैसे हो सकती गोकर्ण की प्रार्थना सुनकर भगवान सूर्यदेव ने कहा श्रीमद् भागवत महापुराण नियम पूर्वक सुनाओ निश्चित उसकी मुक्ति हो जाएगी सप्ताह परायण सात दिन में पूरी भागवत श्लोक सहित सूर्य भगवान की आज्ञा सबने सुनी गोकर्ण जी ने भी सुनी बहुत सरल उपाय गोकर्ण जी ने निश्चय किया मैं स्वयं सुनाऊंगा और उसका उद्धार करूंगा अब तो कथा का समय निश्चित किया बहुत से लोग कथा सुनने के लिए वहां पहुंचे जब सुना कि भगवान की कथा सब पापों का नाश कर देती है तो बहुत से लोग पापी पूण्य आत्मा जो भी सब सबको बैठने की उचित व्यवस्था की गई एक सात गांठ
का बांस जो सीधा था आवाहन किया धुंधकारी का और कहा इस पर बैठ जा तू भी कथा सुन तो सीधे सात गांठ के बास पर धुंधकारी जाकर के बैठ गया छिद्र में वायु रूप होकर क्योंकि बाहर कहीं स्थित नहीं रह सकता चलाए मान तो बैठना है गोकर्ण जी ने एक वैष्णव को मुख्य श्रोता बनाया और प्रथम स्कंध से स्पष्ट स्वर में कथा सुनाने प्रारंभ की श्लोक और अर्थ सायंकाल को विश्राम दिया तो एक बड़ी विचित्र बात हुई सभासदों के देखते देखते एक बांस में तड़ तड़ की आवाज हुई एक गाठ फट गई दूसरे दिन कथा हुई दूसरी गांठ तीसरे दिन तीसरी गाठ सात दिनों में सात गांठे फाड़ कर के दुकारी परम पवित्र दिव्य रूप भगवत पार्षद रूप धारण करके प्रकट हो गया धुंधकारी का श्याम वर्ण पीता धारण के तुलसी की माला सिर पर मनोहर मुकुट कानों में कमली कुंडल सामने आकर गोकर्ण को प्रणाम किया और कहा भाई अब मैं भगवत पार्षद बन गया प्रेत योने से मुक्त सात दिन में भयंकर पापा आत्मा धुंधकारी श्री भगवान की चर्चा सुनने के कारण भगवत स्वरूप हो गया ओहो कितना प्रेत पीड़ा में सह रहा था
एकमात्र श्री कृष्ण चंद जू की लीला कथा सुनने मात्र से मैं भगवत स्वरूप हो गया हूं भैया मैं कैसे आपका उपकार मैं निंदनीय निंदनीय वाला कैसा उज्जवल स्वरूप प्राप्त कर लिया भला मोह पूर्वक लालन पालन करने वाले शरीर को जो हष्ट पुष्ट करते हैं उन्होंने भगवान का नाम जप नहीं किया चर्चा नहीं सुनी तो जीवन किस काम का इसके पोषण के लिए पाप कर्म कर रहे हो और वृद्धावस्था आने वाली परिणाम में दुख रोगों का दुख भोगों की कामना का दुख क्या क्या दुख इसकी क्या गति होगी गाड़ दिया जाएगा या जला दिया जाएगा ऐसे मनुष्य शरीर को प्राप्त करके भगवत प्राप्ति नहीं की तो जीवन व्यर्थ चला गया अरे जो अन्न प्रात काल पकाया जाता है दूसरे देर सड़ जाता है उसी अन्न से इस शरीर का पोषण होता छ घंटे में मल बनाकर निकाल देता है ये शरीर कहीं अविनाशी है क्या नाशवान शरीर है जो लोग भगवान की कथा से वंचित है भगवान का नाम जप नहीं करते वो बुद बुदे जीवों में मच्छरों के समान जीवन उनका है जन्मे मरे किस काम के भला देखो जिस बास में मैं बैठा था तो बास की
गाठ फट गई क्या भगवान की कथा सुनने पर चित्त की गाठ नहीं नष्ट हो जाएगी जड़ चेतन की गृत इसलिए धन्य है वह जो भगवान की कथा सुनने में अपना समय व्यतीत करते हैं दंद कारी ऐसी बातें कह रहा था सबने देखा जयघोष करते हुए नमो नमः नमो नमः और एक दिव्य विमान आया भगवान वैकुंठ नाथ के पार्षद मंडला का तेजों में विमान और सबके देखते देखते कहा धुंधकारी और वह दिव्य पार्षद रूप विमान पर चढ़ा जब विमान पर चढ़कर जाने लगा तो गोकर्ण जी ने रोक दिया रुको यह क्या कथा तो शास्त्र लोगों ने सुनी तो आपको शास्त्रों विमान लाना चाहिए और सबको बैठल कर ले जाना चाहिए क्योंकि हमारे सुनाने में कोई भेद नहीं था और यह सुन भी सब ध्यान से रहे थे भगवत ने कहा आपके सुनाने में कोई भेद नहीं था पर सुनने में भेद हो गया है श्रवण भेद हो गया यह उपवास करके बिना कुछ खाए पिए रात दिन कथा का ही चिंतन करता रहा मनन करता रहा इसके कारण इनको भगवत पार्षद रूप मिलाओ जा रहे और यह कथा सुना भर है मनन नहीं किया मनन विषयों का हुआ इसलिए विमान पर नहीं यह निराहार रहकर
सात दिन दिन में चर्चा सुनता रात भर उसी का चिंतन करता उसके प्रभाव से परम पद का अधिकारी हुआ इसलिए जो मनन हीन है जिनको गुरु वचनों पर विश्वास नहीं है जो कथा में चित्त की एकाग्रता नहीं है वो फल भेद हो गया वो भगवान के दिव्य धाम में एक बार में नहीं जा सकते गोकर्ण जी आपको तो लेने के लिए स्वयं गोलोक बिहारी आएंगे यूं कह कर के विमान अंतरध्यान हो अर्थात चले गए गोकर्ण जी ने समस्त श्रोताओं से कहा बिना तुम्हें विमान में बैठा ले मुझे चैन नहीं सावन के महीना में हम फिर अनुष्ठान करेंगे सब लोग कथा सुनो और सच्चे नियम से रहो उसका मनन करो ऐसा ही किया सब लोग उपवास करके अल्पाहार करके कथा सुने और जही सात दिन में कथा की समाप्ति हुई तो भगवान के बहुत से पार्षद विमान लेकर आए और जितने कथा सुनने वाले थे सबको परमधाम ले गए और भगवान ने गोकर्ण जी को स्वयं गोलोक बिहारी हृदय से लगाया जे भी हृदय से लगाते गोकर्ण भगवत स्वरूप हो गए वही क्री श्याम पितांबर धारण की हुए कुंडल आदि से विभूषित यहां तक कहते हैं कि उस कथा में सुनने में
जो कुत्ते भी बैठे थे वह भी गोकर्ण जी की दृष्टि पड़ने पर विमान पर बैठकर भगवत धाम को गए भक्त वत्सल भगवान श्री कृष्ण इतने गोकर्ण जी पर प्रसन्न हुए कि तुमने सबको कथा सुनाकर मंगल अनुष्ठान इसलिए गोकर्ण जी जिस जिस को चाहा मल कथा सुनकर कुत्ता मनन तो नहीं कर सकता लेकिन लेकिन गोकर्ण जी ने मनन किया कि ये कुत्ता भी कथा में बैठा था इसका भी भगवत उद्धार हो जाए ये आप इसीलिए आसपास जोय जीव जंतु सब भगवत स्वरूप हो जाते हैं बड़े-बड़े सिद्धों को जो गति नहीं मिलती भगवान की लीला कथा सुनने से गोकर्ण जी के प्रभाव से धुंधकारी सहित समस्त श्रोताओं को भगवत धाम की प्राप्ति हुई शेष चर्चा ग श्री राधा वल्लभ लाल की जय
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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