॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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हमारे प्रारब्ध के कारण अगर कोई हमें कष्ट दे तो क्या उसे पाप और दंड मिलेगा ?

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

दीक्षा जी जालंधर पंजाब से राधे राधे राधे राधे महाराज जी महाराज जी आपके प्रवचन सुनने से बहुत जीवन में परिवर्तन आया है महाराज जी आप कहते हैं कि हमारे साथ अगर कोई बुरा करता है तो हमें यह सोचकर खुश होना चाहिए कि उसका हमारे साथ पूर्व जन्म का कोई ऋण था तो जो हम उस समय चुका नहीं पाए इसलिए हमारे साथ इस जन्म में बुरा हो रहा है तो यही सोच कर रख के उन्हें माफ कर देना चाहिए लेकिन महाराज जी क्या भगवान जी भी यही सोचकर उस इंसान को माफ कर देंगे कि उसका पूर्व का प्रारब्ध था क्या उसके लिए दुष्ट कर्मों की कोई सजा नहीं उसको दंड मिलेगा हम उसको चुपचाप सह भी सकते थे लेकिन हमने थप्पड़ मारा य मेरी नवीन क्रिया बनी और आपका प्रारब्ध छय हुआ अब मुझे उसका भोगना पड़ेगा हमारे अंदर प्रेरणा हो रही संयोग भी बना आप गलत भी किए हैं लेकिन क्या भारत सरकार ऐसा आदेश करती है क्या आप सोचो भगवान की तो बात छोड़ो क्या भारतीय सरकार हमारे कानून में ऐसा है क्या रिपोर्ट करो ऐसा है रिपोर्ट रिपोर्ट पर मतलब कानून अपने हाथ में नहीं ले सकते आप

तो आपके अंदर प्रेरणा हुई कि इसको पीट दे उसका प्रारब्ध प्रेरणा कर रहा लेकिन आपने नहीं पीटा तो उसका प्रारब्ध क्षय हो गया और आपका नवीन कर्म नहीं बना अगर आपने पीट दिया तो उसका प्रारब्ध तो छय हुआ पिट के लेकिन आपके लिए नवीन कर्म बन गया प्रारब्ध से हमारे पास सामग्री आ सकती है लेकिन भोगे ना भोगे ये हमारे विवेक के पर है प्रारब्ध बलवान है वो प्रेरित करेगा लेकिन हम उसे रोक सकते हैं विवेक के द्वारा उसे रोक सकते हैं तो अगर हम क्षमा कर दिया तो उसका तो जो कर्म बना उसको तो दंड भोगना ही पड़ेगा हमारा हृदय निर्विकार हो गया और जिसने हमको गाली दी जिसने हमारे प्रति कट व्यवहार किया वह उसका भागीदार बनेगा उसको दंड भोगे तो इसलिए हम यह भी ना चाहे कि उसे दंड मिले संत जन तो भगवान से प्रार्थना करते हैं कि जो हमें गाली दे जो हमें मारे जो हमारा अपमान करें उनको कभी दुख ना पहुंचे नाथ उनको कभी दुख ना पहुंचे इसीलिए तो संतों की महिमा है तो चलना है निर्विकार होने के लिए अध्यात्म मार्ग में जब हमें कोई अपमान करता है तो हमारा

प्रारब्ध क्षय होता है हम उज्जवल हो रहे हैं और वह मलिन हो रहा है तो हमारा प्रारब्ध हमें भगवान की तरफ बढ़ाता ले जा रहा है निर्मल कर ता हुआ तो हमें चाहिए कि हम अपने प्रारब्ध को धुल जाने दे बीच में अड़ंगा ना लगाए हमको गाली दी राधा राधा चुपचाप निकल गए हमारा प्रारब्ध छय हो गया यह भाव जो शास्त्र में सिद्धांत है उसके अनुसार चलना चाहिए जिससे हम बहुत जल्दी निर्मल और आनंद में हो जाते हैं सांसारिक बुद्धि से सोचा जा सकता है कि एक बार गाली दी अगर मैंने क्षमा कर दिया तो अगली बार और गाली देगा वो गाली देने लायक नहीं रहेगा तुम क्षमा करके तो दे देखो उमा क्षमा साप होते भारी अपने कर्म जाय अपकारी उसको ऐसा दंड मिलेगा कि दोबारा आपसे बोलेगा नहीं क्योंकि मालिक है ना इस जगत का मालिक है वो देख रहा है अगर 10 बार आपको उससे अपमानित होना लिखा है तो अपमानित होना पड़ेगा लेकिन 10 बार का अपमान का जो परिणाम उसके पास आएगा वो भूलकर किसी का अपमान नहीं करेगा भगवान सबके ऊपर विराजमान है इसीलिए उनको ईश्वर कहते हैं उनका शासन में

थोड़ा देरी तो होगी लेकिन अंधेर नहीं होगी देरी इसलिए होगी बहुत बड़ा हिसाब किताब है और फसल आज बोई जाती तो आज थोड़ी काट ली जाती है चार महीना पाच महीना बाद ही उस फसल को हम काट पाते हैं ऐसे जो हम कर्म कर रहे हैं उनका कालांतर में दंड या पुरस्कार मिलता है तुरंत तो नहीं मिलता है हर कर्म का फल तुरंत नहीं मिलता है बड़ा कर्म हो जाए जैसे किसी संत की अपमान वृत्ति बन जाए तो फिर तुरंत लागू हो जाएगा साधु अवज्ञा तुरत भवानी कर कल्याण अखिल के हानी मर्जी नहीं तो फिर

नर्क में मिलेगा अगर यहां का छूट गया तो हा वो भगवान का विधान है बिल्कुल उसको भोगना अवश्य में भोगता भोगना ही पड़ेगा युधिष्ठिर जी से भगवान ने कहा कि इतना कह दो अवस्थामा हतो अश्वथामा मारा गया उन्होंने बुद्धि लगा दी नरो या कुंजो नरक दिखाया गया कि केवल आदेश था इतना कि अवस्थामा हातो बोलो तो उन्होंने लगा दिया नरो कुंजर उतने भगवान शकत ध्वनि की द्रोणा चार जी ने अवस्थामा हा तो मारा गया ये युधिष्ठिर बोल रहे इसका मतलब सत्य व तुरंत उदास हुए दृष्ट ने जाकर गला काट लिया द्रोणाचार्य जी का क्योंकि द्रोणाचार्य जी का बध होना अनिवार्य था इसलिए भगवान ने तो अगर आप अपनी बुद्धि लगाकर झूठ बोले तो आपको नरक दिखाया गया षि जी को और कहा जहां ये विचलित हो जाए वही पूरा हो गया इनका नरक उने जी देखा कहां मुझे ले आए तुरंत स्वर्ग पहुंच गए क्योंकि एक शब्द का जो और य कितना बड़ा किताब है इसलिए भगवान का नाम जप करें भगवान की शरण में हो तो जीवन आनंद में हो जाएगा नहीं इतना लंबा हिसाब किताब कि हम भोग भोग के मरते रहे बार-बार तो भी हम

अपने कर्मों का हिसाब नहीं पूर्ण कर पाएंगे वो भगवान ही माफ कर दे तो बात बनेगी भगवान की शरण में हो जाओ भगवान का नाम जप करो सब ठीक हो जाएगा जो बीमारियां आद आती है य अंदर दुख आता है जलन से लेकर अंदर की जलन से लेकर बाहरी भारी विपत्ति तक य सब हमारे कर्मों का फल है कर्म का फल अच्छा आया अंदर के लिए अब अंदर चिंतन बढ़िया होने लगा मुस्कुरा रहा है अब आनंद में डूबा जा रहा है और कर्म का फल बिगड़ा अब ऐसे व्यक्ति का चिंतन करा रहा है कि व जल रहा है बेमतलब जल रहा है चिंतन कर्म का फल उसको भुगता के लिए अब घंटों जल रहा है उसी विषय को सोच के और घंटों एक आनंदित हो रहा उसी इसलिए अच्छे कर्म करो उसका परिणाम अच्छा होगा बुरे कर्म करोगे उसका परिणाम बुरा होगा डिप्रेशन आदि यही बुरे कर्म सब कर्मों के अनुसार अंदर से एक जलन की रेखा से लेकर भारी से भारी विपत्ति तक सब कर्मों का फल है

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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