एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #899 · 4 मई 2025
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
राशि गुप्ता जी राधेधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी जब भी हम कोई नया कार्य शुरू करते हैं ऐसा कहा जाता है कि किसी को ना बताया जाए क्योंकि पहले बता देने से वह कार्य सफल नहीं होता क्या यह नहीं ऐसी कोई मान्यता नहीं अपने कार्य को गुप्त रखने से कार्य में पुष्टता होती है अब हम किसी से कह रहे हैं हम ऐसा करेंगे हम ऐसा करेंगे पता नहीं कर पाए कि ना कर पाए तो एक उपहास के हम पात्र बनेंगे। पहले हम अपने कार्य को गुप्त रखते हैं और हम करते हैं और करके जब सफलता प्राप्त हो जाती है तब कह देते हैं तो कोई परेशानी नहीं।
उसका कोई ऐसा मतलब शास्त्रीय सिद्धांत नहीं है पर वो एक लौकिक सिद्धांत है कि किसी कार्य को करने के पहले बहाबूदी हम क्यों मारे? हम ऐसा करेंगे, हम ऐसा करेंगे, हम ऐसा करेंगे। जब हम हो जाएंगे, तब वो सब पूरा समाज जान ही जाएगा। हम क्यों बोले व्यर्थ की बात है बकाया और कोई ऐसा नहीं कि आप बोल देंगे तो कार्य नहीं होगा ऐसा नहीं नीति के अनुसार भी महाराज जी नीति शास्त्र में भी जैसे कोई दुश्मन उस कार्य में आधा पहले उत्पन्न हां हां अपने कार्य को गुप्त रख के जब कार्य की सफलता हो जाए तो तो अपने आप सब कोई जान जाएगा हम पहले से क्यों उसको प्रकाशित करें यह एक मतलब सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत है।
यह कोई शास्त्रीय आज्ञा नहीं कि आप पहले बोल देंगे तो अनिष्ट हो जाएगा और वह कार्य होगा नहीं। ऐसा नहीं है। कितने ऐसे वीर हैं जो पहले ऐलान कर देते हैं बाद में कार्य पूरा करते हैं। कितने ऐसे नियमों वाले हैं, सुदृढ़ भाव वाले हैं जो पहले ऐलान कर देते हैं। मैं ऐसा करूंगा वैसा करके दिखा देते हैं। लेकिन अपने को चाहिए कि कार्य की प्रणाली को गुप्त रखें और जब कार्य हो जाए तो समाज अपने आप जान जाएगा। महाराज जी अगर कोई निंदा कर रहा हो और आप सिर्फ सुन रहे हैं तो क्या हमें भी उतना ही पाप लगता है जितना निंदा करने वाले को तो ऐसा क्या करें कि सुना हुआ निंदा माफी मिल जाए ऐसे कान में अंगुली डाले सुने ना जब निंदा हो रही हो राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा उठ के चल ले वहां से और जो पूर्व में सुना है मान लो किसी की तो अब भगवान से क्षमा मांगे क्योंकि भगवान ही सब रूपों में है भगवान से प्रार्थना करें तो क्षमा हो जाएगी आगे से सावधान रहें जहां
जहां किसी की निंदा हो रही हो तो पर निंदा के किए ते आवत नहीं कछु हाथ मूर्ख पर्वत पाप को ले चल अपने साथ लेना ना देना बेमतलब में पाप की पोटरी सिर पर बांध रहे अरे वो भला है बुरा है जैसा है भगवान जाने हमको क्या मतलब हमको अपना हृदय पवित्र करना है तो किसी की बुराई सुनने से अपना हृदय अपवित्र होता है मलिन होता है हमारे ऊपर पाप चढ़ता है तो हम पाप की बात क्यों सुने उस समय तुरंत कान में उंगली डालें हां और राधा राधा नाम उच्चारण इसलिए करें कि उसका कोई शब्द ना पड़े।
हम छोड़ के तुरंत उस स्थान को चल दें जहां भक्त की निंदा हो रही हो। संत की निंदा हो रही हो, भगवान की निंदा हो रही ये सब नहीं सुनना चाहिए। विजय पराशर जी आगरा से महाराज जी राधे-राधे। महाराज जी आपसे जानना चाहता हूं कि जब हम लड्डू गोपाल जी को नहलाते हैं तो उस जल का निस्तारण कैसे करें। अभी तक तो मैं देखता आ रहा था कि हमारे परिवार उस जल को तुलसी जी के पौधे में डाल देते थे। क्या ये सही है हमारे? हां। थोड़ा तो चरणामृत ले आचमन करें और फिर अगर तुलसी जी है तो तुलसी जी में डाल दे नहीं तो उसको एक पात्र में भर के रखता जाए और फिर गंगा यमुना नदी में जो आसपास अपने पवित्र नदियां हो उनमें उसमें मिला दे या तो ऐसे वृक्ष के घेरे में डालें जहां पैर ना पड़े क्योंकि भगवान का स्नान का चरणामृत है ना तो उचित यही है कि तुलसी जी के घेरे में डालें जिसके घर में तुलसी जी नहीं है वो तो एक पात्र रख ले 5 लीटर 10 लीटर का और उसी में डालता रहे और जब भर जाए तो पास में जो नदी पवित्र हो वहां जाकर के उसी में डाल दे ऐसे ऐसे कर दे या अब जैसे घर में 10 पांच लोग हो थोड़ा-थोड़ा चरणामृत पिए तो सब पी जाए ठाकुर जी के स्नान का तो चरणामृत पान करना चाहिए पर मान लो लीटरों में तैयार होता है तो अब कैसे पान करें तो फिर उसको ऐसे प्रयोग कर दे पीपल की जड़ में डाल दे तुलसी जी की जड़ में डाल दे या ऐसी लता में डाले जहां पैर ना पड़े या पावन नदियों में डाल दे।
ऐसे महाराज जी ठाकुर जी के फूलों को पहले नदी में विसर्जित करते थे। अब क्या करें महाराज जी? किसी पास के सरोवर के तट में खोद करके और उनको समाधि दे दें। जैसे एकत्रित फूल हो गए तो 10 पांच दिन के एकत्रित कर लिए और किसी सरोवर नदी के तट पर गए और किनारे में खोद के और उन फूलों को ऐसे कर दिया। उनको ऐसे अमित कुमार जी राधे-धे प्रभु जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मैं 16 वर्षों से फिल्म लाइन में था महाराज जी जब से मैंने मोबाइल के माध्यम से आपका सत्संग सुना मेरा मन अभिनय में नहीं लग रहा और मैं मुंबई सब छोड़ छोड़ के वृंदावन रहने के लिए आ गया हूं महाराज जी नहीं हमें लगता है कि अभिनय जीवन जीने के लिए है और जीवन प्रभु के लिए ऐसा बना लो अभिनय करना जीवन जीने के लिए है अर्थ मिलता है और अर्थ से हमारे जीवन का पोषण होता है और जीवन प्रभु के लिए कर ले तो इसमें कोई परेशानी नहीं होगी।
अभिनय कोई निषिद्ध बात नहीं है कि हम त्याग करें ऐसी बात हां भगवान का जब हम सत चिंतन करने लगते हैं तो फिर असत बातों में मन नहीं लगता। यह बात तो है लेकिन जीवन जीने के लिए भगवान ने हमें यहां भेजा है। अपना-अपना रोल है। सब अभिनय कर रहे हैं। सबका अभिनय, कोई माता का अभिनय, कोई पिता का अभिनय, कोई पति का अभिनय, कोई समाज के बहुत बड़े पद का अभिनय, सबको अभिनय। तो आपको जो अभिनय मिले वो आप अभिनय करो और भगवान का भजन करते रहो तो क्या परेशानी है? नहीं। हां ऐसा करो क्योंकि जीवन सबका एक रोल है।
सबको अभिनय करना पड़ रहा है। अब यहां वृंदावन में जैसे तो वृंदावन में मान लो कैसे रहोगे? कुछ ना कुछ तो अभिनय यहां भी करना पड़ेगा। नहीं करना पड़ेगा। तो यहां कोई गलती का होने का चांस अगर हो तो हमें लगता है दूर रह के वृंदावन का चिंतन करें तो ज्यादा अच्छा है। यहां रहकर अगर कोई हमसे पाप बनने लगे, कोई गंदी बातें बनने लगी, गंदे आचरण हो जाए तो हमें लगता है दूर रहकर यहां आओगे तो तत्काल पाप नष्ट हो जाएंगे। क्योंकि धाम है ना और धाम में पाप बन गया। मान लो जवान शरीर है।
अब कहीं इधरउधर किसी से गंदी बातें हो जाए तो सब गड़बड़ हो जाएगा ना। मैं सोचता हूं छोड़ के यही रहे प्रभु जी मन नहीं लग रहा बाबा जी बन रहा है क्या मैं तो वैसे ही सोच रहा अरे बहुत कठिन है बाबा जी बनना बहुत कठिन है बाबा जी बनना सच्चाई का बाबा जी बनना सच्चाई में चलने में हमें लगता है कि अगर भष ना रखे और सच्ची भक्ति की जाए तो और ज्यादा अच्छा है। मत लो अब हम लोग दूसरों के द्वारा दिए हुए अन्न पैसा कपड़ा लत्ता उनका प्रयोग करके भजन कर रहे हैं तो हमारे भजन का हिस्सा वहां भी तो जाएगा।
आप मेहनत करके रोल करके कमा रहे हैं और खा रहे हैं और सच्चाई से भजन कर रहे हैं तो आपका भजन आपके पास ही है। तो हमें लगता है जब कभी ऐसा कोई बैरागी अच्छा तो भले संत बन जाए नहीं तो हमें लगता है संत बनना अब कलिकाल में धीरे-धीरे कठिन हो रहा है। संतत्व में चलना। अब ऐसे ढोंग करना तो बहुत लेकिन सच्चाई से चलने में बच्चों बहुत कठिन बात है। बहुत कठिन बात है। इसलिए हमें लगता है साधु भेष तो धरो मत। साधु बनो। अंदर से साधु बन जाओ और भष सांसारिक रखो और मेहनत करके कमाओ खाओ।
दूसरों को खवाओ और खूब भजन करो। यह बढ़िया है। ठीक है? हां। शिवपाल जी झज्जर हरियाणा से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मैंने किसी ग्रंथ में पढ़ा था कि मृत्यु के समय जीवात्मा अपने सूक्ष्म शरीर के माध्यम से बाहर निकलती है तो तत्काल उसका संरक्षण करने के लिए उसके पूर्व स्वजन इष्ट गुरु आदि का सहयोग मिलता है। कुछ नहीं कुछ नहीं सब नहीं ऐसा कुछ नहीं होता। जो अज्ञानी जीव शरीर छोड़ता है तो कर्म बंधन में बंधा हुआ होता स्वतंत्र नहीं होता और उसकी कोई रक्षा करने की जरूरत नहीं होती।
वह दो प्रकार की गतियों को प्राप्त होता है। या तो नारकी गति को या पुण्य आत्मा है तो स्वर्ग गति को। अगर स्वर्ग गति को जाता है तो देवलोक से आते हैं उसको लेने के लिए। अगर नर्क गति को जाता है तो यमदूत लेने के लिए आते हैं। हरि गुरु सबकी रक्षा करते होते तो बात बन गई होती ना। सबकी बात बन गई होती और जो भक्त है उसका जब शरीर छूटता है जो वास्तविक भगवान की भक्ति करता रहा है अंत समय में स्मरण हो गया भगवान का तो भगवान को प्राप्त हो जाता है अगर अंत समय स्मरण नहीं हुआ उसका तो पुण्यवानों के लोकों में जाकर के सुख भोगता है फिर यहां मृत्यु लोक में श्रीवान कुलवान धनवानों के यहां उसका जन्म होता है और वह पूर्व भजन जहां से उसका रुका हुआ था वहां से फिर भजन चल के वो भगवान को प्राप्त हो लेता तो ऐसी गतियां ऐसा नहीं कि सब परिवार के स्वजन कोई स्वतंत्र है क्या?
कोई स्वतंत्र है क्या? सब परतंत्र है। कर्म के वशीभूत सब हैं। तो ऐसा थोड़ी कि तुम्हारे पिता आ के तुम्हारी समीरक्षा करेंगे। वो न जाने कौन से नर्क में है या न जाने कौन से स्वर्ग में या न जाने कौन सी योनि में चले गए। वहां कोई परिवार स्वजन संबंधी तुम्हारा थोड़ी है। शरीर तक है। शरीर का काम खत्म। कर्म बंधन से वह जीव कहां कीड़ा बनेगा जाकर कि देवता बनेगा जाकर के क्या बनेगा उसका कोई यह सब प्रमाणिक किसी ग्रंथ में लिखा हो तो हमें बताओ क्योंकि जहां तक बचपन से हम ग्रंथ ही पढ़ते रहे समझ में आ रहा है आपको यह बात ऐसा है जीव स्वतंत्र नहीं है जीव परतंत्र है कर्म के परवर और जिस दिन कर्म पर विजय प्राप्त कर ली उसने तो फिर वो तो भगवान का स्वरूप हो गया ब्रह्म ब्रह्म भवती वो तो परमात्म स्वरूप उसका कहां आना जाना है।
जैसे तरंग समुद्र में लीन हो गई तो समुद्र हो गए। तरंग का अस्तित्व खत्म हो गया। तो जब जीव को ज्ञान हो गया तो ब्रह्मविद ब्रह्म भवती ब्रह्म स्वरूप हो गया। उसका कहीं आना जाना नहीं। सर्वत्र व्याप्त कण-कण में परमात्मा में लीन हो गया। समा गया जैसे तरंग समुद्र में लीन हो गई। अब खोजने पर भी तरंग नाम पता नहीं चलेगा। तरंग वायु विकार जीव माया विकार माया विकार नष्ट हुआ परमात्मा स्वरूप हो गया जब आना जाना है तो वो जहां आना जाना है वहां के पार्षद ले जाएंगे माता-पिता परिवार ये सब इन सब का प्रवेश नहीं है राजेश कुमार जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी जब ये शरीर भक्ति करने योग्य था तब यह शरीर प्रपंच में रहा परंतु गुरुदेव भगवान भजन नाम जप अभी शुरू किया है अब ये शरीर शरीर एक अवस्था में नहीं बैठ सकता महाराज जी नहीं बैठना भक्ति नहीं है भक्ति का स्वरूप है तदपिता अखिलाचारिता तद स्मरणन परम व्याकुलते देवर्षि नारद जी कहते हैं हमारे हर आचरण भगवान के अनुकूल हो और भगवान को समर्पित हो अनुकूल का तात्पर्य है शास्त्र धर्म मर्यादा के अनुसार अब हमारे आचरण हो कोई भी आचरण धर्म के विरुद्ध ना हो पाप आचरण नहीं होना चाहिए और वह कर्म भगवान को समर्पित होना चाहिए।
जो भी कर्म करें भगवान को समर्पित करें और उठते बैठते चलते फिरते खाते पीते सोते जागते जब हमारी स्मृति आवे राधा राधा राधा राधा जो भगवन नाम प्रिय है वो नाम हम जप कर रहे हैं इसी का नाम भक्ति है। भगवान की लीला कथाओं को सुनना, भगवान की पूजा करना, भगवान के भक्तों का संग करना, भगवान जहांजहां जो लीलाएं किए उन तीर्थ स्थलियों में जाना तो ये सब भक्ति के अंतर्गत आता है। बैठना कोई साधना भक्ति की नहीं है कि हम बैठकर ही भजन नहीं। फावड़ा चलाते हुए, झाड़ू पोछा लगाते हुए, व्यापार करते हुए, नौकरी करते हुए भी भगवान की भक्ति कर सकते हैं।
नाम जप निरंतर नाम जप का अभ्यास करें अंदर ही अंदर और बाहर व्यवहार करते रहे तो क्या फर्क पड़ता है? तो भक्ति का स्वरूप है भगवत स्मृति। प्रभु से चित्त जोड़े रहना। मैयासक्त मना भगवान में मन जोड़ना। अगर हमारा मन प्रभु में जुड़ा हुआ है तो हमारी भक्ति हो रही है। वह हम चाहे पढ़े हैं तो पढ़े हैं हमारा मन भगवान में जुड़ा हो। शरीर की स्थिति को भगवान नहीं देखते। आप गंगा जी में खड़े होकर गलत चिंतन कर रहे हैं तो आपको गलत चिंतन का फल मिलेगा। गंगा जी में खड़े होकर गलत चिंतन करें तो गलत चिंतन का फल मिलेगा।
और आप सोच में बैठकर के बढ़िया चिंतन कर रहे हैं तो आपको बढ़िया फल मिलेगा। शरीर सोच में है या गंगा जी में? इससे मतलब नहीं ज्यादा खास मतलब आपका चिंतन क्या है? आपका चिंतन यदि भगवान का है तो आपकी भक्ति हो रही है। आपका चिंतन संसार का है तो वृंदावन में रहते हुए भी भक्ति नहीं हो रही है। चिंतन भगवान का चाहिए। जैसे आपने त्राटक के बारे में बोला वो चाहता था कि वैसा नहीं हो सकता बैठे हुए। त्राटक बोला था एक बिंदु पर। देखो सबके लिए सब साधन नहीं है। सबके लिए सब साधन नहीं है।
अब जो हमारे सामने जैसे 500 जवान साधक है तो उनको तो हम बोलेंगे यार एक घंटा तो बैठो पद्मासन में अब वो जवान है वो आराम से बैठ सकते हैं। अब यह बात सबके लिए नहीं है। अब वो विरक्त है। उनके लिए अल्पाहार करो। चार घंटे सो ऐसे चलो। अब गृहस्थ आदमी 4 घंटे सो के कैसे चल पाएगा? उसको तो सात घंटे चाहिए। और वो अल्पाहार करेगा तो फावड़ा कैसे चलाएगा? उसके लिए तो अच्छा भोजन चाहिए। तो यह देखना चाहिए कि उपदेश किसको दिया जा रहा है। अगर उपदेश विरक्त को दिया जा रहा है तो उसमें से जो बातें हमारे लायक है वो हम ले लेते हैं।
बका वो तो विरक्त के लिए है। अपने को देखना है। अपने गृहस्थ हैं। अपना सतमार्ग कैसे चलना है? या कभी किसी बात पर संशय हो तो पूछ लेना चाहिए। जैसे अभी पूछा। ठीक है। जी आशीष जी राधा वल्लभ श्री महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी मेरा प्रश्न है कि जब नाम जप करते हैं तो जिनका नाम जप करते हैं यानी ना के स्वरूप का ध्यान आता है। जैसे राधा नाम में राधा जी का स्वरूप का ध्यान आता है। जैसे राम जी में राम जी इसी प्रकार जब तत्व रूप में राम कृष्ण राधा जी एक ही हैं तो नाम जप में स्वरूप में भेद क्यों है महाराज जी क्योंकि नाम में भेद है ना नाम में भेद है ना राधा नाम लिया तो राधा रूप उन्होंने धारण किया है तो राधा रूप आएगा राम नाम लिया तो राम रूप आएगा शिव नाम लिया तो शिव रूप आएगा अगर ओम नाम लियो तो तत्व आएगा महाराज जी एक छोटा सा प्रार्थना है किसी ने स्वरूप के दर्शन ही नहीं किए हुए हैं तो नाम देखी रूप नाम आदिना वो नाम ही तो करवा रहा
है बिना नाम जप के ऐसे झांकी आ जाएगी क्या ऐसे आ जाएगा क्या ये चित्रपटों में जो है वही है क्या अरे भाई कोटि कोटि रसना जो रोम रोम प्रति हो प्यारी जो के रूप को ना प्रमाण कहो जात है जो को कोटि कल्प लग जीवे रसना कोटिक पावे तो रुचिर बदनारविंद की शोभा कहत ना आवे जब हम राधा राधा राधा राधा राधा राधा बहुत जपेंगे हमारा मन निष्पाप होगा तब राधा रूप झलकेगा और जब राधा रूप झलकेगा तो प्रेममय हो जाओगे समझ पा रहे हैं आप महाराज जी प्राकृत स्वरूप चिदानंद स्वरूप एक नहीं हो सकता किसी से नहीं कदापि नहीं हो सकता भगवान का कभी प्राकृतिक रूप होता ही नहीं है जैसे यह चित्रपट आप देख रहे हैं यह मानसिक कल्पना में आया इसमें जो स्याही लगी वह मायाकृत लगी हुई इसमें चित्रकार की भावना है।
जैसे मनु ये सखी है तुंग विद्या जो तो ऐसी है तुंग विद्या जो कल्पना कर सकते हैं। अब हम मानी संख्या तुंग विद्या जो मानी संख्या जैसे स्कूल में सवाल हल करना होता था तो लगाया जाता था मानी संख्या कुछ भी रख लो और सवाल हल हो जाता था तो मानी संख्या तुंग विद्या जो अब हम इन्हें मान के हे तुंग विद्या जो पूजन करते हैं और ध्यान में तत्पर होते हैं तो हम प्राकृतिक तुंग विद्या के रूप का चिंतन करते हुए चिदानंद रूप में पहुंच जाएंगे। यह जो हमारा प्राकृतिक स्वरूप है आज तक कोई स्याही ही नहीं बनी जो श्याम सुंदर की श्यामता है।
आज तक वह कोई गोरा वर्ण ही नहीं है जो हमारी प्यारी जू का है। पीता अरुण अनंत तड लताभम एक बिजली चमकती तो होश खराब हो जाते हैं। अनंत बिजलियां एक साथ उदय हो ऐसी कांत है श्री राधा किशोरी जी की कैसे झेल पाएगा कोई तो हम माना श्री राधा जी और पूजन करने लगे और नाम जप करने लगे तो हमारी इंद्रियों में प्राकृतिक जो क्षमता थी वो हटने लगी और चिदानंद क्षमता आने लगी धीरे धीरे धीरे धीरे यह रूप गायब हो जाएगा जो असली स्वरूप है वो स्वरूप आ जाएगा यदि नाम जप कर रहे और प्राकृतिक रूप की आराधना कर रहे जो प्राकृतिक हम पाषाण मूर्ति विराजमान किए या अष्ट धातु या चित्रपट रूप में इन्हीं की आराधना से हमें चिदानंद रूप की प्राप्ति हो जाएगी।
हमें चिदानंद तक पहुंचना है। हां चिदानंद तक पहुंचना है क्योंकि जैसे हमारे प्राकृतिक नेत्र हैं और बिहारी जी चिदानंद में है तो क्या हमें सुख मिलता है? अगर सुख मिले तो फिर बिहारी जी के सिवा कुछ याद ना आवे। बिहारी जी के सिवा और कुछ देखने का मन ना हो। सुख मिले तब ना हो। लेकिन थोड़ी देर बाद फिर मंदिर देखने लगते हैं। इधर उधर देख के फिर अच्छा तो ना वो नेत्र है और ना वो हम रूप देख पा रहे हैं। जो बिहारी जी का रूप स्वामी जी देखते थे वो हम देख पा रहे हैं क्या है तो वही बिहारी जी।
अब जब हम कुंज बिहारी श्री हरिदास कुंज बिहारी श्री हरिदास खूब नाम जप करें हमारे नेत्रों में जब चिदानंद पावर जागे तो देखेंगे कि कोटि-कि कामों को भी मूर्छित कर देने वाले बिहारी जो है कोटि काम लावण्य बिहारी कोटि काम करोड़ों एक काम पूरे त्रिभुवन को नचने नाच नचाए करोड़ों काम को भी मूर्छित कर देने वाले बिहारी जो हैं अब वो भजन से होगा खूब हम भजन करें बिहारी जी की आराधना करें तब हमें नेत्रों में नेत्र मिले मानस नेत्र तब फिर हम चच्चिदानंद मैं देह तुम्हारी विगत विकार जान अधिकारी फिर अधिकार वो आ जाएगा फिर जानने में आ जाएगा अभिषेक पांडे जी फतेहपुर से राधे वल्लभ जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मैं एक विद्यार्थी हूं और घर से बाहर अकेले रहता हूं।
कभी-कभी सबके बीच में पूर्व अभ्यास वस हंसी मजाक में वाणी या चेष्टा से गलती हो जाती है। एकांत में आता हूं, भजन करता हूं तो मन इतना तेज जलाता है। तो पहले पहले 10 मिनट नाम कीर्तन किया करो तो वाणी का अपराध नष्ट हो जाएगा। जब हम भजन में बैठे तो उसके पहले जो हमें नाम प्रिय हो वो नाम ध्वनि से कीर्तन करें। तो नाम कीर्तन से जो वाणी के द्वारा अपराध किया गया है वो तुरंत क्षमा हो जाता है। वाक इंद्री से जो पाप बनता है अगर हमको लगता है कि हमारी वाक इंद्री से त्रुटि हो गई तो हम नाम कीर्तन करते हैं।
फिर नाम जप में बैठते हैं। तो कीर्तन करने से निरपराध होकर के हमारे पापों का नाश कीर्तन से बहुत जल्दी होता है। नाम संकीर्तनम यस सर्व पाप प्रणाशनम सारे पापों का नाश होता है। और फिर हम शांत भाव से बैठकर के नाम का चिंतन करें। नाम का जप करें। सुरेंद्र भाटिया जी राधे राधे राधे-राधे गुरु जी गुरु जी पाप क्या है और पुण्य क्या है? जो शास्त्र कहता है कि यह करो उसे पुण्य कहते हैं। और जो शास्त्र कहता है यह ना करो वो पाप है। जैसे स्त्री स्वरूप चार हैं। मां, बहन, बेटी और पत्नी।
और एक स्त्री स्वरूप पत्नी से जो व्यवहार करना है वह तीन से नहीं करना है। तीन में जो व्यवहार करना है वह पत्नी से नहीं करना। अगर आप पत्नी वाला व्यवहार इन तीन पवित्र संबंध तो ये महापाप हो जाएगा। तो जो शास्त्र विरुद्ध आचरण है उन्हें पाप कहते हैं और जो शास्त्र संयत शास्त्र नियत कि यह करना चाहिए उसे पुण्य कहते हैं। भावना गोस्वामी जी दिल्ली से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मन व प्रत्येक इंद्रियों में जो अंधकार फैला रखा है वो समय नष्ट कर रहा है। हमारा इस दुष्ट मन को हम कैसे केवल प्रभु में ही लगाएं।
जन्मजन्म जाते जा रहे हैं। पर महाराज जी किसी जीवन में प्रभु नहीं मिले आज तक महाराज जी इस जीवन में उनका नाम और इसको कैसे पकड़ू महाराज जी पकड़ो ना क्या जबान भगवान ने दी राधा राधा राधा राधा राधा राधा कान भगवान ने दिए हैं भगवान की चर्चा सुनो आंख भगवान ने दिए सब में भगवान की भावना करो जैसे बिजली के बिना कोई यंत्र नहीं चल सकता ऐसे भगवान के बिना कोई ये स्त्री पुरुष मनुष्य पशु पक्षी इनमें जो चेतना है ये सब भगवान ही है पर मन बहुत परेशान कर रहा है महाराज जी मन परेशान कर रहा है क्योंकि मन को तुमने ने परेशानी जगह में लगा रखा है।
अगर आनंद की जगह में लगाओ तो आनंद मिले। आनंद सिंधु प्रिया प्रीतम है और परेशानी की जगह शरीर और संसार और भोग हैं। तो शरीर संसार भोगों में लगाओगे तो परेशानी पैदा होगी। प्रिया प्रीतम में लगाओगे तो आनंद प्रकट होगा। अब प्रिया प्रीतम में लग नहीं रहा क्योंकि बहुत जन्मों से संसार में लगा रहा है। तो अब प्रयास करो। मनुष्य जन्म मिला है। प्रयत्न मिला है। आप उठते बैठते चलते फिरते राधा राधा राधा राधा जपने की कोशिश करो। चतुरासी जी का पाठ करो। श्री जी की सेवा विराजमान करो।
पवित्र आचरण रहे। शरीर पवित्र रहे और आचरण पवित्र रहे। अभी मन आनंदित होने लगेगा। अब गंदे आचरणों में मन जा रहा है और हम उसे छूट दिए हैं और जो मन आता है वो करता है। जो मन आता है हम खाते हैं। जैसे मन आता है वैसे हम जी रहे हैं। तो मन शांत तो रहेगा ही। मन के अनुसार नहीं चलना। धर्म के अनुसार चलना है। प्रभु के अनुसार चलना है। तभी शांति मिलेगी। आप वारिता जी हरियाणा से। राधे राधे-धे महाराज जी महाराज जी क्या नाम जप से मनुष्य की मतलब मेरी रजोगुण की प्रवृत्ति बदल सकती है अरे रजोगुण की बात क्या रजोगुण तमोगुण तो नष्ट ही हो जाएंगे और सतोगुण से ऊपर त्रिगुणातीत अवस्था प्राप्त हो जाएगी नाम जप निरंतर जप का अभ्यास बन जाए तो य लब्ध अपमान सिद्धो भवती अमृतो भवती तृप्तो भवती जो सिद्ध हो जाता है जो अमृत पान कर लेता है जो तृप्त हो जाता है वह नाम जापक नाम जाप नाम में समझते हो बड़ी अपार सामर्थ नाम भगवान में विराजमान बड़े
भाग्यशाली हैं जो निरंतर नाम जपने का अभ्यास लेते हैं पर नाम जप आनंद मिले ना मिले सुख मिले ना मिले लाभ मिले ना मिले इसकी कोई परवाह ना करके एक ड्यूटी बाय जब जप करें तब जाकर साधु दीर्घ काल निरंतर सत्कार सेवितो दृढ़ भूमि जो दीर्घ काल तक आदर सहित नाम भगवान का निरंतर जप करता है वो दृढ़ भूमि सिद्ध हो जाता है वो भगवत प्राप्त हो जाता है पहले नाम जप में अभ्यास के द्वारा ध्यान लगाना सीखें सही जप हाथ में माला चल रहा है जबान में नाम चल रहा है मन संसार में घूम रहा है अभी सही जप नहीं हुआ सही जप हुआ माला हो या ना हो जबान चले या ना चले मन के द्वारा हमारा नाम जप पर यह बहुत ऊंचाई की बात है।
इसलिए नए साधकों को घबराना नहीं चाहिए। नहीं क्लास बाय क्लास भूमिका है। नाम जप की भूमिका है। तो हमें प्रथम भूमिका में चाहिए कि जिभ्या हिलाते हुए नाम जप करें और जहांजहां मन हमारा जाए वहां वहां से हटाकर नाम में लगाएं। बार-बार ये अभ्यास करें और जहांजहां मन जाए वहां वहां भगवान को देखने की चेष्टा करें कि वहां भी परमात्मा विराजमान। कोई भी वस्तु, कोई भी व्यक्ति, कोई भी स्थान ऐसा नहीं जहां परमात्मा ना विराजमान हो। तो नाम जप करते करते दो अभ्यास करें। एक तो जहां जाए वहां से हटा के नाम में लगावे और एक जहां जाए वहीं भगवान को देखने की चेष्टा करें।
वहीं परमात्मा को देखने की चेष्टा करें। धीरे-धीरे हमारा मन ये हम नहीं कह रहे कि तुम दो महीने में सिद्ध हो जाओगे। चार महीने में। अभ्यास लंबा खींचना पड़ेगा क्योंकि बहुत जन्मों का अभ्यास हमारा विषय चिंतन का है। तो जब हम नाम को ध्यान पूर्वक जपते हैं। ध्यान पूर्वक कैसे कहते हैं कि जैसे हमने कहा राधा तो अब हमारे कान में गूंज गया राधा। हमारी आंखों के सामने लिख गया राधा। चाहे आंखें बंद हो चाहे खुली हो। कोई जबान नहीं चल रही अंदर से। राधा राधा या राम राम राम राम ऐसे एक ध्वनि चल रही और हम उसी ध्वनि में डूबते चले जा रहे हैं।
तो जब एकाग्रता होती है नाम जप की तब उसे ध्यान सहित जप कहते हैं। और जब एकाग्रता टिक जाती है घंटा दो घंटा टिक गई तब उसे संप्रज्ञात समाधि कहते हैं। और जब एकाग्रता उठते बैठते चलते फिरते खाते पीते सब समय बनी रहती है। एक क्षण के लिए भी नाम नहीं छूटता तो उसे असम प्रज्ञाति विचक्षणा समाधि कहते हैं। वही सिद्ध पुरुष हो गया। कबीर दास जी कहते ठाड़े बैठे परे उताना कबीर काहे हम ठिकाना। चाहे हम खड़े हैं या बैठे हैं या पड़े हैं या खा पी रहे हैं। हम ठिकाने में रहते हैं।
अर्थात हर समय भगवान के चिंतन में रहते हैं। तो यदि इस प्रकार नाम जप किया जाए तो नाम जप से त्रिगुणातीत अवस्था समाधि परमात्म दर्शन लीला में प्रवेश जो चाहे वह सब प्राप्त हो सकता है। नाम से बढ़कर कोई साधना नहीं है। नाम ही जीवन का सार है। ऐसा नहीं कि अपने साधन नहीं किए। अपने अष्टांग योग का साधन किए हुए हैं। सांख्य योग का साधन किए हुए हैं। कर्म योग का साधन किए हुए हैं। सब करके आपको बता रहे हैं कि सबका सार है नाम में प्रीति हो जाना। हर समय मधुर मधुर भगवान का नाम चल रहा है।
जो नाम प्रिय है। अगर नाम नहीं है तो हम सब अधूरा समझते हैं। जिसके जीवन में नाम नहीं उसका जीवन कूड़ा है। जैसे शून्य शून्य शून्य क्या मतलब रह गया? अब एक लगाओ फिर शून्य रखो तो 10 एक शून्य और बढ़ा दो 100 एक शून्य और बढ़ा दो हजार वो बढ़ता चला जाएगा एक है नाम अगर नाम रूपी एक है तो और साधन रूपी शून्य लगाते चले जाओ महिमा बढ़ती चली जाएगी और नाम रूपी अंक हटा दो तो शून्य शून्य शून्य शून्य कोई उसका अर्थ नहीं रहता इसलिए सबको नाम जप करना चाहिए नाम जप से रजोगुण ही नहीं तमोगुण भी नष्ट हो जाएगा सतोगुण के ऊपर अवस्था आ जाएगी।
त्रिगुणातीत गुणातीत अवस्था आ जाएगी। श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी असंग कैसे रहा जाए? इसके क्या नियम है? मतलब इनका डिवोर्स हो गया महाराज जी। उसके बाद जीवन में असंग रहने मतलब चाहते हैं कि मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति होती रहे उनकी और आजकल के मॉडर्न जमाने में कैसे महाराज जी इसको जब तक हम अंतवृत्ति को भगवान से नहीं जोड़ते हैं तब तक असंगता हो ही नहीं सकती क्योंकि मन किसी ना किसी वस्तु व्यक्ति स्थान का आश्रय लिए बिना रह नहीं सकता। इसका स्वभाव है। यह आश्रय ले ही रहेगा।
देखो आप शांत होकर देखो तो कोई व्यक्ति चल रहा है दिमाग में या कोई वस्तु या कोई स्थान या कोई घटना या कोई परिस्थिति वो आश्रय लेकर उसका चिंतन करता रहता है। तो इसके इन आश्रयों का जो पूर्व में आश्रय लेकर अपने अंदर कैसेट बना ली है जब हम नाम जब करते हैं तब हमें खोल के दिखाता है कि यह कमाई है हमारे पास तो हमें उसे डिलीट करनी है और नई होने ना पावे। इसके लिए हमें हर समय नाम जप करना है। अंदर से वृत्ति जोड़नी है। अब बाहर से अंगुली से माला चल रहा है और जबान चल रही मुख में और मन चल रहा है संसार में तो भी असंग नहीं हो पाए।
मन मैयासक्त मना पार्थ भगवान ने कहा मेरे में आसक्त मन वाला बने तो भगवान की जब हम लीला कथाएं सुनते हैं जैसे भागवत का दशम स्कंध है हम स्वयं पढ़ें हम खूब कानों से सुने भगवान की लीला कथाएं सुनते हैं भगवान का नाम जप करते हैं और भगवान के मार्ग में चलते हैं तो हमारे अंदर एक पावर आता है भागवतिक पावर उससे हम असंग रहते हैं हमें अच्छा ही नहीं लगेगा ऐसे लगता है कि मैं अकेला हूं। कोई तो मेरा होना चाहिए। ऐसा लगता है ना सबको लगता है जिसके हम गोद में सर रखकर चैन से सो सके।
वो केवल भगवान है। नहीं तो संसार कपटी है। ये पाए जान जगत में सब जन कपटी कुटिल कलयुगी टंच। ऊपर से क्या है? अंदर से क्या है? जान पाना बड़ा कठिन है। ऊपर से कुछ और भाषा है और दिखावा है और अंदर से बहुत और दिखावा है। तो एक है जो भीतर और बाहर दोनों से एक है वो भगवान है। भगवान का हम आश्रय लें। जिससे भी मिले हमारा पवित्र व्यवहार होना चाहिए। गंदा आचरण नहीं होना चाहिए। कोई हमको गाली दे तो हम सुन के सह जाए। हम किसी को पलट के गाली ना दें और नाम जप करें तो धीरे-धीरे हमारे अंदर अध्यात्म की वह योग्यता आएगी जिसे असंगता कहते हैं।
असंगो हम पुरुष मैं असंग हूं। यह ऐसा अनुभव होगा क्योंकि वास्तविक हम असंग है। हमारा जो स्वरूप है वो असंग ही है। वो कभी पर वो स्वरूप जो है गलती कर बैठा। देह को मैं मानकर अंतःकरण मन बुद्धि को मैं मानकर वो फंस गया। इसलिए नाम जप करो, भगवत चर्चा सुनो, सत्संग सुनो और अच्छे आचरण करो, पवित्र आचरण करो। तभी असंगता है। गलत आचरण करें और अध्यात्म की बातें करें तो वो बातें बातें केवल है। जीवन में प्रकाश नहीं होगा। अगर जीवन को उन्नतिशील बनाना है, बढ़िया सुखमय जीवन व्यतीत करना है तो गंदे आचरणों को पहले रोको।
जो पाप आचरण है उनको रोको। अच्छे आचरण करो और नाम जप करो। बाबा इसका बल आपको नहीं यह बल जो हमें जहां से मिला है वही खजाना तुम्हें दे रहे हैं। मान लो हम कह रहे राधा राधा जप को भगवत चर्चा सुनो तो इसी से तो हमें बल मिला है। जिस बल से हम टिके हुए हैं वही बल हम सबको दे रहे हैं। अगर इस बल को आप स्वीकार करें तो लंबे समय में आप खुद अनुभव करेंगे कि आपके अंदर कैसी क्षमता बढ़ रही है। आपके अंदर कैसे भाव बढ़ रहे हैं। जी सौरभ शर्मा जी सहारनपुर राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में दंडवत प्रणाम गुरुदेव भगवान श्रीमद् भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि काम क्रोध और लोभ ये तीन प्रकार के नर्क के दरवाजे जीवात्मा नरकसदम द्वारं नाशनात्मन काम क्रोधा तथा लोभा तस महाराज जी इन तीनों का त्याग कर देना चाहिए परंतु इस भौतिक संसार में रहते हुए ये चीजें स्वत ही जीवन में आ जाती है महाराज जी ऐसे में इस नरक से कैसे बाहर निकले भी साए का खा जाओगे स्वतः विष आ गए तो खा जाओगे क्या?
विवेक है कि यह विष है। यह खाद्य नहीं है। तो स्वतः हमारे सामने अगर भोग आते हैं तो वह धर्म युक्त है या अधर्म युक्त। जैसे भगवान ने काम को नर्क का द्वार बताया तो एक जगह काम को अपना स्वरूप बताया। विभूतियों में जब भगवान विभूतियों का वर्णन करते हैं तो कहते हैं धर्म युक्त काम मैं हूं। जैसे पानी ग्रहण किया धर्म युक्त पत्नी शास्त्र सम्मानित स्वीकार किया आज जो यह व्यभचार प्रवृत्ति चल रही ना यह नहीं शास्त्र प्रमाणित कुल परंपरागत धर्म युक्त पाणिक ग्रहण वैदिक मंत्रों के द्वारा अग्नि को साक्षी करके जिसको स्वीकार किया संतानोत्पत्ति के लिए उससे किया हुआ भोग वो भगवत स्वरूप है वो पाप नहीं है वो उसके लिए दोष नहीं है ऐसे स्त्री के लिए है।
अपने पति के साथ सहवास करना धर्म है और दूसरे पुरुषों को काम दृष्टि से देखना मात्र पाप है। पर ये बातें कलयुग का प्रभाव कैसा चल रहा है? इतना गंदा वातावरण होता जा रहा है। पवित्रता जहां छाई रहती है वहां संशय हो रहा है। वहां अब संशय हो रहा है। ऐसे पवित्र संबंधों में ये गंदी बातें प्रवेश कर रही हैं। जहां दिमाग काम नहीं करता ऐसा कैसे हो सकता है? समाज में कितनी गंदगी फैल रही है। कितना गंदा व्यवहार हो रहा है। यह समझा ही नहीं जा रहा कि यह धर्म है। शरीर को पवित्र रखना धर्म है।
जैसे स्त्री शरीर है। इसको जब तक ब्याह ना हो तब तक पवित्र रखना यह धर्म है। और फिर पति को पवित्र होकर समर्पित करना और आजीवन उस पति के अधीन रहना यह धर्म है। ऐसे पुरुष के लिए है। जब तक पानी ग्रहण ना हो तब तक ब्रह्मचर्य रहना धर्म है। और जब अर्धांगिनी मिल जाए तो उसे प्राण के समान प्यार करते हुए उसकी गलतियों को क्षमा करते हुए उसकी मनोकामनाएं पूर्ण करते हुए उसे धर्म के लिए उससे अनुमति लेते हुए सहज मित्रवत भाव से आजीवन पार करें। ये गृहस्थ धर्म हमारे सनातन धर्म का है।
अब आज क्या हो रहा है? आज क्या हो रहा है? ये बहुत गंदी बातें हो रही हैं। आप सब नौजवान बच्चे संभलो। इससे तुम्हारा जीवन बड़ा संकट पूर्ण हो जाएगा। बच्चियां एक बॉयफ्रेंड ब्रेकअप दो बॉयफ्रेंड ब्रेकअप तीन बॉयफ्रेंड ब्रेकअप ये क्या चल रहा है इसे क्या कहा जाता है वैश्या प्रवृत्ति जो कई पुरुषों से संबंध बनाए उसे क्या कहते हैं और जो कई लड़कियों से संबंध बनाए उसे व्यभचारी कहते हैं। तो अब व्यभिचारी और वैश्या प्रवृत्तियां अंदर धारण करना। अब इससे आप सदगस्त बन जाएंगे।
जब आपको पत्नी मिलेगी तो आप अपनी पत्नी में संतुष्ट नहीं रहेंगे। जब आपको पति मिलेगा तो आप पति में संतुष्ट नहीं रहेंगे क्योंकि आपका व्यभचार करना स्वभाव बन गया है। इसलिए धर्म युक्त ब्याह और उससे फिर जो संतान उत्पत्ति के लिए भोग किया जाता है वो काम भगवत स्वरूप है। तो ऐसा नहीं कि हमारे सामने हर भोग आ गया तो हम उसे भोगे। हमारे अंदर विवेक है। धर्म युक्त भोग है तो उसे हम भोगे। धर्म युक्त नहीं है तो हम उसका त्याग करें। नहीं तो हमें नर्क जाना पड़ेगा। जो पर पुरुष से रति करते हैं र नरक कल्प सत पर पतिवंचक परपति रति कर ररो नरक कल्प सत पर जो अपने पति का त्याग करके दूसरे पुरुष से संभोग वो सैकड़ों कल्प तक नरक भोगती है ऐसे पुरुष के लिए लिखा हुआ है उसमें श्रीमद् भागवत में पढ़ के देखो जहां नरकों का वर्णन है जो पुरुष दूसरी स्त्री से सहवास करता है तो वहां लोहे से तपी हुई स्त्री नर्क में और उसी का आलिंगन करवाया जाता है और मरना है नहीं वहां अब वर्षों उसी में चिपकाए रखा लो बहुत होश में बहुत होश में ऐसा नहीं है कि कर्मों का फल नहीं मिलता बहुत जब कर्म अपने स्वरूप में आ जाएगा तो बड़े बड़ों को दंड देता है बड़े-बड़े संत महात्माओं को भी दंड देता है बखशता नहीं है बड़े-बड़े संतों के जीवन में देखा गया तो यह कर्म बहुत बलवान है यह नष्ट नहीं होता यह दंड देके ही नष्ट होता है इसलिए कर्म बहुत सावधानी पूर्वक करना चाहिए तो भगवान ने तीन को नरक का द्वार बताया।
काम क्रोधा तथा लोभा। तो क्रोध की स्वयं उत्पत्ति नहीं है। इसकी काम से उत्पत्ति है। कामा संजायते क्रोधा काम जब हमारी वृत्ति उदय होती है उसमें बाधा पड़ती है तो हमारे अंदर क्रोध आ जाता है। क्रोध स्वयं नहीं आता। क्रोध कामना में बाधा पड़ने पर आता है। जैसे कहते हैं कि आप हमसे नम्र व्यवहार करें तो ये हमारी कामना है और जब आप नम्र व्यवहार नहीं करेंगे तो क्रोध आ जाएगा। क्योंकि हमने कामना की। कामना अगर ना हो तो क्रोध की सत्ता ही नहीं है। तो कामना से ही क्रोध प्रकट हुआ।
और जो लोभ है वो कामना से होता है। कामना पूर्ति होने पर लोभ होता है और कामना की आपूर्ति होने पर क्रोध होता है। तो मूल जो है वो काम है। इसीलिए भगवान ने गीता जी में कहा ये काम सबसे बड़ा शत्रु इसको मार डालो अर्जुन अर्थात निष्कामता जब तक नहीं आएगी तब तक शांति आनंद सद्गति नहीं होने वाली। इसलिए भगवान का नाम जप करो। अच्छे आचरण करो। आए हुए समस्त भोगों को निर्णय करो। विवेक के द्वारा कि धर्म युक्त है कि अधर्म है। अब यह धर्म नहीं कि कोई आपके सामने आकर कहे मुझे भोगो तो नहीं तुम हमारे किस धर्म के डिपार्टमेंट में हो जो हम तुम्हें स्पर्श करें।
नहीं यह पाप है। मैं कभी नहीं करूंगा। ऐसी हिम्मत होनी चाहिए। पर ऐसे क्या है? यहां तो जानबूझकर गलत आचरणों की तरफ कूद रहे हैं। बिना अध्यात्म के पशुवत जीवन होता है। इसलिए शास्त्र स्वाध्याय और संत संग अध्यात्म जरूर जानना चाहिए। आज के नए बच्चे अध्यात्म को जानते नहीं। इसलिए अध्यात्म अनिवाद है। हम सोच समझकर कार्य करें। हमारा कर्म बड़ा प्रबल है। वह हमको दंड देगा। इसलिए कोई ऐसा कर्म ना करें। बहुत सावधान रहे। जैसा मन में ख्याल आते रहते हैं कुछ भी तो क्या उनका भी पाप लगता है वो भी नहीं कलयुग का एक अन्य युगों में तो लगता था कल कर एक पुनीत प्रतापा मानस पुण्य होए नहीं पापा मानस पुण्य तो लग जाएगा जैसे आपके मन में आया कि अब हमारे पास रुपया है कल चलते हैं और बिहारी जी का भोग लगाकर सबको बांटते हैं और आपके सामने कल ऐसी विपत्ति आ गई कि रुपया भी गया और आप भी ना पाए तो आपको पुण्य मिलेगा लेकिन हां वो पुण्य मिलेगा ले हां भावना का लेकिन आपने सोचा कि कल इनको मार
देंगे पाप नहीं मारे तो पाप नहीं लगेगा कलकर एक पुनीत प्रतापा मानस पुण्य होए नहीं पापा अगर मानसिक पाप लगते तो तब तो पहाड़ जैसे पाप इकट्ठा हो जाते क्योंकि मन पाप तो सोचता ही रहता है तो कलयुग में मानसिक पाप नहीं लगते हैं राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा जी के दर्शन आप अपनी मुक्ति वर्णन करें ये नर बाबा थोड़ा सा स्वरूप समझा ठाकुर जी को ये बाबा त्रेता युग से विराजमान है नरसिंह भगवान एक स्तंभ पे बैठे हैं स्तंभ पे 31 पत्ती को कमल बैठो है और 31 पत्ती के कमल पे ठाकुर जी ऐसे पैर करके और अपनी जंगा पे हिरण्यकश्यप रख के वक्षस्थल विद कर रहे हैं अपने हाथ से और एक हाथ में गधा है और एक हाथ में पद्म है और ये ठाकुर जी की आप देख रहे हो ये जुआ है ठाकुर जी की जी राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा
राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राम हां।
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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