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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #905 · 10 मई 2025

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री वृंदावन धाम की जय श्री सदगुरुदेव भगवान की जय श्री रामचंद्र गुड्डू जी महाराज राधे राधे राधे राधे महाराज जी महाराज जी यद्यपि मानता हूं कि भक्ति करना चाहिए। परंतु जब तक सब कुछ अनुकूल होता है तब तक मन स्थिर रहता है।

कोई विपरीत परिस्थितियां आती हैं तो मन विक्षिप्त हो जाता है। दोष देखने लगता हूं और कभी-कभी अनुचित आचरण भक्ति है कहां? मानता हूं परंतु भक्ति नहीं है। इसलिए स्थिति है भक्ति हो तो सामर्थ्य होती है। सामर्थ्य यही भक्ति की सामर्थ्य है। शत्रु मित्र समजानी मान अपमान सम दुख सुख लाभ ना हानि यही जो कृपा है मायाकृत ध्वनों में जो समान भाव पैदा कर दे बड़ी-बड़ी विपत्तियों में भी जो मुस्कुराहट ना रुके हर गम को हर परिस्थिति को आनंद पूर्वक सह जाए ये भक्ति की सामर्थ होती है ये खिलवाड़ थोड़ी होता है भक्ति हृदय में जब आती है तो बड़ी-बड़ी सामर्थ्य अंदर प्रकट हो जाती है नाम जप करो भगवान की आराध आराधना करो भगवत कथा सुनो पवित्र आचरणों से चलो तो तुम्हें अध्यात्म बल मिले अध्यात्म बल से ही इन विकारों को सहा जाता है आपस में राग द्वेष मोहल्ले में राग द्वेष गांव में राग द्वेष प्रदेश में राग द्वेष हाय हाय हाय मारकाट लड़ाई झगड़ा भोग राग ये शांति आनंद ये तो कहां है कहां है शांतिल सब भोग भोगों में अपने जीवन को बर्बाद करके नष्ट करके और कुछ चंद रुपए चंद भोगों की तृष्णा और परिवार बस यही तो जहां शरीर छूटा तो पाप कर्म पुण्य कर्म के बंधन में बंधा हुआ जीव फिर टहलता है।

इसलिए भाई अभी भक्ति को समझा नहीं तुमने। तुम कह रहे हो कि भक्ति परंतु प्रतिकूलता आने पर कितनी बड़ी प्रतिकूलता है। दोनों किडनी फेल है। एक कष्ट अगर कष्ट गिनावे तो डायरी क्या आपको हम कष्ट में दिखाई दे रहे हैं? आप विचार करो ऐसे हैं। भगवान की शरण में भगवान का नाम जप करते हैं तो इतना बल दिए हैं कि ऐसी परिस्थिति में भी आपके सामने बैठे हैं, हंसते हैं, बात करते हैं, नॉर्मल जीवन व्यतीत करते हैं। हां। तो क्यों? हम कोई ऐसी औषधि होती है क्या? नहीं। नाम जप भगवान के सहारे राधा नाम की हां भगवान के सहारे हैं।

ये हम खुलकर आप लोगों से बात करते हैं कि हम भगवान के सहारे हैं। उनका नाम जप करते हैं। नाम जप जो बनता है बनता है। नहीं हम उनके सहारे हैं। हमारे भगवान के सिवा कोई नहीं। इसीलिए हमें आनंद प्राप्त होता है। तो इसी का तो नाम भक्ति है कि हम भगवान के सहारे रह। भगवान का नाम जप करें। गंदे आचरण ना करें। पवित्र जीवन, पवित्र भोजन तो अभी आपको आत्मबल मिल जाएगा। जब हृदय शीतल होता है और एक आनंद आनंद ऐसे जैसे दूध को बटुई में चढ़ा दो ना तो उफान आता है ना ऐसे भगोदानंद की उफान आती है।

रोने का मन करता है। कष्ट में नहीं सुख में सुख में रोने का मन करता है। इतना आनंद एकदम सहन नहीं होता। वो आनंद जब आता है कोई गाली दे रहे हैं कोई मार भी रहा है अपना आनंद हृदय में है ना तो बाहर की चोटें काम नहीं करती अब हृदय आनंद में नहीं बाहर सब सुविधा है तो सोच में हम नेगेटिव सोच में परेशान हो जाते हैं नेगेटिव नकारात्मक सोच मात्र हमें परेशान कर देती है जब हमें भगवान का भरोसा नहीं होता तो सब सुविधा है सब अनुकूलता है लेकिन नेगेटिव सोच से हम परेशान हो पता नहीं कहीं ऐसा ना हो पता नहीं कहीं ऐसा ना हो जाए।

नेगेटिव सोच हमें परेशान कर देती है। और जब भगवान की कृपा होती है, हम भक्ति में होते हैं तो हर नकारात्मक परिस्थिति में पॉजिटिव सोच हमें आनंद प्रदान करती है। ये खास बात भक्ति की है कि पॉजिटिव सोच नहीं। अब मतलब हम कैसे बताएं कितना कष्ट दिया जा रहा है महापुरुषों को देखो जो वायगुरु के शरणागत जन है कि कितना और कह रहे तेरा किया मीठा लागे अब आप सोचो जरा पॉजिटिव सोच कितनी बड़ी है मतलब पूरे शरीर को तप्त बालू के द्वारा जलाया जा रहा है और वो कह रहे हैं वाहेगुरु वाहेगुरु वाहेगुरु तेरा किया मीठा ये बात समझ समझनी होगी तो हम लोग छोटी-छोटी प्रतिकूलता छोटी-छोटी बात में जो परास्त होते हैं, हार जाते हैं, ठकित हो जाते हैं।

यहां तक कि अपने जीवन को नष्ट करने की सोच लेते हैं। ये सब भक्ति विहीन जीवन है। अगर भक्ति युक्त जीवन हो तो बड़ी से बड़ी प्रतिकूल परिस्थिति में भी आप आनंदित होकर मुस्कुराकर कि यार जैसे दिन नहीं टिका तो रात नहीं टिकेगी। दिन आएगा। ऐसे ही सुख नहीं टिका दुख भी नहीं टिकेगा। सुख आएगा। हम आगे बढ़ते हैं। हम दुख में डूबते नहीं है। लेकिन अगर भरोसा भगवान का नहीं, भजन नहीं, अध्यात्म नहीं तो ऐसी सोच हमारी नेगेटिव हो जाती है। ऐसी ले गई कि इतने दिव्य शरीर को दुर्लभ देह मनुष्य को वो नष्ट कर देता है।

इसलिए भगवान की भक्ति में अपार बल है। पर हम वहां तक पहुंचे। भक्ति के बल तक पहुंचे। अभी तो भक्ति की शुरुआत ही नहीं हुई है। जो भक्ति की शुरुआत है अभी कहारा नहीं आया भक्ति का और जब भक्ति का ज्ञान आ जाएगा तो आरा चला दिया जाए तो भी अपनी निष्ठा से नहीं हटेगा। अब सोचो भक्ति का रंग पांच वर्ष का बालक प्रहलाद अग्नि में जलाया जा रहा है। विष पिलाया जा रहा है। लेकिन हरि हरि हरि दूसरा शब्द नहीं निकला। अभी भक्ति का रंग अपने लोगों को अभी तो भक्ति के नाम पर हम सुख भोग रहे हैं।

भक्ति का रंग तो तब आएगा जब दुख पे दुख दुख पे दुख हो। ओम हरि हरि राधा राधा राम राम इसके सिवा निकले ना तब माना जाएगा रंग। अभी रंग तो कहां आया है। प्रेम जब उदय होता है तो दुख और गमों की परवाह नहीं करता। अगर दुख और गम की परवाह होती तो प्रेम ही नहीं कहा जाता। प्रेम का मतलब क्या होता है? अपने प्यारे के लिए हर कष्ट सहना। तो अभी अभी आनंद आ जाए। जब प्यारे के द्वारा दिया हुआ कष्ट है तो बहुत आनंद प्राप्त होता है। तेरा किया मीठा लागे। बस ये बात समझ ली। अभी भक्ति का रंग आया नहीं है।

इसलिए आप ऐसा बोल रहे हैं। अमरीक जी यस वाहेगुरु जी का खालसा। वाहे गुरु जी महाराज जी गुरु ग्रंथ साहिब जी में साधु जनों की संगति महिमा बहुत सुनी है महाराज जी आप जी की संगत YouTube पर करके अकाल पुरक जी बहुत करीब लगते हैं। महाराज जी अब बुरे काम करने को मन नहीं करता। क्या करूं कि प्रीति बन जाए। ध्यान धरते समय कौन-कौन सी बातें ध्यान रखूं। निष्कामता, दया, संतोष, प्रेम, नम्रता आ जाए। महाराज जी गुरु पिता बखश ले। एक पकड़ ले तो सब आ जाएगा। यदि हमारी कोई भी स्वास वाह गुरु के सुमिरन के बिना ना जाए तो सब आ जाएगा अपने आप निष्कामता आ जाएगी शांति आ जाएगी सब श्वास श्वास सुमिरन करे दुविधा राय ना कोई हर स्वास में अगर नाम जप चल रहा है तो दुविधा राय ना कोई हर सद्गुण दैवी संपदा सब कुछ आ जाएगा नाम स्वास दो बिलक चलत है इनको भेद नम मोह को भावे स्वास नाम ही स्वासा नाम स्वास को भेद मिटावे रोम रोम जब रगरग बोले तब स्वाद नाम को पावे हर स्वास में 10 नाम 20 नाम घसीटते चले गए और खूब नाम जप कर रहे हैं।

अभी देखो दैवी संपदा अपने आप प्रकाशित हो जाएगी। निष्कामता संतोष परम शांति आनंद आह्लाद दया ये सब देवी संपदा अपने आप आ जाएगी। जब नाम जप निरंतर चले। नानक नाम जहाज है चढ़े सो तरह पार। जो नाम रूपी जहाज पर चढ़ गया भव समुद्र से पार हो गया। निरंतर नाम रूपी जहाज पर चढ़ने का मतलब है निरंतर नाम जप करना। कोई नाम जहाज थोड़ी कि हम ऐसे जाकर बैठ जाएंगे। नाम में बैठने का मतलब है हर समय वाहेगुरु वाहे गुरु वाहेगुरु वाहेगुरु हर समय हमारे अंदर श्वास श्वास में अधिक से अधिक नाम जब चले इसी से सब कुछ प्राप्त हो जाएगा।

गुरु वाणी का पाठ करो और वाहेगुरु का सुमिरन करो। उन्हीं की कृपा से सब सद्गुण आ जाएंगे। खानपान पवित्र होना चाहिए। अगर खानपान अशुद्ध है, आचरण अशुद्ध है तो ऐसा मानो जैसे घड़े को हम भरना चाहते लेकिन आज नीचे से कई छेद हैं तो घड़ा उभरेगा नहीं। ऐसे यदि पाप कर्म हो रहे हैं और अपवित्र भोजन हो रहा है और आप नाम जपने की चेष्टा कर रहे हैं तो सफल नहीं होंगे। पहले उसको सफल करो कि आपके आसपास का वातावरण भागवतिक हो। आपका खानपान भागवतिक हो, आपका चिंतन भागवतिक हो, तब भागवतिक भाव स्थापित हो पाता है।

प्रवीण सैनी जी मोहाली से श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी गुरु और शिष्य का संबंध लौकिक है या पारलौकिक? पारलौकिक परमार्थिक है जो व्यवहारिक संबंध माता पिता पत्नी पुत्र भाई और भी रिश्ते नाते हैं। यह सब व्यवहारिक हैं। नाशवान है। सांसारिक हैं। परिवर्तनशील है। स्वार्थ से हैं। मोह से हैं। लेकिन गुरु का संबंध यह परमार्थ से है। केवल परमार्थ से है। गुरु की आज्ञा पर अपने मनोभाव को समर्पित करके हम अगर एक-एक बात उनकी मान लें तो इसी जन्म में हमें भगवत प्राप्ति हो जाए।

यह भगवत प्राप्ति के लिए गुरु शिष्य का संबंध है। पर शिष्यत्व आ जाए और गुरु मिल जाए। गुरु मिलना भी कठिन है। दंभ और पाखंड और कपट छल का तो बहुत नाटक चल रहा है। लेकिन वास्तविक जिसने भगवान को प्राप्त कर लिया है या जो भगवान की प्राप्ति के मार्ग में तन्मय है। ऐसे संत का ऐसे भक्त का ऐसे उत्तम कोटि के साधक का यदि हमें सानिध्य मिले तो ही हमारा भगवत मार्ग प्रशस्त हो। हमारे शास्त्रों में वर्णन है। भागवत में वर्णन है कि गुरु ऐसा होना चाहिए जो शब्द ब्रह्म अर्थात शास्त्रों का वेदों का पारगामी विद्वान हो और परम ब्रह्म भगवान की अनुभूति से युक्त हो।

भगवत साक्षात्कार किए हो और समस्त शास्त्रों का ज्ञान हो। स्वयं भगवत स्वरूप जो हो गए उन गुरुदेव भगवान का वरण हो और शिष्य के लिए है कि गुरु की आज्ञा में अपने तन मन प्राणों को न्योछावर करके वैसे ही चले तो इसी जन्म में भगवत प्राप्ति हो जाए जैसी आज्ञा गुरुदेव की हो आज्ञा सम सुसाह सेवा गुरु सेवा तज करे जे बान यह अधर्म यह सब कान नकन में रह गुरु गोविंद न भेद कराए जैसे गोविंद वैसे गुरुदेव गुरु साक्षात परम ब्रह्म तो गुरु और शिष्य का जो संबंध है वो केवल भगवत प्राप्ति के लिए है और यह केवल शुद्ध परमार्थ है।

इसमें व्यवहार का लेश भी नहीं है। जी हरजीत कौर जी वाहेगुरु जी का खालसा वाहेगुरु जी की फल महाराज जी जिन प्रेम किया तिन ही प्रभु पाए। महाराज जी वाहेगुरु जी ने कृपा करके YouTube के जरिए आपसे मिलाया। वाहेगुरु जी की प्रीत से खींचे खींचे हम आपसे मिलने आ गए। आप जी उनसे मिला दो। नाम जप समय जितना होता है उतना कर सकते हैं। कम हो रहे हैं बट पूरी तरह से नहीं। मतलब नाम जप कह रहे हैं कि नाम जप जितना कम हो रहा है बट जैसा चाहिए वैसा नहीं। आप जी द्वारा बताए हुए बिंदु पर ध्यान लगाने का अभ्यास भी शुरू किया है।

कह रहे प्रयासरत है अपनी तरफ से बट जो एक और तड़प चाहिए प्रीति चाहिए वह कैसे मिलेगी महाराज जी ऐसे अल्पाहार करो थोड़ा भोजन करो मौन का आश्रय लो पांच घंटे सो पांच घंटे से ज्यादा नींद नहीं पवित्र आहार अल्पाहार लो अल्पाहार का मतलब भूखे भी नहीं रहना और छकना भी नहीं है और हर समय मौन रहने से हमें भजन का ज्यादा अभ्यास होगा अब जैसे दिमाग है ना यह उड़ रहा है। हम अपनी बात बता ना हमारी खोपड़ी जैसे सा मचा है एकदम दिमाग में और जैसे बचपन से इस मार्ग में रहे तो सा जैसे मतलब बस चुप होने की जरूरत है।

बस चल रहा है। अब जैसे बात कर रहे हैं तुम्हारे दिमाग में छाया हुआ है। क्योंकि अब जैसे यहां घंटे दो घंटे हमारे व्यतीत हुए इसके बाद बंद ना किसी से मिलना ना नीचे उतरना ना बाहर अगर हम किसी चीज का अपने में बसाना चाहते हैं तो उसके लिए हमको समय देना एक वैज्ञानिक जब किसी बात की शोध करता है तो बहुत एकाग्र एकांत शांत उसी में लगन लगाएगा हम तो परमात्मा की शोध कर रहे हैं हम तो वाहेगुरु की शोध कर रहे उनको प्राप्त करना चाहते हैं तो हमारी लगन ना हमारे देह में लग पावे ना देह संबंधियों में लग पावे ना भोगों में लग पावे केवल वाह गुरु में लगे तो अभी तन्मयता हो जाए तन्मया स्थिति जब तक नहीं आएगी तब तक बात नहीं बनती तो हमें हर समय अपने गुरुदेव में अपने इष्ट में लगे रहना है और जबान चलाते रहना है जैसे अब हम उपांशु जप कर रहे हैं मानसिक नहीं हमारी जबान चल और मंत्र जप रहे हैं।

अब हम मानसिक जप रहे हैं। चल रहा है। आप भी जप के देखो तो कोई आश्चर्य की बात थोड़ी है। दो चार बार तो आप भी मानसिक जप सकते हो। फिर मन भाग जाएगा। देखो चल रहा है। मानसिक में कोई हरकत नहीं होती। चल रहा उपांश में हरकत होती है जबान में ऐसा लगेगा कुछ बुदबुदा रहे हैं और वाचिक में तो ऊपर है ही है राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा तो ऐसे हम हर समय उपांश में रहे जब तक हमारी मानसिक स्थिति अचंचल ना हो जाए। अचंचल का मतलब होता है स्थिर। जैसे विषय पुरुष का मन भगवान पे लगाया जाए तो भागकर विषय में चला जाएगा।

ऐसे भक्त का मन विषय में लगाया जाए तो भागकर भगवान में आ जाएगा। वो विषय में नहीं लगेगा क्योंकि उसको स्वाद मिल गया है नाम का। उसको वाह गुरु की कृपा मिल गई है। तो हमको चाहिए कम भोजन, कम सुनना, कम बोलना, कम सोना। अगर इन नियमों को हम धारण करें और एकांत सेवन अधिक समय करें और खूब नाम जप उपांश से करें तो हमारा मानसिक में प्रयोग जहां मन लग गया फिर वो हटाए नहीं हटता है मन निरंतर प्रभु में लग जाए फिर वो हटाए नहीं हटता है ये जो हम आपको बताते कि हम ऐसेसे ये बह बुद्धि नहीं बताते अहंकार के लिए नहीं लेकिन अभ्यास यदि अभ्यास किया जाए तो बहुत सरल हो जाएगा हम आपसे बात कर रहे हैं लेकिन हमारे दिमाग में वही बात नाच जैसे आप हमारी बात सुन रहे हो अंदर कुछ और चल रहा है चल रहा है ना जैसे डबल कह दे कि आप हमसे बात कर रहे हो तो भजन कैसे कर रहे हो तो जैसे आप हमारी बात सुन रहे हो श्रवण इंद्री से सुन रहे हो लेकिन आपका अंदर का सिस्टम कुछ और चल रहा है आप हमारी बात पर पूरे नहीं हो बार-बार कुछ और चल रहा है वही वही उसी जगह जब नाम पहुंच जाता है तब बार-बार हम आपसे बात कर रहे हैं लेकिन वो खिंचाव उसी तरफ चल रहा है तो हमारा निरंतर भजन होगा जब हमारा ऐसा चिंतन होगा तो हमारा निरंतर भजन होगा।

उसे कहते हैं परावाणी के द्वारा भजन। वैखरी मध्यमा पश्यती और परावाणी। परावाणी में वो परिपक्व साधक हो जाता है। वो सिद्ध साधक हो जाता है। जिसकी ऐसी स्थिति होती है। तो हमको एकांत सेवन करना है। हमको पवित्र और थोड़ा भोजन करना है। अपवित्र भोजन भी भजन में बाधक है। तो यह ध्यान रखें कि हमारा भोजन बहुत पवित्र होना चाहिए। और हमारा संग बहुत पवित्र होना चाहिए और बस 5 घंटे से ज्यादा सैया में सोना नहीं चाहिए। उठ के बैठ जाए और नाम जप करने लगे। ऐसा अभ्यास करके देखो और मूल तो गुरु कृपा है।

वाहेगुरु जी की कृपा है। प्रयत्न अपना है। प्रयास अपना है और फल तो गुरु कृपा से ही प्राप्त होता है। महाराज जी जैसे घर में तमोगुणी लोग होते हैं तो उनके बीच में कैसे-जैसे घर में नॉनवेज पकता है। ये तो बहुत बड़ी समस्या है। उस बहुत नहीं ये तो बहुत बड़ी समस्या है उस परिवार के भक्त की जिसके परिवार में ऐसा आहार विहार किया जाता हो और वो भक्ति करना चाहे ये तो बहुत बड़ी समस्या है बड़ा दुर्भाग्य है कि हमको ऐसा प्रतिकूल वातावरण मिला बड़ा दुर्भाव बड़ा सौभाग्य है जिनको अनुकूल वातावरण मिले लेकिन फिर भी स्वयं ना खाए स्वयं मान लो आप पत्नी किसी की होंगे आप किसी की बेटी होंगे किसी के घर में तो रह रहे होंगे अगर उन लोगों का दबाव है तो आपको बनाना पड़ेगा।

आपको उनको पवाना पड़ेगा। आपको उनके बर्तन मांझने पड़ेंगे। लेकिन आप मत खाइए। तो भगवान यह बात तो जान रहे हैं ना कि आप किस समस्या में हो लेकिन आपका मन भगवान की तरफ है। इसी बात से भगवान नीचे जाएंगे। आप स्वयं पवित्र रहिए। स्वयं मत खाइए। लेकिन अगर ऐसा दबाव है कि आपको बनाकर देना पड़ेगा। तो आप मान लो किसी की पत्नी हो तो आपको बनाकर देना पड़ेगा। बर्तन मांझने पड़ेंगे। लेकिन आप मत खाइए। आप भगवान से प्रार्थना कीजिए कि मेरा दुर्भाग्य कि मुझे ऐसा वातावरण मिला है।

पर नाथ मैं आपका इस जीवन में भजन किए बिना व्यर्थ नहीं जाने देना चाहती जीवन इसलिए आपको प्राप्त करना चाहती हूं। अंदर ही अंदर प्रार्थना कीजिए। आप मत खाइए। मुझे लगता है कि अगर परिवार के लोग थोड़ा भी सुलझे हो तो जो ना पाना चाहे उसे दबाव नहीं देना चाहिए। आपकी भाई रुचि है आप नहीं छोड़ पा रहे हैं लेकिन जो छोड़ कर दिए हैं तो उनको सपोर्ट करना चाहिए उनको दबाव नहीं देना चाहिए पीयूष जी मतलब श्री हरिव श्री हरिवंश महाराज जी महाराज आपके द्वारा कही गई दो बातें मेरे हृदय को लग गई।

पहली ये कि आपने कहा था कि इतने जीवन विषय भोगों को दे दिए तो एक जीवन प्रियालाल को देकर देखो और दूसरी ये कि आपने कहा था कि श्री जी की कृपा से हम इस मार्ग में कदम रखते हैं। तो प्रिया प्रीतम बहुत आनंदित होते हैं कि अब ये निकुंज आएगा हमारी सहचरी बनेगा। लेकिन हम संसार की तरफ मुख कर देते हैं और प्रियालाल की तरफ पीठ। तो महाराज जी दोनों लाडले उदास होकर बैठ जाते हैं कि ये क्या कर रहा है? आपने कहा कि हमने हमें ध्यान रखना है कि अपने लाडलों की तरफ पीठ नहीं करनी।

अब महाराज जी श्री जी की कृपा करके बताएं कि प्रारंभ में प्रारंभ में साधक को चाहिए कि और कोई इष्ट ना बनावे। नाम को इष्ट बनावे। हमारा काम इतना ही है। आगे का सब निकुंज प्रिया प्रीतम मोक्ष सब अपने आप मिल जाएगा। हमें केवल राधा इस पर अपने मन को केंद्रित करना है। वर्तमान में हमारे अंदर चल रहा राधा राधा राधा सब ठीक हो जाएगा। जब खाली समय नहीं रहेगा तो काम आदि दोष प्रवेश नहीं करेंगे। ये प्रवेश कर हैं जब खाली समय अंतराय होता है जहां नाम का अंतराय तो हानि हरिवंश के नाम अंतर परे लाभ हरिवंश उच्चत वाणी जहां हम नाम जप कर रहे हैं तो यह विकार अपना प्रभाव नहीं दिखा पाएंगे इसुरित होंगे तभी जब इनको अवसर मिलता है जैसे खाली समय तो अंदर आ गए और अगर लगातार भजन चल रहा है तो इनका प्रवेश नहीं तो हमारा कर्तव्य क्या है ज्यादा कुछ ना सोचे राधा राधा वर्तमान में वर्तमान का समय राधा राधा राधा आप देखना खुद देखना तो हमको ज्यादा आगे पीछे की नहीं सोचनी भूत भविष्य की नहीं सोचनी भूत भविष्य के ठेकेदार ठाकुर जी हैं हम उनकी शरण में हमें वर्तमान में वर्तमान के समय को नाम में लगा देना है और कब प्राण चले जाए इसका कोई भरोसा नहीं इसलिए अगर हम अभी राधा चिंतन कर रहे हैं हमारे प्राण छूट गए तो हम भगवान को प्राप्त हो जाएंगे।

भगवान के बिना मानव जीवन व्यर्थ है। इसका कोई महत्व नहीं है। आपका पद, आपकी संपत्ति, आपका साम्राज्य, आपके रिश्ते नाते, आपका मकान, दुकान, शरीर सब यही छूट जाएगा। मिला क्या? आप जब यहां से चलेंगे तो क्या मिलेगा? आपके शरीर को तो लोग सम्मान पूर्वक दाह संस्कार भी कर देंगे। लेकिन आपका क्या होगा? खास बात समझनी है आपके शरीर को तो सलूट भी करेंगे, सम्मान भी करेंगे। लेकिन आपका क्या होगा? आपका कर्म आपके साथ जाएगा। आपने जो राष्ट्र के प्रति कर्म किया, जो भगवान के प्रति बलिदान दिया, वह आपकी उन्नति करेगा।

इसलिए दोनों काम एक साथ होने चाहिए। समाज सेवा अर्थात राष्ट्र सेवा और भागवतिक सेवा। तो भागवतिक सेवा में सबसे बड़ी हमने अपने जीवन को एक बात में केवल कसौटी में कसा है कि नाम ना छूटने पावे बस हम अच्छे हैं कि बुरे हैं हम जितेंद्रिय हैं कि अजितेंद्रिय हैं मनोनिग्रही हैं कि मन को वश में नहीं कर ये सब हम झंझट नहीं पाली हम वर्तमान में बस राधा राधा राधा राधा अब जितेंद्र अपने आप हो जाएगा क्योंकि राधा राधा चल रहा है मन अपने आप समेटे सब काम हो जाएगा साधक परेशान क्या होता है?

वर्तमान के समय को भूत भविष्य की चिंता में नष्ट कर देता है। इतना कीमती समय हम एक बार राधा बोले मेरा एक सेकंड सार्थक हो गया। एक बार राधा बोले मेरी एक स्वास सार्थक हो गई तो मुझे वर्तमान के समय को भगवन नाम में लगाना। बस गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा कि रघुनाथ जी आप जानते हो सर्वज्ञ हो। मेरे जैसा नीच ना भूत में है ना भविष्य में है ना वर्तमान में है। लेकिन एक बात और कह रहा हूं कि यदि तराजू में तोगे तो पलड़ा मेरा भारी होगा क्योंकि मैं राम नाम जपता हूं। खास बात आप तीर्थ, तपस्या, त्याग, वैराग्य, व्रत, नियम इन सब करने वालों को एक तराजू में तोगे और तुलसी को तोगे तो तुलसी का पल भारी होगा क्योंकि तुलसी ने केवल राम नाम को स्वीकार किया है।

तो वही हम आपसे कहते हैं राधा के हमारा वर्तमान का समय राधा राधा राधा आप देख लो। ये परा विद्या है। ये परा विद्या है। राधा नाम परा विद्या है। आप देखना इसका नाम जप करके मतलब राधा राधा जप करके आप खुद देखो। भाई कोई चीज होती तो हम टेस्ट लेते हैं ना कि अरे नई चीज है टेस्ट ले। राधा राधा राधा राधा थोड़ा स्वाद लेके देखो इसका भी। कोई फीस ले ये कोई फीस होती तो परेशानी कि भाई इतनी लंबी फीस है। हम नहीं दे सकते। फ्री है फिर ये केवल चखना है राधा नाम सुधा रसम रसत जिस्त में विला ऐ जी तू विभल होकर के इस अमृत का पान कर राधा राधा राधा और जो राधा नाम बोला तो अनुताप तद राधा मधुपति महा प्रेमा विस्त परम देम विमति तवम श्री राधे गणति नाम रसम महिना कामा इस प्रस दास मनसा जिसने राधा बोला तो लाल जी ने उसके रजिस्टर को फाड़ दिया।

जो पुराना रजिस्टर जमा है ना हमारा पाप का उसको फाड़ दिया और अनु लिखा आगे लिखेंगे नहीं। अनु लिखा कितने एक दो गलतियां नहीं अनंत अपराध भी हो जाए तो आगे नहीं लिखेंगे और फिर सोचते हैं कि हमारी प्रियाजु का नाम ये राधा राधा रखता है। इसको क्या दे दूं? तो संसार की वस्तुएं तो लाल जी देते नहीं क्योंकि मायाकृत है झूठी है तो वो उसको गले लगाते हैं और सच्चिदानंद सुख प्रदान करते हैं। अगर वो सांसारिक सुख चाहता है तो वो भी देते हैं। तो लौकिक पारलौकिक दोनों उन्नति के लिए लौकिक पारलौकिक दोनों जगह सुखी रहने के लिए हमें नाम का जरूर स्मरण करना चाहिए और बहुत सरल नाम है राधा राधा राधा दो अक्षर राधा नाम ये दो अक्षर जिभ्या में सब जीत गए सब माया पर विजय प्राप्त कर लोगे आप देख लेना खूब नाम जप करो बीना जी उत्तराखंड से राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी जैसा हमने सुना कि कृतज्ञता एक असम्य में अपराध।

इनका कहने का भाव है कि प्रभु भूतकाल में एक दो लोगों द्वारा हम पर असीम उपकार किए गए। हम श्री जी के चरणों में शीश झुका कर कहते हैं कि हम जीवन भर उनके ऋणी रहेंगे। परंतु सोच, भक्ति, रहन-सहन और कार्य क्षेत्र की विषमताओं के कारण उनसे अब सामान्य दूरी बन गई है। गुरुदेव आप सर्वज्ञ हैं। कृपया मार्गदर्शन करें। कृतज्ञता कृतज्ञता किसे कहते हैं? बात समझनी आई। अगर सही भक्त हो तो भगवान से बढ़कर हम ज्यादा सम्मान किसी को तो नहीं दे सकते ना। हम उसे भगवान मानते हैं।

मैं प्यासा था। मेरे भगवान ने इस रूप में आकर मुझे पानी पिला दिया। हम प्रणाम करते हैं आपको। लेकिन व्यक्ति को नहीं। ध्यान रखना भगवान को। अब अगर वह व्यक्ति पानी पिलाने के बाद कुछ और तो हम यह नहीं मानेंगे कि आपने मुझे पानी पिलाया है। पानी पिलाया मेरे भगवान ने प्रेरित करके तेरे से। अब जो तू आचरण कर रहा है तो उसका हिसाब लेता जा। हमारी बात समझना। कृतज्ञता यह नहीं कहते हैं कि कोई हमारे ऐसी विपत्ति में आकर सहयोग करें और इसके बाद वो मनमानी आचरण करने वाला हो तो हम ऐसे झुके रहे।

नहीं मेरी विपत्ति में भगवान ने निमित्त बनाया था तुम्हें। मेरे भगवान ने किया। उपकार भगवान का है। निमित्त मात्र तुम हो। इसके बाद हम पहले तो धन्यवाद देते हैं कि भगवान ने आपको निमित्त बनाया। इसके बाद यदि आपके आचरण, आपका व्यवहार, आपका तो हम कृतज्ञता प्रकट नहीं करेंगे। हम आपसे दूरी बना लेंगे। बात समझ रहे हैं ना? तो यह भक्ति का स्वरूप है। इसी भाव से चलना चाहिए। सब हम भगवान से ज्यादा बड़ा किसको सम्मान दें? मान लो हम आपको भगवान मान रहे हैं कि आपने भगवान बनकर हमारी सहायता की।

भगवान ने मेरी सहायता की। भगवान ने निमित्त बनाया तो हमारा सारा भाव आपके प्रति भगवत भाव है। इसके बाद आपका जो रोल होगा वो इंसान का रोल होगा और उसका परिणाम होगा। यह भाव रखना चाहिए। इंसान में भगवान है वो सारा कार्य कर रहे हैं। हम उनको मानते हैं। तो हमारी कृतज्ञता सीधे भगवान को गई। इंसान पे नहीं। क्योंकि इंसान अभी कुछ और है फिर कुछ और हो सकता है। वो पानी पिला के कुछ और भी कर सकता है। तो इसलिए इंसान की इंसानियत पर शासन बुद्धि से और भगवान की कृपा पर उपकार का भावना हमारा ऐसा रहता है कि आपने हमें पानी पिला दिया।

भगवान ने आप हमारे भगवान हो। लेकिन अब जो आचरण करोगे उसका निर्णय होगा। अगर आप गलत आचरण करते तो हम आपसे दूरी बनाएंगे और गलत आचरण करते तो हम आपकी रिपोर्ट करेंगे। आपको दंड दिलवाएंगे। यह नहीं कि आपने पानी पिलाया है तो हम कृतज्ञता वश पीसते चले जाएं। हम कृतज्ञता वश अधर्म सहते चले जाए। ऐसा नहीं इस बात को खुलकर के समझने की बात है कि कभी-कभी भगवान ऐसे लोगों से भी हमें उपकार करवा देते हैं जिनका उपकार स्वभाव नहीं है। वो गंदे आचरण के हैं। लेकिन वो उपकार बन जाता है तो हम उनके मित्र नहीं बन जाएंगे।

धन्यवाद। भगवान ने आपको निमित्त बना दिया और वो यह सब रूपों में है। तुम नहीं तो यह सही यह नहीं तो वह सही वो करेगा। हमें उस पर विश्वास है। आप पर नहीं आपको निमित्त बनाया इसलिए आपको प्रणाम है। मैं भगवान जैसा सम्मान करता हूं। लेकिन बराबर नहीं बराबर नहीं। बराबर मैं आपका उपकार नहीं मानूंगा। उपकार भगवान का मानूंगा। अगर अगला आचरण आपका गलत होता है तो हमारा स्वरूप आपके सामने दूसरा होगा। वो नहीं होगा कि आपने पानी पिलाया था। पानी भगवान ने प्रेरित करके पिलाया था और तुम अब ये आचरण कर रहे हो जिसका निर्णय अब होगा।

यह बात समझनी चाहिए बहुत अच्छे से नहीं तो हम उपकार में दब करके अधर्म में घसीट सकते हैं। उप किसी को भी अगर हम स्वार्थी हैं तो हम पहले उपकार ही दिखाते हैं। आइए आइए चाय पी लीजिए ना। नहीं पैसा हम दे देंगे ना। मतलब फंसा रहा है। तो आप समझो बहुत कृतज्ञता है। कृतज्ञता नहीं प्रकट करनी। चतुरता भी रखनी है क्योंकि वो आदमी अवसर ढूंढा और वह हमको फंसा रहा है तो इसमें भी देखना है और वास्तविक अगर किसी ने हित किया है तो भगवान ने किया है। भगवान ने उसको प्रेरित किया है।

मैं भगवान से ज्यादा क्या सम्मान दे सकता हूं? आपको भगवान मानता हूं। लेकिन कल अगर आपका आचरण हमारे प्रति गलत हुआ तो उसका निर्णय अलग होगा। आज आपने किया हम आपको भगवान की तरह आदर देते हैं। यह बात बहुत व्यवहार में समझने की है। नहीं पाए जान जगत में सब जन कपटी कुटिल कलयुगी टंचु बड़े कपट के जाल चलते हैं। आपको लगेगा हमारा हित कर रहा है। लेकिन वो आपको फंसा रहा है। वो आपको अपने पंजे में फंसा रहा है। किसी स्वार्थी की पूर्ति करना चाहता है। या कोई अपनी चाहत पूर्ति करना चाहता है।

यह बहुत संभलना है। बहुत संभलना है। तो इसमें देखना हम ये नहीं मानते कि हमारा कोई उपकार करता है। हमारा उपकार परमात्मा करता है और करवाता है। दूसरे को हम नहीं मानते। तब इसीलिए सबसे प्रेम है। किसी से वर नहीं है। लेकिन आपके आचरणों से प्रेम नहीं है। अगर आप आचरण गलत करते हैं तो आपके साथ हमारा व्यवहार गलत होगा। अगर आप आचरण सही करते हैं तो आपके साथ सही होगा। और आप हमारा बहुत खवाते पिलाते उपकार करते हैं। मेरे भगवान ने किया। यह सिद्धांत समझना है। मेरे भगवान ने किया।

तुम नहीं तो दूसरे से दूसरे नहीं तो तीसरे वो प्रेरित करेगा। पूरी सृष्टि उसकी है। इस सिद्धांत से चला जाता है। नहीं तो उपकार में कभी-कभी अधर्म भी हो जाता है। अब वो गलत करना चाहे वो गलत व्यवहार करना चाहे। नए अब तू नहीं है। वो नहीं है। वो परमात्मा तेरे से उपकार करा है। अब तू आचरणहीन पुरुष है। तेरे साथ बर्ताव गलत होगा। बात समझना। व्यवहार को बहुत संभाल करके। नहीं तो कभी-कभी किसी के उपकार के दबाव बस हम अधर्म की भी क्रिया कर सकते हैं। हमारे साथ अधर्म भी हो सकता है।

इस बात को सावधान रखना है। जैसे कोई पूछ सकता है कि अधर्म की क्रिया क्या हो सकती है? मान लो आपने बहुत बार हमें अब आप खानपान के विषय में बोले यार आओ ना खाओ। जो नहीं खाना चाहिए वो आप खाने के लिए कह रहे हैं। जो नहीं पीना चाहिए वो आप पीने के लिए कह रहे हैं। जो नहीं करना चाहिए वो आप करने के लिए कह रहे हैं। तो हम आपका उपकार पाई भर नहीं मानेंगे। इस बात को मतलब समझना है। अगर हम ऐसे उपकार मानते रहेंगे और ऐसे खानपान तो हमारी भक्ति, हमारा संस्कार, हमारा धर्म, हमारा चरित्र दूषित हो सकता है।

इसलिए हमें सावधान रहना चाहिए। राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी आपने कई बार कहा है कि गुरु की प्रकट में जरूरत है। जो आकार रूप में हमें मार्ग दिखाएं, डांटे दुलार करें। प्रकट में गुरु होने का क्या अर्थ है महाराज जी? जिस साधक की दीक्षा हो गई है, अब गुरु अंतर्ध्यान हो गए हैं वो क्या करें? साधक मंत्र जाप करें नाम लेता रहे फिर भी सत्संग करता रहे फिर भी बड़े संतों का संग करता रहे क्योंकि सत्संग के बिना विवेक टिकता नहीं माया इतनी प्रबल है जैसे एक बार पोछा लगा दिया और खिड़की खुली है तो ये गंदा हो जाएगा खिड़की बंद हो तो भी गंदा हो जाएगा 10 दिन बाद खोलोगे तो गंदा हो जाएगा हमें रोज पोछा लगाना है जैसे अपने घर में रोज पोछा लगाना है ऐसे रोज हमें सत्संग सुनना है।

रोज हमें संत महापुरुषों का संग करना है। भगवान की कृपा से मोबाइल चल गया है। तो अगर प्रगट में संग नहीं मिल रहा है तो अगर हम मोबाइल से भी संग कर रहे हैं तो परिवर्तन होता है। हजारों लोग हमारे पास ऐसे आए जो पहले सुधर गए बाद में आए। पहले सुधर गए कि हमने आपका सत्संग सुनकर के सब छोड़ दिया। गंदी बातें और अच्छे मार्ग में अब चल रहे हैं। दो साल हो गए। फिर हम आपके पास आए। तो यह काम मोबाइल ने किया। मोबाइल के सत्संग ने उनको सुधार दिया। तो हमें लगता है प्रगट में संत महापुरुषों का यदि हम सानिध्य लेते रहे तो जो गुरु जी ने दीक्षा रूपी पोछा लगाया अंतकरण में वो वैसे ही स्वच्छ बना रहेगा।

नहीं तो माया अपनी धूल जमा कर देगी और हम सब भूल जाएंगे। फिर माया में रथ हो जाएंगे। हमें रोज सत्संग की आवश्यकता है। जैसे घर में रोज झाड़ू पोछा की आवश्यकता है। ऐसे रोज सत्संग की आवश्यकता है। तो रोज मोबाइल से एक से एक संत महापुरुषों की वाणियां है। उनको आप चयन करो और आप उनकी वाणी सुनो और उनका मनन करो। गुरु को अपने गुरु मानो। मंत्र वही जपो जो गुरु जी ने दिया है। लेकिन सत्संग संत महापुरुषों का करते रहो। तो इससे आपका हृदय निहाल हो जाएगा। समझ पा रहे हैं? नमस्कार बाबा जी बड़ी इच्छा थी आपसे मिलने की पिछले दो वर्षों से बड़ी कृपा के आप दर्शन दिए आ के जब भगवान का विशेष अनुग्रह होता है तो संतों का दर्शन होता है आपकी जो सेवा जो भक्ति हम देखते हैं हमने तो आपको YouTube और मीडिया के माध्यम से ही देखा था।

लेकिन पहली बार जब देखा तभी ऐसा लगा था कि आपसे तो मिलना है। और उस समय मैं कन्याकुमारी में थी तो पिछले तीन दो ढाई तीन सालों से प्रतीक्षा थी इस पल की और पैदल चलते हुए बहुत कृपा बहुत कृपा आपसे मिलने आए। बस हर समय जो गुरु जी ने स्मृति दी है उसी स्मृति में रहना। हां हर समय परमात्म चिंतन होता रहे। शरीर भ्रमण करे लेकिन मन स्थाई प्रभु में लगा रहे। आपको देख के हमारा ओरा भी स्ट्रांग हो जाता है। आपके इस सारे जितने भी सखियां हैं और जितने भी गुरु जी हैं, साधु महाराज हैं, सबको देख के बड़ा अच्छा लगा।

यह हमारे 24 तीर्थंकर भगवान और उनको इसमें यंत्र में स्थापित किया है और आपके बारे में हम अह मतलब मीडिया के माध्यम से ही जानते हैं कि आपकी तबीयत ठीक नहीं रहती लेकिन आप फिर भी मुस्कुराते रहते हैं। तो आपको और भी शक्ति मिले। आप युगों युगों तक जिए। की प्राप्ति आप सबका आशीर्वाद हां सबके जो हृदय की प्रसन्नता है यही हमारी मुस्कुराहट बनती है और हमारी छोटी-छोटी राधा रानियां आपसे मिलना चाहती थी माला पहना दो तिलक कल वापस मुड़ गए थे इन्हें अंदर नहीं आने दिया तो रोने लग गए बाहर आपको एक-एक वस्त्र सफेद दे सकते हैं आपका अनुग्रह ही काफी है वस्त्र नहीं है भगवान एक एक एक ही काफी है एक दे दो एक दुपट्टा उन भाई को दे दो जो संतों की सेवा में रहे वो पूज्य होते हैं आपसे मिलके बहुत बहुत दिल का मतलब बहुत ही आनंद

आ गया मतलब मैंने हमने 33 साल हो गए साधु बनके छोटेपन में ही बन गए थे संत तो बहुत देखे आपके जैसा नहीं देखा सब आप संतों की कृपा आप संतों की चरण की कृपा बहुत अच्छा लगा जय जय जय जय राम गुरु जी हमारा एक क्वेश्चन है जी जैसे हमारी एज हो गई है कि हम हमारा शरीर साथ नहीं दे रहा है हम ध्यान में बैठ नहीं पाते थोड़ी देर में कभी पांव में दर्द कभी हाथ में कभी कुछ होना शुरू हो जाता है और हम सोच सोचते हैं, कोशिश करते हैं कि हम ज्यादा से ज्यादा टाइम ब्रह्म मुहूर्त में सुबह बैठे।

तीन से 6:00 बजे का टाइम देखो घर में सोफा में आराम से बैठो। जैसे सोफा है ना पैर फैला के और नाम जो आपको गुरु जी ने दिया हो या जो प्रिय हो जो प्रिय नाम हो अब ऐसे राम राम राधा राधा राधा राधा जो नाम आपको मिला है उसी नाम को आप आराम से जपिए। मंत्र बाहर उच्चारण मत कीजिएगा। नाम तो बाहर उच्चारण किया जा सकता है। मंत्र अंदर ही अंदर भगवान की प्राप्ति के लिए जरूरी नहीं कि आप पद्मासन में बैठे। हां जरूरी है चिंतन। अब जैसे आप ऐसे बैठे हैं और आप अंदर अंदर जप रहे हैं।

आपका भजन बढ़िया हो रहा है। मन प्रभु में लगना चाहिए। तन अगर पड़ा भी है तो कोई बात नहीं। कबीर दास जी ने कहा ठाड़े बैठे परे उताना। कबीर काहे हम रहे ठिकाना। हम खड़े हैं या बैठे हैं या लेटे हुए हैं या चल रहे हैं हर समय परमात्मा का चिंतन कर रहे हैं। अब आपकी वृद्धा अवस्था है तो आप खूब नाम पर ध्यान दीजिए। आके बैठ नहीं पाते। हां कोई बात आसन की कोई जरूरत नहीं है। आप नाम पर ध्यान कीजिए। नारायण नाम उच्चारण किया जामिल ने। अंतिम समय तो भगवान को प्राप्त हो गया।

अगर आप भगवान का नाम उच्चारण करेंगे निश्चित मंगल हो जाए। उद्धव जी महाराष्ट्र से श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आप जी कहते हैं कि श्री जी ने हमें इस मार्ग में घसीटा है उसी प्रकार श्री जी मुझ अधम को भी कब घसीटेंग मैं ऐसा क्या करूं कि श्री जी मुझे अपने मार्ग में घसीटे क्योंकि जब मैं श्री जी के आश्रित होकर संसार और प्रार्थना प्रभु से हम प्रार्थना हमें प्रार्थना भी नहीं करनी पड़ी क्योंकि हमारा पीछे के जन्म से चलता रहा है इसलिए कि जैसे होता है ना कोई किसी को समझाए कोई किसी को प्रेरित करे फिर उसकी समझ में आवे कि जीवन का लक्ष्य भगवान की प्राप्ति है।

फिर वह चले। ऐसा मेरे जीवन में कुछ नहीं था। स्कूल से आते तो आग लग जाती है हृदय में। यार अम्मा हमारी नहीं ये मरेंगे। पिता हमारे नहीं ये मरेंगे। हमारा है कौन? ये पढ़ाई लिखाई करके क्या करेंगे? धन मिलेगा। धन का क्या करेंगे? भोग भोगेंगे। भोग के क्या करेंगे? मर जाएंगे। यार मतलब शांति कहां है? आनंद कहां है? कैसे जीवन का? बस इसी प्रश्न ने किसी ने हमको नहीं समझाया। इसी प्रश्न ने कहा भागो भागो यह पूर्व जन्म का भजन ना भागो 13 वर्ष की अवस्था में भगा दिया घर से और पूरे जीवन किसी का सहारा नहीं लिया।

किसी व्यक्ति का सहारा नहीं लिया कि हम किसी साधु महात्मा का प्रकट में ऐसे साथ चलना साथ कभी किसी का नहीं। असंगोहम पुरुष तुम बोल रहे हो तो छुप के सुना और बात जो समझ में आई उसे जीवन में धारण किया आगे बढ़े हम किसी का संग नहीं किया इसलिए संग नहीं किया कि कहीं हमारी जो वो किसी के संग से दब ना जाए क्योंकि आपका संग करें आपका लक्ष्य है नहीं भगवान का तो हम फंस सकते हैं तो दूरी बना करके रखें और सदैव पूज्य पाद श्री उड़िया बाबा हमारे आदर्श रहे उन्हीं के ही वचन उन्हीं का जीवन तो हमारी हरी पूछो तो ये पूर्व जन्म का है।

इस जन्म का नहीं है। पूर्व जन्म से हमें जो संपत्ति मिली थी उसी ने हमको घसीटा है। अब जैसे आप लोग हो ये कृपा हुई है कि सत्संग सुनकर भगवत मार्ग में चलने की भावना बनी है। सत्संग सुनकर ये कृपा होती है। बिन सत्संग विवेक न होई और राम कृपा बिनु सुलभ न सोई। बिना सत्संग के ज्ञान नहीं होता और बिना भगवान की कृपा के सत्संग नहीं मिलता। लेकिन पूर्व जन्म का जो जैसे जैसे ध्रुव जी थे बाल्यावस्था में पांच वर्ष में निकल पड़े घर से और छ महीने में भगवत साक्षात्कार कर लिया ये मथुरा में आके मधुपुरी में छ तो क्या ध्रुव जी को छ महीने में भगवान मिल गए नहीं पूर्व जन्म में भारी तपस्या की छ महीने रह गए थे पूर्णता में तो छ महीने में पूर्णता में हो गया अब जैसे एक दो लोगों ने कहा कि हम आप जैसा बनना चाहते हैं भाई ये तो हम वादा नहीं कर सकते कि तुम प्रेमानंद बन सकते हो क्योंकि भगवान के यहां ढांचा अलग है।

आप जैसा ढांचा नहीं है। आप जैसा ढांचा नहीं आप अकेले हैं। पूरे भारत में आप देख लीजिए कुछ ना कुछ फर्क पड़ेगा। कितने ढांचे हमारे प्रभु के पास आप सोचो। तो अच्छा प्रेमानंद बनने के लिए वो सामग्री चाहिए जो बचपन में हमको पूर्व में भगवान की कृपा से मिली। उस सामग्री से अकेले भागना और कितना कष्ट सा है पूरे जीवन में तुम्हें कैसे बताएं जैसे कोई चल रहा हो मेहनत कर रहा हो तो कोई शाबाश बोल दे तो अच्छा लगता है ना और उसे गाली देकर के उसको निराश कर दे तो प्राय निराशा ही मिली है तब वो अंदर से हां तब वो पुष्टता आई एकमात्र भगवान का आश्रय लेकर तो सत्संग सुनो नाम जप करो और भगवान से प्रार्थना करो तो वो तुम्हारे जीवन की डोर अपने हाथ में ले ले अब जैसे हमारे जीवन का है अब हमें ना बुरे से कोई ना भले से कोई जैसे चलाओ बस अपना ऐसे हो गया कि जैसे ड्राइवर बैठा है अब कहां ले जाएगा कैसे ले जाएगा बिल्कुल अपने चुपचाप बैठे क्या बुलवा रहे हैं वो सुन रहा हूं क्या करवा रहे हैं वो देख रहा हूं कहां ले जा रहे हैं क्या-क्या हो रहा है ये उनका खेल तो ये ये भागवतिक ज्ञान है ये मतलब पढ़ा लिखा ज्ञान नहीं ये भगवान अंदर से हमारे जैसे अर्जुन के रथ में भगवान बैठ गए ऐसे ऐसे प्रेमानंद के हृदय में भगवान बैठ गए और वो डोरी पकड़ के चला रहे हैं।

अब दूसरों को लग रहा है प्रेमानंद कर रहे हैं और प्रेमानंद तो केवल बैठे हैं। आगे भगवान सब कुछ कर रहे हैं। कह रहे करावे आप सब और जने बढ़ाई दे तो प्रिया जी से प्रार्थना करो वही अपने चरणारविंद में ले ले। बस यही सार बात है। जैसे दोनों तरफ बैलेंस करके चलना संसार और परमात्मा बहुत मुश्किल। है तो है तो कठिन पर बच्चा बाबागिरी भी बहुत कठिन है। बहुत कठिन अच्छा महीना दो महीना ब्रह्मचर्य रह लो खुली बातें कह रहा हूं। सही है। महीना दो महीना तुम्हें नियम दे दे कि दो महीना ब्रह्मचर्य आप आराम से रह लोगे कष्ट सह के लेकिन आजीवन ब्रह्मचर्य रह जाओ।

कितना आकर्षण है माया का। ये नाना प्रकार की भोग सामग्री मन तो है 25ों वर्ष जो जीवन कटा वह ऐसा जीवन था कि पूरे जीवन में कभी किसी रसोई में बैठकर भोजन नहीं किए वृंदावन के सिवा कभी जीवन में नहीं कि आओ बाबा बैठो गरम गरम नहीं एक रोटी यहां से मिल गई एक मिल गई वो भी मिली कि ना मिली गंगा किनारे गंगा किनारे 10-10 किलोमीटर दूरी गांव है अब गंगा किनारे ही चलना है अब कई कई दिन हो जाते भोजन नहीं मिलता बड़ा कष्ट में ये कोई ना समझे कि साधु का मार्ग बड़ा सरल मार्ग है।

साधुता से पूरा जीवन निर्वाह करना हमें लगता है कलयुग है। बहुत संभल के चलना चाहिए। ये भगवान के आश्रित बाबा जी बनने की सोचना मत। हमें ऐसा लगता है ना कि हम किसी योग के नहीं रहेंगे। चल ही नहीं पाते। किसी भी मार्ग में नहीं नहीं पहले राधा राधा जपो। डट के जपो अंदर फिर आगे बात करना। पहले राधा राधा बाबागिरी बहुत कठिन है। हम कई बार कहा है एकांतिक में कि 50 साल से सही चल रहा है 50 साल से और 5 मिनट गलत हो गया। क्या समाज उसे क्षमा करेगी? सब लोग कहेंगे फ्रॉड है।

नहीं और बेचारा 50 साल जलता रहा। 5 मिनट फिसल गया तो कोई क्षमा नहीं करेगा। इसलिए बाबागिरी बहुत कटिल बात है। बहुत जी मयंक जी कानपुर से श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में दंडवत प्रणाम। महाराज जी आपसे मिलकर लगा कि जग झूठा है और नाम सच्चा है। अब इस झूठी दुनिया में रहते हुए लगता है कि कुछ साथ नहीं जाएगा। जो काम करता था पहले उसमें एक उत्साह नहीं रह गया। सब मिथ्या सा लगता है महाराज जी। सन्यास लेने का उत्साह नहीं है। साहस नहीं है। बीच सा फंस गया हूं महाराज जी।

ले बीच में फसला ले। अब अब और स्ट्रांग मनो कि आपकी रुचि ना होते हुए आपको उस कार्य को करना है कि अपने मन को भक्तिमय करते हुए कार्य करना है कि जैसे हमारा मन नहीं हमारा मन है कि एकांत में बैठो चुपचाप लेकिन हमको सेवा मिली है तो अब ये सेवा हमें करनी पड़ रही है। ऐसे आपको सेवा मान के करनी है। जो आप व्यापार करते हो या जो भी नौकरी करते हो या किसानी करते हो उसे सेवा मान करके कि परिवार रूपी भगवान की सेवा के लिए अर्थ चाहिए इसलिए सेवा कर रहा हूं। मेरी रुचि तो नहीं।

संसार में रुचि ना होना यही भक्ति का लक्षण है। लेकिन उस कार्य को सम्यक करना यह भी भक्ति का लक्षण है। जैसे अर्जुन कह रहे हैं मेरा सन्यास लेने का मन है। युद्ध करने का नहीं। तो भगवान ने कहा सन्यास नहीं युद्ध रूपी कर्तव्य कर्म को करो। इसी से तुम्हारा मंगल होगा। तो जिसको जो कार्य मिला है उसे भगवान की पूजा मान के करो। अंदर अंदर से नाम जप करते रहो तो नाम का एक प्रभाव होता है। वह कहीं आसक्ति नहीं रहने सब ऐसे लगेगा क्या है झूठा है सब जब मरना ही है और एक पैसा साथ नहीं जाना तो हाय हाय करके काहे को मरे वो खूब नाम जप करे तो अंदर अंदर नाम जप करो बाहर से वही कार्य करो जो एक संसारी आदमी करता है तब तो प्रवीणता और सब छोड़कर के बैठ गए तो कायरता कायर नहीं बनना भगवान ने अर्जुन को कायर बनने से मना किया है तुम युद्ध करो इस समय युद्ध रूपी कर्तव्य है तो अब सन्यास लेना तुम्हारी कायर ता होगी कि युद्ध से पीठ करके सन्यास ले लिया तो अपने कर्तव्य कर्म से पीठ मोड़ करके ऐसे बैठ जाना ठीक नहीं है तो इसलिए ना सन्यास लेना है ना कहीं जाना है जो कार्य कर रहे हो वही कार्य भगवान की पूजा मान के करो और खूब नाम जप करो अरुचि होना ये बहुत बढ़िया बात है लेकिन इसको प्रकट नहीं करना हम आपसे मिल रहे हैं हाथ मिला रहे हैं हमारा कोई संबंध नहीं कोई रुचि नहीं लेकिन हम इनको झलकने नहीं दे रहे और आप कैसे हो ऐसा लगा कि मैं खुशी हूं आपसे मिलकर के।

यह हमारा नाटक होना चाहिए। यह जगत रूपी नाटक मंच पर जो हमें रोल मिला है उसमें हमें परफेक्ट उतरना है। भाई के साथ भाई जैसा व्यवहार बहन के साथ बहन दोस्त के साथ दोस्त माता-पिता के साथ वैसा सबके साथ वैसा व्यवहार करते हुए कहीं भी रुचि नहीं। यही भक्ति की कला है। कहीं भी अपनापन नहीं। वो अपनापन गुरुदेव से भगवान से है। लेकिन वो व्यवहार वैसे ही कर रहा है जैसे एक सांसारिक पुरुष करता है। समझ रहे हैं ना आप? जी। राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा इतनो तो कबहु हसी हो इतना तो कबहु हस देो

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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