॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #908 · 13 मई 2025

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री वृंदावन धाम की जय श्री सतगुरुदेव भगवान की जय प्रणव जी पू से राधे-धे महाराज जी महाराज जी क्या श्री जी लाखों भक्तों की एक साथ उठी पुकार को सुनती हैं जब सभी हृदय से एक ही भाव से ही मांगते हैं कि हमारे गुरुदेव उनकी आयु बढ़े उनका शारीरिक कष्ट कम हो तो क्या वो करुण पुकार श्री जी तक पहुंचती है सुनो भरत भावी प्रबल बिलख कहो मुनि हानि लाभ जीवन मरण जस अपजस विधि यह पहले से निश्चित हो चुका है।

उसको नहीं टाला जा सकता। जिस दिन इस शरीर की मृत्यु होनी उस दिन होनी ही है। चाहे 50 करोड़ लोग विनय करो तो पांच सेकंड नहीं बढ़ाया जाएगा। ये अगर बढ़ाया जा सकता आप विचार करके देखिए। तो जिनके पुत्र भगवान श्री राम है उन माता कौशल्या को विधवा क्यों होना पड़ता है? क्या वह अपने पिता दशरथ जी को लेकिन आयु खत्म तो खत्म पक्का सुन लो भगवान ने भी ऐसा तो इसलिए हमें लगता है कि हम जब तक एक दूसरे से मिल रहे हैं तब तक हम इतने बलवान हो जाए अध्यात्म बलवान हो जाए कि हमें किसी और की जरूरत ही ना पड़े और हम अपने अनुभव से इस माया के पथ को पूरा कर लें।

यह जरूरी नहीं है कि हमारा आपका साथ बना ही रहे। यह बिछड़ेगा। यहां का नियम है। यह संसार का नियम है। हम आप एक साथ बराबर नहीं रह सकते। यह शरीर यह शरीर पता नहीं देखो हमको डॉक्टर ने कहा था कि बाबा आप संत हो इसलिए आपका कोई गार्डियन नहीं कि मैं उससे बात कर सकूं। तो आपसे डायरेक्ट बात करता हूं। आप ढाई वर्ष या 5 वर्ष आपकी जिस किडनी की जो हालत है वो आप ढाई वर्ष या पांच आज के 20 वर्ष पहले कहा था ढाई वर्ष या पांच वर्ष और चार पांच डॉक्टर मिलकर के ऐसा स्वामी श्री राम सुखदास जी के संतों ने वो सब व्यवस्था की थी हम तो अकिंचन भिक्षावृत्ति से जीते थे हमारे पास तो एक पैसा भी नहीं था तो उन्होंने कहा कि आप ढाई वर्ष या पांच वर्ष तो मुझे कुछ भय नहीं लगा मुझे लगा कि बहुत कम समय में भगवत प्राप्ति हो जाएगी दो ढाई वर्ष में या पांच वर्ष में भगवान मिल जाएंगे।

ये 20 वर्ष हो गए। यह भगवान के विल को जाना नहीं जा सकता है। अच्छा कई बार ऐसे झटके आते हैं कि हम हम भी इनको बोल देते हैं कि देखो तुम लोग अब सब अपने संभालो कभी भी हमारा शरीर छूट सकता है। ऐसी परिस्थिति आती है और फिर एक दो दिन में तीन दिन में तो हम यह समझते हैं कि आप लोगों की प्रार्थना इन झटकों से हमें बचा रही है। जो पूरे भारतवासियों की प्रेम की भावना है ये गिरे गिरे फिर एकदम बिल्कुल संभल जाते हैं। लेकिन अंतिम तिथि को नहीं टाला जा सकता। जो अंतिम तिथि है उसे नहीं टाला जा सकता।

वो निश्चित है। वह हमारी भी समझ में नहीं है और किसी की समझ में नहीं है। वह जब आएगी तो किसी की प्रार्थना काम नहीं करेगी। उसमें जाना अगर ऐसा होता तो बड़े-बड़े सिद्ध महापुरुष हुए हमारे भारत देश में और लोग प्राणों से भी अधिक प्यार करते थे। वो क्यों जाते? देखो चैतन्य महाप्रभु चले गए। हरिवंश महाप्रभु चले गए। स्वामी हरिदास जी चले गए। नबड़काचार्य वल्लभाचार्य शंकराचार्य बड़े-बड़े महापुरुष आए और अंतर्ध्य हो गए चले गए तो हम सबको भी जाना है जाने की तैयारी कर लो जो पहले से तैयार न थे पछता पछता कर चले गए हम सबको जाना है जाने की तैयारी बस करनी है खूब नाम जप करो पाप कर्म को इसी जन्म में भस्म कर दो नया कोई पाप कर्म ना करो स्वागत होगा भगवान के दरबार में आपका कि आपने मनुष्य जन्म लेकर अपना काम पूरा कर लिया वृचनी शरण जी महाराज जय महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।

महाराज जी पिछले कुछ समय से नाम महिमा का जो आप वर्णन कर रहे हैं कि एक से 13 करोड़ तक की महिमा का वर्णन महाराज जी जो साधक लाडली लाल स्वरूप अपने सदगुरुदेव भगवान की चरण कृपा से उनकी अलौकिक लिफ्ट में बैठ गया है वह इस कोटि गणना में आएगा या नहीं महाराज जी कोई भी स्वास हमारी प्रभु के नाम से विलग ना हो बस हमारा नियम यही है हरिवंश नाम बिरे न छिन श्री हरिवंश सहाय भल हरिवंश भरोसे भय निडर नित गरजत हरिवंश बल भरोसा आचार्य का इष्ट का और निरंतर नाम जप हमें गणना नहीं करनी कि कितने करोड़ हमें जपने हैं।

अब पता नहीं शाम तक जिए कि ना जिए तो करोड़ का संकल्प हमारा कैसे पूरा होगा। अब हम कोई अविनाशी शरीर वाले तो है नहीं। विनाशी शरीर है। अब कब छूट जाए इसलिए हमें हर श्वास नाम जप करनी है। संकल्प तो तब पूरा होने की बात हो जब मुझे पता है मैं कल जिऊंगा। जब पता ही नहीं कि कल तक जिऊंगा कि नहीं जिऊंगा तो क्या संकल्प निरंतर नाम जप करें और प्यारी जू के गोरे चरणारविंद के भरोसे में रहे। उन्हीं की कृपा से होगा। कैसे पापी क्यों ना हो हरिवंश नाम जो ले अलक लड़ती रीझ के महल खवासी दे बोले कैसा भी पापी क्यों ना हो जो श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश ऐसा नाम जप करता है तो प्रिया जो उस पर रीझ करके अपने महल की सहचरी भाव की सेवा प्रदान कर देती खवासी का मतलब है सहचरी भाव दासी भाव की सेवा प्रदान कर देती है तो अपने तो शरणागत जन है अपने संख्या वाले तो है में अपने शरणागत जन है प्रियाजु के भरोसे हैं।

उन्हीं के भरोसे मेरे बल श्री वृंदावन रानी जाह निरंतर सेवत मोहन बन विनोद सुखदानी मेरे बल श्री वृंदावन रानी जिनकी चरण कृपा ते पाई कुंज केली रस सानी जैसी रूप लाल हित हाथ बिकानी तो निधि पाई मनमानी मेरे बल श्री वृंदावन रानी हमारी उपासना में बिक जाना है प्यारी जी के हाथ बिक गए अब जैसे हम अधम नीच पामर जो कुछ बन रहा है वह कर रहे हैं। बकाया हम आपकी शरण में हैं। आपकी कृपा से हमारा मंगल उद्धार या सहचरी भाव से सेवा जो है वह सब आपके चरण कृपा से है। अपने लोगों का भाव ऐसा है।

शिल्पा जी हिमाचल से राधे-राधे। राधे-राधे महाराज जी गुरु जी मन बहुत मलन हो चुका है। कोई खास गुण ना होते हुए भी बहुत जल्दी अहंकार आ जाता है। सहनशीलता बहुत ही कम हो गई है मेरे में। थोड़ी सी प्रतिकूलता आने पे बहुत ज्यादा घबरा जाती है। हां नाम जप करो। नाम जप से सब बल आ जाएगा। करती हूं लेकिन सहन नहीं होता। नहीं अभी करती नहीं हूं। दवा खाए और परहेज से रहे तो दवा ज्यादा काम करती नहीं। गंदे आचरण, गंदी बात, गंदा चिंतन, गंदा व्यवहार ये बंद करो और नाम जप करो।

देखो प्रभाव आता है कि नहीं? नाम जप का। बड़े से बड़ी समस्याओं को शांत भाव से मुस्कुराते हुए सह जाना ये अध्यात्मवान की सामर्थ होती है। संसारी आदमी जिनमें विचलित हो जाता है अध्यात्मवान उनमें गंभीर रहता है। शांत रहता है। प्रसन्न रहता है। और अभी शरीर स्वस्थ है आप लोगों का लेकिन चिंतन हो रहा है दुख आलय संसार का तो आप परेशान हो। सुख की सानिधि में भी परेशान हो। पता नहीं ऐसा ना हो जाए कहीं ऐसा ना हो जाए। कहीं यह ना हो जाए। तो ये ओवरथिंकिंग व्यर्थ की भूत भविष्य का चिंतन क्यों राधा राधा राधा होगा वही प्यारे जो राम जी को भाएगा वही है सोई जो राम रच राखा को कर तर्क बढ़ाव शाखा अस कह जपन लगे हरि नामा राधा राधा राधा राधा क्या चिंता करना अनंत ब्रह्मांडों का पोषण भगवान कर रहे हैं हम उनके दास हैं हम उनकी शरण में वो हमारा भरण पोषण नहीं करेंगे क्या और शरीर बना है पाप और पुण्य से तो सुखदख भोगना ही पड़ेगा।

जैसे हम ना चाहे तो क्या रात नहीं आएगी? आएगी। हम ना चाहे तो दिन आएगा। ऐसे हमारे चाह से नहीं सुखदख आएगा ही आएगा। वो क्रम है। अब हमको लड़ना है। सुख में अभिमान नहीं करना और दुख में हमको व्याकुल नहीं हो जाना। हमको मजबूत रहना है। उसके लिए हमें चाहिए नाम जप। उसके लिए सत्संग चाहिए, शास्त्र स्वाध्याय चाहिए, पवित्र आचरण चाहिए, पवित्र भोजन चाहिए। तब बात आएगी। अहंकार किस बात का? आपने अपने शरीर में क्या बनाया है? आप बताओ आपने अपने ही शरीर में आपका क्या योगदान है?

कुछ नहीं। आप बताइए कि क्या योगदान है? भगवान ने बनाया नहीं। तो ना तो शरीर का अभिमान करना क्योंकि भगवान ने बनाया है। अच्छा अंदर बुद्धि उसमें आपने क्या किया है? कुछ नहीं। जितनी भगवान ने दी उतनी है आपके अंदर। चाहे बुरी बुद्धि हो या अच्छी बुद्धि हो कर्म के अनुसार वैसी है। आप हो क्या? आप कर क्या सकते हो? आपने किया क्या है? किस बात का अभिमान? हमें तो यही समझ में नहीं आता कि जब एक यंत्र में जो चढ़ा हुआ नाच रहा है जैसे कठपुतली है और वह नाच रही और अभिमान करे कि मैं तो बहुत बढ़िया नाच लेती हूं तो बेकार की बात है वो पर्दे के पीछे बैठा हुआ जो अंगुलियों से नचा रहा है वो कलाकार है वो जैसा चाहता है वैसा कठपुतली नाच रहे तो उमा दार जोशित के नाई सब नचावत राम गोसाई चराचर जगत भगवान के नचाए नाच रहा है काहे काहे को व्यर्थ में अभिमान ले कि मैं गुणवान मैं सद्गुण मेरे अंदर ये कुछ नहीं भगवान ने जहां तुम्हें जन्म दिया भगवान ने तुम्हें जो रूप दिया भगवान ने तुम्हें जो गुण दिए वही है तुम्हारे अंदर तो तुम्हारे अभिमान करने की क्या बात है वो तो भगवान की दी हुई बात है नहीं नाम जप करो तो बुद्धि शुद्ध हो जाएगी तो जिससे अभिमान नहीं आएगा खूब नाम जप करो सत्संग सुनते रहो सुखदेव चक्रवर्ती जी राधे राधे महाराज जी राधेधे महाराज जी महाराज जी मन, बुद्धि, चित्त और अहम कौन कहां किस शरीर में विराजमान है?

महाराज जी थोड़ा सा जागृत अवस्था में स्थूल शरीर का परिचय मिलता है। जैसे आप जा रहे हो स्थूल शरीर का परिचय मिलता है। इसमें जो हरकत होती है स्थूल में वह सूक्ष्म से होती है। सूक्ष्म में जो पावर आता है वो कारण से आता है। वह पावर है। जैसे आप पर्दे में जो हरकत होती है वह बालकनी के नीचे से फोकस आता है। फिल्म में जैसे आप देखने जाओ ना तो बालकनी के नीचे से फोकस आता है। वो पर्दे में हरकत पैदा करता है। पर्दे में कुछ नहीं। तो ये पर्दा है। जैसे हमारे यहां चींटी काटी तो अंदर पहले स्फुरणा हुई।

मन में चींटी काट रहे। बुद्धि ने तुरंत निर्णय करके बताया कि गले के पास काट रही है। तो हाथ को हस्त इंद्री कर इंद्री है ना तुरंत मन ने इस इंद्रिय को आदेश किया देखो क्या है वो ऐसे देखने तो जो स्थूल में हरकत करवाता है वो है सूक्ष्म शरीर सूक्ष्म शरीर व्यक्त होता है स्वप्न में स्थूल शरीर व्यक्त होता है जागृत अवस्था में ये जागृत अवस्था है तो स्थूल शरीर है जब आप स्वप्न अवस्था में होते हैं तो स्थूल शरीर का ज्ञान नहीं होता है कि हमारा एक शरीर शरीर और सैया में पड़ा है नहीं ज्ञान होता तो उस समय जो हरकत होती है स्वप्न में वो सूक्ष्म शरीर से होती है उस समय एक मन पूरा बाजार संसार बन जाता है और वो स्वप्न दिखा देता है और जो हमारा सोने के बाद अनुभव होता है कि यार आज मैं बहुत सोया तो तुम तो सो रहे थे अनुभव कौन करवा रहा है कि आज मैं बहुत सोया वही सबका प्रकाशक है वही परम तत्व आत्म तत्व है जो सबका का प्रकाशक है।

तो सूक्ष्म शरीर को आप कैसे देख सकते हो? क्योंकि आप तो स्थूल शरीर बने हुए हो। आपने अपने को पुरुष मान लिया है। आपने अपने को देह मान लिया है। तो केवल इतना अगर साधन करोगे तो इतना अनुभव होने लगेगा कि यह मन है। देखो मन गया। निश्चय करने वाली यह मेरी बुद्धि आज काम नहीं कर रही। मेरा चित्त आज नहीं लग रहा है। यह मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार यह सूक्ष्म शरीर है। इसको कोई यंत्र भी नहीं पकड़ सकते। जैसे अल्ट्रासाउंड है, सिटी स्कैन है, एक्सरा है। ये नहीं पकड़ सकते। इसको ध्यान के द्वारा जाना जाता है।

जब ध्यान में तो तो मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार सब एक एक दिखाई देता है। जब भजन करते हैं तो भजन करो तब जान पाओगे। ऐसे थोड़ी ये बाह्य सूक्ष्म है। आपकी स्थूल दृष्टि तो स्थूल देख सकते हो बाहर अंतर में आओ अंतर में घुसो तब सूक्ष्म में प्रवेश होगा तब सूक्ष्म शरीर को जानोगे जब सूक्ष्म शरीर को जान जाओगे तब कारण शरीर को जानने की योग्यता आ जाएगी और जब स्थूल सूक्ष्म कारण तीनों को अपने से अलग देखोगे तब अपने को देखने की योग्यता आएगी तब आप अपने को जान पाओगे ये ज्ञान है अब ये कोई ऐसे समझ में तो आएगा ना बिना साधना के बिना भजन के समझ में संत महात्मा त्मा जो सच्चाई से चलते हैं रात दिन उसमें लगे रहते हैं

तब उसका अनुभव करते हैं तो हम नाम जप करें इससे कल्याण हो जाएगा हां खूब नाम जप करो बुरे आचरण मत करो जैसे शराब पीना मांस खाना ये सब गंदी बात नहीं करते ना हां पराई बहन बेटियों की तरफ गंदी दृष्टि नहीं ब्याह हो जाए तो ब्याह हो गया हो तो अपनी पत्नी से ही केवल अनुराग किसी से ये पाप कर्म ना करें और नाम जप करे तो भगवान की प्राप्ति हां राधे-राधे नन्नू अंडरवा जी जय गुरुदेव श्री राधे-राधे महाराज जी महाराज जी पिछले दो वर्षों से आपको सुन रहा हूं गुरुदेव आपके एकांतिक वार्तालाप ने मेरी जिंदगी ही बदल दी अब मैं नाम जप भी करता हूं आप जी के आशीर्वाद से गुरुदेव पर पूर्व के पापों मुझे बहुत परेशान कर रहे हैं मैं आग की तरह जल रहा हूं महाराज जी हां बिल्कुल आगे चलना चाहता हूं पर इन अच्छा चल रहे हो तभी जल रहे हो अच्छा चल रहे हो तभी जल रहे ये जो जल रहा है ना ये आप नहीं जल रहे आपका मन जल रहा है उस मन में जो मलिनता है ना वो दूर हो रही है।

तो हृदय जल रहा है। हृदय में ही तो मन है ना। तो जब हृदय जल रहा है तो हमको उस समय साक्षी रहना है। अलग रहना है कि मैं नहीं जल रहा हूं। इस मन ने पाप कर्म किए हैं और नाम जप चल रहा है और सही ढंग से चल रहे हैं तो अब वो निष्पाप हो रहा है। जैसे सोने का मल दूर करना हो ना तो उसे कसौटी पर चढ़ाया जाता है। उसे जलाया जाता है। तो स्वर्ण तपाने पर जैसे अपना मल दूर कर देता है। ऐसे जब हम नाम जप करते हैं, भगवत आराधना करते हैं, तपस्या करते हैं तो मन अशांत होता है। मन जलता है।

उसी जलन में उसके पाप शांत सब नष्ट हो जाते हैं। तब एक दिव्य शांति आती है। तब एक आनंद आता है। पहले थोड़ा जलन होती तो इसे सही चल रहे हो। यह प्रमाण है। तभी तुम्हारे हृदय में जलन हो रही। सह जाओ इस जलन को। आप साथ रहना नाम जप करूंगा। हां बिल्कुल सहित सहित बाढ़े भगत गृह तन गुरु हित गार। गुरु के वचन मानकर चुपचाप सह जाए तो आगे निकल जाएगा। बाढ़ भगत उसके हृदय में भक्ति बढ़ जाएगी। खूब नाम जप करो। सदगुरुदेव भगवान कुछ कभी-कभी रुक जाता है जो जीवा से चलता है हल्का कभी-कभी जी तो एक तो हो चरणों का आशीर्वाद हो निरंतर चल जाए और दूसरी एक छोटी सी कुटिया है काशी में अपनी ऊपर परिवार जन रहते हैं तो नीचे भगवान राधा कृष्ण का विग्रह में स्थापित करके सेवा उनके सदगुरुदेव का आशीर्वाद ले तभी मैं कर सकता हूं।

उसके लिए आदेश खूब प्रिया प्रीतम की सेवा करो और नाम जप को निरंतर चलाने के लिए भोजन पवित्र और अल्पाहार और मौन का आश्रय अधिकतर मौन का आश्रय मतलब हम जड़ मौन नहीं कह रहे कि आवश्यक हुआ बोल दिया लेकिन अधिकतर मौन का आश्रय लें। हां पवित्र भोजन पवित्र आचरण और मौन का आश्रय तो जिभ्या से निरंतर नाम लेने के लिए हमारा मन तैयार हो जाएगा और पहले उपांशु चलता है फिर मानसिक चलता है और जब मानसिक चलने लगता है और कुछ समय तक चलता है और बीच-बीच में रुकने लगता है तो हमको तुरंत उपांश में आ जाना चाहिए।

अगर उपांश में रुकने लगता है तो वाचिक में आ जाना चाहिए। हमको छोड़ना नहीं है। तद विस्मरण परम व्याकुलते नाम छूटते ही हमारे अंदर व्याकुलता पैदा हो जानी चाहिए। अगर नाम चलता रहा तो कोई भी सिद्धि बकाया नहीं जो आ ना जाए और कोई भी सुख बकाया नहीं जो आ ना जाए और भगवान का स्वयं स्वयं भगवान का कृपा प्रसाद आपका वरण कर लेगा। नाम में अपार सामर्थ्य है। जो राम राम नहीं कह पाते थे वो जब मरा मरा बोले तो ब्रह्म ऋषि हो गए और भगवान के पावन चरित्र इतिहास को लिख दिया तो आप विचार करो नाम में कितनी अपार सामर्थ्य है।

जिसने बालक के निमित्त से नारायण पुकारा उसका परम कल्याण हो गया तो हम नारायण नारायण पुकारेंगे तो हमारा कल्याण क्यों नहीं हो जाएगा? खूब मंगल हो जाए। खूब नाम जप करो और प्रिया प्रीतम की आराधना करो। कभी-कभी मन में आ जाता है कि जैसे यह सब चीजें हम बनाए हैं तो अपने वर्तने के लिए हमारे प्रभु का ये संसार तात्पर्य क्या है उनका भगवान भ्रम जैसे शीशे के महल में आप खड़े हो जाओ और शीशे कई प्रकार के होते हैं। एक बड़ा रूप दिखाने वाला, एक छोटा रूप दिखाने वाला, एक भयंकर रूप दिखाने वाला।

ऐसे त्रिगुण माया के शीशे में वह परमात्म तत्व अपने आप को बहुत रूपों में देख एको हम बहु श्यामा। मैं एक बहुत रूपों में हो जाऊं और बहुत रूपों में होकर अपने आप से अपने आप का सृजन कर रहा है। अपने आप से अपने आप का पालन कर रहा है। और अपने आप से अपने आप का संहार कर रहा है। कोई दूसरा नहीं है। एक परमात्मा के सिवा वो अपने आप से अपने आप में खेल रहा है। यहां मैं तू का खेल नहीं हो रहा। यहां अपने आप से अपने आप का खेल हो रहा है। जो ये देख ले वो मुक्त हो गया। जो ना मैं तू देखे वो फंस गया।

जो मैं और तू देखे वो फंस गया। या जो मैं ही मैं देखे तो मुक्त हो गया या तू ही तू देखे तो मुक्त हो गया। मैं ही मैं ब्रह्म मैं अहम ब्रह्मास्म और तू ही तू सब में रमा हुआ है। तो भक्त तू ही तू देखता है। ज्ञानी मैं ही मैं देखता है और फंसा हुआ मैं तू देखता है। मैं और मोर तोरते माया एक ही परम तत्व है। दूसरा नहीं। वो अपने आप से अपने आप में खेल रहा है। कुछ नहीं है। ये सब उमा कहूं मैं अनुभव अपना। सत हरि भजन जगत सब सुदास सिंह जी राधे-धे श्री हरिदास महाराज जी महाराज जी साधन साध्य है या कृपा साध्य है क्या ठाकुर जी को हां कृपा साध्य है पर हमारा प्रयत्न पूरा होना चाहिए हमारा उद्योग हमारा पुरुषार्थ पूरा होना चाहिए होगा तो कृपा से पर अगर हमारा प्रयत्न नहीं है तो फिर भगवान कृपा कृपा से सबको भगवत प्राप्ति क्यों नहीं करा देते?

समम प्रिय समम उपजाय भगवान के सब प्यारे हैं। लेकिन भगवत प्राप्ति उसी को होती है जो प्रयत्नशील होकर साधन पक्ष को पुष्ट करता हुआ भजन करता है और आश्रय रखता है कृपा का उसको भगवत प्राप्ति हो जाती है। जो साधन में बेईमानी करे साधन ना करे कायरता से वैसे जीवन प्रवाह और कृपा से हो जाएगा कभी नहीं होगा क्योंकि सब जन तो भगवान के ही है ना तो भगवान की कृपा का अधिकारी वही होता है जो मन वचन कर्म से प्रयत्न करता है भगवत प्राप्ति के लिए नाम जप करना भगवन नाम कीर्तन करना भगवत कथा सुनना भगवत सेवा करना तो उसके हृदय में जो भाव उत्पन्न होता है उसी भाव से भगवत प्राप्ति होगी बिना साधन के भाव कैसे आ जाएगा इनके अंदर भाव नहीं आया इनके अंदर भाव नहीं आया और एक साधन कर

रहा है उसके अंदर भाव आ गया तो साधन पक्ष से भगवत प्राप्ति नहीं होती यह हम बात मान सकते हैं लेकिन साधन पक्ष से ही भगवत कृपा का अनुभव होता है अगर साधन नहीं जो जितनी कोटि का साधन करता है उतने उच्च कोटि का महात्मा होता है आप विचार करके देखना पर अभिमान रहित होने के लिए हम कृपा का आश्रय लेते हैं कि कहीं हमें साधना का अभिमान ना हो जाए तो यह कि भगवत प्राप्ति कृपा से होती है यह साधन उस कृपा तक पहुंचने के लिए यह साधना भगवान की कृपा से ही हो रही है और यही कृपा का अनुभव कराएगी और यही भगवत साक्षात्कार कराएगी।

इस भाव से हम कृपा प्रधान रखते हैं कि हमारे अंदर अहंकार ना आ जाए। नहीं बिना साधना के आज तक किसी को भगवत प्राप्ति कहां हुई है? साधन पक्ष तो लेना ही पड़ता है। बिना साधन पक्ष के बिना भजन के बिना संयम नियम के बिना आराधना के किसको भगवत प्राप्ति हो गई है? जितने भी संत महात्मा ऋषि मुनि जो भी रसिक जन हुए सब ने आराधना की साधना की तभी भगवान को प्राप्त जिसकी उच्च कोटि की जितनी साधना रही उतने उच्च कोटि का वो संत हुआ है तो खूब आराधना करना है पर आश्रय कृपा का रखना है ये भगवान की कृपा से ही ये आराधना हो रही है राधे राधे महाराज जी महाराज जी निवेदन है कि एक समाधान कीजिए महाराज जी इस आध्यात्मिक जीवन और सांसारिक जीवन में मानसिक संतुलन नहीं बना पा रहे हैं क्या मानसिक संतुलन डिप्रेशन है या कोई साया महाराज जी मानसिक संतुलन कोई साया पाया नहीं है।

जैसे लोगों को रहता है ना कि बाहरी चक्कर कोई होगा ये सब भीतरी चक्कर हमारे द्वारा जो पाप कर्म होते हैं वही हमारे मन को जलाते हैं। वही हमारी बुद्धि को भ्रष्ट कर देते हैं। और कोई नहीं। जैसे भूत प्रेत भी आता है ना किसी के दिमाग में तो पाप कर्म के कारण ही आता है। हमारे पाप कर्म को भुगताने के लिए भूत का आवेश होता है और वो हमें दुख देता है और जब हमारा पाप कर्म क्षय हो जाता है तो या तो कोई झाड़ने फूंकने वाला मिल गया या स्वयं चला जाता है। तो कर्म ही हमारे लिए भूत है और कर्म ही हमारे लिए भगवान है।

अगर हमारे कर्म बिगड़ गए तो वही भूत की तरह हमें सताता है और कर्म हमारे बन गए तो वही भगवान की तरह हम पर कृपा करता है। इसलिए कर्मों का सुधार करो। हमारे कर्म ठीक होने हमारे अगर कर्म बिगड़ गए हैं ना तो ऐसा ही अनुभव होने लगता है। कोई डिप्रेशन नहीं। पहले स्वीकृति करो। नहीं तो अगर किसी आदमी को 20 बार 20 लोगों को तैयार कर लो अलग-अलग और उसको यार तुम डिप्रेशन में पहुंच गए क्या? नहीं नहीं तो। हमें तो लग रहा है तुम डिप्रेशन में हो और चला जाए। दूसरा आवे यार तुम डिप्रेशन में पहुंच गए क्या?

और 20ों कहे अगर वो अस्पताल ना पहुंच जाए तो हमसे बात कर लो। वो अस्पताल जाएगा और चेक करवाएगा कि मैं डिप्रेशन में हूं क्या? क्योंकि 20 लोगों ने कहा है। तो हम पहले कह रहे हैं कि ये स्वीकृति करो कि मैं डिप्रेशन में नहीं हूं। ये स्वीकृति करो कि मेरे ऊपर भूत प्रेत का कोई साया नहीं। स्वीकृति से ही फंस गए हो। मेरे ऊपर भगवान की बड़ी कृपा है और नाम जप करो। गंदे आचरण मत करो। आज हमारी समाज गंदे आचरणों को पाप मान ही नहीं रही है। बहुत जोर से यह व्यभचार फैल रहा है।

ये जो व्यभचार दोष है बहुत जोर से फैल रहा है। चाहे स्त्री हो चाहे पुरुष हो सबके दिमाग में एक ही बात नाच रही है। बस भोग भोग भोग संसार ये पाप महापाप है। पर स्त्री गमन पर पुरुष गमन ये महापाप है और कोई इस पर ध्यान नहीं दे रहा और फिर कहते हैं डिप्रेशन में जा रहे हैं। परेशान हो रहे हो तो परेशान नहीं होंगे तो और क्या हो गया हम खुली बात कह रहे हैं अपने चरित्र को सुधारो अपने आचरणों को सुधारो अपने कर्म को ठीक करो नाम जप करो किसी से आशीर्वाद मांगने की जरूरत नहीं और कोई आशीर्वाद ऐसे फल फूल वाला भले दे दे ऐसा आशीर्वाद बिना अधिकार के नहीं मिल जाता तुम्हें भजन करना पड़ेगा तुम्हें अपने आचरण ठीक करने पड़ेंगे तुम्हें तप करना पड़ेगा तुम्हें पाप नष्ट करने पड़ेंगे उपाय हम बता देते हैं भगवान भगवान गीता में अर्जुन को क्या कह तुम्हें सहना पड़ेगा तुम्हें मेरा भजन मन मना भव मद भक्तो माध्या जी मा नमस् भगवान सामने खड़े हैं और कह रहे जब तक तुम ऐसा नहीं करोगे तब तक मेरे को नहीं जान सकते सामने खड़े हैं महाराज अनन्य चेताम मेरा सतत चिंतन करो अनन्य चिंतनो माम मेरा अनन्य चिंतन करो भगवान बार-बार कह रहे हैं तो जब भगवान कह रहे हैं तो हम लोग तो भगवान के दास हैं सदगुरुदेव भगवान बड़ी कृपा जोरदार है विपक्ष बहुत जोरदार विपक्ष तो जोरदार क्योंकि हमारे स्वामी का ही है।

किसी और का है क्या? हमारे स्वामी तो सोचो जिसकी एक माया शक्ति इतनी जोर की है उसकी कृपा शक्ति कितनी जोर की होगी? प्रभु पहले वो कहते थे अब आप अरे ऐसे ऐसे ऐसे थोड़ी कब बोला जाता है जैसे तुम मंत्र बोल दिए। मंत्र ही नहीं मिला तुम्हें। तभी तो दुर्दशा है। अब कभी मत बोलना। अब आप बता दो वही करेंगे। हम तो रोज चिल्लाते ही रहते हैं। हम एक बात बताते हैं दिल भर लगे ही तो रहते हैं। इसी में लगे रहते हैं कि भाई सुधरो भाई सुधरो मंगल हो तुम्हारा। राधा राधा जपो राम नाम जपो कृष्ण कृष्ण जपो हरि हरि जपो जो मन आवे सो जपो लेकिन जपो और आचरण पवित्र रखो।

खानपान पवित्र रखो। बढ़िया आनंद आ जाएगा। जी अनिरुद्ध जी गांधीनगर राधे राधे-राधे महाराज जी गुरु जी मेरा प्रश्न है कि जीवन का उद्देश्य सत्कर्म और राधा नाम के अलावा क्या हो सकता है बस यही है यह हुआ करना अभी बकाया है ना करना ना करने वाले को सुधार लो करने में यही दो ही ले लो इसी से भगवत प्राप्ति हो जाएगी परा स्त्री की तरफ गंदी दृष्टि से मत देखो अपनी स्त्री में ही भाव रखो ब्रह्मचर्य का पालन करो पवित्र भोजन पाओ मांस मत शरीर ये सब गंदी चीजें मत पाओ। गंदे आचरण मत करो और इतना उद्देश्य बना लो भगवत प्राप्ति हो जाएगी।

भगवान अपने हैं। कोई पराए थोड़ी है। हम भगवान के अंश हैं। वो कोई दूसरे थोड़ी भगवान दूसरे ये शरीर दूसरा है। ये जो आप शरीर देख रहे हो यह दूसरा है। भगवान अपने हैं। बहुत अपने हैं। बहुत अपने नजदीक है। मैं उनका अंश हूं। मैं उनका हूं। संसार का थोड़ी हूं। पर संसार का राग होने के कारण भगवान पराए लगते हैं और शरीर अपना लगता है। इसलिए खूब नाम जप करो। गंदे आचरणों से बचो। बहुत गंदगी फैल रही। बहुत समाज में गंदगी फैल रही है। बहुत पाखंड फैल रहा है। नौटंकी फैल रही है।

हम सत्य का प्रदर्शन कर रहे हैं। असत्य में जी रहे हैं। सत्य का प्रवचन कर रहे हैं। असत्य आचरण कर रहे हैं। अपने मतलब ऐसी स्थितियां बदलती चली जा रही हैं कि सत्य का रोल कर रहे हैं और असत्य में फंसे हुए हैं। इसलिए आचरण सुधारो। सबसे पहली हमारी बात है आचरण सुधारो और नाम जप करो तो तुम्हारा मंगल हो जाए। आचरण अगर बिगड़े हुए हैं और नाम जप कर रहे हो थोड़ा बड़ा तो भी मंगल नहीं होगा क्योंकि चलनी में गैया दुहे और दोष द को दे अब अगर चलनी में गाय धोगे तो तुम्हें बूंद पीने को नहीं मिलेगा तो गाय धोना है नाम जप करना और चलनी है आचरणहीन होना हम कह रहे हैं रावण में क्या कमी थी क्या वो भगवान शिव की आराधना नहीं करता था कि वो विद्वान नहीं था वो ब्रह्म ऋषि कुल में जन्मा था सब थे पर आचरण हीन था।

आचरण चरित्र उसका बिगड़ गया। इसलिए उसे राक्षस कहा गया। नहीं पुलस्त जी का नाती है। उत्तम कुल पुलस्त कर नाती। ब्रह्म ऋषि पुलस्त जी का नाती है। कोई साधारण थोड़ी रावण और विद्वान तो पूछो मत। आज भी जहां अभिषेक होता होगा तो उसके तांडव का गाल किया जाता। जटावी गलत जल प्रवाह पावित लेकिन चरित्र बिगड़ गया। चरित्र बिगड़ गया तो सब बेकार हो गया। वही शंकर जी हनुमान जी बन जा के पहले लंका का नाश किया। पहली लंका जो जलाई तो हनुमान जी ने तो जलाई। तो हनुमान जी कौन? शंकर जी ही तो हैं।

11व रुद्र का अवतार भगवान हनुमान जी हैं। हनुमान जी साक्षात भगवान शंकर हैं। तो जिनकी आराधना की वही पहले जाकर आग लगा दिए। वही जिसका चरित्रहीन है तो इष्ट भी रक्षा नहीं करता। चरित्रवान हो और नाम जप करे तो बढ़िया मंगल हो। इसलिए हम सबसे प्रार्थना करते हैं पाप आचरण छोड़ो गंदा भोजन छोड़ो नाम जप करो तुम्हारा मंगल होगा अरे विराट कोहली और नमस्कार विराज बैठ प्रसन्न हो जय कहानी ठीक ही रहना चाहिए हम आपको अपने प्रभु का विधान बना बताते हैं थोड़ा सा जब प्रभु किसी पर कृपा कृपा करते हैं।

यह वैभव मिलना कृपा नहीं है। यह पुण्य है। पुण्य से एक घोर पापी को भी बहुत देखो पाप करके भी उनका कोई पुण्य है जिससे वो सुकृत पूर्व के सुकृत वश चल रहे हैं। नया पापी है। ये वैभव बढ़ना या यश बढ़ना यह भगवान की कृपा नहीं मानी जाती। भगवान की कृपा मानी जाती है। अंदर का चिंतन बदलना। जिससे आपके अनंत जन्मों के संस्कार भस्म होकर और अगला जो है बड़ा उत्तम होगा। अंदर के चिंतन से होता है। बाहर से कुछ नहीं होता। मात्र अंदर का चिंतन। अच्छा अंदर का चिंतन हम लोगों का स्वभाव बन गया।

बहिर्मुखी बहिर्मुखी का मतलब बाहर बाहर यश, कीर्ति, लाभ, विजय इससे हमको सुख मिलता है। अंदर से कोई मतलब नहीं रखता कोई। कोई विरला ही अंदर से अब क्या होता है? भगवान जब कृपा करते हैं तो संत समागम देते हैं। फिर दूसरी जब कृपा होती है तो विपरीतता देते हैं और फिर अंदर से एक रास्ता देते हैं। यह मेरा रास्ता है। यह परम शांति का रास्ता है। यह शांति का रास्ता नहीं। भगवान वो रास्ता देते हैं और जीव को अपने पास बुला लेते हैं। बिना प्रतिकूलता के संसार का राग नष्ट नहीं होता।

किसी को भी वैराग्य होता है तो संसार की प्रतिकूलता देखकर वैराग्य होता है। सब कुछ हमारे अनुकूल है तो हम आनंदित होकर उसका भोग करते हैं। जब हमारे ऊपर प्रतिकूलता आती है तब ठेस पहुंचती है कि इतना झूठा संसार तो अंदर से भगवान रास्ता देते हैं। यह सही है। भगवान बिना प्रतिकूलता के इस संसार को छुड़ाने का कोई भी औषधि नहीं रखी। आज तक जितने बड़े महापुरुष हुए हैं जिनका जीवन बदला है उनको प्रतिकूलता का दर्शन करके बदला है। तो कभी प्रतिकूलता आए तो उस समय आनंदित हूं कि मेरे ऊपर अब भगवान की कृपा हो रही है कि मुझे सतमार्ग में चलने की प्रेरणा मिल रही है।

अगर सतमार्ग छूटा ये सब तो एक सेकंड के लिए आप विचार कीजिए। अब अपना सुधार कर लो। अपने जीवन को सत्य में ले आओ तो अगला जो होगा वह बहुत जोर का होगा चाहे जन्म हो तो श्रीवान कुलवान धनवान वैभव संपन्न ऐसे और भक्ति की अनुकूलता भक्ति की अनुकूलता खास बात श्रीवान धनवान कुलवान नहीं खास बात भक्ति की अनुकूलता अगर इस जन्म में भगवत प्राप्ति नहीं हुई तो भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि मेरे भक्त का नाश नहीं होता मैं कुलवान धनवान श्रीवानों के कुल में जन्म देता हूं और फिर पुनः भक्ति का माहौल देता हूं और पूर्व का जो भजन छूटा हुआ वहीं से उसको अब बिल्कुल ऐसे ही रहो जैसे रह रहे हो बिल्कुल सांसारिक बन के रहो लेकिन अंदर का चिंतन आपका बदल जाए अंदर के चिंतन में आपके यश की भावना ना रह जाए अंदर के चिंतन में आपको धन बढ़ाने की भावना ना रह जाए अंदर का चिंतन हो जाए प्रभु बहुत जन्म व्यतीत हो गए अब एक बार आपसे मिलना चाहती हूं एक बार आपसे मिलना चाहते हैं प्रभु मुझे आप चाहिए अब संसार नहीं तो बात बन जाएगी तो बात बन जाएगी तो इसलिए पहले आनंद पूर्वक भगवान का नाम जप करो।

बिल्कुल चिंता मत करो। बाबा क्या नाम जप से हो जाएगा? पूरा ये हम अपने जीवन का अनुभव बताते हैं। सांख्य योग और अष्टांग योग और कर्म योग और भक्ति योग चारों युगों में प्रवेश रहा है। पहले हम सन्यासी रहे हैं। 20 वर्ष 20 वर्ष सन्यासी रहे काशी विश्वनाथ जी। तो हम सांख्य योग, अष्टांग योग जो अष्टांग योग है ना अष्टांग योग, कर्म योग इन तीनों को अच्छी प्रकार जान के और फिर भक्ति योग में आए हैं। स्वयं भगवान शंकर से बढ़कर कोई ज्ञानी तो नहीं ना। सनकाद से बढ़कर कोई ज्ञानी नहीं वो हरि शरणम हरि शरणम सनकाद हर समय जपते रहते हैं भगवान शिव राम राम राम राम राम राम जपते रहते हैं हम वृंदावन वासी प्रिया प्रीतम के उपासी तो जो राम में राह है वही राह है और जो धा है ये रस देने वाली वस्तु है तो हम राधा राधा राधा राधा मतलब आप ये समझो कि हमारी इतनी तार्किक बुद्धि नहीं हमारी श्रद्धालु बुद्धि नहीं रही सन्यासी की जो बुद्धि होती है वो तर्क प्रधान होती है कसौटी पर कसने पर तो हम केवल भावुकता में राधा राधा का प्रचार नहीं कह रहे कि हमने सुना और ऐसे ग्रंथों में पढ़ा ऐसे कह रहे स्वयं स्वाद ले कह रहे और विश्वास के साथ कह रहे हैं कि यदि आप राधा राधा जपते हो तो इसी जन्म में भगवत प्राप्ति हो जाएगी इसी जन्म में जैसे किसी से कहा जाए कि तुम सत्य बोलो मंदिर में चढ़ के बोलो तो हम मंदिर में नहीं हम वृंदावन में बैठे हैं करोड़ों मंदिर इसकी समानता नहीं कर सकते भगवान का परमधाम है अगर राधा राधा नाम चल रहा है तो इसी जन्म में भगवत प्राप्ति हो जाएगी।

हमारी आखिरी श्वास यदि राधा तो मुझे श्री जी की प्राप्ति भगवान की प्राप्ति हो जाएगी। इसमें कोई संशय नहीं और किसी साधनों की कोई आवश्यकता नहीं। आप केवल अंदर ही अंदर चलाइए और लिखिए। देखो हम जो कह रहे हैं उसको समझो। बहुत अधिक नाम जपने की हमें चेष्टा नहीं करनी। कम संख्या हो लेकिन मन लगा के हो। जैसे हम अब देखो आप लिखो राधा अपने दिमाग में लिखो खुले नेत्र लिखो या बाहर बाहर देखो दिखाई दे रहा है राधा लिखा हुआ वही कान में सुनो राधा वही अंदर उठाओ राधा ये तीनों का एकाकार हो जाए तो ये करोड़ों नाम जप के बराबर है देखो जैसे हम बोला राधा ऐसे हम 1000 राधा नाम बोले तो हम बोला राधा ये उपांशु है इसे उपांशु कहते राधा राधा राधा राधा 1000 बार यह उपांश हुआ अब ये ऐसे उपांश हम 10,000 बार जप करें अंदर देखते हुए बोले राधा उपांशु 10,000 बार नाम जप करने का फल एक बार मानसिक में है।

इतना बड़ा फल है ये ऐसे राधा राधा राधा चल रहा है। नेत्रों से हम उसे देख रहे हैं, कानों से उसे सुन रहे हैं। आप देखना कि अगर मन भागेगा तो आप लिख नहीं पाओगे राधा नाम। अगर लिख रहे हो तो मन भागेगा नहीं। तो चाहे 10 बार लिखो 100 बार लिखो। लेकिन एक अभ्यास बनाओ ऐसा कि कुछ समय शांति से स्नान आदि करके बैठ गए और राधा राधा लिख रहे हैं। उसी का चिंतन कर रहे हैं। इसे अपना जीवन बना लो। फिर आप परिणाम में खुद देख लेना। कोई घाटे का सौदा तो है नहीं। ठीक है? ये सखी को दे दे ठाकुर शिव जी की है खूब आनंदित रहो नाम जप करते रहो प्रशं जानवी जी नई दिल्ली से राधे राधे राधेधे महाराज जी महाराज जी आपके अनुसार सच्ची खुशी क्या है?

क्या खुशी एक मंजिल है या यात्रा में प्राप्त किया जाने वाला लक्ष्य है? बंधन मुक्त हो जाना किसका है? बंधन मुक्त कोई बंधन ना रहना, कोई इच्छा ना रहना वो खुशी होती है जिसमें कोई बंधन नहीं और कोई चाहत नहीं। हमारी सारी चाहते पूर्ण हो गई। अब हमारे अंदर कोई चाहत नहीं और हमारा कोई बंधन नहीं। मृत्यु का भी भय नहीं। यह सबसे बड़ी खुशी है। जीत गए। हम माया पर जीत गए। मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर इन पर विजय प्राप्त कर ली। और चाहा पर अब कोई चाह नहीं।

किसी का हमारे ऊपर कोई प्रभाव नहीं। मृत्यु का भी कोई भय नहीं। इससे बढ़कर कोई खुशी हो सकती है। हर खुशी का नाश करने के लिए मृत्यु तैयार है। आप चाहे जितना पढ़े लिखे हो, चाहे जितने बड़े पदाधिकारी हो, चाहे जितने करोड़ बैंक में हो, चाहे जितना सुंदर पति मिला हो, चाहे जितना सुंदर परिवार मिला हो, लेकिन एक क्षण में वो सब कुछ आपका छुड़ा देगी। हर खुशी में आग लगा देगी। तो अभी खुशी नहीं मिली। जब आग लगाने वाले में हम आग लगा दें। मृत्यु को भी हम ऐसे परास्त कर दें कि अब हमें भय नहीं रहा।

ऐसे स्थान पर जाए हम जहां मृत्यु का भी प्रभाव नहीं पड़ता। वो कौन सा स्थान है? त्रिभुवन में कोई स्थान नहीं। ब्रह्मलोक में भी काल का प्रभाव है। कालातीत भगवान का आश्रय है। भगवान के चरणारविंद है। जब हम प्रभु का नाम जप करते हैं, प्रियाजु का नाम जप करते हैं और अपने मन को प्रभु में दे देते हैं और मन भगवदाकार हो जाता है तो कोई चाह नहीं रहती। ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा न सोचति न काक्षति ना कोई शोक है ना कोई चाह है प्रसन्न आत्मा अखंड खुशी अखंड आनंद वो प्राप्त होता है अगर भगवान से नहीं तो कौन सी खुशी है हमें बता दे कोई भरोसा सेकंड का नहीं बहुत सुंदर साथी मिला लेकिन मिनट में मर सकता है बहुत सुंदर शरीर है लेकिन कल कोई भयंकर रोग हो सकता है कौन सी चीज ऐसी है जो भय चिंता शोक रहित है एकमात्र भगवान का नाम भगवान का आश्रय भगवान की शरणागति जब ऐसा हमें दूल्हा मिल गया श्री कृष्ण जब ऐसा दोस्त मिल

गया श्री कृष्ण क्योंकि अनंत ब्रह्मांडों का स्वामी तब जो अपार खुशी होती है सोचो कोई यहां का अधिकारी हो बड़ा अधिकारी हो और वो आपसे हाथ मिलावे और कहे कि कभी कोई समस्या हो फिर आपको कैसा लगेगा एक छाती फूली घूमेगी एक आनंद लगेगा नहीं और भगवान हमारे कह रहे अनन्य चिंतो माम ये जना परपासते ते नित्या नाम योगक्षेमम वाम्यम जो निरंतर मेरा भजन करता है उसके योगक्षेम का वाहन मैं करता हूं जब भगवान छाती ठोक रहे हैं तो भक्त की छाती कैसी होनी चाहिए लेकिन हमें भगवान के

पर विश्वास नहीं एक नेता कोई कह दे पदाधिकारी कह दे कि वो चाहे झूठी बात ही कह दे कि आप चिंता ना करो तो तो आपको क्या फूलन रहेगी? हर समय रहेगी कि यार वो हमारे अमुक है और भगवान कह रहे हैं तो भगवान की बात की फूलन नहीं हो रही। जबकि नेताजी यहां नहीं है। वो सर्वत्र नहीं है। वो किसी एक स्थान पर होंगे और वो सर्वज्ञ नहीं है। और वो सर्व सामर्थ्यशाली नहीं और मेरे भगवान सर्वज्ञ है। सब कुछ जानते हैं। सर्वत्र हैं। सब जगह है तो यहां भी है। सब समय है तो इस समय भी है।

सबके हैं तो मेरे भी हैं। सब में है तो मेरे में भी है। ऐसा सर्वज्ञ सर्वत्र विराजमान सर्व सामर्थ्यशाली प्रभु को जब तक हम अपना नहीं मानेंगे तब तक हमारी खुशी स्थाई नहीं रहेगी। समझ पा रहे हैं आप? गिरिराज महाराज की जय हो। आओ आओ। अब तो मैया को ले आया हूं मैं संग में। बहुत सुंदर बहुत सुंदर। लाओ चुनरी जो नजर उतारे करो बाबा मैं जाऊंगा बाबा तो काम से धर ले मैं जरूर आ जाऊंगी बाबा के बहुत कृपा बहुत कृपा करो बाबा कृपा घबराओ मत तो तुम ऐसे ही जाते बढ़िया तुम्हारे वो बिल्कुल वो मत करियो बाबा खूब तुम्हारी बढ़िया रहेंगे बाबा टेंशन वाली बात ना बिल्कुल टेंशन मत हमारी श्री जी की सखी है ब्रजवासी मां-बाप के विरुद्ध नहीं जाना चाहता।

तीन साल से प्रेम संबंध में है। मां-बाप के विरुद्ध नहीं जानता। क्या करें? एक बार आपके भगवान मार्ग पे है। अब इसमें बड़ी समस्या यह है कि मां-बाप को राजी करना अनिवार्य है क्योंकि उनका अधिकार है। देखो सर्वोपरि अधिकार मां-बाप का है। तो हम यह चाहेंगे कि अपनी प्रेमिका को इतना समझा दो कि मैं मां-बाप को नहीं छोड़ सकता। अगर आप हमें छोड़ सकती हो तो छोड़ दीजिए। पर मैं मां-बाप को नहीं छोड़ सकता। अगर आप धर्म को थोड़ा भी ध्यान दीजिए तो मां-बाप का त्याग। अपनी अपनी वासना की पूर्ति ही प्रेमिका है।

आज का प्रेम जो है वो प्रेम नहीं है जो आप समझ रहे हो। देह को लेकर प्रेम है और देह ये माता-पिता की है। और माता-पिता को हम इस देह के प्रेम के लिए छोड़ दें तो मुझे लगता है कि थोड़ा आप विचार कीजिए। प्रेमिका को हाथ जोड़कर मनाइए या अगर आप हमारे माता-पिता के विरुद्ध हैं तो फिर हम आपको स्वीकार नहीं कर सकते। राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा हम्म

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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