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क्या साधु को दूसरों के लिए पूजा-अनुष्ठान करना चाहिए ?

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

आशुतोष स्वरूप जी कैलाश आश्रम ऋषिकेश से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी क्या साधु को दूसरों के लिए पूजा पाठ अनुष्ठान करने चाहिए साधु जिसकी दृष्टि में दूसरा कोई है ही नहीं बहु नाम जन्म नावंते ज्ञानवान माम प्रपद्यते वासुदेवासा महात्मास दुर्लभा जब तक जड़ चेतन जग जीव जत सकल कल राम में जान यह अनुभव नहीं हुआ तब तक हमें और कोई कार्य नहीं करना। पहले यही कार्य करना है। पहले अपने को जीवन मुक्त करना है। जब जीवन मुक्त हो गया तो सर्वत्र भगवान पर क्या अनुष्ठान करना?

किसके लिए अनुष्ठान करना? कोई दूसरा है ही नहीं। एक परमात्मा मात्र है। तो ये तो उपरोहित कर्म हो जाएगा। साधुता थोड़ी है। यह तो उपरोहित कर्म हो जाएगा। भक्तों के अनुष्ठान कराना पूजा पाठ फल रुपया पैसा लेना वो पुरोहित कर्म है वो कोई साधुता नहीं साधुता में उदर पोषण के लिए माधुकरी वृत्ति आकाश वृत्ति ऐसे वृत्तियां अजगर वृत्ति ऐसी पवित्र वृत्तियां धारण की गई है प्र लोग जैसे हैं कि जो प्रभु दे दे उसी से पालन होता है ना मांगना है ना कहीं दान पेटी है ना कहीं कोई फीस है भगवान जो हमें दे देंगे उसी से हमारा बरंगपुर खूब चल रहा है या माधुरी वृत्ति चार पांच घर मांग ली साधु को किसी को भय दिखा के या किसी अनुष्ठान करा के या कोई कार्य करके ये भरण पोषण करना साधु की वृत्त नहीं है ये तो सब पाखंड है महाराज जी वो अगर पंडित से ही हुआ अगर जैसे पंडित कुल से ही हो तभी भी नहीं कर सकता क्यों साधु साधु को कुल से क्या लेना देना है?

साधु एक अलग वस्तु हो गए। जाति पात कुल कर्म धर्म व्रत संस्कृति हेतु अविद्या नासी साधु को ये नहीं कहा जा सकता। साधु तो सिर्फ साधु है। साधु कुल वाला नहीं रह गया है। साधु तो भगवान का स्वरूप हो चुका है। वो अचित कुलत्री हो गया। वो भगवान का स्वरूप हो गया। बहुत सारे साधु महाराज जी ऐसा करते हैं तो अनुचित है। हां अनुचित है। अपने को नहीं करना चाहिए। दूसरे जो कुछ करें भगवान जाने हम उनकी निंदा नहीं करेंगे। हां साधु के लिए उचित मतलब अगर प्रश्न हुआ तो उत्तर है साधु के लिए अनुचित है।

यह धर्म युक्त नहीं है। यह उसकी मर्यादा से विलग है। तस्मा शास्त्रम प्रमाणम ते कार्या कार्य व्यवस्थितो साधु के उदर पोषण के लिए यह जो वृत्तियां रखी गई है उन्हीं से अपना भरण पोषण करें। शास्त्र विपरीत भरण पोषण ना करें। साहब अब आपके पास वस्त्र नहीं है। किसी ने देखा दे दिया तो लपेट लिया। नहीं है तो दिगंबर घूम रहे हैं। हमने तो अपने आप को भगवान को दे दिया है। अगर वो वस्त्र मिल रहा है। हम किसी से वस्त्र मांगेंगे थोड़ी। वस्त्र दे दिया तो लपेट लिया। नहीं दिया तो दिगंबर घूम रहे हैं।

भगवान दे ही देते हैं। ऐसी व्यवस्था कर ही देते हैं। तो जो व्यवस्था अब जैसे किसी व्यक्ति ने आपको ₹500 दिए तो आपको व्यक्ति से कोई परिचय नहीं पूछना। कोई मतलब नहीं रखना। अगर जरूरत है तो ₹500 ले लिया। भगवान ने दे दिया। अब उस व्यक्ति को धन्यवाद नहीं भूलना। उस व्यक्ति का चेहरा नहीं देखना कि दोबारा मिले तो फिर हम उससे नए निरपेक्ष वृत्ति रखनी चाहिए। निरपेक्षम मुनिम शांतम निर्र्वैरम सम दर्शनम अनुजाम्यम नित्यम पूतंग भी जो निरपेक्ष है किसी की अपेक्षा नहीं रखता।

जो मननशील है, जो निर्वैर है, जो शांत है, जो समदर्शी है, वही साधु है। उसी के चरण रज के लिए भगवान कह रहे अनुब्रजाभम नित्यम पुतण भी तो साधुता एक बहुत सिंघवत है। चाह मिटी चिंता मिटी मनवा बेपरवाह। किसी के अनुष्ठान कराने की जरूरत थोड़ी है। वो देख ले तो पवित्र कर दे समाज को। उसके शरीर से वायु निकलकर दूसरे शरीर को स्पर्श करे तो पवित्र कर दे। सुमिरन नाम पवित्र दरस परसनास मम भक्ति युक्त भन पनासु सतर सति सा लोकता देती तीर्थी कुरंत तीर्थानी ये साधु है साधु का जो स्वरूप है तीर्थी कुरवंत अनुष्ठान थोड़ी कराता है उसके दर्शन इस पर संभाषण मात्र से लोक के लोक पवित्र हो जाते हैं जी

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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