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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #954 · 28 जून 2025

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की समस्त संत हरि भक्तन की जय वृंदावन धाम की जय सतगुरुदेव भगवान की जय पूनम सिंह जी आगरा से महाराज जी परिवार वाले कहते हैं कि घर के सभी सदस्यों के एक ही गुरु होने चाहिए क्या परिवार के सदस्य ऐसा नहीं बिल्कुल गलत बात है गलत बात है मतलब भाई का गुरु हमारी श्रद्धा नहीं हमारा दूसरी बात मान लो वो राम उपासक हमारी श्याम सुंदर में प्रीति है वो भगवान का उपासक हमारी मां में प्रीति है तो ऐसा नहीं अपनी रुचि, अपने इष्ट के अनुसार अपने गुरु का चरण करना चाहिए।

यह व्यवहार नहीं है कि हम जहां ले वहां तुम भी लो। ये कोई रिशेदारी नहीं है। यह गुरु वरण है। यह भगवान के मार्ग का है। हमारी श्रद्धा बनती है। तुम पूरा परिवार ले लेते हैं। हमारी श्रद्धा नहीं बनती है। तुम अपनी श्रद्धा के अनुसार लेते हैं। इसमें कुल की रीति नहीं चलती है। ये गुरु बनाने में कुल रीति या कुल गुरु नहीं चलते। परमार्थ का विषय हमने जहां सत्संग किया हमारी मति लग गई हमारी श्रद्धा लग गई कि हमारे गुरुदेव हैं तो हम वही गुरु मान लेंगे हम परिवार वाला इसमें संबंध नहीं चलेगा कास कर जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम प्रभु हमारे शरीर की सारता केवल इसी में है कि हमें इसके माध्यम से प्रभु के दर्शन और सानिध्य गुरुदेव के दर्शन सौभाग्य प्राप्त हो।

प्रभु मेरा प्रश्न यह है कि भजन मार्ग में वह स्थिति कब बनने लगती है? जब अनुकूल तथा प्रतिकूल परिस्थितियां हमारे मन को विचलित ना कर पाए। जब हमारे द्वारा सारे पापाचरण बंद हो जाते हैं और पूर्व किए हुए पाप भजन के बल से भस्म हो जाते हैं। जब हमारा अंतःकरण निष्पाप और निर्विकार हो जाता है तब हमारी द्वंदातीत स्थिति आ जाती है। निर्माण अमोहा जित संग दोषा अध्यात्म नित्या विनिवत्त कामा द्वंदर विमुक्ता सुख दुख संग ये स्थिति आ जाती है। जब हम निष्पाप हो जाते हैं अभी हमारे जन्म जन्मांतर के पाप हैं।

हमें व्यक्ति दिखाई देता है। प्रभु नहीं दिखाई देते। हमें वासना की अभी चाहत है। अभी कामनाओं की पूर्ति की चाहत है। तो अभी हमें डट के भजन करना चाहिए। खूब नाम जप करो। सत्संग सुनो। पापाचरण से डरो। गंदे आहार से डरो। वो आपकी बुद्धि को भ्रष्ट कर देगा। जो बजारू भोजन है जो गंदे आहार हैं इनसे बचो। बहुत गलत वातावरण बन रहा है जो तुम्हारे सामने होटलों में सफाई स्वच्छता से पेश किया जाता है। लेकिन पीछे कैसे बना है? कैसे पात्र मार्जन किए गए हैं? कौन बनाने वाला है?

क्या उसकी धारणा है? तो यह सब बातें हमारी बुद्धि पर बहुत प्रभाव डालती हैं। आजकल खानपान बिगड़ चुका है। हमारे आचरण बिगड़ चुके हैं। तो भजन कैसे बने? भजन तो पापवंत कर सहज सुभाव भजन मोर ते भाव न काऊ अगर पापचरण हुआ मलिन भोजन हुआ तो भजन बनेगा ही नहीं मन संसार में भटकेगा तो यह स्थिति तो तब आवे जब निष्पाप हम हो इसके लिए डट के भजन करो सुधांशु जी उड़ीसा से राधा श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आपकी कृपा से पहले बहुत भक्ति हो रहा था आपकी कृपा से पहले नाम जप ज्यादा हो रहा था लेकिन अभी थोड़ा कम हो रहा है पहले नाम जप में आनंद की अनुभूति हो रही थी लेकिन लेकिन कुछ समय से मुझे ऐसा अनुभव हो रहा है कि जिसकी वजह से मैं अपने आप पर निरंतर नहीं बना पा रहा हूं और दिन प्रतिदिन भक्ति से थोड़ा दूर जा अपने आचरणों को देखो अपने संघ को देखो क्रियाओं पर नजर डालो आसपास जो गलत है उनको छोड़ो जो गलत है उनको छोड़ो विभक्ति प्रकाशित हो जाएगी पवित्र भोजन पाओ भगवान को अर्पित किया हुआ पवित्र आचरण करो देखना सुनना बोलना तीन पर कंट्रोल करो महाराज जैसे कंपनी में काम करते तो प्याज लहसुन डाला जाता इसमें खाना पड़ता है महाराज।

हां। तो प्याज लहसुन तो तमोगुण पैदा करेगा। भजन कैसे करने देगा? अब भजन के लिए तो प्याज लहसुन जैसे महाराज पहले उसे कंपनी में जप करते करते नाम जप कर लिया है लेकिन एक बार सुपरवाइजर पकड़ लिया है। नाम जप से काम नहीं चलेगा। तो इस टाइम पे नहीं हमें यह बताओ कि नाम जप केवल काउंटर या माला से ही होता है क्या? नाम जप तो अंतर का विषय है। सुपरवाइजर कैसे पकड़ सकता है? हम अंदर जो सोचे उस पर किसी का शासन चल रहा है क्या? अंदर हम राधा राधा जप कर रहे हैं। बाहर से काम कर रहे हैं।

हमें काउंटर ले थोड़ी दिखाना है सुपरवाइजर को कि हम नाम जप कर रहे हैं। माला ले थोड़ी दिखाना है कि नाम जप कर रहे हैं। जब नौकरी में है, ड्यूटी में है तो हम ड्यूटी वाला कार्य अच्छे से कर रहे हैं। अंदर से नाम जप कर रहे हैं। पर यह बुद्धि तभी सतर्क होगी जब भोजन ठीक हो। अब मांस खाओ, प्याज, लहसुन खाओ, इधर-उधर अंडा फंडा खाओ। सोचो कि हम महाराज प्यारा लहरा तो महाराज खाओ। अब इसके लिए हम क्या करें? पर वह अशुद्ध भोजन है। वह भोजन भजन में वो तमोगुण पैदा करेगा। वह गंदी बातों का चिंतन कराएगा।

इसीलिए तो प्याज लहसुन निषिद्ध है। और कोई बात थोड़ी प्याज लहसुन तो पृथ्वी में ही पैदा होता है। जैसे आलू पैदा होती है। पर निषिद्ध इसलिए उसका प्रभाव विपरीत है। भजन करने वालों के लिए वो विपरीत चिंतन कराता है। इसीलिए उसका त्याग किया गया है। अपवित्रता बुद्धि की तमोगुण बढ़ाने वाला। इसीलिए उसका त्याग किया। हमें पवित्र बुद्धि चाहिए तभी भजन में लगेगी। तो आहार ठीक करो, आचरण ठीक करो। अंदर अंदर खूब नाम जप करने का अभ्यास करो। विशाल डोगरा जी राधे-धे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी क्या धर्म और कर्म में कोई अंतर है?

हर इंसान का कर्म अलग-अलग होता है। जैसे एक क्षत्रिय है, एक साधु है या क्षत्रिय धर्म से ही तो कर्म होता है। ब्राह्मण धर्म से ही तो कर्म होता है। विरक्त धर्म से ही तो कर्म होता है। गृहस्थ धर्म से ही तो कर्म होता है। जो धर्म से अलग कर्म करता है वो पाप कर्म करता है। और वही पाप का उसे दंड भोगना पड़ता है। शुद्ध कर्म वही है जो धर्म से युक्त हो और जो धर्म से अलग हट गया तो वो पाप कर्म बन गया। अधर्म बन गया। तो वास्तविक कर्म की महिमा तो धर्म से युक्त होने पर है।

जैसे आप किसी के पुत्र हो तो आपका पुत्र धर्म है। किसी के पिता हो तो पिता धर्म है। एक पिता का क्या धर्म है वो कर्म करो। एक पति का क्या धर्म है वो कर्म करो। एक समाज के व्यक्ति का क्या कर्म है वो कर्म करो। वो धर्म से युक्त हो। हमारा यहां धर्म कहता है कि ऐसे चलना चाहिए। तो वो कर्म धर्म युक्त हो गया। और जो मन माने तो फिर वो पाप कर्म बन गया। समझ रहे हैं ना? जो धर्म युक्त हो वही कर्म है और जो धर्म से अलग हो गया वही पाप है। धर्म से विलग हो गया तो पाप है। जैसे अपनी पत्नी से धर्म है।

लेकिन दूसरे की पत्नी या किसी बहन बेटी वो पाप कर्म कर्म तो वही है। कर्म वही है। दूसरी स्त्री की तरफ दृष्टि भी डाली गलत तो अधर्म हो गया। वो पाप कर्म कर्म वही है लेकिन धर्म से युक्त हुआ तो पवित्र कर्म हो गया और धर्म से अलग हो गया तो पाप कर्म बन गए। हार्दिक शर्मा जी राधे-राधे महाराज राधे-राधे महाराज जी महाराज जी अखंड स्मृति से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है तो अखंड स्मृति कैसे आती है? प्रयास और कृपा अपना प्रयास और भगवान की कृपा। अगर अपना प्रयास शिथिल है तो फिर बात नहीं बनेगी।

जी जान से हमें लगना पड़ता है। इसमें अंदर अंदर बार-बार पकड़ना बार-बार पकड़ना मन तो भागता है। रिश्ते नातों संबंधों में भोगों में मन भागता है। उसे बार-बार पकड़ के लाना। राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरि और भगवान की कृपा अपना प्रयास और भगवान की कृपा से हम निरंतर जप कर सकते हैं। अगर अपना प्रयास शिथिल है तो भगवान की कृपा तो सबके ऊपर है। सबके ऊपर सब पर मोर बराबर दया पर वही निकल पाएगा जो अपना प्रयास कर रहा है। अपना प्रयत्न पुरुषार्थ और भगवान की कृपा से हम अखंड स्मृति प्राप्त कर सकते हैं।

मानव जीवन अखंड स्मृति प्राप्त करने के लिए ही है। भगवान का स्मरण करते नौकरी व्यापार जो करो शरीर छूटा भगवान को प्राप्त होगे। अगर भगवान की स्मृति नहीं तो धोखा ही धोखा इतना बड़ा घाटा कि अब पता नहीं किस युग में हमें मनुष्य बनने को मिलेगा। पता नहीं किस युग में 84 लाख योनियां बहते चले जा रहे हैं अन्य योनियों में। कम से कम मनुष्य जन्म मिला तो हम ये प्रवाह तो रोक दें। जन्म मरण का चक्र जो रोक दे। अगर ना हम रोक पाए तो कम से कम अगला जन्म तो मनुष्य का मिले। तो कम से कम ऐसे आचरण हो जाए हमारे कि हम ऐसा कर्म करें जिससे हम पुनः मनुष्य बने और फिर भजन करके भगवान को प्राप्त करें।

एक तो इसी जन्म में प्राप्त कर ले लेकिन असफलता यदि रही तो हम पुनः मनुष्य बने। अन्य योनियों में ना जाएं। इसलिए भगवान का भजन अत्यंत धनिवाद है। कर्मवीर जी चंडीगढ़ श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी जब किसी जीवात्मा का शरीर छूटने वाला हो परंतु उसने दीक्षा नहीं ली हो तो क्या उसे कंठी या तुलसी माला धारण करा सकते हैं किसी व्यक्ति ने दीक्षा ली है तो उसके शरीर छूटने के बाद उसकी माला झोली एवं आसन इत्यादि का क्या विधान है? पहले अब पहले प्रश्न का तो उत्तर है कि कंठी तो पहना ही देना चाहिए क्योंकि तुलसी जी अगर शरीर छूट रहा है और तुलसी जी का स्पर्श है और मुख में रज लगा देना चाहिए मस्तक पर तिलक लगा देना चाहिए भगवान का चरणामृत पिला देना चाहिए और नाम सुना देना चाहिए इतना अधिकार अगर इतना कर दिए तो उस जीव का कल्याण पक्का हो जाएगा जिसका शरीर छूटने वाला है उसके लिए नहीं सोचना कोई दीक्षा लिए है कि नहीं हर जीव भगवान का बंदा है।

भगवान का अंश है। इतना अधिकार सबको है कि अब जैसे कंठी बांध दी तुरंत तिलक लगा दिया, चरणामृत पिला दिया, रज लगा दिया। राधा वल्लभ श्री हरिवंश, राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री वो बोल नहीं पा रहा। अगर वो सुन रहा है और अगर सुन भी नहीं पा रहा है तो वातावरण में राधा वल्लभ श्री हरिवंश से यमदूत नहीं आएंगे और उसका कल्याण हो जाएगा। पहले प्रश्न का कल्याण हो जाएगा। जैसे कि अगर वह गलत आचरण भी कर रहा है। हां तो अंतिम समय ऐसा सौभाग्य किसको मिलता है? ऐसा सौभाग्य अंतिम समय किसको मिलता है कि प्राण निकलने वाले हैं।

गले में कंठी बांधी जा रही है। चरणामृत पिलाया जा रहा है भगवान का और इसके बाद तिलक लगाया जा रहा है। वृंदावन की रज लग रही है तो उसका निश्चित कल्याण हो जाएगा। ये तो कृपा पात्र को ये सबको ऐसा अवसर मिलेगा क्या? किसी व्यक्ति ने दीक्षा ली है तो उसके शरीर छूटने के बाद उसकी माला झोली प्रवाहित कर देनी चाहिए। माला झोली मान लो पूजन की जो भी भगवत सुर विग्रह है वो सब यमुना जी या गंगा जी में या सब सब प्रभावित कर देने चाहिए क्योंकि दूसरा अगर अधिकारी नहीं है कोई सेवा करने वाला तो फिर वो सब ठाकुर ऐसे करके या तो गंगा जी यमुना जी के किनारे खोद करके समाधस्त कर दे या प्रवाहित कर दे दो ही है हमें लगता है प्रवाहित करने से अच्छा समाधस्त करना है क्योंकि खोद के और समाधस्त करके ऊपर से फूल डाल के प्रणाम अगर कोई करने वाला है महाराज जी उसकी सुरक्षा लेकिन वो उसका जैसे

संपत्ति का अधिकारी हुआ ऐसे ठाकुर सेवा करे और उसकी माला और उसका पाठ ग्रंथ ये आसन हां कर देना चाहिए विश्वो जनको युमा च जननी गंगा चमात्री स्वसा ढंडी भव दंडपाण सदृषा जेष्ठा मम भ्रात श्री काशी मणिकिका च भगिनी भारिया ममेति सत्कर्माण सुता सदै फलदा काश्या कुटुंबम मम तारा नायक शेखराय जगदा धाराय धारा धर छाया धक कंधराय गिरिजा संगै श्रृंगारण नद्या शेखने दशा तिलकिने नारायण नाणे नाग कण नगे न गण नाथाय नित्यम नति लक्ष्मी सदने सदा विहरता चित्ते चिंतामणि स्वरधेनुव

गोकुले सुरतरु चारा भूम तवा वाणी ते वदने दया नयनो दानम करे च्यहम विष्णु चे तसते मतिवसता कीर्ति च लोकत्रय लक्ष्मी रिधि भारती च वदने मलो सदा केशव चंडीते भुजदंडयो वेणुपदे वेणु पदे श्रीव वाणी ते वदने दया नयनयो दानम करेम कीर्त वसता स प्रथते तम दीर्घ जी भवा तम दीर्घ जीवी भवा आपके लिए प्रभु मैं नित्य भगवान का अभिषेक करता हूं आपकी आयु आरोग्यता के लिए जी इसीलिए सुरक्षित हूं निधि शर्मा जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी सभी संतजन कहते हैं कि सभी में भगवान की भावना रखनी चाहिए।

पर सांसारिक जीवन में ऐसा संभव नहीं हो पाता। कभी-कभी अपने करीबी जनों से भी द्वेष भाव मन में पैदा हो जाता है। जिसकी वजह से कई बार नाम जप में भी बाधा आती है। तो सांसारिक जीवन में ऐसी कोशिश कैसे जारी रखें कि सब में प्रभु का भाव देखो अपवित्र अंतःकरण कभी भगवत तत्व का अनुभव नहीं कर सकता। उसके लिए अंतःकरण पवित्र चाहिए। जो पापाचरण करता है दुष्ट स्वभाव रखता है। अपनी अनुकूलता की चाह करता है। विषयों के भोग में सुखानुभूति करता है। वह मलिन अंतकरण है। वो मलिन अंतकरण कभी सब लोगों में भगवान का अनुभव नहीं कर सकता।

बहु नाम जन्मनावते ज्ञानवान माम प्रपद्यते वासुदेवा सर्वसा महात्मा सु दुर्लभा बहुत जन्मों की साधना के बाद ऐसा तत्व ज्ञान प्राप्त होता है सर्वम खलमिदम ब्रह्म ने नानास्त चिंतन एकमात्र ब्रह्म तत्व एकमात्र भगवान है जहां ना राग है ना द्वेष है ना शुभ है ना अशुभ है ना सुख है ना दुख है महान परमानंद है। इस भाव में सर्वत्र भक्ति में देखा गया गोस्वामी तुलसीदास जी देख रहे हैं जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम मैं जानी बंधु सबके पद कमल सदा जोर जुग पानी सिया राम मैं सब जग जानी करो प्रणाम जोर जुग पानी अपना ही प्रभु सब में रमा हुआ है।

प्रभु के सिवा कोई नहीं है। पर हमारा मलिन हृदय किसी को अपना मान लेता है। किसी को पराया मान लेता है। कहीं अनुकूलता मान लेता है। कहीं प्रतिकूलता मान लेता है। इसी को साधना के द्वारा मिटाना है। उसकी साधना है। पहला हमारे द्वारा पापाचरण नहीं होना चाहिए। जो धर्म विरुद्ध आचरण है उनका त्याग करके फिर नाम जप खूब अधिक से अधिक करो तो आपके अंदर प्रभाव बढ़ेगा। अब पापाचरण भी कर रहे हो नाम जप भी कर रहे हो तो अनुभव में नहीं आने वाला। जब विशुद्ध मार्ग भगवान का हम चयन करते हैं तो ये सब पापाचरण अधर्माचरण भूल ही ना दे कुमार्ग पाऊं।

गंदी बातें, गंदे आचरण, गंदा दृश्य, गंदा सुनना ये सब त्याग दो और नाम जप करो तो फिर आपको सब में भगवान की अनुभूति होने लगेगी कि सब में भगवान विराजमान है और हैं। देखो कोई दुष्ट स्वभाव है, कोई साधु स्वभाव है। लेकिन तत्व तो उसमें भगवान ही विराजमान है। जैसे हीटर अग्नि पैदा करता है। और एसी ठंडा कर रही, कूलर ठंडा कर रहा है। लेकिन बिजली दोनों में तो एक है ही ना। बिजली में तो कोई अंतर नहीं है। जो हीटर में बिजली है वही फ्रिज में है। वही कूलर में है। वही एसी में है।

ऐसे ही अच्छा स्वभाव या बुरा स्वभाव ये क्रूरा अप पापिनो नच सताम संभास दृश्य सर् वस्तुत निरीक्ष परम स्वराध्य बुद्धि मम जो क्रूर है दुष्ट हैं पापी है संभाषण करने योग्य भी नहीं है। उनमें भी मेरा भगवान विराजमान है। क्योंकि भगवान कोई कण कोई क्षण ऐसा नहीं जहां भगवान ना हो। सर्वत्र भगवान विराजमान है। ये सिद्ध करने के लिए हमें भजन की आवश्यकता है। हम भजन करें। गंदे आचरणों का त्याग करें। तभी हमारे अंदर ये भाव आ पाएगा। और ये आ गया तो जीवन मुक्त हो गया। सर्वत्र भगवत बुद्धि हो गई तो वो जीवन मुक्त हो गया।

अब उसे कुछ करना थोड़ी बाकी है। वो आवागमन के चक्र से मुक्त हो गया। जो सर्वम खलविदम ब्रह्म वासुदेवामति ई वासमिदम सर्वम यत किंच जगतम जगत जो कण-कण में भगवान का दर्शन कर रहा है इससे बड़ा महापुरुष कौन हो सकता है समात्मा सुदुर्भा महारा जी दर्शन कर रहे हैं पर फिर बर्तन कैसे करना है बर्ताव ऐसे ही होगा पत्नी के साथ पत्नी जैसा बहन के साथ बहन जैसा मां के साथ मां जैसा बेटी के साथ बेटी जैसा दर्शन है बर्तन एक जैसा नहीं हो सकता सब में भगवान विराजमान है बर्ताव पुत्र के साथ पुत्र जैसा जैसा पिता के साथ पिता जैसा समाज में जो जैसा बर्ताव वैसा ही बर्ताव है।

पत्नी के साथ पत्नी जैसा व्यवहार मां के साथ मां जैसा व्यवहार बहन के साथ बहन जैसा व्यवहार लेकिन भगवान सम्यक है। भगवत तत्व सम्यक है। व्यवहार में समवर्तिता नहीं है। समदर्शिता है। समदर्शन करो। पंडिता समदर्शना विद्या विनय संपन्न ब्राह्मण गहस्तनी सुनी च सुपाकेचा पंडिता समदर्शना जैसे गाय और कुतिया दोनों में हम भगवत दर्शन कर सकते हैं लेकिन बर्ताव अलग होगा सुनी चोपा चा पंडिता समदर्शना चांडाल में पवित्र ब्राह्मण में गौ में हाथी में कुत्ते में एक ही परमात्मा को जो देखता है बर्ताव नहीं हो सकता गाय के गोबर से लिपने पर पवित्रता मानी जाती है।

लेकिन कुत्ते के गोबर को थोड़ी लीपा जा सकता है। बर्ताव एक जैसा हो ही नहीं सकता है। और जो बर्ताव एक जैसा करना चाहता है वो मूर्ख है, पागल है। बर्ताव एक जैसा हो ही नहीं सकता। बर्ताव तो धर्म के अनुसार होगा। लेकिन दृष्टि एक होगी कि सब में परमात्मा विराजमान है। पंडिता समदना ना कि वर्तना समदर्शन समदर्शन सब में भगवान विराजमान है। वर्ताव एक जैसा अगर बर्ताव में चूक हो गई तो फिर दुर्गति हो जाएगी। बर्ताव ही तो संभालना है। वही ज्ञानी है जो बर्ताव को संभाल ले। जितने झगड़े होते हैं वो सब बर्ताव में होते हैं।

जितने पाप होते हैं सब बर्ताव में होते हैं। झगड़ा कभी हो ही नहीं सकता। यदि अपने सुख की चाह ना हो। अगर हम दूसरों के सुख की चाह कर लें कि हजारों को लाखों को सुख मिले हमारे द्वारा। कभी कोई झगड़ा नहीं हो सकता। कभी कोई शिकायत नहीं है। शिकायत वही है जहां मेरे सुख की हानि हो रही है। हम अपने सुख को जहां देखते हैं वहीं झगड़े हो रहे हैं। जहां हम अपने सुख को देखते हैं वहीं पाप हो रहा है। जहां हम अपने सुख को देखते हैं वहीं अधर्म हो रहा है। धर्म निष्पापता निर्वैरता ये सर्व सुख में है।

सबको सुख मिले। अधिक से अधिक लोगों को सुख मिले। अगर मेरे को दुख मिल रहा है चलेगा। अकेले मेरे को दुख मिल रहा है चलेगा। लेकिन लाखों को सुख मिल रहा है। ऐसा कहा ये जितना हाहाकार मचा है ना जितना हाहाकार मचा ये नहीं हो वो हो ऐसा हो वैसा हो जहां अपने सुख की बात है वही झगड़ा हो रहा है। मेरा सुख छीन रहा है। मेरा सुख लूट रहा है। बस इसी बात के लिए झगड़ा हो रहा है। जितने पाप हो रहे हैं वो सब अपने सुख के लिए हो रहे हैं। अगर अपना सुख छोड़ दे और दूसरों का सुख स्वीकार कर ले दूसरों के सुख के लिए तो परम धर्म बन जाए।

पर हित सरिस धर्म नहीं भाई। जहां कहीं भी कहीं भी कुछ भी हो रहा है वहां देख लो परहित की भावना और स्वसुख की भावना में युद्ध हो रहा है। जहां लाखों को सुख मिलना है वहां हमारा सुख अगर बाधित हो रहा है तो हम अपने सुख को बचाने के लिए लाखों के सुखों को तोड़ सकते हैं। आज हमारे समाज में जितने द्वंद हैं, जितने झगड़े हैं, जितने पाप हैं वो सब इसी के कारण हो रहे हैं। जो विकास नहीं हो रहा बुद्धि का, बुद्धि का विकास और अगर दूसरों को सुख मिलेगा तो मेरे को सुख तो मिलेगा ही अपने आप मिलेगा क्योंकि वो लौट कर के हमारे पास ही आएगा।

अगर हम तुम्हें दुख देना चाहते हैं तो वो लौट कर हमारे पास आएगा। जो हम देना चाहते हैं वो हमारे पास लौट के आएगा। ये सिद्धांत है। अगर हम आपको सुख देना चाहते हैं तो सुख लौट के आएगा और दुख देना चाहते हैं तो दुख लौट के हम ही को प्राप्त होगा। तो समवर्तन तो हो ही नहीं सकता। समदर्शन हो सकता है। आस्था बोरा जी जयपुर से श्री हरिवंश महाराज राधे-राधे महाराज जी दो साल पहले जब आपको सुनना शुरू किया तो जानना हुआ कि हम कितना अज्ञानता और अंधकार में जीवन जी रहे हैं। आपको सुनने से यह समझ आया कि हम जैसे अविवेकी लोगों के लिए भी है भगवत मार्ग।

अब जब भगवत मार्ग पर चलने का प्रयास कर रहे हैं तो हर दिन असफल से हो रहे हैं। मन विकल्पित हो रहा है। कृपया कर दर्शन कीजिए कि हम आपको बताएं हमने अपने अपने जीवन में असफलता को सफलता का योग माना। जहां हम असफल हुए वहां हमें सफलता का मार्ग प्रकट दिखाई दिया। हे भगवान मेरी रक्षा कीजिए। क्रोध आया हे भगवान मेरी रक्षा कीजिए। मुझे संभालिए। तो असफल असरण हो जाना ही शरणागति की पुष्टता है। जब तक अपने में बल होता है कोई तब तक शुद्ध शरणागति नहीं होती। जब अपने को सुनहरी मैंने निर्बल के बलराम जिस समय हमें लगता है कि मैं पूर्ण असफल हूं।

मेरे में कोई सामर्थ्य नहीं तो रोना आता है और रोकर हम भगवान को पुकारते हैं। हे करुणा सिंधु भगवान मैं तो असफल हूं। अगर आप कृपा करो तो मैं इन विकारों से मुक्त होकर आपकी शुद्ध भक्ति को प्राप्त कर सकूं। नाथ मेरे में सामर्थ्य नहीं कि मैं इन विकारों पर विजय प्राप्त करके आपकी तरफ चल सकूं। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं हो हारो कर जतन विविध विधि अतिशय प्रबल अजय तुलसीदास बस होए तबई जब प्रभु प्रेरक बरजे हे प्रभु आप काम क्रोध को प्रेरणा देते हैं। हमारे मन को प्रेरणा देते हैं।

सारी लीला आपकी चल रही। आप इनको रोक दो और हमें अपने चरणों की तरफ आने दो। असफलता में निराशा नहीं आनी चाहिए। असफलता में आशा जुड़नी चाहिए और भगवान से मैं तो किसी योग्य नहीं लेकिन आप सर्व सामर्थ्यशाली हैं। आपकी एक कृपा कोर से मेरा सब कुछ बन जाएगा। मेरे बनाए ना बनेगी कोटि कलपों आपके बनाए बनेगी पल पाव में। पल के चौथाई हिस्से में आपकी कृपा कोर से बन जाएगा। नाथ आपने बहुत पतितों को पावन किया है। मुझ जैसे अधम को भी पावन कीजिए। ये अंदर से भावना आ जाती है। तो हमारी सफलता का योग बन जाता है।

हमें निराश नहीं होना। हमें उदास नहीं होना। हमें हताश नहीं होना। अपने कर्तव्य पर कदम आगे बढ़ाते रहना है। फिसल जाए तो फिर खड़े होकर के चल। ये परमार्थ का मार्ग है। इसमें हारना नहीं। इसमें निराश नहीं होना। हम अविनाशी के बच्चा हैं। एक ना एक दिन परम पद को प्राप्त करके रहेंगे। आज अगर हम परास्त हो रहे हैं तो हम रुकेंगे नहीं। हम 100 बार गिरेंगे तो 101 बार खड़े होकर फिर परमार्थ पर चलेंगे तो कभी ना कभी भगवान हमें विजय दिला ही देंगे। संसार में मोह माया का बहुत जाल है।

हमारी कमजोरियां हमें गिराती रहती हैं महाराज। हमारी कमजोरियां है लेकिन हमारे प्रभु तो बहुत बलशाली है ना। तो उधर दृष्टि रखो। अपनी तरफ दृष्टि क्यों रखो? जब अपने को पता है अपने से नहीं संभलने वाला तो ऐसे चलो गिरोगे नहीं। ऐसे चलोगे कभी नहीं गिरोगे। आज तक जितने भी ऊंचाई पर चढ़े वो ऐसे चढ़े हैं जो भगवान की शरण में हुए सनकाद ब्रह्म ज्ञानी लेकिन हर समय हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम जपते रहते हैं जो भगवान का नाम जप करता है भगवान का स्मरण करता है अपने को असमर्थ देखता है वही तो परम पद का अधिकारी होता है वही तो भगवान का कृपा पात्र बनता है यही दरबार दीन को आदर रीति सदा चली आई जो अपने को किसी योग्य नहीं समझते वही सर्व योग्य हो जाते हैं जो अपने को कुछ योग्य समझते हैं वो भ्रष्ट हो जाते हैं क्योंकि अभिमान नाश का कारण बनता है।

पतन का कारण बनता है। पूजा बंसलुल जी चंडीगढ़ से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी जब हृदय गहरे दुख में होता है और भीतर असहनीय कष्ट उठता है तब उस दुख को ईश्वर प्राप्ति या आत्म मुक्ति का माध्यम कैसे बनाया जा सकता है कैसे गहरा दुख हो सकता है जब नाम चल रहा है गहराई में तो नाम बैठा हुआ है तो वहां दुख कैसे प्रवेश कर सकता है अब जिसके नाम नहीं चल रहा है तो प्रपंच में तो गहरा दुख भोगना ही पड़ेगा इसीलिए तो कहते नाम को अपने साथ रखो मुख में हो राम नाम राम तेरे हाथ में बंदे बंदे तू अकेला नाही राम तेरे साथ में भगवान जब साथ में है तो हमें गहरा दुख कैसे हो सकता है क्या गहरा दुख हो सकता है शरीर स्वस्थ अस्वस्थ इससे कोई फर्क नहीं पड़ता मन स्वस्थ है कि नहीं मन साव मन कृष्ण पदारविंद मन भगवान के चरणों में तो हर समय एक उल्लास बना रहता है एक आनंद रहता है मरने से सब जग डरा मेरो मन आनंद कब मरि हो कब भेट हो पूर्ण परमानंद दुख कहां गहराई में घुस सकता है जब नाम का पहरा है तो दुख घुस कैसे सकता है?

नाम पहारू दिवस निश ध्यान तुम्हार कपाट कैसे घुस सकता है? भगवान का ध्यान दरवाजा बंद ना अंदर का सुख बाहर निकल सकता है ना बाहर का दुख अंदर जा सकता है। हृदय आनंद से लबालब चारों तरफ भगवान के नाम का प्रताप उसकी रक्षा करता रहता है। ऐसे हम थोड़ी कह रहे हैं कि भगवान को जपो भगवान को भजो भगवान का चिंतन करो। हम कह रहे हैं लोक परलोक के सारे सुख आपके चरणों को चूमेंगे यदि भगवान का भजन करोगे तो क्या आप भगवान के नहीं हो जो आप दुख भोग रहे हो आप अशांति भोग रहे हो आप परेशानी भोग रहे हो उसका कारण आपके पाप कर्म है अगर पाप कर्मों को बंद कर दो भगवान का स्मरण करो तो लक्ष्मीपति हैं अनंत मायापति हैं अनंत ब्रह्मांडों के पति हैं अरे किलो दो किलो सोना की बात क्या है 1 लाख योजन का पर्वत है जिसे सुमेरु पर्वत कहते हैं 1 लाख योजन चौड़ा एक लाख योजन लंबा और टोटल सोने का भगवान की माया में कमी है।

अनंत ब्रह्मांड पति हैं। तो हम लोग क्या है? अहंकार से जीना चाहते हैं। भगवान की शरण में होकर नहीं। पाप कर्म करना चाहते हैं। उससे सुखी होना चाहते हैं। चाहते हैं सुख और करते हैं पाप तो पाप का परिणाम दुख है। कहां सुख मिलेगा? इसलिए नाम जप करो। भगवान के आश्रित रहो। यह मांस खाना, मदिरा पीना, पराई स्त्री से व्यभचार करना, दूसरे से छीन झपट, लूट, घसोट, हिंसा यह बंद करो। अगर यह करोगे तो कभी सुखी नहीं होगे। कभी सुखी नहीं हो सकते। नाम जप करो, दूसरों को सुख पहुंचाओ।

धर्म से चलो। आप भी सुखी रहोगे। हमारी समाज भी सुख हो जाएगा। नए-नए जवान दूसरे के चैन खींच रहे हैं। माताओं बहनों को कष्ट दे रहे हैं। मुंह भरा वो गिर पड़ी। उनके लगा क्या नहीं लगा उनको कोई पता नहीं। कोई उनको गम नहीं। ऐसे खींचा कान से खींचा चाहे कान फट जाए चाहे ये क्या राक्षसी वृत्तियां जागृत हो रही समाज में यहां जेल भोगो और फिर नर्क भोगो और फिर सूअर कुत्ता की योनियों को प्राप्त हो इसलिए मनुष्य जन्म मिला है बहुत सावधान होकर भगवान का नाम जप करते हुए कोई पापाचरण मत करो सुखी हो जाओगे मेरा एक प्रश्न था जी मेरा ये प्रश्न था कि बहुत लोग लड्डू गोपाल को अपना बना के कहीं ले जाते हैं और बिना ना लोग छू लेते हैं तो हम लोग में तो वो नहीं मानते हैं तो यह सही है।

नहीं सही है। ठाकुर जी को ठाकुर जी की तरह रखना चाहिए। भले बाल भाव है पर उनको ठाकुर जी की तरह भगवान की तरह उनको रखना चाहिए। पवित्र होकर के भगवान का स्पर्श करना चाहिए। पवित्र होकर भगवान की सेवा करनी चाहिए। ऐसे नहीं कि जहां तहां लिए डोले ऐसे नहीं उनको एक स्थान पर उनको सम्मान पूर्वक अगर ले भी चले तो दर्शन आदि कराने के लिए ऐसी भावना करें कि प्रभु को वन विहार कराने जा रहे हैं। लेकिन स्वयं पवित्र होकर अपवित्र दशा में नहीं अपवित्र वस्त्र नहीं पवित्र भाव से करना चाहिए।

वो लोग गलत हैं जो अपवित्र होकर भगवान को छूते हैं। अपवित्र होकर भगवान को ले डोलते हैं। ठीक है ना? बहुत अच्छे बच्चे। जी आयुष शर्मा जी राजस्थान से जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी हमने आपके श्री मुख से सुना है कि बस श्री जी के आश्रित हो जाओ तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी लेकिन ये मन तो हर जगह सांसारिक चीजों और व्यक्तियों का आश्रय लेता रहता है तो महाराज जी सारे आश्रय मिटाकर एकमात्र श्री जी का आश्रय कैसे प्राप्त होगा नाम जप से जितना भजन करोगे किसका प्रश्न है जितना भजन करोगे उतने ही मन निर्मल होगा निर्मल मन अनाशक्त होता है और मलिन मन आसक्त होता है।

विषयों में आसक्त, व्यक्तियों में आसक्त, पदों में आसक्त, संसार के भोगों में आसक्त मन भगवत आश्रय नहीं लेता। जो अनाशक्त मन हो जाता है, निरपेक्ष हो जाता है, निर्विषय हो जाता है, वही भगवत आश्रित होता है। भगवत आश्रय में सब कुछ छूट जाता है। देखो या तो परिस्थिति हमको भगवत आश्रित कर दे या हम विचार के द्वारा भगवत आश्रय। दो प्रकार से भगवत आश्रय होता है। जैसे गजेंद्र की परिस्थिति हो गई कि अब कोई अन्य आश्रय बचा है नहीं। 1000 वर्ष तक वो लड़ता रहा। उसके हाथी हाथिनिया उसका संग देते रहे।

फिर जब देखा हाथी हाथिनियों ने कि यह तो छोड़ ही नहीं रहा। ग्राह तो गज को ही छोड़ के चले गए। अब अकेला बहुत काल का थका हुआ जलचर जीव बलवान हो जाता है। वह तो उसका घर है ग्राह का। अब वो बलवान ग्राह जब गजेंद्र को खींचा पूरा चला गया। बस सूंड थोड़ी बची। अब उसको लगा कि अब अगले झटके में हम मर जाएंगे। परिस्थिति सब आश्रय छोड़कर भगवान को हरि शरणम। उसी समय भगवान सुदर्शन चक्र के द्वारा ग्राह का उद्धार करके गजेंद्र को छुड़ा लिया। द्रोपदी जी जब सब आश्रय लेके देख लिया पहले पांडवों का आश्रय फिर सभा का आश्रय फिर भुजा का आश्रय फिर दांत का आश्रय जब देखा एक ही झटके में दांत से साड़ी छूट जाएगी।

पुकारा हे द्वारिकाधीश भगवान गोविंद उसी समय वस्त्र रूप में या तो हमारे जीवन में भगवान ऐसी परिस्थिति पैदा कर दे जैसे हम बचपन से भगवान के आश्रित थे हैं रहेंगे। हमें लग रहा था हम आश्रित हो चुके हैं। जब किडनी फेल हुई तब समझ में आया कि आश्रय किसे कहते हैं। जब किडनी फेल हुई आसन में बैठने लायक नहीं। अब साधना कोई रही नहीं। हाय हाय मच गया कि काशी का काम तो पूरा हुआ। जो वृंदावन का काम था वो तो पूरा ही नहीं हुआ। ये आज के 25 26 वर्ष पहले की बात तब एकदम निराशा छा गई कि यार ब्राह्मण के घर में जन्म मिला।

बचपन से भगवान के मार्ग में रहे और वृंदावन का काम पूरा नहीं हुआ तो अब अब क्या होगा तब रोना आया एकांत में ऐसा थोड़ी-थोड़ी देर में बस रोना आ जाता कि प्रभु अब तो कोई साधना नहीं प्रभु अब तो मैं किसी काबिल नहीं रह गया और उसी समय अहंकार सरक के भगवान की शरण में हो गए बस बस फिर उसी दिन से आनंद ही आनंद आनंद ही क्योंकि अहंकार करता था ना मानते थे कि हम साधना पर वो साधना का अहंकार था। इसीलिए हरिवंश महाप्रभु ने कहा सर्वेशु साधन वरेशु चिरम निराशा श्रेष्ठ श्रेष्ठ साधना का भी अहंकार नहीं होना चाहिए।

नहीं तो भगवत प्राप्ति में बाधा हो जाएगी। वो भगवत प्राप्ति की योग्यता खो देता है। यह तब समझ में आया जब किडनी फेल हुई। परिस्थिति तो ये या तो भगवान परिस्थिति पैदा कर दे और या तो विचार के द्वारा। तो जब यह विचार काम करने लगे तो भगवान का आश्रय कि यार कोई भरोसा नहीं घर से निकल रहे लौट के आएंगे कि नहीं कोई भरोसा नहीं भोजन बन के आ रहा है खा पाएंगे कि नहीं बड़ा भयावत संसार है तो हे हरि मैं आपकी शरण में हूं आप ही बचा सकते हो इ परलोक सकल सुख पावत मेरी सो भैया कृष्ण गुण संतू इस लोक और परलोक में समस्त सुखों को वही पा सकता है जो भगवान के आश्रित है तो हम जो उपाय करते हैं वो सुख भोगने के लिए करते लेकिन कहां?

दुखालय में। दुखालय में सुख भोगने के लिए कर रहे हैं। अगर हमारी बुद्धि काम कर जाए और सुख भोगने के लिए भगवान का आश्रय ले ले तो बढ़िया बात बन जाए। देखो वही भोजन जो हम पाते हैं हमारी बुद्धि को मलिन करके माया में लगाता है और वही भोजन जब हम भगवान को अर्पित कर देते हैं तो प्रसाद बन जाता है। हमारी बुद्धि को शुद्ध करके भगवान में लगाता है। भोजन वही है लेकिन उसको भगवान से जोड़ दिया तो प्रसाद हो गया। प्रसादे सर्व दुख नाम हरस उपजायते समस्त दुखों का नाश करके सुख प्रदान करता है।

ऐसे ही हम हर संसार की वस्तु व्यक्ति जो हमारे हिस्से में आई है वो सब भगवान को अर्पित मैं नाथ सकल संपदा तुम्हारी मैं सेवक समेत सुत नारी मंगल हो जाएगा। पक्का मंगल हो जाएगा क्योंकि भगवान मंगल भवन है। तभी आश्रय हो पाता है। नहीं तो भगवत आश्रय बड़ा कठिन है। एक बार हमने एक अपने मन की दुर्बलता देखी गंगा किनारे अब 10 5 किलोमीटर कोई नगर नहीं और दिन डूब गया था सर्दी का समय भीषण कोहरा अंधकार छा गया अब जी घबराया कि कोई मंदिर या कोई गांव का आश्रम कुछ तो नजदीक होना चाहिए अब ऐसे सियारे खा जाएंगे और जो गंगा किनारे लाश खाने वाले कुत्ते और सियानार होते हैं जिंदा आदमी को खा जाए अगर रात में पा जाए तो तो हां मांसाहारी होते हैं वो तो मनुष्य के चीत चीत के पाते हैं।

अब एक मन में घबराहट सी पैदा हुई। मन की दुर्बलता थोड़ी दूर में प्रकाश दिखाई दिया। जैसे कोई बारीक खेत लगाने वाले अपना कुछ ऐसा तो मुझे विश्वास हुआ कि कोई है। तब बड़ा अंदर खेद आया कि यार वो आदमी हमारी रक्षा करे कि ना करे वो दूर प्रकाश दिखाई दे रहा तो विश्वास हो गया। कोई है हिम्मत आ गई। लेकिन भगवान मेरे साथ है। मुझे इस बात का विश्वास क्यों नहीं? बड़ी ग्लानी हुई कि यार कितना गंदा मन है कि अब भी वो भगवान का आश्रय नहीं ले रहा। अब भी भगवान का भरोसा नहीं कर रहा।

दूर व्यक्ति दिखाई दिया तो विश्वास हो गया। तो डर खत्म होने लगा कि कोई तो है। अब वो हमारा पक्ष ले कि ना ले वो आदमी है। क्या है क्या नहीं। लेकिन भगवान तो हमारे साथ हैं। उनकी हम शरण में है। उनके लिए जीवन अर्पित है। फिर मुझे क्यों विश्वास? यह है माया। तो भगवान की कृपा से ही भगवान का आश्रय होता है। भगवान की कृपा से ही भगवान में विश्वास होता है। भगवान की कृपा से ही भगवान का भजन होता है। इसलिए भगवान के आश्रित होकर भगवान से एक ही बात मांगे कि आपका भजन मिल जाए।

बस भजन मिल गया तो सब कुछ मिल जाएगा और भजन नहीं तो कुछ नहीं। मकान, दुकान, स्त्री, पुत्र, परिवार सब यही शरीर सब खत्म। तो यह विचार जब हमारे अंदर दृढ़ हो जाए घटना तो सब कोई देखता है लेकिन प्रभाव कहां पड़ता है हमारे ऊपर राम नाम सत्य है कितनी लाशें हम जला आते हैं लेकिन यह सोचते हैं क्या कि यही हाल मेरे शरीर का होगा अगर यह सोच ले तो घबराहट पैदा हो जाए और घबराहट पैदा हो जाए तो भगवान की शरण हो जाए कि राम नाम सत्य है भगवान का नाम ही सत्य है। अब तो भगवान का नाम जप करेंगे।

भगवान के लिए कार्य करेंगे। अब कोई पाप नहीं करेंगे। लेकिन मनुष्य इतना बावरा है कि दूसरे को फूंक के आता है। अपनी सोचता ही नहीं कि हमारी भी यह दशा हो सकती है। महाराज जी ये प्रश्न मैं इसलिए पढ़ रहा हूं क्योंकि महाराज जी काफी बच्चों की स्थिति लगभग लगभग ऐसी हो रही है। महाराज जी उसको आपको सूचित करना चाह रहे थे। महाराज जी अभी मैं 18 साल की पूरी हुई हूं। महाराज जी मैंने शराब एवं सिगरेट का भरपूर सेवन किया है। नशे की दवाई अपनी दादी को पिलाई ताकि एक पुरुष को अपने घर बुला सकूं।

मैंने अपनी दादी के कान के जेवर गिरवी रखकर कई पुरुषों का संग और सारे दर्शन किए। जब ये बात माता-पिता को पता लगी तो उन्होंने महाराज जी फोन छीन लिया। महाराज जी अभी भी मनमाने आचरण कर रही हूं। महाराज जी मैं सुधरना चाहती हूं। महाराज जी मेरे को तो बर्बाद हो जाएगा नहीं तो। मतलब यह तो बहुत हानि का विषय है। जैसे बहुत हानि का विषय पर यही प्राय हर बच्चा बच्ची के आचरण बनते जा रहे हैं। ये जो गर्लफ्रेंड बॉय फ्रेंड एक नशा चला इसी से सब हमारे बच्चे कॉलेज में प्राय ऐसी स्थिति सब मतलब बहुत कठिन है।

बहुत बहुतों का प्रश्न है और सबकी लगभग हम देख रहे हैं। इसमें हम इसलिए असमर्थ हैं कि अगर आप सुधरना ना चाहो तो आपको कोई सुधार नहीं सकता और आप सुधरना चाहो मान लो अभी कहीं ना कहीं आप में पवित्रता बकाया है तब आपकी हिम्मत आई आप सभा में अपनी बात रख पाई हैं। अगर पूरी अपवित्र अंतःकरण की वृत्ति होती तो आप बोल ही नहीं सकती थी। जी पहले नाम जप होता था आपका सत्संग भी सुनते थे पर जब से बुरे आचरण होने लगे सब छूट गया। पहले तो नियम लो कि कभी शराब नहीं पी होगी। ठीक है।

दूसरी बात अब तक जो हुआ सो हुआ। अब किसी पुरुष का संयोग नहीं करोगे। जब तक ब्याह ना कर लो तब तक पुरुष का सहयोग समझ रहे हो? हमारी पहली बात शराब नहीं पियोग। सिगरेट पीना शराब सिगरेट जो भी व्यसन है मतलब जो व्यसन है उनको मतलब शराब का तात्पर्य ड्रग्स है, हुक्का है, सिगरेट है, जो भी व्यसन है वो व्यसन नहीं करोगी। हमारी बात मान लेना और अब पुरुष का संयोग नहीं करोगे जब तक ब्या ना हो जाए किसी भी पुरुष का ब व्याकुलता चले तो उपवास कर लो एक दो दिन भोजन नहीं पाओगे बुद्धि ठीक हो जाएगी यह उपवास काम पर विजय प्राप्त करने के लिए काफी सहयोग देता है और नाम जप और तीसरी बात जो भी आपका जीवन बैक का रहा उसे मिट्टी डालो अब आगे अच्छा जीवन व्यतीत करो अभी नए बच्चे हो सुधार कर लो अपना ठीक है महाराज माता-पिता पुरानी बातों को ले टोंट करते हैं तो तो सह लो उससे पाप नष्ट हो जाएंगे।

चुप हो जाओ। वो जो अंदर जलन होगी ना उससे पाप नष्ट हो जाएंगे। चुप हो जाओ। अब कोई नया पाप मत करना। महाराज जी मैं इनकी कहूं इनके माता-पिता अब स्वीकार नहीं कर रहे इनको। मतलब इनको बेदखल करना चाह रहे थे। ये भी चाह रही थी कि हमें बेदखल करके हमें स्वच्छंदता मिल जाए। तो वो बिल्कुल भी स्थिति में नहीं और वो इनका दिया का कुछ खाना भी नहीं चाह रहे क्योंकि दादी को दवाई खिलाती थी तो उनके मन में बहुत डर रह गया बैठ गया कि इनका दिया कैसे खा ले। आचरण तो बहुत गलत हो गए हैं।

पिताजी के लिए कुछ कह दीजिए क्योंकि वो आपको सुनेंगे तो हो सकता है उनके मन में कुछ हो जाए तो उनको स्वीकार कर ले। उसने वैसे चाहिए देखो वैसे हमारे जैसे भगवान का स्वभाव है कि घोर वैश्यागामी भी जब सुधरना चाहा भगवान की शरण में आया तो भगवान ने संत बना दिया अगर हर जीव को चांस मिलना चाहिए अब जैसे वो बच्चा है उसे गलती हो गई माना बहुत गलती हो गई बड़ी गलती हो गई लेकिन वो सुधरना चाहता है तो माता-पिता को चाहिए कि प्यार दुलार से आप संभाल दें और वो बच्चा जब हमारे सामने कह रहा कि अब नशा नहीं करेंगे।

अब गंदी बात नहीं करेंगे तो निश्चित सुधार हो सकता है। सब कोई सुधरने का चांस है। सबको चांस है। हम कहते हैं बुढ़ापे तक चांस है। अगर आखिरी में सुधर जाए तो सुधार हो जाए। ऐसा नहीं है कि यह गलत है तो फिर उसको जीवन भर हम गलत कह के टॉर्चर करते रहे। नहीं गलती हो गई। अब उसका सुधार हो जाना चाहिए। वो सुधरना चाहती है। उसे चांस देना चाहिए। माता-पिता को बहन भाइयों को चाहिए कि चांस देना चाहिए। अच्छा बेदखल कर दो। अब वो गंदी बातों में और गिरती चली जाए तो उसका जीवन नष्ट हो जाएगा।

माता-पिता यद्यपि गलती की है। दंडनीय गलती की है। पर अब उसको क्षमा करके उसको दुलार देते हुए आगे बढ़ाओ। सबको सहयोग करना चाहिए एक दूसरे का कि गिरते हुए को थाम करके आगे बढ़ाने का ना कि गिरते हुए को लात मार के और फैला देने का। अब माता-पिता छोड़ देंगे तो गिरते हुए को और गिरा दिया ना। अब वो तो और स्वतंत्र हो जाएगी और पागलपन चढ़ जाएगा। फिर क्या आएगा? शांति में राइट महाराज जी सामर्थ्य नहीं है छोड़ने की नहीं छोड़ दो बच्चा नहीं तो किसी काम के नहीं रहो वो भी कह रहे हैं कि एक बार अटेमप्ट भी कर लिया है नहीं वही तो हम तो जो निर्णय बता रहे हैं वो बुद्धि का बता रहे हैं जो गलत बुद्धि जाती है उसका अंतिम निर्णय यही होता है सुधार लो आज जो हम कह रहे हैं मान लो नहीं तो इसके बाद वो दुर्गति होगी यही नहीं नर्क में दुर्गति होगी और अन्य जीवों में जब बनोगी तो दुर्गति होगी अभी मनुष्य सुधार सकते हो कैसे नहीं सुधार सकती महाराज जी अंदर से सामर्थ कैसे सामर्थ नहीं ऐसे कैसे कि तुम शराब पीते हो, सिगरेट पीते हो और अपनी दादी को तुम नशा देकर के व्यभचार करती हो।

ऐसी तुम्हारी हिम्मत कैसे हो गई? धिकार तुम्हारे मनुष्य शरीर को। अभी तुम्हारे पास शासन नहीं पड़ा इसलिए तुम्हारी मनमानी चल रही कि मैं ठीक नहीं कर सकती। भय से सुधरते हो। अगर बचपन से सुधारा होता ना तो गंदे आचरण बनते नहीं। पहली बार अगर जो गलती की थी ना उसी समय तुम्हें शासन में ले लिया जाता तो आप ठीक हो जाती। अब मनमानी आचार अरे बूढ़ी दादी उनको अब पौष्टिक वस्तु पानी चाहिए कि उनको बेहोश करने वाली चीज पानी चाहिए तुम्हें ब्रह्मचर्य से रहना चाहिए या पर पुरुष से ब्लैकमेल करने लगती है जानती है कि इनको मन में भय थोड़ा सा डाल दिया तो ये ब्लैकमेल कर देती है कि हमको अगर मारोगे तो तुम नहीं तुम भी सुधरो और उनको माता-पिता को भी सुधार कह दो इसको सुधरने का चांस दें सुसाइड कोई अंतिम निर्णय नहीं है बहुत दुर्गति होती है सुसाइड के बाद फाइव स्टॉल होटल थोड़ी रखा कि होटल में पहुंच गए दुर्गति प्रेत योनि की प्राप्ति होती है।

महान दुखदाई होती है। को तो सोचो मत अपने आचरण को कर सकती हो। शराब नहीं छोड़ सकती। व्यभचार नहीं छोड़ सकती। गंदे आचरण नहीं। नाम जप करो और टाइट की कभी सोचना मत। माता-पिता से कह दो कि एक बार क्षमा करो। उसको अच्छे मार्ग में चलने का चांस दो। राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा

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यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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