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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #987 · 31 जुलाई 2025

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की जय समस्त संत हरि भक्तन की श्री वृंदावन धाम की जय सतगुरुदेव भगवान की जय विजय जी दिल्ली से राधे राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज श्री मैं अपनी तरफ से हर कार्य अच्छी प्रकार से करता हूं। वो सबके हित में करता हूं।

परंतु लोग फिर भी मेरे से संतुष्ट संसार किसी को नहीं बसता है। आप बिल्कुल नहा धो के सही बोली वो संसार नहीं इसलिए खूब नाम जप करो और पवित्रता से जीवन निर्वाह करो। इसी में सुखी रहोगे। महाराज जी वो हमें अतिश देते रहे तो भी हमें उनका हित करते रहना चाहिए। बिल्कुल करना चाहिए। हम बंद नहीं करेंगे। हम अपना परोपकार बंद नहीं करेंगे। तुम मारोगे तो भी हम तुम्हारा परोपकार करेंगे। तभी तो हमारी साधुता है। तभी तो हमारी अच्छाई है। जैसे आप अच्छाई कर रहे हो और लोग आपकी बुराई कर रहे हैं तो बुराई करने की तो बात जाने दो।

आप हमें मारोगे तो भी हम आपका अच्छा ही करेंगे। ये हमारी अच्छाई है। ये हमें अपने नियम को अपनाना है कि अगर हम बुराई करने वालों के संग में आकर उनके बुराई कर बैठे तो उन्हीं के जैसे तो हम हो गए। हम अपनी अच्छाई को दृढ़ रखेंगे कि आप हमें मारोगे भी तो भी हम भगवान से प्रार्थना करेंगे कि आप स्वस्थ रहो। आपकी बुद्धि ठीक रहे। आपको कभी कष्ट ना हो। तभी तो हमारी भक्ति सिद्ध होगी। तभी तो हम भक्त कहलाएंगे। तभी तो हम अच्छे कहलाएंगे। इसलिए उमा संत कह इ बाई करत मंद जो करे भलाई।

नितिन जी राधेधे राधे-धे महाराज जी महाराज जी भाव और भावुकता में फर्क कैसे समझे? भाव वाली स्थिति तो इस कामी मन में नहीं है। पर देखो भाव जो भाव होता है वो भजन के बल से प्रकट होता है और जो भावुकता होती है वो तत्कालिक होती है। लेकिन जो भाव है वो स्थाई होता है। वो पांच होते हैं। दा शांत भाव दास्य भाव सख्य भाव वात्सल्य भाव और गोपी भाव। ये पांच भाव होते हैं। तपस्या और साधना से प्राप्त होते हैं। जब हम भजन साधन करते हैं और भावुकता होती है कि थोड़ी देर के लिए किसी व्यक्ति के प्रति हमारा किसी घटना के प्रति हमारा किसी की परिस्थिति के प्रति हमारा जो द्रवित हो जाना उसे भावुकता कहते हैं और साधना भक्ति से जो भाव की प्राप्ति होती है जैसे शांत भाव अब मान अपमान सुख दुख लाभान सम्य समान शांत रहेगा दास्य भाव भगवान मेरे स्वामी मैं भगवान का सेवक सखा भाव भगवान मेरे मित्र वात्सल्य भाव भगवान मेरे पुत्र पुत्र गोपी भाव कांता भाव भगवान मेरे प्रीतम अब इस भाव

को माया नहीं टाल सकती यह दिव्य भाव लेकिन भावुकता का परिवर्तन हो सकता है थोड़ी देर हम आपकी किसी परिस्थिति में भावुकता आए और इसके बाद उन्होंने बताया तो ड्रामा कर रहा था अब तुरंत वो भावुकता गायब हो जाएगी लेकिन भाव यदि हमारा आपके प्रति परमात्म भाव बना है तो आपके किसी आचरण से हमें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि हमारा भाव स्थाई है वो भावुकता नहीं समझ पा रहे हैं आप हां सर गुरु जी के लिए अगर भावुकता होती है तो वो वो भाव होता है भावुकता का जो एक तात्कालिक होता है ऐसा नहीं गुरु जी के प्रति तात्कालिक नहीं होता स्थाई होता है गुरु साक्षात परबह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः अपने गुरु के लिए संपूर्ण जीवन समर्पित कर देना अपने गुरु की आज्ञा में प्रत्येक पल चलना अपने गुरु के लिए तन मन धन सर्वस्व वार देना ये भावुकता नहीं होती ये भाव होता है गुरु के प्रति भाव होता है और भावुकता और तत्कालिक परिस्थिति व्यक्ति घटना में होती है।

बोले वो बहुत ऐसी परिस्थिति में था हम भावुकता में आकर के इतने रुपए दे दिए। वो भावुकता में घटना परिस्थिति में जो आता है वो तात्कालिक होती है। लेकिन जो भाव होता है वो स्थाई होता है। गुरु के प्रति जो हमारा गुरु भाव है। गुरु साक्षात परम ब्रह्म ये हमारा स्थाई भाव है। इसमें परिवर्तन नहीं होना चाहिए। तभी मोक्ष की प्राप्ति होती है। तभी कल्याण की प्राप्ति होती है। थोड़ा सा साधना करते समय भावुकता होती है। तो ये नहीं ये सतोगुणी है। पर इसमें ध्यान रखें दया बिना साधु कसाई और दया करी तो आफत आई संभल करके जैसे हिरण पर दया की भरत जी के चरित्र में आता है।

दया करके दो चार दिन पोषण करके छोड़ देना था। लेकिन उसी में आसक्त हो गए तो अगला जन्म हिरण का हुआ। तो दया बिना साधु कसाई और दया करी तो आफत आई बहुत संभल के दया कर ली चाहिए दया में फसाव भी है दया में ऐसी दया करें कि जैसे कोई डूब रहा है तो चतुरता यह है कि उसको रस्सी या वस्त्र का सहारा दे स्वयं अपने हाथ ना पकड़ा दे नहीं अगर अच्छा तैराक नहीं तो डूबने वाला पहले उसे डुबोएगा जो उसे बचा ले गया है। ऐसे इस माया का कार्य है कि अगर हम यहां दया करें तो हम उसे आश्रय दे दे।

हम खुद ना फंस जाए उसकी दया में। अगर फंस गए तो फिर हम ही पहले डूबेंगे माया में। इसलिए बहुत संभल करके अपने भावुक लोग फंस जाते हैं। इसलिए भावुकता को संभालना चाहिए। भाव नहीं फंसेगा लेकिन भावुकता फंसा देगी। कोई आपके सामने जरा सा भी दुख प्रकट करेगा तो आपको लगेगा क्या करूं? इनका दुख कैसे दूरी करूं? तो बहुत संभल करके बहुत सोच समझ कर आज संसार में छल कपट पाखंड नाटक इसकी बाुल्यता है तो आज का समय थोड़ा भावुकता संभालने का है नहीं तो जेब काट लेंगे भावुकता भी ऐसे भी लोग हैं शोभना जी एमपी से श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी मुझे इसी जन्म में भगवत प्राप्ति करनी है पर पता नहीं कैसे विरक्त यार विरक्त मार्ग बहुत कठिन सा जान पड़ता है गस्थ में जाए गृहस्थ स्त दोनों भगवान के लाडले पुत्र हैं।

दोनों का अधिकार है भगवान प्राप्ति करना। गृहस्थ में गृहस्थ धर्म के अनुसार चले। विरक्त में विरक्त धर्म के अनुसार चले तो दोनों पहुंचेंगे भगवान के ही पास। पर चलना धर्म के अनुसार होगा। गलत अगर रास्ता हमारा हो गया। जैसे मान लो बिहारी जी इधर है। अब हम इधर दौड़ लगा दें तो जिंदगी भर दौड़ते रहे। हम बिहारी जी नहीं पहुंचेंगे और इधर हम लेट के चले तो हम बिहारी जी पहुंच जाएंगे क्योंकि सही रास्ता है तो हम सही रास्ते पर चले गृहस्थ धर्म में रहकर अगर हम ब्याह नहीं करते तो ब्रह्मचर्य का पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा और बड़ा कठिन है ब्रह्मचर्य का पालन करना देखो बातें बनाना अलग बात है जब वेदनाएं काम आदि की सताती हैं तो उन वेदनाओं को सहन करना केवल भजन बल से दूसरा कोई बल काम नहीं करेगा यदि आप डट के भजन करोगे और कुसंग से बचोगे तो ब्रह्मचर्य रह सकते हो।

नहीं तो गृहस्थी में रह के ब्रह्मचर्य रहना बहुत कठिन है। विरक्ति में कि भाई एकांत कमरे में किसी से मिल नहीं रहे। चलो भाई जैसे गृहस्ती में परिवार के जन आ रहे हैं। वो सब हंस रहे हैं। सब खेल रहे हैं। अपने सब मनोरंजन कर क्योंकि गृहस्ती में और हमको उन्हीं के बीच में रहकर के एक उदासीन जीवन भगवत प्राप्ति के लिए करना बहुत कठिन हो जाता है। और विरक्त में अगर हम कदम रखते हैं तो यह आग का मार्ग है। जैसे आग पर चलना है ना चढ़ के मोम तुरंग पर चलबो पावक माय प्रेम पंथ अति कठिन है सबको निभात ना बोले मोम के घोड़े पर चढ़ के आग की ज्वाला से निकलना समझो मोम का घोड़ा पिघल जाएगा ना मोम के घोड़े पर चढ़ के आग की ज्वाला से निकलना ये विरक्त मार्ग है कोई बिरला ही इसे पार कर पाता है नहीं तो गिर जाता है कोई कंचन में कोई कामिनी में कोई कीर्ति में फंस जाता है।

भगवत प्राप्ति तक तो पहुंचना बड़ा कठिन होता है। तो हम धन्यवाद देते हैं कि आप भगवत प्राप्ति करना चाहते हैं। पर कहीं जाइएगा मत। अपने घर में रहिए। अपने परिवार में सुरक्षित रहकर के सदवत्ति के द्वारा भगवान का भजन करिए और भगवत प्राप्ति करिए। अमित सूदन जी राधे-राधे। राधे-राधे महाराज जी। महाराज जी में बीते कुछ ऐसे पल हैं जिनको मैं भूलना चाहता हूं। पर वो बार-बार याद आते हैं। ऐसे में कोई उपाय है उसको भूलने का महाराज? मन की प्रवृत्ति है। वो भूत और भविष्य इन दो पर ज्यादा विचरण करता रहता है।

आगे क्या होगा कल्पना पीछे जो हो गया उसका चिंतन। वर्तमान में हम भूत और भविष्य के चिंतन करने वाले मन पर शासन कर सकते हैं। नाम जप के यदि हम भगवान का परम पवित्र महामंगलमय नाम जप करें वर्तमान में तो हम उसके भूत भविष्य के जो चिंतन की प्रवृत्ति है उसको हम बदल सकते हैं। भूत भविष्य के चिंतन करने के जो संस्कार है वो नष्ट कर सकते हैं। वर्तमान में मंगल भवन अमंगल हारी जो उमा सहित जे जपत पुरारी जिनका नाम भगवान उमापति भी जपते हैं उन्हीं भगवान का नाम यदि हम वर्तमान में जपे जैसे हमारा ये सेकंड वर्तमान का राधा राधा राधा तो मन भूत भविष्य के चिंतन को जो फेंकेगा वो डिलीट होता चला जाएगा वो हम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा और अगर हम नाम जप नहीं करते हैं तो धीरे धीरे धीरे धीरे ओवरथिंकिंग इतनी बढ़ जाती है कि हम डिप्रेशन में जाने लगते हैं।

ये जो आज डिप्रेशन की बीमारी है ना उसका कारण है ओवरथिंकिंग व्यर्थ का चिंतन अधिक चिंतन और अगर हम यही परमात्म चिंतन करें तो आनंद की अनुभूति होने लगे। हम निर्भय हो जाए। हम निश्चिंत हो जाए। हम निशोक हो जाए। हम चिंतन करते हैं लेकिन गलत कल्पनात्मक चिंतन, भयाव चिंतन, नेगेटिव चिंतन हम सकारात्मक चिंतन क्यों नहीं करते? क्योंकि पाप का दंड भोगाने के लिए हमारे साथ ऐसा बर्ताव किया जा रहा है। अगर हम नाम जप के द्वारा पाप नष्ट कर दें तो हमारी सोच सकारात्मक हो जाए।

भागवतिक हो जाए। जैसे आगे पता नहीं ऐसा ना हो जाए तो ऐसा हो जाएगा तो भगवान है ना वो संभाल देंगे। सकारात्मक सोच आ जाएगी जब हम भगवान से जुड़ जाएंगे यार अब तो अब कौन बचाएगा भगवान बचाएंगे या अब क्या होगा अब तो यह सब नष्ट हो गया नहीं भगवान ने जिन्होंने नई सृष्टि एक ब्रह्मांड नहीं अनेकों ब्रह्मांड एक क्षण में रच दिए वो हमारे लिए नया विधान बना देंगे भगवान पर भरोसा है सब ठीक हो जाता है तो हमें लगता है वर्तमान के समय में यदि हम भगवन नाम जप करें और भगवान का भरोसा रखें तो हमारा जीवन अच्छा हो जाएगा।

नेगेटिव चिंतन से हम बच जाएंगे और भूत भविष्य की कल्पनाओं से बच जाएंगे। जो भूत में हुआ उसका सोचना जो भविष्य में होगा उसका सोचना दोनों व्यर्थ है। क्योंकि भूत में जो हुआ वो तो गया। अब भविष्य में जो होना है हमें पता नहीं है। हमें बहुत सावधान होकर के भगवन नाम जप करते हुए वर्तमान को सुधारना है। जी डॉक्टर शिवाली अवस्थी जी राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी हम पतिपत्नी भारतीय नौसेना में डॉक्टर हैं महाराज जी महाराज जी सब अच्छे से कार्य कर रहे हैं महाराज जी महाराज जी एक पूछना चाह रहे हैं कि हर बार गर्भ जब आता है तो गर्भपात हो जाता है महाराज जी वो ठहर नहीं पाता तो महाराज जी पूर्व जन्म के प्रारब्ध है या कोई कहता है भगवान की इच्छा है महाराज जी नहीं भगवान की इच्छा से पूरी सृष्टि रची गई है केवल एक गर्भ की नहीं बात है भगवान ने एक इच्छा केवल की है एक बहु श्यामा मैं एक बहुत रूपों में हो जाऊं।

इसके बाद हमारी इच्छा लागू हो गई। वही हमारा पतन कराती है। वही हमें सुख देती है। वही हमें दुख देती है। अच्छे कर्म वाली इच्छा सुख देती है। बुरे कर्म वाली इच्छा दुख देती है। यह पूर्व का विधान है। जैसे मानो आपका तो गर्भ स्रवित हो जाता है। गर्भ टिकता नहीं है। लेकिन गंगा मैया का तो गर्भ से प्रकट हुए बालकों को गंगा में फेंक देना। पूर्व विधान जानते हैं कि यह अष्ट वसु हैं। इनमें सबको हमें मुक्त करना है। तो जहां पर प्रकट होते तो गंगा में फेंक देते जाके। आठव वसु जो भीष्म जी के रूप में विराजमान है।

उस समय महाराज शांतन ने कहा तू कौन है? ऐसी मां तो मैंने सृष्टि में नहीं देखी जो अपने नवजात शिशु को जल की धारा में फेंक दे। तब उन्होंने कहा हमने कहा था आप प्रश्न मत करना लेकिन आपने प्रश्न किया तो मैं देवी गंगा हूं कांप गए कि पत्नी के रूप में मां भगवती गंगा देवी बस अब नहीं टिकूंगी और अंतर्ध्य हो गई पुत्र को लेकर वही पुत्र महारथी अतिरथियों के वीर वीरों के वीर भीष्म पितामह जी हुए तो हम ये कहते हैं कि जैसे जिन जीवों को केवल आपके गर्भ में आने का लिखा हुआ है लेकिन आगे जीवन लीला नहीं तो गर्भ में आकर ही वह शांत हो जाएंगे।

वह गर्भ श्रवित हो जाएगा। वह जन्म नहीं ले पाएंगे। तो अब जिन जीवों को लिखा जन्म लेते ही मर जाना वो जन्म लेते ही मर जाते। जिनका लिखा है थोड़ा सा बाल तो देखो आप देखो हर तरह की आयु में मृत्यु हो रही है। तो ये सब लिखा हुआ है। हमारे पूर्व कर्मों के अनुसार सब कुछ विधान है। जो जीव जितने मिनट का आएगा जितने सेकंड का आएगा उतने मिनट सेकंड टिक पाएगा। इसका नाम मृत्यु लोक है। तो इसमें हमें भगवान की आराधना करनी चाहिए और अपने पूर्व प्रारब्ध को नष्ट करके नए भाग्य की रचना करनी चाहिए।

भगवान की आराधना से भगवान के सुमिरन से नाम जप से हम बहुत बड़े-बड़े पापों को नष्ट कर सकते हैं और पाप नष्ट हो गए तो गर्भ रह जाएगा। एक परिवार 18 20 साल उनको ब्याह किए हो गए और संतान नहीं होती थी। लेकिन उन्होंने छोड़ा नहीं। दंडवती परिक्रमा लगाना सत्संग में आना भजन करना वो लगे रहे तो दो बच्चे एक साथ प्रकट हुए भगवान करतुम करतुम अन्यथा करतुम है वो कोई साल नहीं जाता जिस साल वृंदावन की दंडवती परिक्रमा नहीं लगाते खूब भजन करते अब पाप नष्ट हो गए तो दो पुत्र एक साथ प्रकट हुए परिवार चलाने वाले हो गए 18 साल बाद 18 साल बाद ब्याह के तो हमें लगता है कि अगर हम भजन करें तो भगवान कृपा कर सकते हैं वो कृपा कर दे गर्व रह जाए, बालक हो जाए, वंश चल जाए, उन्हीं की कृपा से है तो खूब नाम जप करें, भगवत आराधना करें।

गुरुदीप जी कनाडा से राधेधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी पिछले कुछ महीनों से आपका सत्संग और एकांतिक वार्तालाप बार-बार सुनने के बाद मांस मदिरा इत्यादि का सेवन बिल्कुल छोड़ दिया। आपकी कृपा से राधा नाम जप करने का प्रयास कर रहा हूं। मैंने अपने मन से आपको अपना गुरु भी मान लिया। जीवन क्रिया को उसी अनुसार चलाने का कोशिश भी कर रहा हूं जैसे आप कहते हैं। महाराज जी मैं इस आत्मा को अब दोबारा पुनः जन्म नहीं लेने देना चाहता महाराज। इसके इसके लिए भजन चाहिए। हर समय राधा राधा राधा राधा उठते बैठते चलते फिरते खाते पीते क्योंकि कभी भी शरीर छूट सकता है।

तो शरीर छूटने के समय यदि हम राधा बोले तो हमें भगवत प्राप्ति हो जाएगी। फिर हम आवागमन से मुक्त हो जाएंगे। जैसे अजामिल ने अपने बेटे के मिस से बुलाया नारायण तो वह अंतिम समय था। नारायण पुकारते ही भगवान के पार्षद आ गए। यमदूतों की फांसी काट दी उसका मंगल हो गया तो हम हर समय नाम जप करें पता नहीं कब हमारा शरीर पूरा हो जाए अपने को पता तो है नहीं ना चलते फिरते उठते बैठते कभी भी शरीर जा सकता है ऐसा नहीं है कि हम 10 वर्ष और जिएंगे हो सकता है जिए 10 मिनट आखिरी हमारा चल रहा हो क्या पता चले कब कहां घटना घट जाए ये तो एकदम बिजली का कनेक्शन जैसा है कट गया हो तो इसलिए हर समय हमें नाम जप करते रहना चाहिए नाम जप से ही हमें भगवत प्राप्ति हो जाएगी।

गुरु भगवान प्रेरणा से यहां तक आप ले आए और अब अपना साथ कभी मत छोड़ना। मेरे साथ ही रखना। जी खूब नाम जप करना बस गंदे आचरण अब मत होने पावे। हां बिल्कुल मुकेश साहू जी श्री हरिवंश श्री हरिवंश गुरुदेव गुरुदेव भगवान पूज्य कई संतों ने के श्री मुख से सुना है कि 24 घंटे नाम संकीर्तन करने से कलयुग में आज भी भगवत प्राप्ति हो जाएगी। गुरुदेव भगवान आप भी नाम कीर्तन पर बहुत एक 24 घंटा नहीं 24 घंटे बराबर आज जीवन हर समय नाम जप करो भगवान की प्राप्ति हो जाएगी इसमें संशय नहीं एक 24 घंटा नहीं कि एक 24 घंटा किया और भगवान आकर खड़े हो गए नहीं तो कितने लोग कर ले 24 घंटा कितना होता है हमारे अंदर अखंड स्मरण चलना चाहिए 24 घंटे नाम कीर्तन का मतलब नाम सुमिरन हमारे अंदर चलना चाहिए संसार का चिंतन छूटा और भगवान का चिंतन अखंड चल रहा है भगवत प्राप्ति निश्चित हो गई समाज जो जिस 24 घंटे में अगर 24

मिनट जैसे तन्मय होने की जैसे श्री जी हां अच्छी बात है अच्छी बात है 24 घंटे में 24 मिनट अगर तन्मय होकर जपे और शेष समय ऐसे जपे तो भी भगवत प्राप्ति हो जाएगी तो एक दिन जैसे बंसीवट गए थे महाराज जी तो वहां पे जैसे लिखा भी है और कई लोग बताते भी है वहां पे तो जैसे नपुरों की श्री जी की ध्वनि आती है हां ये भगवत इसमें कोई संशय नहीं भगवत देश है कि उनमें से जैसे कि ध्वनि तो आई पर श्री जी की जो नपुर है वो दिखाई नहीं दी तो क्या बिना निज मंत्र के वो दिखाई हां उसके लिए भजन चाहिए भजन खूब करो तब जो बीज निज मंत्र है तो मतलब बिना उसके मतलब श्री जी के न पर अरे राधा नाम से सब कुछ हो जाएगा कौन सी बात ऐसी जो राधा नाम से ना हो हां अलका जी राधेधे राधे-राधे महाराज जी गुरुदेव मेरा पूजा पाठ जब इत्यादि में मन लगता है तो इस कारण और ज्यादा समय महाराज जी उसमें लगाते हैं तो कभी-कभी बच्चे पति नाराज हो जाते हैं तो मुझे अपराध कौन सा लगता है हां वैसे गृहस्ती में ज्यादा पूजा बैठ के करने वाली उचित नहीं है।

रसोई में काम कर रहे हैं। राधा राधा राधा अपने पति को टिफिन लगा के दे रहे हैं। भोजन पवा रहे हैं। बच्चों को पवा रहे हैं। ये पूजा ही हो रही है। इन सब में भगवत भावना करें। अब आप एक घंटा पूजा कर रहे हो। बच्चे को स्कूल जाना है, पति को ऑफिस जाना है और वह सब असंतुष्ट है तो मुझे लगता है वह पूजा ठीक नहीं है। पूजा उतनी ठीक है बैठकर के जिससे हमारे परिवार का बैलेंस बना रहे। हमारे परिवार में सब सुखी रहे क्योंकि वो भूखे चले गए ऑफिस तो उनके अंदर आपकी भक्ति का विरोध पैदा होगा।

बच्चा भूखा जा रहा है। यह सब ठीक नहीं है। बिल्कुल पूजा मत करो। हमारी बात समझो। अगर आप बिल्कुल पूजा नहीं कर रहे हैं। आप अपने पति को भगवत भाव से पुत्र को भगवत भाव से रसोई बनाई। ठाकुर जी को दिखा दिया। पवार है। बढ़िया पूजा हो रही है। नाम जप करना है ना। देखो गोपी जनों की जब दिनचर्या में देखो तो लीप रहे तो भगवान का चिंतन कर रहे हैं। रसोई बना रहे तो भगवान का चिंतन कर रहे हैं। गाय धो रहे हैं तो भगवान का चिंतन कर रहे हैं। धान कूट रहे हैं तो भगवान क्या हम लोग ऐसा नहीं कर सकते?

हल जोत रहे हैं, व्यापार कर रहे हैं, नौकरी कर रहे हैं। जो हमें पद सेवा मिली है, हम भगवान का नाम जप करते हैं। उस सेवा पर ध्यान दें। हम लोग केवल उसी को पूजा समझते हैं। चार अगरबत्ती घुमा दिया फोटो रख के और मूर्ति रख के तो वो पूजा हो गई। अच्छा एक बात देखो अचल मूर्ति में हम भगवान की भावना कर सकते हैं। फोटो में विग्रह में लेकिन चलते हुए चलते हुए पर हम भगवान की भावना नहीं करें तो हमारी बहुत बड़ी कमी है। इन सब में भगवान ही विराजमान है। सच्ची मानिए सच्ची मानिए।

अगर आप ईमानदारी से सब में भगवत भावना कर ले तो आपसे बड़ा कोई महात्मा नहीं है। सम आत्मा सुर्लभा वासुदेवा सर्वमति सम आत्मा सुदुर्लभा और अगर भगवान चले जाए तो देखो आप अपने प्रिय पुत्र के शरीर को जला देंगे। प्रिय पति के शरीर को जला देंगे। क्यों? क्योंकि भगवान अंतर्ध्य हो गए। तो उन्हीं भगवान की पूजा करना है। अब सब खा पी के अपने अपने काम में चले गए। अब हमारे पास समय है तो हम टीवी ना खोलें। हम पूजा गृह खोलें फिर अपने ठाकुर पूजा करें फिर बैठकर जप करें लेकिन वह बाद में करें पहले पति पुत्र की पूजा करें उनको भोजन उनकी तैयारी करने लें जो भगवान ने गृहस्थ धर्म दिया उसका पालन करो जी ब्रह्मानंद जोशी जी राधे राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मैं नाम जप करने का अभ्यास कर रहा हूं उससे मेरे को बहुत शांति मिल रही है पर परिस्थितियां बहुत ज्यादा प्रतिकूलता हो जाती है तो ऐसा लगता है कि कहीं नाम छूट ना जाए महाराज हां चिंता मत करो चिंतन बढ़ाते रहो

अनन्यस चिंतो माम ये जना परिपासते तेशाम नित्याभुक्त नाम योगक्षेम भाव्यम भगवान कह रहे हैं मैं योगक्षेम का जिसका योगक्षेम भगवान वाहन करते हैं उसको कोई विपत्ति परास्त नहीं कर सकती इसलिए प्रसन्न रहो और नाम जप करो और हर दुख को सहने की कोशिश करो तो उससे पाप नष्ट हो जाएंगे आप भगवत प्राप्ति के योग्य हो जाएंगे यम भी व्यथते पुरुषम पुरुष सम दुखा सुखाधीम सोत कल्पते जो आए हुए कष्ट से व्यथित नहीं होता सह जाता है और भगवान का नाम स्मरण करता रहता है सुखदख में समान

भाव रखता है वो अमृत पद का अधिकारी होता है वो भगवान को प्राप्त हो जाता है मुकेश अग्रवाल जी श्री हरिवंश गुरु जी श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी मैं आपका एकांतिक वार्तालाप एवं सत्संग लगभग दो वर से सुन रहा हूं। जिससे जीवन में काफी बदलाव आया है। गुरुदेव प्रारंभ में श्री जी के नाम जप में काफी रुचि थी। काफी अच्छा भी लगता था। अब धीरे-धीरे महाराज जी उतापच सा क्यों लग रहा है महाराज? हां ऐसा होता है गुणों के चक्र के कारण। तीन गुण होते हैं। सतोगुण रजोगुण तमोगुण।

तो जब तमोगुण आएगा तो निद्रा आलस्य प्रमादोत्तम तत तामस मुदाहरतम निद्रा है आलस्य है कोई पुरानी दुश्मनी की बात आके क्रोध होना द्वेष होना ऐसे चलता है और जब रजोगुण आता है तो मकान भोग यश कीर्ति ये सब चिंतन चल और जब सतोगुण आता है तो भगवान प्यारे लगने लगते हैं। नाम जप करना कथा सुनना दान करना ये सब अच्छा लगने लगता है। तो ये गुणों का चक्र चलता है। कबहु तो थरो भजन कबहु होत विशाल मन को धीरज छूटे नहीं गाहे न दूजी चाल कभी थोड़ा भजन होता है कभी बहुत होता है लेकिन हमको चाहिए कि धैर्य ना छोड़े हम गलत मार्ग में ना चले गाहे ना दूजी चाल अगर मन अभी भजन में नहीं लग रहा तो आप शांत एकदम जबरदस्ती मन को रोके हुए हैं तो थोड़ी देर में लग जाएगा गुण हट जाएगा रजोगुण फिर भजन में मन लग जाएगा जाप तो करता हूं गुरु जी हां बस जाप करते रहो इसी से इसी से हो जाएगा हां उतारचाव तो सबके जीवन में आता रहता है।

आपके ही नहीं सबके जीवन कभी बहुत भजन होता है। कभी भजन थोड़ा होता है। कभी लगता है बिल्कुल नहीं हो रहा है। लेकिन हमको धैर्य नहीं छोड़ना। हमें चलना है। अपने मार्ग में चलना है तो हम आगे जीत जाएंगे। त्रिगुण से ऊपर जहां उठे तो निरंतर भजन चलने लगेगा। त्रिगुणातीत निरंतर भजन होता है। लेकिन जब तक गुणों के अंदर है तो उसका प्रभाव रहता है। तो हम हारे नहीं। हम निरंतर अभ्यास करते रहे। श्री हरिवंश महाराज जी पहले अपने परिवार में कभी पूर्वजों का पिंडदान या श्राद्ध नहीं किया।

अब हम सभी रीति-रिवाज त्यौहार मानने लगे हैं। तो हमें अब पिंडदान या श्राद्ध अपने पूर्वजों का करना चाहिए। हमारे हमारे हमारे शास्त्रों के अनुसार है। शास्त्रों में जो आज्ञा है देखो कोई भी सिद्धांत हो तस्मा शास्त्रम प्रमाणम ते कार्या अकार्यो व्यवस्थित यह भगवान श्री कृष्ण के वचन है। कार्य हो या अकार्य इसका प्रमाण शास्त्र से लेना चाहिए। तो जो हमारे पुरखे हैं, हमारे पूर्वज हैं, उन्होंने शरीर छोड़ा है तो हमें पिंडदान करना चाहिए। क्योंकि हम उनके कुल परंपरा में हैं तो हमारा अधिकार बनता है पिंडदान करना।

उनकी अंत्यष्टि क्रिया जैसे की तो अंत्यष्टि क्रिया के बाद हम पिंडदान करें। हम गया जाएं वहां श्राद्ध करें। हमारा धर्म जो है उसके अनुसार चलना चाहिए। हमें लगता है कि मनमानी आचरण ना करें तो अच्छा है। जो हमारे शास्त्र कहते हैं उसके अनुसार चलना चाहिए। जो हमारे पूर्वज कर रहे हैं वैसा हमें करना चाहिए। अब आजकल लोग इतने विमुख होते जा रहे हैं धर्म शास्त्र से। वास्तविकता है ये और ये संसार का नियम बन गया है। हम देख रहे हैं कि जैसे मैं मंदिर में पुजारी हूं तो लोग वहां पे आते हैं तो वो स्वहित तो करते हैं लेकिन दूसरों के पर उसकी कामना ही नहीं कभी करते।

वो वो चाहते हैं कि हमारा अच्छा हो। बाकी उसके बच्चे उसका परिवार नष्ट हो। हां हां बिल्कुल। लेकर के हमारे उनके साथ कई बार ब्राह्मण है। हमारा संतोष हमारा गुण है। लेकिन उस गुण को छोड़कर के हमें कई बार क्रोधाभास और क्रोधित मुद्रा भी अपनानी पड़ती है। तो मेरा तो प्रश्न यही है कि उस क्रोधित मुद्रा को प्राप्त करने के लिए क्या मैं वो देखो ब्रह्म ऋषि साधु महात्मा ये समाज के सुधारक रहे हैं। देवदान शास्त्र संवत है। अगर हम जीवित हैं और स्वस्थ हैं और फिर दान करते हैं जीवित तो बात हमारी बात अलग है।

लेकिन अगर वो दिमाग शून्य हो चुका है जिसे क्या कहते हैं? माइंड डेथ हां ब्रेन ब्रेन डेथ हां क्योंकि वो कुछ सोच नहीं। अब नहीं क्योंकि वो जो देने वाला है वो निर्णय नहीं कर रहा इसलिए नहीं। अच्छा जो मृत शरीर के बाद देने की बात आती है कि मरने पहले पहले संकल्प पहले दे सकता है। संकल्प पहले हो जाता है। हां दे सकता है क्योंकि हमारे हम अपने शरीर के अधिकारी हैं और अगर हमारे आंख से तुम्हारी आंख चल जाती है और हम तो मरने जा ही रहे हैं और हमारा तो प्राण निकल ही गए और अगर तुम्हारे काम आ जाती है तो हमें लगता है अच्छी बात है।

लेकिन वो उसकी स्वीकृति से दे दाता की स्वीकृति से अगर वह दाता देना चाहता है तो देखो हमारे यहां इसका प्रमाण है। जिंदा दधीत जी ने अपनी हड्डियां दान की कि नहीं की? देवताओं को जगत मंगल के लिए दधीत जी ने अपनी हड्डियों का दान किया जिससे वज्र बना और कई अस्त्र बने। तो एक ऋषि परंपरा ने यह हमें प्रमाण दिया कि अगर हम जगत मंगल के लिए अपने शरीर को दान करना चाहे तो हम कर सकते हैं कि हमारा शरीर पूरा हो वो तो जिंदा दे दिए थे जिंदा। और मान लो हमारा शरीर पूरे हो हमारी किडनी किसी के काम में आ जाए।

दिल किसी के काम में आ जाए, आंख किसी के काम आ जाए, वो बात है। मंगल है दूसरों का मंगल है इसमें। इसलिए उसके हम उस पे राजी नहीं है। वो जो ब्रेन डेथ उस पे राजी नहीं क्योंकि वो स्वयं निर्णय नहीं कर सकता। जीव अच्छा अगर आप कह दो कि वो निर्णय नहीं कर सकता लेकिन वो जीवित है। तो उसकी हत्या करने का आपको अधिकार नहीं है। जैसे बालक अबोध ऐसे वो कुछ बोल नहीं सकता। कुछ सुन नहीं सकता। कुछ समझ नहीं सकता लेकिन जीवित है ना तो उसकी हत्या करने का अधिकार किसने दिया हमें बताओ उसकी हत्या करने का अधिकार अगर हम जीवित हैं हम लिख जाते हैं तो वो बात अलग है ब्रेन डेथ में जो ये होता है ना कि उसका दिल निकाल के उसको दे दिया उसको उसके वो स्पष्ट हत्या है उस जीव की क्योंकि वो अपना निर्णय करने लायक नहीं है वो अभी बुद्धि में उसके कुछ नहीं है तो अगर परिवार वाले उसको जब तक वो जीवित रहे उसे जैसे भी जीवित रहे तो वो जीवित उसका मंगलमय रहेगा।

लेकिन यह नहीं कि जीवित आदमी के सब वो स्वयं दे दे तो बात अलग है। हम उसके सपोर्ट नहीं करते। जो ब्रेन डेथ हां उसका सपोर्ट नहीं करते। राधे-राधे महाराज जी महाराज जी कुछ ऐसे मुद्दे होते हैं मेरे को रखने ही पड़ते हैं आपके आगे। महाराज जी महाराज जी मेरी शादी पिछले साल जुलाई में हुई थी। लेकिन मेरी पत्नी गलत आदतों जैसे शराब, सिगरेट, मेरे साथ मारपीट, माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार और अन्य क्रियाएं में भी शामिल है। महाराज जी| इन सबको ना सहन कर पाने की वजह से हमारा रिश्ता तलाक की कगार पर आ चुका है।

जैसे कि आपने कहा कि अगर आपने एक बार पानी ग्रहण किया तो जीवन भर साथ निभाया चाहिए। लेकिन वो योग्यता दोनों पक्ष में होनी चाहिए। अब कैसे तुम्हें बताएं? अगर वो बच्ची सही आचरण से चले तो एक परिवार को संभाल सकती है। अगर उसने आचरण अपने बिगाड़ लिए तो देखो आप पति हो। आप कह रहे हो तलाक की स्थिति है। अगर तलाक होती है तो उसका भी जीवन संकट पूर्ण है और आपका भी जीवन संकट पूर्ण है। तो हमें लगता है अगर छोटे-छोटे बच्चों के आचरण पवित्र कराए जाए। उनको व्यसन मुक्त किया जाए।

कोई बच्चा व्यसन ना करे तो हमारा जो नवीन भारत की पीढ़ी है यह बहुत बढ़िया हो जाए। अब वह बच्ची अगर नशा ना करे गलत आचरण ना करे अपने पति से प्रेम करके एक सद गृहस्ती बसा सकती है कि नहीं बचा पर वो आदत तुम्हारा जीवन तुम्हारे हाथ में है। अगर तुम गलत आचरण करोगे तो तुम दुखी हो जाओगे। अच्छे आचरण करोगे तो सुखी हो जाओगे। देखो आपके सामने उदाहरण है। वो कह रहा है कि तलाक की कगार पर क्या ब्याह इसलिए होता है सदगृहस्ती बिगड़ गई कि नहीं बिगड़ गई? माना तुम दूसरा कर लोगे तुम दूसरा कर लोगे।

लेकिन आचरण अपवित्र हो रहे हैं ना। भावनाएं अपवित्र हो रही ना। अब इन बातों को कैसे समझे? हमारा भारत देश है। इसमें एक बार जिसका पाणी ग्रहण किया जैसा बच्चा कह रहा है आजीवन निर्वाह करना। पर दोनों उसकी योग्यता को समझे। पानी ग्रहण की महिमा को समझें। जैसे माना आज हम वर का वरण कर रहे हैं। आज हम किसी लड़की का वरण कर रहे हैं। अब हम दोनों गलत नहीं करेंगे। अब दोनों मिलकर हम चलेंगे और अपनी गृहस्ती को बसाएंगे। ऐसे विचार कर लो। चाहिए कि बाल्यावस्था से जब तक ब्याह ना हो तब तक हम कोई गलत आचरण ना करें।

चाहिए ब्रह्मचर्य से रहे। धर्म से रहे। कोई नशा ना करें। कोई गंदी बात ना करें और जब पति प्राप्त हो जाए तो बात अलग है। अब पहले ही सब आचरण अगर हम बिगाड़ लेंगे तो यही बात आएगी जैसे बच्चा बोल रहा है कि अब क्या करें? उनको शराब पीना है। उनको सिगरेट पीना है। उनको पर पुरुष की तरफ देखना है तो हम कैसे स्वीकार करें? तो गृहस्ती चौपट हो गए ना। एक वो भी अशांत है और उनको भी अशांत होना पड़ेगा। ऐसा नहीं कि वो अशांत ना हो। ऐसे आचरण वाले मिल गए तो अशांति पैदा कर देंगे।

ऐसे इनसे भी ज्यादा आचरण वाले हैं ना यह क्यों इसका कारण यही है ना हमारे आचरण बिगड़ गए हमारे विचार बिगड़ गए हमारा चरित्रहीनता वही हमको दुख दे रही है आप विचार करो संतजन नहीं बोलेंगे शास्त्र की बात नहीं सुनोगे तो आप सुधरोगे कैसे जो संतों की बात है थोड़ी कड़वी लग सकती है लेकिन वो आपको बढ़िया सुधार देगी अगर बात मान जाओगे अब बच्चा भगवान का सुमिरन करो और कुसंग का त्याग करो करो। अगर पत्नी भी कुसंग युक्त है तो उसका त्याग कर दो। नहीं जीवन खतरे में पड़ जाएगा।

पक्की बात है। जीवन खतरे में पड़ जाएगा। जो गलत आचरणों वाला है उसे आप सुधार नहीं सकते। अपने को बचा सकते हो। अगर अपने को बचाना है तो आपको संग त्यागना ही पड़ेगा। अगर ऐसे आचरणों से युक्त हो और सुधरने की गुंजाइश ना हो तो तुम भी भैया आनंद से जियो और हमको भी आनंद से जी लेने दो। उसमें यह संबंध विच्छेद ही एक दवा है। मारपीट नहीं, हिंसा नहीं, कोई झगड़ा मत करो। बच्चा हो चाहे बच्ची दोनों को अपने आचरण सुधारने चाहिए। देखो तुम गलत रहेगे लेकिन तुमको गलत पसंद नहीं है।

हमारी बात को पकड़ना। तुम गलत रहे हो लेकिन तुम्हें गलत पत्नी मिले यह तुम्हें चाह नहीं रहेगी। तुम्हें गलत पति मिले ऐसी चाह नहीं। तो फिर तुम गलती को क्यों स्वीकार किए हो? तुम भी गलत छोड़ो। गलत छोड़ो तो तुम्हें अच्छा पति मिलेगा। गलती छोड़ो तो तुम्हें अच्छी पत्नी मिलेगी और आपका परिवार बढ़िया चलेगा। तो हम छोटे-छोटे बच्चों से लेकर नवयुवकों को संबोधन देते हैं। प्रार्थना करते हैं कि आप नशा छोड़िए। नशे से गलत होता है। आप व्यभचार छोड़िए। आप अपनी पत्नी से प्यार कीजिए।

आप अपने पति से प्यार कीजिए और जब तक पति पत्नी का संबंध ना हो तब तक ब्रह्मचर्य से रहिए। अब हम क्या कहेंगे? शास्त्र और अध्यात्म जो बोलेगा वही तो हम कहेंगे। जब तक ब्याह ना हो तब तक ब्रह्मचर्य का पालन करने का शास्त्र आदेश करते हैं। अब कौन हमारी बात को मानने के लिए तैयार? जो तैयार हैं उनका मंगल हो जाएगा। गिरीशा जी श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी मेरा प्रश्न है कि भगवान जी ने इस सृष्टि की रचना की। हमें इंद्रियां भी दी और वही हमें शास्त्र के माध्यम से माया और भोग विषयों से दूर रहने की शिक्षा भी देते हैं।

तो क्या मायापति जी ने माया की रचना माया से दूर रहने के लिए की है? देखो भगवान ने दो पक्ष रखे हैं। एक सुख, एक दुख, एक पुण्य, एक पाप, एक माया, एक भक्ति। दोनों रचे हैं। विष अमृत दोनों रचे हैं और रच करके छोड़ दिया। अब तुम विष पान करते हो या अमृत पान करते हो? तुम माया का स्वाद लेते हो या भक्ति का परमानंद लेते हो। यह आपके ऊपर छूट कर दिया है। जीव को स्वतंत्र कर दिया है। तुम जो चाहो कर सकते हो। चाहे अपने कर्म बिगाड़कर दुर्गति चाहे कर्म बनाकर सद्गति। दोनों पक्ष भगवान ने रचे।

अगर केवल माया ही रचा होता तो फिर प्रश्न था फिर दूरी क्यों बनाए? क्योंकि दूसरा पक्ष है नहीं तो दूसरा पक्ष भक्ति है जो परमानंद प्रदान करने वाली है। अच्छा माया कोई त्यागने वाली वस्तु नहीं है। माया के कु प्रभाव से माया में दो भी भाव है। एक अच्छा प्रभाव है और एक बुरा प्रभाव है। जैसे माया से रचित ये शरीर है। अब इस शरीर से हम सत्कर्म कर सकते हैं। तो माया का अच्छा प्रभाव हुआ कि नहीं? हमारी वाणी है। माया ही तो है। इससे हम मृदु बोले, सत्य बोले, हितकर बोले तो माया का सदुपयोग हुआ कि नहीं हुआ?

अब हमारे पास सुंदर भोजन है। उस भोजन को भगवान को भोग लगाया। किसी भूखे को पवा दिया। हमने भी अपनी भूख मिटा दी। तो सदुपयोग है कि नहीं? अब हम भूख मिटाने के लिए दूसरे जीवों की हत्या करें। अब माया का दुरुपयोग हो रहा है। अब तुम्हारी दुर्गति होगी। हमारे पास इतने सुंदर सुंदर पेय पदार्थ हैं। सुगंधित पौष्टिक बुद्धिवर्धक जरूरी मदिरा पियो। इतने सुंदर छप्पन भोग बनते हैं। जरूरी है तुम जीवों को काट के उनका मांस खाओ। तो माया के दो पक्ष हैं। एक अच्छा और एक बुरा। तो बुरे पक्ष का त्याग करना।

जैसे माया का पक्ष एक काम भोग है। अगर काम भोग हम अपनी पत्नी से करते हैं सही है। लेकिन दूसरे की स्त्री से करते हैं गलत है। अगर काम भोग ना हो तो संतान की उत्पत्ति ना हो। सृष्टि ना बढ़े। ये तो भगवान के द्वारा रचित है। कोई हमारा तुम्हारा रचित तो नहीं। लेकिन उसका सही दिशा में प्रयोग हो। अगर वह गलत दिशा अब आप काम भोग पराई बेटी के साथ करें तो हमारा कानून भी आपको दंड देगा और भागवतिक कानून में भी पाप बन गया और अगर अपनी पत्नी से करते हैं तो धर्म युक्त है। तो अगर हम विवेक और अध्यात्म शास्त्रों का स्वाध्याय करके ठीक से चले तो माया कुछ ऐसा है नहीं जो बांधने वाली हो।

माया तब बांधने वाली है जब हम माया का गलत प्रयोग करते हैं। तब बोले अरे भगवान की माया बड़ी विचित्र है। देखो उसकी दुर्गति हो गई। दुर्गति माया ने नहीं की। हमने गलत माया का प्रयोग किया। माया का मतलब ये रचना जितनी देख रहे हो। अब इस रचना में सही ढंग से चलो। आप गलत क्यों चलते हो? तुम्हारी बहन को कोई गलत दृष्टि से देखे तुम्हें बुरा लगेगा। तो तुम दूसरे की बहन को गलत दृष्टि से क्यों देखो? आत्मना प्रतिकूलानी परेशान समाचरित तो माया हमें यह बताओ कि बंधन कारक क्या है?

यह माया, कपड़ा माया, माइक माया, यह दीवाल माया यह सब सहयोग कर रही कि नहीं भक्ति के लिए? आप हमें विचार करके बताओ। अब इसी वाणी से हम गाली देने लगे। इसी शरीर से गंदे आचरण का अब माया का दुरुपयोग हो गया। तो जब हम दुरुपयोग करते हैं माया का जैसे पैसा है। पैसा से किसी गरीब की सेवा कर देना। भूखे को भोजन वस्त्र नहीं तो वस्त्र दे देना। किसी बीमार की औषधि करा देना। 10 5000 लगा दीजिए। वही 10 5000 होटल में शराब और गंदे आचरण में लगा दिए। वह दुरुपयोग हो गया। यह सदुपयोग हो गया।

माया का दुरुपयोग निषेध है। सदुपयोग करना चाहिए। आप हमें बताओ माया कहां बंधन कारक है? कब आपका आपको को आकर के माया ने पकड़ा। हमें बताओ ना कहां क्या माया है। आपके विचार गलत माया हावी। माया माने भगवान के द्वारा रचित भ्रम। आपके विचार सही माया मां है हमारा पोषण कर रही खानपान शरीर पोषण अच्छे कर्म सुख आनंद तो माया निषेध कहां है निषेध है जब हम गलत करते हैं तो हमें गलत का त्याग करना है देखो लोगों की क्या है इस समय जो बुद्धि है ना वह केवल भौतिक जगत को देख रही है अध्यात्म की भावना में नहीं है कोई बिरला ही अध्यात्म में चल पाता है आप देखो भारत में कितने हैं?

एक अरब 30 40 करोड़ तो होंगे। 40 करोड़ तो हो गए। अब उनमें से कितने ऐसे लोग हैं जो अध्यात्म में चलते हैं? चलने वालों में कितने ऐसे हैं जो सही चल पाते हैं। सही चलने वालों में कितने ऐसे जो पहुंच पाते हैं? ये बड़ा कठिन भगवान का माया का चरित्र रचा हुआ है। हम इसी में राजी हैं। जैसे नाली का कीड़ा नाली में ही सुख का अनुभव करता है। उसे अमृत कुंड में डालो तो उसे पसंद नहीं आएगा। ऐसे जो गंदे आचरण कर रहे हैं ना उनको सही बात उपदेश करो तो वो बुरा लगेगा। उनको बुरा लगेगा।

उनको अच्छा नहीं लगेगा। जैसे आप सब बच्चे हो। अब आए हो तो सुधरने के लिए ना तो हम कड़वा भी बोलेंगे तुम गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड बनाना बंद करो तुम कोई नशा मत करो अपने माता-पिता की आज्ञा में रहो अब इसी को तुम बुरा मानो तो फिर अगर संत जन तुम्हें नहीं उपदेश करेंगे तो शास्त्रों तक तुम्हारी पहुंच नहीं तुम कैसे जानोगे कि अच्छाई क्या है और बुराई क्या है नए बच्चे हो संसार में आए हो तुमको लग रहा है सुख चाहिए अब सुख व्यसन में व्यभचार में गंदे व्यवहार में तो वही तुम्हें डिप्रेशन में ले जाएगा।

वही तुम्हें सुस्त करने के लिए प्रेरित करेगा। ऐसी घटनाएं बन जाएंगी। वही तुम्हें नाना प्रकार के आचरणों में फंसाकर जेल पहुंचाएगा। तो संत और सद्गुरु देव और शास्त्र इनकी बातों का मनन करे तो माया है नहीं। मां माने नहीं या माने जो जो है नहीं लेकिन अपना कमाल कर जाती है। है नहीं पर कमाल कर जाती है। बड़े बड़ों को भ्रष्ट कर देती है। ये है भगवान की माया। है नहीं। आप बताओ माया कहां है? कोई बताओ माया कहां है? आप माया हो। अब माया है। नहीं है ना? हमारा अलग नाम है।

आपका अलग नाम है। हमारा अलग आपका अलग स्वरूप है। तो माया क्या है? अब हमारे और आपके बीच में जो आचरण है वह यदि गलत हो गए तो माया हो गए। अभी आप जब यहां से निकलेंगे तो आपसे कहा जाए माया से मिलकर आ रहे हो तो आप कहोगे भाई हम तो भक्ति का आनंद ले आ रहे हैं तो जब हम चार लोग बैठकर के अच्छी वार्ता करते हैं तो वो भक्ति बन जाती है और जब बुरी वार्ता करते हैं तो वही माया बन जाती है। बस इतना अंतर भगवान ले इसीलिए दोनों पक्ष अच्छा देखो बाजार तभी अच्छी मानी जाएगी जब उसमें हर सामान मिले।

अगर केवल मिठाई ही मिठाई मिले। कोई कह दे मिर्च क्यों बनाई भगवान ने? नहीं यार मिर्च की भी जरूरत है। हर चीज की जरूरत है। भगवान ने अपनी सृष्टि में सब कुछ बनाया है। अब हमको क्या पसंद है? हमको धर्म पसंद है कि अधर्म पसंद है? पाप पसंद है कि पुण्य पसंद है? हमको सुधरना है। भगवान से शिकायत लेकर ली कि आपने माया क्यों बनाई है? क्योंकि यह सब माया ही है। ये जो आप देख रहे हो आपका रूप भगवान ना बनाते, आपके हाथ ना बनाते, आपके नाक ना बनाते, आपके आंख ना बनाते तो बड़ा निषेधात्मक है।

अब जिनके आंख नहीं सोचो आप एक मिनट आंख बंद करके देखो। अब आपको जीवन भर ऐसे रहना पड़े तो कैसा लगेगा? एक घबराहट पैदा हो जाती है। नहीं हो जाती है। अब अच्छी-अच्छी बातें भगवत चर्चा हो रही। अब हमारे कान में सुनाई नहीं दे रहा। कितनी बड़ी पूरा जिंदगी तो भगवान ने हम पर कृपा की कर्मों के अनुसार ये मिलता है हमें कृपा की भगवान ने कि इस जन्म में मानव देह स्वस्थ तुम्हें दे रहे हैं। जाओ अच्छे कर्म करो परोपकार करो और भजन करके मेरे को प्राप्त हो जाओ। अच्छे बनने के लिए हमें चांस मिला है।

क्योंकि हम सूअर बन के अच्छे नहीं बन सकते। हम कुत्ता बनकर अच्छे नहीं बन सकते। क्योंकि उसमें इतना विवेक नहीं। हम मनुष्य बनकर अच्छे बन सकते हैं। तो भगवान ने कृपा की है माया रच के ना कि गलती की है। राधा राधा राधा राधा राधा महाराज जी शब्द लिखा है आपके लिए द्वापर की सखी को आई बन के प्रेमानंद द्वापर की सखी को आई बन के प्रेमंद प्रिया प्रीतम मिले कैसे पंथ बताए रही है कृष्ण ही है राधा और राधा होए प्रेमानंद अपनी कृपालुता सारे जग को दिखा रही है। चलो भागो लूटो लूटो राधा नाम धन सब चलो भागो लूटो लूटो राधा नाम धन सब बावरी बनी वो अपनो सर्वस लुटाए जय जय संत भगवान की जय राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा इतनो तो कबहु हसी हो इतना तो कबहु हस देहु सुनहु कृपालु किशोरी राधे सुनहु कृपाल किशोरी राधे राधे राधे

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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