कलियुग में मानसिक पाप नहीं लगता तो क्या निंदा-दोष दर्शन मानसिक पाप हैं?
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
शिवम द्विवेदी जी कानपुर से राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आजकल निंदा और दोष दर्शन होना मानव जीवन की एक सामान्य दिनचर्या बन गई है प्रतििक्षण निंदा दोष दर्शन किसी ना किसी में होता ही रहता है महाराज जी कई संतों आपके श्री मुख से सुना है और मानस की भी चौपाई है कल कल एक पुनीत प्रतापा मानस पुण्य होई नहीं पापा कलयुग में मानसिक पाप का दंड नहीं मिलता तो क्या महाराज जी निंदा और दोष दर्शन मानसिक पाप है लेकिन रुक ही नहीं पाओगे ना वाणी के जो मन में आएगा वो वाणी में आ जाएगा इतना संयम थोड़ी है कि मन की बात को काट सके।
मन में आया तो वाणी में आ जाए। वाणी में आया तो अपराध लागू हो गया। तो हमें एक कथा सुनाया करते हैं कि ब्रह्मा जी के चार पुत्र हैं। सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग है तो सब यह भी चार पुत्र हैं। तो सतयुग को कहा कि हमने नर्क की व्यवस्था की है, बनाया है। तो अपने राज्य में ऐसा करना कि तुम सात्विक प्रवृत्ति के हो तो सात्विक प्रवृत्ति वाला नर्क नहीं जाता। स्वर्ग जाता है। तो बोले कुछ ऐसा करना जिससे नर्क खाली ना रहे। तो उनका इस आज्ञा का पालन हमारे राज्य में नहीं हो सकता।
सतयुग में कोई नर्क नहीं जाएगा। त्रेता से कहा तो त्रेता ने कहा हम बड़े भाई का अनुगमन करेंगे। जैसे सतयुग में कोई नर्क नहीं जाएगा। ऐसे त्रेता में कोई बिरला ऐसे अनुगमन माने मैं चलने की कोशिश करूंगा पीछा द्वापर से कहा तो द्वापर ने कहा आपकी आज्ञा का पालन करने का 100% प्रयास करेंगे। जब कलयुग से कहा तो कलयुग ने कहा जैसे बड़े भाई ने कहा हमारे राज्य में सतयुग में कोई नर्क नहीं जाएगा। ऐसे हम 100% प्रयास करेंगे कि आपका नर्क हाउसफुल रहे। कोई स्वर्ग या बैकुंठ ना जा पावे।
तो ये कलयुग है। युग धर्म का प्रभाव है। झूठ बोलना एक बातचीत रह गई। पहले लोग डरते थे। तो मैं झूठ बोलूंगा पाप लग जाएगा। नहीं असत्य सम पातक पुंजा। झूठ बोलने के बराबर कोई पाप नहीं है। लेकिन क्या माना जा रहा है? झूठा ही लेना, झूठा ही देना, झूठे ही भोजन, झूठ चबेना। बोले आओ कुछ खा लो। बोले नहीं पाया है और बिल्कुल पाए नहीं है। लेकिन बोल के आ रहे हैं। बोले हम आपसे मिलना चाहते कहां हो? बोले इस समय तो मैं आगरे में हूं। एक सेकंड में झूठ बोल देते। ले झूठ बोलना आज कोई पाप नहीं माना जा रहा।
किसी की निंदा करने से कोई डर नहीं रहा। तो ऐसे ही हमारे इस कलयुग में ऐसा नहीं है कि सब दोष दर्शन करने वाले हैं। सैकड़ों श्रद्धालु हैं। तो अब संख्या तो नहीं कि बता सकते लेकिन कुछ अश्रद्धालु भी हैं। तो जो अश्रद्धालु हैं उनकी संख्या ज्यादा है। जो श्रद्धालु हैं उनकी संख्या कम है। माया के दिन, रात, ज्ञान, अज्ञान, निंदा, स्तुति, मान, अपमान यह द्वंद धर्म है। तो यह सदैव अपना प्रभाव दिखाते रहते हैं। इन्हीं के प्रभाव से बचने के लिए नाम जप, सद ग्रंथों का स्वाध्याय, जो गुरुजनों की वाणी है, उसका मनन पठन इसी से हम बच सकते हैं और कोई उपाय नहीं है।
नहीं तो जैसे मानस पुण्य हो ही नहीं पापा तो हम रोक कहां पाते हैं हम कह देंगे लेकिन आप असलियत में जान पाए कि नहीं पीछे वाले बैच में यही चर्चा की कि हम लोगों की दृष्टि क्रिया पे रहती है कारण पे नहीं रहती पहले हम क्रिया से हटे जैसे आप गाली दे रहे हो तुम क्रिया से हटे उसका कारण ढूंढा क्रोध क्रोध का कारण ढूंढा तमोगुण तमोगुण का कारण ढूंढा माया और माया का कारण ढूंढा परमात्मा मूल में कौन आया परमात्मा रूपी पावर से ही ये माया पावरवान है और माया के ही पावर से तमोगुण पावरवान है और तमोगुण के पावर में आकर वो क्रोध कर गया।
अब क्रोध क्रोध की क्रिया हम देखकर उसे गंदा कह सकते हैं। लेकिन जब हम कारणों पर पहुंचेंगे तो लगेगा इसका कारण भी परमात्मा ही है। सबका परम कारण परमात्मा ही है। जैसे रचना, पालन और संहार। तो रचना में तो अच्छा लगता है और पालन में अच्छा लगता है लेकिन संहार किसको पिए? पर होता है। उसके तीनों क्रियाएं हैं। इन तीनों क्रियाओं का परम कारण परमात्मा ही है। कठपुतली का इतना भी नाचे विवेकवान कठपुतली को शाबास नहीं कहेगा। शाबास कहेगा क्या? या उल्टा या सीधा ना शाबास कहेगा ना गाली देगा।
नचाने वाले पर दृष्टि जिसकी है वो कठपुतली को शाबास नहीं कहेगा। कि भैया यह क्या है? वो पर्दे के पीछे से अंगुली चला रहा है तो माया का पर्दा डालकर उमा दारु जोशित दारू कहते हैं लकड़ी और जोसित कहते हैं पुतली उमा दारु जोसित की नाई सब नचावत राम गोसाई कठपुतली की तरह पूरा संसार उनकी माया की डोरी में बंधा हुआ नाच रहा है अगर इससे नाचने से बचना है तो मामे प्रपद्यते माया में तरंतते भगवान की शरण में हो जाए। भगवान का नाम जप करे तो माया मुक्त हो जाए। पक्की बात समझो।
इसलिए खूब नाम जप करो। भगवान का आश्रय ले लो। किसके दोष वर्णन करें? तो हम दूसरे को क्या बोले? हमारा सफेद हो और दूसरे के काले रजिस्टर भरे हो तो लगे कि संसार में। लेकिन जब सच्चाई की बात अगर पूछी जाए ईमानदारी से तो इतने सब लोग बैठे हो। कोई बता सकते हो कि आपसे गलती नहीं हुई। अगर हम ईमानदारी से पूछे वृंदावन धाम में बैठे तो सबसे गलती होती है। नहीं होती तो जब हमारे अंदर गलती है और उससे गलती हो रही है तो हमें लौटना चाहिए। बुरा जो देखन मैं चला बुरा ना मिलिया कोई जो दिल खोजू आपनू तो मुझसे बुरा ना तो हमें लगता है कि हमें अपने हृदय को पवित्र करना चाहिए जिससे हमारी दृष्टि पवित्र हो जाए देखो गोस्वामी जी की दृष्टि पवित्र हुई तुलसीदास जी महाराज की तो क्या कह रहे हैं सिया राम मैं सब जग जानी करो प्रणाम जोरी जुग पानी सब सियाराम है और हमको कहां सियाराम दिखाई दे रहे हैं?
हमें तो स्त्री दिखाई दे रही, पुरुष दिखाई दे रहा है। तो पहले हमें अपनी दृष्टि पवित्र करनी चाहिए। तब हम दूसरे की निंदा करें जब हम निर्दोष हो। पर समाज का स्वरूप बड़ा विचित्र है। कि अगर हमारे 100 दोष हैं तो क्षमा। पर तुम्हारे एक दोष हो गए तो अब क्षमा नहीं। ऐसी प्रबल भगवान की माया है। तो हमें लगता है अगर हम एक दूसरे को क्षमा करके हाथ पकड़ कर के उस दोष रूपी दलदल से निकाले तो ज्यादा अच्छा है ना कि दोष रूपी दलदल में जो फंस गया एक और जमा दे दो कि गहरे दस जाए।
बात समझो। कभी-कभी बड़े अच्छे लोगों से गलती हो जाती है। और वो चाहते हैं कि एक बार क्षमा मिल जाए तो हमें लगता है ऐसे भी क्षमा करना चाहिए। दोष दर्शन ही नहीं। दोषों से निकालना भी चाहिए। अब कुछ लोग होते हैं जो दोषों को अपना व्यापार बना लेते हैं। दोष करना, क्षमा मांगना, दोष करना, क्षमा मांगना वो तो बात अलग है। लेकिन कई बार ऐसे निर्दोष लोग भी होते हैं जिनसे दोष बन जाते हैं। पक्का दिखाई दे रहा है कि दोष दर्शन है। पर उनको अगर क्षमा कर दिया जाए तो निर्दोष हो जाएंगे।
ऐसे तो हमें लगता है कि अगर हमारे आसपास कहीं ऐसे लोग हैं जिनमें हमारा दोष दर्शन होता है तो हमको उनके पास बैठना चाहिए। अगर वह बैठकर के समझे तो हम उन्हें बताएं कि आप ऐसा करते हो अगर ऐसा रोक दो तो अच्छा तब तो सत्संगी तो कई लोग ऐसे होते हैं जो गंदे आचरणों में फंस जाते हैं उनको सहयोग की जरूरत होती है प्यार की जरूरत होती है अगर हम उनको प्यार से सहयोग से तो हमें लगता है अगर हम अपने समाज को और अपनी दृष्टि को निर्दोष बनाना चाहे तो हम पहले हम निर्दोष हो और फिर दूसरों को निर्दोष करने की चेष्टा करें।
दोषी बनाकर उसे निंदा ना करें। देख लिया कि भाई दोष है तो हमारा कर्तव्य है। अगर हमारे पास ज्ञान रूपी साबुन है तो वो दाग मिटा देते हैं उसका। उसका दाग मिटा देते हैं। तो तो वही सत्संगी हुआ। दोषी को स्वीकार करना ही सत्संगी का कार्य है। अगर अस्पताल में बीमार लोग नहीं जाएंगे तो अस्पताल की महिमा क्या रही? अब हमें बता अच्छा अस्पताल काहे के लिए बना होता है? बीमार लोगों के लिए बना होता है ना। भगवान और संत का दरबार किन के लिए है? सबके लिए है ना? तो हम सब अगर सही लोग ही आकर के तो क्या महिमा रही?
बात तो है कि गलत लोग आए और वह सुधर जाए तब तो महिमा रही ना। अच्छा पहला सुधार यह हुआ कि जो संतों को मानते ही नहीं है, गलत आचरणों में लगे हैं, वह आए तो पहली पहली सीढ़ी आए तो आप प्रथम भगत संतन का संग और निश्चित परिवर्तन होगा। पर समाज बखशता नहीं है। अगर वह चढ़ना चाहता है तो पैर फैसलाकर पीछे ही ले जाता है। तो हमें लगता है हमारे समाज को यह सहयोग देना चाहिए कि यदि जैसे कोई गलत आचरण वाला है पक्का रजिस्टर्ड है और वो संत के पास गया है तो उसे शाबाशी देनी चाहिए कि आपने हिम्मत की और संत के पास गए।
अब एक हिम्मत और कर लो। उनकी बात मान लो। पहला तो कदम बढ़ा दिया। दूसरा कदम बढ़ाओ कि जो असद आचरण करते उनको छोड़कर उनकी बात मान लो तो संत संग का लाभ मिल जाएगा। तो उत्साह तो बढ़ाना चाहिए। गिरे हुए को उत्साह बढ़ाना चाहिए ना कि उसे नेगेटिव गिरा देना चाहिए। देखो उत्साह बढ़ाकर सतमार्ग में चलाने वाले बहुत कम लोग हैं। सतमार्ग में चलने वाले को निरुत्साहित कर देने वाले बहुत लोग हैं। तो आज जो हमारे समाज की व्यवस्था है उसमें थोड़ा ये अपने लोग और तो नहीं सत्संगी लोग इस बात पर सुधार लावे कि वह एक दूसरे का हाथ पकड़ कर अच्छे मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करें ना कि गिरे हुए को और गिरा दे।
वह तो गिरा हुआ है। उसे यदि आप छोड़ दोगे, गिरा दोगे तो गिरा हुआ है। लेकिन अगर प्यार से हाथ मिलाया तो शायद उसका कदम अच्छा चल जाए। अगर विश्व में एक आदमी को भी संभाल दिया तो इससे बड़ा पुण्य नहीं होता। मान लो आप दान पुण्य सब कर रहे हैं लेकिन एक आदमी को गलत आचरण से बचाकर अच्छे मार्ग में रख दिया। इससे बड़ा पुण्य नहीं होता। सबसे बड़ा पुण्य है किसी एक व्यक्ति को जो गलत राह पर जा रहा है उसे सही राह पर ले आना। ये सबसे बड़ी बात होती
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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