॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1086 · 7 नवंबर 2025

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की जय समस्त संत हरि भक्तन की जय श्री वृंदावन धाम की जय सतगुरुदेव भगवान की जय जी उत्तराखंड से राधेधे महाराज जी महाराज जी जो हम चाहते हैं हमें ईश्वर नहीं देता देते तो मन में थोड़ा सा संशय होता है। हम हमें क्यों नहीं दिया या जैसे हम चाहते थे वैसा देखो एक बात ये मान लीजिए ये हमारे ईश्वर की दुकान है।

क्या दुकान में आप जाकर बोलो यह वस्तु हमें दे दो वो आपको दे देगा। दुकान में वस्तु लेने के दो अधिकार चाहिए। पहला अधिकार अर्थ का। आपके पास रुपया होना चाहिए तो आप दुकान से वस्तु ले सकते हैं या आप घर वाले होने चाहिए घर वाले होने चाहिए तो घर वाले हैं तो आप गए बोले भैया वो जरूरत है जरा हमारे वो सामान देना तो बिना तौल के उतने अपने जितने दे देगा पैसे से मतलब नहीं क्यों क्योंकि घर वाला है आप दो में से कौन हो ना फरी के घर वाले बने और ना आपके पास तपस्या रूपी धन है तो आपकी कामना कैसे पूर्ति हो जाए?

आप बोलिए कैसे पूर्ति हो जाए? मेरे ईश्वर की दुकान में है सबका जीवन खाता। अब आप बोलिए कैसे आपकी कामनाएं पूर्ण हो। आप अनुष्ठान कीजिए। आप तपस्या कीजिए। आप भजन कीजिए और मांगिए। देखिए पूर्ण होती है कि नहीं होती। ना तपस्या है, ना भजन है, ना साधना है और ना हरि को अपना मानते हो। तो फिर किस अधिकार से तुम्हें भगवान दे दे? क्यों दे दे तुम्हें? तुम ही प्यारे हो क्या? पूरा जगत उनका बच्चा है। जड़ चैतन्य सब उनका बच्चा है। तुम तो मांगना जानते हो लेकिन पशु पक्षी कितनी योनियां है जो बेचारे मांगना नहीं जानते।

और हरि उनकी पूर्ति करते हैं कि नहीं करते? कौन सा आप देखो पशु पक्षियों को देखो कितने स्वस्थ पुष्ट एकदम सुंदर दिखाई देंगे। हरि सबका पोषण करता है। उसका चराचर जगत बच्चा है। लेकिन अगर मांग तो मांग दो से ही पूर्ति होती है। या तो तुम्हारे पास धन हो या तुम दुकान वाले के घर वाले हो। तो आप हरि को यदि अपना मान के प्यार करते हो तो मांगना बनता है या इतनी तपस्या हो आपके पास अनुष्ठान हो जप हो तो जो मांगोगे वो मिल जाएगा। अब दोनों में से एक भी नहीं है। लोगों को मांगना भी नहीं आता।

ठाकुर जी के पास जाते हैं। बोलते हैं मैं एक भोग लगाऊंगा। हमारा काम कर दो। ठाकुर जी से मांगना भी नहीं आता। ठाकुर जी को ठाकुर जी मानो यार। प्रभु को प्रभु मानो और अपना स्वामी मानो, अपना प्रीतम मानो, अपना यार मानो तो अभी काम बनने लगे। आप क्या सोचते हो? आपके परिवार में कितने लोग हैं? परिवार में कितने लोग हैं? 13 13 13 तुझको अर्पण कर दूं। क्या लागे मेरा ये सारी बातें वो ऐसे नहीं जता है जैसे देखो हमने एक बार उदाहरण में बताया था कि जैसे एक पिता मानो चार बेटे हैं और चार बेटों को एक-एक सेव दिया पिता ने ही दिया अब उसमें से एक बेटे ने दौड़ के गोद पर चढ़कर कहा पापा आप पाओ ना और पापा के मुंह पे लगा दिया अब पापा क्या करेंगे?

उसके हाथ से सेव ले लिया और अपने हाथ से उसको पवाएंगे। अब जो दुलार इस एक को मिलेगा वो तीन को नहीं मिलेगा। पिता की ही वस्तु तो दम वस्तु गोविंदम लेकिन हम दौड़कर भगवान को पहले भोग लगाया और फिर प्रसाद पाया तो हम भगवान के कृपा पात्र बन जाएंगे। तो हम भगवान को अगर इस तरह से कि हम आपको एक किलो लड्डू चढ़ाते तो भूल मत करो। भगवान को लड्डू पेड़ा नहीं चाहिए। भगवान अनंत ब्रह्मांडों के स्वामी हैं। उनको तुम्हारा भाव चाहिए। तुम तो भाव है नहीं, प्रेम है नहीं, तपस्या है नहीं तो कामना क्यों पूर्ति हो?

हमें बताओ ना कैसे पूर्ति हो कामना की? अगर हम भगवान से कोई चाह पूर्ति कराना चाहते हैं तो हमें दो में से एक होना पड़ेगा। या तो भगवान के बनो पक्का पूरा सबल तेरा तुझको अर्पण। क्या लागे मेरा या तो यह आओ और या फिर तप करो और फिर देखो कामना की पूर्ति होती है कि नहीं ऐसे कामना की पूर्ति नहीं होगी ऐसे ऐसे भगवान को कोसो मत संपूर्ण सृष्टि भगवान का बच्चा है और संपूर्ण सृष्टि को आवश्यक सामग्री भगवान सबको दे रहे कामनाओं की पूर्ति के लिए आपको तप करना पड़ेगा आपको भजन करना पड़ेगा कामनाओं की पूर्ति के लिए आपको भगवान से प्यार करना पड़ेगा तभी आप ले सकते हैं जी योगेंद्र केंद्र उपाध्याय जी राधे-राधे महाराज जी महाराज आप कह रहे हैं कि आप उच्च शिक्षा मंत्री हैं उत्तर प्रदेश शासन के महाराज जी आप कह रहे हैं कि राजनैतिक व्यक्ति अपनी व्यस्तता के कारण पूजा पाठ ध्यान व भक्ति के लिए बहुत कम ही समय निकाल पाता है।

ऐसी परिस्थिति में कौन सा सरल भक्ति मार्ग होगा जिससे उसका आध्यात्मिक विकास संभव हो और परलोक सुधर सके। जिसका प्रश्न आपको भगवान ने गीता जी में कहा यत करो मैंने जो भी करते हो इसमें यह नहीं कहा कि आप यह करिए यत करो जो करते हो मुझे अर्पित कर दो पर भगवान को अर्पित वही वस्तु की जाती है जो पवित्र होती है जो धर्म युक्त होती है। जैसे हम भगवान को अपना कर्म अर्पित करना है। तो पहले हमको यह ध्यान रखना है कि हम जिस पद पर हैं, हम अपने पद के अनुसार कर्तव्य कर रहे हैं कि नहीं।

पद का दुरुपयोग तो नहीं हो रहा हमारे द्वारा। भय या प्रलोभन से हम अपने पद का दुरुपयोग तो नहीं कर रहे। दुरुपयोग करना स्वार्थ की पूर्ति। सदुपयोग करना दूसरों का हित। दूसरों का मंगल दूसरों के लिए सुख विधान करना जैसे आप बहुत अच्छे पद पर हैं तो आप हमारे समाज का बड़ा मंगल कर सकते हैं। हमारे समाज का बड़ा हित कर सकते हैं और करते भी होंगे। तो हम जो कर्म करते हैं यदि उसे धर्म पूर्वक करें और भगवान को अर्पित कर दें तो उसे समर्पण का जो भाव हमारे अंदर आएगा वो एकदम सांसारिक कर्म है।

आप बिल्कुल उसमें यह मत जाइए कि भागवतिक कर्म ही समर्पित किया जाता है। नहीं भगवान ने कहा यद करो यत करो जो आप कर रहे हैं ये सर्वाण करण सन परा अनन्य योग माम ध्या पासते भगवान ने कहा ये तू सर्वाणी ना धर्माणी कहा ना पुण्यानी कहा भगवान ने कहा ये तू सर्वाणी अब सर्वाणी में पाप कर्म नहीं आएंगे क्योंकि कर्म शब्द तभी सार्थक होता है जब पाप रहित होता अगर उसमें पाप जुड़ जाता है तो कुकर्म हो जाता है। तो ये तू सर्वाण कर्माण कुकर्म नहीं अगर वो अधर्म युक्त हो गया तो पापाचरण अशुभ कर्म बन जाता है।

तो हमारे द्वारा सावधानी ये रखनी है कि अधर्म ना बनने पावे। पापाचरण ना बनने पावे। किसी भी तरह का प्रलोभन हमारे माइंड को, हमारी बुद्धि को लुभायमान ना कर पावे। हम अपने धर्म से विचलित ना रहे। तो वो कर्म जब हम भगवान को समर्पित करते हैं तो भागवत धर्म बन जाता है। वो हमें भगवत प्राप्ति के योग्य बनाने लगता है। और कहीं कर्म करते हुए नाम जप हो तब तो फिर क्या कहना? फिर तो और विजय प्राप्त हो गई। और हम ये कहते हैं कि हर समय हम कर्मानुष्ठान में ही नहीं रहते। बहुत सा समय हमें ऐसा मिलता है जो हम व्यर्थ में नष्ट कर देते हैं।

जैसे हमारे पास 24 घंटा होते हैं तो हम 6 घंटे अधिक से अधिक सोते होंगे या 7 घंटे। क्यों? कम ही सो पाते हैं। कम ही सो पाते हैं। कह रहे हैं। हां, कम ही सो पाते। बहुत अच्छी बात है। हम तो बिल्कुल आखिरी हद कहते हैं कि छ घंटे या सात घंटे बहुत सोने वाला होगा। नहीं तो 5 घंटे चार घंटे तीन जो जैसी साधना में युक्त है उतना इसके बाद हमारे पास जो मानो हम छ घंटे जोड़ लेते हैं। हमारे पास 18 घंटे बटे 6 चौको 24 चार विभाग करते हैं तो 18 घंटे बचे। छह सोने में चले गए। 18 घंटे में हम 12 घंटे सेवा रख लें।

12 घंटे काम रख लें। यह बहुत बिजी कार्य 12 घंटे। हमें लगता है कोई मुश्किल ही 12 घंटे कार्य करता होगा बराबर अनवरत। नहीं तो थोड़ा काम किया फिर विश्राम थोड़ा काम किया फिर विश्राम। समय से तो जब हमें विश्राम की स्थिति मिली तब तो नाम जप कर सकते हैं और हम 12 घंटे अगर लगातार सोच लेते हैं तो 12 और छ 18 घंटे हो गए। 18 घंटे के बाद हम दो घंटे भोजन में रख लेते हैं। दो-तीन टाइम जितना भी आप पाए तो 19 20 घंटे हो गए। 20 घंटे के बाद हम एक घंटा मनोरंजन रख लेते हैं। सांसारिक आदमी अगर करना भी चाहे पेपर पढ़ना है, समाचार देखना है या और भी जो भी करना है।

इसके बाद तीन घंटे ऐसे बचते हैं जिनमें आप बिल्कुल भजन कर सकते हैं। आप उन तीन घंटे में बताओ क्या कर सकते हैं? हमने 12 घंटे आपको काम के लिए दिए, छ घंटे सोने के लिए दिए, दो घंटे भोजन के लिए दिए, एक घंटे मनोरंजन के लिए दिए। तो तीन घंटों का प्रयोग आप बताओ कहां करोगे? अगर वो तीन घंटे भजन में लगा दिए जाए तो हम एक बहुत अच्छी साधना कर लेंगे। बीच-बीच में नाम जप करते हुए और तीन घंटे जो हमारे 24 घंटे में निकले उनको तीन विभाग में कर देते हैं। हम एक एक घंटे 24 घंटे में समय निकालकर भजन को देते हैं।

केवल भजन को देते हैं। तो हमारे मनुष्य जीवन की जो सार्थकता है वो ठीक हो जाएगी। साधन धाम मोक्ष कर द्वारा जो हमारा मनुष्य जन्म साधना के लिए मिला है, मोक्ष के लिए मिला है, उसकी पूर्ति हो जाएगी। अब आप या कोई व्यापारी या कोई किसान या किसी भी डिपार्टमेंट का तो तीन घंटे सबके पास बच सकते हैं। अगर हम तीन घंटे भजन में लगा दें तो हमारा जीवन सार्थक हो जाए। तो हमें चाहिए कि नाम जप करते हुए हमें कर्म करना चाहिए। तो आपका कर्म ही आपकी पूजा है। बस उसमें सावधानी इतनी कि अधर्म ना होने पावे।

क्योंकि अधर्म हो गया तो फिर वो पूजा नहीं वो पाप है। और अगर अधर्म नहीं हुआ और वो कर्म हम भगवान को समर्पित कर दिए तो वो पूजा ही हो जाएगी। जैसे गला काटना कभी पूजा नहीं होता। लेकिन अर्जुन जी को भगवान आदेश करते हैं इनका गला काटिए। मा युद्ध च उठ खड़े हो मेरा स्मरण करो तो वो कर्म कितना भी भयावना क्यों ना हो यदि वो धर्म पूर्वक है और भगवत समर्पित कर दिया जाए और नाम जप किया जाए तो उसी कर्म से हमें भगवत प्राप्ति हो जाएगी। रजनीश जी इंदौर से श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी भगवन मांसाहार और दत क्रीड़ा जुआ खेलने को छोड़कर जितने भी महत पापचरण होते हैं मुझसे सभी हुए हैं शरणागति के पूर्व कृपया दंड विधान करें या इनका प्रायश्चित या श्रवण कैसे करूं ताकि प्रारंभ नाम जप कीजिए किसका प्रश्न है नाम जप कीजिए और यह नियम ले लीजिए कि अब नशानी अब नाश हो आज तक जो हमसे हुआ ओ अपने पक्का नियम दे दो और नाम जप करो भगवान का यश श्रवण करो भगवान की लीला कथा श्रवण करो भगवत सेवा विराजमान कर लो ठाकुर जी की अलग से कोई प्रायश्चित करने की जरूरत नहीं सब इसी से भस्म हो जाएगा पहला तो जो हृदय में जलन होती है उससे पाप क्षीण होते हैं।

दूसरा जो हम प्रतिज्ञा ले लेते हैं उससे पाप क्षीण होते हैं। और तीसरा जब हम भगवन नाम जप कीर्तन करते हैं उससे सब पाप नष्ट हो जाते हैं। तभी तो भगवत प्राप्ति होती है। तो आपको उल्लास पूर्वक नाम जप करो और कोई कठिन प्रायश्चित करने की जरूरत नहीं है। अरविंद यादव जी लखीमपुर महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी गांव में रामायण पढ़ने के लिए लोग बुलाते हैं जो अखंड ज्योत रखते हैं। वहां पर मेरे साथ कुछ लोग अब आकर रामायण पढ़ते हैं तो वो गुटखा खाकर भी पढ़ते हैं।

मैं मना भी करता हूं तो कहते हैं कि मुझे थोड़ी ना मना किया है एक शास्त्र ने और कुछ लौंग आदि ये ये गंदी प्रवृत्ति के लोग हैं। यह ऐसा अपराध है। मसाला या गुटखा या किसी भी तरह के इन पदार्थों को खाकर के भगवत चरित्रों का गायन करना निषिद्ध है। हां एक उपाय हो सकता है। ठाकुर जी को पान का भोग लगाया जाए जिसमें तंबाकू ना हो। इलायची, लौंग, सौंफ, कुछ मीठी चीजें जैसे गुलकंद आदि है ऐसी डाल के और वो आप मुख में रख लें। फिर निषेध नहीं माना जाएगा। लेकिन यदि आप ऐसे गुटखा तंबाकू खाकर करते हैं तो ये निकृष्टता है।

यह शास्त्र का अपमान है। यह मर्यादा के विहीन है और यह पाप लगेगा जो ऐसा लोग करते हैं। इसलिए हमारी सबसे प्रार्थना है जहां तक हमारी आवाज पहुंचे कि आप लोग भागवत कथा श्रवण या भागवत कथा कथन या रामचरितमानस श्रवण या रामचरितमानस कथन या वृंदावन की परिक्रमा या गिरिराज जी की परिक्रमा इनमें कोई भी नशा ना करें। अगर नशा करेंगे तो लाभ लेने गए हो ऊपर से आपकी हानि हो जाएगी। अपराध बन जाएगा। नहीं खाना चाहिए। बिल्कुल नहीं खाना चाहिए। गलत है पर जी जो ग्रंथ है इनको छूना या जैसे कहीं भी रख रहे हैं जैसे किताबों की तरह इनका भी कुछ हां बिना वस्त्र के आवरण के ग्रंथ को रखना ही नहीं चाहिए एक पीला वस्त्र या लाल वस्त्र एक वस्त्र का आवरण ऊपर से ओढ़ाना चाहिए वस्त्र को और पवित्र रखना चाहिए।

अपवित्र दशा में सद ग्रंथों को नहीं छुआ जाता। स्नान आदि करके पवित्र होकर प्रणाम करके और फिर जो आसन होता है सद ग्रंथ रखने का जिसे रेल कहते हैं उसके ऊपर वस्त्र डाल के फिर हम वाचन करें फिर गायन करें ऐसे अपवित्र दशा में ना छुएं झूठा मुंह हो तो ना छुए अपवित्र शरीर हो तो सद ग्रंथों को ना छुए नहीं तो आपकी बुद्धि प्रतीत हो जाएगी इन चीजों को महाराज जी आजकल कोई मान ही नहीं रहा मतलब बड़ी अपवित्रता सी फैल रही है महाराज आशीर्वाद भगवान का भय नहीं रह गया। धर्म का भय नहीं रह गया।

यह भय नहीं रह गया कि हमसे पाप हो जाएगा। अब तो जो मन मावे सो कर रहे हैं। पूछो मत। क्योंकि बुद्धि भ्रष्ट हो गई है ना। भय हो तो हमें लगे कि हम गलत करेंगे तो हमारा पुण्य नष्ट हो जाएगा। भगवान नहीं मिलेंगे। हमारे को हानि होगी। अब कौन अब तो बड़े भाग्य हैं जो कोई भगवान के इन ग्रंथों का वाचन करता हो, कथन करता हो, पाठ करता हो। नहीं तो लोग दिन भर मोबाइल में लगे रहते हैं। इधरउधर के कार्यों में अपना जीवन व्यर्थ करते हैं। अब हमें लगता है कि अगर गांव में देखा जाए तो पहले जब हम बच्चा थे तो दो चार छह जगह लालटेन जला के रामचरितमानस का गायन होता था।

10 पांच बूढ़े बैठे हैं। रामायण हो रही कहीं भागवत कथा हिंदी की हो रही। अब देखा जाए तो हमें लगता है एक जगह ऐसा होना मुश्किल है पूरे गांव में। कहीं कोई मंदिर आदमी कर रहा हो तो कर रहा है। नहीं तो अब कहा अब तो घर में टीवी चल गई है। जेब में मोबाइल है तो ऐसा कोई तो अब पवित्रता का ज्ञान नहीं रह गया है। अब शौचालय में वही मोबाइल लेकर के गए तो मोबाइल को स्नान तो नहीं करवाया ना। वैसे ही मोबाइल लिए रसोई में घूम रहे हैं वैसे तो वह बुद्धि को पतित नहीं करेगा। तो आप इतनी सूक्ष्मता की बात कब देखें जब शराब पी रहे हैं, मांस खा रहे हैं, अपवित्र भोजन पा रहे हैं।

तो इन पवित्रताओं की तरफ देखे कौन? हमें तो अभी तक अनुमानतः बहुत कम ऐसे लोग मिल रहे हैं जो शराब नहीं पी रहे, मांस नहीं खा रहे, गलत आचरण नहीं कर रहे। अगर उनमें मिल भी रहे हैं तो बहुत सुधार पक्ष में हैं सत्संग सुनकर तो वह मिल रहे हैं और या जो बहुत अच्छे धर्म वाले गृहस्थ के यहां जन्मे वो मिल रहे हैं। नहीं तो प्राय नए बच्चे सब गंदे आचरणों में गुटखा खाना शराब पीना बीड़ी सिगरेट पीना ये सब गंदे आचरणों की तरफ बढ़ रहे हैं। जो धर्म से चलते थे वो लोग भी अपने आचरण बिगाड़ रहे हैं।

कलयुग का बड़ा विचित्र प्रभाव चल। मतलब बहुत कम लोग होंगे जो नशा ना करते हो। कोई नशा नहीं। बहुत कम लोग होंगे ऐसे जो कोई नशा ना करते हो। बहुत कम लोग होंगे ऐसे जिन्होंने जीवन में कभी शराब अपनी जिभ्या पे नहीं रखी। बहुत कम लोग होंगे जो पराई माता बहनों की तरफ गंदी दृष्टि ना की हो। या पराए पुरुष की तरफ गंदी दृष्टि ना की हो। तो इन सब बातों को देखते हुए लग रहा है कि अगर हम सुधर जाए तो सुधर जाए नहीं तो कलयुग का और प्रभाव बढ़ता चला जाएगा। हमको गिराता चला जाएगा।

हम सब गिरते चले जाएंगे। और हम आज इसी को जीवन मान लिया है। अध्यात्म शून्य जीवन को जीवन मान लिया है। धर्म ग्रंथों के अनुसार चलना, संत वाणी के अनुसार चलना, परम पवित्र जीवन रखना यह तो बहुत मतलब दुर्लभ चीज होती जा रही है। फिर भी सत्संग के प्रभाव से आज हमारा समाज बदल रहा है। आज हमारे समाज के नवयुवक जन बदल रहे हैं। उनके जीवन चरित्र अच्छे हो रहे हैं। ऐसा हमको यहीं बैठे-बैठे सुनने को मिलता है। जब हमारे सामने नवयुवक जन बोलते हैं। हमने सब त्याग दिया और हम अच्छे मार्ग में चल रहे तो हमें बड़ा हृदय में शीतलता होती है।

अच्छा लगता है कि हमारी समाज सुधर रही है। अंजलि शर्मा जी मध्य प्रदेश से राधे राधे-धे महाराज जी महाराज जी मेरा सवाल है कि जीवन की कठिन परिस्थिति में कैसे निपटे उस नाम जप जितना नाम जप होगा तो बड़ी से बड़ी कठिन परिस्थिति को भी आप आनंद पूर्वक सह कर लांग सकते हैं। अगर भजन नहीं है फिर बुद्धि काम नहीं करेगी। चाहे जितना बुद्धि लगाओ भजन के बिना काम नहीं करेगी। भजन और भगवत कथा यह दो में सामर्थ्य है कि बड़ी-बड़ी विपत्तियों के समय को भी काट लेगी। अगर हम भगवत कथा सुनने में रुचि रखें और नाम जप में रुचि रखें तो बड़ी से बड़ी समस्याओं का समाधान मिल जाएगा।

खुद अनुभव की बात कहते हैं कि बड़ी-बड़ी कठिनाइयों में, बड़ी-बड़ी परेशानियों में भी जो आपको परेशान ना होने दे, दुखी ना होने दे, वह है भगवान का नाम। जो आपको नाम प्रिय हो वो खूब नाम जपिए। उसी से आपको अध्यात्म बल मिलेगा। उसी शीतलता से आप बड़ी-बड़ी जो जलन है ताप है उनको आप पार कर जाएंगे। जासनाम भव भषज हरण घोर त्रशूल दैहिक दैविक भौतिक तीनों तापों को नष्ट करने की सामर्थ भगवान के नाम में जासु नाम भव भषज हरण घोर त्रशूल तीनों प्रकार के ताप चाहे शारीरिक हो चाहे मानसिक हो चाहे दैविक सब सब प्रकार के तापों का शमन करके हृदय को आनंदित करके और संसार से उद्धार करवा दे वह भगवान का नाम है।

इसलिए नाम जप करो तो बड़ी से बड़ी कठिन परिस्थिति भी आपको परास्त नहीं कर पाएगी। ये भक्तों के चरित्र में देखो देखो मीरा जी का चरित्र कितना कठिन परिस्थिति जहर तक पिलाया गया। देखो प्रह्लाद जी का चरित्र अग्नि में जलाया गया। जहर पिलाया गया। कितना कितना कष्ट दिया गया। देखो कितनी कठिन परिस्थिति ठाकुर हरिदास जी के ऊपर। 22 बाजारों में मारकोड़े उनकी खाल खींच ली गई। किस बात के लिए? केवल भगवन नाम जप। तो किसने संभाला? नाम जपने। भगवान का नाम जप करते थे। उसी के बल से सब कुछ सह गए और पुनः बड़े-बड़े सम्राट आकर उनके चरणों में घिरे।

क्षमा याचना की। इसलिए नाम जप सबसे बड़ी सामर्थ है। गोपाल रामविलास गुप्ता जी राधे-राधे। जी राधे-राधे महाराज जी। पर जी अभी जो चर्चा हुई उसी के रिगार्डिंग इनका प्रश्न था कि आज समाज में विचारों, जीवन शैली और मान्यताओं के आधार पर विभाजन की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। ऐसे में सामाजिक समरसता और सद्भाव को वास्तविक रूप में स्थापित करने के लिए व्यक्ति को मतलब क्या करना चाहिए? क्या व्यवहार अपनाना चाहिए? या हमें अपने आप में क्या परिवर्तन? देखो हम खूब उच्च स्वर से कहते हैं।

जब तक आप अध्यात्मवान नहीं बनोगे तब तक सुधरने वाला नहीं। ना आप सुधरोगे ना समाज सुधरेगी। आपको अध्यात्मवान बनना पड़ेगा। आपको पवित्र भोजन पाना पड़ेगा। पवित्र आचरण करना पड़ेगा। पवित्र ग्रंथों का स्वाध्याय करना पड़ेगा। पवित्र संतों का संग करना पड़ेगा। इसी से सुधरोगे। अन्यथा अगर यह कोई समझे कि हम समाज को धन देकर या भोग सामग्री देकर या सुविधा देकर सुधारा जा सके तो असंभव है। भाई भाई में पिता पुत्र में पति पत्नी में आज प्रेम नहीं रह गया। आज दिखाई नहीं देता।

प्रेम नहीं दिखाई देता। पति संशय में है। अपनी पत्नी पर पत्नी संशय अपने पति पर। माता-पिता को लगता है पता नहीं जीवन हमारा कट पाएगा कि नहीं कट पाएगा। बच्चों के बीच में जो वयोवृद्ध हो गए हैं। मतलब बड़ा संकट पूर्ण आज हमारा समाज होता जा रहा है। नए बच्चे उददंडता की मूर्ति होते जा रहे हैं। असभ्य बर्ताव करना, नशा करना, इधरउधर की गंदी बातों में चित्त देना तो बड़ा समाज का ऐसा जो कुछ हिस्सा सुधर रहा है वह संत समागम जो संतों की बात सुन रहे हैं अपने आचरणों में उतार रहे हैं वही सुधर रहा है नहीं शेष मनमानी आचरण हो रहे हैं बहुत से लोग तो हमारे पास आते नहीं इस बात से कि हम जाएंगे तो बाबा छुड़वा देगा नशा छुड़वा देगा गंदी बातें छुड़वा देगा जब तक संत संग नहीं होगा शास्त्रों का स्वाध्याय नहीं होगा आध्यात्मिकता नहीं होगी होगी तो हमारे समाज में प्रेम नहीं आएगा यार।

मतलब हमारी यही समझ नहीं आता। भाई भाई से प्रेम नहीं कर रहा। एक मां के उदर से पैदा हुए हैं। भाई भाई से प्रेम नहीं कर रहा। बेटा मां को प्यार नहीं कर रहा। मां बेटे को प्यार नहीं कर रही। पिता पुत्र परिवार सब संबंधों में खटाई आती जा रही है। छल कपट घुसता चला जा रहा है। मतलब जीवन कैसे जिएंगे? जब आप सोचो आपको अपनी पत्नी पर विश्वास ना हो या पत्नी को आप पर विश्वास ना हो तो आप कैसे जिएंगे माता-पिता पुत्र परिवार आपस में सब मतभेद ला कैसे जिओगे उस घर को नरक बना दिया जाता है जहां छल कपट और प्रेम नहीं होता है वो घर नरक हो जाता है तो गृहस्ती तो परम पावन सुख देने वाली होती है दिन भर मेहनत करके आए पत्नी ने मुस्कुराकर स्वागत किया बच्चों को गोद में दुलया और बूढ़े माता-पिता के चरण छुए उनकी सेवा की बड़ा आनंदमय खुशहाल परिवार यही जीवन गृहस्ती का अब खुशहाल कैसे रहे सब सुविधा है लेकिन अपने भाई से द्वेष है अपने भाई की उन्नति सहन में नहीं आ रही अपने भाई की तो हमें तो बड़ा आश्चर्य लगता है कि कलयुग महाराज की बड़ी विचित्र लीला कलह पति पत्नी में झगड़ा भाई भाई में झगड़ा मतलब बहुत विचित्र दशा है।

अगर संभला जाए तो आनंदमय जीवन हो सकता है। नहीं तो बड़ा आश्चर्यमय है। बड़ी ऊंचाई से लेकर नीचे तक जो है इसका प्रभाव है। तो हमें लगता है कि अगर हम अध्यात्म से नहीं जुड़ेंगे तो हमारे द्वारा ऐसी गलतियां होती रहेंग और यह कलह अशांति छल कपट जहां घुस गया वो जीवन बर्बाद कर देता है। उस परिवार को बर्बाद कर देता है। और प्राय घरघर में कलह हो रही है। कलह घर-घर में हो रही है। यह नहीं होना चाहिए। क्षमावान बनो, सहनशील बनो, अध्यात्मवान बनो। तभी समाज सुधर सकता है। दिव्या सिंह जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी नाम निष्ठा कैसे दृढ़ हो?

नाम हृदय में प्रकाशित कैसे हो? नाम जपने से अधिक से अधिक बार-बार नाम जप करें। अधिक समय नाम जप करें। खूब श्रद्धा पूर्वक नाम जप करें। सम्मान पूर्वक नाम जप करें तो हमारी नाम निष्ठा प्रकट हो जाएगी। सातों दीर्घकाल निरंतर सत्कार सेवितो दृढ़ भूमि पातांजलि जी कह रहे हैं यदि दीर्घकाल माने लंबे समय तक सत्कार पूर्वक आदर सहित बार-बार नाम जप करें तो दृढ़ भूमि नाम निष्ठा जागृत हो जाएगी। सात दीर्घकाल निरंतर निरंतर सत्कार आदर सहित सेवितो खूब नाम का स्वाद ले लेकर राधा राधा राधा राधा राधा तो हृदय में दृढ़ भूमि फिर हृदय में स्वयं चलने लगेगा नाम निष्ठा नाम प्रेम सब नाम जप से आ जाएगा पहले हम जबान से नाम जपना खूब अभ्यास करें मन में मन के चक्कर में ना पड़े कि मानसिक नहीं पहले हम जिभ्या जिभ्या वर्तते नाम त्यम जिसकी जिभ्या के अग्र भाग पर आपका नाम विराजमान है तो हम खूब नाम जप करें जिभ्यास राधा राधा राधा राधा राधा तो हमारे अंदर गूंज हो

जाएगी नाम की फिर मन पकड़ लेगा जब मन पकड़ लिया फिर तो बात बन जाती है मन पकड़ ले नाम जप को तो सोवत हो रसना रटे राधा कृष्ण सुनाम पूज्य श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी के लिए आता है जो राधा कुंड के थे सोवत हु रसना रटे राधा कृष्ण सुनाम वो सोते थे तो उनके जिभ्या से निकलता था राधा कृष्ण राधा कृष्ण राधा कृष्ण राधा लेकिन नियम बहुत जोर का था इसीलिए सबकी स्थिति ऐसी आना बहुत मुश्किल है लौन तक्र ब्रज को लियो परसो नहीं कछुआ नमक और मठा इसके सिवा कुछ नहीं खाया और वह

भी ब्रजवासियों का लौन माने नमक तक्र माने मठा लौन तक ब्रज को लियो परस नहीं कछु दान रघुनाथ दास गोस्वामी जी के लिए आता है केवल छाछ और नमक डालकर के वही लेते थे 12 महीना बस इतना ही आहार था सोचो केवल छाछ और नमक डालकर लेते तब उनके सोवत हो रसना रटे राधा राधा कृष्ण सुना हर्ष जी गुजरात से राधेधे गुरु जी राधे-धे महाराज जी महाराज जी क्या भगवत प्राप्ति होने से पहले साक्षात भगवान का दर्शन होना संभव है वैसे हम ये कह रहे हैं कि भगवान कभी भी किसी को भी मिल सकते हैं इसमें हम संशय नहीं करते पर बिना भगवत प्राप्ति की योग्यता आए भगवान है तो सब जगह दिखाई थोड़ी देंगे कोई कण ऐसा नहीं भगवान ही कण बने हुए हैं तो भगवान की प्राप्ति की योग्यता आती है अंदर तब भगवान दिखाई देते हैं।

देखो जैसे जो श्री कृष्ण रूप अर्जुन के साथ है हम उसे नहीं देख सकते पक्का हम नहीं देख सकते और जिसे अर्जुन श्री कृष्ण रूप को देख रहे हैं वह विराट रूप को नहीं देख सकते विराट रूप के लिए दिव्य दृष्टि दी ना तब उनहीं श्री कृष्ण में विराट का दर्शन हुआ। वही श्री कृष्ण विराट रूप में दिखाई दिए। हमको वही श्री कृष्ण नहीं दिखाई दे रहे जो अर्जुन के सारथी है। अर्जुन को वो श्री कृष्ण तो सहज दिखाई दे रहे लेकिन विराट रूप नहीं दिखाई दे रहा। विराट रूप के लिए उनको द दिव्य दृष्टि प्राप्त करनी पड़ी।

तो कण-कण में भगवान है। पर जब तक हमारी योग्यता नहीं होगी तब तक हमको नहीं। अब ऐसे कोई कि हमें भगवान मिल गए हैं तो हम उसको भी प्रणाम करेंगे क्योंकि किसी भी तरह भगवान से जुड़ने की बात करें तो प्रणाम लेकिन बिना योग्यता के योग्यता यही है कि निरंतर नाम जब चल रहा है सारे काम क्रोधा आदि दोष नष्ट हो चुके हैं। वो भगवान के प्रेम में उन्मत्त है। अब वो कुछ भी कहे दुर्लभ नहीं है। भगवान की लीला में प्रवेश हो जाना है। भगवान का दर्शन करना वो बात अलग। एक आए थे हमसे बोले हम भगवान का साक्षात्कार किए कहा सब लोग प्रणाम करो भाई भगवत साक्षात्कार महापुरुष आया प्रणाम करो तो सब लोगों ने प्रणाम किया वो तो सीधे साधे सरल भगत होते सब ने प्रणाम किया थोड़ी देर बैठा रहा उसने कहा कोई हमारी बात मानता नहीं है और हमको लोग उपहास करते हैं हमको ही भगवत प्राप्त मानते नहीं है फिर हम उनसे कहा लोग अभी दिखाई दे रहे हैं अभिमान की चाह है अभी भी आपको यश की चाह आपको भगवान मिल गए।

ऐसे बातें बना लेना बहुत सरल है। लेकिन काम पर विजय प्राप्त करना क्रोध पर विजय प्राप्त करना। मोह मद मत्सर इन दोषों पर तब भगवत प्राप्ति की योग्यता होती है। भगवत प्राप्ति ट विकार जित अनघ अकामा पाप रहित कामना रहित छह विकारों पर विजय प्राप्त काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर ट विकार जित अनघ अकामा कहां है ट विकारों पर विजय प्राप्त करना कोई खेल तमाशा काम क्रोध लोभ मोह पूरा जीवन साधु महात्मा अपना लगा देते हैं इसी पर कि कोई विकार हमारे अंदर ना रह जाए कोई दोष ना रह जाए तो ऐसे बात अलग है।

लेकिन अगर भगवान चाहे तो किसी को भी भगवान कृपा कर सकते हैं। भगवान का नियम नहीं है कि वो आपसे भी मिल सकते हैं। अभी मिल सकते हैं क्योंकि मालिक है कभी मिल सकते किसी पर जब आपसे मिलेंगे तो आप बता नहीं पाएंगे कि आपको भगवान मिले। आपकी आंखें, आपका रोम रोम, आपका हृदय देखकर कोई पहचान ले तो पहचान ले। आप अपने मुंह से नहीं कह सकते कि मुझे भगवान मिल गए। जिसे भगवान मिल जाते हैं वो कभी मुख से नहीं कह पाता। यह पहचान होती है। उसकी रोम रोम बताएगा भगवत प्राप्ति। उसकी आंखें बताएंगी।

उसका हृदय बताएगा उसका कि वो किस कोटि का महात्मा है। किस कोटि का लेकिन वो मुख से नहीं कह सकता वो कुछ। प्रेम में ये अपने प्रीतम के मिलन की बात कोई कह पाता है क्या? कोई नहीं कह पाता। अपने प्यारे के मिलन की बात नहीं कह पाता। अगर कहता है तो सूखा है वह प्रेमी नहीं है। और जो प्रेमी है वो अपने प्यारे के मिलन की बात नहीं। प्यारे की बात आते ही अशुभ प्रवाह चलने लगेगा। शरीर कांपने लगेगा। उसकी दशा बदल जाएगी। वो बता कैसे पाएगा? यही बात यही परिचय बताएंगे। नेत्र रोम रोम शरीर पुलकित यह परिचय बताएगा कि भगवान का भक्त है।

यह भगवान से जुड़ा हुआ है। वो वाणी से नहीं कह पाता कि हम भक्त हैं या हम प्रेमी हैं या हम ज्ञानी हैं। वो तो सूखे हृदय वाले ऐसी बात बोलते हैं। जिनका हृदय प्रेम में डूबा है वो ऐसा नहीं बोलते। अमित जी जय राधे। राधे-राधे महाराज जी। महाराज जी कितना भी खुद को शरीर या जीव कहकर संबोधित कर लूं यह देह भाव वैसा का वैसा ही बनाओ। बिना भजन के ऐसे थोड़ी चला जाएगा। भजन करना पड़ेगा। ऐसा थोड़ी है। इंजेक्शन लगेगा तो आपको ही पीड़ा होगी। यह थोड़ी कि शरीर को जशन लग रहा है।

आप निरपेक्ष है। ऐसा नहीं। बस उस समय भजन चल रहा है। तो निरपेक्षता आने लगेगी। सह जाओगे। व्यथित नहीं होगे। कहा पीड़ा तो होगी। पीड़ा तो सिद्धों को भी होती है। चांटा मारोगे तो गाल में दर्द नहीं होगा। लेकिन उसको विवेक के द्वारा काटा जाता है। शरीर का प्रारब्ध था उसको शांत। ऐसी एक स्थिति आती है अवधूत स्थिति जिसमें शरीर की शुद्ध नहीं है। वो तो बहुत बड़ी स्थिति है। तो खूब भजन करो। भजन से ही परिपक्व होगे। जितना भजन करोगे उतना मोह नष्ट होता जाएगा। जितना मोह नष्ट होता जाएगा उतने आप निरपेक्ष होते जाओगे शरीर से।

ऐसे संतों को देखा गया कि उनके पैर में कीड़ा पड़ गए तो कीड़ा अगर निकल के गिर जाता है तो उठा के रख देते हैं। ए भैया तेरा भोजन पा अब सोचो एक चींटी काटे कितना कष्ट होता है। उनके पैर में कीड़ा तो ऐसे वो वो है शरीर से निरपेक्ष महापुरुष उनको ज्ञान है। जैसे तकिए पे कीड़ा लगा हो तो हमको क्या फर्क पड़े? क्योंकि हम कोई तकिया तो है नहीं। ऐसे हम कोई शरीर तो है नहीं। शरीर को कष्ट हो रहा है तो हमको क्या पर ऐसी स्थिति प्राप्त होना ये बहुत बड़ी बात है। बातों से नहीं प्राप्त होती कि मैं शरीर नहीं हूं।

ऐसे नहीं प्राप्त होता। नाम जप करो, अच्छे आचरण करो, परोपकार करो। यह सब देखकर भगवान कृपा करेंगे आपके ऊपर तो आपको असली ज्ञान प्राप्त हो जाएगा। एक होता है नकली ज्ञान। अनुभव नहीं है ना तो वह ज्ञान काम नहीं करेगा। असली ज्ञान होता है जो हृदय से उत्पन्न होता है। जो भजन करने से, तपस्या करने से, व्रत अनुष्ठान करने से, भगवत आराधना से जो ज्ञान होता है वो माया का नाश करता है। अगर पढ़ लिख के ज्ञान होता तो बहुत लोग माया का नाश कर लेते लेकिन वो ऐसे नहीं होता है।

ना आत्मा प्रवचनेन लभ्या न मेधया न बहुना श्रतेन यह आत्मज्ञान ना बहुत प्रवचन करने वाले को होता है ना बहुत सुनने वाले को होता है ना बहुत बुद्धिमान को होता है आत्मा जिसे वरण कर लेती है उसे होता है तो खूब डट के भजन करो तब शुद्ध ज्ञान प्राप्त होगा अदिति जैन जी मथुरा से राधे-धे महाराज जी गुरु जी असली सुख किस में है मनोकामनाओं को पूर्ण करने में अथवा नहीं असली सुख है मनोकामनाओं की त्याग में जिसे शांति कहते हैं सुख कहते हैं भगवान गीता जी में कहते हैं त्यागा शांति अनंतम भोगों की इच्छाओं का त्याग करने से ही शांति और सुख की प्राप्ति होती है और हम लोगों की बुद्धि उल्टा प्रेरणा देती है कि जो भोग की इच्छा हो अगर भोगने को मिल गया सुख मिल गया ऐसी मान्यता होती नहीं त्यागा निरंतरम जाह न चाहे कबहु कछु तुम सन सहज सनेह बसहु निरंतर तास सुर सो राहुल निज के जिसे कोई चाह नहीं होती भगवान से उसका सहज में प्रेम हो जाता है और जिसका भगवान से सहज प्रेम हो जाता है उसके हृदय में भगवान प्रकाशित हो जाते हैं।

जब हृदय में प्रकाशित होते हैं तो जड़ चैतन्य सब में भगवान का दर्शन होता है। तो भगवत प्राप्ति से बढ़कर कोई सुख तो है नहीं। तो शांति और सुख की प्राप्ति कामनाओं के त्याग में है ना कि कामनाओं के भोग में। ये अच्छी तरह से समझ लो। हमारी बुद्धि हमको उल्टा सिखाती है। यह कुमति है। वो कहती है कि भाई मन ने कहा यह भोग लो सुख मिलेगा। बस इसी में हम गिरते चले जा रहे हैं। यही गलती हमारे को बार-बार इस दुखाले संसार में दुख भोगने के लिए मजबूर कर देती है। इसलिए भगवान का नाम जप करो और जो इच्छाएं सद हो धर्म पूर्वक हो उनको तो भोगो और जो अधर्म पूर्वक हो उनका त्याग कर दो।

इच्छाओं के सब इच्छाएं नहीं त्याग की जाती। अब जैसे हमें प्यास लगी, हमारी इच्छा हुई कि पानी पीना है तो हम पानी पिएंगे। अब हम कहां पीना है, कैसे पीना है, यह सब समझ-बझ के अपनी प्यास बुझाएंगे। इसमें कोई भूख लगी है। यह शरीर धर्म की इच्छा है। हम देखेंगे कि हम भिक्षावृत्ति के द्वारा पवित्र अन्न लेकर हम अपने उदर का पोषण करेंगे या धर्म के द्वारा कमाकर गृहस्थ धर्म में हम अपने उदर का पोषण करेंगे। अब काम वेदना सता रहे तो गृहस्थ धर्म में हो अपनी पत्नी है कोई पाप नहीं विरक्त धर्म के लिए तो वो अलग ही मार्ग है वो इन सबको सहता है इसीलिए जगत तो नमस्कार करता है विरक्तों को संतों को जगत नमस्कार क्यों करता है कि जहां हम सहन नहीं कर पाए वहां आप सहन करके निकल गए भगवान की तरफ तो आपके चरणों में पूरा संसार संतों के चरणों में झुकता है तो अब गृहस्थ धर्म में जैसे अपनी पत्नी से पाप लेकिन पराई पत्नी की तरफ दृष्टि भी अगर दूषित दी तो पाप दृष्टि हो गई क्रिया हो जाना तब तो नरक की मतलब पूरी तैयारी कर ली उसने त्रिविध नरकसदम द्वारम नासन मात्मन काम क्रोधा तथा लोभा तस्मा देत्र तीन नरक के द्वार भगवान श्री कृष्ण चंद्र जी ने बताए काम क्रोध और लोभ अगर इनमें फंसे रहोगे तो पक्का नरक जाना पड़ेगा।

तो अब काम नरक का भी द्वार है और काम धर्म का भी स्वरूप है। अपनी पत्नी से सहवास करके संतान उत्पत्ति करना यह धर्म पूर्वक काम है। और पराई स्त्री की तरफ कुदृष्टि करना और सहवास करना यह नरक का द्वार है। लोग धर्म पूर्वक कमाए हुए धन से हम अपने परिवार का पोषण कर रहे हैं और धर्म पूर्वक धन हम कमाए जिससे हम समाज की भी सेवा कर सके। कोई पाप नहीं लेकिन बेईमानी पूर्वक घसखोरी चोरी अधर्म पूर्वक कमाना धन यह नरक का द्वार है काम और क्रोध क्रोध तभी प्रकट होता है जब कामना में पूर्ति नहीं होती कामा संजयते क्रोधा तो हम कामनाएं सद करेंगे और जब वो नहीं पूरी होंगी तो हम भगवान की इच्छा मानकर शांत हो जाएंगे लेकिन असद कामनाओं में ऐसा नहीं होता जब असद कामनाएं पूरी होती है तो पूरी ही होनी नी चाहिए और नहीं पूरी होगी तो क्रोध आ जाएगा तो हमें लगता है कि भगवान का आश्रय लेकर कामनाओं के त्याग में

ही सुख है ना कि कामनाओं के भोग में ऐसा संत और शास्त्र सम्मत बात है महप शरण जी मुंबई से श्री राधे श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी क्या आप रोज एक ही दिनचर्या से थकते नहीं है सुबह एक 2 बजे उठो फिर वही दैनिक दिनचर्या वगैरह यही बात सभी सहयोगियों पे लागू होती है महाराज जी थकने की तो बात जाने दो समय कम पड़ता है रोज ऐसा लगता है कि आज हमारा भजन कम हुआ आज हमारे और समय मिलता और भजन करता 24 घंटे में 1 मिनट में ना टीवी है ना ट्रांजिस्टर है ना मोबाइल है ना पेपर है ना किसी व्यक्ति से हंसी मजाक है किसी से किसी भी तरह का कोई संपर्क भी नहीं बस इतना ही संपर्क है जो एकांतिक में आप लोगों से प्रश्न उत्तर कर लेते हैं।

शेष एकांत जो भगवान के चिंतन मनन की धारा है बस उसे उबने की तो बात तब होती है जो मन के प्रतिकूल कार्य किया जाए तब उबने की बात होती है। अब मन राजी हो गया भजन में तो उसको तो और समय मिले। अधिक से अधिक समय मिले। रात में जग के भजन हम 1:30 बजे जग गए थे। 1:30 बजे से हमारी दिनचर्या ऐसे भी नहीं हुआ। 1:30 बजे से दिनचर्या चल रही और बराबरी चलती रहेगी। तो थकने का तो नाम नहीं अंदर और जलन है कि अभी जो भजन होना चाहिए जितना होना चाहिए उतना नहीं हो पा रहा हमसे। हमें और भजन करना है।

अगर हमारी किडनी ठीक होती तो शायद और हम भजन कर पाते। हमारे तो अंदर जलन है कि अब जितना करना चाहिए उतना नहीं कर पा रहा हूं। उबन कैसे हो सकती है? क्यों? किसका प्रश्न है? उबन कैसे हो सकती है? वही रूटीन आता है सेम सुबह उठे पूरा साल इतना सुखद रूटीन है कि वो इतना आनंद देता है कि उसमें और मांग होती है और मांग होती है इससे बढ़कर और क्या हो सकता है सोचो उबन तो तब हो जब सांसारिकता हो हमारे प्रभु नवम नवम हमारे प्रभु की बात नवम नवम हमारे प्रभु का नाम नवम नवम हमारे प्रभु की लीला नवम नवम हमारे प्रभु की साधना का आनंद नवम लोग नयो नेह नवंग नयो रस नवल श्याम वृषभानु किशोरी नव पीतांबर नवल चुनरी नई नई बूंदन भजत गोरी नव वृंदावन हरित मनोहर नव चातक बोलत

मोर मोरी नव मुरली जु मल्हार नई गति श्रवण सुनत आए घनघोरी नव भूषण नव मुकुट विराजत नईनई उप लेत थोरी थोरी जैसे हित हरिवंश आशीष देत मुख चिर जीवो भूतल हजोरी सब कुछ हमारे प्रभु का नया है पुराना हो तो जीव बे नाम नया नया लगता है रूप नया नया लगता है सब नवम नवम है पुराना हो ना तो ये लगे यार बार-बार रिपीट कर रहे हो थकान लगे मुझे थकान नहीं मुझे और नशा चढ़ता है और जपूं और देखूं और गाऊं और रटूं और जगूं और रोऊं ऐसा लगता है तो हमें तो थकान तो महसूस नहीं होती उबन भी महसूस नहीं होती गुरु कृपा से बस यही लगता है कि और भूख लग रही है और भजन की भूख लग रही है और प्रभु के लीला गायन की प्रभु के लीला चिंतन की तो इसमें उबंत तो है सांसारिक दृष्टिकोण से तो ये सब क्योंकि हम नए-नए नया चीज देखना चाहते हैं।

जैसे आप पूरे साल यही पीला ही डालना है। तो लाल डाल सकते हैं, पीला डाल सकते हैं। काला डाल सकते हैं। तो यही तिलक लगाना है। उतना ही करना है श्रृंगार भी प्रभु का। तो इसमें उबन नहीं होती महाराज जी। नहीं बिल्कुल नहीं होती। अच्छा और क्या है? चलो आज अमेरिका घूमने चलते हैं। आज बोर चलते हैं। पूरे साल छ महीने वृंदावन में इसी कुटिया में रहते हैं। हां नहीं उब कुटिया तो बहुत बड़ी है। हमको तो रसोई जितना भी मिल जाए तो एकांत में समय व्यतीत करने बस चुपचाप निरंतर चित्त को प्रभु में जब लगा देते हैं ना तो सब बाहरी बातें अच्छी नहीं लगती।

तो अब वो चीज जो बचपन से मिटाने में लगे थे गुरु कृपा से वो चीज मिट गई है। तो अब ये सब कुछ अच्छा नहीं लगता। महाराज जी कल हम एक पद पढ़ रहे थे। आपकी यही स्थिति का वर्णन भोरी सखी जी लिख रही है। एसो दुख दीजिए ही माही। बिनु पद कंज छटा दृग देखे को सुहावे नाही। नाम रटे दृग ढारे आंसू छिन छिन अति अकुलाह। काहू सो मिलवो ना सुहावे बातन सो घबराह। बस्ती छोड़ी एकांत बैठी वो जग सब छुण्य दिखा। ऐसे दुख बिनु प्यारी जीवन जन्म। बिल्कुल महापुरुषों की मर्जी ऐसी स्थिति हो जाती है।

बहुत सारे पद बहुत सारे ऐसे विरा कि किसी कुछ अच्छा ना लगे मतलब ये संसार अच्छा ना लगे कहीं बस कोने में बैठ के रोती रहूं बस समझ में आ रहा है आपको और महाराज जी एक इनका प्रश्न है कि महाराज जी इतनी आपको साधना करते हुए समय हो गया है और कुछ ऐसे दिन नहीं आए जिसमें आपको लगा चलो अभी घर चलते हैं वापस कभी नहीं गुरु कृपा से कभी नहीं एक एक सप्ताह भोजन नहीं मिला गर्मी सर्दी बरसात ऐसे ही सहे कभी स्वेटर नहीं मिला, कभी कंबल नहीं मिला। गंगा के किनारे भ्रमण करते रहे।

आज के मतलब 27 वर्ष पहले 27 साल तो वृंदावन रहते हो गए। ये अभी जो सुविधा देख रहे हो 10 12 वर्ष के है। पूरा जीवन कष्ट में पर भगवान की कृपा से कभी एक दिन भी ऐसा नहीं आया। चलो घर चलते हैं। जिस दिन से घर से निकले आज तक घर नहीं गए। जिस दिन से घर की रसोई में भोजन पाकर त्यागा आज तक कभी किसी के घर की रसोई में भोजन नहीं किया। अब यहां वृंदावन में थोड़ा नियम शिथिल हो गया। शरीर रोग ग्रसित है तो यहां बन जाता है। कोई बना के दे दिया तो ऐसे नहीं माधुकरी के सिवा और आकाश वृत्ति आकाश वृत्ति जो हमारे सामने परमात्मा भेज दे वही हम खाएंगे अन्यथा नहीं खाएंगे।

किसी से मांगेंगे नहीं। बहुत आनंद का विषय है क्योंकि अब आप लोग ऐसे संसार में लगे हो तो वहां से देखने पर लगता है कि यार हां ऐसा हां ऐसा दुख को हमने अपना साथी चुना है अपना मित्र चुना है तो सुख की अगर चाह होती तो दुख से ऊबकर घर भाग जाने की बात होती जब मैंने दुख को ही अपना मित्र माना है तो सुख की चाह ही नहीं है सांसारिक सुख की चाह ही नहीं है सुविधा यह सब हम इन सुविधाओं के अधीन नहीं है। एसी फसी यह सब सुविधा इसके तो आज शरीर रोग ग्रस्त है इसलिए इसे स्वीकार किए हैं।

नहीं उखड़वा को बाहर फेंकवा देते। हमारा स्वभाव ऐसा था। पर अब प्यास लगती है। पानी लिमिट में पीना है। इसके लिए हमें ठंडे वातावरण में रहना है। जिससे हमें अधिक प्यास ना लगे और बोलने की सेवा है और इसमें प्यास लगती ही है। तो दुख को ही हमने अपना साथी चुना है। हमने कभी सुख की आकांक्षा नहीं की। जतिन जी दुबई से श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आपने कहा था कि एक करोड़ नाम जप से शरीर निष्पाप हो जाता है पर हम एक साथ इतना नाम जप नहीं कर सकते रोज थोड़ा-थोड़ा जाप करें तो क्या यह सब हमारे खाते में जुड़ता जाएगा जैसे एक करोड़ नाम जप कोई बहुत नहीं होता है।

यदि लगन पूर्वक करो तो ज्यादा नहीं होता है। एक दिन में 3 लाख नाम जप किए जा सकते हैं। जब हम अधिक प्रयासरत होकर नाम जप करें तो एक दिन में 3 लाख नाम जप किए जा सकते हैं। तो एक करोड़ कितने दिनों में होगा? लगभग एक सवा एक महीने में हो जाएगा। तो कोई खास बात नहीं है। अगर हम 1 लाख नाम रोज जप करें तो महाराज जी लगभग तीन महीने में क्या इस जीवन को पवित्र करने के लिए हम 3 महीने नहीं लगा सकते और 1 लाख नाम जप करेंगे तो आपको 10 घंटा कम से कम टाइम मिलेगा काम करने का भी।

हम लगन लगावे ना हम इतनी संख्या सोच के परेशान क्यों हो जाते हैं? अरे अगर हम शस स्वास कई कई नाम जप करें तो बिना प्रयास के एक करोड़ हो जाएंगे। कोई प्रयास करना नहीं पड़ेगा। और देखो एक करोड़ यह तो बाहरी बात है। अगर हम आरत होकर आंसू बहाते हुए 10 बार भी राधा राधा बोलेंगे ना तो एक करोड़ वाले को मात कर देगा। एक करोड़ की एक संख्या पूरी की एक रोरो के जप रहा किशोरी जो ठाकुर मुझे दम से कुछ नहीं हो पा रहा राधा राधा राधा राधा तो जो करोड़ नाम से होता है ना दस नाम से भी हो जाएगा एकदम कनेक्शन मिलाकर के अगर एक नाम लिया जाए तो करोड़ नाम को फेल कर देगा एक नाम एक नाम त्रैलोक पर वो कनेक्शन पूरा अंदर अंदर का पूरा चिंतन प्रभु में पर वो अभ्यास करते करते होता है।

ऐसे थोड़ी हो जाता है। तो अगर हम अभ्यास करें तो एक करोड़ बहुत नहीं होता है। और जो हम नाम ले रहे हैं वो हमें पवित्र कर रहा है। विश्वास करो। गंगा जी में जो पवित्रता है, पाप नाशक शक्ति है, वह भगवान के चरणों से ही है। क्योंकि गंगा जी भगवान का चरण धोवन है। तो भगवान के नाम में अपार सामर्थ्य है। यदि हम भगवान का नाम जप कर रहे हैं तो अपवित्र पवित्रोवा सर्वांगतो यह स्मरे पुंडरिकाक्षम सवाभ्यांत सूची वो वाह और अभ्यंतर भीतर और बाहर दोनों से पवित्र हो जाता है जो भगवान का नाम जप करता है तो अधिक समय नाम जप करते करते करते कार्य करो अभ्यास कर लो जो कार्य करना है नाम जप करते हुए करो बिना माला के बिना काउंटर के भी तो जप होता है भगवान से कह दो आप गिन लेना ना आप गिन लेना हम तो धुआधार जप रहे हैं।

राधा राधा राधा राधा राधा महाराज जी कनेक्शन कैसे बनाया जाए भगवान से जो बनना चाहिए वो बन नहीं रहा है हां बनना चाहिए वो बन नहीं रहा पहले कनेक्शन कटे ना मैं महाराज जी मैं रहता हूं दुबई में तो वहां वहां अकेला रहता हूं फैमिली मतलब कि मैं और हस्बैंड वाइफ है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप दुबई में रहे आप अमेरिका में रहे आप हमारी गोपाल जी की भूमि में रह रहे हैं हमारे भगवान की भूमि में रह रहे इससे कोई फर्क नहीं देखो देश और उद्देश इसमें अंतर है। देश कोई भी हो सकता है लेकिन उद्देश्य हमारा यदि भजन है तो हमें कोई नहीं टाल सकता।

कोई नहीं हटा सकता। उद्देश्य सही था। तो विभीषण जी ने रावण के अत्याचारी लंका पर रहते हुए भी ऐसी महान भक्ति की कि भगवान ने कहा तुम सारी के संत प्रिय मोरे धरो देह नहीं आन नहीं नि होरे तो दुबई और अमेरिका और थाईलैंड और थाईलैंड इससे क्या फर्क पड़ता है कहीं भी शरीर रहे हम भगवान का नाम जप करेंगे हम खानपान पवित्र रखेंगे हम व्यभचार नहीं करेंगे हम शराब नहीं पिएंगे हम गंदी बात नहीं देखेंगे गंदी बात नहीं सुनेंगे गंदी बात नहीं बोलेंगे बढ़िया हो क्या परेशानी है?

कोई हमें परेशानी नहीं है। हम कितने आपको ऐसे भक्त बताएं कि आप आश्चर्य मानेंगे। अमेरिका में रहते हैं और शिष्य है और वहां अमेरिका में वृंदावन रस रीति का भजन कर रहे हैं। तो आप विचार कर सकते हो कि ऐसे भोग विलासी देश में भी रह के वो भोग विलास का त्याग करके और भजन कर रहे हैं। तो हम कहीं भी रहे हमारा उद्देश्य ठीक है तो देश बाधा नहीं डाल सकता। और हमारा उद्देश्य ठीक नहीं है तो हम किसी भी देश में रहे वो हमारे भजन के लिए बाधा पहुंचा देगा। भजन में बाधा पहुंचा देगा।

पक्का जो सावधान नहीं है उनके द्वारा पापाचरण हो रहा है। उनके द्वारा गंदी बातें हो रही हैं। उनके द्वारा प्रपंच हो रहा है। और जो संत गुरुजनों के शासन में है उन पर कृपा है तो फिर एक क्षण के लिए भी भगवान का विस्मरण ना करते हुए वो वृंदावन वास कर रहे हैं। तो अगर हम सावधान नहीं तो वृंदावन में भी हमसे गलती हो जाएगी। और अगर सावधान हैं तो अमेरिका में भी गलती नहीं होगी हमसे। हमें सावधान होना है। हमें नहीं करना है। ऐसे थोड़ा खुले दिमाग का होना चाहिए। ज्यादा उसमें नहीं।

चाहे 10 लोग बैठे नौ लोग मांसाहार है। तो 10वें हम अपने अन्न को पाकर के जो हमारे पास है हम उसको पाकर के मुंह पोछ राधा राधा चल दिया। कोई हमारे अंदर विकार नहीं। ऐसे होना चाहिए। क्योंकि संसार है अपनेप सब रंग ढंग है। अब व्यापारी हो या नौकरी पेशा वाले हो तो अब नहीं घर में भोजन है तो होटलों में ही भोजन पाना पड़ेगा। हां अपना अनुकूल भोजन ले लिया और बस जो हो रहा है आपका सत्संग सुन के लास्ट एक साल से महाराज जी हमने प्याज और लहसुन उधर छुआ भी नहीं है। हां बहुत सुंदर बहुत सुंदर और ठाकुर जी की सेवा भी है।

हां बहुत सुंदर बहुत सुंदर है। चिंता मत करो। खूब नाम जप करो। ओम नमो नारायण राधे राधे राधे राधे राम जी का सेवक सब आप महाराज से मिलना जरूरी है ऋषि फिर दो बात कल्याण की निरंतर गुरु मंत्र का सुमिरन होता रहे और देह भाव छूट जाए तो हमारी बात बन जाए। स्वरूप बोध हो या भगवत प्रेम हो दो से ही हम माया मुक्त होते हैं। स्वरूप बोध के लिए तीनों शरीरों का राग त्याग होना अत्यंत आवश्यक है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण का। यह मंत्राकार वृत्ति से होता है। हम जो वेदांत श्रवण करते हैं, उसका जो हमारे हृदय पर प्रभाव पड़ता है, वह सुमिरन से पड़ता है।

यदि हमारे अंदर प्रणव का जप नहीं है मंत्र जप नहीं है तो नमत्मा प्रवचनेन लभ्या न मेधया न बहुना श्रुतेन बहुत प्रवचन कर लेने पर वेदांत का आत्मबोध नहीं होता बहुत प्रवचन सुन लेने पर भी आत्मबध नहीं होता बहुत बुद्धिमान होने पर भी आत्मबध नहीं होता खूब सुमिरन करें उठते बैठते चलते फिरते देह भाव रहित विचरण करें। कर्ता भाव रहित कर्म हो, भोगता भाव रहित भोग हो तो हमें स्वरूप बोध प्राप्त हो जाए या प्रभु के चरणों में प्रेम दो के बिना मायामल का नाश नहीं होता। या तो निरंतर भगवदाकार वृत्ति या आत्म स्वरूप में स्थिति इसी से मोक्ष या भगवत प्रेम के द्वारा दिव्य लीलाओं में प्रवेश शेष फिर हमें जन्म लेना पड़ेगा।

अगर यह कार्य हम पूर्ण नहीं कर पाते तो हमें फिर जन्म लेना पड़ेगा। अगर हमारी मंत्रकार वृत्ति हो गई अव्यावत भजनात अखंड भजन उठते बैठते चलते फिरते या स्वरूप बोध तो बात बन गया भक्त को भी स्वरूप बोध होता है पर भगवत साक्षात्कार के बाद मम दर्शन फल परम अनूपा जीव पाव निज सहज स्वरूपा वो उसको स्वरूप बोध हो जाता है भगवान कराते हैं और जो ज्ञानी है वो वो शास्त्र और गुरु की आज्ञा पर चलते हुए अपने तीनों शरीरों का बाध करके वो अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है। और अगर हम भजन परायण नहीं रहे तो वेदांत श्रवण के बाद भी हमें आत्म स्वरूप का बोध नहीं होगा।

इसीलिए सनक सनंदन सनातन सनत कुमार चारों ब्रह्म ऋषि कुमार हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम रटते रहते हैं क्योंकि भगवान की शरण में भगवान के नाम में ऐसी महिमा है कि फिर माया स्पर्श नहीं कर सकते तो हमें चाहिए कि जो हमें गुरु जी ने मंत्र दिया चाहे वह प्रणव हो या कोई भगवान का नाम हो हर श्वास में निरंतर चलते रहना चाहिए महाराज जी आपके सत्संग दो लाए थे करत चोट कलेजे भीतर चमक उठे जिंदगानी रे मन चमक उठे जिंदगानी सुनो रे प्रेमानंद बाबा की वाणी सुनो मन प्रेमानंद बाबा की वाणी राग ना द्वेष ना मोह किसी से सबसे बढ़कर दानी आदर मान कर औरन का आदर मान कर और का आप रहे अमानी संतो आप रहे अमानी सुनो रे प्रेमंद बाबा की वाणी सुनो रे प्रेमानंद बाबा की वाणी क्या जाने विषय रस भोगी मोह माया लिपटानी क्या जाने विषय यन रस भोगी क्या जाने विषय य रस भोगी मोह माया लिपटानी कहे कहे हरिदास हरि का प्यारा कहे हरिदास हरि का प्यारा हरि में सूरत समानी संतो हरि में सूरत समानी बहुत जापान से आए तीन चार बार हमेशा दो ढाई साल से जापान तीन चार

साल से राधा राधा हिंदी आती है? नो नो हिंदी ट्रांसलेट YouTube अपने आप ट्रांसलेट करके आप हमारा प्रवचन सुनते हैं? राधा राधा राधा राधा श्री राधा श्री राधा महाराज जी ऐसी कृपा हो निष्काम भावना की कोई ऐसी भक्ति बताओ कोई कामना ना रहे नाम में ही सामर्थ बिना कामना कोई कामना ना हो जितना नाम जप करोगे तो सब कामनाएं भस्म हो जाएंगी नाम जप में है नाम जप के बिना कुछ नहीं हो सकता कोई तो कृपा ठाकुर हां नाम जप करो खूब नाम जप करो राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा

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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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