एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1119 · 10 दिसंबर 2025
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की समस्त संत हरि भक्तन की वृंदावन धाम की सदगुरुदेव भगवान की जय उषा जी मुंबई से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी अपने किसी प्रिय को खो देने के बाद हृदय में उमड़ती हुई दुख और शोक और ग्लानी शंका तड़प फन को कैसे शांत किया जा सकता है?
ज्ञान के द्वारा अज्ञान में मोह से ग्रसित होकर के सारा संसार दुखी हो रहा है। जब तक ज्ञान नहीं होगा तब तक रोना नहीं होगा। कौन हमारा है? सब में भगवान विराजमान है। वही जब अंतर्ध्य हो जाते हैं तो कहा जाता है मर गया। और जब वही चैतन्य रूप होते हैं तो कहा जाता है जिंदा है। अब हमारे गर्भ से प्रकट हुआ या हमारे घर में प्रकट हुआ तो हम मान लेते हैं हमारा है। वो चैतन्य घन परमात्मा अपने कर्मों का भोग भोगने आता है और फिर चला जाता है। उसका किसी से संबंध नहीं रखता।
हम अपनी तरफ से संबंध मानकर रोने लगते हैं। पांच तत्व पांच तत्वों में विलीन हो गए और आत्मा कर्मों को लेकर नए जन्म में चला गया। हम यहां बैठे रो रहे हैं उसके लिए मोह के कारण जब तक मोह नाश नहीं होगा तब तक यह रोना धोना बंद नहीं होगा इसका नाम मृत्यु लोक है यहां सब मरेंगे चाहे जो कोई हो चाहे दुरात्मा हो चाहे महात्मा अच्छा हो चाहे बुरा सबको यहां शरीर छोड़कर जाना पड़ेगा फिर रोना क्यों किस लिए रोना जिसकी जितनी आयु है उतना रहेगा इसके बाद चला जाएगा जो पहले से तैयार ना थे पछता पछता कर चले गए हम तुम सबको जाना है जाने की तैयारी कर लो नाम जप करो भगवान के आश्रित रहो भगवान के लीला चरित्रों को सुनो तो ये मोह नष्ट हो जाएगा मोह नष्ट होते ही आनंद की अनुभूति होगी रोना धोना थोड़ी होगा अब अज्ञान की दशा है इसलिए रोना आ रहा है कि मेरा पुत्र चला गया मेरा भाई भाई चला गया।
मेरा मित्र चला गया। मेरा पति, मेरी पत्नी ऐसे यहां जाना है सबको। अपने समय के अनुसार जाना है। कोई मरता नहीं है। आत्म तत्व कर्मों को लेकर नया जन्म लेता है। पंचभूत पंचभूतों में मिल जाते हैं। कोई मरता नहीं है। ये केवल हमारा मुंह है कि मेरा था। वो किसी का नहीं था। वो न जाने कितने जन्म किस-किस को मां-बाप बनाया। इस जन्म में तुम्हें बनाया अगले जन्म में फिर और किसी का तो यह सब मायाकृत है इसलिए रोइए मत नाम जप कीजिए और उस जीवात्मा को भी शांति मिले नाम जप करके उसको दीजिए और स्वयं भजन कीजिए आनंदित रहिए मोह मत कीजिए नहीं तो मोह तो बहुत ही दुखदायक है मनोज साहू साहू जी भोपाल से श्री हरिवंश महाराज जी गुरुदेव भगवान आपके द्वारा ही एक बार श्रवण किया था कि भक्ति मार्ग पर चलने से ब्रह्म ज्ञान या ब्रह्म मार्ग का जो संकेत या अनुभूति होती है स्वतः ही हो जाती है।
महाराज जी महाराज जी भक्ति मार्ग पर चलते हुए हम कैसे अनुभूति करते हैं उसकी? ब्रह्म जब आप भजन करेंगे तो वो स्थिति आने लगती है। भजन से स्थिति आती है। भजन से कुछ अच्छा नहीं लगता। संसार के भोग कोई भोगने की इच्छा नहीं होती। तब धीरे-धीरे अंदर ज्ञानुरित होने लगता है। जितना भजन बढ़ाते चले जाओगे तो जैसे एक एक कवल में सुधा निवृत्ति तुष्टि और पुष्टि होती है। ऐसे एक एक नाम जप से संसार से वैराग्य अपने स्वरूप का ज्ञान और भगवान से प्रेम ये तीनों हो जाते हैं। पर जैसे कई दिनों का भूखा हो तो एक कवल भोजन पाने पर रोक दिया जाए तो उसको असंतुष्टता होगी।
समझ में नहीं आएगा कि हमारी भूख मिट रही। जब आधा पेट होगा तब समझ में आएगा कि हमारी भूख मिट रही। ऐसे अनंत जन्मों से हम वासनाओं से घिरे रहे हैं। अब हम नाम जप शुरू करेंगे तो आधा पेट कम से कम नाम जप हो 24 घंटे में 12 घंटा तब समझ में आएगा कि हां अब आपका भजन हो रहा है। आपको संसार से वैराग्य हो रहा है। आपको भगवान से प्रेम हो रहा है। इसलिए भजन को बढ़ाओ और कम से कम 12 घंटा लाओ। 24 घंटे में 12 घंटे भजन तब आप फिर देखो कि आपके अंदर कैसे ज्ञान की भूमिकाएं बदलती हैं।
कैसे भक्ति की ऊंचाई आती है। चीनू जी फरीदकोट से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी कर्म और भाग्य में क्या अंतर है? उसी को एक ही बात कहते हैं। जो हमारे भाग्य में कर्म के परिणाम रूप रचना लिखी गई है जिसे प्रारब्ध कर्म कहते हैं वही भाग्य है और नया कर्म जो करते हैं वो क्रियमाण है। जो संचित जमा है उन्हें संचित कर्म कहते हैं। कर्म तीन प्रकार हुए। संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म और क्रियमाण। क्रमाण जो वर्तमान में कर रहे हैं प्रारब्ध जो वर्तमान के कर्म का फल सुखदख दे रहा है।
वर्तमान में अच्छा कर रहे हैं लेकिन बुरा फल मिल रहा है। प्रारब्ध वर्तमान में बुरा कर्म कर रहे हैं लेकिन अच्छा फल मिल रहा है। भाग्य वही प्रारब्ध। जिस समय तुम्हारे भाग्य से पुण्य कर्म का फल नष्ट होगा और वर्तमान का पाप कर्म पूर्व का पाप कर्म जुड़ेगा उस समय तुम्हारा पतन हो जाएगा। नाश हो जाएगा। तुम्हारा महान दुख विपत्ति संकट में फंस जाओगे। इसलिए बहुत होश में चलना चाहिए। अगर आप होश में नहीं चलोगे तो आपसे पाप कर्म बनेंगे और वही पाप कर्म आपका प्रारब्ध बनकर आपको दंड देंगे।
आपको दुख देंगे। तो कर्म क्रियमान नया प्रारब्ध पूर्व जन्मों के कर्मों का भोग संचित बहुत जन्मों के कर्मों का एकत्रित गोदाम मोना निशा दुबे जी राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी कोई व्यक्ति हमें दुख देता है तो हमारे पूर्व जन्म के कर्म उस व्यक्ति के द्वारा दुख के रूप में आते हैं तो महाराज जी क्या उस व्यक्ति को भी आगे चलकर दुख प्राप्त होगा प्राप्त होगा क्योंकि उसका नया कर्म बन गया आपके कर्म ने उसे प्रेरित किया वो क्षमा भी तो कर सकता था लेकिन उसने आपको दंड दिया तो उसका क्रमाण बन गया अब उसको भोगना पड़ेगा जैसे आपका हमसे टक्कर लग गई आपके प्रारब्ध कर्म ने धक्का दिलाया।
हम क्षमा भी तो कर सकते हैं। हम क्षमा कर दिए तो हमारा क्रमान ठीक हो गया और हमने आपको गाली दे दिया। आपको धक्का दे दिया तो हमारा नया कर्म बन गया। ये अब हमको भोगना पड़ेगा। इसी यही तो परंपरा कर्म परंपरा है। बराबर भुगताती चली जा रही है। बंसल जी रुड़की से राधे-राधे महाराज जी। महाराज जी आप पूछ रहे हैं कि जैसे जिन संतों का भगवत प्राप्ति होती है या आखिरी जन्म होता है तो उनको भी कर्म भोगने पड़ते हैं। होता है तो महाराज जी क्या उनको भगवान माफ़ करते हैं कुछ यहां भगवान कुछ माफ़ कर देते हैं या हां अरे पहाड़ के पहाड़ माफ़ कर देते हैं वो तो ऐसे 100 50 ग्राम एक कुंतल में 50 ग्राम फटाफट भोगवा के फटाफट भोगवा करके देखो ना बड़े संतों की बड़ी पीड़ाएं होती हैं।
ये फोड़ा ये कैंसर ये चीज ये दुनिया का दुख उन्हीं के ऊपर आ जाता है क्योंकि उनका आखिरी जन्म होता है। तो जो पहाड़ का पहाड़ जमा होते हैं उनमें थोड़ा-थोड़ा भुगता करके निपटा देते हैं। और संतों को इतना ज्ञान होता है कि मैं शरीर नहीं हूं। इसलिए शरीर में आने पर दुखों को वो व्याकुल नहीं होते। वो शांत नहीं होते, विचलित नहीं होते। सह जाते हैं और भगवान का भजन करते हैं। विदिशा शर्मा जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी अगर कोई किसी की मदद करे पहले खुद से और फिर वही इंसान बार-बार हमें यह बोले कि मैंने तेरे लिए यह किया ये किया तू ऐसा बोल रहा है।
अभी तो महाराज जी ऐसी कंडीशन में पहली बात तो जिसने किया और बोला तो उसका सारा पुण्य खत्म हो गया। दूसरी बात तो वो अब तुम्हें टॉर्चर कर रहा है। उसका नया कर्म बन रहा है। उसको दुख भोगना पड़ेगा। तुम केवल शांत रहो। कोई उत्तर मत दो। वो बार-बार ऐसा कह रहा है तो उसकी हानि ही हानि हो गई। पहले कहने से उसका पुण्य नष्ट हो गया और बार-बार कहने से उसका पाप बढ़ रहा है क्योंकि आपको दुख दे रहा है और दुख देने के परिणाम में उसका पतन हो जाएगा। उसका नाश हो जाएगा। वो उसके लिए हानि का कारण बन जाएगा।
इसलिए आप चुप रहो। आप जिस समय वो आपको बोले उस समय राधा राधा राधा कोई बुरा मत मानो। जैसे देने पर उसके बुरा नहीं माने थे ऐसे गाली देने पर भी बुरा मत मानो। उसका कर्म बिगड़ रहा है। आपका ठीक हो रहा है। दीशांत जोशी जी उदयपुर से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी अहंकार छोड़ना चाहिए लेकिन मैं छोड़ते ही कर्म कौन करेगा? प्रकृति तीन गुणों के द्वारा किसका प्रश्न है? तीन गुणों के द्वारा कर्म होते हैं। गुण गुण वर्तते मनुष्य पार्थ सर्वसा आत्मा थोड़ी कर्म करती है। कर्म तीन गुणों के द्वारा होते हैं।
सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण। जैसे यंत्र में चढ़ी हुई कठपुतली नाच रही है तो वो थोड़ी नाच रही। यंत्र नचा रहा है तो माया रूढ़ानी जो यंत्रूढ़ानी मम माया भगवान कहते हैं मेरी माया रूपी यंत्र के ऊपर आरूढ़ होकर सारा जगत नाच रहा है माया नचा रही है तीन गुणों से कर्म मैं से थोड़ी होता है कर्म तो माया से होता है मैं स्वीकार करने के कारण उसे कर्ता और भोगता का दंड मिलता है जो मैं अहंकार विमूढ़ आत्मा कर्ता मन्यते मैंने ने ये कर्म किया तो उसे दंड भोगना पड़ेगा। नहीं तो उसको कोई दंड नहीं।
पूरे विश्व का भंडारा हो जाए तो कोई पुण्य नहीं और पूरे विश्व का विनाश हो जाए उसके द्वारा तो कोई पाप नहीं जो अहंकार रहित है लेकिन अहंकार होने के कारण ही छोटे-छोटे कर्मों का भी हिसाब उसे भोगना पड़ता है। यही अहंकार मिटाने के लिए तो साधना की जाती है। जो अंतःकरण का अहंकार है उसे मिटाना है। आत्मा में ब्रह्म स्वरूप है। वो निर्विकार है। वो चिदानंदमय है। उसके द्वारा कोई क्रिया नहीं होती। जो अक है उसमें कोई संकल्प नहीं होता वो गुणातीत है वही मैं हूं पर मैं भूल से अपने को शरीर मानकर वह अंतःकरण के अहम धर्म से युक्त होकर कर्ता और भोगता भाव हो जाने के कारण हमारा जन्म मरण हो रहा है।
हमें दंड भोगने पड़ रहे हैं। निर्विकार होने पर भी हम विकार को प्राप्त हो रहे हैं। अजन्मा होने पर भी हमारा जन्म मरण हो रहा है। और दुख रहित होने पर भी हमें दुख भोगना पड़ रहा है। यही कारण है। अगर मैं के द्वारा करता मैं ही है तो आपके अभी-अभी शरीर में जो दिल धड़कता है तुम्हारे द्वारा धड़कता है क्या? तुम धड़काते हो क्या? माया के द्वारा धड़क रहा है कि नहीं? पलकें तुम झपकाते हो क्या? स्वयं हो रहा है कि नहीं? ऐसे सब कर्म स्वयं हो रहे हैं। जिस गुण का आवेश हुआ उसके द्वारा हो रहा है।
अब कर्ता भाव होने के कारण तुम्हें भोगना पड़ रहा है। नहीं तो कर्ता भाव ना हो तो कोई भोगना नहीं पड़ेगा। कुछ नहीं भोगना। मैं एज ए व्यक्ति हमें करना क्या चाहिए? फिर क्या स्वयं होने दो सब कुछ या क्या? पहले मैं को समझ करके इसको त्यागो। तो तुम खुद देखोगे इस शरीर के द्वारा कितने अच्छे और पवित्र कार्य होते हैं। क्योंकि गंदे कार्य मैं से होते हैं। जब मैं पुरुष हूं तो फिर स्त्री का आकर्षण है। फिर मकान चाहिए, फिर गाड़ी चाहिए, प्रतिष्ठा चाहिए। अब उसके लिए पाप कर्म बनते हैं।
पुण्य कर्म बनते हैं। दोनों कर्मों को भोगना पड़ता है। साधना के द्वारा मैं का त्याग कर दे तभी तो मुक्त पुरुष होता है। उससे जो भी कार्य होते हैं सब मंगलमय होते हैं। क्योंकि पाप कर्म मैं के द्वारा होते हैं और मैं हट गया तो पाप कर्म उससे होने नहीं है। तो मंगलमय जगत मंगल के कार्य होते हैं। वही संत हो जाता है। चाहे वो पट शर्ट में हो चाहे लाल पीले में हो। संत के लक्षण आ जाए तो संत हो जाता है। वो संत हो जाता है। जी आरती जी दिल्ली से श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी अभिमान जनित हीनता क्या है?
पूज्य भाई जी के अनुसार अभिमान जनित हीनता का जो बोध है वह हीनता नहीं बल्कि अभिमान का शोभ है। साधक स्वयं में इसे कैसे पहचाने? अभिमान जनित हीनता का तात्पर्य होता है कि इनके पास तो गाड़ी है। मेरे पास गाड़ी नहीं है। इनके पास बढ़िया मकान है। मेरे पास मकान नहीं है। ये तो बड़े पदों में है। हम तो कुछ नहीं। तो ये जो हीनता है ये जलाती रहती है। ये दैन्यता नहीं है। ये जलाती रहती है। कामना जनित हीनता है। दूसरों की भी उन्नति देखकर अपने हृदय में जो जलन हो रही है मत्सरता ये अहंकार इससे बाहर कैसे सर्वलोक महेश्वर भगवान अभी बताया नहीं।
यद्यपि वो निर्धन है। फिर भी लोक में धन्यवाद का पात्र है। यदि हम धर्म से चल रहे हैं। गरीबी से चलो तो दीपक की तरह जलते रहोगे। धर्म पूर्वक और अगर ज्यादा जल्दी करोगे पाप कर्म करके धनी बनना चाहोगे तो हाईजन की तरह जलोगे एकदम फोकस हुआ एकदम तड़ाम से बुझ गए और वो दीपक की तरह जलता हुआ कुल परंपरागत पवित्र भाव से चलेगा पाप कर्म करने वाला कभी सुखी नहीं हो सकता तो हमको यह नहीं देखना अपने में हीनता नहीं लानी कि यार इनके तो यह है इनके तो नहीं भगवान ने मुझे जिस परिस्थिति में रखा है बहुत अच्छा रखा है और बड़ी उनकी कृपा है।
देखो अगर भगवान हमारी आंखें ले लेते और फिर सोचो जीवन भर ऐसे बंद रहे तो घबराहट नहीं पैदा हो जाती। भगवान ने हमको आंखें दी। कान दिया, बोलने को दिया, चलने को दिया, चखने को दिया। बताओ हर अब हम भगवान का धन्यवाद ना दे के हम इस बात से जले कि उसके गाड़ी अधिक है। उसके घर नहीं हमको भगवान ने जितना दिया बहुत कुछ दिया। अब मैं भगवान का भजन करके भगवान को प्राप्त करूंगा। पाप कर्म नहीं करूंगा। पाप कर्म के द्वारा प्राप्त हुई सुविधा परिणाम में नाश को प्राप्त कराती है।
इसलिए मैं ऐसा कर्म नहीं करूंगा। ईमानदारी वाला कर्म और पहले लोगों के दिमाग में ईमानदारी भरी रहती थी। हमने देखा है कि पहले बेईमानी से लोग डरते थे। हमने कई बार बताया कि हम बच्चे थे। हमारे घर में गेहूं बेचा गया। क्योंकि किसान आदमी के यही धन प्राप्ति का उपाय था। तो जैसे स्कूल की फीस देनी है या उससे तो अन्न नहीं बेचा जाता तो वो ₹100 का बिका तो बेचने से उसने ₹110 दे दिए अनजाने में ₹10 मतलब लिपट के आ गए तो घर में जब उन्हें गिना गया तो ₹10 थे तो पिताजी ने कहा पूरे पैसे ले जाओ और उसके सामने गिन के दिखाओ कि तुम्हारे 10 ज्यादा है 10 वापस करके आओ तब वो 10 वापस कर नहीं तो मान लो ऐसी ऐसी स्थिति में जहां ₹100 का गेहूं बेचा जाता है वहां ₹1 काफी लाभ है।
लेकिन नहीं बोले पूरे रुपए ले जाओ और उसके सामने गिनो और गिन कर दिखाओ कि 10 तुम्हारे ज्यादा है उनको देकर आओ। तो ऐसे पिता के होने के कारण ही तो भगवान के मार्ग में चल पाए हम। अगर ऐसे माता-पिता ना होते, धर्मात्मा महात्मा ना होते तो हम कहां से महात्मा पैदा हो जाते। तो पहले हमने देखा पुराने जमाने के जो नियम थे वो ईमानदारी वाले थे। बेईमानी आप उनकी शरण में चले जाओ वो मर सकते हैं लेकिन आपका बाल बांका नहीं होने नहीं दे सकते और आज धोखा है। वही आदमी आपको मार सकता है।
और पहले था मेरी शरण में आया है। चाहे मेरी जान चली जाए लेकिन मैं इसको कभी अहित नहीं होने। पहले विश्वास, धर्म ये सब अब धीरे-धीरे कलयुग का ऐसा समय आता जा रहा है कि विश्वास और धर्म एक कोने में समेटता चला जा रहा है। अधर्म और अविश्वास ये बढ़ता चला जा रहा है। पति पत्नी में विश्वास नहीं। मतलब आप देखो विश्वास कितना कम हो गया कि पति पत्नी तो एक शरीर के दो हिस्से समझो पति पत्नी को उनमें विश्वास नहीं। तो ये जब हम धर्म से चलेंगे भगवान का नाम जप करेंगे। भगवान के आश्रित रहेंगे तो हमारा जीवन बड़ा सुखी रहेगा।
शांति रहेगी। जिस शांति की खोज हम बाहर कर रहे हैं वो हमारे हृदय में है। और अगर शांति है तो सबसे बढ़कर धन है। दुनिया का धन एक तरफ और संतोष धन एक तरफ। अगर हमें संतोष और शांति प्राप्त हो गई तो सबसे बड़े हम धनी है। इसलिए हमें हीनता का भाव नहीं रखना चाहिए। अभिमान जनित हीनता यही होती है कि काश मैं भी ऐसा बन जाता और जल रहा है अंदर ऐसा नहीं होना चाहिए। अमन जी जयपुर से राधे राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी क्या नाम सुनने और नाम जप करने का फल अलग-अलग होता है मैं जप नहीं कर पाता लेकिन श्रवण कर लेता हूं नहीं नहीं काम नहीं बनेगा बराबर श्रवण थोड़ी करते हो 24 घंटे बराबर श्रवण थोड़ी करते हो तो नाम जप कहे कि जैसे सांप अंदर मिल के बैठा हुआ है और ऊपर से लाठी चलाओ तो सांप के ऊपर कोई फर्क पड़ेगा क्या ऐसे ही हमारा जो मन मन है वो अंदर है, हृदय में है और कान से हम सुन रहे हैं।
मन संसार का चिंतन कर रहा है। आराम से कर रहा है कि नहीं? आप देखना जब आप कान से सुन रहे हो तो देखना वो संसार का चिंतन कर रहा है। उस पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा। अब उससे जपवा राधा राधा राधा मन से जपो आप अंदर तुम स्वयं जपो तो वो लगेगा। फिर नाम जप मेंने लगेगा तो कभी श्रवण कर लिया और कभी नाम जप भी किया केवल श्रवण बराबर थोड़ी करते हो थोड़ी देर किया इसके बाद खत्म तो श्रवण में मन चंचल बना रहेगा लेकिन जब मनन करेंगे तो स्वयं को मन को लगना पड़ेगा इसलिए नाम जप करो स्वयं कभी श्रवण कर लिया और कभी सुमिरन कर रहे श्रवण कथन सुमिरन सेवन चित लावह श्रवण कथन श्रवण भी किया कभी गा भी रहे हैं कभी कभी सुन भी रहे हैं और कभी जप भी रहे हैं।
अंदर ही अंदर उसको सुमिरन कर रहे हैं। तब काम बनेगा। प्रधान कार्य श्रवण और कथन का तो सुमिरन ही है। सब साधनों का फल यही है कि अंदर ही अंदर हमारे भगवान का नाम चलने लगे तब हमारा परम मंगल हो जाएगा। सारे पाप नष्ट हो जाएंगे। वैसे श्रवण मंगलम भगवान की कथा भगवान का नाम भगवान की चर्चा श्रवण मंगलम सुनने मात्र से मंगल कर देते हैं लेकिन मन को लगाने के लिए हमें अंदर जप भी करना पड़ेगा सुमिरन भी करना पड़ेगा शिवम शर्मा जी गोवर्धन से राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी आप हम बृजवासियों की महिमा बताते हैं महाराज जी लेकिन महाराज जी हम लोगों से संत वैष्णवों की निंदा बहुत होती है प्रभु जी श्री कृष्ण कहते हैं कि जो मेरे भक्तों के प्रति अपराध करता है मैं उसे कभी क्षमा नहीं करता।
महाराज जी हम क्या सुधार करें? हां नहीं करना चाहिए। देखो आप तो ब्रजवासी हो। जब भगवान के जय विजय पार्षद ने संत सनक सनंदन सनातन सनत कुमार को रोक दिया तो उनको गुस्सा आ गया कि हमें तुमने क्यों रोक दिया? तो उन्होंने श्राप दिया जाओ तीन जन्म के लिए तुम असुर भाव को प्राप्त हो। दैत्य भाव को प्राप्त हो क्योंकि तुमने यहां असुर भाव प्रकट किया तो भगवान के दिव्य धाम के दिव्य पार्षदों को तीन बार रावण कुंभकरण और हिरण्यकश्यप और हिरणाक्ष शिशुपाल और दंतवक्त ये तीन अवतार लेने पड़े जय विजय को तो भगवान भी अवतार लेकर उनका उद्धार करते रहे यद्यप लेकिन यह प्रसंग बताता है कि यदि भगवान के तुम निजी पार्षद भी हो और अपराध संतों का कर दोगे तो तुम्हारी दुर्गति हो जाएगी।
इसलिए संतों की निंदा नहीं करनी चाहिए। चाहे वो ब्रजवासी हो चाहे ब्रजवासियों को संत जन मानते हैं तो संतों को ब्रजवासी भी बहुत प्यार करते हैं। लेकिन किसी भी संत की निंदा मत करो। हो सकता है वह अभी 10 दिन से संत बना हो तो तुमको उसके आचरण गलत दिखाई दे सकते हैं। लेकिन वह 10 दिन का संत है। वो धीरे धीरे धीरे साधना करके अब वो पवित्र बनेगा। तो हमको किसी के दोष नहीं देखने हैं। हमें किसी की निंदा नहीं करनी है। हमको अपना उद्धार करना है। इसलिए पर दोष दर्शन पर निंदा पर निंदा श्रवण ये त्याग कर देना चाहिए।
प्रतिभा दुबे जी महाराज जी अगर हम किसी कारणवश चारधाम यात्रा ना कर पाए तो ऐसा क्या करें कि उतना ही पुण्य मिल जाए। भगवान का नाम जप भगवान के नाम जप से सारे धामों का सारे तीर्थों का सारे व्रतों का सारे शास्त्रों के स्वाध्याय का सब फल प्राप्त हो जाएगा। भगवान का नाम ब्रह्म राम ते नाम ब वरदायक वरदान भगवान से भी बढ़कर के भगवान का नाम है जो वर देने वालों को भी वरदान देने की सामर्थ रखता है ब्रह्म राम ते नाम ब वरदायक वरदान इसलिए भगवान का नाम जप करो तो आप परम पवित्र हो जाएंगे अपवित्र पवित्रोवा सर्वावस्थांग तो यह पुंडरी काक्षम सवायांत सूची वो बाह्य और अभ्यंतर दोनों से परम पवित्र हो जाता है जो भगवान का नाम जप करता है।
सारे तीर्थ भगवान के द्वारा ही बनाए हुए हैं। और जो भगवान को भी अधीन कर ले वो भगवान का नाम है। इसलिए भगवान का नाम जप करो। चारों धामों की यात्रा का फल आपको प्राप्त हो जाएगा। तनिष्का भारद्वाज जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी ऐसा क्यों होता है कि कभी हमें भगवान से एक जुड़ाव सा महसूस होता है पर कभी-कभी जब उनकी जरूरत हो तो हमें लगता है कि भगवान हमसे दूर हैं। वो जुड़ाव नहीं होता है। तीन गुणों का प्रभाव है। जब सतोगुण आएगा तो भगवान अच्छे लगने लगेंगे। भक्ति अच्छी लगने लगेगी।
साधु संग अच्छा लगने लगेगा। जब रजोगुण आएगा तब भोग अच्छे लगने लगेंगे। भगवान के सामने पर्दा सा ढक जाएगा और जब तमोगुण आएगा तो निद्रा, आलस, हिंसा, क्रोध, प्रमाद ये सब बातें आ जाएंगी। तो ये तीन गुणों का चक्र सबके हृदय में चलता रहता है। जो भजन के द्वारा इन तीन गुणों को जीत करके त्रिगुणातीत हो जाता है उसके ऊपर फिर प्रभाव वो फिर एक रस भगवान की भक्ति में डूबा रहता है। जब तक हम तीन गुणों के अंतर्गत है तब तक हमारे भाव बदलते रहेंगे। जो गुण आएगा वह अपना प्रभाव हमको दिखाएगा।
इसलिए हमको हर गुण के प्रभाव में नाम जप करना है। तो हम गुणों से पराजित ना होकर फिर त्रिगुणातीत हो जाएंगे। तो चाहे जो गुण आवे चाहे रजोगुण आवे चाहे तमोगुण आवे चाहे सतोगुण आवे मन लगे चाहे ना लगे सुख मिले चाहे ना मिले भाव बने चाहे ना बने हमें राधा राधा राधा राधा रटना है जिससे तीनों गुणों से हम ऊपर उठ जाएंगे अभी जुड़ाव नहीं है वह तो सतोगुण का लक्षण है अंशु जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आप कह रहे हैं कि आपको आपके शरीर में ना महाराज जी अभी एकदम किडनी फेल हो गया मतलब महाराज जी लास्ट छ महीने में ही 80% किडनी डैमेज हो गई है अभी 20% बची है उसका इलाज चल रहा है मेरा तो गाइडेंस चाहिए महाराज जी मार्गदर्शन की कि ऐसे में क्या करना चाहिए हम तो बच्चा भगवान के सहारे हैं और भगवान का नाम जप करते हैं हमारी तो 100% फेल है तुम्हारी तो 80% फेल ले हम तुम्हें गाइडेंस क्या करें?
हम शरीर में नहीं रहते। शरीर को पीड़ा है। हम शरीर के दुख सुख में नहीं रहते हैं। आप बचपन से अभ्यास किया है और भगवान की शरण में तो यह कला ये कला आपको थोड़ी मिल जाएगी। क्योंकि आप भगवान से जुड़े नहीं हैं। भगवान में चित अर्पित नहीं किया है। तो जब तक भगवान में चित अर्पित नहीं किया जाता तब तक ये दुख सुख और सब अब ना मरने की चिंता है। अगर भगवान में चित्त जोड़ दो तो आनंदित हो सकते हो। नाम जप करो तो आनंदित हो सकते हो। हां आप निराश मत होइएगा। आप निराश मत होइएगा।
अच्छे डॉक्टर से मिलिएगा। हो सकता है आयुर्वेदिक डॉक्टर ऐसा मिल जाए। होम्योपैथिक डॉक्टर ऐसा मिल जाए या वो जो थेरेपी करते हैं ऐसा कोई मिल जाए। आप एक बार प्रयासरत रहिए। भगवान से प्रार्थना कीजिए और नाम जप कीजिए और निराश बिल्कुल मत होइएगा। इसमें सबसे ज्यादा होता है कि जब हमारे शरीर में कोई रोग होता है और हमें इस बात का पता चलता है तो हम टूट जाते हैं। हम निराश हो जाते हैं। हम उदास हो जाते हैं। यह नहीं होना चाहिए। इसका बहुत बड़ा रोग पर प्रभाव पड़ता है। देखो अगर हम प्रसन्न ना रहे तो हम गिर जाए।
हम हर समय प्रसन्न रहते हैं। भगवान के बल से हर समय प्रसन्न रहते हैं। इसलिए हम स्वस्थ जैसे रहते हैं। इतनी कठिन परिस्थिति में भी हम आपसे वार्ता कर रहे हैं। हम सत्संग कर रहे हैं। इसलिए निराश तो होइएगा नहीं। प्रसन्न रहिएगा और दो-ती किलोमीटर आराम से चलिएगा और डॉक्टरों से सलाह करके उचित आहार लीजिएगा और आपकी किडनी फिर आ सकती है। आप प्रयासरत रहिए निराश मत होइएगा। ठीक है हर्षित जी श्रीहारी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी श्री जी से प्रेम कैसे हो प्रेम के लिए तड़पन प्रेम मूल यह नाम है प्रेमी रसिक जपत यह नाम प्रेम मगन निजबन विश्राम श्री हरिवंश जहां रहा है अगर हम प्रेम का मूल नाम है और इस नाम को खूब जप करें तो इसी से प्रेम प्रकट हो जाएगा पहले नाम अनर्थ की निवृत्ति करता है।
पाप का नाश करता है। फिर धीरे-धीरे भाव आता है। फिर धीरे-धीरे अनुराग प्रकट हो जाता है। पर ये लंबा सफर चलेगा। जब हमारा रात दिन भजन होगा तब हमें भगवत प्रेम होगा। 24 घंटे उठते बैठते चलते फिरते खाते पीते काम करते एकांत में बैठते हर समय नाम जप करो। इसी से प्रेम प्राप्त हो जाएगा। भजन न सेनी प्रेम की भजन न होई संग बिन भजन बिना नहीं प्रेम छिनहु भजन न छाड़िए धरिए या द्र नेम बिना भजन के प्रेम नहीं होता और बिना महापुरुषों के संग के भजन नहीं होता जब संतों का संग होता है तब हमें नाम में प्रीति होती है और जब नाम में प्रीति होती है तो भगवान में प्रेम हो जाता है राधिका जी सोने सोनीपत से राधे-राधे गुरु जी गुरु जी आपने सत्संग में प्रेम भक्ति के विषय में बताया प्रेम भक्ति में कामना नहीं रहती कामना के त्याग करने पर ही प्रेम भक्ति का प्रादुर्भाव महाराज जी कैसे होता है कृपया मार्गदर्शन करें देखो जब तक हमें अपने शरीर और शरीर संबंधियों से मोह होता है तभी तक कामना होती है।
यदि हमारा शरीर भगवान को अर्पित हो जाए और सारे संबंध भगवान को अर्पित हो जाए। सारे संबंध नाथ सकल संपदा तुम्हारी मैं सेवक समेत सुत नारी परिवार का संबंध भगवान के चरणों में शरीर का संबंध भगवान के चरणों में तो हमको भगवान की तरफ से यह ज्ञान प्राप्त होता है कि हमारे भगवान सर्वज्ञ हैं। सर्वज्ञ अर्थात सब कुछ जानते हैं। सर्वशक्तिमान वो सब कुछ कर सकते हैं। सर्वत्र वो सब जगह विराजमान है। तो जो सब कुछ जानते हैं, सब कुछ कर सकते हैं। सब जगह विराजमान है, वह मेरे प्रभु हैं।
तो मुझे फिर क्या मांगना? क्योंकि कोई अल्पज्ञ तो है नहीं कि उनको बताना पड़ेगा कि हमें क्या आवश्यकता है। तो जो वह विधान कर रहे हैं वो मेरे लिए परम मंगलमय है। जोई जोई प्यारो करें सोई मोहि भावे भावे मोहि जोई सोई सोई करें प्यारे। जब उपासक अपने आप को पूर्ण भगवान को समर्पित कर देता है तो उसकी कामना नष्ट हो जाती है। इस समर्पण में जादू है। इस समर्पण में एक चमत्कार है कि उसके अंदर कोई कामना नहीं रह जाती और जहां कामना का नाश हुआ भगवान की प्रेम लक्षणा भक्ति प्रकट हो जाती है।
सकल कामना हीन जे राम भगत रस लीन भगवान की भक्ति के प्रेम रस में वो उपासक लीन हो जाता है जिसकी कामनाएं शांत हो जाती है। सबसे बड़ी कामना शरीर भोग की रहती है। त्रिभुवन में इसका बहुत बड़ा प्रभाव है काम का। अगर यह काम वासना थोड़ी भी चिंगारी बची रही तो 25ों 50ों वर्ष साधना करने पर जहां इसको अवसर मिला भोग का तहां ये ज्वाला बन जाती है। इसलिए उपासक को ऐसा नहीं समझना है कि मैं निष्काम हो रहा हूं। मेरे अंदर कोई कामना नहीं। भगवत प्राप्त महापुरुषों के हृदय में भी काम अपना प्रभाव दिखा देता है।
जैसे देवर्षि नारद भगवान के 24 अवतारों में एक अवतार भी है और भगवान की प्रेम लक्षणा भक्ति के आचार्य भी है। लेकिन उनको जब ये अभिमान आया कि मैं काम विजय हूं तो उनको फिर ब्याह की सूझी और बड़ा चरित्र है। कई बार सुना चुके हैं। जब उपासक अपने देहाभिमान को और देह संबंधियों को और देह संबंधी भोगों को भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है तभी उसका समर्पण माना जाता है और समर्पण का एक चमत्कार होता है कि उसके हृदय में कोई कामना नहीं रह जाती और जिसके हृदय में कोई कामना नहीं होती वहां भगवान का प्रादुर्भाव हो जाता है।
जाह न चाह कबहु कछु तुम सन सहज सनेह बसो निरंतर तासुर सो राहुल निज के भगवान उसके हृदय में निरंतर प्रकट होकर विराजमान हो जाते हैं जिसकी चाह मिट गई कामना नष्ट हो गई तो कामना अज्ञान के कारण होती है। सर्वज्ञ भगवान से संबंध जुड़ जाने पर कोई कामना नहीं होती। अगर हुई भी तो वो नष्ट हो जाती है। वो शांत हो जाती है। इसलिए हमें भगवान की शरणागति स्वीकार करके निरंतर नाम जप करना है और कामनाओं को भगवान के चरणों में समर्पित कर देना है। वो पूर्ण करें या वो उसका नाश कर दे।
दोनों प्रकार से हम राजी हैं। ध्रुव जी होशंगाबाद से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी श्री जी और गुरु कृपा से हमें ये पता चल जाए कि यह सिद्ध संत है तो उस सिद्ध संत से लाभ कैसे ले उनकी वाणी का पालन करने से संत सेवा साक्षात भगवान की सेवा है। उनको भोजन, औषधि, वस्त्र आदि से सेवा करना, उनके वास की व्यवस्था करना, उनके शरीर संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करना और उनकी आज्ञा का पालन करना। इससे हमें संत कृपा का अनुभव होता है और संत कृपा का अनुभव सीधे भगवान से जोड़ता है।
बड़े भाग पाई सत्संगा बिन ही प्रयास हो भव भंगा। बिना प्रयास के संसार के समस्त दुखों का नाश करके भगवनंद की प्राप्ति कराने में समर्थ है। संत सेवा पर कठिन है। संतों का बिलग बिलग स्वभाव होता है। बिलग बिलग उनकी साधनाएं होती हैं। यदि हम बहुत सहनशील हो, बहुत शांत हो और सब संतों में भगवान की भावना करें तो ही संत सेवा बन सकती है। नहीं बहुत कठिन है संत सेवा। और संत सेवा बन गई तो भगवान उसके अधीन हो गए जिससे संत सेवा बन गई। एक हरिपाल जी नाम के बड़े भगत हुए हैं।
भक्त माल में चरित्र है। उन्होंने अपने गुरु जी से पूछा कि मैं गृहस्थ हूं। मुझे कैसे भगवत प्राप्ति होगी? तो उन्होंने कहा रोज संत सेवा कीजिए। रोज किसी संत को जेवाइए, सुंदर सुंदर भोजन बनाइए और संत को पवाइए। कभी संत दरवाजे से भूखा रह जाए तो एक दिन भगवान साक्षात तुम्हें प्राप्त हो जाएंगे। अपने गुरु जी की बात मानकर के हरिपाल जी रोज भगवत सेवा करने लगे। वो जमींदार थे। खूब जमीन धन ऐश्वर्य था। अब संत तो श्रद्धा के भूखे होते हैं। श्रद्धा भी थी और संपत्ति भी थी।
धीरे-धीरे संतों की मंडलियां आने लगी। अब तो रोज हजारों संतों का भंडारा होने लगा। धीरे-धीरे जमीन बिक गई। घर की संपत्ति बिक गई। बाजार से उधार लिया। अब उधार मिलना बंद हो गया। एक दिन संत दरवाजे पर आए और घर में कुछ नहीं। उनका गुरु आज्ञा है संत भूखा नहीं जाना चाहिए। तो भाला उठाया और रास्ते पर जाकर खड़े हो गए और जो ना राम बोलता ना कृष्ण बोलता ना गले में कंठी ना मस्तक में तिलक तो सीधे भाला उसके गले पर रखते और उसके पास जो होता वो छीन लेते और छीन के संत सेवा करते कि इसका भी कल्याण होगा और संत सेवा भी होगी।
अब जब लोगों को यह पता चला कि हरिपाल सिंह डाकू हो गए और रास्ते में जो कोई राम बोल दे तो नहीं फिर लेते थे। कृष्ण बोल दे हरि बोल दे तो नहीं लेते थे। गले में कंठी हो मस्तक में तिलक हो तो प्रणाम करते थे। जो संसारी आदमी होता उसे लूट लेते थे और उसकी संपत्ति को भक्तों की सेवा में लगाते थे जाके। तो अब उस मार्ग से जो जाता वो राम राम बोल के जाता। कृष्ण नाम बोल के जाता कोई तिलक लगा ले कोई कंठी लगा ले तो बच जाए वो जंगल का रास्ता था अब हरिपाल जी को कोई लूटने वाला मिलता ही नहीं क्योंकि जहां देखते हरिपाल जी राम राम कृष्ण कृष्ण हरे हरि ऐसा लोग बोलने लगे एक दिन साधु मंडली आई अपनी पत्नी से कहा अब तो लूटने वाला भी हमारा जो विचार था वो गलत हो गया कोई मिलता ही नहीं किसको लूटे सब राम राम बोलते हैं।
हरी हरि बोलते हैं। जाता हूं। अगर आज संत सेवा नहीं हुई तो मैं प्राण त्याग दूंगा। अपने संतों को भूखा नहीं जाने दूंगा। मैं नहीं देख सकता कि गुरु आज्ञा का उल्लंघन हो। भगवान सर्वज्ञ है। वो सब कुछ देखते हैं। सब कुछ जानते हैं। भगवान ने श्रृंगार शुरू किया। द्वारिकाधीश रुक्मणी जी ने कहां जा रहे हो प्रभु? बोले एक महान भक्त को दर्शन देने जा रहे हैं। तो बोले आप अकेले अकेले नहीं जाओगे। हम भी जाएंगे। तो बोले देखो पूरा श्रृंगार करके चलना होगा। हमारे साथ चलना होगा तो और कोई भी भागवतिक चिन्ह नहीं धारण करने और रास्ते में केवल धन की बात करनी है।
राम कृष्ण हरी भगवत चर्चा कोई नहीं करनी। बोले प्रभु आज तक तो हमने ऐसा अजीब भक्त नहीं देखा। भक्त तो भगवत चर्चा सुनकर प्रसन्न होते हैं। बोले नहीं कोई भगवत चर्चा नहीं करनी। श्रृंगार पूरा कर लो। कोई भागवतिक चिन्ह नहीं धारण करना। हरिपाल जी उदास खड़े थे उसी मार्ग में कि कोई निकले तो मैं चोरी उसकी वस्तुओं की करके संतों का भंडारा कर दूं। बड़ी मंडली संतों की बैठी हुई है। जो ही नजदीक गए श्री भगवान ने कहा भैया सुनते हैं इस मार्ग में चोर लगते हैं। आपको मैं दो अशरफियां देता हूं।
मुझे पार कर दोगे। हरिपाल जी से ही। तो हरिपाल जी ने कहा ये तो बहुत बड़ा धनी आदमी। बोले हम बिल्कुल पार कर देंगे। सर्फियां अपने पास रखो। उन्होंने सोचा दो सर्फी से क्या होगा? पूरा लूटेंगे इसे। तो द्वारिकाधीश और रुक्मणी जी स्वयं लूटने के लिए लिखित है श्री मद भक्त माल जी में चरित्र है हरिपाल जी का श्री रुक्मणी जी और द्वारिकाधीश जब बीच जंगल में पहुंचे तो भाला निकाला और भगवान की तरफ भाला किया और कहा सब मुकुट आभूषण करधनी बाजू बंद सब उतार के रख दो भगवान उतारने लगे तो रुक्मणी जी ने कहा सुदर्शन चक्र की याद करो यह भाला क्या करेगा आप इसके सुदर्शन चक्र से मार दो भगवान ने कहा हम मारने नहीं आए हम जिस भक्त के दर्शन कराने लाए थे वह यही है।
इशारे से बताया और कहा सब आभूषण उतार दो। तो रुक्मणी जी ने सब आभूषण उतार दिए लेकिन सुहाग के चिन्ह को रोक लिया। तो हरिपाल ने कहा इससे 10 संतों की भूख मिटेगी। सीधे उतारो नहीं। भाला रुक्मणी जी और भगवान उनकी इस भक्ति को देखकर अपनी गुरु आज्ञा के पालन के लिए वो निम्न कार्य में भी चोरी में भी उतर गए तो भगवान द्वारिकाधीश और रुक्मणी जी प्रकट हो गई उनको दर्शन दिए और कहा मेरे आभूषण ले जाओ अब ये कुल परंपरागत तुम्हारे यहां लक्ष्मी बनी रहेगी क्योंकि साक्षात महालक्ष्मी का अवतार रुक्मणी जी है इनके आभूषणों से आभूषण प्रकट होते रहेंगे और कभी भी तुम्हारे हमारे घर से लक्ष्मी नहीं जाएगी।
साक्षात द्वारिकाधीश रुक्मणी जी को देखकर साष्टांग दंडवत से हरिपाल जी को भगवत साक्षात्कार हुआ। यदि हम संत सेवा में उतरे तो बिक जाए चाहे लेकिन संत हमारे दरवाजे से भूखे ले जाए तो भगवान की प्राप्ति हो जाती है। निश्चित प्राप्ति हो जाती है। एक महाराष्ट्र में सागाल शाह सेठ थे। उनके गुरु जी ने भी उनको आज्ञा दी संत सेवा की। वह रोज जाते 10 20 किलोमीटर में कहीं भी एक संत मिलते उनको लेवा के आते भोजन पवाते 12 वर्ष व्यतीत हो गए 12 वर्ष में हर कार्य सिद्ध हो जाता है 12 वर्ष तक यदि जप करो तो जप सिद्ध हो जाएगा 12 वर्ष तक अगर आप संयम से रहो तो आपका संयम सिद्ध हो जाएगा तो 12 वर्ष संत सेवा पूर्ण होने वाली थी और ऐसी वर्षा शुरू हुई उस दिन कोई संत नहीं मिला तो भूख भूखे रह गए।
उनकी पत्नी और उनका पुत्र चिलैया और उनका नाम सागाल साहब था। तीनों भूखे रह गए। दूसरा दिन हुआ वही बरसात तीसरा दिन हुआ, चौथा दिन हुआ। पत्नी ने कहा हमारा नियम था बिना संत को पवाए हम पाएंगे नहीं। तो हमारे चाहे प्राण चले जाए पर हम संत को पवा के ही पाएंगे। लेकिन मेरा बेटा अभी छोटी अवस्था का है। 13 14 वर्ष का है। चार दिन भूखे हो गए। यह मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती। इसलिए आप जाओ और किसी संत को लाओ। अब ऐसी वर्षा में कहां संत मिलने वाले? तो स्वयं भगवान संत वेश धारण करके चौराहे पर बैठे मिले।
अरे सागर सा के प्राण आ गए हो। दौड़ के गए। पर देखा उनके शरीर से कुष् चूरा है। मवाद मवाद चूरा है। पर तिलक लगाए हुए संत वेश में साष्टांग दंडवत किया। कहा भगवन हमारा व्रत था बिना संतों को भोजन पवाए हम पा नहीं सकते। चार दिन हो गए। हमारे परिवार में किसी ने जल भी नहीं पिया। आप चले और प्रसाद पाए और हमारे परिवार के प्राणों की रक्षा हो जाए। हमारे नियम की पूर्ति हो जाए। उन्होंने कहा हां चल सकते हैं लेकिन मैं चलने लायक नहीं हूं। मुझे कोई अपने कांधे पर ले चले।
तो कहा आओ प्रभु मेरे कांधे पर बैठो। उन्होंने कहा नहीं एक आदमी तो मक्खी उड़ाने के लिए चाहिए ना। अपनी पत्नी को लिवा के लाओ और वो हमें कांधे पर बैठा ले। गए घर में पत्नी से कहा पत्नी आई। जे ही वो विभत स्वरूप देखा यहां घाओ यहां घाओ। मवा चूरा है और उसके मन में आया नहीं संत के प्रति दोष दर्शन नहीं करना मुझे संत सेवा करनी इसलिए बैठाला और वो इतनी दुर्गंध भगवान ने बढ़ा दी कि दोनों पति पत्नी छोड़कर भाग जाए लेकिन गोविंद गोविंद गोविंद एक एक कदम भगवान नाम जप करते हुए घर पहुंचे उनको स्नान कराया चंदन लगाया तो उन्होंने फिर खीर पुआ ये अच्छे-अच्छे पदार्थ सामने रखे भगवान जो संत वेश में कुष्टि रूप में थे उन्होंने कहा हम खिर पकवान नहीं पाते तो कहा प्रभु हम तो वैष्णव है हमारे यहां तो प्याज लहसुन भी नहीं बनता आप संत वेश में आए आप भूखे वापस लौट जाएंगे आप रुकिए मैं कसाई वाले से मांस लेकर के आता हूं उन्होंने कहा नहीं नहीं कसाई वाले का मांस नहीं चाहिए ये हम बहुत बड़े संत से प्रवचन के सुना था हमें कसाई वाले का मांस नहीं चाहिए।
यदि आप पवाना चाहते हो तो अपने पुत्र का मांस पवा दो। तो पत्नी की तरफ देखा और कहा ये क्या संत है? लेकिन संत पे दोष दर्शन करके या उनको भूखा वापस करके तो कहा प्रभु यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं अपने पुत्र की हत्या करूं और आपके लिए मांस बनाऊं। बोले मुझे इससे मतलब नहीं। मुझे पाना है लेकिन यही घर में पाना है। बाहर से कुछ लाना नहीं। जे अपने पुत्र की हत्या करने के लिए उद्यत हुए भगवान प्रकट हो गए। उन्होंने कहा बस मैं यही देखना चाहता था कि संत के प्रति तुम्हारा कितना समर्पण है।
संत के प्रति समर्पण मूरध्वज ने अपने पुत्र को आरे से चीर दिया। तो संत सेवा करना बड़ा कठिन है। अगर संत सेवा हो गई तो भगवान बिक गए। भगवान उसके अधीन हो जाते हैं। संतों को पवाने का मतलब है जैसे गर्भणी स्त्री को पवाओ तो उसके पाए हुए अन्न से उसका बच्चा पुष्ट होता है। ऐसे हृदयस्त भगवान संतो के विराजमान है। संतों को पवाने का मतलब है सीधे भगवान को पवाना। तो वस्त्र सेवा, वास सेवा, संतों की सेवा, उनकी आज्ञा का पालन करना इससे निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाती है।
प्रोफेसर वि डी शर्मा जी राधे-राधे महाराज जी महाराज जी नाम जप के साथ किन भावों द्वारा शरणागति भाव को पुष्ट किया जा सकता? सबसे पहला भाव हमारा दास भाव होना चाहिए। हमारे यहां भक्ति में पांच भाव और छठवा महाभाव शांत भाव, दास्य भाव, शक्य भाव, वात्सल्य भाव, गोपी भाव और महाभाव सहचरी भाव इन छह भावों का वर्णन किया गया है। तो हम भगवान के अंश गीता में भगवान ने कहा मम वशो जीव लोके जीव भूता सनातन मना इंद्रण प्रकृति स्थान करति ममो ऐ जीव तू मेरा अंश है तो उस भाव से अंश अंशी भाव से सबसे पहले हम भगवान को अपना अंशी माने अपना स्वामी माने और हम भगवान के सेवक हैं ऐसा भाव माने श्री हनुमान जी महाराज राम जी के चरणों को लिए हुए बैठे थे।
परम ज्ञानी वशिष्ठ जी ने सभा को जलाने के लिए कि हनुमान जी ज्ञानी नाम अग्रगण्यम है। बुद्धिमताम वरिष्ठम है। बुद्धिमानों में सबसे श्रेष्ठ है। पूछा हनुमान तुम कौन हो? हनुमान जी ने वशिष्ठ जी की तरफ देखा कि इतना बड़ा ज्ञानी महात्मा प्रश्न कर रहा है। जरूर गढ़ उत्तर देना चाहिए। तो उन्होंने कहा प्रभु शरीर भाव से यह स्वामी है और मैं दास हूं। प्रभु अंश भाव से मैं अंश हूं। यह हमारे अंशी हैं। और प्रभु दास भाव से यह स्वामी मैं सेवक और स्वरूप भाव से जो सियाराम वो विराजमान वो सियाराम यहां विराजमान है।
जो सियाराम वहां विराजमान है वो सियाराम यहां विराजमान है। दास्य भाव स्वामी सेवक शरीर को लेकर अंश अंशी भाव स्वरूप को लेकर और अगर वास्तविक तत्व की बात करें तो जो सियाराम वहां विराजमान वो सियाराम यहां विराजमान तो हमें चाहिए देहाभिमान नष्ट करने के लिए भगवान को स्वामी मानकर और अपने को सेवक मानकर उनका नाम जप करते हुए उनकी सेवा करनी चाहिए। आपको समझ में आया नहीं? कोई इसमें प्रश्न आपका जी मोहित जी प्रश्नकर्ता कह रहे हैं कि महाराज जी धर्मपत्नी को खुश रखने के लिए कोई मंत्र है अगर वो नाराज हो जाए।
देखो इसके हम विशेषज्ञ नहीं है। लेकिन शास्त्र के अनुसार हम बता सकते हैं कि यदि हम अपनी धर्म पत्नी की कामना पूर्ति करें और उसके मन के प्रतिकूल कभी आचरण ना करें तो वह हमारे अधीन हो जाएगी। उसके मन के प्रतिकूल आचरण ना करें और सदैव उसकी कामना की पूर्ति में तत्पर रहे और अन्य स्त्री से संबंध ना बनावे। अगर कामना की पूर्ति भी करेंगे और उसको यह पता चले कि आप किसी अन्य स्त्री से संबंध बनाए हैं तो शायद है वो आपको पसंद नहीं करेगी। कोई भी पत्नी यह पसंद नहीं करेगी कि उसका पति किसी पर स्त्री से प्रेम करें।
तो आपको चाहिए कि संपूर्ण वृत्ति लगाकर अपनी पत्नी में भगवान का दर्शन करते हुए उसमें प्रेम कीजिए और कामना की उसकी पूर्ति कीजिए। प्रतिकूल अगर वो व्यवहार करती है तो आप मुस्कुराकर शांत हो जाइए। इसी से आप अपनी पत्नी को अधीन कर सकते हैं और दूसरा कोई उपाय नहीं है। कोई ऐसा मंत्र नहीं है कि हम आपको बताएं। महाराज जी आपको हर एक विषय का ज्ञान कैसे है महाराज जी आप ना गृहस्ती में गए पिता का क्या कर्तव्य है? पति का, पुत्र का, पत्नी का क्योंकि भगवान हमारे सब रूपों में विराजमान है।
जब भगवान का ज्ञान हो जाता है तो सब ज्ञान हो जाता है। आप किसी भी विषय में प्रश्न कीजिएगा। भगवान तुरंत आपको उत्तर देंगे बिना सोचे बिचारे। क्योंकि भगवान ज्ञान स्वरूप है ना वही भगवान हमारे हृदय में बैठे हैं। तो जहां आप प्रश्न करते हैं तो प्रश्न बाद में पूरा होता है। उत्तर हमारे दिमाग में पहले आ जाता है। नहीं तो हमको ये कोई बताते थोड़ी कि आज क्या प्रश्न करना है। जो प्रश्न करो आप तुरंत उत्तर लीजिए। उसका सटीक उत्तर लीजिए। ऐसा नहीं कि मनमानी उत्तर। अगर आप राजी नहीं है तो आप खड़े होकर बोल सकते हैं कि मैं आपके उत्तर से राजी नहीं हूं।
आपको प्रमाण सहित हम उस उत्तर को प्रमाणित करेंगे कि ये शास्त्र समवत और भागवतिक उत्तर है। ये कोई मनमानी मनगढ़ंत बातें नहीं है। श्री राधा वल्लभ लाल की जय। श्रद्धा मिश्रा जी श्री राधा वल्लभ श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी सन्मुख होए जीव मोहि जब जन्म कोटि अग तब महाराज जी ये सुंदरकांड की चौपाई आपके श्री मुख से सुनकर ये विनती लेकर आई हूं कि आप मेरा उद्धार करें। गुरुदेव इस अधम से प्रतिकूलता आते ही प्रभु के प्रति अविश्वास एवं शाप नहीं ये ये तो नहीं होना चाहिए।
यह नहीं होना चाहिए। नहीं नहीं ऐसा नहीं होना चाहिए। अपने प्यारे के द्वारा दी हुई प्रतिकूलता प्यारे में प्रेम बढ़ाती है ना कि प्यारे पर अश्रद्धा कर लेती है। ऐसा नहीं होता। नहीं एक ऑफिसर थोड़ा लेट पहुंचा। तो उसकी पत्नी ने कहा ए जी हम तुमसे रोज प्रार्थना करते हैं। आप समय से आ जाया करो। आप लेट क्यों हो जाते हो? आज तो बहुत लेट हो गए। उसने पिस्तौल निकाली खोला गोली भरी फिट किया। पत्नी की कनपटी में लगा दिया। उसने कहा ये सब नाटकबाजी बाहर किया करो। बोले असली गोली है।
तुम्हें डर नहीं है। बोले मेरे प्रीतम हो। मुझे डर नहीं है। तुम मेरे प्यारे हो ऐसा कर ही नहीं सकते। उसने हंसकर पिस्तौल नीचे रख ली। बात समझ में आई? प्रभु मेरे प्यारे हैं और मंगल भवन है। उनकी ताकत ही नहीं की वो मंगल कर सके। उनका जिन्होंने मारने का प्रयास किया उनको तो परम पद दे दिया और हम राधा-राधा बजते हैं वो हमारा मंगल कर देंगे। कैसी बात करते हो? जिन्होंने प्रभु को मारने का प्रयास किया। जैसे पूतना अपने स्तनों में जहर लगाकर छह दिन के भगवान थे। उनको मारने के लिए गई तो उनको वो पद दिया जो यशोदा मैया को मिलना चाहिए।
ऐसे कृपालु भगवान क्या भजन करने वालों को या अपने भक्तों को मंगल करेंगे वह दुख दे देंगे वो विपत्ति दे देंगे नहीं नहीं ऐसा भगवान का ऐसा स्वभाव नहीं है हमारे भगवान जैसे हम सूर्य भगवान को कहें कि तुम में ताकत हो तो अंधेरा करके दिखाओ तो वो नहीं दिखा सकते क्योंकि जब तक वो रहेंगे अंधेरा हो ही नहीं सकता। ऐसे भगवान मंगल भवन है। भगवान की ताकत नहीं कि किसी का मंगल कर सके। भगवान ने जिनको मारा उनको योगी जन दुर्लभ परम पद दे दिया। परम पद दे दिया। जिनको मारा फिर जिनको प्यार करते हैं उनकी बात क्या है?
तो अगर हम भगवान के भक्त हैं तो विपत्ति में दुख में संकट में घबराए नहीं। उन्हीं से प्रार्थना करें कि हमको ऐसी सामर्थ्य दीजिए। एक वो संसारी गीत में है ना ऐसी शक्ति हमें दे ना दाता। मन का विश्वास कमजोर होना। ऐसी विपत्ति ऐसे दुख हमारे जीवन में आए जिससे हम आप पर विश्वास कर सके। आप पर दृढ़ता कर सके। कहीं ऐसी परिस्थिति ना भेज देना कि हमारा विश्वास आपसे टूट जाए। भगवान से प्रार्थना करो। यह बहुत कमजोर बात है कि विपत्ति में दुख में हम घबराकर भगवान पर अश्रद्धा कर ले या विश्वास नहीं उस समय तो और श्रद्धा करने की बात है क्योंकि वही हमें विपत्ति का नाश कर सकते हैं।
हरि स्मृति सर्व विपद विमोक्षणा भगवान का स्मरण ही समस्त विपत्तियों से बचाता है और भगवान का स्मरण छूट गया तो अश्रद्धा हो गई तब तो हम गए फिर हमारा कौन साथी है विपत्ति में कौन साथी है संसार में नहीं संसार में कोई साथी नहीं है एकमात्र भगवान साथी है तो भगवान के सन्मुख रहो हमें तो ऐसा नहीं लगता कि कोई विपत्ति ऐसी है जो हमें परास्त कर सके क्योंकि हम भगवान के जन है ऐसा नहीं हो सकता कोई बाल बांका नहीं कर सकता। भगवान के जन है हम। भगवान की शरण में हम बचपन से देख रहे हैं।
तो एक एक कदम भगवान का प्यार दुलार हमको देखने को मिला है। नहीं भगवान बहुत कृपालु है। कभी ऐसा मत करो। कोई भी अश्रद्धा मत करना। श्रद्धा मात्र से आपको समझ में आ जाएगा भगवान कितने कृपालु हैं। गुरुदेव ये जीव जानता है लेकिन फिर भी ये नहीं होता। यह जानते हैं महाराज जी पर कभी-कभी शाब्दिक अपराध बन जाता है। भगवान को भी उल्टा सीधा बोल देते हैं। यह चलेगा। कैसे चलेगा? जैसे हम आपसे प्यार करते हैं। अब हमको नाराजगी लगी तो हम किससे लड़ेंगे? आपसे ही तो लड़ेंगे। लड़ना बात अलग है।
अश्रद्धा बात अलग है। लड़ने में और प्यार होता है। हम किससे कहें? आपके होते हुए हमारी ये दुर्दशा और हम किससे कहे? हम रात आठों पैर आपकी सेवा करते हैं। हमारी दुर्दशा आप देखकर चैन से रह रहे हो। ठीक है जाओ हम आपसे बात नहीं करते। वो एक लड़ना होता है। उसमें प्यार होता है। हम भी लड़ते हैं अपने भगवान से। उसमें प्यार होता है। अश्रद्धा शब्द अलग है और लड़ना शब्द अलग है। लड़ने में प्यार होता है। अपने प्यारे से लड़ने में एक और आनंद की अनुभूति होती है। बाद में रोना भी तो आता है।
आप लड़ के देखो वो इतना आनंद दे देंगे कि रोना आ जाएगा। आपसे लड़े आप क्षमा कीजिए। ऐसा आ जाएगा आ जाएगा। पर अश्रद्धा होना अलग बात है। अश्रद्धा नहीं अश्रद्धा नहीं प्यार में लड़ना होता है। अश्रद्धा एक अलग चीज है और प्यार में लड़ना एक अलग चीज है। जैसे नरसी मेहता जी भगवान से कहते हैं उनको दर्शन दे दिए उनको दे दिए। हमको क्यों नहीं दे रहे? हमसे क्या परेशानी? 52 बार दर्शन दिए नरसी मेहता जी को। तो वो अपनापन जब अपनापन होता है तब बात होती है। महाराज जी आपके जीवन की कोई ऐसी घटना कि आपको गुस्सा आया?
हां क्यों नहीं आया? कई बार आया। उसके बाद फिर आपको प्रेम भी आया। अरे उसी प्रेम में गुस्सा आता है। उसके बाद फिर और क्या रोना आता है? फिर बाद में रोना आता है कि क्षमा करो आवेश में मैं भूल गया आपसे। वो सुनते हैं और वो एक एक सेकंड की सुनते हैं। एक एक सेकंड का हिसाब करते हैं। ऐसा नहीं बहुत प्यारे लाडले कोई मूर्ति नहीं है। वो यही है। यही सबके बीच में है। हर कण में हर क्षण में आप में सब में वो समाए हुए हैं। कोई उनसे प्यार करके तो देखे। इतना बड़ा प्यार करने वाला कोई आशिक ही नहीं।
जितने बड़े भगवान हैं। कोई प्यार करके तो देखे। इतने सुंदर इतने महान सर्वश्रेष्ठ सर्वलोक महेश्वर और वो हमारे प्यारे छाती चौड़ी हो जाती है आज मस्त हो जाता है जीवन नाचने को करता है कि भगवान ने मेरी बात बना दी कि हमारा यार बन गए भगवान हमारा प्यार बन गए भगवान संसार से हटा के अपने से प्यार करवा लिया हमारे जीवन को धन्य कर दिया भगवान ने अरुण जी करुणाल से राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी जिस शांति के लिए हम सारी उम्र भागते रहते हैं वो हमारे अंदर अंदर ही है तो इतनी बाद में क्यों पहुंचते हैं वहां तक?
बाहर से आप भटक गए ना अब इंद्रिय और मन बहिर्मुख हो गए। बहिर्मुख का मतलब संसार में अब संसार में भटकने के कारण शांति तो अंदर है और भटक बाहर रहे। मानो चाबी घर में खो गई और वो घर में है और हम दरवाजे के बाहर पूरा दिन भटकते रहे। शाम के जब थक के आए तो पता चला चाबी तो घर में ही है। तो शांति तो हृदय में है। तो हृदय में टिकते कहां है? सारा हृदय बाहर फैलाए हुए हैं। संसार के सारे रागों में फैलाए हुए हैं। तो यहां शांति थोड़ी दुखालयम असतम। जैसे मिठाई की दुकान में जाओ और वहां बोलोगे जरा गीता जी देना।
तो आपको कहेगा ग्रंथालय में जाओ। ये तो मिष्ठान भंडार है। तो संसार को भगवान ने क्या लिखा है? दुखालयम अशातम हेडिंग डाल दी ऊपर। यह दुख का घर है और नाशवान है। महाराज जी फिर क्या संसार गृहस्ती छोड़ के सब छोड़ना कहां है? छोड़ना थोड़ी कुछ है। कभी कुछ छोड़ना नहीं है। परिवर्तन करना है। और जोड़ देना है। जैसे आपने एक कर्म किया। दो घंटे कर्म किए और उसके बाद कृष्णारपणमस्तु यह जोड़ दिया वह कर्म भगवान को समर्पित कर दिया तो भगवत समर्पित कर्म आपको मोक्ष की तरफ ले जाएगा बंधन की तरफ नहीं ले जाएगा और कहीं बीच-बीच में कृष्ण कृष्ण राधा राधा भी जप लिया और वो कर्म भगवान को समर्पित कर दिया वो कर्म भगवान को समर्पित होने के कारण आपका परम मंगल कर देगा वो निष्काम कर्म हो गया वो भगवत समर्प ित कर्म हो गया वह आपका मंगल कर देगा वही कर्म है हल जोत रहे हो चाहे व्यापार कर रहे हो चाहे कोई ड्यूटी दे रहे हो यत करो भगवान ने कहा उसमें यह नहीं कहा कि यह करो यही समर्पित करो कहा यत करो जो तुम कर रहे हो पाप कर्म छोड़कर पाप कर्म समर्पित नहीं किए जाते जैसे हम भोग लगाते हैं तो अभक्ष पदार्थों का त्याग कर देते हैं।
मांस, मछली, अंडा, लहसुन, प्याज इनका हम त्याग करके भोग लगाते हैं ठाकुर को। तो ऐसे हम पाप कर्म का त्याग करके अच्छे कर्म हर जगह अच्छे कर्म है। जैसे आप कोई सर्विस कर रहे हैं और उसमें से बेईमानी कर रहे हैं तो पाप कर्म कर रहे हैं। आप सर्विस कर रहे हैं। ईमानदारी से कर रहे हैं। वह धर्म कर्म है। बात है चाहे एक रुपया की बेईमानी हो लेकिन पाप कर्म बन गया और ईमानदारी से कर रहे हो। ठीक है गरीब हो लेकिन आप धन्यवाद के पात्र हो भगवान आपको धन्य करेंगे सकल भवन मध्य निर्धना पिते धन्य निर्धना ते प धन्य यद्यपि वो निर्धन है ते धन्य जिसके हृदय में भगवान की भक्ति विराजमान है जो धर्म से चलता है निर्धना ते प धन्य सकल भवन मध्य है पूरे ब्रह्मांड में वह धन्यवाद का पात्र हो जाता है जो धर्म से चलता है भगवान की भक्ति करता है तो हमको यह देखना है कि छोड़ना कुछ नहीं कहां भाग के जाओगे हमें बताओ माया रहित स्थान बताओ चलो जहां आप कहो वहां हम आपको माया दिखाएं माया ही माया है भाग के कहां जाओगे कहीं भाग के नहीं जाना जहां हो वही साधना करो और माया रहित हो जाओ जहां हो वहीं साधना करो।
जिस परिस्थिति में हो उस परिस्थिति में साधना करो। अच्छा साधना कलयुग की इसमें विशेष जोर पसीना चुने में नहीं दिया गया। सुलझ के समझ के हम कर्म करें समझ के और नाम जप करते रहे और भगवान को समर्पित करते रहे। देख लो जीवन आपका क्या हो जाएगा। आप स्वीकार करो केवल इस बात को स्वीकार करो। मान लो आपको आठ घंटा हो गया काम करते हुए और आप भगवान को भूले रहे 8 घंटा के बाद हे करुणामय प्रभु ये आठ घंटा संसार की सेवा ऐसी थी कि मैं आपको भूल गया ये आठ घंटा कर्म जो आठ घंटा समय है वो मैं आपको समर्पित करता हूं आप करके देखो सब लोग आप करके देखो आपको कितना आनंद आएगा छोड़ना नहीं माया छुड़वाएगी हम कह रहे हैं 20 घंटा भूल गए आप समर्पण ही नहीं किया तो 20 घंटा को टोटल समर्पण करो।
हे नाथ मैं 20 घंटा से संसार के राग में ऐसा भूल गया। यह टोटल 20 घंटा मैं आपको समर्पित करता हूं। कृष्णारपणमस्तु आप इसका फल देख लीजिएगा। इसका फल देख लीजिएगा। परम लाभ प्राप्त होगा इसका। आप देख लीजिए। इसे भागवत धर्म कहते हैं। जो कृष्ण समर्पण है यह भागवत धर्म है। कर्म का समर्पण भागवत धर्म बिल्कुल सरल है। आप जो कर रहे हो बस पाप कर्म नहीं पाप कर्म जब हो जाए तो उसका प्रायश्चित कर लेना चाहिए। एक तो होने ना पावे अगर हो जाए तो उसका प्रायश्चित कर लेना चाहिए। गंगा यमुना स्नान करके कुछ पाठ करके कुछ दान पुण्य करके उनको नष्ट कर देना चाहिए।
जिससे हमें अगले जन्म का हिसाब ना बन जाए वो पाप कर्म तो पाप कर्म नष्ट कर दिया और सारे कर्म भगवान को समर्पित कर दिए और नाम जप कर रहे हैं तो हमारा घर बैठे कल्याण हो गया घर बैठे सबका कल्याण हो जाएगा हमारी बात मान लो राधा राधा जपो और अपने कर्मों को भगवान को समर्पित कर दो राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
संबंधित
- एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1402 — श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान…
- किसी को कोई बात समझाने पर वो न समझे तो क्रोध आ जाता है — शशांक वर्मा जी मुजफ्फरनगर से राधे-राधे श्री राधावल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी ऐसा कई बार होता है कि किसी को अपनी बात समझाते हुए…
- स्वर्ग में वो कौन-सा सुख है, जो धरती पर भी नहीं है? — पारस कोहली जी नई दिल्ली से राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी सुख और दुख एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं। मेरा प्रश्न यह है कि वह कौन सा सुख स्वर्ग में है…
- एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1401 — विक्रम पांडे जी मिर्जापुर से श्री हरिवंश महाराज जी राधावल्लभ श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी आपका सत्संग सुनता हूं और कृपा का अनुभव है महाराज जी…
- संत भगवान के प्रश्न पर महाराज जी ने साधना जीवन के लिए क्या उपदेश दिया? — महाराज जी कुछ हम लोगों को आप बता दें कि जैसे साधना जीवन में क्या कैसे कुछ भी आप अपने मुखारविंद से कुछ सब बातों की केवल एक ही बात है ना विषय चिंतन होने पावे ना विषय क्रिया बस…
- परिवार में नकारात्मकता व कलह हो तो क्या करें? — एसवी चतुर्वेदी जी दिल्ली से राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी परिवार में नकारात्मकता हो घर में कलह हो रही हो गृह युद्ध जैसी परिस्थिति बन रही हो तो अध्यात्म के रास्ते पर…