॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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जटेरी धाम से पधारे महंत पूज्य श्री विपिन बिहारी दास जी द्वारा बसंत और होली के रसभरे पदों का गायन।

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

आओ महाराज आओ धन धन विराज आओ सब संतो कुंज बिहारी श्री हरिदास जय हो जय हो पतित पावन संतो जरी धाम में तुलसी नरेश जी की कथा है तो आप एक दिन आपके श्री चरण पधारे जय हो स्वामी महाराज जी हाथ की बनी हुई है सबको पहनाओ सबको और महाराज जी जाको राखे सांवररो और ताह नाके कोई अंबरीश प्रहलाद ध्रुव कुंती नंदन जो कुंती नंदन जो जगत में गजपति जैसे दुर्वासा असुरेश सुरुचि दुर्योधन जैसे श्री भागवत रसिक नरेश बाह ग राखे जाको तो कोई बा को कछु ना बिगाड़ सके जब श्री जी ने आपके हृदय में विराज तो आप तो हमारे लिए साक्षात श्री जी के रूप में विराज जय हो जय जय हो की कृपा से सब एक पद सुना दे आ महाराज जी आज बसंत बनो सखी वन में श्री वृंदावन में श्री निधि वन में आज बसंत बनो सखी वन में श्री स्वामी बिहार देव जी महाराज का पद है फूल सो लाल लड़ाए लाडली खेलत मत मदन में फूली लता ललितादिक देखत फूल बड़ी तन मन में फूल सो दास बिहारीन गावत फूल के सुख सदन में आज बसंत बनो सखी वन आज संत बनो सखी मन में सत्संग आज बसंत बनो सखी बन में कभी बन

में वृंदावन में श्री निधि बन में वृंदावन में जीवन में आज संत बनो सखी बन में आज बस संत बनो सा बन फूल सो लाल लड़ा लाडली फूल सो लाल लड़ा लाडली फूल सो लाल लड़ा लाडली खेत मा लाल लड़ाई लाडली फूल लाली खेलता मात मन में बन में खेला मा बन आज वंत बनो सखी मन में आज बस बनो सा आज बसंत आज बसंत आज बसंत सखी मन में फी लता ललिता देखता फी लता ललिता देखता हो लीला ललिता देखता ललिता देखा फूल बढ़ ताना मन में बन में फूल बढ़ तों में फूल लता ललिता देखत फूल लता ललिता चलेत फूल बढ़ी ताना मन में मन में फूल मन में फूल सो दास बिहारी गावत फूल सो दास बिहारी आ फूल दास बिहारी फूल सो दास बिहारी फूल के सा में मन में के सन में मन में आज बसंत बनो सखी मन में आज बसंत सन में फूल सो लाल द लाडली फूल लाल लड़ाए लाडली फूल के सुख सदन में बन में फूल के सुख सदन में बन में फूल लता ललिता देखत फूल लता ललिता देखत फूल बढ़ी तन मन में मन में फूल भरी तन मन में मन में फूल सुदास बिहारी गावत फूल सुदास बिहारी गावत सुख सदन में वन में सुख सदन में बन में आज

बसंत बनो सखी वन में आज बसंत मन में आज बसंत आज बसंत आज बसंत साखी बन लाभ से लोभ बढ़ता है। एक पद और सुन ले का लोभ बढ़ गया। महाराज जी हो रही है क्या? खेरी खेल श्याम बोला से छबी आई हो के घनश्याम खेल हो अभी गुलाल नै नलन में अभी गुलाल तेरी अभी भर देन में नैना में आत मन आई छवि प्यारी आज मन आई मोल नैन है अभी रघुला अभी हर हर उलन में आज का रथ मन भाई छबी प्यारी मन भाई श्याम बाजे बजत दो के मन माथे मो बढ़ा आई बाजे वाला तेरी बाजे हरि बाजे मन मत मोता पिचकारी रंग छत पिचकारी मार मचाई प्यारी मार मचाई के छवि रंग छूटता पिचकारी छवि रंग छूटता पिचकारी मार मचाई रघुवार मचाई गावत गीत रस रीत जीत के सुखदा पाई गावत गीत तेरी गावत गावत गीत रस जय सुखदाई रस बिहारी लगी छवि रस बिहार लगी छवि जोधा छाई छवि जो घन छाई होली खेलन श्याम खेलन श्याम बोला सली खे बहुत बहुत कृपा बहुत कृपा ये अमृत रस आप ही रसिक महापुरुषों के द्वारा मिल सकता है।

दुर्लभ रस प्रभुंद पाद जी ने तीन वृंदावन का वर्णन किया। जी एक वर्णन किया गोष्ठ वृंदावन एक वर्णन किया गोपी वृंदावन जी एक राधा निकुंज वाटी वृंदावन करके संकेत किया है जो राधा निकुंज वाटी वृंदावन है ये य नारदा सुख अगम्यम वृंदावन वंजुल मंज कुंजे त कृष्ण चेतो हरण विज्ञ मत्रास्त किंचित परम रहस्यम जो नारद जी श्री सुखदेव जी इस भगवान शंकर और ब्रह्मा की भी दृष्टि से अगोचर वृंदावन है। जी इनके द्वारा अगोचर है। जहां श्री लाडली जू अपनी दृष्टि से चित्त का आकर्षण करके लालजु को अधीन किए हुए भैकुट निर्जित मदन मंद सस्मित बदन किए रस विवस घनश्याम पिय गोरी इस वृंदावन में किसी का प्रवेश नहीं ये स्वामी जी महाराज हरिराम व्यास जी महाराज जी रस त्रिवेणी यही कृपा जी आचार्य चरणन ने जो कृपा करी है वो वितन वृंदाव पे जी ये हमारा रसकंद तो हमारा वृंदावन तो यही है तन बन के बन तन भयो कछु बरो बरनो न जाए कदली कुंद कदंब अंब बन बीथन बर विमाए तन मन के धो बन तन भयो कछु बरो बरनो न

जाए तो महाराज जी वही श्री प्रियाजू को श्री अंग रूपी वृंदावन वा वृंदारण्यम स्वपद रमणम रमणम रति प्रदम क्योंकि नहीं तो और भी शब्द आ सकते लेकिन रमणम शब्द है रति प्रदम तो गुप्त रूप से आचार्यन को इशारो निकुंजन को ही वही ये वस्तु आपकी ये आपके ही योग्य और तो फिर आचार्यों ने अपने लोगों को परोसा उस त्रिभुवन में कहीं नहीं है तो ये प्यास केवल यही बुझ पाई और कहीं ना आगमों में है ना निगमों में है ना पुराणों में है जे रस बिसरी छदा पिपासा रस जय महाराज आपको रोम रोम पुल जाता है आपके आरती यही जय जय माता सियाराम

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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