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कण-कण में ईश्वर का वास है, तो मंदिर में जाने पर एक अलग अनुभूति क्यों होती है?

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

अनिमेश सिंह जी नोएडा से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी ईश्वर सर्वव्यापी है कण-कण में ईश्वर का वास है किंतु जब हम मंदिर में जाते हैं तो एक अलग अनुभूति होती है ईश्वर से साक्षात्कार जैसा अनुभव मंदिर में प्राप्त होता है जो अनंत कहीं नहीं प्राप्त होता महाराज जी ऐसा क्यों होता है हां भगवान का अर्चा अवतार कहा गया है जो श्री विग्रह है उसमें भगवान की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है जैसे दूध में घी है। पर जब हम उसकी प्रक्रिया करके निकालते हैं तभी स्वाद मिलता है।

दूध पीने से घी का स्वाद नहीं मिलेगा। दूध को दधी रूप में जमाना, दधी का मंथन करना, मक्खन निकालना और फिर उसे तपाना तब उससे जो निकलता है वो घित होता है। यद्यपि दूध में घी है पर घी का स्वाद एक निराला है और वो पद्धति से निकलता है। तो ऐसे ही कण-कण को मिलाकर के जब आकार दिया गया और उसे आकार में प्राण प्रतिष्ठा की गई और जब भक्त जन अर्चना के द्वारा भगवान को वहां प्रकट कर लिए तो अर्चना विग्रह में स्वयं भगवान विराजमान है तो अव्यक्त भगवान से व्यक्त भगवान का सुख तो मिलेगा ही अधिक।

तो जब हम मंदिर में जाते हैं तो एक विशेष परमाणु एक विशेष आनंद एक विशेष सुख मिलता है क्योंकि वहां भगवान प्रगट अर्चा विग्रह के रूप में विराजमान है। महाराज जी जो साधक या महापुरुष जन जन व्यापी मतलब जो प्रभु अंदर विराजमान है उनमें भी जब भगवत भाव करते हैं उनको भी प्रत्येक चलते फिरते बिल्कुल ऐसा ही अनुभव होता है जैसे इसको मंदिर में अनुभव होता है ऐसे हर व्यक्ति वस्तु स्थान तभी तो निरंतर परमानंद में मगन रहता है क्योंकि सर्वत्र भगवान का दर्शन करता है श्री राम में सब जग जानी करो प्रणाम जोर जुग पानी वो मंदिर में जाए या ना जाए वो हर समय परमानंद में मगन रहता है क्योंकि सब में सी राम को देखता है सर्वम खलमिदम ब्रह्म नैना नास्त कििंच सर्वत्र ब्रह्म बुद्धि हो गई तो ब्रह्म भूता प्रसन्न का समाते वो ब्रह्म भूत हर समय अखंड प्रसन्नता को प्राप्त होता है जो सर्वत्र भगवान का समदना जो सर्वत्र भगवान का दर्शन करता है सर्वत्र आत्म स्वरूप का दर्शन पर वो बच्चा ये अपना अनुभव बता रहा है ठीक का अनुभव बता रहा है।

पर यह साधारण कोटि का है। लेकिन असाधारण कोटि का अनुभव यह है कि क्रूर पापी को भी देखकर के भी अपने भगवान की स्मृति में भावना में तन्मय हो जाना तो जो मंदिर में सुख है वो कण-कण में सुख है। ऐसा अनुभव हो जाएगा। तो महाराज जी क्रूर और पापी की जो प्रकट में लीलाएं होती हैं तो उस समय अंदर विचार क्या होता है? जैसे हीटर गर्मी फेंक रहा है लेकिन विवेकवान हीटर की गर्मी और कूलर फ्रिज आदि एसी आदि की ठंडी इन क्रियाओं को देख के बिजली को नहीं भूलता उसको पता है बिजली दोनों में एक है हीटर की गर्मी में और फ्रिज या एसी या कूलर आदि की ठंडी में बिजली तो एक ही है ना तो ऐसे क्रूर पापी और पुण्य आत्मा महात्मा दोनों में भगवान तो एक ही विराजमान क्रियाएं दोनों की अलग-अलग है।

जो क्रिया को देखता है वो कारण को नहीं समझ पाता। जो कारण को देखता है वही समझदार है। कारण सबका परमात्मा है। वही विराजमान सब रूपों में है। गायत्री जी उत्तराखंड से महाराज जी आपके चरणों में दंडवत प्रणाम। गुरुदेव भगवत प्राप्ति और प्रेम प्राप्ति में कुछ फर्क है क्या? भगवत प्राप्ति में मोक्ष भी आता है। सारष्ट साम्य सा एकत्व आदि लेकिन प्रेम में एक दुर्लभता है वो मोक्ष भी मान ग्रहण विना मत सेवन जना वो मोक्ष देने पर भी स्वीकार नहीं करता वो अपना कल्याण भी नहीं चाहता वो बस अपने प्यारे के वियोग में तड़पना चाहता है।

प्यारे का नाम ले ले के उसकी याद में रोरो करके समय व्यतीत करना चाहता है। ऐसे प्रेमी जगत को पावन करने वाले होते हैं। जो मोक्षाभिलाशी है वह तो धन्य है ही लेकिन जो मोक्ष त्यागी है मोक्ष का भी त्याग करके भगवान के विरह में तड़पना चाहते इसीलिए गोपियों की चरण वंदना परम ज्ञानी बृहस्पत शिष्य भगवान के मित्र भगवान के मंत्री उद्धव जी ने की। क्यों? क्योंकि गोपियां हर समय भगवान श्री कृष्ण के प्रेम में उन्मत्त रहती थी। गृह कार्य करते हुए भी कृष्णाकार वृत्त रहती थी।

विकेत कामा खिल गोप कन्या मुरारी पादार पितवत्त द्यादिक मोह वसादच गोविंद दामोदर माधवेती इतनी तन्मयता थी कि बोलना चाहिए दही ले ले दही तो बोलती कोई गोविंद ले ले कोई दामोदर ले ले कोई माधव ले ले भगवत प्रेम अत्यंत दुर्लभ वस्तु है। भगवान से यही प्रार्थना करनी चाहिए कि प्रभु मुझे अपने चरणों का प्रेम प्रदान कीजिए। अपने नाम का प्रेम प्रदान कीजिए। अपने धाम का प्रेम प्रदान कीजिए। अपने रूप का प्रेम प्रदान कीजिए। और मैं कभी मोक्ष या कल्याण नहीं चाहता। प्रभु यत्र यत्र मम जन्म कर्म नारके परमे पदे थवा राधिका रथ निकुंज मंडली तत्र हद में विराजता चाहे मुझे नरक में रखो चाहे परम पद में मुझे कोई परवाह नहीं पर स्वामी आपका स्मरण आपकी रूप माधुरी आपकी लीला माधुरी का चिंतन करके मेरे आंसू बहते रहे यही मेरे जीवन की लालसा है प्रेम अत्यंत दुर्लभ वस्तु है

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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