Ekantik Vartalaap Collection / 17-03-2026 / Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
श्री हरि बोल आप सब लाडली जी की कृपा से वृंदावन पधारे। अब प्रार्थना यही है कि जीवन के समय की सार्थकता भगवन नाम जप में है। नाम जप से बढ़कर के कोई साधना नहीं है। ब्रह्म राम ते नाम ब वरदायक वरदान। वरदान देने वालों को भी वरदान देने की सामर्थ नाम जापक में आ जाती है। भगवान से भी बढ़कर भगवान का नाम है। और फिर भगवान भी जो नाम जप करते हैं वो राधा नाम है। जपत हरि विवस तव नाम प्रतिपद विमल मनुष्य तव ध्यान ते निम नहीं करो। एक निम के लिए भी प्रियाजु का ध्यान और राधा नाम ये प्रभु श्री कृष्ण नहीं छोड़ते।
इसलिए हर समय जहां भी रहो सावधान रहो कि कोई पाप कर्म ना बन पावे। कोई नशा ना करो। कोई गंदा आचरण मत करो। खूब नाम जप करो। नाम जप से जीवन सार्थक है। साधु संग का फल नाम जप है। भटको मत। एक एक नाम का हिसाब होगा। एक एक सेकंड का हिसाब होगा। हमारी लाडली जो बड़ी करुणा में है। हमारे लाल जो बड़े करुणामय है। अवगुण करे समुद्र सम गत ना अपनो जान। लाई के सम भजन को मानत मेरु समान। अगर समुद्र के समान शरणागत भक्त से पाप बन जाए। अपराध बन जाए तो श्री जी मानते ही नहीं कि अपराध बना है और राई के समान भजन बन जाए तो उसे सुमेर पर्वत के समान मानती तो बहुत भजनंदी है इसलिए थोड़ी सी ठाकुर सेवा चाहे करो लेकिन घर में ठाकुर सेवा प्रिया प्रीतम विराजमान करो वाणी जी का पाठ करो और नाम जप करो और सावधान रहो कि मृत्यु के पहले हम अपनी लाडली लाल को ऐसे लझा ले कि हमारा शरीर जब छूटे तो अंतिम समय लाडली लाल हमारे ध्यान में हो और हम उनका नाम जप करते हुए शरीर छोड़े तो हमारा मनुष्य जीवन सार्थक हो जाएगा।
यही साधु समागम का फल है। सब स्वस्थ रहिए आनंदित रहिए। श्री हरि कचेरा किशन जी राधे राधे मेरे साथ राधे-राधे महाराज जी महाराज जी भारत भूमि निसंदेह दिव्य भूमि है जहां संत महापुरुषों की वाणी दर्शन एवं दिव्य लीलाएं होती रहती हैं संतों एवं महापुरुषों के होने पर आध्यात्मिक बल समाज को प्राप्त होता है। परंतु जब वो महापुरुष दिव्य धाम चले जाते हैं। उनके अभाव में समाज एवं राष्ट्र उनकी गुरु वाणी एवं दी हुई शिक्षाओं के प्रभाव को निरंतर धारण करने के लिए क्या करें?
बिना प्रगट संतों के सानिध्य के उनकी वाणी के अनुसार हम चल सके। बड़ा असंभव देखो संतों की वाणी तो दिव्य है ही है लेकिन स्वयं भगवान अवतरित होकर गीता जी ये संत वाणी नहीं स्वयं भगवान बोल रहे हैं। गीता जी तो स्वयं भगवान बोल रहे हैं। भागवत जी में स्वयं भगवान उद्धव जी को उपदेश कर रहे हैं। लेकिन हम उसको अपने में धारण नहीं कर सकते। तभी धारण कर पाएंगे जब कोई गीता के अनुसार चलने वाला संत मिलेगा। और उससे जब हमारा संबंध होगा भाव संबंध और वह जब अपनी दिव्य अनुभूतियां देगा तो गीता जी की बात हमें समझ में आने लगेगी तो हमें गुरु वाणी की बात समझ में आने लगेगी तो हमें बड़े-बड़े सद ग्रंथों की बात समझ में आने लगेगी।
इसीलिए गोस्वामी जी ने प्रथम भगत संतन कर संगा। सबसे पहली भक्ति रखी है गोस्वामी जी ने संतों का संग। अगर हमें संतों का संग मिले तो परम सौभाग्य है। और अगर संतों का संग ना मिले तो केवल ग्रंथ से देखकर हम अपना कल्याण नहीं कर सकते। जैसे मेडिकल स्टोर है और हम बीमार हैं और हमें मेडिकल स्टोर में खड़ा कर दिया जाए। क्या हम निरोग हो सकते हैं? डॉक्टर की जरूरत है कि नहीं? है ले। दवा वहीं रखिए। शास्त्र है मेडिकल स्टोर और हम है बीमार भवर रोग के। अब हमको शास्त्र रूपी मेडिकल स्टोर से हम निरोग नहीं हो सकते क्योंकि हमें बीच में वैद्य की जरूरत पड़ेगी, डॉक्टर की जरूरत पड़ेगी।
मेडिकल स्टोर में ही दवा रखी है। अब वो पहले हमारे रोग को समझे और हमारे अधिकार अनुसार वो हम दवा दे। वो मेडिकल स्टोर से ही देगा। लेकिन अगर डॉक्टर से हम ना मिले तो हम अपनी हानि नहीं कर सकते। कोई भी दवा टेस्ट करेंगे तो हम परेशान हो जाएंगे। मेडिकल स्टोर है वो तो बहुत से रोगों की दवा सब औषधि तो शास्त्र क्या है? मेडिकल स्टोर है। गुरु क्या है? डॉक्टर है। हम है मरीज। तो जब गुरुदेव शोध करके कि देखो जैसे अभी इससे कहा कि तुम नाम जप करो। कहा हां ठीक है यह दवा बताई सद्गुरु वैद्य वचन विश्वासा संयम यह ना विषय के आशा सद्गुरु रूपी डॉक्टर की बात मान लो और परहेज करो जो गंदी बातें हम कहो गंदी बातें छोड़ो विषय की आशा को त्यागो यह परहेज है दवा खाओ सद्गुरु की आज्ञा का पालन परहेज गंदी बातों का त्याग करो अभी सब ठीक हो जाएगा तो हम केवल शास्त्र या सद्गुरु वाणी से जो लिखित है उससे हम हमको प्रगट में चाहिए।
प्रगट में संत रूपी डॉक्टर चाहिए। वो हमारी नाड़ी पकड़े कि हम किस कोटि के मरीज हैं और उसी कोटि की दवा हमको दे तो हमारा कल्याण हो जाए। भगवान की बड़ी कृपा रहती है। जब संत जन मिलते हैं। जब द्रव दीन दयालु राघव तो साधु संगति पाइए। संतों का संग मिलता है। जिस दिन हमारे संत महापुरुष अब जैसे बड़े-बड़े अंतर्धान हो गए। अब यत्र तत्र कहे संत जो स्वयं भगवान में स्थित हैं और भगवान में स्थित करना जानते हैं। अन्य को भी भगवत भाव में स्थित करना जानते। बीच में कोई लेनदेन नहीं।
अध्यात्म कभी बिकता नहीं और जो बिकता है वह अध्यात्म होता नहीं। केवल भगवान की महिमा सुनो आके फ्री और उसको अपने जीवन में धारण करो। हमारा आपका संबंध है भिक्षा और शिक्षा का। भूख लगे तो हमें चार रोटी दे दो और तुम हमसे शिक्षा लो। हम बाबा जी हैं। तुम्हारा कल्याण शिक्षा से होगा और हमारा भजन भिक्षा से होगा। बस इतना संबंध है। भिक्षा तय नहीं होती। मन आवे एक रोटी दे दो, मनावे दो रोटी दे दो, मन आवे भरपेट दे दो। तो अगर हमें संत मिल जाए तो हमारा कल्याण हो जाए। अगर संत तो केवल वेश मात्र से बात नहीं बनेगी।
वेश मात्र से बात नहीं बनेगी। सोने का पानी फेरा हो और आप कलश पीतल का ले जाओ तो स्वर्णकार की नजर में पीतल के पैसा मिलेंगे। सोने के नहीं मिलेंगे। समझ रहे हो ना? जिस समय वो जा देखा कसौटी में कस के तो तो पीतल है ओरिजिनल भगवान के मार्ग में चलने वाला शुद्ध संत मिल जाए तो हमारा कल्याण हो जाएगा तो शास्त्रों की जो बातें हैं वो हम पर हावी हो जाएंगे और हमसे बुरे आचरण होने ही नहीं पाएंगे हर समय दिमाग में यार बाबा ने कहा है ऐसा नहीं होना वो बाबा सामने दिखाई देंगे और वो बात सामने दिखाई देगी और आपके आचरण बदलना शुरू हो जाएंगे तो हम कहते कि जैसेजैसे कलयुग आएगा वैसे वैसे एक घाटा हो जाएगा।
संत मिलना मुश्किल हो जाएंगे। संतों का अभी बहुत घाटा है। संत मिलना बहुत घाटे का सौदा है। हमारे बड़े-बड़े संत अंतर्ध्य हो गए। ब्रज में जो रात दिन भजन करने वाले किसी से कोई मतलब नहीं रहने वाले। अंतर्ध्य हो गए। बड़े-बड़े जो जैसे श्री स्वामी राम सुखदास जी निष्काम संत लाखों लोगों को गीता जी का निष्काम भाव से केवल निष्काम धर्म भगवान का तो ऐसे संत अंतर्ध्य हो गए। अब बड़ा घाटा है अपने को। हम भारतवासियों को बहुत घाटा है। जब बड़े-बड़े संत अंतर्ध्य हो गए तो फिर हम किससे सच्चा ज्ञान प्राप्त कर पाए?
देखो पुराने ऋषि परंपरा को देखो ऋषियों के पास गृहस्थ जाते थे कुछ फल फूल दूरवांकुर अर्पित किए और वो उपदेश किए और उनका कल्याण हुआ कहीं तय या बेचना या खरीदना तो ये खरीद बेच वाला अध्यात्म नहीं होता अध्यात्म शुद्ध होता है तो भगवान की कृपा से अभी कुछ संत भगवान भारत में ऐसे हैं निष्काम निष्काम जिनकी कि फिर आगे चलकर के और घाटा हो जाएगा। जैसे पहले जो सुविधा थी उड़िया बाबा हरी बाबा बड़े-बड़े सिद्ध महाप्रभु वो अब घाटा हो गया। अभी जो दो चार 10 15 जो भी ऐसे अंगुलियों में गिने जा सकते हैं।
ऐसा नहीं कि भीड़ मिले अंगुलियों में गिने जा सकते हैं। वह आगे चलकर वह भी घाटा हो जाएगा। घाटा हो जाएगा। तो बहुत भगवान की विशेष कृपा है अभी कि अभी भजन करने का अवसर दिया है भगवान ने। भजन कर लो। नहीं तो कलयुग का इतना प्रचंड तांडव अब देखो बढ़ने लगा है। मतलब जहां सुरक्षा थी वहां शोषण वृत्ति आने लगी है। पति पत्नी के संबंधों में बहुत ही विकार आ गए हैं। पुत्र मातापिता इनके संबंधों में विकार आ गए हैं। गुरु शिष्य इनके संबंधों में विकार आ गए। कलयुग का प्रभाव बढ़ रहा है ना?
बर्दाश्त नहीं। हां। तो यह आगे चलकर और होगा तो भजन कहां होगा? धर्म कहां होगा? धर्म तो बर्दाश्त करने से होता है। जो सहनशील होता है तभी धर्म में चल पाता है। कोटक जी मुंबई से महाराज जी इन कह रहे हैं कि सत्संग से विवेक तो होता है महाराज जी मगर वो हमेशा व्यवहार में उतर नहीं पाता। मोह क्योंकि बल नहीं हमारी बात समझो। जैसे हमको ये जान विवेक तो अभी नहीं हुआ। जानकारी जैसे हमें जानकारी हुई कि यह गलत आचरण नहीं करना चाहिए पर मन हमको विवश करके वह गलत आचरण करा दिया और जैसे मुझे जानकारी कि अच्छा आचरण करना चाहिए पर मन निराश होकर के वो नहीं करा रहा इसमें हमारे पास भजन बल नहीं है अध्यात्म बल नहीं है अध्यात्म बल है तो जहां लगाना इंद्री मन को वहीं लगा दिया जहां हटाना है वहां से हटा दिया तो जानकारी तो है लेकिन जानकारी का प्रयोग नहीं है।
वह प्रयोग तभी हो सकता है जब हमारे पास नाम रूपी बल होगा। नाम जप तो महाराज बहुत कर रहे हो। अब आपका शब्द ही बता रहा है कि आप नाम जप नहीं करती। बहुत नाम जप करने वाला कैसे बोल सकता है? बहुत नाम जप करते हैं। ये बोल कैसे सकता है? आप हमसे कहो कि आप कितना नाम जप करते हो? तो हाथ उठा के यही कहेंगे कि हम तुम्हें क्या बताएं? पूरा जीवन हो गया प्रयास करते। लेकिन अभी जी नहीं भरा कि जितना होना चाहिए वह नहीं कर पा रहे। वास्तविक कह रहा हूं कि काश मैं डट के भजन कर पाता।
जबकि हमारे पास और कोई काम नहीं भजन के सिवा और प्रयास रहता है लेकिन फिर भी असफल है। हम यह नहीं कह सकते कि हम बहुत भजन करते हैं। वो शब्द नहीं बोल पाएंगे। बहुत वैसे भी [कराहने की आवाज़] आपकी जेब में करोड़ रुपया रखे हैं। आप बता दोगे क्या करोड़ रुपया रखे हैं? गुप्त रखा जाता है कि नहीं? ऐसे ये भजन का है। बड़े-बड़े भजनानंदी ऐसे करते हैं। हम अधम जीव हम नीच जीव कहां हमसे भजन होता है? आप कहते भजन तो बहुत होता है। फिर परेशानी क्या है? जोक जानकारी हमको है कि नहीं करना वो नहीं करना।
जो जानकारी करना है कि करना है वो करना है। क्यों? क्योंकि भजन है। भजन नहीं है तो फिर यह बात आएगी। ईमानदारी से भजन करो। जैसे हम कह रहे हैं। लिखो दिमाग में राधा राधा सुनो कान से राधा राधा और बोलो हृदय से राधा राधा सब ठीक हो जाएगा। करके तो देखो। अब ऐसे कह दे कि हमने तो बहुत भजन कर लिया। तो तुम उनसे बात करो जो भजन नहीं करते। पूरा जीवन भजन में दिए हुए हैं। शुरू तो तुम करो भजन। ईमानदारी से सही भजन करो। अभी पीछे बैच में कहा कि आप घड़े में पांच छेद कर दो और एक-एक चुल्लू जल डालते रहो।
कभी भरेगा तो पहले छेद बंद करो और एक-एक बूंद डालते रहो। घड़ा भर जाएगा। पहले उन छेदों को बंद करो जो हमारे भजन को क्षीण करते हैं और ईमानदारी से भजन करो। फिर आप भी देखो बोलोगी कि नहीं भजन परमानंदमय है जो घोर हिंसक स्वभाव के थे और राम नहीं बोल पाते थे वो जब मरा मरा हुए तो रामायण की रचना कर दी इतिहास की रचना कर दी जो आज हमारे भारत में सम्माननीय इतिहास है तो आप विचार करो हम कह दे बहुत भजन करते हैं कुछ ऐसा नहीं होता तो वो बात तुम्हारी हम कैसे मान ले जब हम भी भजन करते हैं और ऐसा होता है कोई चिंता नहीं बेपरवाह ना मृत्यु की चिंता ना दर्द की चिंता ना कोई भय तो हमारा प्रतिपल आनंद में बीतता है किससे नाम से भगवान के भजन से ये हम प्रमाण तुम्हें खुद इसलिए देते हैं कि अब जैसे आपने कह दिया चार लोगों ने सुना कि हम बहुत भजन करते हैं लेकिन ऐसा नहीं हम यह नहीं कह सकते कि बहुत भजन करते हैं लेकिन करते हैं और उसका परिणाम तुमको हम दिखाई देते नहीं भजन व्यर्थ नहीं जा सकता।
भजन व्यर्थ नहीं। हां यह जरूर है कि बहुत जन्मों के हमारे पुराने संस्कार हैं, पाप है। तो अब हम थोड़ा भजन करना शुरू किया और वो हमको घसीटते हैं माया की तरफ। अब हम और भजन बढ़ावे और भजन बढ़ावे। धीरे-धीरे ऐसा होगा कि वो घसीट के हमारे पास आ जाएंगे। हां, निराश नहीं होना। बहुत जन्मों का बिगड़ेल मन है तो हमें निराश नहीं होना। पर हमको भगवान के नाम की अश्रद्धा वाली भी बात नहीं कहनी यार हम बहुत नाम जप करते हैं। ऐसा ऐसा नहीं ऐसा नहीं ऐसा बोलने से नाम की महिमा पर अंगुली उठती है और वो हम उठने नहीं देंगे क्योंकि हम स्वयं आपके सामने बैठे हैं।
उसके प्रमाण है कि हर कष्ट हर परिस्थिति हर व्यवस्था भगवान सब व्यवस्था करते हैं। किसी महीने में ऐसा नहीं होता कि यार बिजली का बिल नहीं भरने को हुआ यार। ऐसा नहीं सब व्यवस्था भगवान करते हैं तो नाम का आदर करो और आदर पूर्वक नाम जप करो सब ठीक हो जाएगा महेश सिंह राधेधे महाराज जी राधे-धे महाराज जी महाराज जी ईश्वर का स्वरूप क्या है? वह साकार है या निराकार अलग है या सृष्टि ही ईश्वर अनिर्वचनीय स्वरूपम पहला उत्तर है अनिर्वचनी स्वरूपम राम अतर्क बुद्धि मन वाणी मत हमारे सुनो भवानी ईश्वर क्या है यह निर्वचनी है फिर भी ब्रह्म ऋषियों ने उनका वर्णन किया है वह सच्चिदानंद रूपाय वह सत चित आनंद रूप है।
फिर आगे कहा विश्व उत्पत्त्याद हेतवे वही विश्व के उत्पन्न करने का हेतु है। हेतु का मतलब वही विश्व बना हुआ है। उसके अलावा विश्व नाम की कोई चीज नहीं। मत परतरम न्यतत किंचित्त धनंजय। हे अर्जुन मेरे सिवा कोई कुछ है ही नहीं। किंचिन मात्र कुछ नहीं। वेद कहता सर्वम खलमिदम ब्रह्म नेह नाना नास्त कििंचन ब्रह्म के सिवा किंचिन मात्र कुछ नहीं है। उपनिषद कहता है ईशा वास विद सर्वम यत किंच जगतम जगत ईश्वर के सिवा किंचिन मात्र जगत में और कुछ नहीं है। हरिवंश महाप्रभु कहते हैं यह क्रूर पापिनो नसता संभास दृश्य सर् वस्तुत निरीक्ष परम स्वराध्य बुद्धि मम जो दुष्ट दिखाई दे रहे हैं पापी दिखाई दे रहे हैं घोर निंदनीय है वार्ता करने योग्य भी नहीं है वो भी साक्षात राधा वल्लभ लाल है ऐसी मेरी दृष्टि है।
गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे हैं जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम मैं जानी बंधु सबके पद कमल सदा जोर जुग पान सिया राम मैं सब जग जानी करो प्रणाम जोर जुग पहला उत्तर है अनिर्वचनीयम ब्रह्म स्वरूपम वो वाणी प्राकृतिक है बुद्धि प्राकृतिक है और वो अप्राकृतिक चिदानंद है वाणी सीमित है वह असीम है। बुद्धि एक देसी है वह अनंत है। जैसे सीप में समुद्र नहीं नापा जा सकता। ऐसे बुद्धि से परमात्मा का आकलन नहीं किया जा सकता। क्योंकि बुद्धि एक प्राकृतिक वस्तु है। वाणी एक इंद्री वाक इंद्री है।
ये प्राकृतिक है। और वो अप्राकृतिक चिदानंदम में है। फिर जब हम उसका ज्ञान प्राप्त करते हैं तो सब कुछ वही है। उसके सिवा कुछ नहीं है। वही प्राकृतिक है। वही अप्राकृतिक है। जैसे शास्त्रों में वर्णन आया है। अष्टधा प्रकृति से ही संपूर्ण सृष्टि प्रकट हुई है। पृथ्वी जल वायु, अग्नि, आकाश ये पंच महाभूत मन, बुद्धि और अहंकार यह तीन तो पांच तीन आठ अष्टधा प्रकृति और भगवान का अंश जीवात्मा इसी से संपूर्ण तो भगवान का अंश भी भगवान स्वरूप है और अष्टधा प्रगति भी भगवत स्वरूप है।
जब लौट के देखो तो सब भगवान ही है। पर जब हमें जानना होता है तो दो पद्धतियां स्वीकार करते हैं। एक है और एक नहीं है। उपनिषदों में शास्त्रों में वर्णन आया जैसे ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या यह सिद्धांत से चलते हैं और जब पहुंच जाते हैं तो वहां से देखते हैं तो सर्वम खलमिदम ब्रह्म कुछ मिथ्या नहीं सब वही परमात्मा बना हुआ है दूसरा कोई नहीं समझ में आ रही है बात आपके जी नीलेश जी गुजरात से राधेधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी अभिमान और स्वाभिमान में महाराज जी थोड़ा सा अंतर समझने का प्रयास कर रहे थे अभिमान यानी यानी अहंकार तो मनुष्य को का पतन करता है।
मगर स्वाभिमान को भी क्या छोड़ना जरूरी? नहीं आप स्वाभिमान किसे कहते हैं? वो अहंकार ही तो है। आप स्व को क्या जानते हैं? नहीं स्व को कहां जाना आपने? शंकर सहज स्व रूप समारा लागी समाधि अखंड अपारा स्व वो आत्मा से संबंधित है। शंकर सहज स्व अभिमान स्व रूप यह परम पवित्र है। लेकिन आप स्वाभिमान नहीं करते। आप अभिमान करते हैं। विद्या का, अपनी चतुराई का, अपनी वस्तु का, अपनी नाना प्रकार के संबंधों का। ये सब अभिमान स्वाभिमान, जाति का अभिमान, कुल का अभिमान ये सब अभिमान है।
स्वाभिमान नहीं है। स्वाभिमान तो मैं प्रभु का हूं या मैं ब्रह्म हूं। शुद्ध परमात्म तत्व से संबंधित है। तो जो लोग ये कह देते हैं कि अभिमान तो नहीं करना चाहिए। स्वाभिमान फिर तो उनसे पूछो स्वाभिमान किसे कह रहे हो? तो अपनी जाति को ले लेते हैं, कुल को ले लेते हैं, विद्या को ले लेते हैं, धन को ले लेते हैं, पद को ले लेते हैं। इसी को तो अभिमान कहते हैं। विद्या रूप महात कुल, धन जोबन अभिमान ये सब इसी अभिमान के अंतर्गत आते हैं। स्वाभिमान मैं भगवान का हूं। मैं प्रभु का अंश हूं।
अब आत्म तत्व से जुड़ गया या मैं ब्रह्म हूं। अब यह परम पवित्र है। इसको कोई मिटा नहीं सकता। और जब इसका अनुभव होता है तो जो मेरे अंदर है वही सबके अंदर है। राग द्वेष हो ही नहीं सकता। लड़ाई झगड़ा हो ही नहीं सकता। जहां लड़ाई झगड़ा होता है वहां अहंकार होता है। उसे हम स्वाभिमान कह देते लेकिन स्वाभिमान का अर्थ नहीं समझते हम। स्वाभिमान की परिभाषा नहीं समझते। समझ पा रहे हैं आप? जी नैना जी मध्य प्रदेश से। राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आप कह रहे हैं कि आपके पति की एक दुर्घटना में निधन हो गया महाराज जी हमने बहुत प्रार्थनाएं की सब कुछ हुआ बट फिर भी उनको खो दिया महाराज जी कह रहे हैं कि अभी भगवान में मतलब दूर हो गए भगवान हम सबको कह रहे हैं कि होश में हो जाओ तुम कसाईवाड़े में हो इस लोक का नाम क्या है फिर आश्चर्य की कौन सी बात है कसाईवाड़े में कब कौन से पशु का नंबर कब आता है ये तो आश्चर्य की बात थोड़ी वो हरी हरी घास खा रहा है।
पंखा के नीचे है। वो समझ रहा मैं बड़ी मौज में मौज में नहीं हूं। अगला नंबर तुम्हारा है। यह कसाई वाला है काल का। काल का कसाई वाला सब काटे जाओगे। सब मारे जाओगे। क्योंकि इसका नाम मृत्यु लोक है। सब मरोगे। कोई आश्चर्य की बात? कोई संशय की बात, कोई गर्भ में मर जाता है। कोई गर्भ से बाहर आकर मर जाता है। कोई बाल्यावस्था में मर जाता है। कोई जवानी में मरता है। कोई बुढ़ापे में मरता है। मरना तो है ही। और अपने कर्म के अनुसार मरना ही पड़ेगा। तो भगवान पर श्रद्धा श्रद्धा करने की जरूरत इसमें क्या है?
तुमने जो कर्म किए तुम्हारी आयु है 30 वर्ष। तो 30 वर्ष के बाद एक सेकंड नहीं बढ़ सकती। तो तुम्हारे कर्म का फल तुम्हें मिल रहा है। भगवान उसमें क्या करें? जजों को गाली देने की जरूरत नहीं है। वो न्यायाधीश सर्वज्ञ है। वो एक भी पॉइंट कहीं चूक नहीं करता है। तो गाली देने से क्या होगा? प्रार्थना करने से क्या होगा? मान लो आप खूब उपासना करो और उसको 30 वर्ष जीना तो सिर्फ 30 वर्ष जिएगा तुम्हारी उपासना उसको 32 वर्ष नहीं कर देगी और भगवान को गाली देने से क्या तुम अपने कर्मों को और बिगाड़ रहे हो उसमें क्या है इसका नाम मृत्यु लोक है तुम्हें पता नहीं किस लोक में तुम आए हो मृत्यु लोक जहां हर समय मृत्यु का भय है सब मरोगे कोई नहीं बचोगे समय है तुम्हारे बाप मर गए तुम्हारे बाबा मर गए तुम भी मर जाओगे ऐसे क्रम तुमसे लड़के उत्पन्न हुए वो सयाने हुए वो मरे उनसे उत्पन्न हुए वो सयाने हुए वो मरे ये क्रम चल रहा है कार में बैठे जा रहे हैं फिल्मी गाना सुनते हुए चले एक्सीडेंट हुआ पूरा परिवार मर गया इसका नाम मृत्यु लोक है यहां सब चाट जाएगा मृत्यु किसी को बख्शेगा नहीं कोई मरना नहीं चाहता और किसी अपने परिवारिक जनों को कबूतर ने देखा बिल्ली आ रही तो आंख मूंद लिया कि है ही नहीं बिल्ली तो बच जाएगा क्या वो तो फाड़ के खा जाएगी तो ऐसे है कि हम मृत्यु की बात सुनना नहीं चाहते हम मरना नहीं चाहते तुम्हारे अरे चाहने से है।
अब तो गड़ासे में आ गए हो। काटे जाओगे पक्का काटे जाओगे। कैंसर, दिल फेल, किडनी फेल ये सब क्या है? मृत्यु के गड़ासे हैं। मार रहे पूरे जगत को मार रहे और हम फूंक भी रहे हैं दूसरे के शरीरों को। लेकिन यह ज्ञान नहीं कि यह मेरी भी दशा होगी। मेरे शरीर की भी यही दशा होगी। आज से पाप नहीं करूंगा। आज से भगवान का भजन करूंगा। अच्छे कर्म करूंगा। दूसरों को सुख पहुंचाऊंगा। यह बात कहां आ रही दिमाग में? फिर प्लानिंग बन रही है। अब ऐसा करना, ऐसा करना, ऐसा और प्लानिंग करते-करते उनकी प्लानिंग हो गई।
वो चले गए। यह आती है भावना कि अच्छे कर्म करूंगा, सब करूंगा। लेकिन फिर भी बीच-बीच में ना भावनाएं दुनिया में इधर-उधर हो जाती है। इधर-उधर इसलिए हो जाती है कि नाम नहीं चल रहा है। नाम जब करते हो करते नहीं निरंतर जहां अंतर मिलेगा उठा के पटक देगा। यह शैतान है। मन एक शैतान है। इसको निरंतर लगाए रखो। समय मत दो। अगर समय दिया तो ये पटक देगा। ओवरथिंकिंग इधरउधर भूत भविष्य का चिंतन भोगों का चिंतन ये पटक देगा। हमें टाइम ही नहीं देना। अनन्य चिंतनो माम ये जना परपासते।
भगवान कह रहे हैं जो जन मेरा अनन्य चिंतन करता है। भगवान कहते हैं उसका योगक्षम वाहन मैं करता हूं। क्या चिंता करनी है? भगवान की शरण में होकर नाम जप कर रहे हैं। पूर्व के आए हुए दुख सुख को सह रहे हैं। और नाम जप करते हुए शरीर छोड़ते हैं। हमारा आवागमन से मुक्ति हो गई। हम दुखों से निपट गए। तो नाम जप निरंतर अंतर ना पड़ने पावे। मन को समय ना मिलने पावे। इतना नाम जप हम करें। तब हमारा मनुष्य जीवन सार्थक होगा। महाराज जी जो मृत्यु वाला प्रसंग चल रहा था। तो महाराज जी इस दशा में हम कैसे फिर अपने आप को संभाल पाएंगे?
नाम जप केवल नाम जप। केवल नाम जप आप देखो तो हम भगवान के नाम के बल से हैं। उसी की गर्जना की हम तुम्हें बता रहे हैं। भगवान के नाम के बल से हैं। आप लोग क्या है? अपना बल रखते हैं। भगवान का बल नहीं है। भगवान का चिंतन का बल नहीं है। अपनी मानसिकता का बल है। अपनी कमाई का बल है। हम कितना कर सकते हैं? हम एक बहुत सीमित शक्ति वाले हैं। हमको असीम शक्ति से जुड़ना होगा। तब हमारी कामनाएं पूर्ण होंगी। तब हमारी बात बनेगी। असीम शक्ति से जुड़ने के लिए पाप आचरण छोड़ना होगा।
वह छोड़ नहीं पा रहे हैं। इसीलिए बार-बार सुन के भी हम समझ के भी नहीं समझ पा रहे हैं और हम फिर गिर जाते हैं। तो हां इसको हमको संभालना होगा। पापा आचरण बंद करके नाम जप करो सब ठीक हो जाएगा। पक्का समझो। अपनी दिनचर्या अपना जो कार्य है उस पर हम लगे हैं। हम यह बहाना नहीं मारते। अगर हम यह कह दें कि हम बीमार हैं सब लोग जानते हैं अब हम नहीं आ पाएंगे तो इनका बस नहीं कि हमें बुला सके क्यों भाई बीमार हैं हम परेशान है लेकिन नहीं हम इनके आगे तैयार होने की कोशिश करते हैं कि अगर यह आधा घंटा बाद हमसे उठे हम इनसे पहले उठे हम अगर आगे अग्रिम है तो हम अग्रिम हर सेवा अग्रिम करें तो अपने लोग निराश हो जाते हैं हताश हो जाते हैं उदास हो जाते हैं नहीं नाम बल नहीं है इसलिए हम हताश निराश उदास हो जाते हैं नाम बल हो तो रौंदते चले जाओगे आप हर
परिस्थिति को रौंद दोगे आप देखो तो नाम जप करके देखो तो खूब अधिक से अधिक नाम जप करो फिर आप देखो आपके अंदर कैसा उत्साह आता है कैसा आनंद आता है कैसे विचार आते हैं देखो आप सब ठीक हो लेकिन आपके विचार ठीक नहीं तो आप जलोगे आपके पास खाने पीने पहनने वड़ने की कोई कमी नहीं लेकिन आगामी इतनी बड़ी कामना हो गई है कि आप उस पे जलोगे आपका सब ठीक है लेकिन नेगेटिव विचार है तो आप जलोगे यही चीजें तो अपने अंदर खोजो नेगेटिव विचार अधिक से अधिक बड़ी कामना हम जितने पे हैं उतने में संतोष नहीं बड़ी कामना वो हमें जला रही है फालतू के विचार जला रहे हैं।
फालतू के राग द्वेष के विचार जला रहे हैं। इन्हीं को तो नष्ट करने के लिए अध्यात्म है। इन्हीं विचारों को हम शुद्ध कर लिया। पॉजिटिव विचार कर लिए और संतोष कर लिया। चार रोटी हमारा काम चल जाएगा। देने वाले को जब इच्छा होगी तो आठ कर देगा। हम क्यों चाहे? चार दिया है। चार में हम संतोष करते हैं। अभी आनंद आ जाएगा। लेकिन हमारे पास आठ हैं पर हमें 16 चाहिए। अब आठ में हम संतोष ना करके आठ का स्वाद ना लेके 16 की चिंता में जल रहे तो अब इसका क्या होगा? ओवरथिंकिंग का क्या है?
और सब ओवरथिंकिंग में है। आप देख लो। सब इसी विचार में है। जितनी परिस्थिति उसमें आनंदित नहीं है वो बड़ी परिस्थिति चाहिए। अब वो बड़ी परिस्थिति प्राप्त होने के लिए बड़ा तप चाहिए, भजन चाहिए, सेवन चाहिए। आज वो पाप कर रहा है। लेकिन कल उसने पुण्य किया था। इसीलिए पाप करते हुए आज सुखी दिखाई दे रहा है। लेकिन जब इसके पाप का फल आएगा तो मिटियामेट हो जाएगा। आज आप धर्म से चल रहे हो। लेकिन आज दुखी हो क्योंकि आपका पाप कर्म का परिणाम चल रहा है। जब आपका ये धर्म का फल आएगा तो आप सुखी हो जाओगे।
ये बातें समझना चाहिए। मोहित अहिलवालिया जी राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। पर जी जब इंसान का जन्म होता है उसी समय तय हो जाता है कि कब यह व्यक्ति अच्छे कर्म करेगा कब बुरे नहीं नहीं नहीं नहीं गलत गलत गलत गलत तुम्हारा गलत चिंतन है मनुष्य जब जन्म लेता है उसके पहले दो कर्मों से उसके शरीर की रचना होती है। पाप कर्म और पुण्य कर्म से कई बार एकांतिक में बताया है केवल पाप कर्म से यातना देह मिलता है जो नरक में मिलता है नरक लोक में केवल पुण्य कर्म से देव शरीर मिलता है जो स्वर्ग लोक में है।
पाप और पुण्य दोनों को मिश्रित करके मनुष्य लोक में जन्म मिलता है। उसका परिणाम होता है समय पर सुख मिलना या दुख मिलना। समय-समय पर सुखदख अनचाहे ढंग से वह अपने आप आएगा। अब पाप कर्म करना और पुण्य कर्म करना इसकी छूट है तुम्हारे ऊपर। अब तुम प्रारब्ध से प्रेरित होकर पाप कर्म नहीं करोगे। वासना से प्रेरित होकर पाप कर्म करोगे। अब चाहे उपासना कर लो, चाहे वासना से प्रेरित होकर पाप कर्म कर लो। यह तुम्हारे को छूट दी गई है। लेकिन इस शरीर की रचना दो कर्मों से हुई है।
उसका भोग पूरे जीवन भोगना पड़ेगा। जैसे हम उपासना कर रहे हैं लेकिन हमारा कोई कर्म बिगड़ा रहा तो दोनों किडनी फैले। तो अब यह शरीर का कर्म है। पूर्व जन्म के शरीर में जो हमने पाप कर्म किए उससे इस शरीर का निर्माण हुआ और इस शरीर के माता के गर्भ से ही किडनी में दोष था। वो जो पोलसिस्ट किडनी कहते हैं वो वैसे तो समझ पा रहे हैं आप ना हमें कर्म करने के लिए स्वतंत्रता है। हम पाप कर्म कर सकते हैं या पुण्य कर्म कर सकते हैं। वो प्रारब्ध से नहीं प्रेरित है। वो पहले से निश्चय नहीं है।
पहले से निश्चय सुख और दुख। पाप का फल दुख और पुण्य का फल सुख। आप समझ रहे हैं? नहीं तो जैसे पाप का फल दुख है तो वर्तमान में पाप कर रहा है लेकिन वह सुखी है क्योंकि उसके पूर्व पुण्य का फल उसको मिल रहा है। वर्तमान में कोई पुण्यत्मा धर्मात्मा है लेकिन वो दुख भोग रहा है क्योंकि उसके पूर्व के पाप का फल उसे भोगने को मिल रहा है। समझ पा रहे हैं आप? कुमार जी इनका था कि नाम जब से भाग्य में लिखे बुरे कर्म टल सकते हैं। हां बिल्कुल टल सकते हैं। अगर हम पर उसका हिसाब है अगर 1 किलो हमारा पाप कर्म है उदाहरण में बता रहे हैं और 25 ग्राम हमारा नाम जप है तो क्या होगा कुछ नहीं हो पाएगा जब एक किलो के ऊपर नाम जप पहुंचे तब एक किलो को रद्द करेगा तो ऐसे अनंत जन्मों के हमारे पाप है तो हमें डट के नाम जप करना चाहिए जितना हम नाम जप करेंगे उतने हमारे पाप क्षीण होते जाएंगे और हमारे अंदर प्रसन्नता आनंद सुख ऐसी वृद्धि होती जाएगी समझ पा रहे हैं आप अखिलेश मिश्रा जी राधा वल्लभ श्री हरिव श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी मन श्यामा श्याम के गौर श्याम चरणों में आश्रय लेकर हर समय डूबा रहे लेकिन जो संकल्प विकल्प स्फुरित होते रहते हैं मन को बार-बार संसार की ओर ले जाते हैं ऐसे में भजन को और कैसे बढ़ाएं और शरणागति कैसे पुष्ट करें अपना क्यों मान रहे हो अपनापन हटा दो इनका मन चंचल है आपको कोई परेशानी कोई परेशानी नहीं।
तो जब आपने तन, मन, प्राण, बुद्धि, अहंकार यही तो शरणागति में समर्पण किए जाते हैं। हमने दे दिया भगवान को। इनका अपना मानने से ही मलिनता बनी हुई है। अपना मानने से ही अपने को कष्ट है। पूर्ण बेपरवाह हो जाओ। ऐ मन तुम्हें जहां जाना है जाओ। राधा राधा राधा तुम्हें जो करना है करो। अब हमने भगवान के हवाले तुम्हें कर दिया। जब हम पूरा मकान दे देते हैं तो सब कुछ कूड़ा, कर्कट, खिड़की, छिपकली, जाला सब उसके नाम हो जाता है जिसको दे देते हैं। अब उसको क्या सफाई करनी है, क्या अनुकूलता में वो देखें।
उसको अपने मकान में अनुकूलता क्या करनी है? अब हमने अपना सर्वस्व भगवान को अर्पित कर दिया। अर्पण करने के बाद हमारा एक ही कर्तव्य है मास्मत युद्ध चटी मिली वो ड्यूटी करना और नाम जप करना मन लग रहा है बढ़िया है नहीं लग रहा बहुत बढ़िया है शांत है अच्छा है नहीं शांत है तो उस समय में ध्यान देना है कि मैंने मन को प्रभु को दे दिया है अगर ये अशांत है तो प्रभु जाने प्रभु सर्व सामर्थ्यशाली है वह जब चाहेंगे तब शांत कर देंगे। मेरा मन अब नहीं है। यह मन प्रभु को दे दिया।
मेरी इंद्रियां अब नहीं है। यह प्रभु को दे दिया। मेरा अहंकार प्रभु को समर्पित है। निर्भय निश्चिंत निशोक और विपरीत भावना का त्याग और परीक्षा ना करना। यह लक्षण शरणागति के होते हैं। मेरे में तो सद्गुण नहीं है जो संतों में होने चाहिए। तो मैं शरणागत कैसा? अब मैं प्रभु का हूं। अगर वो मुझे दुर्गुणी बनाकर रखना चाहते हैं तो मैं सद्गुणी बनना नहीं चाहता। राजी रहो आप। देखो करके एकदम मस्ती आ जाएगी। जिसमें आप राजी हो उसमें मैं राजी हूं। मुझे ना नर्क चाहिए ना स्वर्ग चाहिए।
आपकी प्रसन्नता चाहिए। जे विधि प्रभु प्रसन्न मन होई करुणा सागर कीजे सोई। जिस तरह से आपको सुख मिले। मुझे बुरे आचरणों में संलग्न देखकर आपको सुख मिलता है। सदैव बनाए रखो। अगर आपको नहीं तो आप सर्व सामर्थ्यशाली हो। ये जितने बुरे आचरण आए हैं सब आपकी माया से प्रेरित होकर आए हैं। और जितने सद्गुण आते हैं वो आपकी कृपा से आते हैं। मैं आपके सहारे हूं। आपके भरोसे हूं। मेरे बनाए ना बनेगी। मैं चाहे जितना उपाय करूं यह मेरे बस में नहीं होने वाले। अपने में असमर्थता और प्रभु की कृपा का दृढ़ भरोसा और अपने प्रयत्न में कमी नहीं।
तीन बातें। पहली बात मैं असमर्थ हूं। दूसरी बात जितना मेरे में सामर्थ्य है वह पूरा प्रयास कर रहा हूं। तीसरी बात कृपा का दृढ़ भरोसा मेरा कल्याण मेरा मंगल मुझे भगवत प्राप्ति इसी जन्म में होगी क्योंकि मैं प्रभु की शरण में हूं और मैं मनमानी शरण में नहीं हूं। गुरु कृपा से शरण में हूं। उसके साक्षी हैं गुरुदेव जिन्होंने मुझे प्रभु की शरण में किया। तो अब शरणागत का पूर्ण भार प्रभु के ऊपर होता है। वो स्वयं सब ठीक कर देते हैं। मतित सर्व दुर्गाण मत प्रसादा तरिशति जिसने मेरे को चित्त दे दिया मैं सारे उसके दुर्गुणों का नाश कर देता हूं।
शांत हो जाओ। यह अनंत जन्मों से भटका हुआ मन अगर एक मिनट भी लग रहा है प्रभु में तो बड़ी कृपा है। अनंत जन्मों का विषयभ्यासी मन एक मिनट भी प्रभु में लग रहा है तो बड़ी कृपा हमारे ऊपर है। अब एक मिनट नहीं अब तो काफी समय लग जाता है। तो धीरे-धीरे यह लगता है और ना लगे तो यह प्रभु का है। मेरा नहीं है। सारे कर्म प्रभु को क्योंकि शरीर समर्पित सारे संकल्प विकल्प क्योंकि मन समर्पित सारा निश्चय समर्पित क्योंकि बुद्धि समर्पित और मैं स्वयं समर्पित अब मुझे क्या चिंता निश्चिंत हो जाओ बार-बार अगर बीज को गाड़ करके देखोगे उखाड़ के कि जगा कि नहीं जगा तो बीज बेकार हो जाएगा।
एक बार हमने विश्वास करके अपने जीवन को भगवान के हवाले कर दिया। जब कोई परेशानी हो तो परेशानी के समय हमें जैसे हम देख रहे हैं मन बहुत परेशान कर रहा है। तो छोटा बच्चा जिसे कोई आपत्ति आती है तो निवारण तो कर नहीं सकता। मच्छर काट रहा है या कुछ भी है वह रो देता है। बस हम रो दे। प्रभु देख लो आपको समर्पित करने के बाद भी मन की यह हालत है। प्रभु अब आप देख लो एक कृपा को आएगी संभाल के चली जाएगी जन्म जन्म का बिगड़ा मन बहुत करुणा सिंधु भगवान है उन्हीं से बनेगा गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे हैं हो हारो कर जतन विविध विधि अतिशय प्रबल अजय हर उपाय करके हमने देख लिया है मन बहुत प्रबल है तुलसीदास बस होए तब जब प्रभु प्रेरक बर गए इस मन को पावर देने वाले पहले आप हो इंद्रणा मनसनी आप रोक दो मेरे बस की बात नहीं मैं आपकी शरण में हूं प्रधान साधन यह है और सहयोगी साधन है चाहे मन लगे या ना लगे नाम जप
नहीं छूटना चाहिए महा मनुष्यों भगवान से एक ही बात मांगनी चाहिए धन दे या ना देव सुख दे ना दे हमारी इच्छा पूर्ति करो ना करो एक बात कह दूं आपको भूलूं नहीं बिसरिहो ना बिसारी हो यही दान मोहे देव श्री हरिवंश के लाडले मोहे अपनी कर लो मैं आपकी स्मृति में डूबा रहूं आपके भजन में डूबा रहूं इतनी सामर्थ्य दे दो अब मन भजन में डूब रहा है तो शरीर के दुख सुख की परवाह क्या और यहां की संपत्ति का कोई महत्व नहीं है चाहे अरबों जमा कर लो मरोगे तो 25 पैसे साथ नहीं जाने वाले तो क्या महा जो है उसी में संतोष करो और नाम जप करते हुए जीवन व्यतीत करो और हर क्षण सोचते रहो कि मैं प्रभु की शरण में हूं।
शरणागत का पूरा भार प्रभु के ऊपर होता है। अपनी चिंता करना मेरा कलंक है शरणागति में। भगवत चिंतन करना हमारा कर्तव्य है। अब हमारी चिंता भगवान करेंगे। क्योंकि मैंने भगवान को अपने आप को समर्पित कर दिया। इसके साक्षी गुरुदेव हैं। गुरुदेव ने मुझे शरणागत किया। इसके जैसे ब्याह होता है ना तो पंडित पानी ग्रहण करवाता है। ऐसे आपका कर कमल श्री जी के कर कमल में श्री जी का आपके यह गुरुदेव ने कराया है। हाथ पकड़ाया है। मंत्र देने का मतलब क्या है? उनकी शरण में कर देना।
जब गुरुदेव ने कर दिया तो बेपरवाह हो गए। उसके साक्षी गुरुदेव हैं। मैं आपकी शरण में हूं। आपकी सारी जिम्मेवारी है जो हमसे हमको सामर्थ्य दिए उतना हम भजन कर रहे उतना हम रोक रहे हैं जो नहीं रुक रहा था ऐसे अभी आनंद आने लगेगा निर्भय हो जाओ निश्चिंत हो जाओ अंदर की वृत्तियां हमारी खराब है हमारे कोई भावना नहीं हमारे कोई आचरण शुद्ध नहीं तो फिर मैं प्रभु का हूं मैंने प्रभु को समर्पित कर दिया है उनकी माया के प्रभाव से मेरे भाव शुद्ध नहीं मेरे आचरण शुद्ध नहीं अभी वो देखें माया को प्रबल करते हैं कि भक्ति को प्रबल करते हैं।
यह बात शरणागति में अंदर बैठा लेनी सब ठीक हो जाएगा। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि को अपना मानने से मलिनता होती है। और प्रभु का मानने से निर्मल हो जाते हैं। सीधी बात है। इनको प्रभु का मानो। अपना मानना बंद करो। जहां ये भागे, जहां परेशान करे वहीं सोचो। हमने तो प्रियालाल को दे दिया इनको। अब वो जब चाहेंगे तब उठा लेंगे। अब उन्होंने स्वीकार कर लिया। अब गंदा है तो उनका अच्छा है तो उनका तो भगवत प्राप्ति पक्की उसमें कोई संशय नहीं होगा क्योंकि आपने प्रियाल को समर्पित कर दिया।
समझ पा रहे हैं आप? जी दिव्यांशु महेंद्र रत्ता जी श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी लगभग 9 महीने से आपके साथ YouTube के माध्यम से जुड़ा हुआ हूं। आपके बताए गए मार्ग पर चलने का निरंतर अभ्यास भी कर रहा हूं। नाम जप भी कर रहा हूं। सब परिवर्तन और अनुभव कर रहा हूं कि नाम जापक जैसा होना चाहिए। अभी हाल में ही महाराज जी आपके मुख से 13 करोड़ नाम जप की महिमा सुनी। इस जीवन में कम से कम 13 करोड़ नाम जप का लक्ष्य बनाया। परंतु इस संख्या तक पहुंचने तो काफी साल लग जाएंगे।
तो महाराज जी आपका प्रश्न है कि जीवन जित कितना बाकी है इसका तो पता नहीं है। बट जैसे आपने बताया था कि नाम भगवान को ट्रांसफर कर दो और किसी को भी उसका फल दे सकते हैं। उसी प्रकार स्वयं निरंतर नाम जप करने का अभ्यास के साथ-साथ क्या किसी ब्राह्मण पंडित को भी साथ में लगा लें? ताकि वो केस का करते रहो किसका है ले ले ले आखरी बिल्कुल निर्णयात्मक बात है कि अभी हमारी शाम तक मृत्यु होनी है और हम प्रयास है एकको करोड़ नहीं हुई राधा राधा राधा राधा राधा तो हम मर जाते हैं जो 13 करोड़ का फल है ना वो इतने में मिल जाएगा बस बात समझ रहे हो ना?
हमें लक्ष्य बनाना है। पूर्ति भगवान के हाथ है। मान लो हम कह रहे हैं कि हम 13 करोड़ नाम जप करेंगे और 13 सेकंड का हमें भरोसा नहीं है कि हम जिएंगे कि नहीं। तो बात समझनी है। हमारे लोगों का जीवन बड़ा संशय पूर्ण है। इसका नाम मृत्यु लोक है। कभी भी हम मर सकते हैं। पता नहीं कल मिलेगा कि नहीं मिलेगा। कल आएगा कि नहीं आएगा। हम आज ही ढंग जाए तो क्या फायदा कल का वादा किए तो हम अभी करें काल करे सो आज कर आज करे सो अब पल में प्रलय होएगी बहुर करोगे कब हमारा कर्तव्य है कि हम वर्तमान के समय को भगवान में लगाएं अभी अगर अभी हम राधा राधा बोल रहे हैं तो हर समय हमारा वर्तमान ही तो होगा हम वर्तमान के समय को प्रभु के चिंतन में लगाते हैं और हमारा शरीर छूट जाता है तो हमें भगवत प्राप्ति होगी।
जो 13 करोड़ में होगी वह 13 बार में भी हो सकती है। तो हम 13 बार वाला विश्वास रखें 13 करोड़ वाला तो हम भरोसा क्या आज संकल्प किया कल ना रहे तो 13 करोड़ क्या मतलब और हमको अपने मन को रमाना है ना कि पंडित जी के मन को समझे हमारा मन प्रभु में रम जाए वो चाहे 13 बार में रमे और चाहे 13 हजार में रमे चाहे 13 लाख में रमे या 11 करोड़ में रमे। यह मेरी पर्सनल बात है। वहां संख्या तो वर्णन की गई कि इतना इतना करो तो ऐसा ऐसा हो जाएगा। लेकिन एक नाम में मोक्ष हो जाएगा।
अजामिल ने अंतिम समय अपने पुत्र को पुकारा। उसका नाम था नारायण। नारायण। और प्राण छूटने का समय आ गया। भगवान के पार्षद आ गए। यमदूतों की पास काट दी और बड़ा शास्त्रार्थ हुआ और भगवान के पार्षद परमधाम ले गए उनको एक नाम ने काम कर दिया कि नहीं कर दिया तो अब वो अंतिम समय कब है मुझे पता नहीं इसलिए मैं हर समय नाम जप करूं वो 13 करोड़ तक पहुंचे वो 13000 तक पहुंचे या 13 तक पहुंचे आपको भगवत प्राप्ति निश्चित होगी बात समझ रहे हैं ना हां पंडित से कराने की जरूरत नहीं है देवेंद्र जी गंगानगर से राधेधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी लोग सत्य मार्ग पर चलने व बोलने पर समाज व रिश्तेदार सत्य का साथ ना देकर गलत का साथ देते हैं।
हमें सत्य पर चलने वालों को तुच्छ समझकर समाज से अलग व विरोध करते हैं। ऐसा क्यों महसूस करवाते हैं कि सत्य बोलना गलत है। गलत को ही प्राथमिकता देते हैं। महाराज जी ब्रह्मा जी के चार पुत्र हैं। सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलयुग। सतयुग से कहा बेटा हमने नरक का निर्माण किया है। ध्यान देना। तो सतयुग ने कहा हमारे राज्य में कोई नर्क नहीं जाएगा। त्रेता से कहा हम बड़े भैया का अनुसरण करेंगे। सतयुग का द्वापर से कहा उन्होंने कहा विचार करेंगे कि आपकी आज्ञा का पालन करें।
कलयुग से कहा तो कलयुग ने कहा जैसे बड़े भैया ने कहा हमारे राज्य में कोई नरक नहीं जाएगा। ऐसे वादा करते हैं। हमारे राज्य में कोई स्वर्ग नहीं जाएगा। सीधे नरक हाउसफुल करेंगे। इसीलिए कोई साथ नहीं देता कलयुग में। बात समझ रहे हो ना? अगर आप सत्य से चलोगे तो आपको विरोध करने वाले मिलेंगे। शाबास कहने वाले नहीं मिलेंगे। आपको नीचे गिराने वाले मिलेंगे। लेकिन आपको ये नहीं कहेंगे वाह धन्य है यार। तुम हमारे कुल में पैदा हुए सत्य पर चलने धन्य है। तुम हमारे मित्र हो।
सत्य पर चल रहे हो। हमारे गांव के हो। सत्य पर चल रहे हो। बहुत सुंदर। अगर तुम किसी की जरूरत पर ₹500 दे दोगे तो तुम्हें बेवकूफ समझेगा। भोला है। आप जानबूझकर के उसका हित कर रहे हो। वह आपकी बेेजज्जती करेगा। यह कलयुग का स्वभाव है। यह कलयुग का प्रभाव है। कोई किसी का यहां हित नहीं करता। आप अपने को सत्य मार्ग में चलाइए। सिर्फ भगवान आपका साथ देंगे। इंसान आपका साथ नहीं दे सकता। क्योंकि इंसान कलयुग से प्रभावित है। और जो धर्म से चलने वाले हैं वो आपको बहुत प्यार करेंगे।
देखो आप लोग कहीं ना कहीं धर्म का आश्रय ले तो आप हमें प्यार कर रहे हैं कि नहीं? हां तो ऐसा नहीं है कि कोई प्यार नहीं करेगा। नहीं कोई करेगा वो भगवान करेंगे और जब भगवान की कृपा आपके ऊपर होगी तो फिर सब प्यार करेंगे। जा पर कृपा राम की होई ता पर कृपा करे सब कोई। हां। तो भगवान से प्यार चाहो। कोई इंसान तुम्हारा सपोर्ट करे। मुझे लगता है ऐसा बड़ा मुश्किल है। बड़ा मुश्किल है बच्चा। इसलिए धर्म से चलो। किसी इंसान के सपोर्ट या उससे हम धर्म अपना नहीं छोड़ेंगे। फिर माता-पिता को तकलीफ होती है गुरुदेव तो बुरा करो ना।
हमने सत्य के मार्ग पे चल के सही किया। जी तो माता-पिता को वो गलत लोग होते हैं। कुछ गांव में वो कहते हैं कि आपके लड़के ने देखो ऐसे किसी की नहीं। किसी की भी बात नहीं माननी। सत्य के लिए सबका त्याग करना है। अगर माता-पिता भी सत्य से विचलित हैं तो जाके प्रिय न राम वैदेही तज ताह कोट बैरीस सम जज परम सत्य का मार्ग अकेला होता है। सत्य के मार्ग पे प्रह्लाद जी चले तो हिरण्यकश्यप पिता है। विरोधी हो गया ना। सत्य के मार्ग पर चले तो कैकई जी विरोधी हो गए ना। राम जी को 14 वर्ष का वनवास और भगवान के सत्य के मार्ग पर चले तो बलि जी के गुरु ही विरोधी हो गए।
बलि जी जब तीन पग पृथ्वी दान करना चाहे तो शुक्राचार्य जी मना कर सत्य के मार्ग पर चलने में गोपियों के पति विरोधी हो गए। तजो पिता प्रहलाद विभीषण बंधु भरत महतारी गुरु बल तजो कंत ब्रज बन तन भेद मंगलकारी सब मंगल करने वाले बन गए इसलिए ऐसा नहीं फिर गुरुदेव मन में शंसा होती है कि हम माता-पिता को कैसे खुश रखते नहीं कोई खुश हो या ना हो सत्य अगर सही ढंग से चल रहे हो तो पूरे विश्व को खुश करने की सामर्थ आ जाएगी थोड़ी देर के लिए वह संतुष्ट होंगे उनका भी कल्याण हो जाएगा असत्य पे चलने से उनका का भी पतन हो जाएगा और सत्य से चलने से उनका भी मंगल।
आज वह खुश नहीं है लेकिन उनका परिणाम बहुत अच्छा मिलेगा क्योंकि आप उनकी संतान हो। यदि नाम जप करते हो, धर्म से चलते हो, कोई पाप कर्म नहीं करते तो तुम अपने माता-पिता का भी कल्याण कर दोगे। वर्तमान में वो गाली देंगे लेकिन अंत में उनका कल्याण होगा। और अगर अभी गलत चलोगे तो वर्तमान में भले रुपया लेके उनको दे जाके लेकिन वो भी नरक जाएंगे और आप भी नरक जाओगे। तो हमें चाहिए सत्य पे चलना कुछ भी हो जाए। सत्य पर चलने वाले किसी की परवाह नहीं करते। किसी की भी किसी की भी दो साल से अकेले ही चल रहे हैं।
नहीं भगवान सबके साथ हैं। हम तो बचपन से अकेले चल रहे हैं। विचार करो 11 वर्ष की अवस्था से भागे थे इस सत्य के मार्ग में। तो भगवान निर्वाह करके अब 556 की जो भी अवस्था है निर्वाह कर दिया। बहुत बड़ी जिंदगी निर्वाह कर दी। भगवान निर्वाह करते
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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