नामजप का प्रयास भी करती हूँ, पर वाहेगुरु जी के लिए तड़प नहीं आ रही, क्या करूं?
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
हरजीत कौर जी यस वाहेगुरु जी का खालसा वाहेगुरु जी की फलते महाराज जी जिन प्रेम किया तिन ही प्रभु पाए महाराज जी वाहेगुरु जी ने कृपा करके YouTube के जरिए आपसे मिलाया वाहेगुरु जी की प्रीत से खींचे खींचे हम आपसे मिलने आ गए आप जी उनसे मिला दो नाम जप समय जितना होता है उतना कर सकते हैं कम हो रहे हैं बट पूरी तरह से नहीं मतलब नाम जप कह रहे हैं कि नाम जप जितना कम हो रहा है बट जैसा चाहिए वैसा नहीं आप जी द्वारा बताए हुए बिंदु हिंदु ऊपर ध्यान लगाने का अभ्यास भी शुरू किया है।
कह रहे प्रयासरत है अपनी तरफ से बट जो एक और तड़प चाहिए प्रीति चाहिए वो कैसे मिलेगी महाराज जी ऐसे अल्पाहार करो थोड़ा भोजन करो मौन का आश्रय लो पांच घंटे सो पांच घंटे से ज्यादा नींद नहीं पवित्र आहार अल्पाहार लो अल्पाहार का मतलब भूखे भी नहीं रहना और छकना भी नहीं है और हर समय मौन रहने से हमें भजन का ज्यादा अभ्यास होगा अब जैसे दिमाग है ना यह उड़ रहा है। हम अपनी बात बता ना हमारी खोपड़ी जैसे साए मचा है एकदम दिमाग में और जैसे बचपन से इस मार्ग में रहे तो सा जैसे मतलब बस चुप होने की जरूरत है।
बस चल रहा है। अब जैसे बात कर रहे हैं तुम्हारे दिमाग में छाया हुआ है। क्योंकि अब जैसे यहां घंटे दो घंटे हमारे व्यतीत हुए इसके बाद बंद ना किसी से मिलना ना नीचे उतरना ना बाहर अगर हम किसी चीज का अपने में बसाना चाहते हैं तो उसके लिए हमको समय देना एक वैज्ञानिक जब किसी बात की शोध करता है तो बहुत एकाग्र एकांत शांत उसी में लगन लगाएगा हम तो परमात्मा की शोध कर रहे हैं हम तो वाहेगुरु की शोध कर रहे उनको प्राप्त करना चाहते हैं तो हमारी लगन ना हमारे देह में लग पावे ना देह संबंधियों में लग पावे ना भोगों में लग पावे केवल वाह गुरु में लगे तो अभी तन्मयता हो जाए तन्मया स्थिति जब तक नहीं आएगी तब तक बात नहीं बनती तो हमें हर समय अपने गुरुदेव में अपने इष्ट में लगे रहना है और जबान चलाते रहना है जैसे अब हम उपांशु जप कर रहे हैं मानसिक नहीं हमारी जबान चल और हम मंत्र जप रहे हैं।
अब हम मानसिक जप रहे हैं। चल रहा है। आप भी जप के देखो तो कोई आश्चर्य की बात थोड़ी है। दो चार बार तो आप भी मानसिक जप सकते हो। फिर मन भाग जाएगा। देखो चल रहा है। मानसिक में कोई हरकत नहीं होती। चल रहा उपांश में हरकत होती जबान में ऐसा लगेगा कुछ बुदबुदा रहे हैं और वाचिक में तो ऊपर है ही है राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा तो ऐसे हम हर समय उपांश में रहे जब तक हमारी मानसिक स्थिति अचंचल ना हो जाए। अचंचल का मतलब होता है स्थिर। जैसे विषय पुरुष का मन भगवान पे लगाया जाए तो भागकर विषय में चला जाएगा।
ऐसे भक्त का मन विषय में लगाया जाए तो भागकर भगवान में आ जाएगा। वो विषय में नहीं लगेगा क्योंकि उसको स्वाद मिल गया है नाम का। उसको वाह गुरु की कृपा मिल गई है। तो हमको चाहिए कम भोजन, कम सुनना, कम बोलना, कम सोना। अगर इन नियमों को हम धारण करें और एकांत सेवन अधिक समय करें और खूब नाम जब उपांश से करें तो हमारा मानसिक में प्रयोग जहां मन लग गया फिर वो हटाए नहीं हटता है मन निरंतर प्रभु में लग जाए फिर वो हटाए नहीं हटता है ये जो हम आपको बताते कि हम ऐसेसे ये बाब बुद्धि नहीं बताते अहंकार के लिए नहीं लेकिन अभ्यास यदि अभ्यास किया जाए तो बहुत सरल हो जाएगा हम आपसे बात कर रहे हैं लेकिन हमारे दिमाग में वही बात नाच रही जैसे आप हमारी बात सुन रहे हो अंदर कुछ और चल रहा है चल रहा है ना जैसे डबल कह दे कि आप हमसे बात कर रहे हो तो भजन कैसे कर रहे हो तो जैसे आप हमारी बात सुन रहे हो श्रवण इंद्री से सुन रहे हो लेकिन आपका अंदर का सिस्टम कुछ और चल रहा है आप हमारी बात पर पूरे नहीं हो बार-बार कुछ और चल रहा है वही वही उसी जगह जब नाम पहुंच जाता है तब बार-बार हम आपसे बात कर रहे हैं लेकिन वो खिंचाव उसी तरफ चल रहा है तो हमारा निरंतर भजन होगा जब हमारा ऐसा चिंतन होगा तो हमारा निरंतर भजन होगा।
उसे कहते हैं परावाणी के द्वारा भजन। वैखरी मध्यमा पश्यती और परावाणी। परावाणी में वह परिपक्व साधक हो जाता है। वह सिद्ध साधक हो जाता है। जिसकी ऐसी स्थिति होती है। तो हमको एकांत सेवन करना है। हमको पवित्र और थोड़ा भोजन करना है। अपवित्र भोजन भी भजन में बाधक है। तो यह ध्यान रखें कि हमारा भोजन बहुत पवित्र होना चाहिए और हमारा संग बहुत पवित्र होना चाहिए। और बस पांच घंटे से ज्यादा सैया में सोना नहीं चाहिए। उठ के बैठ जाए और नाम जप करने लगे। ऐसा अभ्यास करके देखो और मूल तो गुरु कृपा है।
वाहेगुरु जी की कृपा है। प्रयत्न अपना है। प्रयास अपना है और फल तो गुरु कृपा से ही प्राप्त होता है। महाराज जी जैसे घर में तमोगुणी लोग होते हैं तो उनके बीच में कैसे-जैसे घर में नॉनवेज पकता है। ये तो बहुत बड़ी समस्या है। उस नहीं ये तो बहुत बड़ी समस्या है। उस परिवार के भक्त की जिसके परिवार में ऐसा आहार विहार किया जाता हो और वो भक्ति करना चाहे ये तो बहुत बड़ी समस्या है। बड़ा दुर्भाग्य है कि हमको ऐसा प्रतिकूल वातावरण मिला। बड़ा दुर्भाव बड़ा सौभाग्य है जिनको अनुकूल वातावरण मिले।
लेकिन फिर भी स्वयं ना खाएं। स्वयं मान लो आप पत्नी किसी की होंगे। आप किसी की बेटी होंगे। किसी के घर में तो रह रहे होंगे। अगर उन लोगों का दबाव है तो आपको बनाना पड़ेगा। आपको उनको पवाना पड़ेगा। आपको उनके बर्तन मांझने पड़ेंगे। लेकिन आप मत खाइए। तो भगवान यह बात तो जान रहे हैं ना कि आप किस समस्या में हो। लेकिन आपका मन भगवान की तरफ है। इसी बात से भगवान नीचे जाएंगे। आप स्वयं पवित्र रहिए। स्वयं मत खाइए। लेकिन अगर ऐसा दबाव है कि आपको बना के देना पड़ेगा। तो आप मान लो किसी की पत्नी हो तो आपको बना के देना पड़ेगा।
बर्तन मांझने पड़ेंगे। लेकिन आप मत खाइए। आप भगवान से प्रार्थना कीजिए कि मेरा दुर्भाग्य कि मुझे ऐसा वातावरण मिला है। पर नाथ मैं आपका इस जीवन में भजन किए बिना व्यर्थ नहीं जाने देना चाहती जीवन इसलिए आपको प्राप्त करना चाहती हूं। अंदर ही अंदर प्रार्थना कीजिए आप मत खाइए। मुझे लगता है कि अगर परिवार के लोग थोड़ा भी सुलझे हो तो जो ना पाना चाहे उसे दबाव नहीं देना चाहिए। आपकी भाई रुचि है आप नहीं छोड़ पा रहे हैं। लेकिन जो छोड़ कर दिए हैं तो उनको सपोर्ट करना चाहिए।
उनको दबाव नहीं देना चाहिए।
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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