महापुरुषों के वचन हैं, ध्यान से सुनना।
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
बहुत ध्यान से सुनिए। यह बड़े महापुरुषों की बातें हैं। तेरे भाव, तेरी वृत्तियां, तेरे आचरण शुद्ध नहीं है। यही तो होता है। मेरा भाव शुद्ध नहीं। मेरी वृत्तियां शुद्ध नहीं। मेरे आचरण शुद्ध नहीं। सुन लो ध्यान से। शरणागति में तेरे भाव तेरी वृत्तियां तेरा आचरण शुद्ध नहीं है। तो क्या हुआ? तू इनकी चिंता मत कर। इनकी चिंता मैं करूंगा। इनकी चिंता मैं करूंगा कि मेरे इस भक्त का भाव शुद्ध नहीं। अभी इसे ठीक करना है। इसकी वृत्तियां ठीक नहीं। इसे ठीक करना है। मैं क्यों चिंता करूं?
मैं क्यों करूं? क्यों करा है? ऐसा क्यों करा है आपने? नहीं। हमारे आसपास कृपा का पहरा है। तुम हमें देख भी नहीं सकते। तुम हमें छू भी नहीं सकते। बात करने की तो बात जाने दो। अगर बात कर रहे हो हमसे हमें देख रहे हो हमें छू रहे हो तो वो छुआ है इसलिए छू रहे हो। वो बात कराना चाहते इसलिए बात कर रहे हो। वो दिखाना चाहते इसलिए देख सकते हो। नहीं तुम हमें देख भी नहीं सकते। हम प्रभु की वस्तु हैं। हम प्रभु की वस्तु है। दूसरे अध्याय के सातव श्लोक में गीता में अर्जुन ने भगवान की शरण होने की बात कही।
फिर आठव श्लोक में कहते हैं कि इस भूमंडल का धनधान से संपन्न निष्कंटक राज्य मिलने पर भी अथवा देवताओं का अधिपत्य मिलने पर भी इंद्रियों को सुखाने वाला मेरा शोक दूर नहीं हो सकता। मानो एक तरफ तो कह रहे हैं कि शिष्य साधि तम प्रपनम अब आप जो कहेंगे वही करेंगे और भगवान बोल नहीं पाए और आप कह रहे कि मुझे युद्ध नहीं करना ये क्या शरणागति है भगवान बोल भी नहीं पाए ठीक उसी के आगे के श्लोक में बोल दिया पहले में कहा शस्त साम तम प्रपन्नम अब चुप हो जाओ बोलने दो भगवान को लेकिन उन्होंने स्पष्ट कहा कि पृथ्वी का राज्य क्या देवताओं का राज भी मेरे शोक को नहीं सुखा सकता।
इसलिए कि मैं युद्ध नहीं करूंगा। तो भगवान जब बोले तो हंसते हुए बोले वाह शरणागत वाह मैं नहीं करूंगा। वाह शरणागत पहले कहते शिष्य साधि माम तम प्रपन्नम मैं शिष्य हूं और आपका शरणागत हूं। अब इसके बाद आपका ना कहना ये तो बिल्कुल कहीं भी किसी तरह उचित नहीं है। मैं आपका हूं। आप जो कहे जैसे कहे मुझे इससे मतलब नहीं है कि आप क्या कह रहे हैं। आप जो जैसे जो भावे जो प्यारो करे सोई मोह भावे ये बहुत बड़ी बात है। नाशवान पदार्थों के संबंध से किसी का शोक दूर हुआ है क्या?
हो सकता नहीं। होने की संभावना नहीं। परंतु मेरी शरण लेकर जो तू शोक कर रहा है यह बड़ी भारी गलती है। तू शोक क्यों कर रहा है? मेरी शरण है तो विश्वास कर आज से मैंने तेरा भार अपने सिर पर ले लिया। एक एक शब्द अमृत है। आज से विश्वास कर मैंने तेरा भार अपने सिर पर ले लिया। हमारी श्री जी हमारे लाल यद्यपि जो ब्रह्म रुद्र सुख नारद भीष्म मुखसा पुरुषस तस इतने महान हमारे लिए हमारे लाल जो हमारी प्रिया जो जब आपकी शरणागति पुष्ट हो गई तब बात होती है शरणागत होने के बाद बहुत ध्यान से सुनना इस लोक की चिंता या परलोक की चिंता सद्गति की चिंता या दुर्गति की चिंता बिल्कुल नहीं होनी चाहिए।
मेरा सद्गति होगी कि दुर्गति होगी। लोक बनेगा कि परलोक बनेगा? बिगड़ेगा कि बनेगा इससे कोई मतलब नहीं। शरणागत भक्त इस ठसक में रहता है। प्रभु मेरे और मैं प्रभु के। यह इतना भाव दृढ़ हो जाता है। इतनी स्वीकृति जोर की हो जाती है कि उसका चिंता, भय, शोक, शंका ये सब जड़ से नष्ट हो जाते हैं। मेरे दोषों का आधार कट जाता है। अहम, अहंकार जिसमें दोष रहते हैं, वह कट जाता है, मिट जाता है। जितने भी दोष आते हैं, भगवान की विमुखता पर आते हैं। भगवान के सन्मुख होने पर संसार और शरीर के आश्रित जितने संस्कार है सब मिट जाते हैं धीरेधी जो प्रभु के संबंध की दृढ़ता पर दृष्टि रखता है।
संबंध की दृष्टि इष्ट और गुरु के संबंध का कोई भी अंदर चिंतन नहीं है। मैं का चिंतन है। मैं कर रहा हूं, मैं कर रहा हूं। उसका फल ये होगा। मैं ऐसे हूं, मैं ऐसे बहुत गुण विषय है। जब गोपियों ने गले तक जल में खड़े होकर के साधना की और बाहर निकलकर देवी की बालूकामय मूर्ति बनाकर हे कात्यायनी हे महामा हे महायोगिनी आप हम पर प्रसन्न हो और मुझे नंद नंदन पति के रूप में प्राप्त हो। देहाभिमानी कभी नंद नंदन को अपने पति प्रीतम के रूप में प्राप्त नहीं कर सकता। प्रभु ने देखा ये तो तैयारी पूरी किए हैं मेरी प्राप्ति की और उनमें सब कुमारियां ही थी।
कुछ आराधना ऐसी भी की थी जिनके पति थे क्योंकि रास में जब जाने में रोका तो उसमें आता है कि पतियों ने रोका तो शरीर छोड़कर के रास में पहुंच गई। संबंध देखो हम तुम्हारी दासी हैं। तुम हमसे हंसी ठिटोली ऐसी मत करो। गोपियों ने संबंध यहां संबंध पर दृष्टि कहां है? मेरे गुरु जी मेरे इष्ट देव कितनी दृष्टि है? इस संबंध पर कितना जोर है आपका? आपको अपने कर्म पर विश्वास है या संबंध पर विश्वास है? यह बात ध्यान देनी है। कर्म पर विश्वास है। यह अपने क्रिया पर विश्वास या संबंध पर विश्वास?
अहो भाग्य आज पूरी दिनचर्या का फल तो मिल गया कि मुझे सेवा मिल गई। मुझे आज्ञा मिल गई। आज्ञा मिल गई। आयस लिए चले निजदा दासी। संबंध का दृढ़ होना। चिंता भय शोक परीक्षा विपरीत भावना चिंता भय शोक परीक्षा शंका विपरीत भावना ये छह चीजें नहीं रहती शरणागति में चिंता भय शोक शंका परीक्षा विपरीत भावना शरणागत इतना प्यारा हो जाता है कि जैसे जैसे आपको कहो कि पीड़ा देना चाहते तो यहां दे दो, यहां दे दो, यहां दे दो। दिल में मत देना। बहुत सुकुमार जगह है। जैसे होता है ना पीठ में मार लो, गाल पर मार लो लेकिन दिल पे चोट मत मारना।
बहुत सुकुमार जगह है। ऐसे शरण्य शरणागत को अपने दिल की तरह रखता है। ये ध्यान रखना। आज्ञा दे ही नहीं सकते। ऐसे क्योंकि वो ऐसे है पूर्ण ऐसे है। हम जो कहेंगे वह करेंगे तो हम वही करेंगे जिससे उसका मंगल होगा। उसका कल्याण होगा। उसको परम पद की प्राप्ति होगी। जो वो कर सकता है। ऐसा कह ही नहीं सकते कि जो उसकी क्षमता के बाहर हो। चिंता है अगर भय है अगर शोक है अगर शंका है परीक्षा विपरीत भावना अभी शरणागति नहीं प्रभु ने मुझे स्वीकार किया कि नहीं पता नहीं निश्चिंत होना जब भक्त अपनी मानी हुई वस्तुओं सहित एक एक शब्द समझना है जब भक्त अपनी मानी हुई वस्तुओं सहित अपने तन तन को अपने मन को समर्पित कर देता है तब उसमें लौकिक पारलौकिक किंचित मात्र भी चिंता नहीं रह जाती जीवन निर्वाह कैसे होगा मेरे तो आचरण ऐसे मेरा कल्याण कैसे होगा मेरे में तो कोई भाव दशा नहीं है मेरा कैसे क्या गति होगी
बिल्कुल चिंता नहीं ये जैसे घर में लोग रहते हैं उनको कोई चिंता है क्या ज्ञानी संसारी लोग कल्याण मोक्ष सब कुछ नहीं खाए पिए अम्मा बप्पा परिवार एकदम ऐसे प्रभु से बिल्कुल जस्ट ऐसे ही प्रभु से खाए पिए नाचे गाए कूदे हरि शरणम भगवान मस्त साधना ये वो वो करवा रहे हो नहीं पढ़े चिंता दीन दयाल को मोह मन सदा आनंद जाो सो प्रतिपालसी रामदास गोविंद चिंता दीन दयाल को मोह मन सदा आनंद जा सो प्रतिपालसी जिसने पैदा किया है वही प्रतिपालन करेगा भगवान के संबंध की दृढ़ता जब हो जाती है तो संसार और शरीर से बिल्कुल संबंध खत्म हो जाता है बिल्कुल हुकुम पर जैसा बिल्कुल जैसा वो रंग आ जाता है।
वो रंग शरणागति का आ जाता है। तब जीने की आशा और मरने का भय करने का राग और पाने का लालच सब मिट जाता है। कोई हमारी दिनचर्या नहीं। आप ही हमारी दिनचर्या हो। कोई हमें परम पद नहीं। आप ही हमारे परम पद हो। इससे बड़ा कोई लाभ नहीं कि आप कृपा करके हमको देख रहे हैं। हमसे बात कर रहे हैं। बहुत इतना ही पर कहां जाना है आपके पास? आप है हमारे पास। एकदम बिल्कुल बेपरवाह स्थिति भक्ति के मन में बात कहां से आती है? मेरे आचरण शुद्ध नहीं। मेरी वृत्तियां ठीक नहीं है। तो आप पकड़ो इस बात को।
मेरे आचरण ठीक नहीं समर्पित हो तुम मेरे आचरण ये शरीर तो प्रभु का है इसमें मेरा क्या मेरे आचरण कहां से आ गए मेरी वृत्तियां ठीक नहीं है मन तो प्रभु का है मेरी वृत्तियां का मतलब क्या है बैठ के अच्छे से समझ लो ये साधना से नहीं होता ये समझने से होता है तभी कहा है तात स्वर्ग पवर्ग सुख धरी तलायक कंग तुलनताए सकल मिल जो सुख लव सत्संग सत्संग से हजारों वर्ष तपस्या के बाद जो बात आती होती है वो एक सेकंड में आ जाएगी सत्संग से इसलिए सत्संग की बराबरी स्वर्ग और मोक्ष आदि मर्त लोकों के भोगों की समानता नहीं रखी गई ये सबसे बड़ा है सत्संग मेरी वृत्तियां ऐसा क्यों माना तुम्हारी वृत्तियां काहे से ठीक नहीं तुमने वृत्तियां मानी तो शरणागति किससे हो मेरे आचरण ठीक नहीं तो शरीर से ही होता है ना फिर शरीर को तुमने अर्पित ही नहीं किया तो क्या ढोते रहो बोझा कर्म करते रहो उसका फल मिलता रहेगा परिणाम तो श्री जी मिलना या भगवत प्राप्ति होना ये तो नहीं ये महान दोष है मेरी वृत्तियां ठीक नहीं मेरे आचरण ठीक नहीं वृत्तियां ठीक
नहीं है इतना बड़ा दोष नहीं जितना बड़ा दोष यह है कि मेरी वृत्तियां ठीक नहीं है अरे यार एक सेकंड में सब ठीक हो जाता है। वह प्रसन्न है तो सब ठीक है। आप प्रसन्न हो तो मन, बुद्धि, इंद्रियां, शरीर आदि में जो मेरापन है यही सबसे बड़ी कमजोरी है। यही सबसे बड़ी गलती है। इसे श्री जी को दे दो। अपने मन को, अपनी इंद्रियों को, अपने शरीर को, अपने श्री जी को दे दो। क्योंकि जब मैं भगवान की शरण में हो गया, जब सब कुछ उनके समर्पित कर दिया तो सब कुछ में मन भी बुद्धि भी अब ये मेरे कहां रहे?
वास्तव में शरणागत को मन बुद्धि आदि की अशुद्धि की भी चिंता नहीं करनी। मेरी वृत्तियां ठीक नहीं है। ऐसा भाव कभी नहीं आना चाहिए। किसी कारणवश यदि ऐसा भाव आ जाए तो आर भाव से रोना चाहिए। नाथ देखो बचाओ बचाओ आपकी वस्तु कोई अपनी मान रहा है। आपकी वस्तु कोई अपनी वृत्तियां ठीक नहीं ये गड़बड़ बात नहीं है। गड़बड़ बात है। मेरी वृत्तियां ठीक नहीं। अभी आपकी वस्तु कोई मेरी मान रहा है। स्वामी बचाओ। प्रभु को पुकारना चाहिए। सर्व समर्थ प्रभु आपको समर्पित करने के बाद मैं चिंता क्यों करूं?
वैसे समर्पण के बाद चिंता नहीं रह जाती है और नहीं करनी चाहे हमने अपनी साइकिल किसी को दे दी। अब उसकी चैन खराब हो जाए, ब्रेथ खराब हो जाए। ये उसका मतलब भैया और उसका चैन खराब है। आपसे कोई कहे वो जो आपने साइकिल दी थी उसकी चैन खराब तो कहोगे। अब हमारा कोई मतलब नहीं रहा उससे। वही जिसकी साइकिल जिसको दे दिया वह हमारा उससे कोई संबंध नहीं ऐसे शरीर से मन से बुद्धि से यह है शरणागति हमारा इससे कोई मतलब नहीं भगवान ने भी कह दिया कि तू चिंता मत कर सर्वध परितज मामेम शरणम ब्रज अहम तम सर्व पापे मोक्ष्यामि माचा मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त करके माचा परम पवित्र कर दूंगा।
निश्चिंत हो जाओ। भगवान के चरणों में पड़े रहो। मस्त आश्रय लेकर। जब बात समझ में ना आवे तो कह दो नाथ यह भी सब आपको समर्पित है। देख लेना आप हे नाथ ये सब आपके हाथ की बात है। मेरे हाथ की बात नहीं है। ये निश्चिंत हो गए पुनः बोले मन बहुत दंडता कर रहा है। करने दो डोरी तो उनके हाथ में है। कर जतन विविध विधि अति से प्रबल अजय तुलसीदास बस हो त प्रभु बेरक बर
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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