॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1308 · 26 जून 2026

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

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तो वास्तव में वो दिखती कैसी हैं? उनकी मुस्कुराहट नाम जप करो वो कृपा करके आपको दिखाए तब देखो हरिवंश महाप्रभु कहना चाहते हैं कि श्री जी कैसे हैं देखो पद कह रहे हैं देखो माई सुंदरता की सीवा ब्रज नव तरुनी कदम नागरी निरख करत अधगवा देखो को माई सुंदरता की सीमा तो ऐसा लग रहा है कि महाप्रभु श्री जी की सुंदरता का वर्णन कर रहे हैं कि आगे तुरंत बोल पड़े जो कोटि कलप लगी जीवे रसना कोटिक पावे तो रुचर बदनारविंद की शोभा कहत ना आवे देखो माई सुंदरता की सीवा जो कोई करोड़ कल्प तक जीवे और करोड़ों जी्या हो तो भी महारानी जी के रूप की बात नहीं तेरो रूप कहत नहीं आवे जैसे हित हरिवंश कछु जस गावे ये तो श्री जी अनुभव कराती है उसी को अनुभव तो खूब नाम जप करो श्री जी से प्रार्थना करो कभी कृपा कर दे तो सामने वो वर्णन में नहीं आता नेत्रों ने देखा तो वाणी बोल नहीं पाए।

नेत्रों ने देखा ना तो वह वाणी कैसे बोल पाए? क्योंकि वाणी ने तो देखा नहीं और नेत्रों ने देखा तो उसके वाणी नहीं है। वाणी के नेत्र नहीं है। जिसने देखा वो बोल नहीं पा रहा और जो बोल रहा है उसने देखा नहीं तो बात तो अधूरी हो गई ना। हां पूरी तो तभी होगी जब जो देखे और वो बोले तो वो बोल नहीं सकता। कह रहे जो को कोटि कल्प लगी जीवे रसना कोटिक पावे तो रुचिर बदनारविंद की शोभा कहत ना आवे। जो मोहिनी जो विश्व मोहन श्री लाल जू को सुमन मन मोहन मदन मन मोहन मुनि मन मोहन लालू को मोहित कर ले उन प्यारी जो को इन नेत्रों में सामर्थ्य कहां देख ले वो तो जब भजन करके प्रियाजु इनहीं नेत्रों में प्रेम दृष्टि देख देती है जैसे अर्जुन को दिव्य दृष्टि दी तो विराट रूप दिखा ना तो श्री कृष्ण के साथ रहते हुए कभी विराट रूप में नहीं देखा श्री कृष्ण को ऐसे ही जब प्रिया कृपा करके प्रेम दृष्टि देती है तब प्रिया का दर्शन जो जो दर्शन होता है वो वाणी से नहीं कहा

जा सकता है नहीं कोई देव लोक भूलोक रसातल सुन कवि कुल मति डरिए सहज माधुरी अंग अंग की कह का सो पट तर देखो माई सुन सुंदरता की सीवा ना देवलोक में ना भूलोक में ना रसातल में कोई ऐसा है ही नहीं जिससे उदाहरण दिया जाए कि प्रियाजू कैसी सुंदर है बोले अमुक जैसी कोई है ही नहीं जब लाल जू की सुंदरता काम को मोहित कर ले और लाल जू को लाडली जो अधीन किए हुए है तो लाडली जो ही कृपा करे तभी दर्शन में आएंगे वो बहुत सुंदर है मतलब वो जुबान से बोल ही नहीं सकते नहीं बोल सकते

और कोई कल्पना नहीं कर सकता और किसी से उदाहरण नहीं बन सकता क्योंकि जितनी ये मायाकृत कल्पना है वह श्री जी है नहीं श्री जी चिदानंदमय है और यह सब त्रिगुण माया में ही है तो इसमें किसकी किसको कहा जाए देवलोक में तो ऐसी सुंदरिया है कि उतरा में तो मृत्यु लोक में मूर्छित हो जाए लोग इतनी सुंदर है अप्सराएं और उसके ऊपर ब्रह्मलोक में तो और सुंदर है कह रहे देवलोक भूलोक रस कोई है नहीं श्री जी जैसा श्री जी को देख के वो लाल जो मूर्छित हो जाते हैं और महाराज जी जैसे

कोई प्रेमी जन श्री जी को याद करके उनके प्रेम में रोता है तो क्या श्री जी भी उनको देख के भावुक होती है तड़पने के लिए उनसे मिलने के लिए अब वो तड़पन किस कोटि के है उसी कोटि की श्री जी के हृदय में होगी श्री जी के हृदय तक तुम्हारी पहले हृदय की बात तो पहुंचे समझ रहे हैं ना श्री जी के हृदय तक बात पहुंचना जैसे तुम्हारी बात प्रधानमंत्री तक पहुंचे पहले बात तो पहुंचे फिर उनकी क्या प्रत प्रतिक्रिया होती है तब बताई जा सकती है पर तुम्हारी बात प्रधानमंत्री तक पहुंचना बहुत मेहनत लगेगा नहीं लगेगा ऐसे हमसे बात कर लेना अलग बात है लेकिन अब राष्ट्रपति से बात करना डायरेक्ट फिर अनंत ब्रह्मांडों के पति श्री लाल जो जिनके अधीन है उनके हृदय तक हमारी बात पहुंचे इसीलिए हम राधा राधा राधा राधा राधा कह के रोएं तो कभी लाडली जो हमारी बात सुन ले क्योंकि कहां हम अधम और कहां लाडली जो वो भी गैप में होती है अपने वही व्याकुल होती है तभी अपने को व्याकुलता आती है।

वही चाहते हैं उन्होंने हमें अपना माना तभी हम राधा राधा बोल पाते नहीं। राधा राधा बोलने की भी हिम्मत नहीं। उन्हीं के प्यार से तो प्यार है नहीं तो अपना क्या प्यार? अपने को तो छोड़ दे तो विषयों में है। जैसे नाली के कीड़ा को छोड़ दे तो नाली में ही वो खेलना चाहेगा। ऐसे अपने को छोड़ देते हैं। खाना पीना संसार के भोग वो तो श्री जी पकड़ लिए हैं ना तो इसीलिए उनकी तरफ हम चल रहे हैं। अगर वो छोड़ दे तो फिर ऐसे ही फिर वैसे संसार की तरफ चले जाए तो श्री जी ही प्यार कर रहे हैं।

मतलब हम श्री जी को प्यार कर रहे हैं। ये तो धोखे वाली बात है। श्री जी ही हमें प्यार कर रहे हैं। तब हमारे अंदर प्यार है। मतलब हमारी तरफ से प्यार कहां है? हमारी तरफ से तो छोड़ के देखो अपने मन को कहां जा रहा है? भोगों में जाएगा, विषयों में जाएगा। श्री जी कहीं ना कहीं मान लिए हैं कि ये मेरा जन है, मेरा दास है, मेरा सेवक है। तभी वो मन श्री जी की तरफ जाता है। समझ पा रहे हैं? आपके जैसे सुंदर ध्यान कैसे करें श्री जी की सुंदरता देखी नहीं जा सकती। तो जिस रूप की हम ध्यान करते हैं श्री जी का तब श्री जी कभी हमें दर्शन देके कृपा करके।

हम तो आपके रूप में श्री जी को देखते हैं। आप भाव देखो भाव एक होता है मां जैसा एक होता है मां। बोले हम आपको प्रभु जैसा मानते हैं। तो मानना और प्रभु होना अंतर है ना? जैसे बोले हम आपको श्री जी जैसा मानते हैं। ये आपके भाव है। लेकिन श्री जी जैसा मानना और श्री जी होना अंतर है। महाराज जी हम आपको श्री जी के रूप बिल्कुल श्री जी मान के चलते। वही बात वही वही समझाना चाहते हैं कि श्री जी मानना और श्री जी होना इसमें बहुत अंतर है। हम श्री जी की दासी हैं। हम श्री जी के चरण के आश्रित है।

यह हमारा बाहरी नाटक शरीर माया में है। जो हमारा स्वरूप है वो जो हमारे स्वरूप को जान जाओगे तो श्री जी को देख लोगे। श्री जी को देख लोगे तो हमारे स्वरूप को जान जाओगे। ये स्वरूप नहीं है हमारा। ये हमारा माया में शरीर है। जिसके सहारे से हमारी साधन भजन वो सब जो बना इसके सहारे से बना। इसी से बना। अब इससे कोई मतलब नहीं रह गया। अब जो हमारा स्वरूप है वह तभी अनुभव में आएगा जब श्री जी कृपा करें और जो अगर हमारे स्वरूप को देखोगे तो वही श्री जी पारस में श्री जी के पारश्व में विराजमान दिखाई देगा ये बड़ी गढ़ बातें हैं वो आंतरिक बातें हैं उनमें तरुण जी पंचकूला हरियाणा से राधे-राधे गुरुदेव गुरुदेव आपके चरणों में नमन गुरुदेव श्री जी की कृपा से एक वर्ष पूर्व YouTube के माध्यम से मैं आपकी शरण में आया इसके कुछ वर्ष पहले से नाम जप तो चल रहा था श्री जी की कृपा से परंतु इसके उपरांत सत्संग स्वाध्याय अध्याय के महत्व को समझा जिनकी महिमा को मैं अपने जीवन में आए अनेकानेक सकारात्मक प्रभावों के रूप में अनुभव कर रहा हूं।

गुरुदेव कई वर्ष पहले मुझे परम पूज्य स्वामी रामसुख दास जी महाराज से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। उसके उपरांत उनके द्वारा लिखी हुई अनेक पुस्तिकाओं को पढ़ने का सौभाग्य मिला। उनकी पुस्तकों में वे अनेक जगहों पर चुप साधन का उल्लेख करते थे। उनका कहना था कि यदि साधक नाम जप के साथ-साथ दिन में कुछ मिनट चुप साधन का अभ्यास करें। देखो चुप साधन का मतलब रहस्य समझे हो? अपने को सबका साक्षी मानना। ना हम नाम जप कर रहे हैं, ना हम कुछ सोच रहे हैं, ना हम कुछ कर रहे हैं।

जैसे शांत बैठे हैं। अब हम अंदर अंदर से कुछ नहीं हम कर रहे हैं। जो हो रहा है उसके हम साक्षी हैं। इसे चुप साधन कहते हैं। समझ पा रहे हो आप? चुप साधन का मतलब क्या होता है? जैसे मन में संकल्प बन रहा है तो हम तो नहीं मना रहे ना। मन में संकल्प हो रहा है। बुद्धि को चिंतन कर रही तो हम तो नहीं कर रहे ना। चुप साधन का मतलब जब तक अच्छे महापुरुषों से संग से इसका रास्ते नहीं समझोगे तो ऐसा लगेगा इसे चुप साधन कहते हैं। नहीं नहीं ये ये चुप इसमें चुप हो। आप चुप हो के देखो।

नहीं वो तभी मैं परेशान हो जाता हूं। आ तो उसे चुप साधन का मतलब जो ये बहुत अच्छा ज्ञान मार्ग का साधन है। क्या इसमें है स्थूल शरीर की चेष्टाएं रूपली लेकिन सूक्ष्म शरीर की चेष्टाएं चलती हैं। मन बुद्धि से चित्त से जो चिंतन हो रहा है। अहम से जो क्रियाएं की गई हैं भूत में या जो हमें भविष्य में करना है या वर्तमान में जो हम वो चल रहा है ना आप पकड़ पा रहे हो हमारी बात कि नहीं? अब कहा चुप कहां है? चुप तो नहीं ना? इसी में चुप ढूंढना है कि इन सबको मैं देखने वाला हूं।

मैं करने वाला नहीं हूं। मन में जो हो रहा है मैं देख रहा हूं। इंद्रियों में जो हो रहा है मैं देख रहा हूं। चित्त में जो हो रहा है मैं देख रहा हूं ना। आप देख ज्ञान में आप दृष्टा है। आप शरीर थोड़ी है। ना स्थूल शरीर है ना सूक्ष्म शरीर ना कारण शरीर। तो उस समय मैं चुप हूं और मैं इनको केवल देख रहा हूं। और इनकी हर बात को हम काटते चले जा रहे हैं। नकारात्मक यह मैं नहीं हूं। यह मैं नहीं कर रहा हूं। यह मैं नहीं सोच रहा हूं। तो इससे क्या होगा कि ज्ञान बढ़ेगा और आप इनसे अलग होते जाएंगे।

वो मोक्ष मार्ग का साधन है जो आंतरिक साधन है कि मैं कभी देह हुआ ही नहीं। मैं कभी अंतःकरण हुआ ही नहीं। मेरा कभी स्वभाव है ही नहीं। मैं आत्म स्वरूप हूं और मैं इनमें फंस गया हूं। तो दो मिनट से ही, पांच मिनट से थोड़ा अलग होके देखें। ये ज्ञान मार्ग का साधन समझ जाता हूं उनको बता महाराज जी थे भक्ति मार्ग के ही प्रेरित किए महाराज तीनों मार्गों का वर्णन किए हैं जैसे गीता में सांख योग का भी वर्णन है कर्म योग का भी वर्णन है और ज्ञान योग का वर्णन है तो महाराज जी तीनों मार्गों का दर्शन कराते थे लेकिन शुद्ध ज्ञान स्वरूप आत्मा में स्थित थे समझना शुद्ध आत्म स्वरूप में स्थित ज्ञानी महापुरुष थे महाराज जी जो थे श्री स्वामी राम सुखदास जी शुद्ध ज्ञानी महापुरुष पुरुष थे।

जो भक्ति का रहस्य है वह ज्ञान का भी रहस्य है। दोनों एक ही जगह पहुंचते हैं तो जो ज्ञान में सिद्ध हो गया तो भक्ति के रहस्य को भी जानता है और कर्म योग को भी जानता है। और जो कर्म योग से सिद्ध हो गया वो भक्ति राशि को भी जानता है। ज्ञान योग को भी जानता है। जो भक्ति से सिद्ध हो गया वो कर्म योग को भी जानता है और ज्ञान योग को भी जानता है। क्योंकि ज्ञान अलग चीज नहीं है। जैसे ज्ञान का तात्पर्य है कि जो सर्वत्र है जैसे हम भक्ति में कहते हैं सिया राम में सब जग जानी तो ज्ञान में कहते सर्वम खलमिदम ब्रह्म नैना नास्त कििंचन एक ही बात हुई ना अब सर्वम खलमिदम ब्रह्म जो है तो यहां भी तो है ना तो वही ब्रह्म मैं हूं ये ज्ञान है और यहां मैं का विस्मरण हो गया मैं का विस्मरण हो गया ब्रह्म नहीं माया नहीं नहीं जीव नहीं काल अपनी हो सुधि ना रही एक रहो नंदलाल एक केवल भगवान में प्रीति जैसे गोपी जनों की प्रीति ऐसे भग तो स्वामी जी महाराज ज्ञान सिद्ध महापुरुष थे संपूर्ण भक्ति के रहस्य के ज्ञाता कर्म योग रहस्य के ज्ञाता थे तो जब ये ज्ञान की बात आती ये जो मार्ग समझना होगा ना कि कौन सी बात भक्ति की है और कौन सी मार्ग ज्ञान की है और कौन सी मार्ग कर्म ये ज्ञान मार्ग की बात है कि हमको उसका साक्षी क्षी भाव होना है।

हां। और भक्ति मार्ग में समर्पण है। साक्षी भाव नहीं है। भक्ति मार्ग में समर्पण है। जो हमारे शरीर से क्रियाएं हो रही वो सब श्री भगवान के लिए है। जो हमारे मन बुद्धि चित्त अहंकार है। ये भगवत में संकल्प करें। भगवत चिंतन करें। ये भगवन नाम जप करें। भगवत लीला गुणगान श्रवण हर इंद्रिय हर मन वो सब भगवान को अर्पित कर देना। मैं तन वाणी अंतःकरण सब भगवान को समर्पित समर्पित होकर निश्चिंत निर्भय निशोक निसंशय और विपरीत भावना का त्याग ये स्थिति आ जाती है। तो हम जैसे गीता पढ़ेंगे ना तो सब कुछ है उसमें तो हम किस मार्ग के पथिक हैं ये देखना है।

हम भक्ति मार्ग की बात ज्ञान मार्ग से जोड़कर के ज्ञान मार्ग की बात भक्ति मार्ग से जोड़कर तो हम विचलित हो जाएंगे क्योंकि थोड़ी देर तो सब मार्ग एक जैसा चलते हैं। इसके बाद सब अलग हो जाते हैं। आगे आगे का जो मार्ग है सबका अलग है। भक्ति में मैं का भी स्मरण है। और ज्ञान में तू का भी स्मरण है। जो कोई भगवान जो सच्चिदानंद जो वो यहां मैं में है मैं वही सब कुछ हूं। ज्ञान में शुद्ध ज्ञान में वही आत्मा एक ही आत्मा जो सर्वत्र व्याप्त है वही यहां वही मैं आत्मा हूं।

तो अब इन अंतःकरण से और देह से अलग भाव में साक्षी भाव में आना वो चुप साधना है। हां चुप होने का मतलब जैसे लोग समझते हो ईमानदारी से देखो चुप कहां हो। है तो वही बात समझाने के लिए तो अब जैसे कहा जाए कि थोड़ी देर चुप साधना करनी चाहे कि शांत एकांत बैठ गए और चुप हो गए। मतलब शांत हैं, एकांत है और चुप हैं। तीनों बातें नहीं है। ना आप शांत हो, ना आप एकांत हो और ना आप चुप हो। बैठ जाओ कहीं एकांत में जाके और ये तीनों बातें नापना कि क्या आप एकांत में हो? एक के सिवा अन्य जगह रमण ना करना एकांत कहा जाता है।

एक के सिवा अन्य जगह ना वृत्त जाना उसे एकांत कहा जाता है। और शांत किसी भी तरह की स्ूना ही ना उत्पन्न होना। जैसे शांत जल में कोई तरंग नहीं होती। तभी तो हम शांत कहते हैं ना। तो अंतःकरण में कोई तरंगे ना होती तो उसे शांत कहते हैं। तो ऐसा नहीं है ना ना एकांत है ना शांत है और चुप चुप नहीं है। नाना प्रकार के प्रपंच चल रहे हैं। अब उसके आप दृष्टा हो। अब आया ज्ञान मार्ग। अब चुप आपको माना जाएगा। जब आप सबसे निरपेक्ष होकर शांत हैं। एकांत है अलग एकदम और आप दृष्टा मात्र।

जैसे इनकी हर हरकतों को हम देख रहे हैं। लेकिन चुप हैं हम। ऐसे ही हम अपने हृदय की ममता रहित आसक्ति रहित होकर अलग एकदम अपने को देख रहे हैं तब माना जाएगा वो थोड़ा बहुत पवित्र बुद्धि से है ना तो हां तो भगवान की शरणागति स्वीकार करके भगवान का नाम जप करना भगवान का गुण कीर्तन करना भगवान के गुण कीर्तन सुनना एकांत में जब बैठना तो नाम पर ज्यादा जोर देना देखो स्वामी जी की वाणी पढ़ो फिर राधा बाबा की वाणी पढ़ो परम ज्ञानी राधा बाबा और अंततोगत परम प्रेमी अब आप देखो आस्तिकता की आधारशिलाएं पढ़ के देखो है ना और सत्संग के

बिखरे मोती भाई जी महाराज की पढ़ के देखो भाई जी महाराज ये दोनों महापुरुष जो है राधा बाबा और भाई जी ये प्रेम मार्ग के भाव सिद्ध महापुरुष है और स्वामी जी भक्ति [नाक से की जाने वाली आवाज़] कर्म योग इन सबको प्रकट किए भाव लेकिन लेकिन सिद्ध है ज्ञान में स्वामी राम सुखदास जी महाराज ज्ञान सिद्ध महापुरुष है जो आत्म बोध प्राप्त है सन्यास धर्म के अनुसार आत्म बोध प्राप्त है तो आत्म बोध प्राप्त होते हुए जैसे उड़िया बाबा भगवान की कथाएं सुन रहे नाम कीर्तन हो रहा

हरी बाबा जहां नाम कीर्तन करते वही उड़िया बाबा होते पर उड़िया बाबा भक्ति का प्रकाश कर रहे हैं लेकिन सिद्ध है ज्ञान मार्ग के हरि बाबा उड़िया बाबा का संग कर रहे है पर सिद्ध है प्रेम मार्ग के ऐसे समझ लाता है कि ज्ञान भक्ति सबका प्रकाश होता है महापुरुषों में पर वो स्थित महापुरुष ने सब रस गायो शब्द समझना देखना यह है कि उनको हं ठहरानो वो हृदय उनका तो हृदय स्वरूप बोध में था हृदय स्वामी जी का आत्म बोध में था ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुष किंचिन मात्र कहीं भी

किसी तरह की ना स्थूल में आसक्ति ना सूक्ष्म में ना कारण में हां तो आप आंतरिक जो लक्ष्य स्वामी वो ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुष और भक्ति के रहस्य के ज्ञाता और कर्म योग के रहस्य के ज्ञाता और सांख्य योग में ज्ञान योग की परम निष्ठा को प्राप्त और अब महापुरुष जन जानते हैं ना जगत का कल्याण कैसे होगा भगवान की परम भक्ति से उसी से शुद्ध ज्ञान भी होगा इसीलिए उन्होंने कहा कि बहुत वर्ष अनुभव करने के बाद लगा कि गीता का मुख्य उपदेश भक्ति ही है स्वामी स्वामी राम सुखदास जी हां तो लगा की गीता को लेकिन स्वामी जी की स्थिति कहां है?

वो जब महापुरुषों के वचन पढ़ो ना तो स्थिति उनमें छुपी होती है। आप स्वामी जी की कोई भी बात पढ़ना वो वहीं पहुंचेंगे आत्म स्वरूप में हमारी बात को पकड़ना। तो जहां जहां महापुरुष होते हैं ना वो बात वही आ जाती है। अब जैसे आप लाख ज्ञान की बातें हमसे करवाओ और जब हमारे बात को आप सुनोगे ना तो बार-बार में आ जाएगी कि प्रियाजु की कृपा से भगवान की कृपा से वो तो समझ लेना वो वही टिका हुआ है। जिसकी बार-बार इस बात वही आवे तो वही टिका हुआ है। वही स्थिति रहती है। अब जैसे राधा बाबा की आप बात पढ़ के देखो।

भाई जी की बात पढ़ के देखो। हां स्वामी जी की बात पढ़ के देखो। और जय दयाल जीका की बात पढ़ के तो वो जहां स्थिति होती है ना वही प्रकाश हो जाता है। तो ये जो स्थिति है ज्ञान की तरफ जाने वाली है। गौरव जी राधे-राधे गुरु जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी यदि हमें भगवान है वह भगवान से हम तो फिर हमें अपने ही कार्यों पर संदेह क्यों होता है? वह हम इस संदेह को दूर क्योंकि तुम ऐसा अनुभव नहीं कर पा रहे ना। दूध में घी है पर एक प्रक्रिया है उस प्रक्रिया से निकालोगे क्यों भला पूरी पका के दिखाओ सीधे दूध में नहीं पकेगी और उसी में घी है 5 लीटर दूध है उसको पहले दही उबालो दही जमाओ मंथन करो मक्खन निकले फिर उसको उबालो तो आप फिर देखो घी निकल आएगा उसी में घी है आप में परमात्मा है लेकिन साधना नहीं है ना इसीलिए संशय जिसको ज्ञान ना हो उसे कहा कहा जाए यह दूध है इसमें घी है तो वो कैसे मानेगा कि यार इसमें घी कहां है नहीं है घी लेकिन प्रक्रिया के द्वारा उसी से घी

निकल जाएगा नहीं निकल जाएगा अब जैसे ये मेहंदी है आप मेहंदी को एक-एक रेशा रेशा चीर डालो कहीं लालिमा मिले तो बताना कह दो यार मतलब मेहंदी में लालिमा तो होती है लेकिन इसमें है नहीं प्रक्रिया है आप उसको बांटो बांट के हाथ में रखो और 40 मिनट बाद धो दो देखो हाथ में लालिमा आ जाएगी आ जाएगी ले आ जाएगी तो ऐसे परमात्मा आप में है लेकिन साधना करो साधना रूपी प्रक्रिया नहीं है तो आपको परमात्मा अनुभव में ले जा रहा है वो है यही संशय इसीलिए हो रहा है क्योंकि साधना नहीं साधना हो जाए तो संशय खत्म हो जाए यही अनुभव हो जाता है छाती के अंदर ही बैठे हैं भगवान हां अपने हृदय में सबसे पहले भगवत साक्षात्कार हृदय में होता है पहले हृदय में होता है फिर बाहर होता है ध्यान रखना पहले हृदयस्थ भगवान फिर बाहर भगवान आते हैं तो ये बात समझ रहे हैं ना हमारी साधना बने तब बात समझ में आए हम भगवान का नाम जप करें।

भगवान की लीला कथा गाएं। संयम से रहें। गंदे पापाचरण ना करें। धीरे-धीरे हृदय पवित्र होगा। संशय नहीं रह जाएगा। समझ में आ जाएगा कि भगवान है। अभी तो बहुत दूरी है क्योंकि हम शरीर अभिमान में है। भोगों में है। संसार प्रिय लग रहा है। भोग अच्छे लग रहे हैं। तो भगवान कैसे समझ में आएंगे? वो तो अंदर विराजमान है। देखो प्रधानमंत्री हैं। आप मिलना चाहो मिल सकते हो। लेकिन ऐसे नहीं मिल सकते कि हमारी तुम्हारी मिल सकते हैं। एक वहां एक प्रक्रिया है। उस प्रक्रिया से पास होइए और यह अधिकार साबित हो जाए कि आप मिलने योग्य हैं।

तो भारतीय हैं आप मिल सकते हैं। जब एक प्रधानमंत्री मनुष्य है उनसे मिलने के लिए हमें योग्यता और प्रक्रिया की जरूरत है। नहीं महीनों लग जाएंगे। अभी थोड़ी मिल जाओगे कि जाए मेरा वो अनंत ब्रह्मांडों का मालिक जो है अब आप सोचो जो अनंत ब्रह्मांडों का मालिक है उससे आप अभी मिल सकते हैं अभी पर मिलने की परम व्याकुलता चाह पैदा हो जाए बस यही हमारे भगवान को चाहिए रुदु सुशम राजन कृष्ण दर्शन लालसा हे श्री कृष्ण आपके बिना जिया नहीं अभी यही प्रकट हो जाए सबके बीच में आपको दर्शन देंगे किसी को दिखाई नहीं देंगे रुदु सुशम राजन कृष्ण दर्शन लालसा तो हमारे अंदर भजन हो, साधन हो, भगवान की भक्ति हो, तब हमारे अंदर रोना आए।

भगवान के लिए प्रबल रोना आ जाए तो अभी भगवान प्रकट हो जाए। भाई योग्यता तो आपको दिखानी पड़ेगी। वो दैवी शक्तियां जब कोई भगवान से मिलने के लिए चलता है ना तो उसकी परीक्षा होती है कि आप भगवान से मिलना चाहते हो कि नहीं? कैसे? लो रुपया। राजी हो जाओ। राजी हो गए तो लाखों उसी में राजी हो गए। भूल गए कि भगवान से मिलने के लिए चले थे। उसे कंचन कहते हैं। फिर सुंदर सुंदर भोग भोगो सुविधा है सब फ्री भोगने में लग गए तो भूल गए। अब जो दैवी शक्ति तुम्हें ले जाना चाहती थी वो काट दिया।

नहीं ये भगवान से मिलने लायक नहीं। फिर तीसरी मान सम्मान बढ़ाई। अरे आप तो भगवान हो। आप तो सरकार हो। आप तो जय हो। अगर इसमें राजी तो काट दिया कनेक्शन। नहीं नहीं ये मिलने वाला। जब उतने पे भी रोना शुरू है। हे प्रभु हे करुणा निधान तो साकरी गली है भगवान से मिलने की साकरी गली है प्रेम गली अति साकरी ता में दो ना सवा वह वहां से क्रॉस करवा दिया आगे भगवान मिल गया समझ गए तो खूब नाम जप करो भगवान का चिंतन करो पहले ये इतनी योग्यता कि मुझे कुछ नहीं चाहिए हम तो एक साधारण उदाहरण देते हैं जब एक बालक रोने लगता है खिलौने से ना खेल के तो मां का ध्यान उधर खींचता है फिर वो अपनी बेटी को भेजेगी या किसी को भेजेगी जाओ जाओ गोद में ले लो।

अगर वो उतने पे भी रोना बंद ना किया तो कहेंगे नहीं मानेगी मुझे ही लेना पड़ेगा। तब वो जाके गोद उठाते हैं। खिलौना या किसी के भेजने पर उसका रोना बंद नहीं होना चाहिए। ऐसे हमारे पास भी खिलौने भेजे जाते हैं माया के खेल लो खेल लो या रिद्धियां सिद्धियां ले लो। रिद्धियां सिद्धियां गोद में उठा लो। ना रिद्धियां सिद्धियां ना कोई खिलौना भोग सामग्री और जिसका रोना चलता रहा फिर भगवान मिल जाते कविना हंसना छोड़ दे रोने से कर प्रीति बिन रोए किन पया प्रेम प्यारा तो हमारा भजन ना होगा भगवान से प्यार नहीं होगा तो यही भगवान है हम नहीं जान पाएंगे कि भगवान है उसकी प्रक्रिया साधना करें तो भगवान हमारे हृदय में ही अनुभव में आ जाएंगे कि भगवान है ठीक है ना शब शुक्ल जी गुरुदेव आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।

श्री हरि भगवन हमारी अभी दृष्टि काम में है। इसको राम में कैसे बनाया जाए? महाराज जी नाम जितना जपोगे उतना ही मन निर्मल होगा। मलिन मन में काम का अधिकार होता है और निर्मल मन में भगवान प्रकाशित होते हैं। निर्मल मन जन सो मोहे पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा। निर्मलता नाम करेगा। जितना नाम जप करोगे उतने निर्मल होता जाएगा मन। जितना नाम जप करोगे उतने ज्ञान प्रकाशित होगा। जैसे दो लकड़ियों के घर्षण से अग्नि दिखाई ना देने पर भी प्रकाशित हो जाती है। ऐसे जिभ्या में नाम रगड़ने से राधा राधा राधा राम राम कृष्ण कृष्ण हमारे अंदर दिव्य ज्ञान दिव्य प्रेम जागृत होता है।

जितना अधिक नाम जप करेंगे उतना ही हमारे अंदर ज्ञान प्रकाशित होगा। एकादशी स्कंध में भागवत में लिखा है कि जैसे भूखे व्यक्ति को एक एक कवल भोजन पाने से सुधा निवृत्ति तुष्टि और पुष्टि होती है। ऐसे ही एक-एक नाम जप करने पर भगवान का ज्ञान स्वरूप का बोध और प्रेम ये तीनों प्राप्त होते हैं। संसार से वैराग्य होने लगेगा। भगवान का ज्ञान प्राप्त हो जाएगा और प्रेम प्राप्त हो जाएगा। तो खूब नाम जप करो। जितना अधिक नाम जप करोगे उतना ही भगवान का अपनापन जागृत होगा। मेरे प्रभु मेरे कृष्ण मेरी किशोरी जो तो इस मेरेपन में निर्विकारता है।

तो जितने विकार मेरेपन के मैं शरीर मेरी स्त्री मेरा पुत्र मेरा परिवार मेरा ये इनसे सब व्यवहार ऐसे ही रहेगा। पर अंदर से ममता खत्म हो जाएगी। ममता प्रभु के चरणों में सबकी ममता ताग बटोरी मम पद मनह बांध बर डोरी यह ज्ञान नाम जप से होगा जितना अधिक आप नाम जप करेंगे और हृदय तो आपका द्रवित है ही है मान लो जैसे रुदन है ना यह बार-बार बताता है कि हमारा हृदय द्रवित हो रहा है लुजलुजा हो रहा है हृदय जरा सी भगवान की बात सुनी संत दर्शन किए जैसे हमारे हृदय में भाव आ रहे इनको हम छुपाए और खूब नाम जप करें तो और जल्दी जल्दी हमारे अंदर निष्कामता आ जाएगी।

जहां निष्कामता आई भगवत प्रेम स्फुरित होने लगेगा। भगवत प्रेम जगा हो गया काम। प्रेम या ज्ञान दो एक जग जाए या तो विशुद्ध ज्ञान या परम पवित्र भगवत प्रेम। बस यही दो हैं समर्थ जो माया से पूर्ण रूप से हमें पार कर देंगे। भगवान ही ज्ञान दाता है। भगवान ही प्रेम दाता है। खूब नाम प्रेम मूल यह नाम है। प्रेमी रसिक जपत यह नाम प्रेम मगन निज बन विश्राम। प्रेम की मूल जड़ क्या है? नाम प्रेम मूल यह नाम है। जितना नाम जप करोगे उतना ही प्रेम प्रकाशित होता चला जाएगा। महाराज जी उसमें पढ़ा हमने कि यद्यपि कहे गुरु बार ही 12 समझ हां तो अपने बाल्यावस्था के कारण अज्ञान के कारण कह रहे मैं समझ नहीं पाया तो गुरुदेव तो बार-बार समझा रहे लेकिन मैं समझ तो वो भगवान की लीला चरित्रों का विषय है लेकिन यहां नाम जप के लिए तो कुछ समझने की जरूरत ही नहीं है।

राधा राधा राधा राधा राधा राधा सब समझ अपने आप आ जाएगी। वहां तो लीला चरित्र के लिए कह रहे हैं कि बार-बार गुरुदेव ने मुझे समझाया भगवान के लीला चरित्रों का पर हम समझ नहीं पाए अज्ञानता के कारण तो इसमें तो समझने की जरूरत नहीं बस पकड़ लो नाम पकड़ लो जो दे रहे हैं या जो प्रिय हो वो जपने लगे पर गुरु मुख से निकला हुआ नाम विशेष लाभदायक होता है तो जो नाम प्रिय लगे वो खूब नाम जप करो नाम जप से सब ठीक हो जाएगा आप देख लेना आप इतना इतना समझो जो राम राम नहीं कह पा रहे थे वो जब मरा मरा बोले तो दो के बाद राम राम आ गया ना मरा मा रामा रामा रामा और वो महान ऋषि हो गए जो ठीक से राम नहीं बोल पा रहे थे वो मरा मरा उल्टा नाम जपत जग जा नाम में बड़ी सामर्थ है और नाम में रुचि कम होती है अगर हम नाम में रुचि उठते बैठते चलते फिरते कर ले तो पक्का काम हो जाएगा नाम जप करने के समान कोई साधना नहीं है।

और नाम जप में कोई पैसा नहीं लगता है। बस चलते फिरते उठते बैठते अभ्यास की जरूरत है। अभ्यास अगर कर ले हर समय नाम जप का तो चलने लगेगा। नाम को मन को पकड़ाना होता है एक बार और यह पकड़ ले तो फिर उठते बैठते चलते फिरते खाते पीते हमारे अंदर नाम चलने लगेगा और नाम चल गया तो बस हो जैसे हम बढ़िया जहाज में बैठ जाए तो हमको ना तैरने की चिंता है ना डूबने की चिंता पार हो गए तो इस संसार समुद्र से कह रहे नानक नाम जहाज है चढ़े सो उतरे पार नाम रूपी जहाज में चढ़ गए मतलब राधा राधा राम राम हरे हरे कृष्ण कृष्ण जो नाम प्रिय हो बस उसी से आप पार हो जाओ भव समुद्र से पार होने के लिए सुदृढ़ नाम जहाज है सुदृढ़ मतलब मजबूत ऐसा नहीं कि कहीं आपको डुबो देगा नहीं भव समुद्र से पार करने के लिए सुदृढ़ नाम जहाज खूब नाम जप करो राजेंद्र जी राधेधे श्री राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी शरीर को नष्ट करना पाप है पर प्रेम विवशता विरह कोई सहन नहीं कर पाए और सब त्याग करके प्राण त्याग दे तो क्या अपराध यहां प्राप्त है क्या?

हां क्योंकि हमारी वस्तु नहीं है तो हम उसको कैसे नष्ट कर सकते हैं? हमारी वस्तु नहीं है। प्रेम विरह हृदय का विरह होता है। लेकिन उस प्रेम विरह में यह बात ध्यान रखनी है कि अपना प्रियतम हर समय सामने रहता है। जब विरह होता है किसी हम कह वो विरह किसी संसारी स्त्री के लिए हो या संसारी पुरुष के लिए तो आप देखोगे वो आपके सामने रहेगा। कि परमात्मा के लिए तो तो जीवन धन्य हो जाए। तो उसमें विरह विकलता होती है। उद्धव जी यही समझाने आए थे गोपी जनों को कि गोपीजन श्री कृष्ण विरह में विकल रुदन कर रहे हैं।

तो एक दिन श्री कृष्ण चंद्र जो रो रहे थे मथुरा में तो उद्धव जी ने कहा प्रभु आपके आंसू देखकर मुझे सहन नहीं होता। तो उन्होंने कहा गोपियों के आंसू रुकवा दो तो मेरे रुक जाएंगे। वहां गोपी रो रही है इसलिए मेरे को रुदन आ रहा। तो उद्धव जी समझाने आए। तब उन्होंने कहा तुम क्या समझते हो? श्री कृष्ण हमसे दूर है। अरे मेरी आंखों में मेरे रोम रोम में मेरे हर समय सात श्री कृष्ण रहते हैं। विरही के नेत्रों में विरही के हृदय में विरह के रोम रोम में प्रीतम रहता है। तो उसका तो जीवन प्रीतमय होता है।

अगर ऐसा होता तो सब गोपियां प्राण त्याग देती। लेकिन एक भी गोपी ने प्राण तो नहीं त्यागा ना। भगवान के प्रेम में विरह में वो रो के रुदन करते हुए कभी उनके साथ खेल रही कभी हंस रही। यही दशा देखकर के तो उद्धव जी चरणों में लौट गए कि जो प्रेम की ऊंची दशा कभी मिलन कभी विरय कभी मिलन कभी वीर कभी विरय कभी मिलन ये दशा गोपी जनों की देखी तब उन्होंने यही मांगा कि मुझे ब्रज की कोई घास लता औषधि बना दी जाए जिससे इन गोपियों की चरण धूल हमारे ऊपर पड़े वो दशा होती है मरता नहीं मतलब प्राणों में इतनी व्याकुलता अपने प्रीतम के लिए होती है भयानक जो मैं ऐसा जानती प्रीति किए दुख होए नगर ढिंढोरा पीटती अजी प्रीति न करियो कोई लेकिन उस प्रीति में जो

दुख है उसमें जो सुख है वो ब्रह्मा को भी नहीं है समझना प्रीति के दुख में जो सुख है वो ब्रह्मा को भी नहीं है तो मिलन के सुख में जो दशा होती होगी उसका वर्णन कैसे करें तो हम जिसकी प्रीति में विरह में होते हैं वो नेत्रों में बसा होता है पी मूरति नैनन से ते रस रहा समाए हे प्यारे कब मिलोगे हृदय तड़प रहा है तो इस तड़पन में जो आनंद है इस तड़पन उसी आनंद के कारण शरीर नहीं छूटता नहीं तो शरीर कब का छूट जाए प्रेमी का शरीर विराग में कब जल जाए पर वो जो आनंद है तड़पने में वो मिलेंगे तो फिर उनको देखेंगे फिर उनसे ऐसे बात करेंगे फिर ऐसे वो उसी में डूबा हुआ काट रहा है पर एक एक मिनट बार-बार उसको लग रहा है आज घड़ी लेट चल रही क्या?

इसे रफ्तार से चलना चाहिए। जल्दी से एक घंटा हो जाए और हम मिल ले जाकर। ऐसे अपने प्रीतम के लिए तड़पता रहता है। इसी तड़पन के लिए तो भगवान ने गोपी जनों से कहा कि मैं तुम्हारा ऋणी हूं। मैं तुम्हारा ऋणी हूं। भगवान ने कह दिया कि मैं तुम्हारा तुम्हारे प्रेम को नहीं चुका सकता। जो तुम मेरे लिए तड़पना मेरे लिए रोना वो तड़पन वो रुदन अजीत भगवान को ऋणी बना दिया। सर्वलोक महेश्वर भगवान को ऋणी बना दिया। तो शरीर को नष्ट करना यह कहीं भी किसी भी प्रेमी के जीवन में नहीं पाया गया।

उसको शरीर से मतलब ही नहीं रहता। वो अपने प्रीतम में तड़पता रहता है। शरीर का अपनापन खत्म हो जाता है। शरीर की जैसी भी परिस्थिति है उसको सहा जाता है और प्रभु के लिए जब प्रभु के विधान से शरीर छूटता है अपने आप तो उसे भगवत प्राप्ति होती है। अगर कोई जबरदस्ती शरीर छोड़े तो आत्म कहा जाएगा। बात करने वाला लोक और परलोक में दोनों जगह निंदनीय माना जाता है। अभी यह सूचना दे दी जाए कि आप आज 4:00 बजे शरीर हत्या करना चाहते हैं तो आपको बंदी बना लिया जाएगा और इस पर मुकदमा चलेगा और आपको सजा मिलेगी।

हमारा कानून भारतीय कानून भी आपको नहीं बख्शेगा। फिर भागवती कानून तो बहुत ही इसमें सख्त है। आत्म मनन गति जाए। आत्महत्यारे को बहुत दुर्गति प्राप्त होती है और शास्त्रों में कहीं ऐसी आज्ञा नहीं है कि आप भगवान के लिए शरीर को नष्ट कर दे। ऐसी आज्ञा ले इसलिए सावधान रहना चाहिए। जब तक शरीर है तब तक भगवान के लिए अर्पित किए और जब शरीर को छूटने का समय आया तो प्रारब्ध भोग के अनुसार छूट जाएगा। क्यों जी आप सुनील शर्मा जी राधा वाला नमस्कार गुरुदेव आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी सच्चे साधक के जीवन में अनुकूलता प्रतिकूलता का कोई भी महत्व नहीं रखता महाराज जी आपकी कृपा से जब से समझ पकड़ी है तब से अनुकूलता में प्रभु की दया और प्रतिकूलता में प्रभु की कृपा मानते हैं।

प्रतिकूलता में यह भाव रहता है कि प्यारे जीव की कितनी कृपा है। पहाड़ जितने कष्ट को राई के दाने के जैसे बदल दिया उन्होंने और उनकी कृपा कर्म कट रहे हैं। महाराज जी जब साधारणता ग्रस्त जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियां आती है, तब उसे ठीक करने की प्रार्थना ना करके क्रिया में उतर जाते हैं। तब महाराज जी यह प्यारे की अवहेलना सी लगती है कि हम क्रिया में क्यों उतर गए? नहीं उसका भी प्यारे का विधान मानना चाहिए। जब हम प्रभु की शरण में तो हमको प्रेरणा कर रहे हैं कि इस प्रतिकूलता की निवृत्ति ऐसे होगी।

यदि हम उस चेष्टा में लगते हैं तो उसको अहम में ना लावे। जब हमारा अहम शरणागत हो चुका है तो उस अहम में अगर प्रेरणा हो रही है और वह सत शास्त्र सम्मत है तो उसे भगवान की प्रेरणा मानते हैं। भगवान ने प्रेरित किया फिर ऐसे क्रिया हुई और वो दुख निवृत्ति हो गई तो भगवान की प्रेरणा से मान लो प्रेरणा हो जाए कि हम अमुक पाठ कर लेते हैं। अमुक सेवा कर लेते हैं। तो भगवान ही प्रेरित कर रहे हैं। गृहस्थ धर्म में ऐसी आवश्यकताएं आ जाती हैं। पर वस्तुत जब हम पूर्ण शरणागति की तरफ देखते हैं तो फिर [गला साफ़ करने की आवाज़] जोई जोई प्यारो करे सोई मोहि भावे।

जो हमारे प्यारे विधान किए हुए हैं वो हमारे लिए बहुत अच्छा है। दूसरे के द्वारा किया हुआ अच्छा विधान हमारे लिए अच्छा नहीं। लेकिन हमारे प्यारे के द्वारा किया हुआ प्रतिकूल विधान भी हमारे लिए बहुत अच्छा है। भगवान नरसिंह जी ने जो बात कही प्रह्लाद जी से बहुत जोर की कहे कि यद्यप तुम्हारे हृदय में इच्छा नहीं है तो भी तुम हमारी इच्छा के लिए एक मनवंतर तक गृहस्थ धर्म को स्वीकार करो और अपने प्रारब्ध के शुभ अशुभ का भोग करके मुझे प्राप्त हो जाओ। यह बहुत जोर की बात रही कि उत्तम भक्त वही है जो आए हुए प्रारब्ध भोग को भोगता है।

अब अगर उसकी निवृत्ति प्रभु कराते हैं। अब जैसे रोग रूप से प्रभु आए तो औषधी रूप से पूजा उनकी हुई वो हम नहीं चाहते। लेकिन हमें करना पड़ेगा। तो भगवत सेवा बन रही है। गुरु आज्ञा का पालन हो रहा है कि रोग रूप से भगवान आए औषधि रूप से उसकी पूजा करो। इसमें हम कहीं नहीं है। तो क्योंकि अब शरीर तुम्हारा नहीं, मन तुम्हारा नहीं, प्राण तुम्हारे नहीं, सब कुछ प्रभु का है। तो जब तक जैसे सुरक्षित रखना चाहते हैं आपको प्रेरणा कर देंगे। तो उसमें अपना बचाव पक्ष ला के मैं कहीं ना खड़ा होने पावे।

उसमें प्रभु को ही माने हम तो बात बन जाएगी। अब जैसे हमारे द्वारा कोई गलत काम हो जाता है तो हम उस पर पश्चाताप करते हैं कि क्या अभी हमारी शरणागति में यह हिस्सा बकाया रह गया क्या? यदि प्रभु का अधिकार होता तो काम का अधिकार कैसे हो गया? क्रोध का अधिकार कैसे हो गया? लोभ का अधिकार उस पर हम चिंतन करते हैं। क्या यह क्षेत्र अभी बकाया रह गया है प्रभु की शरणागति से और बार-बार प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि प्रभु संपूर्ण हृदय आपके चरणों में अर्पित हो। अब आप देख लीजिए आज शरणागति सत्संग सुन रहे थे ना प्रारंभ में तो वह हृदय की बात कहते हैं।

कभी-कभी हृदय के उद्गार प्रकट करते हैं कि जीव के सामने कुछ परिस्थितियां ऐसी आती हैं जिसमें अहंकार उसका चूरचूर हो जाए। वो भगवान की शरण में हो जाए। नहीं तो जीव अहंकार को पकड़े रहता है। मैं को पकड़े रहता है। कर्ता भाव बना रहता है। यह कर्ता भाव तभी जाएगा जब पूर्ण रूप से हम ऐसे हो जाएंगे। श्री जी के शरणागत तो फिर श्री जी सब संभाल लेते हैं। प्रभु सब संभाल लेते हैं। तनवांग मनोभ अमल सोहम त वास्तिता शरीर से मन से वाणी से निर्मल भाव से मैं आपकी शरण में हूं।

अमल होती कामना जो मल होती है वो कामना। अमल होती है निष्कामता। निष्कामता मैं कोई चाह रख के नहीं आपसे प्रेम करने के लिए आपकी शरण में हूं। पर यह बहुत ऊंची स्थिति है। हम अपनी चाह की पूर्ति के लिए भी श्री जी से ही मांग करें। किसी और से ना करें। क्योंकि अब हमारे श्री जी के सिवा कोई है नहीं और हमारे हृदय में आवश्यकता लग रही है। धैर्य है नहीं। इतना ज्ञान है नहीं कि वो सर्वांतर्यामी सब जानते हैं। तो फिर हम उन्हीं से कहें उन्हीं से कहें कि हमारा तन मन प्राण सब आपको समर्पित है।

पर पता नहीं कौन सा क्षेत्र अभी समर्पित नहीं रह गया जिसमें मांग उठ रही है तो वो भी आपसे ही आपको समर्पित है। वो मांग भी आपको समर्पित है। आप पूरा करें या ना पूरा करें पर हमारी श्रद्धा हमारा विश्वास आपसे कम नहीं होने वाला। ऐसे चला जाता है। क्योंकि गृहस्थ धर्म में बहुत सी आवश्यकताएं, बहुत सी कामनाएं देखो इतने बड़े ज्ञानी महात्मा श्री जनक जी हैं। जब अजग का खंडन बड़े-बड़े वीर नहीं कर सके तो बहुत विलाप करने लगे कि अगर मैं ऐसा जानता कि कोई वीर ही पैदा नहीं हुआ अजगव खंडन करने वाला तो मैं अपनी जानकी को इस दांव पर ना लगाता कि जो अजगव का खंडन करेगा वही जानकी का वर होगा।

मेरी जानकी कुंवारी ना रहती। मैंने कैसा प्रण ले लिया जिससे आज मुझे पता चला कि कोई ऐसा वीर ही नहीं है। तब लक्ष्मण जी उठे और उन्होंने कहा एक रघुवंश मणि भगवान श्री राम के विराजमान होने पर ये कैसी छोटी बात कह दी। तुम अजब को कहते हो मेरे स्वामी का इशारा हो जाए तो ब्रह्मांड को कच्चे गड़े की तरह फोड़ दूं। और सैकड़ों योजन इस पुराने धनुष को कह रहे हो। ऐसे लेते चले जाऊं। कमलना लाल की तरह ऐसे तोड़ दूं। ये तो आप कैसे कह दिए कि यहां वीर नहीं है। वो तो रघुवंश मुनि प्रभु बैठे हुए हैं।

वो शांत है। अगर आज्ञा कर दे तो पूरे ब्रह्मांड को चखनाचूर कर दो और थर्रा गई पृथ्वी जिस समय लक्ष्मण जी अपने आए तो जनक जी को भी गृहस्थ में बेटी के ब्याह का विषय आया तो चिंतित हुए कि नहीं हुए तो इतने बड़े ज्ञानी महात्मा चिंतित हो गए अपने लोगों को तो चिंता हो ही जाएगी। तो हम वो चिंता श्री जी के चरणों में चढ़ा दें कि भाई आप ही हम आप हमारे पूरे परिवार के स्वामिनी हो आप देखो आप व्यवस्था देख लो हम तो आपके हैं हमें प्रेरित करो कहां जाऊं क्या करूं कैसे करूं समझ रहे हैं ना महाराज जी बस है ना यू लगता है अगर श्री जी से कुछ कहेंगे तो उनको कष्ट ना हो चाहिए देखो श्री जी की अनंत सामर्थ्य है किसी गरीब आदमी से कहने में तो चिंता होगी नहीं होगी अनंत सामर्थ्य वाले प्रीतम उनके अधीन है श्री कृष्ण अनंत सामर्थ्यशाली है ना तो जाके

अधीन सदा ही सावररो या ब्रज को सिरताज हमारे माई श्यामाजू को राग तो हमारी श्यामाजू है तो श्यामा जी के जो प्रीतम है अनंत ब्रह्मांडों के स्वामी है तो उनको इशारा भी नहीं करना पड़ेगा अपनी कही हुई बात वो अपने आप समझंगी तो उनको दुख तो होने वाला नहीं गरीब थोड़ी है हमारी श्री जी कि यार ₹100 मांगा तो यार परेशाली आ जाएगी और बलशाली उनके प्रीतम है अनंत ब्रह्मांडों का भार अपने सर पर शेष रूप में भगवान ऐसे धारण किए जैसे सरसों का दाना तो वही तो है श्री कृष्ण ही के

अंश से तो बलराम जी हैं श्री कृष्ण ही का अंश तो संकर्षण भगवान है तो अनंत ब्रह्मांड उन्हीं के रचे गए हैं और उनको कोई मेहनत नहीं पड़ी तो लक्ष्मीपति भी तो हैं वो तो हमारी कामना कोई ना कोई अर्थ की होगी कोई संकट निवृत्ति की होगी कोई समस्या होगी तो समस्या का समाधान हम किससे कराएंगे जब हम आपके सेवक हैं भाई नौ नौकर की समस्या पड़ेगी तो मालिक से ही कहेगा तो अब वो मालिक कंजूसी करे तो बात अलग है तो हमारे प्रिया प्रीतम कंजूस तो है नहीं अति उदार वि सुंदर सुरत सुर सुकुमार जैसे ही हरिवंश करो दिन दो अचल विहार तो अगर हमको कोई बात पड़ेगी तो हम जाएंगे कहां किससे कहेंगे अपनी श्री जी से ही कहेंगे तो कहना भी श्री जी से ही चाहिए यद्यपि एक स्थिति ऐसी है जहां नहीं कहना बनता क्योंकि जब सब आपका है तो मैं क्या कहूं मेरे तो सुख के विषय आपको प्रिया प्रीतम पर अभी जिम्मेवारियां है बच्चे हैं पत्नी है परिवार है तो हम श्री जी से ही कहे एक स्थिति है जहां कहना नहीं बनता वहां तो प्रेम सहित होलसाद सेवा श्यामा श्याम की कीजे मन

भात दिन प्रति अनुराग सो प्रतिपद अनुराग से युक्त होकर केवल श्यामा श्याम को रिझाने की बात श्यामा श्याम से श्यामा श्याम के जाने की बात कि श्री जी हमें ऐसा मन दे दो जिससे हमें यह पता चले कि आपको कब कौन कैसे सुख पहुंचा सके। श्री जी हम पर ऐसी कृपा करो हम ऐसे योग्य हो जाए कि आठों पैर आपकी सेवा में मगन रहे। ऐसी मांग आगे चलकर आए आएगी। अभी जो मांगे हैं वो शरीर है, पत्नी है, पुत्र है, परिवार है। तो हम कुछ बकाया ना रखें। सब कुछ उन्हीं में जोड़ते चले जाए। इसी से भगवत प्राप्ति हो जाएगी।

आप चिंता ना करो। बहुत उदार और बहुत बड़ी सीरीज है। बहुत बड़ी है। उन्हीं के अंश से सब शक्तियां है। उन्हीं के अंश से की कृपा कर जल्दी से जल्दी हो गई। ये भी श्री जी के ऊपर छोड़ो। जहां राखो ता रहो मान सुखरास है। आकांक्षा करनी है। पर ये भी छोड़ देते हैं कि आप जहां रखोगे अब तो मैं आपकी हूं। हम कोशिश करेंगे मांगेंगे। आपके चरणों का सानिध्य लेकिन आप जहां रख रहे हो भगवत रसिक जी का है जहां राखो ता रहो मान सुखरासे जब तक जहां रखोगे मैं राजी रहूंगा पर मैं हूं आपके हरिवंश महाप्रभु भी कहते हैं यत्र यत्र मम जन्म कर्मभ नारके परमे पदे थवा राधिका रति निकुंज मंडली तत्र तत्र हृद में विराजता मेरे कर्म के अनुसार जहांजहां मुझे भेजो चाहे वो नरक तुल्य हो या परम पद हो पर हे किशोरी अपने परिकर के सहित आप हमारे हृदय मेंित हो राधिका रति निकुंज मंडली तत्र तत्र आप दिल्ली में रखो कोलकाता में रखो विदेश में रखो पर आप हमारे हृदय में सदैव स्फुरण के रूप में रहो बिसरियो ना बिसारी हो यही दान मोहे देव श्री हरिवंश के लाडले मोहे अपने कर ले सुनीता जी सूरत से गुरुदेव आपके चरणों में प्रणाम महाराज जी परमार्थ के लिए हमारा क्या पुरुषार्थ हो जो पुराने प्रारब्ध के बंधन कट जाए और भक्ति मार्ग पर हमारी दिनचर्या के क्या नियम होने चाहिए इसमें?

पहली बात तो समस्त पुरुषार्थों का परम पुरुषार्थ भगवान का नाम है। हम जितना नाम जप करेंगे उतना ही वह हमारे प्रारब्ध को भोगने की सामर्थ्य देगा और पीछे के संचित कर्मों को भस्म करेगा और क्रियामाण पवित्र हो ऐसा हमको ज्ञान देगा। नाम जप करने से जितना हम नाम जप करेंगे और सबसे ज्यादा कमी यही है कि नाम जप नहीं होता और सब प्रपंच हो सकता है और सब हो सकता है लेकिन घंटा दो घंटा एक तार नाम जप देखो आप करके देखो सबसे कठिन काम है मानो हम आपको बोल रहे हैं राधा अब आप दो घंटे 24 घंटे में दीजिए कि जिसमें राधा नाम का विस्मरण ना हो एक तार राधा नाम चलाओ राधा राधा राधा राधा राधा दो घंटे दिमाग तुम्हारा देखो ना कैसा तुम्हारा दिमाग हो जाएगा।

बिना संयम के आप ऐसा नहीं कर सकते। आपका ब्रह्मचर्य ठीक होना चाहिए। आपका आहार ठीक होना चाहिए। आपके व्यवहार ठीक होने चाहिए। तभी आपके नाम में रुचि होगी। यदि शरीर पवित्र नहीं, विचार पवित्र नहीं तो फिर भजन कैसे हो जाएगा? भजन परम पवित्र है। भोजन सुधार। अब आजकल लोग भोजन पर सुधार की दृष्टि क्या पशुता सी चल गई है। कैसे भी पेट भरे स्वाद के लिए वो कहीं भी खा सकते हैं। यह नहीं देखा जा रहा है कौन बना रहा है, कैसे बना रहा है, कितना अपवित्र है, कैसे है और वो बस गरम गरम जहां स्वाद वाली बात ना तो सब होटल का पसंद करने लगे।

अब होटल का भोजन हम कहते हैं पेट भले भर जाए लेकिन ना वह स्वास्थ्य वर्धक है और ना वो बुद्धि शुद्ध रहने देगा। आपकी बुद्धि को भ्रष्ट करेगा। क्योंकि बनाने वाले किस भाव के हैं? बनाने वाले कैसी पवित्रता रखते हैं? भोजन अब आपके सामने तो फ्राई करके दाल आ गई। अब वो पांच दिन से उबली वही रखी। फ्रिज में पांच दिन से उबली है और पांच दिन से जो गया उसको फ्राई करके दिया वह आपके लिए स्वास्थ्य के लिए भी ठीक नहीं तो भक्ति करने के लिए परमार्थ के लिए आहार शुद्धि भोजन शुद्ध होना चाहिए आपका देखना ठीक होना चाहिए हम पूरी भक्ति की मूल जड़ आपको बता रहे हैं।

अगर आपका देखना सही नहीं है। मान लो आप टीवी देखते हैं, टीवी में गंदी बातें मोबाइल में देखते हैं, लैपटॉप में गंदी बातें देखते हैं तो आप भूल जाओ कि आप भक्ति करोगे। भक्ति नहीं होगी, भजन नहीं होगा। चिंतन वही चलेगा जो हम देखते हैं। आप गंदी बातें सुनते हैं। आप गंदी बातें बोलते हैं तो आपका विचार भी गंदा ही रहेगा। देखना सुनना बोलना भक्ति में तीन का बहुत बड़ा प्रभाव है। कथन श्रवण सुमिरन सेवन चित लावह अर्चन बंधन अरदास संतन सक्ष और आत्मा समर्पण यह नव लक्षण भक्ति बढ़ाई तब तिन प्रेम लक्षणा पाई फिर प्रेम का जागरण होता है पहले हमारा श्रवण ठीक हो इसीलिए महाप्रभु हरिवंश चंद्र जो तीन बातों को कह रहे हैं रसना कटो जो अन रटो निरख अन फूटो नैन श्रवण फूटो जो अन सुनो श्री राधा जसन हमारी जुबान कट जाए जो प्रियाल के सिवा कुछ बोले ले नेत्र फूट जाए जो प्रिया लाल के सिवा कुछ देखे।

कान हमारे फूट जाए जो प्रिया लाल के सिवा कुछ सुने। अब मोबाइल में बहुत सब प्रपंच भरा हुआ है संसार का। जो लोग मोबाइल का प्रयोग दुरुपयोग कर रहे हैं, गंदी बातें देख रहे हैं, गंदी बातें सुन रहे हैं, वही गंदी बातें विचार में आएंगी। वही चेष्टा होगी। भक्ति क्या बनेगी? नाटक हो जाएगा। भक्ति का नाटक हो जाएगा। इसलिए देखना, सुनना, बोलना इस पर संयम लाओ। खाना और पीना इस पर संयम लाओ। उठना बैठना किसके साथ बैठ रहे हो? क्या व्यवहार है? अगर कुसंग है तो सत्संग का सेवन करो।

कुसंग का त्याग करो। तब आपके अंदर भाव पवित्र होंगे। नाम जप करोगे तो परमार्थ की पुष्टता आएगी। और भगवान की भक्ति खूब लीला कथा सुनने से भगवान की लीला कथा का गायन करने से भगवान की सेवा करने से अर्चना वंदना साष्टांग दंडवत और उनका नाम कीर्तन करने से इससे भक्ति पुष्ट हो जाती है अगर हमारा यह आचरण शुद्ध ना हुआ तो नौटंकी हो सकती है भक्ति की नाटक हो सकती है भक्ति की दंभ पाखंड हो सकता है लेकिन वह भक्ति नहीं होगी जिससे हमारे अंदर आनंद आवे और जब तक आनंद नहीं आएगा तब तक पाप कर्म रुक नहीं सकता।

ये ध्यान रखना बिना हृदय के आनंद के हमारे बाहरी जो पाप कर्म है वो नहीं रुक पाएंगे। वो मतलब केवल बातें बनाना होगा। शुद्ध भक्ति नहीं होगी। इसलिए आहार शुद्ध करो। खानपान व्यवहार शुद्ध करो। ऐसे लोगों का संग त्याग करो और मोबाइल सबके पास रहता है। इसलिए इसका नाम लिया है। इसका दुरुपयोग मत करो। इससे सत्संग सुनो। इससे अच्छी बात करो। अह अनावश्यक चीज़ें देखना अनावश्यक मतलब अब तो हमको तो ज्ञान नहीं था। एक दिन एक भक्त ने यहां शिकायत की कि पैसे वाला उसमें गेम है। क्या पैसे वाला जुआ जिसे गांव में जुआ कहते हैं।

पैसे वाला उसमें गेम है और उसमें लाखों रुपया हारकर लोग डिप्रेशन में जाकर के कहीं ना कहीं वो अपने शरीर को नष्ट करने की प्रक्रिया पे आ रहे हैं। तो क्यों गलत प्रयोग करते हो? मोबाइल से अच्छा प्रयोग होता है। देखो मोबाइल ना होता तो आप यहां ना आते। मोबाइल से सत्संग सुनकर के आप यहां आए हैं तो उससे सही मार्ग चयन करो। उससे सही बातें सुनो। देखो मोबाइल है कोई खतरा है। आप तुरंत दूसरों को सहयोग कर सकते हैं। अपने को बचा सकते हैं। फोन कर सकते हैं। सूचना दे सकते हैं।

बहुत से उससे लाभ भी हैं। तो लाभ प्रकरण को लीजिए। जो हानि करने वाला प्रकरण उसको मत छेड़िए। उसमें सब कुछ है। तो उसको गंदी बातें मत देखिए। तो जिनके पास मोबाइल है वह सावधान रह दुरुपयोग उसका ना करें सदुपयोग करें और अपना संग देखें अगर गलत संग है तो हमारा भजन में बहुत बाधा पड़ेगी जाके संग कुमति मति उपजय करत भजन में भंग तजो रे मन हरि विमुखन को संग तो विमुख जनों का संग त्याग करो भोजन सही करो और नाम जप करो देखो भक्ति रंग लाने लगेगी अब नी सही ना हो तो बिल्डिंग कितनी भी बड़ी हो गिरी जाएगी ब्रह्मचर्य नाम जप ये दो परमार्थ की नीव समझ लो।

गृहस्ती में हो तो भी संतान उत्पत्ति के लिए शास्त्र आदेश करता है। शेष समय ब्रह्मचर्य रहो तो आपकी स्मृति, आपका बल, आपकी चेतना जागृत रहेगी। बड़े से बड़ा दुख सहने की सामर्थ आती है ब्रह्मचर्य में। अगर ब्रह्मचर्य है तो बड़े से बड़े दुख में भी आप अपनी दिनचर्या नहीं रोकेंगे। आपके अंदर पावर रहेगा। खानपान वाला पावर अलग है। वो तो चर्बी बढ़ाएगा। ब्रह्मचर्य अध्यात्म पावर पुष्ट। ब्रह्मचर्य संकल्प पावर पुष्ट ब्रह्मचर्य सर्दी गर्मी बरसात पीड़ा इनको सहने की सामर्थ्य उसमें आती है।

इसलिए हमारी प्रार्थना है कि अगर वास्तविक जीवन सही आनंद में जीना है तो गृहस्थ हो तो उचित ब्रह्मचर्य हम नहीं कह रहे कि अनैष्टिक ब्रह्मचर्य उचित ब्रह्मचर्य समय पर अपने गृहस्थ धर्म में उतर गए नहीं तो ब्रह्मचर्य से खानपान पवित्र है व्यवहार पवित्र है भगवान की लीला कथा गा रहे हो नाम चर्चा भगवान की महिमा सुन रहे हो नाम जप रहे हो अब इसी से काम हो जाएगा अंदर से नाम जप करो और बाहर से जो सेवा कर रहे हो भगवान को अर्पित कर रहे हो पवित्र आचरण पवित्र भोजन भगवान को अर्पित किया हुआ इसी से भगवत प्राप्ति हो जाएगी।

नाम पर लगो नाम देखो अंदर जप करके अगर नाम जप नहीं हो रहा तो सब बेकार सब नाटक हो जाता है। माया बहुत बड़ी बलवान है। वह फिर नहीं चलने देती। नाम जप नाम जप से ही सब काम बनेगा।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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