एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1341
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
सचिन जी पुणे महाराष्ट्र से जय हरिवंश जी राधे श्री हरिवंश महाराज जी राधे-राधे आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी अजपा साधना कैसे सिद्ध करें उसका प्रयास कैसे करें कृपया मार्गदर्शन करें देखो पहले हमारे हमारे अंदर कर्ता भाव है। जब तक हम कर्ता भाव को नहीं मिटाएंगे तो अजपा तक कैसे पहुंच पाएंगे? देहाभिमानी कर्तत्व भाव रखने वाला अजपा में स्थित नहीं हो सकता। तो पहले हम जप की प्रक्रिया में आवे। पहले वाचिक जप फिर रूपांशु जप फिर मानसिक जप पहले वैखरी वाणी से जप फिर मध्यमा फिर पश्यती फिर परावाणी परावाणी ब्रह्म स्वरूप है जैसे दिल धड़कता है हम धड़काते नहीं ऐसे ही वो स्वयं स्फुरित होता है रोम रोम रगरग आनंद से प्रफुल्लित होकर इष्टाकार वृत्ति और चल रहा ये सिद्ध पुरुष का लक्षण होता पहले वैखरी जो हम बोल रहे हैं राधा राधा राधा कृष्ण कृष्ण नारायण नारायण नारायण हरि हरि जो भी फिर उपांश जिभ्या का अग्र भाग तालु के पास लगा हो नाम चल रहा हो इसे उपांश कहते हैं फिर मानसिक चल रहा अंदर अब ये निरंतर चले अव्यावृत भजनात अखंड भजन तब वह वृत्ति भगवदाकार हो जाती है।
जब सोहम अस्मित वृत्त अखंडा जब वृत्ति भगवत स्वरूप हो गई अब अजपाजाप होता है। पहले प्रयास वो बिना प्रयास के होता है। पहले साधना वो सिद्ध अवस्था होती है। अजपाजाप चलने का मतलब है सिद्ध पुरुष देहाभिमान गलित हो चुका है। कोई विषय आकांक्षा नहीं रह गई। कोई जागतिक कामना मान प्रतिष्ठा कुछ नहीं रह गया। एकमात्र प्रभु जो ममता रहित है, अहंकार रहित है, निर्ममो निरहंकारा वो परमात्मा स्वरूप अजपा जाप में प्रवेश पा जाता है। तो जो गुरु ने दिया वही निरंतर चलने लगे उसे अजपा जाप कहते हैं।
मैं जप नहीं रहा हूं। अजपा और जाप हो रहा है। हम केवल देख रहे हैं, सुन रहे हैं, साक्षी मात्र हैं। वह हो रहा है। उसे अजपा जाप कहते हैं। तो पहले कर्ता भाव में आओ क्योंकि कर्ता भाव में हो। पहले करो फिर होने लगेगा। साधक को करना पड़ता है। सिद्ध का स्वतः होता है। समझ रहे हैं आप? तो पहले प्रयासत रहो। राम कृष्ण हरि जो नाम प्रिय है। पहले जिभ्यास से रटो फिर उसको उपांश में लाओ। फिर उसे मानसिक में लाओ। मानसिक से फिर वह रोम रोम रगरग में फैल जाता है। कई बार हम सुनाते हैं कि नाम स्वास दो बिलक चलत है।
इनको भेद नमो को भावे स्वास नाम ही स्वासा नाम स्वास को भेद मिटावे रोम रोम और रग रग बोले तब स्वाद नाम को पावे तो वो जो स्वाद मिल गया ना भगवदाकार वृत्ति जैसे सोते हुए पुरुष में जपने की क्षमता नहीं होती क्योंकि सुशुप्त में ज्ञान नहीं रहता लेकिन अभ्यासी जो महापुरुष हैं जिनका नाम में अभ्यास है सोवत हु रसना रटे राधा कृष्ण कृष्ण सुनाम श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी राधा कुंड में वो सो रहे हैं पर उनके श्री मुख से निकल रहे राधा कृष्ण राधा कृष्ण राधा कृष्ण राधा कृष्ण ऐसे ही बहुत से महान सन्यासी जनों को जो सिद्ध महापुरुष हुए ओम ओम ओम ओम स्वास स्वास तो जब अतिशय रगड़ करे जो कोई तो अनल प्रगट चंदन ते होई चंदन को भी घर्षण करे तो अग्नि पैदा हो जाए तो जब हम नाम जप करते हैं तो हम में दिव्य शक्ति आ जाती है।
वो स्वतः भगवान नाम चलने लगता है। रोम रोम आनंद से प्रफुल्लित रहता है। तो वह वृत्ति पहले आने के लिए हम हर श्वास में अधिक से अधिक नाम जपने का प्रयास करें। मन ऐसे थोड़ी जपने लगता है। जब निर्वासनिक मन होता है तब वो नाम जपने लगता है। अभी तो हमें बिना मन के भी जपना पड़ेगा। लड़ाई लड़नी पड़ेगी। तो हम जपे नाम और हमारा मन कर रहा है विषय चिंतन। जब नाम हम जपे और मन भी जपे नहीं कर में माला फिरे और जिभ्या और मनवा जगत में सो तो सुमिरन ना आए सही सुमिरन तो तब होगा जब हाथ का माला छूट जाए और मन के माला से चल रहा है हमें गणना से मतलब नहीं कर का माला डाल दे और मन का माला फेर तो अब लड़ाई तो बहुत जोर की कहने में तो सरल है।
चार शब्दों में कह दिया लेकिन करके देखो युद्ध बहुत बड़ा है। मन घसीटेगा विषयों की तरफ। मन को अच्छा नहीं लगेगा नाम जप करना। धीरे-धीरे उसे जबरदस्ती जपाते जपाते फिर वो जैसे जब बिल्कुल भजन नहीं करते थे। तब देखो और आज जब भजन करने लगे हो तो मन लगने लगा ना 10 मिनट 20 मिनट आधा घंटा लगने लगा ना। 24 घंटे में अगर 10 मिनट भी मन लगने लगा है तो हमने अपने दुश्मन पर कब्जा कर लिया है। 10 मिनट भी अगर लगने अनंत जन्मों से माया में लगा था। आज हम उसे 10 मिनट भगवान में लगा रहे हैं।
नाम में लगा रहे हैं। तो हमने अधिकार कर लिया। धीरे धीरे धीरे धीरे जब पूरा मन निर्मल हो जाएगा और पूरा मन भजन में लग जाएगा तो उसी को कहते हैं भगवत प्राप्त महापुरुष। फिर मन जहां भगवदाकार हुआ तो भगवत प्राप्त हो जाता है। फिर तो उसका रोम रोम जब देखो महाराष्ट्र के ऐसे संत हुए श्री तुकाराम जी जहां चरण रख देते समझो वो भूमि से निकलता था विट्ठल विट्ठल विट्ठल जनाबाई जी कंडा जो छापती थी उनके कंडे को कान में लगा के सुनो तो निकलेगा विट्ठल विट्ठल विट्ठल और चोखा मेला जी की हड्डियों से निकलता था विट्ठल विट्ठल विट्ठल ये इतना नाम जप किए कि रोम रोम नस नाड़ियां त्वलचा मांस हड्डी सब नाम में हो गए सब नाम में हो गए।
अभी तो हमारी जिभे नहीं पवित्र हुई है। गंदी बातें बोलने में, अश्लील संभाषण करने में तो कोई हिचक नहीं। प्रपंच की बातें करने में कोई हिचक नहीं। यहां से संभालना शुरू करें। जिभ्या में दो इंद्रियां हैं। एक है वाकेंद्रिय और एक है रस्द्री। रसेंद्र्री को भगवान का प्रसाद पावावे। भोग लगाकर जो भोग नहीं लगता वो चीजें प्याज, लहसुन, माद, मच्छरी सब नहीं खाना चाहिए। तब रस्द पवित्र होती है जब भगवान को अर्पित करके प्रसाद पाया जाता है और वाकेंद्र जब केवल नियम ले ले भगवत चर्चा करेंगे या दूसरे की हित चर्चा करेंगे प्रपंच और गंदी बातें नहीं बोलेंगे तो वाकेंद्र एक एक इंद्री पवित्र हो जाए अभी जपा चलने लगेगा नहीं हां महाराज जी मैं मतलब जब से नाम जप कर रहा हूं ना मन में महाराज जी बहुत डर बन रहा है महाराज जी अब मर जा बहुत हां क्योंकि वो मरेगा ना मन निर्मल होगा ना विषय नहीं मिल रहा ना तो तुम्हें थोड़ी डर लग रहा है।
मन को डर लग रहा है। तुम्हारा जो कुछ भी करता हो तो लग रहा है ये गलत हो रहा है। आप आप जैसे मेरे पीछे पीछे बोल रहे हो कि ये गलत है। ये नहीं देखो देखो नहीं अभी तुम गलत सोच रहे हो। गलत करोगे तो गलत है। नहीं तो सब कुछ गलत थोड़ी है बच्चा। कुछ सोच सोच भी लेता हूं तो गलत मतलब कुछ नहीं क्या गलत सोचते हो? जैसे मतलब किसी को मतलब पहले मैं जैसे नॉनवेज वगैरह खाता था। अब तो नहीं खाता प्रॉपर तो मतलब आप खाता ही नहीं हो एकदम। आप ये समझो अगर गलत सोचोगे तो आप ये समझो प्रेमानंद रूपी भूत तुम्हारे दिमाग में बैठा बदलेगा।
मतलब कोई कोई कुछ बोलता है कोई कुछ खराब बोल रहा है जैसे कहीं गया मैं तो सुन के मतलब मेरे से कुछ निकल गया गलती से मुंह से तो ऐसा लगता है कि क्या बोल दिया रूम पे आके ऐसा लगता है मैं हॉस्टल पे रहता हूं तो ऐसा लगता है रूम पे आके क्या बोल हां बस और थोड़ा सावधानी नहीं ये अच्छा है टेंशन नहीं ये अच्छा है बहुत सावधानी से रहे तो आपसे पाप कर्म नहीं बनेंगे लेकिन सत कार्यों में नहीं डरना है हमको दो बातें देखनी है कि यदि गंदा मन सोचता है तो डरना चाहिए गंदा बोलता है गंदा आचरण की प्रेरणा करता है तो हमें डरना है।
जो डर गया वह बच गया। समझो संसार में जो डर गया वह बच गया। कैसे? समाज का डर, कानून का डर, ईश्वर का डर, गुरु का डर तो आपसे पाप कर्म नहीं होगा। और जो डरा नहीं वो मर गया। वैसे कहते हैं ना जो डर गया वो मर गया। हमारे यहां सिद्धांत दूसरा है। जो डर गया वो बच गया और जो डरा नहीं वो मर गया। अगर आप ईश्वर से नहीं डरेंगे तो पापा आचरण करेंगे ना। आप गुरु से नहीं डरेंगे तो मनमानी आचरण करेंगे ना। आप समाज से नहीं डरेंगे तो आप समाज द्रोही पापा आचरण करेंगे। कानून से नहीं डरेंगे तो आप बहुत बड़े-बड़े अपराध कर सकते हैं।
डर अच्छा है। ईश्वर का डर, गुरु का डर, माता-पिता का डर, समाज का डर। ये मंगल करने वाला डर है। अब इस डर में इतना ना डर जाए कि हम मंगल कार्यों में भी डरने लगे। ऐसा नहीं। जो कार्य हमें करने के लिए आदेश मिले हैं, वह कार्य करना। बहुत पवित्र हृदय हो रहा है। उसमें थोड़ी सी भी गलती बर्दाश्त नहीं होगी। अब उसको आप मतलब टेंशन मत लीजिए। आपको सिर्फ टेंशन में ले रहे हो क्या? महाराज जी मतलब ऐसा लगता है कुछ भी करने जाता हूं जैसे आप ऐसा लगता है कि जैसे नाम जप नहीं हो रहा है तो लग रहा है कि महाराज जी ने मेरे को एक दो बार कहा नाम जप के तब भी नहीं हो रहा तो अब कैसे हो सकता है?
तभी मैं जबरदस्ती करता रहता हूं। नहीं जबरदस्ती ही करते रहो। अभी तो तुम बच्चे हो यार। हम लोगों की जिंदगी व्यतीत हो गई। जैसे लोगों से कहो ना भजन करो। बोले 24 घंटे करते हैं। तो लगे 24 घंटे यहां पूरी जिंदगी निकली जा रही है और 24 घंटे उन्हीं में है लेकिन यह कहने में हमको डर लगेगा कि नहीं 24 घंटे पता नहीं नींद में चलता हो कि ना चलता हो। जागृत में तो हम चला कोशिश कर लेकिन नींद में तो झूठा ना हो जाएगा। तो 24 घंटे चलता है। इस पर मोहर नहीं लगा सकते। इस पर ठाकुर जी को मोहर लगावे गुरुजी मोहर लगावे।
हमारा प्रयास है। प्रयास हमारा है। तो अभी तो बच्चा हो तुम तो जैसे कि नाम छूट गया क्या? तो तद्विणन परम व्याकुल तेति नारद जी कहते हैं भगवान का स्मरण छूटने पर व्याकुलता आना तो ये तो अच्छी बात है। गलत बात सोचने पर भय लगना ये तो अच्छी बात है। किसी से कोई भी बात कहने के बाद उसका चिंतन करना कि मैंने गलत कहा कि सही अगर थोड़ा भी गलत हुआ तो जलन होना ये तो अच्छी बात है। ये तो बहुत पवित्र हृदय की बात है। पहले ऐसा नहीं होता था। पता नहीं कैसा अलग अब नाम जप कर रहे हो तो ऐसा होगा।
पहले थोड़ी नाम जप चल रहा था। अब तो दवाई साथ में चल रही है। हृदय पवित्र शुरू शुरू में जब नाम जप किया तब सब अच्छा हो रहा था। अच्छा लग रहा था। सब चीज मतलब बढ़िया हो रहा था। मतलब अब तो जलन लग रहा है। हां अभी और बढ़ेगी जलन। ये थोड़ा मार्ग जलन का है। और जहां सारे पाप भस्म हो गए तो नाच पड़ोगे। पायो जी पायो मैंने राम रतन धन पायो। ये एक मार्ग डर वाला निडर अवस्था में पहुंचाता है। यत विष परिणाम अमृतोपम तत सुखम सात्विकम स्मृतम जिसकी शुरुआत विष जैसी लगे उसका परिणाम अमृत होगा यह है सतोगुण यह है भजन का मार्ग इसमें विष जैसा लगता है शुरुआत और परिणाम अमृत जैसे और भोगों में अमृत जैसा शुरुआत लगती है और परिणाम बड़ा विषवत होता है यज्ञ अमृतोम परिणाम विष तत सुखम राजसम स्मृतम जो राजसिक भोग आदि है इनमें शुरुआत अमृत जैसी लगती है अरे भोग ले तुरंत बड़ा सुख परिणाम बड़ा बड़ा दुखद होता है।
तो इसलिए बहुत अच्छे चल रहे हो। इतना मतलब जलन पैदा हो गया था ना कि मतलब इधर आ गया। अच्छा जलन किसको होती है? विवेक धारण कर जलन किसको होती है? मन को तो गलत जन्म जन्मांतर से करता कौन चला रहा है? मन करवाता उसको जलने दो। शांत रह तू यम ही भगवान ने सब कुछ लिख दिया है यम ही व्यथते पुरुषम पुरुष सम दुखा सुखाध कल्पते जो हृदय की जलन से व्यथित नहीं होता उसे सह जाता है वही अमृत पद का अधिकारी होता है बहादुर बन दुखायर बन गया अरे हृदय में जलन होती है अरे ऐसा होता है सब कष्ट सहते हुए भगवान के मार्ग में चला जाता है हे प्रभु आपके द्वारा दिया हुआ हर विधान मेरे लिए मंगल है क्या रोता गाता घूम रहा है।
हृदय जलता है। यह हो रहा है। यह तो सब प्रोसेस है उसका। देखो जब हमें पता होता है कि मेरे छाती में फोड़ा है तो रुपया देके चिरवाते और महीनों उसमें पट्टी बंधवाते रहते हैं। लेकिन हमको पीड़ा होती पर दुख नहीं होता। क्यों? क्योंकि हम जानते हैं एक महीना बाद हम ठीक हो जाएंगे। ऐसे इसमें जलन होती पर सुख होता है आंतरिक। क्योंकि हम सतमार्ग में चल रहे हैं। भजन में चल रहे हैं। ये पापाचरण के द्वारा की हुई जो मलिनता है वो जल रही। एक दिन हम आनंद में पहुंच जाएंगे और गंदे कामों में तत्कालिक सुख दिखाई देता है लेकिन हृदय जलता है वो जीवन भर जलता रहेगा यह थोड़े दिन जलेगा और नाच पड़ेगा मन आनंदित हो जाएगा अशोक जी राधे राधे-धे महाराज जी [गला साफ़ करने की आवाज़] महाराज जी मैं YouTube के माध्यम से आपको ऑस्ट्रेलिया में सुन रहा हूं।
आपके द्वारा मार्गदर्शन जो करते हैं उसका पूर्ण रूप से पालन करने की कोशिश करता हूं। महाराज जी मेरा एक संशय है। गीता में कहा है कि आत्मा अजर अमर है। ना उसे जलाया जा सकता है ना काटा जा सकता है। ना गीला किया जा सकता। लेकिन गरुड़ पुराण में नरक में आत्मा को गर्म तेल में तलने और काटने की बात कही गई है। ऐसे में कौन सा नहीं अब उसको समझना है जो गीता जी में कहा नैन छिनती शस्त्राण नैन दति पावक न चैन क्लेदपो न सोशति मारुतः वो सच्चिदानंद आत्म स्वरूप को कहा गया है और जो गरुण पुराण में आत्मा संबोधन किया गया अंतःकरण के अहम धर्म को अंतःकरण में मन बुद्धि चित्त अहंकार वो जो अहंकार है एक जो शुद्ध मैं है वह ब्रह्म तत्व है।
जो मैं है वह ब्रह्म तत्व है। जो मैं के साथ लग के क्रियाएं हुई है वह अंतःकरण का अहंकार है। तो अंतः स्थूल शरीर तो यही छूट जाता है। अंतःकरण चतुष्टय और इंद्रियां और वो आत्म तत्व उसके साथ वही जाता है नर्क में। और भोग भोगता है अंतःकरण। जैसे तो थप्पड़ लगा स्थूल शरीर में। लेकिन स्थूल शरीर को कभी दुख नहीं हो सकता। कभी नहीं हो सकता। दुख हुआ सूक्ष्म शरीर को मन को। मन ने कवर किया कि गाल पर थप्पड़ पड़ा। बुद्धि ने निश्चय किया कि गाल पे थप्पड़ पड़ा। मन ने उसके दुख को अनुभव किया।
अब जो अंदर इस देह में अभिमान किए हुए जीवात्मा है। अब वो विकल हो गया। अब वो विकल जैसे दीवाल में अभी हथौड़े से तोड़ने लगो। मेरे को क्या फर्क पड़ेगा? लेकिन मेरा अपनापन होने के कारण हम व्याकुल हो गए। तो इतना घोर अपनापन गाढ़ अपनापन स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर में भ्रम से आत्मा ने कर लिया है। अब जब इनको जलाया जाता है तो उसको भारी दुख होता है। जैसे यहां स्विच हो अभी भारी कष्ट महसूस होगा। और यहां शून्य कर दो और गड़ासे तिल तिल काट दो कोई कष्ट नहीं होगा।
क्यों? क्योंकि मन इस त्वगेंद्र के साथ यहां पहुंच नहीं पा रहा है। सारा का सारा दुख सुख का अनुभव, जन्म मृत्यु का अनुभव, नरक स्वर्ग का अनुभव केवल मन को होता है आत्मा को नहीं। वहां जो आत्म शब्द का प्रयोग किया गया वो अंतःकरण को कहा जाता है। वो उस आत्म तत्व को नहीं जिसे नैन छिनते शस्त्राण नैनम जहां आग्नेस्त्र नहीं जला सकता वायुस्त्र नहीं सुखा सकता और वरुणास्त्र उसे गीला नहीं कर सकता ऐसी आत्मा को कौन तपा सकता है? अंतःकरण को जैसे स्वप्न में आपको किसी ने पकड़ा और गड़ा से काटना शुरू किया।
क्या आपको लगता है मैं स्वप्न में हूं? आपको ऐसे ही लगता है कि बिल्कुल काटा जा रहा हूं। बिल्कुल वैसे ही भय लगेगा जब गड़ासा उठाएगा। अगर जगा दिया जाए तो हंस दोगे कि नहीं? तो क्या उस समय तुम अनुभव नहीं कर रहे थे कि तुम्हें मारा जा रहा है। जो सपने सिर काटे कोई और बिन जागे दुख दूर ना। ये सब स्वप्न है। उमा कहूं मैं अनुभव अपना। भगवान शिव का अनुभव सत हरि भजन ये जगत सब सपना आ ब्रह्म स्तंभ पर्यंतम सर्वम मायामयंम जगत तो नर्क भी सपना स्वर्ग भी सपना मृत्यु लोक की हर क्रिया सपना जेह जाने जग जाए हिराई जागे जथा स्वप्न भ्रम जाई लेकिन स्वप्नी पुरुष जो पिट रहा है उस समय उसे से कहो तुम पिट नहीं रहे हो तो कहेगा पागल हो यहां नस नस पीड़ा दे रही और उसे केवल जगा दो तो खुद कहेगा नहीं मैं पिट नहीं रहा था ये तो भ्रम था ऐसे ही अज्ञान की धरा में मोह निशा सब सोव निहारा देख स्वप्न अनेक प्रकारा ये मोह के कारण ही नर्क स्वर्ग और ये सारा खेल है मोह गए बिन राम पद हो न दृढ़ अनुराग मोह नष्ट हो जाए तो अभी आप देखोगे ना कोई यहां स्वर्ग है ना नर्क है ना सत है ना असत एकमात्र भगवान विराजमान है।
समझ रहे हैं? एकमात्र भगवान ये सत असत का भेद नहीं। देखो गोस्वामी जी ने जाना सिया राम मैं सब जग जानी करो प्रणाम जोर जुग पानी। सब सियाराम है। हमें क्या दिखाई दे रहा है? स्त्री पुरुष जड़ चैतन्य अच्छा बुरा दिखाई दे रहा है ना? तो अभी हम सो रहे हैं। अभी हम स्वप्नी पुरुष हैं। जब जग जाएंगे तो केवल राम में श्याम में गोपीजन कहती जित देखो तित श्याम मई मैं जिधर देखती हूं उधर श्याम सुंदर दिखाई देते हैं। तो नर्क में जो वर्णन है कष्ट का वो अंतःकरण रूपी आत्म भाव का है ना कि आत्म तत्व का है।
आत्म भाव माने होता है अपनापन। अपनापन करके शरीर को जो को जो पाप किए शरीर तो यही रह गया लेकिन वो अंदर की मशीन तो पूरी जा रही ना अंतःकरण इंद्रियां और स्वभाव कारण शरीर और सूक्ष्म शरीर वो जाके वहां यातना देह मिलता है और कष्ट भोगता है कारण शरीर सूक्ष्म शरीर जहां के स्वर्ग में उसे देव देह मिलता है वहां सुख भोगता है कारण शरीर और सूक्ष्म शरीर आके अमानव देह मिलता है फिर क्रियाओं में लग जाता है वो यात्रा बंद करने के लिए जब तक ज्ञान नहीं होगा जब तक भगवत भक्ति नहीं करोगे।
यह दो ही मार्ग प्रशस्त है जिनमें तत्व बोध होने पर जीवन मुक्त या भगवान के चरणों का साक्षात्कार होने पर जीवन मुक्त मम दर्शन फल परम अनुपा जीव पाव निज सहज स्वरूपा सहज स्वरूप कौन सा जो शंकर सहज स्वरूप समारा तो ला समाधि अखंड अपारा वही आपका स्वरूप है समझ पाए आप अभी समझ पाए भगवत गीता के अनुसार मृत्यु अंत नहीं है तो क्या मृत्यु का भय उचित है मृत्यु का भय जानते हो कैसा होता है कैसा होता पत्नी का दुलार, पुत्र का दुलार, रुपैया का अहंकार, घर मकान की प्रीता यह है मृत्यु का दुख और कोई मृत्यु का दुख नहीं।
ट्रांसफर में किसी को परेशानी नहीं होती। बंगला गाड़ी सब सरकारी है। 5 मिनट में अटैचू उठाया चल दिया कि अगली नया बंगला गाड़ी मिलेगी। लेकिन अपना मकान छोड़ना पड़े तो। तो तुमने सरकारी तो माना नहीं। संतजन सरकारी मानते हैं। बोले आश्रम किसका? बोले राम जी का। बोले आप सोफा में बैठे हुए सब कैसे बोले राम जी की कृपा सरकारी सरकारी अभी ट्रांसफर करे कोई परेशानी मरने से सब जग डरा मेरो मन आनंद कब मर कब भट हो पूरन परमानंद मृत्यु इसलिए भयाव लगती है कि मृत्यु की तैयारी नहीं की और जहांजहां राग फैलाया वो सब छूट रहा है इसलिए मृत्यु भयाव लगती नहीं मृत्यु भगवान है सब कुछ हरण करने वालों में मैं मृत्यु हूं भगवान श्री कृष्ण जी विभूतियों में वर्णन करते हैं मृत्यु का मतलब ट्रांसफर अब बताओ कौन कौन मरता है?
कोई नहीं मरता। पंचभूत पंचभूतों में मिल जाते हैं। अंतःकरण जीव के साथ अपने कर्म अनुसार चला जाता। मरा कौन? कुछ नहीं। ट्रांसफर नया कपड़ा पहनने को मिला। पुराना उतार दिया। आपको ये नया मानो जीवन मिला। अब आपने इसे पुराना तो किया नहीं। पुराना तब माना जाएगा जब आपने भगवान के दासत्व को प्राप्त कर लिया। तो जब भगवान के दास भाव को प्राप्त हो रहे तो मनुष्य शरीर छोड़ने में कोई परेशानी नहीं है। जैसे बड़े गजराज के गले से फूलों की माला टूट कर गिर जाए उसे पता ही नहीं चलता।
ऐसे भगवान के भजन करने वाले को शरीर छूटने के समय कोई कष्ट नहीं होता। नहीं तो जनमत मरत दुशा दुख होई। तो यह दुशा दुख है कि हमारी प्यारी पत्नी छूट रही है। पुत्र छूट रहा है। मकान बैंक बैलेंस सब छूट रहा है। जहां मर के जाना है। कोई पता नहीं कहां जाना है। अब भय नहीं लगेगा तो और क्या लगेगा? तो मृत्यु अंत नहीं है। तो मृत्यु से भय इसलिए लगता है कि हमारा राग जो फैला हुआ है और भगवान के भक्तों का भगवान में राग होता है। हमें पता है हमें कहां जाना है। हमारे पास पास है।
अब हमें कोई डर नहीं। हमें अपने प्रभु के पास जाना है। प्रभु हमारे आएंगे मृत्यु रूप में लेने के लिए। और कोई थोड़ी मृत्यु आएगी। प्रभु आएंगे तो क्या डर लगे? अपने प्रभु से क्या डर लगे? नरसिंह भगवान से दुनिया डर रही थी। प्रह्लाद जी डरे क्या? दौड़ के जाकर गोद में बैठ गए प्रभु के। तो मृत्यु हमारे भगवान है। कोई और नहीं है और मृत्यु किसी की नहीं होती। ट्रांसफर होता है। परिवर्तन होता है। समझ में आ रहा है? धर्मेंद्र जी राधे-राधे। महाराज जी मैं सिंगापुर में 10 साल से रहा हूं।
आपके सुझाव से मैंने आध्यात्मिक जीवन अपनाने की कोशिश की है जिससे मेरे जीवन में परिवर्तन आया है। महाराज जी मेरे ऑफिस में मुझे अभी भी उन लोगों के साथ बातचीत करनी पड़ती है जो दूसरों की बुराई करते हैं। मांसाहारी हैं, शराब पीने वाले हैं। दोपहर के भोजन के लिए उनके साथ रहना पड़ता है। ऑफिस में अधिकांश लोग भौतिकवादी हैं। क्या यह मेरे आध्यात्मिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डालेगा? विशेष रूप से जब लोग शक्तिशाली हो मतलब पूरी लंका अलग थी और विभीषण जी अलग थे। अरे पूरी लंका अलग थी।
विभीषण जी अलग थे कोई प्रभाव नहीं पड़े जो रहीम उत्तम प्रकति का कर सकत कुसंग चंदन विष व्यापत नहीं लपटे रहत कोई फर्क नहीं पड़ता तुम अपना पवित्र भोजन पाइए पवित्र विचार रखिए उनसे हंसिए बात कीजिए वो समझ ना पावे पर आप अपने रंग में रहिए वो अपने रंग में रहे विरोध करना नहीं क्योंकि ऑफिस में एक ही में रहना है किसी से कोई विरोध नहीं करना अपने को गुप्त रख के वो कहे ये खाओ पियो नहीं खाना पीना लेकिन हम उनका विरोध भी नहीं करेंगे। उसी टेबल पर वह खा रहे हैं और उसी टेबल पर हम पा रहे हैं।
कोई फर्क नहीं। बिल्कुल यह हम सुलझी हुई आपको बात बता रहे हैं। हां नहीं बिल्कुल नहीं अपना कुछ बोलते हैं तो उनको ऐसा लगता है कि उनको बुरा लग रहा है। हां नहीं आपको अच्छा नहीं बोलना है। उनसे अच्छा नहीं बोलना है। देखो अपने को बचाने के लिए हमको उनके जैसा बनना है। उनके सामने अंदर से बिल्कुल अपना मार्ग अलग है। लेकिन उनके सामने अपने को नाटक करना है। सब में भगवान है। गुरु शिष्य का नाटक माता-पिता का नाटक पुत्र का माता-पिता प्रति क्या करता पुत्र का नाटक मित्र का नाटक हमें नाटक करना ये जग नाटक वैभवा ये सत्य नहीं है ये नाटक है तो नाटक में हमको जो रोल मिला है मान लो 50 मित्र हैं हम हसेंगे मजाक करेंगे खाएंगे पिएंगे लेकिन हम पवित्र खाएंगे पिएंगे और पवित्र हंसी मजाक करेंगे और उनके कटाक्षों का हमारे ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ेगा कोई यह जान ना पावे कि आप किस कोटि के हो तभी तो चतुरता भाई बाहर क्योंकि अगर भक्ति का माहौल है
10 भगत है तो जान जाएंगे तो कोई परेशानी लेकिन 10 के दसों रजोगुणी संसार मार्ग में चलने वाले हो आप एक अकेले तो फिर आपको बहुत सावधान रहने की जरूरत है कोई असर नहीं पड़ेगा हमारे अंदर जो लक्ष्य चल रहा है उसको कौन बदल सकता है अंदर राधा राधा बाहर बोलेगा हेलो बिल्कुल उनके जैसा नहीं हां मस्त एकदम चतुर वही है जो अपने आप को संसार के बंधने से बचा ले हां ऐसा नहीं कि मित्र लोग पे सर दबाव डालें हम गलत भोजन पावे गलत नहीं मेरी रुचि नहीं आप पाइए आपका विरोध नहीं पर मेरी रुचि नहीं है विजेंद्र सिंह जी श्री हरिवंश गुरु जी गुरु जी जीवन मांस मदिरा और व्यभचार से युक्त था तभी आपका वीडियो देखा जिसमें आपने कहा 24 घंटे में से 24 मिनट मुझे दे दो 24 मिनट देने के एक साल के अंदर मांस मदिरा तो दूर प्याज लहसुन तक छूट गया और मेरा मेरे जैसे नी तुच्छ पापी भी तुलसी तुलसी धारण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
गुरु जी कुछ हफ्ते पहले आपने कहा कि ढाई घंटे दे दो। देखो जीवन कैसे परिवर्तित हुआ। गुरु जी अब मैं अब से मैं लोभी आदमी है कि हम 24 घंटे में ले जाएंगे। ले ढाई घंटे में करें क्या? नहीं इसमें ढाई घंटे में कि आप जप को एक घंटे कर लीजिए। और उसको दो भागों में कीजिए। जप को मान लो 45 मिनट इधर कर लिया। 45 मिनट उधर कर लिया। 24 घंटे में दो भाग कर लीजिए तो डेढ़ घंटे चले गए। एक घंटे में एक दो ग्रंथ पढ़ो। जैसे भागवत है। दो चार पांच अध्याय पढ़ा। रामायण के दो चार पांच दोहे अर्थ सहित पढ़े।
एक दो श्लोक गीता जी के पढ़े। शास्त्र स्वाध्याय करने से हमारे पाप नष्ट होते हैं। पुण्य बढ़ता है और हमारे अंदर ज्ञान जागृत होता है। हमारा अध्यात्म क्या है? हमारे शास्त्र क्या है? ये हमें पता चलता है और भगवान की कृपा मिलती है। तो शास्त्र स्वाध्याय और सुमिरन और शेष समय अपने कार्य में लगे रहो क्योंकि हमने उसमें यह विभाजित किया कि आप छ घंटा सो लीजिए सात घंटा सो लीजिए शेष समय कार्य कीजिए जो मनोरंजन में आप समय लगाते हैं वो अध्यात्म में लगा दीजिए आपके जीवन की उन्नति हो जाएगी लौकिक पारलौकिक दोनों सत्संग सुन सकते हैं उस हां सत्संग भी सुन सकते हैं सत्संग भी सुन सकते जैसे आप भाव के लिए बोलते हैं श्री जी को लेकर के निकुंज को लेकर के किसी चीज़ को लेकर के अभी किसी तरह का कोई भाव नहीं आता।
जो भाव आता है वो आपको लेकर आता है। आपसे ही प्रीति है। आप आप मित्र समझ के या शिष्य समझ के जैसे भी बस आप देख लेना। आप जो कहेंगे हम करेंगे क्योंकि आपको जो अच्छा लगता है हम वो करेंगे। अब आप देख लेना बस। जी बस हमारी प्रार्थना यही है कि अगर कदम आगे बढ़ा दिए हो तो पीछे वाले जो कार्य हैं उनमें मत जाना। जो पीछे कदम आपके चले हैं उन पर अब नशानी अब ना नश हो। पीछे हुआ अब आगे नहीं होगा क्योंकि यह बहुत बड़ी मंजिल है सत्य की कभी-कभी एकदम अंधकार छा जाता है कामनाओं का और फिर हम गलत मार्ग में चल पड़ते हैं तो गलत मार्ग में मत जाना बस इतनी प्रार्थना है जितना बने नाम जप करते रहो जितना बने सेवा करो शास्त्र स्वाध्याय करो समाज में माता-पिता बुजुर्ग और जीव जंतु किसी की भी सेवा मिल जाए सेवा करो गलत से बच जाओ बस गलत से बच जाओगे तो थोड़ा भजन भी भगवत प्राप्ति करा देगा।
जो पूर्व में गलती हुई वह गलतियां नहीं होनी चाहिए। उन गलतियों का डर तो आता है। वो डर तुम्हें कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। नई गलती ना होने पावे तो सनुख होए जीव मोह जब जन्म कोटि यग नाशो तब भगवान कहते हैं करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट कर देता हूं। पर नए ना होने पावे। भगवान कहते सर्व धर्मान परित्यज मामेकम शरणम ब्रज अहम तम सर्व पापभ्य मोक्षस्याम मासचा तुम सब धर्मों को त्याग कर मेरी शरणागति धर्म को स्वीकार कर लो मैं तुम्हारे सर्व पाप नष्ट कर दूंगा तो पीछे की तो चिंता मत करो आगे ना बनने पावे सावधानी रखो ठीक है महाराज श्री इसमें एक वो था बहुत असंख्य कोटि महाराज जी आपकी वार्ता सुन के आपके वचनों को सुन सुन के उन्होंने गलत आचरण छोड़ दिए।
मांस, मदिरा, व्यभचार और असंख्य कोटि अपराध जो अधर्म आचरण करते थे। महाराज जी निरंतर संग ना रहने के कारण। हां वही हम निरंतर हां जैसे आप आप सुबह आए किसी को कह रहे थे कि माया पटक देगी और अभी गिरे मतलब आने के बाद फिर गिरे फिर उठना बड़ा कठिन हो जाएगा। तो महाराज जी उस समय मतलब निरंतर क्या नाम जप और सत्संग का संग रहेगा। तभी लंबे समय तक इसको खींच जाएंगे और एक बार निकल गए तो फिर तो निकल ही जाएंगे। नहीं बहुत कठिन है मानो जैसे 70 वर्ष की आयु है और 20 वर्ष से शुरू किया हम 40 वर्ष चल रहे भगवत प्राप्ति नहीं हुई तो गुंजाइश है माया तुम्हें परास्त कर सकती है तो हर समय नाम जप सत्संग और लक्ष्य बराबर लक्ष्य बना रहना बहुत समय तक यही तभी कहते हैं कोई लाखों में एक चलता है चलने वाले हजारों में कोई एक ठीक से चलता है और ठीक से चलने वालों में कोई एक बिरला पहुंचता है।
बिरला पहुंचता नहीं। इतने मनोरंजन वाटिकाएं हैं कंचन कामिनी कीर्ति की कि उसी में जीव गिर जाता है। जैसे उसने कभी भावना की कि अगर हमें ये सुख मिलता तो जी भर के भोगते और भजन कर रहा है तो पहले भगवान नहीं मिलेंगे। पहले उसके सामने वह सुख आएगा जो उसने चाहा है। यह पक्का है हमारे पक्का000% जो इच्छा कर हो मन माही प्रभु प्रसाद कछु दुर्लभ नाही जब रावण ने लात मारा था तो कहा नहीं था विभीषण जी ने लेकिन सोचा था कि मैं जा रहा हूं राम जी की शरण में तेरा नाश करवा के इसी सिंहासन पर बैठूंगा तो भगवान ने जाते ही पहला काम किया था समुद्र का जल मंगा के लंकाधिपति कहा था आओ लंकेश तो घबरा गए कि प्रभु मैं तो आपकी शरण में आया हूं लंकेश बनने नहीं आया।
तो प्रभु ने कहा नहीं इस बात को स्वीकार करो। तो उन्होंने कहा हां उ कछु प्रथम वासना रही पर प्रभु पद प्रीति सरित सो बह प्रभु थी मन में बात पर अब आपके चरणों को देखकर प्रेम सरिता में बह गई मुझे लंकेश नहीं आप अपने चरणों का नहीं बोले लंकेश भी बनो चरणों की दासत्व भी प्राप्त करो तो हमें लगता है कि अगर हमारी वासना कोई है अंदर फिर आगे भजन के बल से पहले वो वासना पूरी होगी नष्ट तो नहीं होगा साधक भ्रष्ट तो नहीं होगा। बादलों की तरह छिन्न भिन्न तो नहीं होगा क्योंकि भगवान का जन है।
पर निर्वासनिक बिना हुए वो आगे उन्नति को प्राप्त नहीं होता। इसलिए वासना कोई ना कोई बनी ही रहती है और जहां भजन हुआ तो कंचन कामिनी कीर्ति इनका संयोग होने लगता है तो साधक मनोरंजन में लग जाता है फिर वो मार्ग रुक जाता है इसीलिए जन्मजनम मुनि यतन करा अंत राम कह आवत नाही तो प्रयास करते रहो कभी चूक मत करना यही महाराज जी जो आपने कहा यही स्थिति मेरे साथी से कैसे बचे नाम जप खूब और नाम जप बढ़ाओ पावर बढ़ाओ राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा और गलत संग ना करना राधा राधा कहते हुए भी यदि गलत संग करोगे नारद जी से प्रश्न हुआ कस्त तरति कस्त तरति कस्त तरति मायाम कौन तर जाता है कौन तर जाता है माया से कौन तर जाता है तो बोले यो महानुभाव सेवते यो संगास तजति यो ममता तजते जो महापुरुषों का संग करता है और कुसंग का त्याग करता है और किसी से ममता नहीं रखता वो निकल जाएगा।
यो महानुभाव सेवते महापुरुषों का संग उनके वचन बाबा ने कहा है कि ऐसे नहीं देखना नहीं देखना बाबा ने कहा ये चीज नहीं खाना नहीं खाना ऐसे नहीं बोलना ऐसे नहीं देखना रोज सत्संग सुनो हर एक दिन नया नया आपको मिलेगा उपदेश उसी से आपका जीवन पार हो जाएगा पर पूरे जीवन अगर निष्कलंक निकल जाए तो परम पद मिल जाएगा परम पद भगवान का भगवान का सानिध्य और जो चाहोगे भजन कर रहे हो भगवान मिलने की तो ऐसे जो चाहोगे वह मिल जाएगा और कुछ नहीं चाह रहेगी तो भगवान मिल जाएंगे तो निश्चिंत होकर भजन करो इसमें घाटा तो है नहीं गिर भी पड़ोगे तो भी घाटा नहीं 100 बार राधा राधा कहा तो तुम्हारा बैंक लॉकर में जमा हो गया अब तुमने पाप किया तो इसका तुम्हें दंड मिलेगा लेकिन तुम्हारे पास 100 नाम जमा है वो तुम्हारी उन्नति करेंगे वो कभी नष्ट होने वाले नहीं समझ रहे हैं ना हां खूब इसी लोभ से नाम जप करो नाम बढ़ाओ महाराज जी यहां तो हम सब साधक जन आपके सानिध्य में है तो आपका शासन है।
बाहर जिन जो शराब छूटी वही दोस्तों के बीच में रहना। हां बिल्कुल बहुत कठिन थोड़ा पर काम करेगा। देखो कल एक नहीं कह रहे थे कि अरे बोले अब जहां शराब पी ले या कुछ कर ले सोचो तुम सब छा जाते हो हमारे दिमाग में डर पैदा हो जाता है हमारे हृदय के तो बोले जहां हम गलत सोचते हैं करने की सो तुम छा जाते हो दिमाग में लगता है यार बाबा जान जाएंगे तो बोले इसलिए फिर अब गलत हमसे हो ही नहीं रहा है क्योंकि हर समय आप हमारे दिमाग में छा जाते हो तो ये बात बहुत पॉइंट की है कि यदि हम संत सद्गुरुदेव या उपदेशता को अपने दिमाग में रखें ये बाबा ने कहा था ऐसा नहीं तो दिमाग में वो छाए हुए हैं तो हमसे गलत हो ही नहीं सकता और भगवान की ऐसी कृपा है कि लाखों लोग इस बात को समझ रहे हैं कि भगवान की कृपा से वो सतमार्ग में चलने की तैयारी कर रहे हैं।
कोई चल रहे हैं कोई चल चुके हैं तो इसमें घाटा नहीं होगा क्योंकि भगवान ही चलाते हैं। अगर वो ना चलावे तो अपने लोगों की ताकत ही नहीं कि चल पावे। शैलेंद्र कुमार जी राधेधे महाराज महाराज जी राधे-धे महाराज जी समाज के माया एवं प्रपंच के कारण मन विचलित होता रहता है भक्ति में नहीं लगता कोई सब आज का नहीं है सब अपने अंदर ही भरा है कूड़ा कर और कुछ नहीं है हमें कोई परेशानी नहीं मेरा मन ठीक तो पूरा संसार ठीक मेरा मन खराब तो पूरा संसार खराब मेरा मन पापी तो पूरा संसार पापी मेरा मन राम में तो पूरा संसार राम में मेरा मन कृष्ण में तो पूरा संसार कृष्ण में अब बोलो क्या बदलना है अपना मन बदलना है या संसार
बदलना है गोस्वामी जी की दृष्टि ठीक हुई तो बोले सिया राम मैं सब जग जानी करो प्रणाम जोर जुग पानी पूरा संसार सियाराम में कहां प्रपंच है हमारी दृष्टि में प्रपंच है तो प्रपंच है हमारी दृष्टि में काम है तो काम है हमारी दृष्टि में राम है तो राम है हमारी आधी बात है सुधरना अपने को है दूसरे को नहीं तेरे भावे जो करे भो संसार नारायण तू बैठ के अपनो भवन बहार क्यों प्रभु बताओ हमको अपना सुधार करना है हमें अपने पैरों में जूते पहन लेने पूरे संसार में कारपेट नहीं बिछाने समझ रहे हो हमें अपना माइंड ठीक कर लेना है पूरा संसार ठीक हो जाएगा हम ठीक तो संसार ठीक लाल चश्मा तो पूरा संसार लाल हरा चश्मा तो पूरा संसार हरा और जैसा हम दर्शन कर रहे हैं वो हमारे अंदर की सामग्री बाहर नहीं है।
क्या परेशानी है? जैसे एक फिल्म में पैसा लगा के आप जाते हो देखने कुछ अच्छा होता है, कुछ बुरा होता है। तो आप उसका मनोरंजन करते हैं कि नहीं करते? आप वहां किसी से दुश्मनी नहीं करते, किसी से प्यार नहीं करते। क्योंकि आपको पता है झूठे चलचित्र हैं, कहानी है। उसका आनंद ले रहे हैं आप मनोरंजन कर रहे हैं। ऐसे ही पूरा संसार मनोरंजन है। जगन्नाटक वैभवा एक परमात्मा एक अपने को अनेक रूपों में करके तीन विभाग कर दिए। एक पालन सृष्टि विनाश कहीं विनाश लीला हो रही कहीं पैदा होने वाली सृजन लीला हो रही तो कहीं पालन लीला हो रही है कहीं काम क्रोध की लीला दिखाई दे रही कहीं भजन की लीला दिखाई दे रही लेकिन ये सब सब झूठे इनमें एक परमात्मा सत्य है ये सारी क्रियाएं झूठी और सारे रूप झूठे ये जितने रूप हैं सब झूठे और भगवान सत्य हैं वो थे हैं और रहेंगे यह रूप नहीं रहेंगे।
कल यह रूप कुछ और था। आज कुछ रूप और बदल रहा है। कल इसका पता नहीं चलेगा। फिर आप कोशिश भी करो तो ढूंढने से पूरे त्रिभुवन में रूप नहीं मिलेगा। यह झूठा है। लेकिन इसके अंदर जो है वो सत्य है। हम सत्य वस्तु को पहचाने। हम माया के इस नाटक में भूले ना। देखो अगर माया के नाट्य में आप अभिनेता को पहचान लोगे तो आपको परेशानी नहीं होगी। जैसे आप फिल्म में गए तो आपको ज्यादा अच्छा तभी लगेगा जब आप अभिनय वाले को पहचानते हो। नहीं लगेगा। बोले कौन है? बोले अमुक है और अभिनय दो प्रकार का होता है उसमें।
एक होता है पॉजिटिव होता है नेगेटिव। नेगेटिव खलनायक और नायक। दोनों को देखने पर जब खलनायक का कोई रोल करता है और बहुत दुष्टता का रोल करता है। कोई कहे बहुत ही दुष्ट आदमी तो आप कहोगे नहीं नहीं। ये तो बहुत बढ़िया आदमी है। केवल रोल कर रहा है। समझ रहे हो ना? ऐसे ही एक परमात्मा वो केवल रोल कर रहा है। वो है निर्विकार। वो है निर्विकार परमेश्वर। एक परमात्मा केवल रोल कर रहा। हमको यही जानना है। अब हम यही नहीं जान पा रहे। इसीलिए परेशानी कि बड़ा प्रपंच है। हमें तो कहीं प्रपंच नजर नहीं आता।
हमारे भगवान अपने खेल खेल रहे विविध रूप में। कहीं विनाश का खेल, कहीं पालन का खेल, कहीं सृष्टि का खेल, कहीं अच्छा खेल, कहीं बुरा खेल। वो खेल रहा है अपने आप में। तो उस खेल में मत सम्मिलित हो। उस खेल से हटो और उस खेल के दृष्टा बनो। तो बढ़िया अभी तो ज्ञान नहीं प्राप्त है ना इसलिए परेशान। नाम जप करो। खूब नाम जप करते हो? बराबर बराबर है। बराबर का अभ्यास करो। अगर हम एक बार पोछा लगा दे और खिड़की दरवाजा खुला छोड़ दे हवा आएगी पूरी गंदी हो जाएगी। नहीं हो जाएगी।
खिड़की दरवाजे कंट्रोल में रखो। ये सब खिड़की दरवाजे इनको होश में रखो और नाम जप का पोछा लगाते रहो। अभी मन निर्मल हो जाए। सब में भगवान बैठा भैया। वही छुपा। किसी सूझ वाली आंख ने पहचान की कण-कण में झांकी भगवान की। सब में वही रमा हुआ है। हां, अब अपने पद और अधिकार के अनुसार जो कर्तव्य है उसको करता रहना चाहिए। चतुरता वही है कि अपने कर्तव्य में धोखा ना पड़े और हम सबके प्रति समान भाव भगवत भाव रखकर नाम जप करते हुए यहां से मुक्त हो जाए बड़ा कठिन है इस दरिया में फंस गए दलदल में फंस गए इससे मुक्त हो जाए राम कृष्ण हरि जो नाम प्रिय हो खूब नाम जप करो दूसरों का उपकार करो और अपने कर्तव्य का पालन करो समझ गए शिल्पी जी राधेधे श्री हरिवंश प्रभु राधे-राधे महाराज जी महाराज जी कह रहे हैं कि इनके पति आपको सुनते हैं बट इनका आध्यात्म में थोड़ा कम झुकाव है और वह जबरदस्ती
इनको लगाना चाहते हैं कि तुम भी भागवत मार्ग पर चलें और इसमें कभी-कभी वो क्रोध कर देते हैं और छोटी-छोटी बातों पे लड़ने लग जाते हैं महाराज जी महाराज जी मुझे क्या करना चाहिए ऐसे में देखो पत्नी के प्रथम भगवान पति है आज हमारे धर्म को नहीं समझा जाता इसीलिए परेशानियां हो रही हैं और पति का प्राण पत्नी है अर्धांग ंग का मतलब होता है बामांग होता है ना तो बांग में ही तो दिल है पूरा प्राण माना जाता है पत्नी को और पत्नी का भगवान पति ये हमारे भारत देश की शैली है
ये हमारे धर्म की बात है आज हमारे देखो इन बातों को ना मानने का कहा जाता पुरानी बातें इन बातों को ना मानने का क्या दुर्दशा है गृहस्ती की क्या दुर्दशा पति पत्नी में विश्वास नहीं पति पत्नी में प्रेम नहीं एक गृहस्थ दो मिनट की बर्ताव में भंग हो जाती। बोले डिवोर्स वो लड़की लेकर लड़का ले चली गई। वो पति अपने मकान में बैठे रो रहे हैं। क्या हो रहा है ये? ये जो गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड लिविंग रिलेशन चल रहा है ना यह बहुत नाशकारी है। गृहस्थी के लिए हमारे देश की परिपाटी है।
एक दूसरे को प्राण समर्पित करते हुए आजीवन निर्वाह करना। आजीवन निर्वाह करना। तो आप भी अपने पति को भगवान मान करके उनकी आज्ञा का पालन करते हुए नाम जप करो पति को समर्पित करो पति प्रेम प्राप्त होगा और सबसे बड़े परम पति भगवान है और भगवान की प्राप्ति करनी है तो दोनों मिलकर के भजन करो सद गृहस्ती में रहो और कभी पति नाराज हो तो चार बातें सुन लिया देखो सुनने वाला बड़ा होता है सुनाने वाला नहीं होता सुनने वाला बड़ा होता है जैसे कोई गाली दे रहा है तो आप सुन लिए तो आप क्षमावान है आप बलवान है वो बलवान नहीं वो तो गाली दे रहा तो आप नाम जप करो भगवान को अर्पित करो कि हमारे पति हम पर प्रसन्न हो पति की प्रसन्नता और पति को चाहिए कि जीवन में जो भी हम कर्तव्य कर्म करें सलाह ले करें पत्नी से और उसके मन की कामना को पूर्ण करें क्योंकि उसका हाथ आपने लिया है उसने आपका हाथ नहीं लिया पानी ग्रहण में ऐसे होता है कि आज से सारी जीवन की तेरी जिम्मेवारी मैं लेता हूं कितना बढ़िया गृहस्थ धर्मया मेहनत करके गए मुस्कुरा के पत्नी ने स्वागत किया दोनों प्रेम से खाए खाए पिए आनंद से बैठ।
अब आज का समय क्या है? देखो क्या समय है। हम यही कहते हैं अपने बच्चों को सुधारो। ये बॉयफ्रेंड गर्लफ्रेंड वाला वायरस दिमाग में जो बढ़ रहा है सबके ये बहुत हानिकारक है। बहुत हानिकारक है। यह गृहस्थ नहीं सही रहने देगा। साल साल भर ब्याह होता और डिवोर्स हो गया। यह तो कभी सुना नहीं था। डिवोर्स शब्द तो सुना ही नहीं था। जो ब्याह हुआ पति पत्नी बसे एक हुए। आजीवन निर्वाह, आजीवन निर्वाह। हमारे भारत की मर्यादा है यार। पवित्र जीवन स्त्री का पवित्र जीवन पुरुष का दोनों जीवन निर्वाह किए एक साथ मिलकर।
ऐसा है हमारे यहां हमारे यहां ये गंदगी नहीं है। अब ये बातें कौन समझ रहा है? ये बॉयफ्रेंड गर्लफ्रेंड वाला समय ये समझ रहा है कि हमारा पवित्र जीवन नष्ट हो गया। अब मैं किसी के काबिल नहीं रह गई। पर जी बहुत बढ़ रहा है इसका कारण इसका कारण देखो शास्त्र और संत ये द्व समाज के सुधारक है शास्त्र कोई पढ़ नहीं रहा मोबाइल का जमाना है और संतों की कोई मान नहीं रहा और जो मान रहे हैं वो सुधर रहे हैं जो मान रहे हैं वो सुधर नहीं रहे तो कैसे समाज सुधरे सब बहा चला जा रहा है मोबाइल में मोबाइल में सब बहा चला जा रहा है क्योंकि मोबाइल में पूरा गलत संस्कार भी हैं अच्छे संस्कार भी अच्छे कौन देखना चाहता है गलत ही गलत सीरीज और फिल्में में गंदी गंदी बातें तो गंदगी बढ़ती चली जा रही और नए जमाने के बाहर की हवाएं आती है।
अब देश विदेश सब जाना होता है तो वहीं के संस्कार बन रहे हैं। खानपान गलत है। बुद्धि भ्रष्ट है। माता-पिता का आदर नहीं। गुरुजनों का आदर नहीं। शास्त्र स्वाध्याय नहीं इसलिए भ्रष्ट हो रहा है समाज। अब जो बड़े-बड़े संत हैं वो सब अपनीपनी सीमा में हो गए। क्योंकि जान रहे संसार बड़ा विचित्र है। साधु पहले भ्रमण करते थे। अब भ्रमण करें तो कह देंगे बच्चा चोर है मार डालेंगे अरे बच्चा चोर है तो बंदी बना लो दिन में जांच कर लेना भारत के ही तो है नहीं मार डाला लाठी डंडों से तो साधु महात्मा अगर गांव गली जाए तो कह बच्चा चोर है मार डाले तो सुधरेंगे कहां से समाज सुधरेगी संतों के वचन से शास्त्र स्वाध्याय से अच्छे आचरण से अच्छे आचरण कहां से आएंगे जब तक अच्छा संग नहीं होगा और संघ है वही कुसंग गंदी बातें हैं तो हमें लगता है कि गृहस्थी बड़ी समस्या में है।
ब्याह हुआ पति पत्नी में प्रेम नहीं। पत्नी दूसरे को प्यार करती है। पति दूसरे को प्यार कैसे गृहस्ती चलेगी? कैसे कुल परंपरा चलेगी? कैसे संतान चलेगी? आप विचार करके देखो। तो इसलिए हमें लगता है कि अगर माता-पिता भी और बच्चे दोनों सुधरना चाहे तो बहुत अच्छी बात है। हमारा समाज उन्नति को प्राप्त हो। नहीं तो अवनति को प्राप्त हो रहा है। बहुत अवनति को। आप बच्चों के सामने जो बातें कर रहे हैं उनका संस्कार पड़ रहा है। आप बच्चों के सामने जो नशा कर रहे हैं संस्कार पड़ रहा है।
आप जैसे संस्कारों से युक्त होकर गर्भधारण कराएंगे वैसे बच्चा पैदा होगा। आपके संस्कार ठीक नहीं तो बच्चों के संस्कार कहां से ठीक हो जाएंगे? जब गर्भ में बच्चा आ जाए उस दिन से ब्रह्मचर्य रहना चाहिए गृहस्ती को। जब तक बच्चा ना हो जाए और समय ना आवे तब तक उसे ब्रह्मचर्य कौन रहता है? तो बच्चों के संस्कार वही काम के वही गंदे संस्कार पड़ेंगे क्योंकि जैसे माता-पिता के संस्कार वही बच्चों में जाते हैं। तो इसलिए सुधार हो नाम जप करें अच्छे से चले सब विश्व पूरा मंगलमय रहे भावना तो यही सर्वे भवंतु सुखिना सर्वे संत निरामया सर्वे भद्राण पश्यंतु मा कश्चित दुख भाग भवेत लेकिन हमारे अकेले पहले से नहीं होगा आप भी सुधरो तब होगा वैसे काफी सुधार भी हो रहा है सुनते महाराज जी आज तक ये बातें किसी ने नहीं बताई जो आपसे हमें पता लग रही है और 45 45 साल 40-40 साल हो गए हैं जी किसी को ये बातें पता नहीं होती जी महाराज आपके माध्यम से पूरा पूरा विष मंगलमय हो रहा है।
जी इससे ज्यादा कुछ नहीं। हम कोशिश यही कर रहे हैं कि जो जो बात गुरुजनों से मिली, संतों से मिली, हमारे समाज को पहुंचे, समाज जागृत हो, गंदे आचरणों से बचे। अब इसमें मंगल नहीं है। जैसे मानो एक बच्चा है। अब वो गंदे आचरण कर रही है या कर रहा है। अब उसे ब्लैकमेल किया गया। अब वो किसे कहे? घर में कहेगा तो काट डाले जाएंगे। घर वाले ऐसा कह रहे हैं और वो ब्लैकमेल में गिरते चले जाते हैं। फिर उसको करने का रास्ता नजर आ जाता है। कई बच्चे तो इस बात में बच्चे बच्चियां कर ले।
हमें लगता है माता-पिता को थोड़ा मित्रवत व्यवहार करना चाहिए। एक काट डालने मार डालने वाली बातें नहीं करनी चाहिए। उनको कहना चाहिए कि देखो हम हम आप पिता पुत्र तो हैं लेकिन एक दोस्त भी हैं। अगर तुमसे कोई भी गलती हो जाए तो हमसे बताना। हम तुम्हें बचाएंगे। तुम्हें कुछ भी पसंद आया मुझे बताना। हम तुम्हें वो दिलाएंगे। ऐसे प्यार किया जाता दिखाओ अच्छा मोबाइल क्या करते हो क्या बात करते हो कहां बात करते हो कैसे मिलते हो तो बच्चे को लगेगा कि अगर हमसे कोई गलती हुई है और हमें कोई ब्लैकमेल कर रहा है तो अपने पापा से कह सकते हैं लेकिन पापा को फुर्सत कहां है पापा को इतनी फुर्सत कहां है कि पांच मिनट बैठकर बच्चे को थोड़ी जीवनी को सुधारें तो माता-पिता ही प्रथम गुरु होते हैं ये जो बॉयफ्रेंड गर्लफ्रेंड लिविंग रिलेशन ये जो गंदी बातें हस्तमैथुन आदि बच्चों में चला है ये बहुत नाशकारक है।
बच्चे नहीं समझ रहे हैं। और अगर इससे सुधार हो जाए तो स्मृति प्रवीण हो जाए। शरीर बलवान हो जाए। आगे चलकर के परिपक्व हो जाएंगे। कई बार हम कहते हैं आप किसानी को जानते हैं खेती? जब गेहूं गलेथ में होता है। गलेत का मतलब बाली निकलने वाली होती है। अगर उस समय काट लिया जाए तो एक दाना नहीं मिलेगा। और वही बाली आ जाए और महीना भर और रुक जाओ तो 40 मन निकलेगा उसी में तो 20 वर्ष तक बच्चा गलेथ में समझो ब्रह्मचर्य वो और जब 20 के बाद जहां ब्याह हुआ तो फिर वो अनाज वाला समझो फिर वो लड़का बच्चा परिवार उसका कुछ बाल बांका नहीं होगा लेकिन 20 वर्ष के पहले यदि ब्रह्मचर्यहीन हो गया तो गृहस्थी लायक नहीं रहेगा गृहस्थ लायक नहीं रहेगा ऐसे व्यसन ऐसा व्यभचार ऐसी क्रियाएं कर रहे हैं कि वो शरीर शरीर को तो कुछ समझ रहे हैं।
उनको जरा सा सुख लगा तो लगा यही सुख है और उसी में बहते चले जा रहे हैं। इसलिए ब्रह्मचर्य अत्यंत आवश्यक है। बच्चों की पवित्रता आवश्यक है। बच्चों की जीवन की उन्नति के लिए माता-पिता का कर्तव्य है कि उनकी रक्षा करें। उनका जीवन पवित्र रखें तभी बात बनेगी। जी आलोक सेठ जी बदोही से। राधा श्री हरिवंश। जय श्री राधाव श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। गुरुदेव मैं सोने चांदी के दुकान में एक कारीगर के रूप में कार्यरत हूं। पहले तो ऐसा नहीं होता था।
लेकिन अब एक साल से YouTube के माध्यम से भजन का स्वाध्याय हुआ। तब पता चला कि यह कार्य गलत है। जब तक कोई किसी भगवान की मूर्ति को चाहे सोने या चांदी का हो जब साफ कराने या बेचने लाता है गलाने के लिए कहता है तो मन बहुत दुखी एवं विचलित होने लगता है। क्या किया जाए महाराज जी ऐसे में? क्योंकि अभी घर की आर्थिक स्थिति को भी देखना है। पर हम तो यह नहीं कह पाएंगे कि आप भगवान के श्री विग्रह मूर्ति को गलाकर दूसरा रूप दीजिए। क्योंकि हम तो उनको साक्षात मानकर आराधना करते हैं।
वो कैसे लोग हैं जो अपने भगवान को बेच देते हैं। अपने भगवान को गलाने के लिए ले जाते हैं। चाहे वो स्वर्ण के किसी भी धातु के जब हमने एक बार भगवान का रूप दे दिया उनको तो ऐसा हम नहीं कर सकते। और इसके लिए हम अनुमति भी नहीं दे सकते। अब जीवन उपार्जन के लिए आपके तो आप वह देखो लेकिन हम अनुमति नहीं दे सकते ना आदेश कर सकते हैं क्योंकि भगवान का विग्रह तो भगवान का ही है ना मान लो इतना बड़ा है लेकिन ऐसे के तो हम देख रहे हैं ना श्री कृष्ण है अब हम कैसे उनका अमंगल सोच सकते हैं कि हम आग में तपा के गला दें या हम ऐसा हम नहीं कर सकते हम एक उपासक हैं।
हम अपने उपास्य देव की चाहे जितनी मूर्तियां हो हम ऐसा करने का नहीं कह सकते। बिल्कुल नहीं कह सकते और ऐसा नहीं होना चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए। अब हम इसके विषय में क्या कह सकते हैं? लेकिन हम उस विषय को कह रहे हैं कि ऐसा नहीं होना चाहिए कि हमारे भगवन मूर्तियों को गलाया जाए। अष्ट धातु की हो या किस सोने की केवल हो। वो कैसे लोग हैं? निर्दयी हृदय जिन्होंने अभी तक पूजा में रखा। अब उनको बेच दिया और वह कैसे हृदय हैं जो भगवान के उस रूप को गलाते फिर तभी हानि होती है अपराध लगता है तभी फिर पूरी की पूरी दुकान बर्बाद हो जाती है आग लग गई चोरी चोरी कर ले कर कर ले गए या कोई घटना घट गई ये अपराध है ऐसा नहीं होना चाहिए हमारी हम क्योंकि एक उपासक है ना हम कोई व्यापारी तो है नहीं तो हम वही बात तुम्हें बताएंगे जो अध्यात्म में आपका मंगल करेगी ऐसा नहीं होना चाहिए ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए अब आगे की रास्ता आप देखो देखो कि आप कैसे चलोगे।
जैसे लोग आजकल सुपारी में, तंबाकू में या झोले में या कार्ड में भगवान के नाम लिख रहे हैं। वो लोग समझते नहीं। फिर जब परिणाम आता है तब नाम का यही तो अपने धर्म के लोग समझ नहीं रहे। अपने इष्ट की मूर्तियों को उनकी छवियों को लक्ष्मी गणेश जी की पूजा की। इसके बाद निकालकर गांव बाहर पीपल के नीचे रख दिया। अपने भगवान की छवियां कार्ड में छाप ब्याह में फेंक करके रद्दी कागजों में वही प्रभु बने हैं। श्री राम बने, सिया जी बने, शिव जी बने, पार्वती जी बने। झोला में भगवान का नाम भगवान के रूप छाप दिए बैग में और और झोला का काम झोले जैसा है।
उसमें चाहे जूते रख लो, चाहे कपड़े रख लो, सब रख लो। अब उसी में भगवान का नाम लिखा उसी में जूते। हमारा कहां सनातन धर्म रह गया? अरे सामने लिख दिया जाए राम और हमसे कहा जाए तलवार की नहीं तो पैर रखो तो गर्दन उड़वाना पसंद करेंगे। में पैर रखना पसंद नहीं करेंगे और ईंट में लिख दिया ईंट में नाम लिख दिए भगवान के और वही लेटरिंग में लग रहे हैं। वही बाथरूम में लग रहे हैं। कहां इसलिए बुद्धि भ्रष्ट होती चली जा रही है। कहां लोग समझ पा रहे हैं कि अपराध बन रहे हैं। तभी तो को लौकिक उन्नति कोई उन्नति है।
अरे ऐसे हाइलजन की तरह प्रकाशित हुए। फ्यूज हो गए। आग लगी सब नष्ट हो गया। एक्सीडेंट हुआ। पूरा परिवार मर गया तो तुम्हारे सब रखे के रखे रहेंगे। अपराधों से बचना चाहिए। उनका उनका माइंड रहता है कि महाराज जी मंगल होगा बट उसके पीछे के अपराध यह समझते मंगल होगा भगवान के नाम का अपमान करवा रहे हो मंगल होगा ऐसे कैसे मंगल हो जाएगा तुम्हारे सोचने से मंगल हो जाएगा हम जिस राधा नाम को सिंहासन में विराजमान करके आरती करते हैं वही राधा नाम खनी में तो लिखा हुआ है तो ऐसे खाए और फेंक दिए जूता में रदते चले जा रहे हैं तो यह सारा अपराध उस फैक्ट्री वाले को लगेगा और फैक्ट्री वाले की जब अपराध का घड़ा भरता है ना जब तक घड़ा नहीं भरता ना तभी तक जब घड़ा भरता है फिर पता चल जाता है एक परचून की दुकान थी तो बेचारा बड़े धर्म से चलता था तो साइकिल से चलता नमक रोटी खाता और सामने हलवाई की दुकान थी बहुत उसमें मिलावट सब कार से चलता तो एक दिन एक संत आए उस गरीब के घर तो उनका महाराज धर्म श्रेष्ठ है कि अधर्म श्रेष्ठ है तो उनका धर्म तो बोले धर्म से चलता हूं तो आपको हम आधा लीटर दूध नहीं पिला सकते और अधर्म से चलता है।
कार से चलता है वह बोले आओ बेटा गंगा स्नान करने चलते हैं। गंगा के किनारे ले गए और एक गड्ढा खुदवाया एक आदमी से और कहा इस पर खड़े हो जाओ। बोले गुरु जी करोगे क्या? बोले चुप रहो और भरभर के गंगाजल डालते रहे। जब गंगाजल यहां तक आ गया तब कहा महाराज अगर एक घड़ा भी डाल दिया तो मैं मर जाऊंगा। तो बोले ऐसे ही तुम्हारा सामने वाला जब तक घड़ा भर नहीं रहा है तब तक कार से चल जहां पाप का घड़ा भरा तो फिर वो नष्ट हो जाएगा धर्म से चलने वाला दीपक की तरह जलेगा लेकिन कुल परंपरागत चलेगा अधर्म वाला एकदम उठेगा और फ्यूज हो जाएगा नष्ट हो जाएगा इसलिए भाई ये भगवान की मूर्तियों की अब कैसे तुम्हें बताएं विद्वान बनते हैं और भगवान का नाम गुरु का रूप और भगवान के रूप छाप देते और नालियों में फाड़ के फेंक देते हैं लोग।
नहीं वो पोस्टर पोस्टर हां अब वो नालियों में फेंक दिए। तुम्हारे गुरु की छवि थी। तुम्हारे भगवान की छवि थी। अब ये अपराध नहीं है और विद्वान बनते हैं। ऐसे अरे अपने इष्ट का सम्मान करना सीखो। इष्ट के नाम का सम्मान करना। तुलसी जाके मुख से धोखे निकत राम। ताके पग की पगुतली मोरे तनु की चाम। अपने सनातन धर्म के देवी देवता इष्ट नाम रूप इनका आदर करना सीखे। अब ऐसे एक सिंहासन में विराजमान है और एक जूते के नीचे जा रहे हैं। मतलब पोस्टर में वही बने हैं राधा कृष्ण। अब वही फाड़ के फेंक दिए।
अब कौन संभाल के देखता है कि उनको यमुना जी पधराए जाके उनको कहीं पवित्र जगह में समाधि दे दे। ऐसा तो नहीं हो रहा। तो ये अपराध है। ये समाज को कष्ट देंगे। सुधरना चाहिए। ऐसी सामान नहीं लेनी चाहिए जिसमें भगवान का नाम लिखा हो और अगर ले तो उस नाम को उतना कैची से काट के पवित्र स्थान में समाधि देनी चाहिए। जैसे गंगा किनारे यमुना किनारे किसी सरोवर के किनारे गड्ढा खोद लिया और समाधि देकर ऊपर रज डाल ली तब तो हमारी बात बनेगी। शादी के कार्डों को हां हां बिल्कुल शारदी के कार्डों में भगवान की छवि नहीं छापनी चाहिए क्योंकि लोग अपमान करते हैं ना केवल निमंत्रण कार्ड समझते हैं और इसके बाद तो रद्दी कागज की तरह हो जाता है तो अपमान होता है हमारे भगवानों का ऐसा नहीं करना चाहिए महाराज जी हम गीता का पाठ करते हैं तो जो मरने वाला है उसको मैं देती हूं जो कोई भी मरे चाहे पशु पक्षी मरे चाहे कोई मेरे परिवार का मरे चाहे जिस दिन पाठ करती हूं मैं उसके निमित्त कर देती हूं महाराज जी तो कोई बोलता सातवा अध्याय करो।
कोई बोलता है आठवां अध्याय करो। तो कौन सा करना चाहिए? रोज एक अध्याय करो। क्रम बाय क्रम करो। भगवान की वाणी में कोई अच्छी बुरी या कम ज्यादा थोड़ी है। नहीं मरने वाली हम क्या कह रहे हैं? पूरी गीता भगवान ने स्मृति प्रदान करने के लिए अर्जुन को सुनाई है। कोई मरे जीने वाली बात नहीं है। वहां की मोक्ष पद भी कैसे प्राप्त होती है? वो स्मृति से। पूरी गीता सुनने के बाद अर्जुन ने क्या कहा? नष्टो मोहा स्मृति लब्ध तत प्रसादयात हे अचुत आपकी कृपा से मोह नष्ट हो गया स्मृति प्राप्त हो गई पूरी गीता भगवत प्राप्ति कराने में समर्थ है।
प्रथम अध्याय से लेकर 18व अध्याय तक रोज क्रम से एक एक अध्याय पाठ करो और चाहे जिसको दान कर दो बहुत अच्छी बात है। इससे जीव का मंगल होगा और नाम जप साथ में नाम जप तो किसी भी जीव को तो बहुत अच्छा है। आपका बहुत सुंदर भाव है। किसी भी जीव को दोगे तो उसका उद्धार हो जाएगा।
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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