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वृन्दावन की दीक्षा का कितना बड़ा फल है? / भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य // 20/09/26

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श्री धाम वृन्दावन पर पूज्य महाराज जी के वचन — ऊपर वीडियो में सुनें।

पूरा प्रवचन

वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद [गला साफ़ करने की आवाज़] रसो पूर्णम हृद प्रितम मधुपते स्मरता मुगम निर्वापय परम शीतल माशया परम सच्चिदानंद घन प्रेमानंद स्वरूप नवनि निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाडले युगल सरकार प्राणाराध्य प्राण प्रिय श्री प्रिया प्रीतम जो समस्त सहचरी वृंद खग मृग पशु पंछी तरुलता यमुना रस रानी रजरानी समस्त ब्रजवासी पर कोटिष नमन कोटिष प्रणाम परम सच्चिदानंद भगवान बाह्य जगत में तो अवतार लेते ही हैं और शास्त्रों असुर प्रवृत्ति वाले जीवों को परम पद प्रदान करते हैं।

किसी को मार करके और किसी को प्यार करके प्यार करते हैं उनको जो एक मात्र प्रभु के आश्रित होकर तड़पते रहते हैं। प्रभु के लिए प्रभु उनके प्यार के लिए अवतार धारण करते हैं। करुणामय प्रभु बाहर तो अवतार लिए ही हमारे हृदय में अवतरित हो हमारे हृदय में प्रकाशित हो तो समस्त दुख दोष द्वंदों का नाश हो जाए और हम प्रभु के आसक्त चित्त हो जाए ना तप है ना ज्ञान है ना वह भजन है ना वह समर्पण है बस एक आशा है अति उदार विभी सुंदर सूरत सुर सुकुमार अति उदार है मेरे प्रभु लाडले कभी रीज करके या खीज करके जैसे चाहे इस बात में खीज जाए कि हजारों बार संभाला है फिर भी नहीं संभलता खीज कर देख ले या रीझ कर देख ले हमारा काम हो जाएगा हमारा हृदय निष्काम हो जाएगा उनके के प्रेम में युक्त हो जाएगा।

एक बार करुणा करके हमारे हृदय में प्रकाशित हो। श्रीपाद प्रबुद्धानंद जी महाराज भगवत प्राप्ति का सहज मार्ग बता रहे हैं। कह रहे शयं दीक्षा उच्च भावतेशु शयं शिक्षा राधिका आराधनेशु [नाक से की जाने वाली आवाज़] श्रेय प्रेमाधीश पूर्व मूल कक्षायक श्री वृंदारण सौभाग्य वो बड़ा भाग्यशाली जीव है जो सेयम दीक्षा उच्च भाव वतेशु उच्च भाव प्रिया प्रीतम की अनन्यता वतेशु जिसने वृंदावन में दीक्षा ली प्रिया प्रीतम की शरणागति बड़े भाग्य [गला साफ़ करने की आवाज़] अहो भाग्य जो भगवान की शरण में होते हैं सब धन्य है पर यहां कह रहे हैं उच्च भाव वतेशु बड़े उच्च भाव का उसने व्रत लिया जो वृंदावन में श्री श्यामा श्याम की शरणागति रूपी दीक्षा स्वीकार की शयम शिक्षा राधिका आराधनेशु फिर जिनसे दीक्षा ली उन गुरुदेव भगवान के चरणों में पूर्ण समर्पित होकर राधा आराधन की शिक्षा ली।

कैसे हम प्रियाजू को रिझाएं जो गुरुदेव ने उपासना पद्धति बताई बिना क्यों म्यू किए वैसे चल दें तो बहुत जल्दी आनंद की अनुभूति हो जाए। हम लोग दीक्षा तो लेते हैं लेकिन अपना कुछ आग्रह रखकर जिसे हम दुराग्रह भी कह सकते हैं। कुछ अपनी बुद्धि रखकर कुछ अपनी जानकारी रखकर कुछ अपना ज्ञान रखकर इसलिए स्वयं शिक्षा राधिका आराधनेश्व इसका प्रभाव नहीं पड़ता। दीक्षा तो ले ली। बहुत से सौभाग्यशाली जन है जो श्री किशोरी किशोर जी की शरणागति क्रिया मात्र लिए अगर दीक्षा लेकर के राधा आराधनेश्व की शिक्षा स्वीकार नहीं की तो सफल नहीं हो पाओगे।

जब गुरुदेव की शरण में जाया जाता है तो कोरा कागज बनकर जाया जाता है। चाहे जितना ज्ञान विज्ञान भगवान से ज्यादा किसी को ज्ञान क्या होगा? जिनकी शस वेद श्रुतिचारी वो हरि हाथ जोड़े बैठे हैं। वशिष्ठ जी के सामने राम जी के रूप में हाथ जोड़े नीचे बैठे हैं संदीपनी जी के सामने कृष्ण रूप में हम तुम क्या हैं? अपने गुरुदेव के सामने अल्पज्ञ बनकर के कोरा कागज बनकर के जो चाहो लिख दो वही हमारा जीवन होगा। गुरु की कृपा उनके द्वारा प्रदत्त श्री जी की सेवा उनके द्वारा उपदिष्ट मंत्र नाम उपासना हो गया काम।

श्रीपाद कह रहे हैं सेम प्रेमाधीश पूर्व मूल कक्षायत श्री वृंदारण सौभाग्य प्रेमाधीश्वर श्री युगल सरकार श्यामा श्याम की जो दीक्षा और शिक्षा दोनों अपने गुरुदेव से लेकर आराधना में रत हो जाते हैं वो पराकाष्ठा को प्राप्त होते हैं। वह प्रेम की पराकाष्ठा को प्राप्त होते हैं। चरम सीमा का प्रेम हृदय बहा घूमता है। जरा सी बात हो जाए बस वो डूब गया। पर ये ध्रुवदास जी भी महाराज ने कहा है यह उपासना सिद्ध वाको ही जा की सांगोपांग उपासना है। सांगोपांग एक संत एक मंत्र, एक ग्रंथ, एक कंथ जिस संत से हम जुड़े हैं, उनके द्वारा बताया हुआ ही पंथ, उन्हीं के द्वारा दिया हुआ कंत माने इष्ट देव।

उन्हीं के बताया हुआ मंत्र और उन्हीं के द्वारा दिया हुआ ग्रंथ। जैसे अपने गुरुदेव कंत श्री राधा वल्लभ लाल जी महाराज पंथ श्री प्रिया प्रीतम की उपासना अनन्य भाव से राधा वल्लभी उपासना ग्रंथ श्रीमद् चतुराशी जी मंत्र शरणागत निज मंत्र फिर अन्य समय राधा वल्लभ श्री हरिवंश राध हो गया एक संत एक ग्रंथ एक पंथ एक मंत्र एक कंत इसे सांगोपांग उपासना कहते हैं। मिलावट नहीं अब में मिलनी मिले ना कछु जब खेलत रास सदाबन में बस इनके हो जाना है सच्ची मानिए सारा कार्य ये करते हैं इनके हो जाओ ये हृदय पर अपना अधिकार करके फिर जो सुख देते हैं ये मेहनत है आपकी अभी होने की करते हो गए और जब हो गए तब उसका फल मिलता है।

फिर कुछ करना नहीं होता। पड़ा है तो खड़ा है तो चल रहा है तो क्रिया परायण है तो निष्क्रिय है। एक अजीब सी आनंद की स्थिति। बस ऐसा लगता है किसी कोने में बैठ के चिल्ला के रो बस तो कुछ हल्का हो जाए हृदय। बस क्यों रो रहे हो कुछ पता नहीं। बस वो विकलता एक आनंद की विकलता बड़े सौभाग्यशाली है जो वृंदावन में प्रिया प्रीतम की दीक्षा लेते हैं। बड़े महाभाग्यशाली हैं जो वृंदावन में राधा उपासन की उन्हीं से शिक्षा लेते हैं। और उसी के अनुसार जब आराधना करते हैं तो बोले प्रेम की पराकाष्ठा को वो प्राप्त होते हैं।

प्रेम की पराकाष्ठा है। सहचरी स्वरूप में स्थित होकर प्रिया प्रीतम को दुलार करना यम यम देशम शरति पवन शुद्ध सचित सुखात्म श्री मद वृंदा विपिन विलसद व्ली वृक्षादंगी सर्वा क्रमित तनुतो वैष्णव धाम तत स्थान नेत तष्ो द्वार सज्जा विमान वृंदावन की हवा यम यम देशम सरति पवना शुद्ध सचित सुखात्म भजन यहां और देश के बसत घटत भजन की बात वृंदावन में स्वार्थो उलट भजन हो जात यम यम देशम शरति जिस जिस शरीर को वृंदावन की वायु लगती है वो परम पवित्र हो जाता है वायु लगने मात्र से वृंदावन में जो कबहु कछुक भजन नहीं होए रज तो उड़ी ला गए तने परम पवित्र श्री प्रिया प्रीतम और उनके प्रेमी जनों के चरण रज आंसुओं से अभिषिक्त ये रज जब वायु के संयोग से हमारे शरीर का स्पर्श करती है तो कह रहे हैं शुद्ध सच्चित सुखात्म उसे शुद्ध सच्चिदानंद में सुख प्रदान करने की योग्यता देती है।

यह वायु वृंदावन की पीछे एक जगह निकला था कि वृंदावन का जल साधारण जल मत समझो। सब चरणामृत है। सच्चिदानंद घन वृंदावन की वायु सच्चिदानंद घन स्वरूप प्रदान करने में समर्थ है। हम वृंदावन वासी हैं। ये ठसक रखो। श्रीमद् वृंदा विपिन विलसद वल वृक्षाद संगी यहां लता लता के तरु तरु के नीचे हमारे प्रिया प्रीतम बैठकर विनोद करते हैं। रसमई बातें करते हैं। रसमई क्रीड़ाएं करते हैं। इसलिए इन लताओं का जो आलिंगन करते हैं, इन लताओं को जो हृदय से लगाते हैं, लताओं का जो सम्मान करते हैं, वो दिव्य वृंदावन की कृपा को प्राप्त करते हैं।

यहां से कोई भी जीव या कोई लता मत ले जाना। कि आप कहीं बाहर से आए हैं। तुलसी जी देखा खरीद ले गए। कोई वृक्ष देखा, कोई पशु पक्षी बहुत बड़ा अपराध है। यह सब दिव्य तपस्या करके इस भूमि में प्रकट हुए। कल एक प्रश्न्ता ने कहा कि हमारा मकान वृंदावन में भी है और दिल्ली में भी है। हम एक तुलसी जी खरीद के ले गए। बहुत उपाय किया और सूख गई। तब से मैं अशांत हूं। अपराध बन गया। धाम से किसी भी लता को मत ले जाना। गिरिराज जी को मत ले जाना। किसी जीव को मत ले जाना। रज ले जाओ, चंदन ले जाओ, चरणामृत ले जाओ।

प्रभु का प्रसादी, वस्त्र, मुकुट ये सब ले जाओ। लेकिन प्रभु के निज जनों को चाहे वो घास ही क्यों ना उगी हो। कितना तप किया होगा जब वृंदावन में तण बनी है आकर के। उद्धव जी कह रहे मुझे तण लता औषधि गुल्म बना दो। मत ले जाना यहां से। अपराध हो सकता है। बहुत बड़ा अपराध हो सकता है। जिसकी पूर्ति वृंदावन ही कृपा करे तो हो सकता है। नहीं वृंदावन के जनों का वृंदावन के खग पशु पंछियों का अपराध किसी और तीर्थ की ताकत नहीं कि तुम्हें निष्पाप कर दे। सर् क्रमितो आ कह रहे हैं कि ऐसे वृंदावन में मुझे कीड़ा बना दो।

प्रेम को भी प्रेमी किसी भी तरह एक प्रेमी कहता है अपने किसी प्रियजन से कि ऐसा करना जब मेरा शरीर छूट जाए तो मुझे इस रज से संस्पर्श करते हुए घसीटते हुए ले जाना और हे प्रभु जब मेरे शरीर को आग लगाई जाए तो मेरे शरीर का जो राग है वो इसी वृंदावन की रज में फेंक दी जाए जिससे प्रेमी जनों की चरण धूल में मिलकर चरण धूल बन जाए। उनके चरणों का स्पर्श हो। मेरा आकाश तत्व शरीर से निकलकर वहां हो जहां शब्द राधा राधा उच्चारण किया जा रहा हो। मेरे शरीर का वायु तत्व निकल कर वहां हो जहां प्रेमी जनों के शरीर का स्पर्श होता हो।

मेरा जल तत्व वहां हो जहां मेरे प्रभु और प्रीतम के प्यारे जनों की सेवा होती हो। मेरा पृथ्वी तत्व वहां हो जहां इनके चरण पड़ते हो। मर के भी अपने प्रीतम को सुख देना। वृंदावन इतना प्यारा है श्रीपाद प्रभुंद जी को कह रहे क्रम तनु भ्रतो वैष्णवम धाम इस वैष्णव धाम में कीड़ा मकोड़ा बना के रख लिया जाए देखो अपने लोगों के ऊपर कितनी कृपा है कि विवेक प्रधान मनुष्य शरीर बनाकर प्रभु ने धाम दिया क्या चाहिए फिर भी कोसते हो प्रभु ने क्या दे दिया प्रभु ने क्या रखा रखा अपने पास सब कुछ दे दिया नाम मंत्र संत समागम धाम अब तुम्हारी बुद्धि मारी गई है राग द्वेष ईर्ष्या काम क्रोध तो तुम भोगो प्रभु की तरफ से कोई कृपा में कमी नहीं है

आहा यहां वो सुख मिलता है अगर आप भजन में लगो कि नेतम तष् अवसर दशो द्वार सज्जा विमाना बैकुंठ का विमान सजा हुआ आया हो तो द्वार से वापस कर देगा मुझे वृंदावन में रहना बैकुंठ नहीं जाना ये ले जाओ विमान अपना मैं यहां नाली का कीड़ा बनकर रहना पसंद करूंगा वैुंठ में मैं विमान पर बैठकर नहीं जा ये प्रेमा शक्ति वृंदावन धाम की चलते हैं परम कृपालु करुणा वरुणालय भगवान श्री हरि की पावन प्राकट्य लीला का कथन श्रवण करके अपने हृदय को उनकी प्रेम लक्षणा भक्ति से युक्त करते हैं।

प्रसंग चल रहा है। कंस ने वासुदेव देवकी जी को छोड़ दिया था। जब प्रथम पुत्र लाए तो देवर्षि नारद जी ने देखा कि यह पापी अगर ऐसे दया करेगा तो भगवान के अवतार में विलंब होगा। आकर के कंस के सामने नारायण नारायण नारायण कंस ने पूजन किया। कंस से कहा मैं तुम्हें बताने आया हूं कि यह ब्रज में रहने वाले जितने नंद गोप है उनकी स्त्रियां हैं। ये सब दिव्य हैं। ये बृजवंशी यादव देवकी यदुवंशी की स्त्रियां सब देवी हैं। और जितने यदुवंशी सब देवता हैं। यह बड़े-बड़े सब देवता आए हुए हैं।

तुम्हारी सेवा में भी गुप्त रूप से देवता ही वास कर रहे हैं। अवसर देख रहे हैं तुम्हारे विनाश का। और तुम्हें पता होना चाहिए जो आकाशवाणी हुई थी कि अष्टम गर्भ तुम्हारा विनाश करेगा। जानते हो कौन आने वाला है। पृथ्वी का भार बढ़ गया है। असुर भाव की वृद्धि हो रही है। तो भगवान स्वयं अवतरित हो रहे हैं अष्टम गर्भ के रूप में और पता नहीं कौन सा अष्टम गर्भ हो। बस कंस का दिमाग घूम गया। तुरंत आदेश किया वसुदेव देवकी को कैद कर लिया जाए। उसको पक्का हो गया कि सर्वलोक महेश्वर भगवान मारने के लिए मुझे आ रहे हैं।

और उसे स्मृति आई पूर्व जन्म की। मैं काल नेम राक्षस हूं। तो मुझे मारने के लिए स्वयं भगवान पधार रहे हैं। कड़ी हथकड़ी बेड़ियों से जकड़ दिया वसुदेव जी को। घोर राक्षसी पहरा जो महान बलवान क्रूरकर्मा उनको बड़े-बड़े दरवाजे बंद जेल के दरवाजों पर पहरेदार हथकड़ी बेड़ी देवकी वसुदेव जी की परीक्षित प्राय देखा जाता है कि जो अपने ही प्राणों का पोषण करते हैं। ऐसे लोभी निर्दयी स्वार्थ की पूर्ति के लिए अपने माता-पिता का भी वध कर देते हैं। पूज्य जनों का भी अपमान कर देते हैं।

अपने हितैषी और मित्रों की भी हत्या करवा डालते हैं। उसने तत्कालीन राजा अपने पिता को बंदी बना लिया। महाराज उग्रसेन को कैद कर लिया और स्वयं मुकुट छीन करके शूरसेन देश का राज्य शासन अपने हाथ में ले लिया। कश तो बहुत स्वयं बली था। कोयलिया पेड़ हाथी ये दों हजार हाथियों का बल लगता था। एक हाथ से परास्त कर दिया था। तभी जरासंध प्रसन्न होकर के अपनी दो पुत्रियों का इससे ब्याह किया और दहेज में कोलिया पे हाथी दिया था। मग नरेश जरासंध की बहुत बड़ी बल की सहायता थी कंस के पास प्रणंबासुर बकासुर चाडुर तणावर तघासुर मुष्टिकासुर अरिष्टासुर द्वत पूतना केशी धेनुकासुर बाणासुर भौमासुर ये बड़े-बड़े महान बलशाली जो पृथ्वी पर विजय प्राप्त कर ले ऐसे कंस के दोस्त थे सहायक थे कंस ने आदेश कर दिया जो यदुवंशी मिले मार डालो उसे।

समस्त यदुवंशी भयभीत हो गए। कोई कुरु देश, कोई पांचाल, कोई कैकय, कोई शाल्व, विदर्भ, निषद, विदेह, कौशल आदि देशों में भागकर अपने प्राणों की रक्षा की। और कुछ लोग जो बहुत विवेकी थे उसको प्रणाम करके मीठी मीठी बातें करके उसको विश्वास दिलाया कि हम आपकी सेवक हैं। आपकी आज्ञा में हैं। अक्रूर आदि जैसे बड़े-बड़े यदुवंशी जब कंस ने एक एक करके देवकी के छह बालक मार डाले। तब देवकी के सातव गर्भ में भगवान के अंश स्वरूप जिन्हें अनंत कहा जाता है। भगवान शेष जी आए। आनंद स्वरूप शेष जी के गर्भ में आने के कारण देवकी को स्वाभाविक बहुत आनंद हर समय आनंदित रहती।

परंतु एक भय सता रहा था। कंस इसे भी ना मार डाले। बड़ा शोक हुआ। आर भाव से देवकी जी ने भगवान को पुकारा। विश्वात्मा भगवान ने देखा कि मुझे अपना स्वामी और सर्वस्व मानने वाले कंस के द्वारा बहुत सताए जा रहे हैं। तो अपनी योग माया का चिंतन किया। तत्काल योग माया हाथ जोड़कर सामने खड़ी हुई। भगवान ने आदेश दिया कल्याणी तुम ब्रज में जाओ। गच्छ देवी ब्रज भद्रे गोप गोभी रलंकृतम जहां ग्वाल और गौ से सुशोभित ब्रज है वहां हमारे परम प्राण प्रिय नंद जी और यशोदा जी विराजमान है।

उन्हीं के पास वासुदेव की पत्नी रोहिणी निवास करती है। कंस से डरकर गुप्त रूप में इस समय मेरा अंश जिसे भगवान शेष जी कहते हैं देवकी के उदर में गर्भ रूप में है जाओ वहां से निकाल के रोहिणी के उदर में भगवान शेष जी को विराजमान करो और मैं स्वयं समस्त ज्ञान बल ऐश्वर्य आदि आदि से युक्त होकर देवकी का पुत्र बनूंगा। तुम नंद बाबा की पत्नी यशोदा जी के यहां कन्या रूप से विराजमान हो जाओ। तुम लोगों को मुंह मांगे वरदान देने में समर्थ होगी। जो हे देवी कुमुदा चंडिका कृष्णा माधवी कनकेच माया नारायण सानी शारदे अंबिकच तुम्हारे नाम है जो तुम्हारी भाव से आराधना करेगा धूप दीप नैवेद्य आदि से उसकी सारी कामना पूर्ण करने में तुम समर्थ होगी।

देवकी के गर्भ से खींचे जाने के कारण भगवान शेष जी को लोग संसार में संकर्षण कहेंगे। लोक रंजन करने के कारण राम कहेंगे और बलवानों में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण बलभद्र कहे जाएंगे। जब सर्वेश्वर भगवान ने इस प्रकार योग माया को आदेश किया। योग माया ने हाथ जोड़कर सर झुकाया और कहा जो आज्ञा ऐसा कहकर उनकी बात की और उनकी परिक्रमा करके इस भूतल पर भगवान ने जैसा कहा था वैसा ही किया। अचानक देवकी का गर्भ अंतर्ध्य कंस को सूचना पहुंची। सातवां गर्भ नष्ट हो गया है। और वो योग माया देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया।

पूर्वाशी बेचारे बड़े दुखी हुई है कि छह तो कंस ने मार डाले। सातवा अपने आप अंतर्ध्य हो गया। अब भक्तों को अभय करने वाले भगवान विश्वात्मा भक्त नाम अभयंकर आवेश भाग मन आकंदभ अपने भक्तों को अभय देने वाले समदर्शी सर्वत्र विराजमान परमात्मा वासुदेव जी के मन में अपनी समस्त कलाओं के साथ प्रकट हुए। महान तेजस्वी हो गए वासुदेव जी। मानो कई सूर्य एक साथ उदय हो। ऐसा तेज वसुदेव जी के क्योंकि भगवान उनके हृदय में प्रकाशित हो गए। लोगों की आंखें नहीं टिकती वासुदेव जी के चेहरे पर।

कोई भी अपने बल वाणी या प्रभाव से उसे दबा नहीं सकता जिसके हृदय में भगवान का प्रकाश हो जाता है। भगवान के उस महा तेजोमय स्वरूप को धारण करने के कारण वासुदेव जी महान तेजस्वी भगवान वासुदेव जी के आधान किए जाने पर देवकी के हृदय में प्रकाशित हुए। जैसे पूर्व दिशा चंद्र देव को धारण करती है वैसे शुद्ध सत्य से संपन्न देवी देवकी ने विशुद्ध मन से सर्वात्म आत्म स्वरूप भगवान को धारण किया। भगवान सारे जगत के निवास स्थान है। आ सा देवकी सर्व जगन निवास निवास भूतान नरे भोजेंद्र ग निखे वरुद्धा सरस्वती ज्ञान खले यथा सति भगवान सबके निवास स्थान है।

देवकी जी भगवान का निवास स्थान बनी। परंतु जैसे घड़े में तेज चमक रहा। ऊपर से बंद ऐसे घोर कठोर पहरा बड़ी-बड़ी दीवारें, बड़े-बड़े दरवाजे जेल में देवकी जी के भगवान प्रकाशित हुए पवित्र दिव्य आनंद देवकी जी को है। भगवान पधारे शरीर की कांत जो बंदी ग्रह अंधेरे से भरा हुआ था। जगमगा उठा देवकी जी की अंग कांत से। सूचना हुई कि इस समय देवकी और वसुदेव का अद्भुत तेज घबरा गया कंस। भारी घबराहट पैदा हो गई। यह आठवां गर्भ है। यह मेरी मृत्यु बनेगा। अबकी बार मेरे प्राणों का ग्राहक भगवान आया है।

बड़ी विचित्र दशा कंस की है। जिधर देख भगवान ही भगवान भयवश वो भगवत भाव में हो गया। प्रति पल वो बस ये कि संतान हुई है। सूचना मिल जाए। विचार किया देवकी को मारना तो ठीक नहीं। यह विचार कब आ रहा है? क्योंकि भगवान उधर में विराजमान है। मैं वीर पुरुष हूं। बालक पैदा होगा उसे मारूंगा। देवकी को नहीं। गर्भवती स्त्री पर हाथ उठाना ठीक नहीं है। कंस विचार कर शिक्षा लो। घर गृहस्ती में यदि माताएं गर्भवती हो तो उनको किसी भी तरह से कष्ट ना दिया जाए। उनसे विशेष सेवा ना ली जाए।

उनको मारा पीटा ना जाए। कटु वचन ना कहा जाए। ऐसा सिद्धांत है। वह मरा हुआ व्यक्ति है जो ऐशों को कष्ट देता है। छोटा बालक अपाहिज व्यक्ति रोगी वृद्ध गर्भवती स्त्री ये सब सम्माननीय पूजनीय है। और इनको सहयोग देना चाहिए ना कि क्लेश देना चाहिए। वह मरा हुआ व्यक्ति है जो इनको कष्ट देता है। अर्थात उसके सारे पुण्य नष्ट हो जाते हैं। जो अत्यंत क्रूरता का व्यवहार इनके साथ करता है। जैसे कोई अपाहिज है आप उसको और कष्ट दे रहे। के कटु वचन वयो वृद्ध माता-पिता रोगी शरीर गर्भवती माता बहुत सावधान इनके साथ व्यवहार आपका मृदु सम्मान युक्त होना चाहिए नहीं सारे पुण्य नष्ट हो जाते मरा हुआ व्यक्ति है उसकी मृत्यु के बाद उसे यमराज के यहां भारी दंड मिलता है नरक में और यहां लोग उसे निंदा करते हैं गाली देते हैं इतना ही नहीं वह देहाभिमानियों के योग्य घोर नरको में अवश्य अवश्य अवश्य जाता है।

यद्यपि कंस की बुद्धि भ्रष्ट थी लेकिन इस समय उसको जो ज्ञान हो रहा है वो देवकी का चिंतन हो रहा है और भगवान का चिंतन हो रहा है। इसलिए भले ही द्वेष से सही पर भगवान का चिंतन होने के कारण बुद्धि पवित्र निर्णय कर रही है। अब भगवान से मन ही मन वर दृढ़ करके जन्म की प्रतीक्षा करने लगा। क्या स्थिति कंस की है? क्या स्थिति है? श्री सुखदेव जी महाराज के यही स्थिति बड़े-बड़े परमहंसों की होती है जो कंस की है। आसीन समिस्त भंजना पर्यटन मह चिंतया हसी केश मपस तन्मयम जगत आ कितनी उत्तम स्थिति बैठा है तो कृष्णा समन अगर वो उठकर के चल रहा है कृष्ण खा कृष्ण अगर उसे जीरा दिखाई देता है तो कृष्ण दिखाई देता है सांवला कृष्ण चलते फिरते उठते बैठते चिंतयानो रसी केशव पश्चत तन्मयम जगत जिधर देखता है उधर कृष्ण दिखाई देते हैं उसको यही तो स्थिति चाहिए ओो उठते बैठते खाते पीते सोते जागते चलते फिरते कृष्णमय हो गया कंस आसीना समस्त भजाना पर्यटन मह चिंतयानो रसिकेश मत तन्मयम जगत इधर भगवान शंकर जी ब्रह्मा जी बड़े-बड़े लोकपाल कंस के कैद खाने में आए सब प्रकाशित हो गए कंस के कैदखाने इसीलिए परम पवित्र मथुरा भूमि जहां हमारे भगवान अवतरित कितना सौभाग्य हमारे घर की बात है ये हमारे घर की बात है हम गर्व से कह सकते हैं हमारे घर की घटना है और हमारे घर वाले प्रभु की बात है समस्त देवता लोकपाल नारद आदि सब ब्रह्म ऋषि सब कैद खाने में उपस्थित थे।

देवकी वसुदेव जी के सामने हाथ जोड़े स्तुति कर रहे हैं भगवान की सत्य व्रतम सत्य परम त्रित्यम सत्यस यो निहितम च सत्य सत्यस सत्यमृत सत्य नेत्रम सत्यात्मकम त शरणम प्रपना फुल त्रिमूल चतुरसा पंच विधा सात्मा सप्तगो नवाक्षो दसदी द्वग वृक्षा तमेवास स प्रसू तम सधानम तम मनुग्रहस तया समत चे सस्त पश्यती नाना न विपितो हे भगवान आप सत्य संकल्प है हे भगवान सत्य ही आपकी प्राप्ति का श्रेष्ठ उपाय हे भगवान सृष्टि के पूर्व प्रलय के पश्चात संसार की स्थिति के समय इन असत्य अवस्थाओं में भी आप सत्य हैं।

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश ये पांच दृश्यमान सत्यों के आप ही कारण है। अंतर्यामी रूप से आप इनमें विराजमान है। आप इस दृश्यमान जगत के परमार्थ स्वरूप हैं। आप मधुर वाणी के समदर्शन के प्रवर्तक हैं। आप सत्य स्वरूप हैं। हम सब आपकी शरण में हैं। हे प्रभु यह संसार क्या है? एक सनातन वृक्ष। इस वृक्ष का आश्रय क्या है? एक प्रकृति इसके दो फल हैं। सुख और दुख तीन जन है सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण चार रस है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इनके जानने के पांच प्रकार हैं। श्रुत, त्वचा, नेत्र, रसना, नासिका इनके छह स्वभाव हैं।

पैदा होना, रहना, बढ़ना, बदलना, घटना, नष्ट हो जाना। इस संसार वृक्ष की छाल सात धातुएं रस रुधिर मांस मेद अस्थि मज्जा शुक्र आठ शाखाएं पांच महाभूत मन बुद्धि अहंकार इनमें मुख आदि नवोद द्वार खोल है प्राण अपान व्यान उदान समान नाग कुरख कृवदत्त धनंजय ये 10 प्राण इसके 10 पत्ते हैं और इस संसार रूपी वृक्ष पर दो पक्षी हैं जीव और ईश्वर इस संसार रूपी वृक्ष के उत्पत्ति के आधार एकमात्र आप ही है। आप में ही इसका सृजन होता है। आप में इसका पालन होता है। आप में इसका प्रलय होता है।

प्रभु जिनका चित्त आपकी माया से आवृत्त हो गया है। वो यह सत्य समझने की शक्ति खो बैठा है कि आप अपने आप से अपना सृजन करते हैं। अपने आप से अपने आप का पालन करते हैं। अपने आप से अपने आप का संहार करते हैं। जिनकी माया से आसक्त बुद्धि है, वह इस सामर्थ्य खो बैठते हैं इस रहस्य को जानने की। वह उत्पत्ति स्थित प्रलय आदि करने वाले को अलग-अलग देखते हैं। तत्व ज्ञानी पुरुष सब के रूप में केवल आपका ही दर्शन करते हैं। जैसे कुछ लोग प्रश्न कर देते हैं। भगवान ने उनकी रक्षा क्यों नहीं की?

क्यों करें? अवश्य में भोक्तव्यम कृतम कर्म शुभाश अपने अपने कर्म का विधान है। बोले भगवान को दया नहीं आती नहीं आती। क्यों? क्योंकि सृजन पालन संहार तीनों लीलाएं बराबर उनकी है। जब सृजन होता है तब जब पालन होता है तब और जब संहार होता है तब वो बिल्कुल निर्मम होकर अपने आप से अपने आप का सृजन अपने आप से अपने आप का पालन अपने आप से अपने आप का संहार वो किसी दूसरे का संहार थोड़ी हो रहा है। वो अपने आप से अपने आप में संहार लीला खेल रहे हैं। हे चराचर जगत के कल्याण के लिए अनेक को रूप धारण करने वाले भगवान आपके सब रूप विशुद्ध अप्राकृत सत में है और भक्तों को संतों को आप बहुत सुख देते हैं।

दुष्टों को उनकी दुष्टता का दंड देते हैं। दुष्टता का दमन करते हैं। ध्यान से सुनो। अगर भगवान के पक्षपाती बनाने की भावना है तो भक्ति करो और भगवान को अपने पक्ष में ले लो। माया पर विजय प्राप्त कर लो। और दुष्टता करोगे तो भगवान ही काल रूप तकर काल रूप में भ्राता दंड देंगे उनके लिए भगवान महान दुखमय बन जाते हैं जो धर्म के विरुद्ध शास्त्र के विरुद्ध आचरण करते हैं। ध्यान से सुन लो। अगर शास्त्र के विरुद्ध अधर्माचरण करोगे तो भगवान ही तुम्हारे लिए दंड रूप हो जाएंगे।

दुख रूप विपत्ति रूप कमल के समान कोमल अनुग्रह भरे नेत्रों वाले मेरे प्रभु कुछ बिरले लोग ही आपको समझ पाते हैं। कुछ बिरले ही एकाग्रता पूर्वक आप में चित्त लगा पाते हैं। और जो आपके हो गए आप में चित्त लगा दिया तो आपके चरण कमल रूपी जहाज में बैठकर आराम से संसार समुद्र से पार हो जाते हैं। अनायास ही पार हो जाते हैं। क्यों ना हो अब तक के सभी संतों ने इसी चरण कमल रूपी जहाज से संसार को पार किया। भगवान भी गीता जी में स्पष्ट कह दिए देवी हेशा गुणमई मम माया दरतया मामेव ये प्रपद्यते माया में ताम तरते परम प्रकाश स्वरूप परमात्मन आपके भक्त जन सारे जगत के निष्कपट प्रेमी सच्चे हितैषी होते हैं।

वे स्वयं तो इस भयंकर और कष्ट युक्त संसार से पार हो जाते हैं और हजारों को लाखों को मम भक्ति युक्त भवन पुन उनका कल्याण कर देते हैं। भक्तों में ऐसी सामर्थ है। क्यों? क्योंकि आपके चरण कमल रूपी नौका जो स्थापित है उसमें सबको बैठाते हैं। हरि शरणम हरि शरणम बैठो पार हो जाओ। वास्तव में संत पुरुषों का भक्तों का महान कृपा प्रसाद इस जगत में है। प्रभु आप अनुग्रह स्वरूप है। कृपा स्वरूप है। हे कमल नयन जो लोग आपके चरण कमलों की शरण नहीं लेते। बड़ी सुंदर बात है। ये नेविंदाक्ष विमुक्त मानिनस त भाव विशुद्ध बुद्ध आरु कृ परम पदम तत पतधना आहा जो लोग भगवान की शरणागति स्वीकार नहीं करते भगवान की भक्ति भाव से रहित है और बड़ा ज्ञान अपने को मुक्त मानते हैं।

झूठमठ वास्तव में बद्ध हैं। बड़ी-बड़ी तपस्या करके साधना का कष्ट उठा के ऊंचे ऊंचे पदों पर पहुंचकर वहां से भ्रष्ट होते देखा है। नीचे गिरते देखा है। ये भगवान शंकर ब्रह्मा आदि परंतु तथा नते माधवताकाच ब्रस मार्ग तब बद्ध सोदा तया गुप्त विच निर्भया विनायकानी कप मूधस प्रभु जो आपके शरण में हो गए आपके भरोसे हो गए जो आपके निज जन है आपके चरणों में जिन्होंने अपने आप को समर्पित कर दिया वे कभी जाना अभिमानियों की भांति अपने साधन से भ्रष्ट नहीं होते अगर चूक भी हो जाए जन अवगुण प्रभु मानन का दीन बंध मृदुल शो भाव बड़े-बड़े विघ्नों के डालने वाले सेनाओं के सरदारों के सिर पर पैर रखकर वो निर्भय विचरते हैं क्योंकि भरोसा आपका है।

कोई भी विघ्न माया का उन भक्तों के मार्ग में रुकावट नहीं डाल सकती जो आपके चरणों की शरण में और जो ज्ञानाभिमानी है उनको ऊंचे ऊंचे पदों से भ्रष्ट होते देखा है। प्रभु आप संसार की स्थिति के लिए समस्त देह धारियों के परम कल्याण प्रदान करने वाले विशुद्ध सत्य सच्चिदानंदमय परम दिव्य मंगल विग्रह से प्रकट हो रहे हैं। प्रभु उस रूप के प्रकट होने से ही आपके भक्त वेद कर्मकांड अष्टांग योग तपस्या समाधि के द्वारा आपकी आराधना करते हैं। बिना किसी आश्रय के साधना कैसे हो सकती है?

प्रभु आप सबके विधाता हैं। यदि आपका यह विशुद्ध सत्य में निज स्वरूप ना होता तो अज्ञान और उसके द्वारा होने वाले भेदभाव को नष्ट करने वाला अपरोक्ष ज्ञान भी किसी को ना होता। प्रभु यह जगत में दिखने वाले तीन गुण आपके हैं। आपके द्वारा प्रकाशित है। परंतु इन गुणों की प्रकाशक वृत्तियों से आपका ज्ञान नहीं हो सकता। वास्तविक ज्ञान के लिए आपके चरणों की सेवा करने से जो विशुद्ध सत्यमय स्वरूप का बोध होता है। यह यह खास बात भगवान की दासता से जो ज्ञान प्रकट होता है वो जड़ चेतन ग्रंथ का भेदन करता है।

भगवन मन और वेद वाणी के द्वारा केवल आपके स्वरूप का अनुमान मात्र होता है। वेद भी नेति नेति कहते हैं। क्योंकि आप वेद के द्वारा जानने में आने वाले नहीं है। वेद के भी वेद हैं। साक्षी हैं। इसलिए आपके गुण, जन्म, कर्म, आपके नाम, आपका रूप अद्भुत है। इतना नहीं कहा जा सकता। इतना रूप है, इतना गुण है, इतनी महिमा है। भक्त जन उपासना के द्वारा आपका साक्षात्कार करते हैं। बहुत सुंदर, बहुत सुंदर। जिसको भगवत प्राप्ति की चाह है, वह बहुत ध्यान से बात सुने। कैसे भगवत प्राप्ति होगी?

एक श्लोक में बहुत सुंदर शरण ग्रण संस्मरय चिंतयन नाम रूपा च मंगला क्रिया यस्त चरणवियो राष्ट चेता भवा कल्पते शरण रणवन जिसके कान हर समय लालायित रहते हैं। कहीं भगवत चर्चा सुनने को मिल जाए। कहीं भगवान की बात सुनने को मिल जाए। बावरो सो रस में फिरे खोजत नेह की बात। कहीं मेरे प्यारे की बात सुनने को बलिहारी है उन भक्तों। वृंदावन में तो हजारों ऐसे भ्रमर हैं भगवान के रस कथा के। अभी यहां फिर वहां फिर वहां दिन भर वो माला लिए। बस भगवान की चर्चा सुनने में जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

श्रणमन और ग्रण खूब उत्साह पूर्वक नाम कीर्तन नाम कीर्तन ऐसे करना चाहिए कि यहां की गले की नसे फूल जाए। चेहरा लाल हो जाए और रोने का मन हो तब समझो नाम कीर्तन सार्थ। चीख के राधा राधा आंसू बहने लगे। सब भूल जाए घण भगवान की लीला का गायन करना, पदों का गायन करना। जैसे भूखे आदमी को बढ़िया स्वादिष्ट भोजन मिल जाए फिर थार खींचो तो जबरदस्ती दोनों हाथ से अरे छक लेने दो। ऐसे ही जब हम गाने बैठे तो ऐसी भूख होनी चाहिए गाने की कि यार शाम तक वैसे बैठे रहे। प्रभु ऐसी सामर्थ्य दे दो कि बैठ जाए सुबह से शाम तक केवल लीला गायन करें।

भगवत प्राप्ति का सीधा उपाय है शरणमन ग्रहण और जो हमने गाया जो सुना उसका स्मरण संस्मरय भगवान का स्मरण बहुत जोर की बात है आपके नामों का रूपों का गुणों का श्रवण कीर्तन स्मरण और चिंतयन जो ध्यान करता है और आठों पहर आपकी सेवा मेंित लगाए रहता है। उसको जन्म मृत्यु रूपी संसार चक्र में दोबारा नहीं आना होगा। वही आप सबको अनायास वही दिनचर्या प्राप्त है जो भगवत प्राप्ति के ही सोपान पर चढ़ाती है। श्रण ग्रण संस्मर चिंतयन नाम रूपान मंगला और क्रियासु क्रिया क्या है?

य चरणारविंद चेता बस खास बात है आविष्ट चेता भगवान के आवेश में भरे हुए कभी सैया रचना करें श्रृंगार कर कभी झूला झुला रहे कभी नाच रहे कभी गा रहे हैं ऐसा उपासक कभी जन्म मृत्यु संसार चक्र में नहीं पड़ेगा हे प्रभु संपूर्ण दुखों के हरने वाले भगवान आप सर्वेश्वर हैं। यह पृथ्वी आज धन्य धन्य हो जाएगी क्योंकि आपका अवतार हो रहा है। आपके अवतार से इसका भार दूर होगा। धन्य है प्रभु हमारे लिए बड़े सौभाग्य की बात है कि आपके सुंदर सुंदर कोमल कोमल चरण चिन्हों से विभूषित जब हम पृथ्वी को देखेंगे तो आप मस्तक रखेंगे हृदय रखेंगे।

हमारे नेत्र सफल होंगे। जब 19 चरण चिन्हों से चिन्हित भूमि को देखेंगे। प्रभु वैसे तो आप अजन्मा हैं। आपके जन्म के कारण के संबंध में कोई तर्कना नहीं। फिर भी हम ये कह सकते हैं कि आप अपने भक्तों के लिए अवतार धारण करते हैं। आ प्रभु आप द्व लेश से रहित सर्वाधिष्ठान आत्म स्वरूप है। यह आपका एक लीला विनोद केवल अपने प्राण प्यारे भक्तों के लिए है। प्रभु आपने जैसे अनेकों बार मत्स्य अवतार हग अवतार कच्छप अवतार नरसिंह अवतार वारा अवतार हंस अवतार राम अवतार परशुराम वामन अवतार धारण किया ऐसे ही इस बार आपका कृष्णा अवतार हो रहा है।

आप हम सब का प्रणाम नमस्कार चरण वंदना स्वीकार कीजिए। देवकी जी को संबोधित करके कहा माता जी यह बड़े सौभाग्य की बात है कि सर्वलोक महेश्वर भगवान आपके यहां प्रकट हो रहे हैं। ज्ञान बल ऐश्वर्य से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान पधार रहे हैं। द्याते कुक्षता परमान से साक्षात भगवान भय साक्षात भगवान पधार रहे हैं। आप कंस से तनिक भी मत डरिए। अब तो वह कुछ दिन का मेहमान है। यह महाबलशाली भगवान उसको घसीट कर मारेंगे। तुम निश्चिंत हो जाओ। परीक्षित ब्रह्मादि देवता इस प्रकार भगवान की स्तुति करके अपनी मति के अनुसार वंदना करके सब अंतर्ध्य हो गए।

जो कंस के कारागार में प्रकट हुए थे। अब अ सर्व गुणो पेता काल परम शोभन यवा जन्मक्षम श्तक्ष ग तारकम भगवान अवतार ले रहे हैं तो समस्त शुभ गुण प्रकृति में प्रकट हो गए सुहावना लुभायमान प्रकृति रोहिणी नक्षत्र आकाश के सभी नक्षत्र ग्रह तारे शांत सौम्य हो रहे हैं। जब अंतःकरण निर्मल हो जाता है तो भगवान का प्रादुर्भाव होता है। ऐसे प्रकृति निर्मल हो गई। भगवान के प्रादुर्भाव के समय काल, दिशा, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, आत्मा सब अलग-अलग दिव्य तेजोमय निर्मल भगवान अवतार ले रहे हैं तो दिशाएं स्वच्छ निर्मल प्रसन्न आकाश दिव्य तेजोमय हो गया।

जगह-जगह रत्नों की खान हीरे जवाहरात की खाने भूमि ने प्रकाशित कर दी। नदियों का जल निर्मल जबकि कमल दिल में खिलते हैं पर रात्रि में सब जगह कमल खिल गए क्योंकि कमलाक्ष भगवान प्रकट हो रहे नमः पंकज नाभाय नमः पंकज मालिने नमः पंकज नेत्राय संपूर्ण बन खिला हुआ रंग बिरंगे पुष्पों के गुच्छे लदे हुए रात्रि में पक्षी चहक उठे भोरे गुनगुनाने लगे भव वायु सुख स्पशा पूर्ण गंध सुचे धीमीधीमी वायु बह रही सुगंध से जो ब्राह्मणों की अग्निहोत्र की अग्नियां कंस राक्षसों ने बुझा दी थी अपने आप दिव्य रूप से प्रज्वलित हो गई अग्नस्तजाति नाम शस्तत्र समत बिना समधा के अग्नि प्रकाशित हो गई संत पुरुष तो पहले से ही चाहते थे कि आसुरी प्रवृत्ति की बढ़ती ना हो।

पता नहीं क्या सब संतों के भक्तों के हृदय में एक अद्भुत आनंद क्योंकि भगवान का आविर्भाव हो रहा है। स्वर्ग में देवताओं की धुंधिया अपने आप बज उठी। जब किन्नर गंधवा सिद्ध चारणा विद्या धन अप्सरो भी शमम तदा किन्नर गंधर्व गान करने लगे सिद्ध चारण मंगलमय भगवान की स्तुति करने लगे विद्याधरिया अप्सराएं नृत्य करने लगी बड़े-बड़े देवता ऋषि मुनि आनंद में भरकर कंस के कारागार के ऊपर पुष्पों की वृष्टि कर रहे। अब संपूर्ण बल से मेघ गर्जना करने लगे। भगवान होते और बादल लटकने लगे।

अंधियारी रात हो गई। वर्षा प्रारंभ हो गई। मेघ की गर्जना और मोटे-मोटे बूंदे। बड़ा भयावह अंधकार क्योंकि जन्म मृत्यु के चक्र से छुड़ाने वाले जनार्दन के अवतार के समय निश ठीक 12:00 बजे रात्रि अंधकार का साम्राज्य उसी समय निशि तम उद्भूते जायमाने जनार्दने देव देव रूप्या विष्णु सर्व गुहाय आविरासी यदा प्रा्याम द्दु पुष् भगवान जनार्दन के अवतार का समय रात्रि के 12:00 बजे घोर अंधकार का सामाज है मेघ गर्जना कर रहे हैं वर्षा हो रही भगवान स्वयं देव रूपणी देवकी के सामने प्रकट हुए।

समस्त कलाओं के आचार्य हैं। पर यहां 16 कलाओं से पूर्ण प्रकट हुए। क्योंकि चंद्र वंश में वसुदेव देवकी जी ने देखा एक बड़ा अद्भुत स्वरूप भगवान का तमद्भुतम बालकम बुजेक्षणम चतुर्भुजम शंख गदा युदाम श्री वत्स लक्ष्म शोभोस्तु म पीतांबरम श्रपय शोभगम महा हवदुल किरीट कुंडल परिशक्त सहस्त्र कुंतलम उदाकांगद कंक विरोमान वासुदेवत साविस्मयोल विलोचनो हरि सुतम विलोक्याकदा कृष्णा समोस मुदाजेत मालतो गवा वसुदेव जी ने देखा नेत्र कमल के समान कोमल विशाल चार सुंदर हाथों में शंख गदा चक्र कमल लिए वक्षा स्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह गले में

कौस्तुभ मणि झिलमिला रही वर्षा कालीन मेघ के समान परम सुंदर श्यामल शरीर पर बिजली की तरह मनोहर पीतांबर फहरा रहा बहुमूल्य वैदुर मणि किरीट कुंडल कांत से सुंदर सुंदर घुंघराले बाल और दिव्य तेजोमई कांत नख चंद्रिका से मानो सूर्य प्रकाशित हो रहे हो कमर में चमचमाती करधनी की लड़ियां बाहों में बाजू बंद कलाइयों में कंकण शोभायमान ऐसे भगवान को सामने देखा भगवान स्वयं पुत्र रूप में पधारे बड़ा आश्चर्य हुआ परमात्मा मेरा पुत्र बन गया आंखों से आंसू चल रहे हैं वसुदेव जी के आनंद रोम रोम आनंद में मग्न है क्या करूं?

हथकड़ी बेड़ियों से जकड़ा हूं। पर जब मैं यहां से मुक्त होऊंगा तो 10,000 ब्राह्मणों को करोड़ों गए दान करूंगा। संकल्प किया इस समय तो हथकड़ी बेड़ी से जकड़े। भगवान अपनी अंगकांत से संपूर्ण श्रुतिका ग्रह को प्रकाशित कर दिया। झेल तो वासुदेव जी को निश्चय हो गया है। परम ब्रह्म परमात्मा स्वयं भगवान पधारे हैं। सारा भय जाता रहा। भगवान के चरणों में मस्तक रखा और हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे। विदितो भवान साक्षात पुरुष प्रक पर केवलंद स्वरूपा सर्व बुद्ध श स्वप्न कृतदम सष्ट्ञ त्रिगुणाकम तदतम प्रविष्ट प्रविष्ट भावसे समझ गया समझ गया प्रभु प्रकत से अतीत साक्षात परमात्मा पुरुषोत्तम आप का स्वरूप केवल अनुभव स्वरूप केवल आनंद स्वरूप आप समस्त बुद्धियों के एकमात्र साक्षी आप ही स्वर्ग के आदमी अपनी प्रकृति से इस त्रिगुणमय जगत की सृष्टि करते हैं।

फिर इसमें प्रविष्ट ना होने पर भी प्रविष्ट होने की लीला करते हैं। प्रभु जैसे जब तक महातत्व आद कारण तत्व पृथकप्रथक रहते हैं तब तक उनकी शक्ति भी पृथकप्रथक होती है। जब वे इंद्रिया आदि 16 विकारों के साथ मिलते हैं तभी इस ब्रह्मांड की रचना करते हैं। इसे उत्पन्न करके इसी में अनुप्रविष्ट से जान पड़ते हैं। पर सच्ची बात तो यह है कि वो किसी पदार्थ में प्रवेश नहीं करते। इसका कारण है कि वो स्वयं पदार्थ बने हुए हैं। ठीक वैसे ही बुद्धि के द्वारा केवल गुणों के लक्षणों का अनुमान होता है।

आपका नहीं बुद्धि की सामर्थ्य नहीं कि भगवान का अनुभव करा सके। हे सर्वांतर्यामी हे परमार्थ सत्य आत्मा स्वरूप ये गुणों का आवरण आपको नहीं ढक सकता। इसलिए आप में ना बाहर है ना भीतर है फिर भी आप किस में प्रवेश करेंगे मैं सत्य समझता हूं आपकी कृपा से वो अज्ञानी है जो ये बात नहीं समझ पाता ये देह के आदि पदार्थ सब माया का विलास है विचार के द्वारा इसकी अस्तित्व सिद्धि नहीं होती बल्कि बाधित जो बाधित है जैसे स्वप्न में है तो जागृत अवस्था का स्थूल देह बाधित पड़ा है कोई ध्यान नहीं और जब जागृत हुए तो स्वप्न अवस्था झूठी ये तत्काल तत्काल जो झूठे हो रहे हैं सत्य कैसे हो सकते हैं आप सर्वशक्तिमान सबके स्वामी संसार के रक्षक आप मेरे घर आए अखिल कोटि ब्रह्मांडों के पिता हैं आप प्रभु ये बड़े-बड़े असुर प्रकट हो गए हैं जो घोर अत्याचार कर रहे हैं।

आप इनका संघार कर डालेंगे। हे आराध्य देव ये कंस बड़ा दुष्ट है। प्रभु मुझे अब भी भय लग रहा है कि अगर वह सुनेगा कि आपका अवतार हुआ। आप प्रकट हुए तो प्रभु जैसे आपके भाइयों को मार डाला। कहीं वो शस्त्र लेकर आए और ऐसा कुछ अनिष्ट ना कर दे। जान रहे हैं परम ब्रह्म परमात्मा है पर पुत्र भाव है इसलिए अधिक प्रीति मन भांदेहा जब वसुदेव जी स्तुति कर रहे हैं तो देवकी जी गौर से देख रहे हैं कि अरे पुरुषोत्तम सच्चिदानंद भगवान पहले तो कंस के भय से भयभीत फिर मुस्कुराती हुई देवकी जी ने कहा प्रभु प्रभु वेद जिसे अव्यक्त बताते हैं वो व्यक्त होकर हमारे सामने है।

ब्रह्म ज्योतिष स्वरूप बताते हो मेरा पुत्र बनने। प्रभु जिस समय ब्रह्मा की पूरी आयु दो पदार्थ समाप्त हो जाती है उस समय वह भी भयभीत होते हैं और काल शक्ति के द्वारा ब्रह्म लोक तक सब नष्ट कर देते हैं आप ये पंचमाभूत अहंकार अहंकार महातत्व महातत्व प्रकृति में लीन हो जाता है प्रभु आप केवल शेष रहते हैं इसलिए आपका नाम एक शेष है प्रभु ये मृत्यु ग्रस्त जीव कहां-कहां किस-किस की शरण में नहीं गया। लेकिन आज तक कोई निर्भय नहीं कर पाया। आज आप बड़े भाग्य के आपके दर्शन हो रहे हैं।

आपकी शरण में भक्त भयारी हम लोग बहुत भयभीत हैं कंस से। देखो भगवान को देख रहे हैं। फिर भी पुत्र भाव होने के कारण यह बात है। प्रभु हम बहुत भयभीत हैं। अपने लिए नहीं आपके लिए। कहीं कंस ऐसे मधुसूदन कुछ ऐसा उपाय करो जिससे कंस ना जान पावे कि आप मेरे यहां प्रकट हुए। मेरा धैर्य टूट रहा है। मैं आपके लिए कंस से डर रही हूं। विश्वात्मन मेरी प्रार्थना है यह यह होता है बालक रूप भगवान का उपसर विश्वात्म रूपम अलौकिकम शंख चक्र गदा पद्म चतुर्भुजम हटा रूप प्रभु उपसहार करो इस रूप का और बालक बनो जैसे कौशल्या जी माता पुनि बोली सोमति डोली तजहु तात यह रूपा कीजे शिशु लीला अति प्रिय शीला जो सुख परम अनूपा सुनी वचन सुजाना [चीखने की आवाज़] रोदन ठाना होई बालक सुर भूपा ये चरित जगाव हरि पद पाव ते न पर भव कुपा उपसर विश्वत्म दो रूप मलौकिकम शंख चक्र गदा पद्म श्रीियाष्टम चतुर्भुजम उपसहार

करो इस रूप का नाथ और आप मेरे बालक के रूप में विश्वम यतन निशते यथावकाशम पुरुष परो भवान विभय मम गर्भ बलोकस विडंबन हित देखते देखते भगवान बाल रूप और बताया कि सुनो स्वयंभू मनवंतर में जब तुम्हारा पहला जन्म हुआ था उस समय तुम्हारा नाम प्रश्न था और वसुदेव सुतपा नाम के प्रजापति थे तुम दोनों ने शुद्ध हृदय से मेरे लिए तपस्या की और जब वरदान की बात आई तो उत्कृष्ट तपस्या के प्रभाव से तुम दोनों ने वर्षा वायु घाम शीत उष्ण सब सहा प्राणायाम के द्वारा मन को मलक हो के प्राणों को सूक्ष्म करके सूखे पत्ते खा के फिर हवा पी के हमारे लिए तपस्या की तुम्हाराित शांत निर्मल मेरी आराधना से युक्त 12 हजार वर्ष तक वसुदेव देवकी जी ने पत्ता और हवा यहां एक दो दिन उपवास कर ले तो कुटू का ये हो सिंघाड़े का हलवा हो व्रत हो रहा है भगवान के लिए अरे 24 घंटे व्रत रहना है तो पानी भी मत पियो क्या जाता है मर थोड़ी जाओगे भगवान के लिए 12 हजार वर्ष सूखे पत्ते खाकर कभी वायु से पूर्णिमाई देवी उस समय मैं प्रसन्न हुआ।

तुम्हारी तपस्या पूर्ण हुई। तुम मेरे प्रति महा प्रेम रखकर हृदय में ऐसी भावना करते थे कि भगवान जैसा पुत्र हो। आ उस समय समस्त अभिलाषा पूर्ण करने वाला वर देने वालों का राजा मैं तुम्हारे सामने प्रकट हुआ। मैंने कहा तुम्हारी इच्छा हो वो वरदान मांग लो। तुमने कहा तुम्हारे जैसा पुत्र चाहिए। मेरे जैसा मेरे जैसा तो मैं ही हूं। आ जाओ मैं तुम्हारा पुत्र बनूंगा। धन्य है धन्य है। तपस्या सार्थक हुई। तुम सफल मनोरथ हुए। मैंने देखा कि त्रिभुवन में अखिल ब्रह्मांडों में शील स्वभाव उदारता बल ज्ञान वैराग्य ऐश्वर्य में मेरे समान कोई नहीं है।

इसलिए मैं ही तुम दोनों का पुत्र हुआ। कृष्ण गर्भ कहलाया। वासुदेव जी कश्यप और तुम अदिति हुई। उस समय मैं वामन के रूप में अवतार लिया। क्योंकि मैं जब एक बार कहता हूं, वरदान देता हूं तो तीन बार उसको पूरा करता हूं। तीसरे जन्म में तुम देवकी और वसुदेव हुए उसी वाणी को सत्य करने के लिए और यह रूप मैंने इसलिए दिखाया कि मैं परम ब्रह्म परमात्मा हूं। ये स्मरण रखना मैं केवल पुत्र ही नहीं हूं। ध्यान रखो भगवान शिक्षा दे रहे हैं कि केवल भगवान को अगर वात्सल्य भाव से तो केवल बेटे ही अकेले नहीं वो परब्रह्म भी हैं तो उसी हिसाब से वर्ताव होना चाहिए।

तुम दोनों स्पष्ट देखो तुम दोनों मेरे प्रति पुत्र भाव और ब्रह्म भाव दोनों रखना। भगवान आदेश कर रहे हैं महाप्रभु इतना दुलार लाडली लाल को कर रहे हैं पर बीचबीच में कहते जाते हैं जैसे हित हरिवंश करत अपनो जस प्रगट अखिल ब्रह्मांडन ध्यान रखो ये प्रिया प्रीतम कौन है अखिल ब्रह्मांडों के स्वामी यद्यपि सकल लोक चूड़ामणि कौन है प्रभु है भगवान कह रहे हैं तुम दोनों मेरे प्रति पुत्र भाव और ब्रह्म भाव रखना इस प्रकार तुम वात्सल्य का सुख लेकर मेरे परम पद को प्राप्त हो गए।

भगवान इतना कहकर चुप हो गए और देखतेदे नन्हे से शिशु बन गए। भगवान नन्हे से शिशु भगवान ने कहा ले चलो हमको यहां से। गोकुल ले चलो। नंद बाबा यशोदा मैया के यहां। प्रभु इतनी मोटी मोटी बेड़िया हथकड़ियां पहरेदार दरवाजा बंद भगवान ने कहा ले चलने की तुम चेष्टा तो करो जे ही चेष्टा की तड़ाक तड़ाक टूट गई हथकड़ी बेड़ी सब ताले खुल गए योग माया ने लीला फैलाई सब सो गए बड़े-बड़े बड़े दरवाजे अपने आप खुल गए। वसुदेव जी उस समय देवकी मैया की हालत क्या हुई होगी? कोई मां सोच सकती है।

दूसरा नहीं सोच सकता। त्रिभुवन मोहन लाला अभी प्रकट हुए हैं। अभी जा रहे हैं। उस समय देवकी मैया की क्या? बस केवल कंस से बचाने का भाव उनको नहीं तो विकल थी माता जी देवकी जी थोड़ी देर के लिए चित्त को जोड़ो इतना सुंदर लाला अभी प्रकट हुआ अभी पर लाला की रक्षा हो जाए देवकी जी वही कंस कारागार में अशुभ प्रवाह करती हुई वही बाल प्रभु के रूप का चिंतन कर रही वसुदेव जी लेकर के प्रभु प्रभु को चल रहे है। अब इतनी जोर की वर्षा हो रही है। निशि अंधेरी बिजुरी चमके सघन बरसे मे बंदी बैरी सब छूटी खुले ब्रज कपाट शीश धरी श्री कृष्ण लीने चले गोकुल बाट विचार कर रहे हैं कि क्या करूं वर्षा हो रही है लाला अत्यंत सुकुमार अभी प्रकट उस बिजली चमक रही।

पहरेदार सो गए। दरवाजे खुल गए लेकिन कदम आगे बढ़ाने में कि वर्षा हो रही। इतने में देखा कि बाहर तो बूंदे पड़ रही। उनके ऊपर बूंद नहीं पड़ रही। बुद्धि काम नहीं कर रही कि हम लौट के देखे अनंत भगवान शेष जी सहस्त्र फण का छाता लगा लिया। भगवान शेष जी और आगे नरसिंह की दहाड़ जो वसुदेव जी को केवल ना दिखाई दे रहे सुनाई दे रहे हैं। सिंह आगे शेष पीछे चल पड़े। आगेआगे रास्ता नरसिंह भगवान साफ करते हुए चले जा रहे। पीछे भगवान शेष जी थ धीरेधीरे पहुंचे। बड़ी व्याकुलता है।

कैसे लाला सुरक्षित पहुंच जाए और मैं वापस आ जाऊं। यह बात कोई जान ना पावे। जे भी यमुना जी के समीप गई थी। यमुना रसरानी ने देखा प्रीतम आए तो वैसे ही सावन भादों में बाढ़ होती और उफान तट पर खड़े हुए। अब क्या करूं? वापस जा नहीं सकता। लाला को गोकुल पहुंचा। यमुना जी इतनी बड़ी हुई तैरना तो आता है वसुदेव जी को पर अभी नवजात शिशु को लेकर कैसे नासिका लो नीर बाढ़ो ये चरण रखे उफान यमुना जी के लिए प्रीतम जा रहे हैं कम से कम चरण तो छू ले प्रीतम के वासुदेव जी और उठा रहे हैं यमुना जी और उठ रही है वासुदेव जी और उठा रहे लाला लाला को प्राण प्रिय वात्सल्य भाव एक बूंद लाला को ऊपर शेष जी का फण ऐसे जैसे जैसे यमुना जी सांस लेने की भी दिक्कत अब आ गई नासिका लो नीर आप और उठा दिए बाढ़ो पार पैो दूरी तो शीश ते हुंकार कार

की जमुन जानो भ चरण परसत था दीनी पार गए वसुदेव भगवान ने यमुना जी तुरंत सावधान अब वो तो वामन में तो इतना बड़ा बड़ा बढ़ा दिया था तो कृष्ण अवतार में यमुना जी में छुआ वासुदेव जी ऐसे ही किए भगवान ने थोड़ा चरण लंबा किया बोले छू ले चुप रहो देखो परेशान हो रहे बस यमुना जी तुरंत घुटने से हो गई पूरी यमुना जी घुटने से आराम से वासुदेव जी पार हो गए अब विचार कर रहे वहां तो सब सोए थे कंस कारागार में यहां अगर जगे होंगे तो सब पहचान जाएंगे क्या बस यही विचार जिधर दृष्टि डालते हैं सब सोए हुए सीधे महर ढीग उन जा राखे अमर अति आंद सूरदास विलास ब्रजहित प्रगटे आनंद कंद वहां पहुंचे तो देखा रोहिणी जी दीवाल में लगी हुई है सखियां जितनी दासियां सब जो जैसे यशोदा जी सैया पर और लाला नील मेघ का इतना सुंदर पार्श्व में की दृष्टि ऐसे है वसुदेव जी की कोई देख तो नहीं रहा हो लाला के ऊपर लाला लाला में लाला समा गए और बगल में योग माया रो रहे कन्या के रूप में जल्दी उठाया जैसा भगवान ने आदेश किया था कि हमें गोकुल में छोड़ा यहां

यशोदा की कन्या को गोद में आते ही रोना बंद [गला साफ़ करने की आवाज़] जो लाली शांत योग माया अनुकूल बस जैसे गए थे वैसे सुविधा से वापस आए और जे ही जेल के अंदर हुए भड़ाक से दरवाजे अपने आप बंद पहरेदार जग गया तालाब मोटा हो लगा अंदर गए हथकड़ी बेड़िया जकड़ गई योग माया है ना साथ में जब प्रभु है तो सब खुल गए माया है तो सब बंद गए रोना शुरू कर दिया पहरेदार सावधान है भागता हुआ गया महाराज की जय हो रात्रि में देवकी की संतान हुई रोने की आवाज देवकी की संतान तो ना दिन चैन रात बाल खुले बिखेरे हुए नंगी तलवार लिए हुए भागता हुआ लड़खड़ा के कहीं गिर जाता है फिर संभल के उठता है आठवीं संतान तेरी मृत्यु होगी वही आकाशवाणी गूंज रही अब वो कंस पधारा सब देवकी जी हाथ जोड़ के भैया देखो आकाशवाणी ने कहा था आठवा पुत्र हो गए पुत्र नहीं है पुत्री है आप की कन्या के समान आप इसे छोड़ दो आपने मेरे इतने पुत्र मारे अब तो दया निर्मम हत्यारा उसको दया कहा पकड़ा पैर ऐसे और गोद से कन्या निकला बाहर एक चट्टान पर पर वो कोई साधारण कन्या

जुड़ी हो तो भगवान की माया शक्ति है अंबिका है समस्त जगत को संहार करने की सामर्थ रखने वाली हाथ से छूट कर गई और देखा 16 भुजाओं से युक्त साम्य अस्त्र शास्त्र ऐ पापी कंस तू क्या मुझे मारेगा तेरी क्या सामर्थ्य है तेरा मारने वाला ब्रज में पैदा हो चुका है ये नई बात उसने कहा ये नहीं भैया हो क्या रहा है हमारे एक आकाशवाणी हुई थी कि तुम्हारे मारने के लिए अष्टम गर्भ से और यहां आठवें गर्भ में कन्या पैदा होती है। आकाशवाणी झूठी कैसे हो गई? यहां तो पुत्र होना और यह कह रही ब्रज में पैदा हो गया।

देवकी वसुदेव जी के पास आए और कहा सब प्रारब्ध करवाता है। आप हमें क्षमा करो। अब हम क्या बताएं आकाशवाणी ने इतना कष्ट दिलाया नहीं। हम आपको कभी कष्ट जब उसको पता चला कि इनकी तो कन्या हुई है तो मतलब सब आकाशवाणी झूठी वासुदेव देवकी जी ने कहा कोई बात नहीं हमारा प्रारब्ध है उसको भोगा बड़े प्यार से जेल से उनको मुक्त कर दिया कंस ने संगोष्ठी बैठा ली कहा क्या ऐसा हो सकता है आकाशवाणी झूठी है महाराज आकाशवाणी तो झूठी नहीं हो फिर देवकी की कन्या कैसे हो गई? यहां तो पुत्र होना था।

हम उसको कैसे जाने की कन्या कैसे हो गई? उस विषय में जब आप नहीं जानते तो हम बोले आकाशवाणी की ब्रज में पैदा हो चुका है। काहे को आप परेशान होते पूरे ब्रज मंडल में कल सुबह 10 दिन के बच्चे जितने 10 दिन से पूरे ब्रज मंडल में हम सब लग जाएंगे। हफ्ता में पूरा पूरे ब्रज मंडल के बालक साहब जो 10 दिन पहले से हुए हैं। आपने बड़े-बड़े देवता तो आपके सामने घुटने टेक देते हैं। आप बच्चों के लिए परेशान हो। कंस के जो सलाहकार इसीलिए सचिव वैद्य और गुरु तीन जो प्रिय बोले भया आस राज धर्म तन तीन कर हो अगर शिष्य की चाटुकारिता गुरु करने लगे तो शिष्य का नाश हो जाएगा और मरीज के अनुकूल वैद्य चलने लगे तो मरीज का नाश हो जाएगा और अगर चाटुकारिता बोलने वाला सचिव हो मंत्री हो तो राजा का नाश हो जाएगा ठीक निर्णय करना महाराज आप गलत है भले भले मंत्री पद से निकाल दिया जाए।

पर वो तो सब असुर स्वभाव के थे। ठेका उठ गया ब्रज 84 कोस के बच्चों के मारने का। गोकुल के ठेकेदार हुई पूतना। बड़ा आनंदित कंस की अब तो सब बच्चे ही मार डाले जाएंगे तो झंझट खत्म हो जाएगी। और इधर योग माया जो ही हटी सोई रोहिणी जी के नेत्र खुले। सुई दृष्टि गई तो इंद्र नीलमणि की तरह यशोदा जी के पारश्व में भगवान विराज अरे यशोदा जी को अरे जग तो देख कितना सुंदर लाला यशोदा जी ऐसे ओ ये तो वही है जो स्वप्न में दिखाई देता था जाओ बाबा को सूचना दो और फिर जो आनंद मचता है वो शेष चर्चा की श्री राधा वल्लभ लाल की जय।

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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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