इस एक बात से आपका पूरा जीवन बदल जाएगा ! // 24/09/26
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
पूरा प्रवचन
देखो सबसे पहली बात कि जो ही हम शरणागत होते हैं हमारी बात ही हमारे सारे जीवन का भूत भविष्य वर्तमान का पूरा भार इष्ट पर होता है। अब हमको जो कर्तव्य करना है इस समय शरणागति का वह केवल भजन है। इसके बाद हमको यदि शारीरिक रोग मिलता है या हमें अपमान मिलता है या वर्तमान में हमारा बिना किसी चिंतन के हृदय जलता है तो सहित सहित बाड़े भगति गत तन गुरु हितकार अब वो शरणागत प्रतिपाल शरीर की आसक्ति का नाश करने के लिए रोग देंगे अभिमान का नाश करने के लिए अपमान करवाएंगे निंदा करवाएंगे आपसे ऐसे कर्म कराएंगे जिसे पिटो तुम्हारा अभिमान नष्ट हो और पूर्व के जितने भी कर्म है तुम निश्चिंत हो जाओ हमारी अगर बात मानते हो हमें यदि गुरु मानते हो तो तुम निश्चिंत हो जाओ शरणागत को अपने पूर्व कर्म के विषय में बिल्कुल चिंता नहीं करनी अहम तम स्वर पाप मोक्षस मास मैं तुम्हें समझ समस्त पापों से मुक्त कर दूंगा।
ये अगर बात आपको समझ में आ रही है अगर इसमें और कोई संशय हो तो मेरे से फिर पूछ लो। यदि शरणागत हो गए हो तो तुम्हारे पूर्व कर्मों का आचार्य और इष्ट नाश कर देंगे। कटे कर्म बंधन संसारी और स्वयं हरिवंश महाप्रभु कहते तहारे अगले पांचले अपराध हरिवंश के भी अब क्या चिंता अब जो जलन हो रही है वो शरणागति के विरुद्ध चिंतन और आचरण से हो रही है आप ये कहां चिंतन कर पा रहे हैं कि हम श्री जी की शरण में श्री जी का चिंतन आपसे कहते हैं हर समय हृदय में इतना आनंद बना रहता है कि वो आनंद एक चक्रवर्ती सम्राट को भी नहीं है।
और शरीर में इतना कष्ट बना रहता है कि शायद इतने में से किसी को कष्ट नहीं होगा जितना शरीर को हमारे कष्ट है। पानी बिछ के नहीं पी सकते। हर शरीर के अंग पीड़ा दे रहा है। लेकिन आनंद इतना है कि हम कैसे तुम्हें बताएं? क्यों हृदय जल रहा है? क्योंकि तुम भगवत चिंतन नहीं कर रहे हो। किससे पाप नहीं बन जाते? भूत में हुए वर्तमान में भी चूक हो रही है। भविष्य में भी हो सकती है। संभालेंगे भले आपको भगवान जय जय अहम तम सर्व पापभ्यो सर्व भूत भविष्य वर्तमान सर्व पापभ्यो मोक्ष्याम आप तो केवल शरणागत हो।
आप कहा हमारे पाप हमारे पाप है। तो फिर क्या है? यह उनका विधान है। शरणागति पुष्ट करने के लिए अपना प्रेम प्रदान करने के लिए वो हमें पात्र बना रहे हैं। वो हमें कृपा पात्र बना रहे हैं। जहांजहां हमारा अहंकार उसे नष्ट कर रहे हैं। जहांजहां हमारा मैंपन उसे छीन रहे हैं। ये कृपा कर रहे हैं। वो उनकी कृपा को तो समझो। ये कृपा हो रही है। ये दंड नहीं है। ये कृपा है। अब हमारा कोई प्रारब्ध नहीं हमारा कोई प्रारब्ध नहीं हम शरणागत है अब विधान है हमारे ऊपर भगवत विधान वो क्यों है ये भगवान जाने हमको तो आभास इसलिए होता है कि शरणागति पुष्ट करने के लिए जहांजहां हमारा अभिमान है मैंपन है अपनापन है उसका नाश भगवान कर ले हृदय जलता क्यों है क्योंकि भगवत चिंतन रहित है।
हृदय जलता क्यों है? क्योंकि हम पूर्व का चिंतन करते हैं। कई बार चर्चा में कहा है अगर सत्संग में ध्यान हो कि आपको ना भूत की ना भविष्य की। वर्तमान की देखनी ये सेकंड राधा राधा राधा क्या बात है। भूत भी पवित्र हो गया। भविष्य भी मंगलमय हो गया। जय हो। आप इतने पाप नहीं किए होंगे। सा गाड़ी जनेऊ बैलगाड़ी इकट्ठा था इतने ब्रह्म ऋषियों को मारा था बड़ा-बड़ा जपने लगे चरित्र पढ़ के देख लो ना आप ऐसे ऐसे गंदे आचरण वाले महापुरुष हो गए भगवान का आश्रय लेकर अगर कर्म बंधन ना कटते तो कैसे होता कटे कर्म बंधन संसारी सुख सागर पूरी तति भारी विधि निषेध श्रंखला छुड़ावे नहीं जा हम लोग इसी बात को तो भूले हैं हम पर जो कृपा लाडली जी ने की वो ठसा कहां है आपके अंदर हमारे माई श्यामा को राज के अधीन सदा सावरो या ब्रज को से ताज हमारे माई श्यामा अभी सब
कर्म बंधन छिन्न भिन्न हो जाए लेकिन वही पुराने तुम बने हुए हो श्री जी को स्वीकार कर रहे हो क्या आप स्वीकार करते हैं कि आप श्री जी के दास है हृदय से अगर स्वीकार करे तो जैसे हम फूले घूम रहे हैं वैसे फूले घूमो उत्साह आनंद बल किसी की बात की कमी नहीं तभी डॉक्टरों से कल कह रहे थे कि तुम हमको साधारण इंसान मत समझो हम साधारण आदमी नहीं है क्यों हम श्री जी के हम लाडली जी के कोई प्रधानमंत्री का आदमी होता कोई राष्ट्रपति का आदमी होता हम अनंत ब्रह्मांडों के पति आदमी है कोई साधारण है तो जैसे हम है वैसे तुम हो वही मंत्र वही भष वही सब कुछ लेकिन कमी किस बात की है तुम्हारे अंदर ठसक नहीं एक उदाहरण में हरिद्वार में सब गंगा जी नहा रहे थे तो पार्वती जी ने कहा प्रभु कितने पुण्य आत्मा सब गंगा नहा रहे बोले सब गंगा नहीं नहा रहे पानी में डुबकी लगा रहे कोई बिरला एक गंगा ना स्नान करेगा नहीं समझी प्रभु तब नहा तो रहे हैं और आप कह रहे हो पानी में नहा रहे हम बताते हैं वृद्ध का रूप रखा फिसलन का वो दृश्य दिखाया और गड्ढे में
गिर गए कीचड़ में और पार्वती जी के पास बोले तुम यह सबसे कहो कि हमारे पति को सहयोग करके निकलवा जब निकालने के लिए आवे तो उससे कह दो निष्पाप हो तो छूना नहीं भस्म हो जाओ अब जो निकले बोले भैया हमारे पति को थोड़ा निकलवा दो तो कोई तो मजाक कर देता कर देता कोई कुछ कोई कुछ और कोई कोई ये सोचता धर्मात्मा पुरुष कि यार निष्पाप हो तो छुए नहीं तो भस्म हो जाएगा तो पाप तो बहुत ही है और काहे को हम झंझट में फसे कि भस्म हो जाए एक देहातीती आदमी गंगा स्नान कर हर हर गंगे
हर हर गंगे बाहर निकला बोले भैया हमारे पति को निकाल दी बोले भैया भी बहन निकालते लोटा रखा जो बोले रुको अगर निष्पाप हो तो हमारे पति को छूटा नहीं तो भस्म हो जाओगे तो उन्होंने कहा मैया अभी तेरी समझ में नहीं आई कि मैं गंगा स्नान करके आ रहा हूं। गंगा स्नान से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और भगवान शंकर को। भगवान शंकर ने कहा इसने गंगा स्नान किया। उसको ये गर्व है कि मैं गंगा नहा के आ रहा हूं तो पापी कैसा हमें ठसक है कि हम श्री जी के हैं। हरिवंश चंद्र जी के हैं।
अब मेरे कर्म बंधन कैसे आप पढ़ क्या सुनते हो? क्या पढ़ते हो? कटे कर्म बंधन कमल कर जिन अभय दी कर्म बंधन सब सब हम आचार्य की शरण में हम श्री जी की शरण यही तो ठसक मतलब आप ला नहीं पा रहे क्या आनंद की कमी है आनंद सिंधु भगवान जिनके चरण में महावर रचते हैं उन गोरे चरणों की हम दासता स्वीकार किए हुए अभी आनंद की कमी आनंद की कमी तो तुम्हारी तुम शरणागति स्वीकार नहीं कर पा रहे हो। शरणागति स्वीकार कर लो। पूर्णता वो करेंगे। हम नहीं कर पाएंगे। पूर्ण शरणागति। हमारी जहांजहां आसक्ति है उसका नाश हमारे इष्ट करेंगे।
वो घसीटेंगे। वो हमें पूर्ण करेंगे। पूर्ण उनसे होगा। हमारी तरफ से नहीं होगा। हमारी तरफ से पूर्णता नहीं हो सकती। अपूर्ण ही रहेंगे। पूर्ण उनकी तरफ से होती है। तैयारी हमें करनी है। उसके लिए शास्त्र संत और गुरु लगा दिए भगवान ने कि तुम तैयारी कर लो। शरणागति की तैयारी करो और शरणागति हम करवाए। भगवान कहते भाई जी महाराज पूज्य राधा बाबा इन बड़े संतों की बात कह रहे हैं। कि साधक तैयारी कर सकता है। शरणागति की पूर्णता नहीं। पूर्णता श्री भगवान से होगी। जब वो कमल कर जिन अभय कर्म बंधन सब कटे परम सुखद सुशील सुंदर पाय स्वामी मम धनी जय जय श्री हरि संस् हमारे अब कर्म बंधन नहीं रहते जैसे छोटा बच्चा गिर जाए और मां दौड़ के उठाने आए तो मां के थप्पड़ मारता है।
मां के ऐसे करता है। तुम कहां थी जब हम गिरे अब तो उठाने आई हो लेकिन जब हम गिर रहे थे तो तुम कहा थी पकड़ लेती वो मा तो अल्पज्ञ है लेकिन श्री जी सर्वत्र सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान प्रभु की प्रिया है हम ऐसे देखते हैं तो आप लोग अभी समझ नहीं पा रहे हो आप लोग शरणागत है हम कह रहे हैं मान रहे हो तुम हम कह रहे हैं आप लोग शरणागत है पर ये बगाठ बांध लो कि गुरु जी ने हमको श्री जी को समर्पित कर दिया अब क्या हृदय जल रहा है तो हम श्री जी के हैं और हृदय आनंदित है तो हम श्री जी के हमको
हृदय से क्या लेना अब मन में आप बैठे हो तो चलो ऐसे हटो और फिर देखो संतुष्ट केनवा कैसी भी परिस्थिति हो संतुष्ट है श्री जी के सिवा किसी का भरोसा नहीं किसी का आश्रय नहीं अभी आनंद आ जाए कौन सा कर्म बंदा आपका कौन सा पुण्य लाया वृंदावन कौन सा पुण्य गुरु की शरण में कराया कोई ऐसा पुण्य किया है क्या कृपा कृपा आप मानते हो ना कृपा तो जब कृपा है तो जलन कैसी नाचो इतने बड़े सरकार के अनुसरण में नाचो इसमें क्या होता है कि हम वो कृपा का रसोस्वा ना करके हम सोचते हैं कि हमें डेढ़ साल हो गए भजन करते कोई अनुभूति नहीं हुई।
हम यह सोचते ही नहीं कि हम शरणागत है। हम श्री जी के हैं। जय जय बलहार। सब उखड़ जाएगा। साहब बिल्कुल हमारी बात मान लो। यार दो मार्ग है भगवान की प्राप्ति। एक है तैर कर जाना और एक है नाव में बैठ जाना हमारा जो है वो नाव वाला है श्री हरिवंश प्रताप नाम नौका निज सेवक भवसागर सुख तर निकट हरिवंश जो सेवक हम कभी ये भगवान से नहीं कहा सत्य मानो ना कि आप हमारे दर्शन में आओ आप हमें आनंद दे तुम्हारी गरज हो तो आओ तुम्हारी गरज हो तो आनंद हमारे गुरु जी ने हमको मंत्र बताया हम वही जपेंगे और मंत्र के अधीन भगवान भी है ध्यान रख और वो मंत्र हमें गुरु जी ने दे दिया है अब जाओगे कहां भाग पर हम क्या है ना मंत्र पर गर्व करते हैं ना नाम पर गर्व करते हैं ना इष्ट की शरणागति पर गर्व करते हैं हम वही घिसे पिटे पुराने डायलॉग बोलते हैं कि हमारे कर्म बस ये इससे लाभ अब हमारे कौन से कर्म है?
हमारे कौन से कर्म है? हम आपकी शरण में है। महाराज अगर कोई कर्म आप कहते भी हो कि तुम्हारे कर्म तो तुम्हारी माया बाजी भी पसारी सुन मुनि मोहे काकी कोड कहे हरिदास तुम्हारे हम जीते वकील सही हो तो मुकदमा डरने की बात नहीं है। परेशान होने की बात नहीं है। निश्चित कल्याण होगा। उच्च जीवन में अनुभव ना हो तो भी पड़े रहो तो अंतिम स्वास में राधा किशोरी की कृपा तुम्हें परम पद प्रदान करेंगे। मानो ना रे मानो हमारी बात हम कह रहे हैं पड़े रहो वृंदावन में अंतिम समय तक श्री जी कृपा कर देंगे।
जब स्वास छूटेगी तो श्री जी अपने पास ला हम श्री जी के भरोसे पड़े हैं। ताना तो तुम क्या करोगे? हमें क्या बताएं? जो मैं अपने अवगुण कहूं कथा ये बात शरणागति का बल श्री जी का बल है अपना कोई बल सब अंग गुणहीन हो ताको यतन न कोई एक किशोरी कृपा ते कछुए सो होए मान लो मेरी बात इस थसक में रह के मैं श्री जी की हूं मैं श्री जी का हूं और राधा राधा राधा जो मिले दबा के पाव पार उतार के वृंदावन वास कर रहे हो पाव पसार के सो और जब जागो तब प्रिया भजे हमारे रसिकों ने कहा है जागे जब जागे तब प्रिया भजे सोवे पाव पसार ए बस यही कमी है कि आप श्री जी को अपना नहीं मान पाते श्री जी को
अपना ना मानने के कारण ही सारी समस्याएं अब देखो कैसे चल रहा है सब कैसे चल रहा है चार आदमी एक घर में तो चिंता हो जाती आप लोग इतने सब श्री जी के पार्षद हो और क्या कमी है कौन सी कमी चल भरोसा कभी ऐसा नहीं हो सकता हम भूखे रह सकते हैं लेकिन तुम नहीं रह सकते तुम्हें भूखे नहीं रहने देंगे श्री जी क्यों क्योंकि हरिवंश उपासक की शरण में पक्की बात कह रहा हूं महाराज हम पीछे होंगे तुम आगे होगे निकुंज में जय जय हम पीछे होंगे और तुम आगे होगे हम घूम के आए पूरा जीवन
और तुम डायरेक्ट आ गए हो नहीं आ गए कौन से तप किया यहां ब्रह्मचर्य उपासना महावाक्य सन्यास दुनिया का सब करते हुए काशी से होते हुए तब वृंदावन मिला और तुम्हें सीधे वृंदावन तो हमसे श्रेष्ठ तो हो ही कृपा तुम्हें श्रेष्ठ पद पर बैठाल दी ना समझ पाओ तो फिर भाई बात अलग वृंदावन गुरु शरण शरणा शणागत मंत्र निज मंत्र हृदय जले मरो फिर अरे अब यार क्या चिंता चिंतामणि प्रणमताम ब्रजनागरी चूड़ामणि कुलमणि वृषभ चिंतामणि हमारी श्री आज तक अभी तक हम देख कर के तुम्हें बता रहे हैं कि श्री जी एक एक बात आपकी देख रहे एक बात नहीं रही इसलिए कनेक्शन नहीं जोड़ अपनापन महारानी जी से अपनापन कर ले बस सब बात बस श्री जी से ये हो जाए कि मेरी महारानी से श्यामा जो हमारी किशोरी जो हमारी लाडली जो हमारी वो अब वो जिनकी शरण में हो उन्हीं की शरण का तुम्हें ज्ञान नहीं तो क्या बात हुई अनंत ब्रह्मांडों का पद अनंत ब्रह्मांडों का पद उनके चरणों में है उनके दास हो कौन रोक लेगा कौन रोक लेगा केवल नारायण निकला और भगवान के पार्षद आकर के यम दूतों
की फांसी काट और डांट लगाया यमद दूतों को यार ऐसे भगवान जिनके चरणों में झुकते उन प्रियाजु के हम चरण में हम राधा बोलेंगे और नरक जाएंगे हम राधा बोलेंगे हमारा हृदय जलेगा आप बस यही भूले हुए अपने स्वरूप स्वरूप तो भूले हुए आप जहां समर्पित हो चुके हो उसको भूले हुए हो थसक में घूमो बोले भजन नहीं होता कोई बात नहीं बड़े के घर के लड़के अगर ना भी पढ़े लिखे तो करोड़पति तो बने ही रहते हो अब ये थसक रही है आपके कि हम श्री जी के हैं। जैसे आपने बोला कि हम श्री जी के हैं।
दृढ़ विश्वास हो जाए, अपनापन हो जाए। ऐसा ही अपनापन गुरुदेव के प्रति धीरे-धीरे बढ़ रहा हो तो एक ही बात है महाराज जी। अब ये इसलिए नहीं कहेंगे कहेंगे कि मन मना मत भक्तों का पूजा करवा अच्छा क्योंकि उनको तो देखा नहीं है महाराज जी तो ये बात आ गई दिमाग में तो इससे बढ़कर के क्या है? ये बात दिमाग में आ जाए कि हमारे गुरु जी हमारी श्री जी तो बस फिर हो गया फिर क्या अभी कुछ तीन चार दिन पहले ही आपने सत्संग में कहा था पर किसी प्रसंग वो बात बीच में हुई पर इसलिए हम अलग से उसको समझना चाहते हैं कि महाराज जी उसमें आपके शब्द थे यानी जैसे आपने कहे अकॉर्डिंग कि भले ही मुझ में श्रद्धा मत करो पर मेरी बात अगर मान लोगे तो तुम्हारा तो क्या फर्क है महाराज जी गुरुदेव को मानना और गुरुदेव की बात मानना नहीं इसमें क्या है कि जैसे हमारे प्रति मनुष्य
बुद्धि हुई तो गुण दोष है जड़ चेतन गुण दोष में विश्व की निकलता जब आपकी हमारे ऊपर मनुष्य बुद्धि होगी तो ये शरीर गुण दोष से युक्त है तो इसके द्वारा दोनों क्रियाएं होंगी गुण और दोष दोनों युक्त क्रियाएं होंगी हो सकता है आपको हमारी क्रिया से अश्रद्धा हो जाए हो सकता है आपको हमारी क्रिया पसंद ना आवे लेकिन हमारी बात पर तुम हम पर श्रद्धा ना करो तुम हम पर भाव ना करो हमारी बात पर श्रद्धा कर लो तो तुम्हारा काम हो जाएगा ये बहुत उतर के बोले थे महाराज उस दिन आप जब बहुत उतर के बोले थे अगर और पहली बात है कि अगर गुरु पर श्रद्धा नहीं है वो बातें ही काम नहीं करेगी इसलिए तो ये अभी दूसरा कि महाराज जी कैसे बात ही काम नहीं करेगी बात तो काम तब करेगी जब गुरु जी पर श्रद्धा होगी।
भाई मंत्र तो काम तब करेगा जब मंत्र दाता पर श्रद्धा होगी और मंत्र दाता से श्रद्धा हो जाए तो मंत्र काम नहीं करेगा। पर हम कह रहे हैं फिर भी कह रहे हैं यदि हमारी बात पर तुम्हारी श्रद्धा हो गई। महाराज जी ने कहा था तो हमारी पूजा हो गई। हमारी बात हो गई। हमारा सम्मान हो गया। हमारे प्रति पूर्ण श्रद्धा हो गई आपकी क्योंकि आपने बात मान ली कि महाराज जी ने बात कही दी यह बहुत बड़ी बात हो गई आप हमारे फोटो मत पूजो आप हमारे सामने प्रणाम मत करो आप हमारे सामने कभी आओ मत लेकिन हमने जो कहा वो पालन कर रहे हो तो तुम्हारी गुरु श्रद्धा पुष्ट हो ही जाएगी क्योंकि महाराज जी ने हमारी ये बात कही इस बात में कितना अपनापन है यार सर नहीं हमारे महाराज जी ने बात गुरु जी में तो है पर तो आज महाराज जी कभी तो बस फिर नहीं बने फिर या तो बच्चा बन के पड़े रहो गुरु जी कहोगे तुम्हारे गुरु जी हमारा उद्धार कर देंगे गलत आचरण मत करो इधर उधर मत जाओ आपको भगवत प्राप्ति होगी जय रेनु परम मंगला आचार्य शरणागति गुरु कृपा बहुत बड़ी बात एक आदमी हमारी बात मान के चल रहा है और एक आदमी अपने मन के अनुसार चल रहा है।
तुम जा खोपड़ी के बल खड़े होकर के तप करो लेकिन उसकी बराबरी नहीं कर सकते जो गुरु अधीनता लिए हुए ये सिस्टम है। ये सिद्धांत है। ये बात समझ लेना। गुरु कृपा अमोग यही तो भ्रम हो गया था शंकराचार्य जी के शिष्यों को कि त्रुटकाचार्य जी जो थे वो केवल शरीर सेवा करते थे शंकराचार्य लंगोटी धोना कपड़ा धोना खानपान सब उनकी सेवा कभी वेदांत बैठकर सुना ही नहीं तो एक दिन स्नान करके आए तो शिष्यों ने एक श्लोक दिया कि इस पंक्ति को गुरु जी व्याख्या करके हम सबको बता तो उनका त्रोटक भी आ जाए तो मथुरा दास जी के मुख की बात कह रहा हूं।
उन्होंने कहा कि त्रटक भी आ जाए शंकराचार्य जी ने तो शिष्यों ने कहा पेड़ को सुना देना ठीक है लेकिन उसको सुनाना बेकार है कभी बैठा ही नहीं आज तक भगवान शंकराचार्य ने कहा गुरु की शरीर सेवा को तुम ऐसे हे भाव से देखते हो बुलाओ उसको बुलाया कहा बेटा इस पंक्ति की व्याख्या कर दो गुरु प्रताप पूरा वेदांत जागृत हो गया और वही शंकराचार्य जी की गद्दी पर बैठे शंकराचार्य जी के बादचार्य जी बैठे गुरु सेवा तो आप लोग जो सेवा कर रहे हैं गुरु सेवा सबसे बड़ी बात परम ब्रह्म परमात्मा की अनुभूति केवल गुरु कृपा से होगी मोक्ष मूलम गुरु कृपा रामानंदाचार्य जी एक बगीचे में बैठे हुए थे कुआ से पानी मंगाया ठाकुर जी के लिए उसमें थोड़ी बदबू आई तो कहा बदबू क्यों आई बोले भगवान उसमें पत्ता गिरता है इस पेड़ की डाल बोले इस डाल को काट दो लेकिन उतना ही काटो जितनी कुआं के ऊपर है।
तो बोले भगवान ऐसा कैसे हो सकता है? कुआं के ऊपर डाल में अगर कोई काटेगा तो डाल की तरफ बैठकर ऐसे काटेगा वो सीधे कुआं मिला जाए। बोले इससे मतलब नहीं। चलो कौन काटेगा? तो कोई उठा नहीं। एक उठे और कुल्हाड़ ली गए और काटा और सीधे कुए में गिर गए। मैं कुल्हाड़ और डालते सहित और शिष्य सबके मन में सोचा बच गए यार बच गए नहीं गुरुजी तो मार डाला था हमने कहा गुरु जी वो कुआ में गया बोले कुछ नहीं तो बैठो बैठे रहे 15 20 मिनट के बाद जय हो नमो नमः जय हो नमो नमः और वो सीधे भगवान के पार्षद उनको बाहर वो आए और गुरु जी से कहा ये माला दी है सियाराम जी ने और ये प्रसाद दिया बोले क्या हुआ बोले जे डाल से हम नीचे गए तो भगवत पार्षदों ने अपनी गोद में ले लिया और साकेत धाम ले गए तो सियाराम जी के दर्शन हुए और प्रसाद मिला ये आपको मिला अब सब शिष्य भगवान ही के लिए तो अर्पित हुए थे सोचे यार हम नहीं काटा अगर हम काट देते तुलसी गुरु आज्ञा गरीब ये बहुत बड़ी बात है कि जो गुरु आज्ञा पर जीवन व्यतीत करते उनका जीवन धन्य हो जाता है जलन किस बात की किस बात की जलन ठेका हम ले रहे हैं पर वो पता नहीं तुम विश्वास वालों की ना महाराज जी आप जैसे सारी बातें इसमें सबकी धारण करने की क्षमता अलग-अलग रहती है।
हां शरणागति के बल पर महाराज जी ये क्या पूर्व का भी कुछ रहता है या कृपा कृपा मूर्खता मूर्खता मिठाई मिठाई दिखाई देती है कि नहीं दिखाई देती तो ये बात आपको मीठी नहीं लग रही मीठी लग रही है तो बस इसको स्वीकार कर लो ना क्या परेशानी है पर मूर्खता ऐसा कैसे हो जाएगा गुरु के हम भजन नहीं करेंगे हम परिक्रमा नहीं लगाएंगे हम नहीं करके देख लो करके देख लो मुनि मन ध्यान धरत नहीं पावत करत विनोद संग बालक पट श्री जी की शरणागति हम कह रहे हैं शरणागति की जब तरफ तरफ चलोगे तो हमने चार बातें आपको बताई थी कि हमारे मार्ग में चलने के लिए चार बातें आवश्यक नाम मंत्र मंत्र वाणी सेवा अब इस आज्ञा का पालन करो हमने चद्दर फेंक दिया तुम समुद्र भ समुद्र में डूब रहे हो चद्दर के चार कोने होते हैं एक ही कोना पकड़ा जाता है नाम पकड़ लो मंत्र पकड़ लो वाणी पकड़ लो सेवा पकड़ लो बस वो पूरा चद्दर खींच जाएगा पूरा तुम निकल जाओगे तो अब नाम वाणी मंत्र सेवा आप पकड़ो अब ऐसे मतलब चिंतन करोगे संसार का क्रियाएं करोगे गंदी तो फिर कैसे आपको
आपको मतलब भागवती कैसे जागरण होगा आप शरणागति पर हो कहां भगवान की शरण में होकर के पड़े रहो भगवत प्राप्ति में भगवान ने कुछ नहीं कहा इतनी बात कही बात समझना भगवान के शब्द है सर्व धर्म परमान परित्यज मामेकम शरणम ब्रज तो अहम भगवान कह रहे अहम तम सर्व पाप मोक्ष देशाह समुदता मृत्यु संसार सागरात विश्वास करके बैठ जाओ यार बैठ जाओ काहे परेशान जो करवाया जाए वो कृत करो जो भोजन मिले पाले हो आराम से चौड़े से सो जाओ कहीं जगह नहीं है तो फुटपाथ में भैया हमें वृंदावन वास करना है भगवत प्राप्ति करके भगवत प्राप्ति विश्वास करो हमारी बात पर विश्वास करो मन की बात अच्छी लग रही है और ऐसा लग रहा है किसी को धारण करें बट इसको सतत ये बनी रहे इसके लिए महाराज जी कुछ करना है या अपने आप दिया ना चार चार बात नाम जपो मंत्र जपो वाणी पाठ करो ठाकुर सेवा करो गुरु सेवा करो, संत सेवा करो, धाम सेवा करो, सेवा सेवा किसी की भी सेवा मतलब जो सेवा श्री जी की सेवा करो, नाम सब बन जाएगा।
इन चार के बिना शरणागति होगी ही नहीं। इन चार के बिना शरणाग और शरणागति हो गई तो ये चारों स्वयं चलेंगे। ये भी बात तुम्हें बता रहे हैं। मैं जपता नहीं हूं। मैं करता नहीं हूं पाठ। मैं पूजा नहीं करता हूं। कुछ नहीं करता हूं। हमसे पूछा जाए तो हम एक शब्द कहेंगे कुछ नहीं करता। हो रहा है। श्री जी की कृपा से एक मिनट भी बकाया नहीं। बिल्कुल निश्चिंत रहो यार। श्री जी की शरण में होकर राधा राधा अगर हमारे गलत कदम जा रहे हैं तो राधा राधा राधा हमारी बस नहीं श्री जी श्री जी देखना हमारी बस नहीं है हम कहीं भी गिर सकते संभालना लाडली लाडली लाडली बाल बाका हो जाए तो मैं बता कूद कूद पड़ेगी कोई ना कोई रूप लेकर के अच्छा कर देंगे बचा देंगे उनका निज अनुभव ये इसलिए भजन करो भजन का मतलब होता है हो जाना आ भजन का मतलब होता है हो जाना श्री जी के हम हो गए अब अब अब तो अपने आप हमारा चिंतन होगा जिसके हम हो गए हमसे ज्यादा हमारा श्री जी भजन करती है हमसे ज्यादा हमारा श्री जी भजन करती है अगर हम एक बार राधा बोलते हैं तो 100 बार हमारा मंगल चिंतन करो।
ऐसा स्वभाव और सुने ना दे। एक बार युधिष्ठिर जी भगवान के शिविर में गए। युद्ध क्षेत्र की बात बता रहे हैं। पांडव है। भगवान ऐसे बैठे। उन्होंने सोचा परम ब्रह्म परमात्मा जगत ध्यान इनका करता है। ये किनका ध्यान? जब ध्यान छूटा तो का कहो कैसे आए? दाता से। उनका पहले आप हमारे प्रश्न का उत्तर दीजिए कि आप ध्यान किसका कर रहे थे। भगवान के आंसू आ गए और कहा युद्ध भूमि में सर सैया पर पड़े हुए महा भागवत भीष्म पितामह हमारा ध्यान कर रहे हैं। ये यथा माम प्रपदते तास अगर आप दो आंसू बहाकर श्री जी की चिंतन करते तो श्री जी आपके पास ही है।
बस जिस दिन विकलता हो जाएगी कि हम उनके दर्शन के बिना नहीं रह सकते उसी दिन पर्दा हट जाएगा और भाव में तो हर समय बनी ही है अगर आप भजन करते हो शरणागत हो तो ये चिंता रहे श्री जी आनंद स्वरूप है अब जलन नहीं होनी चाहिए क्यों भाई समझ में आई बात सबके हैं हां श्री जी की और ठसक भजन करे वो जिसको श्री जी का भरोसा ना हो अब आप समझो हमारी बात समझो जब हमारा श्री जी का भरोसा है तो हर समय श्री जी का चिंतन होगा हम जिसके भरोसे जैसे धन का भरोसा है तो धन का चिंतन होगा जहां आपका भरोसा टिका है अपनापन टिका है सुख बुद्धि टिकी व चिंतन होगा और अगर हम श्री जी के हैं तो हमारा भजन स्वास स्वास से होगा बिना हम भजन के रह नहीं सकते बिना जी नहीं सकते भजन ना महाराज जी हम भजन का मतलब होता है भाव भजन का मतलब होता है एक जैसे हमारे दिमाग में बैठ गया मेरी महारानी श्री राधा रानी अब हम कहीं भी कहीं भी हो वो हमारे दिमाग में बैठा है मेरी महारानी श्री शरणागति कितनी जोर की है आपकी वो आपके अनुभव में आ जाएगी तो अहंकार आ जाएगा लेकिन आप
स्वीकार करो कि हम शरणागत है और स्वीकार करने के आपकी स्वीकृति की बात है देखो हमारी बात बहुत सूक्ष्म ता से समझना पानी ग्रहण के पहले उस लड़की का घर में चम्मच पे अधिकार नहीं था और पानी ग्रहण होते हुए गृह स्वामिनी हो गई ऐसे ही बिल्कुल ऐसे वो दूसरे दिन अगर कोई लोटा ले जाएगा तो कहेगी मेरा लोटा क्यों ले जा रहे हो क्यों क्योंकि उसने अपना समर्पण उस पुरुष को कर दिया जब संसार में रीति है तो हमने जब अपना समर्पण प्रभु को किया तो प्रभु बोल पड़े अहम भक्त स्वतंत्र मैं भक्त के अधीन हो गया भगवान भक्त तत्पर ये बात समझ में क्यों नहीं आती बस यही समझना है हम जैसा वैसा करें जैसा तो बड़ी बड़ी भयंकर परिस्थितियों से भी निकाल के वो आपको देखो हमारे हृदय में अनंत जन्मों की अशुभ और शुभ वासनाएं हैं।
ये बिना श्री जी की कृपा के ऑपरेशन सफल नहीं होगा। और ऑपरेशन होगा गुरु एक बार ऑपरेशन होगा। एक एक वासना आपकी नष्ट करके हृदय को निर्मल कर दिया जाएगा। कुछ भोगा के और कुछ समझा के कुछ वासना ऐसी होती है कि जो समझ में नहीं आती। तो देखो अल जी और बोल जी का चरित्र पढ़ के देख लो। वो वासना भगवाने के लिए फिर वो रास्ता दे देते भोगो अब देखो क्या है फिर उसका परिणाम दिखाते हैं जन्मजनम के लिए वो वासना नष्ट हो जाती शरणागति पर कभी अपने इष्ट पर प्रश्नवाचक चिन्ह ना लगाओ कि ऐसा क्यों हुआ हमारे साथ क्या परम मंगल विधान श्री जी का होगा अब तो अमंगल हो ही नहीं सकता हमारा क्योंकि हम मंगल भवन की शरण में ये आप लोग गर्व में रहो अच्छा आप एक माला चला लेते हो, परिक्रमा कर लेते हो तो आपको इस पर विश्वास है और श्री जी की कृपा पर विश्वास नहीं है और पूरे जन्म भर ये सब करो माला चलाओ और परिक्रमा लगाओ और एक वैष्णव की निंदा कर दो तो सब भस्म हो जाएगा।
भक्तन निंदा अति बुरी भूल करे जिन को किए सुकृत बहु जन्म के क्षण में धारे साधु अवज्ञा क्या परम बल मिलेगा इसलिए कृपा से शरणागत प्रतिपा हमारे बनाए बनेगी कोटि कल्प लो आपके बनाए बनेगी कल हमें चिंता नहीं करनी हम आपसे कहते हैं भजन ना बने रहने दो वाणी पाठ रहो रहने दो ठाकुर सेवा रहने दो हमारी बात पकड़ लो वृंदावन मत छोड़ो जो मिले वो खाओ पड़े रहो भगवत प्राप्त कर लो पड़े रहो कुछ करना मत पर पढ़े पढ़े कुछ कुछ कुछ ना जाने क्या कह पढ़े ही तो नहीं रहते नहीं तो सच्ची कहते शरणागति का सीधा प्रभाव ये है कि श्री हरिवंश प्रताप नाम नौकाद सेवक भवसागर सुख तरत निकटत हरिवंश सेवक सेवक जी ने कहा भवसागर सुख तरत अब हमारा समय कहीं गलत ना हो जाए इसलिए हम नाम सेवा का लेकिन हमारा कल्याण हो गया हमारा कल्याण उसी समय हो गया जिस दिन गुरु जी ने शरणागत किया।
जैसे श्री कृष्ण की शरण होते ही अर्जुन का सब ठीक विजय प्राप्त हो गया। साध लेकिन 18 दिन महाराज हुआ बस काम तो उसी समय हो गया था जब श्री कृष्ण से कहां साधिमाम मैं आपका शिष्य हूं और आपका शरणागत वही विजय हो गए संजय जी ने घोषित कर दिया था पहले ही धृतराष्ट्र से यत्र योगेश पुष्पो यत्र पाो धनधरा तत्र श्री विजय ध लेकिन फिर भी 18 आप बैठे हैं आगे और युद्ध करवा रहे ऐसे ही हमारे आगे आगे प्रभु चलेंगे लेकिन हमको युद्ध करना पड़ेगा पक्का तो ऐसे बिल्कुल ऐसे रहो शरणागत रहो सब करवा लेंगे वो अपने आप सब करवा लेंगे अगर आपको बहुत जल्दी
शरणागति का आनंद लेना है तो चार बातें छोड़ नाम जप मंत्र जप वाणी पाठ और ठाकुर और एकदम प्रमाद स्थिति हो कुछ ना करो तो वृंदावन में पड़े रहो गलत आचरण मत करो पड़े रहोगे तो धीरेधीरे यहां का प्रभाव ऐसा है कि आपको भजन में लगा देगा वो क्या है कि यहां फिरत स्वार्थ अपने भजन गए फिरे हम नहीं कह रहे तुलसीदास जी कह रहे यहां फिरे स्वार्थ अपने और भजन गए फिरे वाह एक वैष्णव का दर्शन अमंगल नष्ट कर देता वैष्णव धाम है चलत फिरत सुनियत ऐसी राधा वल्लभ लाल ऐसे वृंदावन विपिड में बसत रहो यहां तो हर जगह नाम गूंज रहा है भगवान का काम पड़ेगा मंगल हो जाएगा वैष्णव दर्शन होंगे ठाकुर दर्शन होंगे यहां प्रसाद मिलता है कहीं भी पाओगे तो प्रसाद ही है ठाकुर के भोग लगाकर हर आश्रमों में पवाया जाता है तो प्रसाद पाओ श्री जी का पड़े रहो प्रसाद और चरणामृत और रज और वृंदावन धाम ये सब परंप पहुंचा देंगे पर विश्वास हो ना विश्वास ही नहीं होता है कि उसको इस बात पर विश्वास है कि हम 11 माला घुमा लिया तो इससे कल्याण हो जाएगा।
इस बात पर विश्वास नहीं कि गुरु जी ने श्री जी की शरणागति कर दी। ये तो एक क्रिया है। अब हम जिए तो कैसे जिए? हमारा समय कट रहा है ऐसे मंगलमय भगवत कथा सुन रहे हैं नाम जप कर रहे हैं वाणी पाठ कर रहे ठाकुर सेवा लेकिन हमारा कल्याण तो हो गया क्योंकि गुरु जी ने श्री जी की शरणागति कर दी और श्री जी ने शरणागति स्वीकार कर दी ये ठसक अंदर आ जानी चाहिए स्वभाव श्री राधा लाल की जय
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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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