यदि साधक स्वयं पर कृपा करे, तो यह लाभ मिल सकता है/ काकासुर, शकटासुर एवं तृणावर्त का उद्धार
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
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वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हृदपितम मधुपते स्मरता निर्वापय परम शीतल माश्रयाम परम शीतल माश्रया [नाक से की जाने वाली आवाज़] परम सच्चिदानंद घन प्रेमंद स्वरूप नवनि निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाडलेले युगल सरकार प्राणाराध्य प्राण प्रिय श्री प्रिया प्रीतम जो समस्त सहचरी वृंद खग मृग पशु पंछी तरुलता यमुना रस रानी रजरानी ब्रजवासी परिकर कोटि स चरणों में बार-बार नमस्कार बार-बार प्रणाम देखो भगवान जब अवतार लेते हैं पापी पुण्य आत्मा कुछ नहीं देखते सबको परमधाम प्रदान करते हैं।
जो दृष्टि में आ गया या जो उनको अपनी दृष्टि में ले लिया दोनों को चाहे वह भगवान के प्रति कुभाव रखे या अच्छा भाव रखे भगवान ये नहीं देखते उसका मंगल कर देते हैं। पर अन्य समय भगवान कृपा की वर्षा करते हैं। सब पर मोर बराबर दाया सब मम प्रिय सम मम उपजाए अब इसमें क्या होता है कि जब जीव के ऊपर भगवान की कृपा होती है तो उस कृपा का अनादर करता है भगवान की दया भगवान की कृपा संत समागम भगवत आराधना का क्रम उपदेश उपासना में रत होना यह सब अपार कृपा है। पर जीव की दुर्गति है, दुर्दशा है कि वह अपने शरीर को मैं मानकर भोगों में सुख बुद्धि करके भगवान की कृपा की अवहेलना कर देता है।
बस फिर दुर्गति और भटकना पड़ता है। पेट भर लेना या इंद्रियों के भोग भोग लेना है। पशुओं में भी है। बड़े भाग मानुष तन पावा सुर दुर्लभ सद ग्रंथन गावा किस बात के लिए है यह जो दुर्लभ मानुषो देह नाम क्षणभंग तत दुर्लभ मननेत बैकुंठ प्रिय दर्शनम यह दुर्लभ मनुष्य देह कहे गए किस बात के लिए भजन करके इंद्रियों को शासन में लेकर भगवान की प्राप्ति के लिए वो बड़े अभाग भागी हैं जो भगवान से विमुख होकर भोगों में सुख मानकर राजी हैं। जिनका जीवन संकट में जा रहा है पर वो समझ नहीं पा रहे।
अंधकूप में जा रहा है। वो समझ नहीं पा रहे। पुण्यों के प्रभाव से सुख भोग रहे हैं और पाप कर्म वर्तमान में कर रहे हैं। परिणाम में जब आपके भूत का पाप कर्म और वर्तमान का पाप कर्म दोनों जुड़ेंगे तो तुम्हारा ऐसा सर्वनाश शुरू होगा। फिर कोई बचा नहीं सकता। इसलिए अभी कृपा है। संत कृपा गुरु कृपा शास्त्र कृपा भगवान कृपा सब है आपके ऊपर। आप अपने ऊपर अपनी कृपा कर लीजिए। अपनी कृपा जो संत सदगुरुदेव शास्त्र आज्ञा करते हैं वैसा चल दीजिए प्यारे तो बच जाओगे मुक्त हो जाओगे।
श्रीपाद प्रबोधनांद जी महाराज कह रहे हैं अरे शीघ्रम शीघ्रम सुत धन कलत्राद ममता प्रताने कालोयम नब पुरदम मृत्युगतम समस्ता [चीखने की आवाज़] लभ नाम परम मलभ्यम स्व कृपया भूक्तम वृंदा विपिनधाव हता अरे मूर्ख शीघ्रम शीघ्रम को जल्दी कर जल्दी कर तूने मृत्यु को अधीन नहीं कर रखा है कभी भी किसी भी क्षण मृत्यु तेरे शरीर को नष्ट कर सकती है कभी कोई भयानक रोग हो सकता है सब होश उड़ जाएंगे तुम्हारे अहंकार के जहां वहां रिपोर्ट आई पता चला कैंसर पता चला किडनी फेल पता चला तुम्हारा दिल कमजोर हो रहा कभी भी फेल हो सकता है वो कब फेल होगा तुम अभी फेल हो जाओगे पक्का समझ लो बातें बनाना अलग है जब शरीर में मृत्यु वाला रोग होता है ना तो अच्छे अच्छे के होश उड़ जाते हैं और बस डिप्रेशन में पहुंच जाता है ना रात में नींद ना दिन में भूख ना चैन इसलिए पहले से अगरित भगवान में जुड़ा है तो मरने से सब जग डरा मेरो मन आनंद कब मरी हो कब भट हो पूर्ण परमानंद अपने प्रीतम से मिलना है मरना क्या है शरीर छोड़कर प्रीतम से मिलना है अरे शीघ्रम
कुर शीघ्रम सुत धन कलत्राद ममता ये स्त्री ये पुत्र ये धन ये मकान ये वैभव तुम्हारे साथ नहीं जाएगा तुम्हारे साथ भगवान का नाम जाएगा। परोपकार से जो धर्म किया वह जाएगा। जो शरीर से भगवत सेवा की वह जाएगा। यह शरीर मृत्यु के अनुगत है। कभी भी छूट सकता है। इस पर विश्वास मत करो। कभी भी छूट सकता है। पान की दुकान में खड़े मोटरसाइकिल पान लगाओ। दो तीन पान अरे जल्दी कर यार देर हो रही है बस गिरे मोटर पान लगा रखा है जल्दी कर रहे थे पान के लिए और पान मृत्यु ने उनको कर लिया एक के सामने भोजन की थाली है होटल में बैठे पान पूरा मुंह उसी में राधेश्याम किस क्षण एक कवल भी नहीं खा सकते अगर समय पूरा हो गया तो ऐसे शस भी नहीं ले सकते।
राधा बोलने की तो बात जाने दो। इसलिए जब तक शस है वर्तमान में तुम नाम जप करो। राधा राधा राधा भविष्य तुम्हारा मंगलमय होगा। भूत तुम्हारा पवित्र हो जाएगा। भविष्य मंगलमय हो जाएगा। वर्तमान में नाम जप कर। ये कोई दुर्लभ नहीं है। स्त्री पुत्र धन संपत्ति ये सब पापियों के घर हो। सुत दारा धन लक्ष्मी पापियों के घर होए संत समागम हरि कथा तुलसी दुर्लभ दो समस्त दुर्लभ वस्तुओं में दुर्लभ वस्तु है भगवत प्रेम भगवान मोक्ष तक दे देते लेकिन प्रेम सहज नहीं देते पृथ्वी में प्रकाशित ये श्री धाम वृंदावन इसका आश्रय इसका वास सीधे प्रिया प्रीतम का प्रेम प्रदान करता है।
यदि निरपराध होकर रहा जाए तो रहने से रहा जाए तो अहा मंदा वृंदा विपिन इदमी स्थिर चरम चिदानंदाकारे गुणम धिया साधन धिया वयंतु श्री राधा मुरलीधर दास रससम पदा में तत कंदम द्वखिल वंदम ब्रम ऐ मंद बुद्धि अब भी मान ले वृंदावन आजा कुछ क्षण बैठ सत्संग सुन यमुना के पावन पुलिन पर बैठकर नाम जप कर मंत्र जप कर वाणी गायन कर नाम कीर्तन कर क्योंकि वृंदावन में थोड़ा भी भजन [खांसने की आवाज़] चिदानंद रूप प्रदान करता है। वृंदा विपिन इदियम स्थिर चरम चिदानंदाकार गुणमय धिया साधन धिया यहां जो थोड़ी भी साधनामय बुद्धि करके साधना कर ले तो बहुत बड़ा उसका फल होता है।
चिदानंदमय स्वरूप वृंदावन प्रकाशित करता है। तू माइक आचरणों के द्वारा यहां अपराध करता है। इसलिए तुझे अनुभव में नहीं आता। वृंदावन प्रेम समुद्र है। आनंदमय है। चिदानंद स्वरूप प्रदान करने वाला है। पर आपको क्यों अनुभव में नहीं आता? क्योंकि आप कुिया गंदी बुद्धि रखते हो। यहां आकर भी वही गंदे आचरण, गंदी बात, गंदा दर्शन, गंदा व्यवहार यदि तुम इन माईक गुण में तमोगुण, रजोगुण की प्रेरणा के जो कार्य हैं, इनका त्याग कर दो, तो श्री राधा मुरलीधर का तुम्हें अद्भुत सुख प्राप्त कराने वाला दास वृंदावन प्रदान कर देगा।
यह समस्त वंदनीयों का परम वंदनीय महा धाम वृंदावन है। बड़ी महिमा है। थोड़ा सा दान, थोड़ा सा पुण्य, थोड़ा सा भजन बहुत करके यहां प्राप्त होता है। पर विपरीत भी सोचिए। थोड़ा सा पाप, थोड़ा सा झूठ, थोड़ा सा असत्य, थोड़ा सा अनाचार, दुराचार पर्वत जैसा हो जाएगा। भोगना मुश्किल है और यहां का पाप वज्र के लिए होता है। अर्थात जल्दी मिटने वाला नहीं। मिटा सकते हैं तो राधा माधव ही मिटा सकते हैं क्योंकि उनके धाम का अपराध है। वही कृपा करें। वही आदेश करें। धामी श्री श्यामा श्याम वृंदा सखी को तो हमें अपराध मोचन कर दे।
नहीं यहां वृंदा सखी का एक छत्र शासन है। कोई भी जरा सी भी कहीं भी अपराध वृत्ति करेगा तुरंत नोट होती है। बहुत सावधानी यहां ये भगवत धाम है। यदि निरपराध होकर रहा जाए तो चिदानंदमय स्वरूप और राधा माधव का वो महा सुख दास्य भाव हृदय में दासता प्रिया प्रीतम की जागृत कर देता है। इसलिए मानव जीवन की उपलब्धि उन्नति हमारी एक एक वृत्त भगवत चिंतन करते हुए अच्छे आचरण करें सत आचरण करें चलते हैं श्रीमद् भागवत महापुराण नंदालय में रोज नवीन नवीन उत्सव हो रहे हैं। क्योंकि महा महोत्सव स्वरूप आनंद कंद श्री लालजू महाराज विराजमान है।
यशोदा मैया अपने लाला को गोद से पालने में और झुला झुला के दर्शन करते हुए आनंद ले रहे। कभी लाला किलकारी मारता है, कभी आंख खोलकर मैया की तरफ देखता है। तो यशोदा हरि पालने झुलावे यशोदा हरि पालने झुलावे हलरावे दुलरावे मलावे जोई सोई कछु गावे जोई सोई कछु गावे जोशोदा हरि पालने झुलावे मेरे लाला को आओ निंदिरिया काहे ना सुवे तू काहे ना बेग सिया आवे तो को कान बुलावे कबहु पलक हरि मुंद लेत है कबहु अधर फरकावे सोवत जान मौन होए के रही करिन बतावे कवि हरि आंखें मूंद लेते हैं।
भैया सो गया लाला दासियों को सारा कोई आवाज नहीं होनी चाहिए। मेरा कान्हा सो गया है। क्या सौभाग्य अनंत कोटि ब्रह्मांडों का मालिक पालने में और मैया उस सुख को ले रही जो बड़े-बड़े योगियों के ध्यान में भी नहीं आते। उन प्रभु की रूप माधुरी सोवत जानी मौन होए के रही करी कर कर शैन बतावे लाला सो गया कोई आवाज कोई बर्तन की आवाज कुछ नहीं थोड़ा सोए फिर अकुला करके प्रभु आंख खोल लिए इ अंतर अकुलाई उठे हरि हे जशु मैया बार-बार लाला के वक्षा स्थल पर छाती पर ऐसे हाथ के सो जा सो जा जसुमति मधुरे गावे जो सुख सुर अमर मुनि दुर्लभ सो नंद भामिनी पावे यशोदा हरि पालने झुलावे देखो भगवान की लीला में यह देखने को मिल रहा है कि सदैव एक सा नहीं रहता।
अगर सुख तो विपत्ति फिर सुख तो फिर विपत्ति। मैया ने देखा लाला पालने में सो गया। लाला के लिए अपने हाथ से दूध गर्म करती है। अपने हाथ से मक्खन निकालती। सेवा में लग गई। इधर कंश भयभीत हो गया। पूतना मार डाली गई। निश्चित हो गया। ये कोई साधारण बालक नहीं है जो अभी छठव दिन महाबली पूतना को मार डाला। कंस बड़ा शशंकित और भयभीत है। उसी समय सभा में विराजमान काकासुर जो कौवे का रूप रख के वज्र जैसी चोंच, वज्र जैसे पंजे वो देवताओं को भी मार सकता है। इतना बलवान काकासुर खड़ा हुआ और हंसते हुए कहा महाराज एक बालक के लिए आप इतने चिंतित हो गए।
कंस ने कहा आज की घटना सुनी नहीं। वो बालक है। छह कोस का शरीर धारण करने वाली महाबली पूतना को मार डाला। चिंता की बात नहीं है। उसने कहा महाराज एक चांद हमें दीजिए। आपकी चिंता को जड़ से नष्ट कर दूंगा। कंस को लगा कि बलवान तो है ही बुद्धिमान भी है। तो या मेरे दोस्त यदि तुम ऐसा कर सकते हो तो हमारी मित्रता और पक्की हो जाएगी। जाओ और नंदालय में जो अभी नवजात है प्रभु अभी अभी नवीन कमल की तरह खिले देखो कैसे विघ्नाते हैं उसे मार डालो कंस से प्रेरित होकर वो कागसुर जो काग कौवे का रूप रखता है ब्रज मंडल में पहले फिर नंद बाबा के भवन की तरफ और छोटा काग का रूप रखकर के आनंद में देखा कि पालने पर श्री कृष्ण शयन कर रहे हैं।
शिष्य को देखते ही भयंकर क्रोधित हो गया। काला कौवे का रूप धारण किए हुए लोह की वज्र के समान उसकी चोंच और पंजे हैं। भगवान ने ऐसे मुट्ठी बांध ली सोते हुए और उसने भगवान की मुट्ठी पर प्रहार करने के लिए टूट पड़ा। मैया अपनी सेवा में लगी है। देखो कैसे भगवान लीला करते नहीं तो मैया तो बहुत डर जाती और मैया के ऊपर आक्रमण कर सकता था। तो मैया सेवा में गई। लाला पालने पे शयन कर रहे। शयन करते ही मुट्ठी बांध ली। और उसने प्रहार किया। बाई मुट्ठी पर चमकते हुए अपने नख जो वज्र के समान है प्रहार किया।
भगवान ने जब बाई मुट्ठी पर प्रार किया तो दाएं हाथ से गला पकड़ लिया उसका कंठ जाप बहु बार फिरायो गह पटक्यो नप पास पर्यो वही से घुमा के मारा कि कंस के सामने मुंह भरा गिरा जाके कंस ने देखा काकासुर है अभी तो सभा में कह के गया था कि अभी गए तुम चिंतित हो अभी मैं मार के आता हूं कंस के सामने गिरा। एक पहर तक औषधियां पवाई गई। तब कुछ उसमें सुधि आई। फिर भी गला बहुत दर्द कर रहा था। उसने कहा सुनहु कंस तब आई सर धर अवतार महाबल को एक ही कर मेरो गर्भ हर सुनहु कंस तब आई सर सूरदास प्रभु कंस निकंदन भक्त हेत अवतार धर धरि अवतार महा महाबल को एक ही कर मेरो गर्भ हर बड़ी कठिनाई से बोला क्योंकि गला दबाया था प्रभु ने कंस ये कोई अवतार है बालक नहीं कोई महाबल का अवतार है मैं एक ही हाथ से गला पकड़ के मुझे फेंका है।
उत्कर्ष नाम का दैत्य खड़ा हुआ और हंसते हुए कहा कि बड़े बल मददा बनते हो और ताकत तुम में है नहीं। कंस एक बार मैं चाहता हूं कि मुझे आदेश करो। यह उत्कच हिरणाक्ष का पुत्र है। चाक्षुस मनवंतर से पूर्व की बात है। एक दिन यह उत्कर्ष लोमस ऋषि के आश्रम में जा पहुंचा। बड़ा सुंदर तपोवन देखकर उसे ईर्ष्या हुई कि ऋषि का ऐसा आश्रम। उसने बड़ा शरीर बनाया और पूरे आश्रम को उजाड़ना शुरू कर दिया। कोमल हृदय लोमस जी उसे क्षमा करना चाहते थे। पर वो अपना उदंडता नहीं बंद किया।
कहा कि शांत हो जाओ और जा। तब वो देखा कि यह दुर्मति मानेगा नहीं। तो उन्होंने कहा विदेहो बहुत दुर्मते जा तुझे अपने देह का बड़ा अहंकार तेरा देह अभी पतन हो जाए विदेहो भव दुर्मते वाक्य पूरा नहीं हुआ कि उत्कच का पूरा शरीर ऐसे गलित हो गया खत्म अब वायु अब वायु रूप में पुकार पुकार के कह रहा क्षमा करो हे ऋष्वर मैं बार-बार आपसे जीवन दान चाहता हूं। क्षमा करो मैं बहुत कष्ट में हूं। महात्माओं को गुस्सा पानी में जैसे लकीर करें ना बस ऐसे होता है गुस्सा। वो भी उसके कल्याण के लिए होता है।
कभी अपने स्वार्थ की पूर्ति में बाधा पड़ने पर क्रोध नहीं होता। जब परमार्थ में बाधा होती है तब उनको क्रोध आता है। और वह भी क्रोध एक क्षण के लिए जैसे पानी में लकीर खींचो खत्म। बड़ी अनुकंपा, बड़ा दुलार करने लगे। अच्छा तुम्हें बहुत पीड़ा है। थोड़े दिन तो तुम्हें कष्ट भोगना पड़ेगा। सच्चिदानंद भगवान श्री कृष्ण का जब अवतार होगा तब उनके हाथ से तुम्हारा उद्धार हो जाएगा। तुम अपने स्वरूप को प्राप्त हो जाओगे। काफी समय हो गया था। बड़ा भूख प्यास से व्याकुल वायु रूप होकर भयंकर भटकता रहा।
कंस ने वायु रूप धारी उत्कच से कहा सच्ची तुम उस बालक को मार सकते हो। उत्कर्ष ने हंसते हुए कहा अभी हमारा आतंक आपने देखा नहीं। अगर मैं सभासदों के बीच में बोल रहा हूं कि ब्रज भीतर उपज्यो मेरो रिपु मैं जानी यह बात दिन ही दिन वो बढ़त जात है मु को करिए घात धनुज सुता पूतना पठाई छिनक माज संहारी और घीच मरोर दियो काग गा मेरे ढग फटकारी एसो कौन मार है ताको मोह कहे सो आई वाको मार अपुन पो राखे सुर ब्रजह सो जाई कंस ने कहा कि तुम सभासदों के बीच में उत्कच ऐसी बात करते हो पर मुझे विश्वास नहीं क्योंकि उसने पूतना को मार डाला कागासुर को दुर्दशा कर दी ऐसा कौन उस बालक को मार सके मानो प्रज्वलित अग्नि में घताहुति पड़ गई हो कंस के वचन से उत्कर्ष गर्व को प्राप्त हुआ अहंकार करते हुए कहने लगा मैं राक्षसों का सेनापति हूं हिरणाक्ष पुत्र हूं शरीर नहीं है तो क्या मैं वायु रूप से पूरे ब्रज को नष्ट कर सकता हूं।
कंस ने कहा जाओ एक बार तुम भी उपाय करके देख लो बवंडर रूप वो जो ऐसे घूमता हुआ बवंडर होता है ना ऐसा रूप धारण किया उसने दो कर जोर भयो उठ ठाड़ो प्रभु आयस मैं पाऊं आते जाए तुरत ही मारो कहो तो जीवित लाऊं और कंस से कहा तुम आनंदित रहो। कहो तो मारकर फेंक दे या जिंदा तुम्हारे सामने ले आवे। कंस ने भूरीभरी प्रशंसा की। वाह वीर जाओ उसको मार डालो। ब्रजेंद्र नंदन के प्राण हरण का संकल्प करके वह भीषण दैत्य ब्रज की तरफ चला मथुरा से। और ब्रजेंद्र नंदन योगेंद्र मुनिंद्र दुर्लभ चरणारविंद उनको मारने की जो काल के भी महाकाल है बीचबीच में घबराहट पैदा हो जाती है कि पूतना को मार डाला कागासुर की दुर्दशा कर दी कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरा शरीर तो लोमस जी ने ले लिया जान ये ले ले बीचबीच में घबरा जाता है।
फिर रुक जाता है। फिर हिम्मत किया और बाबा के महल की सीमा पर आकर राउंड लगा रहे हैं। वो जो ऐसे चलता है ना घूमता हुआ वायु चक्रवात ऐसे मानो बाबा के महल की परिक्रमा कर रहा हो। चारों तरफ वो घूम रहा है। शरद और हेमंत की संधि का प्रभात है। चारों तरफ आनंद ही आनंद ब्रज मंडल में छाया हुआ है। ब्रजेंद्र गणी यशोदा मैया आज रोज उत्सव हो रहा है। कभी नक्षत्र का उत्सव, कभी यह उत्सव उत्सव स्वरूप ही वह उत्सव की व्यवस्था में लगी है। रोज ब्राह्मणों को बुलाना, अभिषेक कराना, दान देना, ब्राह्मणों को भोग पवाना, गौओं की पूजा करना, ब्रजवासियों को बुलाना, उनको पवाना रोज उत्सव हो रहा है।
रोहिणी जी के सहित सेवा में लगे हैं। पर धीरे से एक बार सेवा करते करते लाला का दर्शन कर लेते हैं। सुख पूर्वक लाला शयन कर रहा है। अगर जरा सा भी शंका हुई तो दौड़ के पहुंच जाती है। नजदीक लाला को गोद में उठाती है। दुग्ध पान कराती फिर शयन करा देती है। प्रभु उठे भोग लगा श्रृंगार हुआ फिर भोग लगा फिर शयन हुआ फिर उत्थपल फिर भोग लगा फिर श्रृंगार हुआ फिर से यही तो है यही अष्टयाम सेवा कर रही यशोदा मैया रोहिणी जी यशोदा मैया सेवा में लगी हैं और धात्रियां दासियां भी उनकी आज्ञा का पालन कर रही है।
कभी-कभी प्रभु बड़े जोर से किलकार मारते हैं। दौड़ पड़ती है। धात्री यशोदा जी रोहिणी जी नजदीक आती है। छोटे-छोटे बा रखे झुनझुनाए ऐसे ऐसे अखिल कोटि ब्रह्मांड नायक प्रभु किलकारिया मारते हैं। नंद नंदन अभी कोई झुनझुना बजा रहे कोई कुछ गा रहे इतने में धीरे से करवट ली अरे आज मेरे लाला ने करवट लिया करवट बदलने का उत्सव हुआ पहली बार लाला ने करवट लिया है दाहिनी करवट ली फिर मैया को क्या कहना अपार आनंद आज करवट बदलने का उत्सव होगा हमारे लाला ने करवट बदली है एक ही साथ तुम ध्वनि हो गई।
बाबा को सूचना करो। ब्राह्मणों को बुलाओ। अरे लाडली है। मंत्र उच्चारण करें। उनको गौए दान करो। लाला ने करवट स्वयं बदली है। स्वयं करवट ली है। यशोदा मैया मुख चुंबन करती हैं। हृदय से लगाती हैं। इतने में समाचार सुनकर लाला ने करवट बदली है। बाबा और बूढ़े बूढ़े गोप आ गए। शयनम पार्वो पीडम सयान सुकुमार कुमार पीड मकस्मातिलोक्य तदते धात्री मात्रे निवेदित मात्रे शाति मातंद कंदलिता निज नंदन मंगलातिसणी श्रीमन नंदक्षित भरतराम सुगाता शू भू सर्वा समा महोत्सवम महा महोत्सवम चकार बाबा आए आज मेरे लाला ने करवट बदली महोत्सव हो नहीं महा महोत्सव हो पूरे ब्रज मंडल को प आज लाला स्वयं अपनी शक्ति से करवट बदला है बाबा ये शक्ति दे रखा ये नहीं देखा कि लाला छाती में चढ़ के पुतला को मारा कागासुर को मरोड़ दिया।
यह वात्सल्य में नहीं दिखाई देता। उनको लगता है भगवान मेरे नारायण ने मेरे बालक की रक्षा की। नंद द्वार पर शंख ध्वनि धुंद भी भेरी बेणु वीणा मृदंग ये सब बाजे बजने लगे। मंगल गान करती हुई बृजांगनाएं नंद महल में आने लगी। धान्य दूवा हरिद्रा चंदन मांगलिक द्रव्य हाथ में लेकर गोपियों का दल का दल वेदज्ञ ब्राह्मण बृजेंद्र नंदन ने समस्त ब्रह्म ऋषियों के चरण धोए और स्वर्ण के पात्रों में भरभर करके रत्न अन्न राशियां दान की। सुंदर बहुमूल्य वस्त्र रत्नाभूषण मणिमालाएं ये सब ब्रह्म ऋषियों को दान की।
फिर करोड़ों की संख्या में गौ दान किया। नंद उपनंद सब और जहां भगवान है वहां कभी कमी नहीं होती। करोड़ दान करे तो कई करोड़ व्यवस्था हो जाती है। बृजेंद्र की पूजा से संतुष्ट ब्राह्मणों ने आशीर्वाद दिया। लाला चिरजीवी है। ये हृदय से आशीर्वाद देते हैं। महिलाएं जो ब्रज युवतियां हैं वो जो गांव के गीत गाए जाते हैं अपने गीत गा रही हैं। ब्रज रानी ने उपटन लगाकर के लाला को स्नान कराया। जब ऊपर से जल डालते हैं तो लाला किलकारी करता है। देखो भावना में देखो सुख मिलता है भावना में डूबने से।
बड़ी सी थाल है। पहले गोदी में लेकर के अंगराग उपटन लगाते फिर बीज थाल में खड़ी कर देते और अनुकूल जल के द्वारा प्रभु का अभिषेक स्नान करा रहे। प्रभु कैसे आनंदित हो रहे? घुंघराली अलकावली विशाल नेत्र श्याम कांत मुस्कुरा रहे हैं किलकारी कर जैसे जल डाले तो ऐसे ले ऐसे बालगोविंद जो युवतियां है वो गीत गा रही हैं। सर्वांग जल से अभिषिक्त करके स्नान कराकर मैया अपने अंचल से पूछती है। बाद में गोद में लेकर के गोरोचन का तिलक लगाती है। फिर अनामिका से अच्छी तरह पोछ करके काजल लेती है।
और बड़े-बड़े अरविंदक्ष नेत्रों में काजल लगाती है। आंधते समय जब काजल लगाते हो तो बालक रोने नहीं लगते तो रोने जैसा प्रभु कर या पुकार नहीं रोना नहीं रोना नहीं काजल ऐसे लगा रही ये सुख मिलता है उपासना से जिनके सूर्य और चंद्र नेत्रों से प्रकाशित होते हैं उनको प्रकाश मिलता है उन आंखों में यशोदा में और प्रभु रोने जैसा करते तो पुचकारते रोना नहीं रोना नहीं पर वो रो ही देते हैं। तो मैया जल्दी से अपने दुग्ध को उनके मुख में डाल फिर पुचकार करके हे परम ब्रह्म परमात्मा को कैसा दुलार यही तो भाव में दम है।
जगत के माता-पिता वही है और उनको गोद में यशोदा मैया दुलार कर रही है। जब मीठा मीठा अनुकूल दुग्ध मैया का मुख में जाता है तो काजल लगे हुए नेत्र से नंद नंदन मां की तरफ देखते हैं। मां निहाल हो जाती है। आत्म विस्मृति सी हो जाती है। कुछ ब्राह्मण आए कुशा हाथ में लिए हुए और शांति कुंभ जल से अर्ध बना बनाकर मंत्रो उच्चारण करके भगवान के ऊपर ऐसे छिड़क रहे हैं। शांति पाठ करते जा रहे हैं। प्रोक्षण छोटी-छोटी बूंदे जल की पड़ रही तो नंद नंदन सो जाते हैं। बढ़िया कुशा से छिड़क ना ठंडीठ्ली जल प्रभु आंख बंद कर लेते हैं क्यों क्योंकि वो मंडरा रहा है आसपास सो नहीं रहे सोच रहे हैं ज्यादा कुसा कुसा जल छिड़कने में समय लगा है तो इनको भी समेट ले जाएगा तो हम इनको बचाएंगे कि पहले उसको प्रहार करेंगे प्रभु को पता है सर्वज्ञ है श्री नायको्थान िक मंगले प्राप्त समग्र गोप ग्राहम सुखम तन कथम निद्रा सदम किमागा बिल्कुल सो गए कि कोई भी आसपास ना रहे भैया ने कहा सब चलो सब चलो लाला को नींद आ गई लाला को सोने दो और प्रांगण के भाग में शकट गाड़ी के पहिए निकालने के बाद जो हिस्सा बचता है उसे सकट कहते हैं।
वो मैया ने उसी सकट के पलना में लाला को सुला दिया। चलो सब वो सकट कोई ऐसे केवल लकड़ी का थोड़ी है कि मरकत मणि से पट्टियां लाल मणि से सब ऐसे मणियों से जटित वो है छकड़ाऊ जो शकट कहते हैं। पहिया हटा देने के बाद गाड़ी का जो हिस्सा बचता है उसे सकट कहते हैं। मैया ने धीरे से तकिया लगाया। सुला दिया और सबसे कहा यहां से हट चलो लाला को नींद आ गई है। अचिंत लीला महाशक्ति ये सब संविधान बना रहे हैं। नहीं तो गड़बड़ हो जाएगा। पूरा परिक परेशान हो जाएगा। ब्रज महषि अब यशोदा जी रोहिणी जी जो आए हुए ब्रजवासी जन उनको खवा ले पिया ले स्वागत में यशोदा नंदन की दृष्टि उस महान राक्षस पर है जो मारने आया है आंख भर मूंदे हुए हैं उत्कच दैत्य सीधे आंगन में आया सूक्ष्म रूप रखा और अत्यंत आनंदित हुआ कि अब सकट के नीचे है।
बस अपना भार बढ़ाना है। सकट पर रख के नीचे गिरेगा और बालक मर जाएगा। वायु रूप उत्कच उस सकट को अपना लक्ष्य बनाया जिसमें नीचे लाल जो शयन कर रहे हैं। लाल जी ने दृष्टि डाली आओ बेटा तुम्हारे बाप तो हम ही है जगत के तो है ही लेकिन तुम्हारे भी है तुम कितनी चतुरता करोगे हमें तुम बालक समझते हो भगवान ने दृष्टि से देखा कितने भाग्यशाली है जो दृष्टि बड़े बड़े ऋषि मुनि आराधना करके चाहते हैं वह उसको सहज मिल रही है भगवान ने एक अंगूठा मुंह में डाला और चूसने लगे। मानो उसको दिखा रहे हैं कि मैं जग रहा हूं, सो नहीं रहा हूं।
वहां कोई आसपास नहीं। भगवान ने ऐसी लीला की सहन की कि सब चले गए थे। वैसे भी अंगूठा चूसने का अभ्यास है प्रभु को। उसमें आता है ना भगवान अपने कर कमल से चरण का अंगूठा चरण का करारविंद मुखारविंदम पदारविंदे विनवे सयंतम वटस पत्रस पुट सयानम बालम मुकुंदम मनसाम तो कर पग गई अंगूठा मुख मेलत प्रभु पढ़े पालने अकेले हरस हरस अपने रंग खेलत अभी सोने के लीला करो जब चले गए ना तो आनंदित हो मान लो जैसे कोई पहलवान युद्ध करना हो तो थोड़ा अंग अपने तो अपने अंग और अंगूठा पी रहा जे चरणारविंद श्री भूषण उरते ने कुटारती देखो धोका रस चरणन में मुख मेलत कर आरती जो चरणारविंद के रस को सुर मुनि करत विषाद सो रस है मोह को दुर्लभ ताते लेत स्वाद ये सब लोग हमारे चरणों की क्यों वंदना करते हैं?
बड़े-बड़े ऋषि मुनि चरणों का ध्यान करते हैं। तो क्या स्वाद चरणों में तो भगवान चरण पकड़ के खुद अपने अंगूठा का स्वाद ले रहे हैं। इसी समय वो सकट पर पहुंचा वह उत्कर्ष और एक बार भगवान को देखा सा पोतना पोत कोयम पोतो विसंकट सकटा धस्ता दास्ते साक्षात मृत्यु विधात तुम कोपी जंतु शते छ रूप तचा पूतना संस्थिता तस्ू सनो पू ये पूतना को मार दिया छोटा सा नीलम मणि पूतना को मार दिया सा पूतना पोथ कोयम पोतो अरे पूतना क्या थी उसको इसने मार दिया मुझे तो विश्वास नहीं होता कि ये पूतना को मार है।
उत्कर्ष ने देखा तो भी मैं आज इसके प्राण हर ही लूंगा। वैसे तो बहुत सुंदर है और इतना सुकुमार है कि पूतना को कैसे मार सकता है? ऐसा निश्चय करके सकटे पर अपना जाकर बैठ गया और वजन बढ़ाने लगा। आसुरी माया का विस्तार स भारी वजन और उसने जितना वजन लगाया पूरा अपनी आसुरी माया का कि नंद नंदन इसी के नीचे पिस जाएंगे और उत्कल को पता नहीं चला कि अनंत ब्रह्मांड एक रोम कूप में धारण करते हैं। एक रोम कुप में दिखरावाते मात अद्भु प्रचंड रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मांड ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रतििवेद कहे क्या जाने हो असुर भगवान को पीस डालने की इच्छा से पूरा भार रख दिया उस छकड़े के ऊपर भगवान ने कहा कि तू धर ता यही दिखाने आया है हमारे घर में किलकारी मारी चरण ऐसे एक चरण ऐसे लगा दिया छकड़े पे पालने से काफी दूर होगा छकड़ा और छोटे से नंद नंदन बामन बन के गए थे तो पहला पग ब्रह्मलोक गया था ये है ये वो पूरी ताकत लगा रहा है छकड़ा टस से मस नहीं हो रहा छोटे से नंदन नंदन का एक चरण केवल पूरी ताकत लगा रहा सटासुर वही उत्कर्ष उत्कच ने सोचा कि कहीं और गोप गण आ गए तो हमारी बात बिगड़ जाएगी।
पूरा फिर संकल्प करके माया के द्वारा पूरा बल लेकिन जितनी माया है उन सब मायापति तो भगवान है। कहां वात्सल्य रस से दुलार करने वाले बाबा और मैया के द्वारा पोषित लालजू लालू ने योग माया की तरफ देखा कि बहुत उपद्रव कर रहा है ये बृजेंद्र नंदन के वात्सल्य का आस्वादन कहा मैं बालक हूं और यह उत्कच उपद्रव मचाने आया है योग माया ने कहा सरकार बस आपका इशारा ही काफी है। जहां प्रभु थे सकटा ऐसा उल्टा कि नीचे सकटासुर वही उत्कर्ष और योग माया ने अपना बल विस्तार किया किचकिचा गए व मर गए भगवान की अनंत शक्तियां हैं।
अंदर से काख रहा है, रो रहा है, करुण क्रंदन कर रहा है। योग माया ने आवाज बंद कर दी। जैसे अभी भगवान यहां प्रकट हो तो ना किसी को शब्द सुनाई देगा, ना किसी को रूप दिखाई देगा ना। भगवान जितना कार्य करते हैं वह सब योग माया से करते हैं। भगवान अगर योग माया तो एक एक को जिसको दर्शन देना होगा वही वही केवल देख सकता है वही सुन सकता है भगवान क्या कह रहे हैं दूसरा नहीं तो वहां आवाज बंद कर दी योग माया उपासता गोप गोपांगनाए इतना चीखा वो दैत्य सकड़े के छकड़े के नीचे और योग माया का दबाव पिसा चला जा रहा है मार चीख रहा है लेकिन घर में किसी के कान में आवाज नहीं पड़ रही।
योग माया बृजेंद्र नंदन के इशारे में चलने वाली है। दैत्य मर गया। लेकिन सकटे में स्पर्श लालजू का चरण और सकटे में वो था। तो लालजू के चरण के स्पर्श मात्र से छकड़े के स्पर्श मात्र से वो दिव्य रूप में आ गया। उसका आसुरी शरीर वो तो मर गया। भगवान के अब योग माया इस समय किसी को आने नहीं दे रही। भगवान के सामने दिव्य रूप धारण करके चरणों में योग माया ने आदेश के तुरंत अंत यहां विनय और प्रार्थना का भी समय नहीं वो भगवान की अनुमति से अब आवाज पहुंची छकड़े की समझ रहे छकड़ा गिरे हुए कितना समय में हुआ वो मरा फिर वो हाथ जोड़कर प्रार्थना की दिव्य रूप धारण किया और जब चला गया तब छकड़े की आवाज पहुंची खर खर खर कर कुछ गिरा ऐसा लगा सब दौड़ पड़े बृजेश्वर कुछ दूर पे अरे ये तो कुछ भयानक गिरने की आवाज है रोहिणी जी यशोदा मैया चीख पड़े आंसू बहाते हुए ये जिधर आवाज आ रही उधर तो छकड़ा था छकड़े के नीचे लाल डाला था।
व्याकुल होकर भागी। यशोदा मैया ने भाग कर जब देखा छकड़ा पलटा हुआ मूर्छित हो गई। मेरे लाला का कुछ अनिष्ट हो गया। रोहिणी जी ने देखा कि झकड़ा अलग है। वो अलग अपने चरण चला के खूब किलकारी कर रहे थे। तो यशोदा जी से कहा बहन नीलमणि सुरक्षित है। कुशल है मैया को कुशल शब्द से चेतना आई कितना प्यार है प्रभु से दौड़ के गई लाला को मेरा लाला मेरा प्राण और अपनी दासियों से कहती हम तो सेवा में मगन तुम तो बीच में आकर देख लेती डांट रहे हैं दासियों को अश्व प्रवाह से भगवान को अभिषेक कर रहे हैं यशोदा लाला साला अगर तुझे कुछ हो जाता तो मेरा क्या होता खूब रो रहे बालों में नवनीतस मृदुलस त्रमासिको शंतिके हा कष्टम सकटस भूमि पतना भंगोय अकस्मात नंद बाबा आदि बड़ेड़े बूढ़े ब्रज गोप सोच रहे हैं ये तो छोटा सा लाला और ये सकटा कैसे पलट गया ये तो बहुत मजबूत रेशम की रस्सियों से बना हुआ ये ऐसा कैसे हो सकता है तत् यदि सुस्त ना ब्रजाधिका और थोड़ा तो आवाज होती एकदम कैसे पलट गया रस्सी टूटती कुछ थोड़ा आवाज होती कैसा है हाय रे मेरा नवनील नीलमणि मक्खन से भी सुकोमल है और इसके निकट पूरा का पूरा सकटा उल्टा होकर के गिर जाना।
मेरे तो प्राण निकल रहे हैं बात सोच के कि अगर मेरे लाला को कुछ हो जाता तो मेरे प्राण सब ब्रजवासियों के तो यही है। श्री लाल जो महाराज खूब रतन उतार करके फिर दान कर दिए। बाबा के यहां दान चलता रहता था। ब्रज रानी समस्त गोप और गोपियों के सामने कहती है कि तुम सब आशीर्वाद दो। तुम्हारे आशीर्वाद से ही हमारे लाला को कुछ नहीं हुआ। नहीं इतना बड़ा सकटा पलट गया था। कुछ हो जाता। सब आशीर्वाद दो। हम गोद पसार कर आशीर्वाद मांगते सब ब्रजवासियों से ब्रज गोपों से कि हमारे लाला को कभी कोई कष्ट ना हो।
अब नंद भवन में बड़ी सावधानी रख ली जा रही। फिर ब्राह्मणों को बुलाया स्वस्थ वाचन मंगल दान। माता जी छाती से श्री लाल जी को लगाए हुए हैं। इतने में कुछ गोप बालक भागते हुए आए और वो लालजू से उनके नित्य शिखा है। लाल जी से कुछ बात कर रहे हैं तोतली वाणी में मामा मम पापशत सुरताम या या यदा चाचा चरण मुम पितया ता ता ता तदा तेन स्पष्ट मात्र डी डी डी डी डीन इध सोयं सता कैसी तोतली वाणी में बोल रहे हैं मा मम पापा सुरता मेरी मेरी मेरी बात सुनो य या या यदा चरण मुथा पितम ये जो सकटा पलटा है मैंने दूर से देखा है ये ये कन्हैया ने कन्हैया भैया ने लात मारी ता ता ता तदा ते तेन स्पष्ट मात्रो डी डी डी डी डीन इो वृता स्वयं सटा ये जो पूरा माटो सहित सकटा पलटा है ये कन्हैया ने लात मारी है इसी से पलटा है बाबा ने कहा अभी सीधे उठ के तो बैठना नहीं आता लात मारेगा सटा पलट जाएगा रुदताने पादे छिपत संशय कैसे ऐसा हो सकता है मेरा छोटा सा लाला किंतु वो ब्रजवासी बालक बार-बार कह रहे कि इसी के चरण के प्रहार से सटा पलटा है।
बाबा ले माखन दे देकर के हां ठीक है जाओ वात्सल्य के आगे विश्वास नहीं होता ध्यान रखना वात्सल्य के आगे विश्वास नहीं होता ऐश्वर्य का उपनंद जी ने और बूढ़े ब्रजवासियों को बुलाया गणित लगाई कैसे पलट सकता है इतना मजबूत बंधा था ऐसा कैसे बाबा ने कहा गणित बाद में लगाना पहले छकड़ा ठीक करो जवान जवान बलिष्ठ गोपों ने जो 50ों की संख्या में थे सटा को ठीक किया सामग्री रख दी गई बड़ा वेद मंत्रों के द्वारा पूरा घर पवित्र किया गया विप्रा मंत्र विद युक्त प्रोक्ता तथा ताफला भविष्यती कदाचित मैया को इस सकट गिरने से बहुत भय लग गया अब कभी अकेले नहीं छोड़ना लाला को।
चाहे रोहिणी जी रहे या कोई सखी रहे और या मैया रहे। एक दो तो पास ही रहेंगे। नंद बाबा तो एकांत में हुए और कहा हे नारायण पग पग पर विपत्ति आती है। आप कैसे बचा लेते हो हमारे पुत्र को और ये नहीं कह रहे सोच रहे कि जिनके अंश से नारायण प्रकट हुए वो स्वयं अंशी भगवान है। अब बृजेश्वरी पहली बात तो एक क्षण गोद से ही नहीं उतारती थी। और अगर कहीं उतारा तो रोहिणी जी या कोई ना कोई धावा मां वहां उपस्थित रहेगी। शाम हुई लाला को शयन करा रहे यशोदा मदन गोपाल सुवे देख सयन गति त्रिभुवन कम ई विरंच भ्रमावे जब ये शयन करते तो पूरा समेट के शयन करते मैं ब्रह्मलोक तक बोले पूरा कंपायमान अनंत ब्रह्मांडों का कर विनाश करके सबको अपने में लेकर शयन करते उनको यशोदा मैया स्वयं शयन करा रही असित अरुणित आलस लोचन उभय पलक पर आवे जनु रवि गति संकुचित कमल जुग निश अल उड़न न पावे मानो कमल संकुचित हो रहे रात्रि में ऐसे प्रभु के नेत्र मुंद रहे हैं।
कैसे लाला लाल छोटे छोटे ओष्ठ हैं। स्वास उधर उसित यो मानो दुग्ध सिंधु छवि पावे जो उधर जो भगवान का ऊपर नीचे हो रहा है बड़ी शोभा हो रही है। नाभि सरोज प्रगट पद्मासन उतर नाल पछितावे वही नाल वही नाभ जिससे ब्रह्मा जी प्रकट हुई है यशोदा मैया ऐसे ऐसे उधर में लाला धीरेधीरे सो रहा है कर सिर तर कर श्याम मनोहर अलक अधिक सोभावे सूरदास मानो पनगपति प्रभु ऊपर पन छावे जसोदा दा मदन गोपाल सुवे प्रातः काल हुआ फिर लालन की दिनचर्या स्नान आदि सब करा के सुभ्रा सुक्तम तदा लोचनम नवा केशम सरध विग्रहम भानु प्रभा भावम तमसत रोहिणी त युक्तम सह दिव्य बालका रोहिणी के लाला बलराम जी कैसे एकदम गोरे आज सुंदर मैया श्रृंगार करके आंखों में अंजन लगाकर सिर पर केश सवार करके और श्याम वर्ण के वस्त्र धारण करा है।
बलराम जी अधिकतर पसंद करते हैं। श्याम वर्ण प्रभु के श्री अंग का गोरे हैं। बस प्रियालाल जैसी जोड़ी है। एक गोरा एक सांवला सूर्य के समान दुर्धर्ष तेज है बलराम जी का। ऐसे परम सुंदर बालक को और इधर यशोदा मैया ने श्याम सुंदर का श्रृंगार किया। बलराम जी बड़े हैं। बहुत ही दिव्य भगवान का बाल स्वरूप है। बलराम जी को तो पूरा वस्त्र धारण करा है। इनको झगुलिया पीत धोती ऐसे घुंघराली अलकावली काजल लगाया फिर ब्राह्मणों को बुलाया जात कर्म संस्कार क्योंकि आज नाम रखा जाएगा अभी तक नाम नहीं रखा गया वसुदेव ने पहले ही जब गए थे मथुरा कर देने नंद बाबा तो बता दिया था कि ज्यादा जोर का उत्सव कोई मत करना।
हमारा भी लाला आपके यहां है। रोहिणी पुत्र बलराम। यह बात कंस को अगर पता चली तो खतरा हो जाएगा। इसलिए अगर आप जो भी उत्सव बालकों के करें बड़े गुप्त रूप से करें। अन्यथा राक्षस अनिष्ट कर देंगे। अभी तक बलराम जी का दर्शन सार्वजनिक रूप से किसी भी ब्रजवासी को नहीं हुआ था। इतना गुप्त रखा गया था। रोहिणी तने के दर्शन ब्रजवासियों को नहीं। लाला के तो हो गए बाबा के लेकिन बलराम जी को इतना छुपा के रखा गया था क्योंकि देवकी जी की छह संतान मार डाले थे। तो इससे भय था देवकी जी की ही तो संतान बलराम जी भी हैं।
आकर्षण करके रोहिणी जी के गर्भ में आए थे। वसुदेव जी की पत्नी इसलिए बहुत नंद बाबा गुप्त रखे थे और पहले ही जन्म बलराम जी का हुआ है पर कोई उत्सव नहीं मनाया बलराम जी के जन्मदिन का अभी तक कोई उत्सव बलराम जी का नहीं इतना नंद नंदन का उत्सव हो गया अभी तक बलराम जी को आंगन में नहीं लाया गया क्योंकि डर था अब सबसे पहले बलराम जी को अब लाया गया नंद नंदन के पास। अभी तक गुप्त रूप से बलराम जी को रखा गया। जे ही बलराम जी ने वो तो उन्हीं के संग हृदय ही है। पर जे प्रथम बार नंद नंदन को देखा तो आनंद अश्रु बलराम जी के चल रहे हैं।
छवि में भर गए। मानो समाधि लग गई अपने प्रभु को देखकर शेष जी है ना रोहिणी तने यशोदा नंदन का ये परस्पर प्रथम मिलन पूज्य राधा बाबा लिख रहे हैं ये प्रथम मिलन यहां है। अभी तक नहीं मिले। कितने आश्चर्य की बात है। कितना बलराम जी को गुप्त रखा गया। शुभ मुहूर्त बड़े-बड़े ब्राह्मण बालक युगल प्रथगालया नता में अलग गुप्त महल में रखा गया था बलराम जी को जहां किसी का भी प्रवेश नहीं केवल रोहिणी जी जाकर उनको पवाना सहन कराना बस आज वहां से बाहर निकाल के श्रृंगार ऐसा गोरा पूरा रूप बलराम जी का ऐसा सुंदर रूप नंद नंदन के पास आए।
लाल जो किलकारियां मार रहे हैं। अब एक ही जगह राम और श्याम माताएं देख कर तण तोड़ती है। नजर ना लग जाए जोड़ी पर। रोहिणी जी तो अतिशय प्यार में भरकर यशोदा मैया से कहा लाओ लाला को और यशोदा मैया ने बलराम जी को गोद में ले लिया बृजेंद्र नंदन का आज नामकरण संस्कार होगा सुंदर धीमी गति के बाध्य बजाए गए स्वस्त वाचन हो रहा और महान ऋषि गर्गाचार्य जी दोनों का नामकरण संस्कार करने के लिए आए। कहा कि देखो हमारे मन में भागवतिक प्रेरणा हुई है। मैं वैसे तो प्रसिद्ध हूं आचार्य रूप में लेकिन आपके नहीं और अगर हम नामकरण संस्कार भगवत प्रेरित होकर के यहां आए हैं और अगर यह बात कंस को पता चली तो निश्चित समझ जाएगा कि वासुदेव जी के ही पुत्र वहां है और कोई ना कोई खतरा कर देगा।
इसलिए हम चाहते हैं कि गुप्त रूप से नामकरण संस्कार हो जाए। यदुवंशियों का कुल पुरोहित हूं पर करना मुझे नामकरण संस्कार और सही बताएं तो वासुदेव जी ने ही मुझे भेजा है। नंद बाबा बहुत प्रसन्न हुए। हाथ जोड़कर के चरणों में प्रणाम किया। कहा मानो स्वयं भगवान पधारे गर्गाचार्य जी आप विराजिए उनके चरण धोए आरती पूजा की बड़ा अभिनंदन किया और कहा भगवन संत तो पूर्ण काम होते हैं वो तो हम जैसे गृहस्थों को पावन करने के लिए पधारते हैं। आप जैसे महात्माओं का हमारे जैसे गृहस्थों के घर आ जाना परम कल्याण का स्वरूप है।
हम तो घरों में इतने उलझ गए हैं कि हमारा चित्त जो है भगवान या देखो कैसी दन्यता भगवान आंगन में खेल रहे हमें लगता है कि हमारे कल्याण के लिए भगवान नारायण ने आप जैसे महापुरुष को भेजा है। प्रभु आप जैसे संत इंद्रिय और बुद्धि की सीमा के बाहर के हैं। हम पहचान नहीं सकते। लेकिन आप सब त्रिकालज्ञ महापुरुष हैं। ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता हैं। ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ है। आज्ञा कीजिए। उन्होंने कहा कि मैं यदुवंशियों के आचार्य के रूप में जगत में प्रसिद्ध हूं। यदि मैं प्रगट उत्सव रूप करके तुम्हारे पुत्रों का नाम रखूंगा तो कंस पक्का समझ जाएगा।
कंस की बुद्धि बुरी है। वह पाप सोचा करती हो। वसुदेव जी के साथ तुम्हारी घनिष्ठ मित्रता है। और जब से उसने सुना देवकी की कन्या तो उसने निश्चय कर लिया कि देवकी की कन्या नहीं हो सकती। आकाशवाणी थी। आठवां पुत्र होगा। जरूर कुछ अगर उसको पता लग गया तो फिर अनिष्ट हो सकता है। तुम्हारे पुत्र का संस्कार कर दूं और तुम्हारा पुत्र को वासुदेव का लड़का मानकर कुछ अनिष्ट करें। इसलिए और आया हूं करने नामकरण संस्कार पर गुप्त रूप से करूंगा। नंद बाबा ने कहा आचार्य गौशाला में चलते हैं।
महल में तो आना जाना सबका लगा रहता है। गौशाला में एकदम एकांत बंद करके वह चुपचाप फिर नामकरण संस्कार सिर्फ हम आप और बालक गर्गाचार्य जी ने कहा यह बात ठीक है। आए ही थे संस्कार करने भगवत प्रेरणा से। जब नंद बाबा ने ऐसी प्रार्थना की तो एकांत में गुप्त रूप से गौशाला में भगवान का नामकरण संस्कार हो रहा है। गर्गाचार्य जी ने यशोदा मैया की तरफ देखा। आपको पहले बताया कि अत्यंत दुलार में बलराम जी को यशोदा मैया ने ले लिया और रोहिणी जी ने श्याम जी को ले लिया। ऐसे ही गौशाला में बैठ गई।
तो यशोदा जी की तरफ देख कहते हैं यह रोहिणी का पुत्र है। त्रिकालज्ञ महापुरुष ये रोहिणी का पुत्र है। और ये सारे जगत को आनंद देने वाला होगा। इसलिए इसका नाम होगा राम। और ये अपार बल की असीम बल की मूर्ति है। इसलिए इसका नाम होगा बल। और दोनों मिला के नाम होगा बलराम। और यह यदुवंशियों में और तुम लोगों में कभी भेदभाव नहीं करेगा। इसलिए इसका एक नाम होगा संकर्षण। ये सबको खींचता है अपनी तरफ। और ये रोहिणी की गोद में जो सांवला सांवला है ना इसकी तो क्या महिमा कहूं?
यह तो प्रत्येक युग में जन्म लेता है। यह पीछे बहुत रक्त पीत आदि विभिन्न रंग स्वीकार करके अवतार ले चुका है। अबकी बार ये श्याम वर्ण हुआ है इसलिए इसका नाम होगा कृष्ण। गर्गाचार्य जी ने कृष्ण नाम। नामकरण संस्कार में कृष्ण नाम। वैसे तो भगवान के अनंत नाम है। नंद जी यह तुम्हारा पुत्र पहले कभी वासुदेव जी के यहां भी प्रकट हुआ था। इस रहस्य को जानने वाले इसका नाम श्रीमान वासुदेव। तुम्हारे पुत्र के इतने नाम है कि हम रात दिन अगर उच्चारण करें तो भी पार नहीं पा सकते।
अनंत नाम अनंत गुण अनंत कर्म उन नामों को, उन गुणों को, उन प्रभाव को तो मैं जानता हूं लेकिन संसार के सब प्राणी नहीं जानते। गर्गाचार्य जी ने कहा यह परम कल्याण स्वरूप है। जो रोहिणी की गोद में है सांवला सांवला ये कृष्ण श्रीमान वासुदेव ये परम कल्याण स्वरूप है। ये तुम्हारा परम कल्याण करने के लिए प्रकट हुआ है। समस्त गोप और गौओं को ये बहुत आनंदित करेगा। इसकी सहायता से तुम लोग बड़ी-बड़ी विपत्तियों से सुगमता पूर्वक पार हो जाओगे। ब्रजराज ये पहले भी युगों में प्रकट हुआ है।
पृथ्वी में एक बार कोई राजा नहीं थे। डाकू चोर बढ़ गए थे। तो इसी ने सज्जन पुरुषों की रक्षा करने के लिए दुष्टों का संहार करने के लिए अवतार धारण किया था। यह नहीं बताया कि कौन सा रूप भगवान श्री राम क्योंकि त्रेता में रामावतार और द्वापर में कृष्णा तो पीछे युग में राक्षस बढ़ गए थे। उन राक्षसों का नाश करने के लिए इसने अवतार धारण किया था। नंद तुम्हें कैसे बताएं यह जो रोहिणी की गोद में सांवला सलोना है ना ये संपत्ति सौंदर्य कीर्ति में साक्षात भगवान नारायण के समान है।
तुम बड़े भाग्यशाली हो। बड़ी तत्परता से इसकी सेवा में रहना। नंद बाबा को भलीभांति समझाकर गर्गाचार्य जी गुप्त रूप से नामकरण संस्कार करके अपने आश्रम को लौट गए। नंद बाबा को बड़ा आश्चर्य हुआ कि गर्गाचार्य जी कह रहे पहले युगों में अवतार लिया। यह भगवान नारायण के समान रोने लगे कि ये तो सब मेरे नारायण की कृपा यह बिल्कुल नहीं आता बाबा के हृदय में कि भगवान है। यही है वात्सल्य मेरा लाला ये तो नारायण की कृपा है जो मेरा ऐसा सद्गुण संपन्न पुत्र हुआ। अब एक दिन मैया लाला को गोद में लेकर के बहुत पुचकार करके दुग्ध पान करा रही थी।
लाला पीते चले जा रहे थे और मैया पिलाती चली जा रही थी वात्सल्य में भरकर मैया के मन में आया कि ये इतना दूध पी रहा है तो कहीं अपच ना हो जाए एकदार मादा स्वामारो भामिनी प्रतम पाया मासम स्नेह परिपता पीत प्रायस जननी सातस रुचितम मुखम लालती राज जतो दशम इदम दूध पिलाया छोटी सी तोंद इतना दूध पी गया तो लाला की तरफ देख के कि इतना दूध पीने पर अपच नहीं होगा तुझे और ऐसे तोंद में ऐसे पेट में ऐसे तो लाला मुस्कुराया जो आिया खमोदसी जनी कमासा सुरेंद्रसना बुद्ध दान नगा भूतानी स्थिर जंगमानी आकाश पृथ्वी ग्रह नक्षत्र तारे पूरा चराचर जगत भगवान के मुंह में मानो भगवान दिखा रहे मैया ये दूध मैं अकेले नहीं पी रहा पूरे ब्रह्मांड को यहां से सप्लाई हो रही पूरे ब्रह्मांड को जा रहा है ये दूध पूरा ब्रह्मांड प्रफुल्लित हो रहा है आनंदित हो रहा है पुष्ट हो रहा है मां मेरे उदर में अनंत ब्रह्मांड वास करते हैं आकाश अंतरिक्ष ज्योति मंडल दिशाएं सूर्य चंद्रमा अग्नि वायु समुद्र द पर्वत नदियां वन समस्त चराचर प्राणी मैया ने लाला के
मुख में देखा बार-बार नेत्र करती है मेरे लाला के मुख में पूरा संसार कहां से आ गया साविक्ष विश्वम सहसा राजन संजातवे पसीना पसीना हो गई मैया वात्सल्य ने ऐश्वर्य को डांट लगा यहां तेरा काम नहीं है तत्काल वो दृश्य गायब हुआ फिर वात्सल्य उमड़ा भैया ने कहा मेरा लाला ये मेरी निगुड़ी आंखों में ही कुछ हो गया। पता नहीं दुनिया दिखाई देती लाला के मुंह में और फिर देखा तो लाला मुस्कुरा रहा है। लाला को छाती से लगाया। एक दिन लाला को बहुत प्यार से गोद में बैठाले हुए मां दुलार कर रही थी।
एकदो मारूम लालती सुतम सती गरिमा शिशु ढुम नसे गिरवत भगवान मानो कोई पर्वत हो ऐसे शरीर भगवान का यशोदा मैया की टांगे दर्द करने लगी। कितना तगड़ा हो गया है। इतना पीड़ा कैसे हो सकती है? और उधर कंस के पास जब सूचना पहुंची कि जो तुम्हारा उत्कच था ना वही सब कच्छ हो गया। दोबारा तुम्हारी खबर भी देने नहीं आएगा। कंस ने बवंडर रूप धारी तृणावर्त को भेजा। जाओ। वो सीधे बवंडर भयंकर रूप रखकर के भगवान ने कहा मैया को गोद में मैया हमें गोद में लिए वह मैया को भी उड़ा ले जाएगा।
इतना जोर का वजन किया कि मैया ने कहा आज लाला में इतना कैसे वजनील हो गया भूम निधायतम गोपी विस्मिता भार पीड़िता महापुरुष माद जगता मास कर्मशु इतना भार से पीड़ित हो गए कि ढगा दिया जमीन में ऐसे ओ हो कितना गरु हो गया लाला और इसीलिए भगवान ने अपना वजन बढ़ाए कि मैया यहां से सेवा में जाए लाला जो जमीन में ऐसे लाला मानो सो गया चलो थोड़ा सो जाओ हम काम कर लेते यही चाहते थे भगवान इसके बाद वो भगवान नारायण का स्मरण करते हुए घर के काम तणावर्त ने देखा बढ़िया अवसर है निजी का सेवक था कंस का कंस की प्रेरणा से वह वायु रूप होकर के आया और भगवान श्री कृष्ण को उठाया और बस आंगन से आकाश और आकाश से ब्रज रज से पूरा गोकुल ढक गया।
किसी को कुछ दिखाई नहीं दे रहा। बस भयंकर साए वायु की आवाज और धूल भरी वायु। 48 मिनट तक तो कुछ दिखाई ही नहीं दिया। ऐसा अंधकार छा गया रज का। जब ये बवंडर चला तो मैया भाग के वहां गई जहां लाला लाला तो वहां था नहीं। मैया तो बहुत घबरा गई। बेशुद्ध हो गई। अपना पराया कुछ सूझ नहीं रहा। जिधर देखो उधर धूल भरी आंधी। जैसे बछड़े के बिछुड़ जाने पर गाय की दशा होती है। ऐसे मैया व्याकुल हो गई। रोने लगी। यहां तक कि मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। क्या भगवत प्रेम है। भगवान ने बवंडर रूप धारी उस तणावर्त का गला पकड़ा और जब आकाश ले गए।
और कस के दबा दिया और भगवान ने इतना बोझा भारी किया कि वो सह ना सका ना एक कदम आगे बढ़ सका तणावर्त भगवान श्री कृष्ण को नीलगिरी के समान इतना वजन बढ़ा लिया भगवान ने कस के गला दबाया शिशु रूप भगवान के गला दबाने पर वो निश्चष्ट हो गया असुर मर गया आंखें बाहर निकल आई बोलती बंद हो गई। प्राण पखेरूर उड़ गए। अपना रूप असली धारण करके वही धम्म से गिर पड़ा। जे ही गिरने की आवाज सुनी ब्रजवासियों ने देखा अरे ये तो राक्षस है और राक्षस की छाती में कन्हैया जैसे पूतना की छाती में थे।
दौड़ कर के सब बृजवासी गए। भगवान श्री कृष्ण आराम से उसकी छाती पे क्या धन्य है ये दैत्य भैया धन्य है धन्य है परम ब्रह्म परमात्मा छाती में अंतिम स्वास निकल रही इनसे ज्यादा धन्य और कौन होगा गोपिकाओं ने दौड़ के लाला को गोद में उठाया छोटे से लाला और बाहर नहीं सह पाया तणावत मैया जब होश में आई लाला गोद में दिया मैया अत्यंत आनंदित होकर बार-बार भगवान नारायण को प्रणाम कर रही भगवान आपने हमारे बालक की रक्षा की यशोदा मैया बाबा से कहते बड़े आश्चर्य की बात है देखो कितनी बड़ी घटना ये कौन सा ग्रह नक्षत्र हमारे पीछे पड़ा है कि जब से बालक हुआ कोई ना कोई देख लो लोग कहते हैं हम बड़ी समस्या में हम कहते हैं परमात्मा जब अवतरित होते हैं तब यहां समस्या संसार डालता है।
तुम तो मनुष्य हो। चाहे रामावतार देखो, चाहे कृष्णा अवतार देखो। देखो देखो ये राक्षस तो हमारे बालक को मृत्यु के मुख में डाल दिया था। परंतु हमारे नारायण भगवान ने जीता जागता हमें वापस कर दिया। और उस दुष्ट को उसका पाप ही खा गया। सच है। साधु पुरुष अपनी क्षमता से संपूर्ण भयो से बच जाते हैं। हम लोगों ने पता नहीं कौन सा ऐसा तप किया। यशोदा मैया नंद बाबा से कह रही भगवान की पूजा की या किसी प्यासे को पानी पिलाया या कोई बाग बगीचा या कोई दान पुण्य बना जिससे हमारा बालक मरते मरते बच जाता है।
यह बड़े सौभाग्य की बात है। जब नंद बाबा ने देखा कि महावन में बहुत सी अशुभ घटनाएं घट रही हैं। तो वासुदेव जी की बात पर बार-बार याद आया कि वासुदेव जी कोई बहुत बड़े योगी हैं। वह कह रहे थे कि कोई ना कोई अशुभ घटना घटेगी। भगवान सच्चिदानंद में अवतार ही इसीलिए लिए थे कि इन दुष्ट जनों का जो कभी भी उद्धार नहीं हो सकता था। उनको परम पद प्रदान किया। अब कृष्ण बलराम घुटनों के बल धीरेधीरे चलने लगे। ये बकया बकया आंगन में एक दिन लाल जो महाराज घुटनों के बल चल रहे थे।
देख लो भक्ति का प्रभाव परम ब्रह्म परमात्मा को घुटनों के बल चला रहे कैसा खेल तो पुराने घरों में डेहरी होती थी लकड़ी की मोटी डेहरी और रोज कितना पवित्र जीवन गृहस्थी का कि माई लोग 4:00 बजे स्नान करके डेहरी पूजन रोज करती थी रोज डेहली पूजन दीपक जलाना गाय के गोबर से लिपना सामने और पुष्पों से चौक रोज का काम 4:00 बजे तो ये शुरू हो गई यहां कहां 8:00 बजे सो के जगते हैं दलित दुराएं छाई हुई है 4:00 बजे और आपको बताएं 2:00 बजे रात्रि से चक्की पिसती थी तब ऐसी थी कि कलाई पकड़ लेना तो तुम छुटा नहीं सकते और मंगलमय भगवान के गीत गाते हुए दो बैठ जाते इधर घर घर और मंगलमय गीत गा रहे 4:00 बजे नहा धो के और दहली पूजन ऐसे 50 बाल्टी पानी खींचना है 30 हाथ रस्सी से कभी दिल फेल होगा गांव में किसी का दिल फेल हुआ हो ऐसी बात नहीं कभी किसी को गैस की गोली भोजन पचा लेंगे इतनी रोटी दो लीटर मठा आधी बेली गुड़ ना शुगर और ना लीवर और ये एक बार नहीं यह बाल भोग होता था।
बाल भोग सच्ची कहते हैं किसान के घर में मोटी मोटी चूल्हे की पांच छह रोटी और दो लीटर मठा डाले पात्र में और मीसे और गुड़ से काट के अरे लाल धरे फावड़ा चला रहे मेहनत कर रहे अब तो किसानी में कुछ नहीं रह गया वो ट्रैक्टर से एक आ मतलब छह आठ आठ घंटे जोतना तब एक बीघा जोतता था कितना पवित्र जीवन था। तो बाबा की मोटी डेहरी थी। अब लाला घुटनों के बल चला और ऐसे डेहरी के सहारे और डेहरी में जो चढ़े तो पेट तो डेहरी में लग गया। पीछे से चरण उठ गए और आगे से हाथ पहुंचे नहीं तो बीच में टंग गए ना।
अब रोने लगे तो देवर्षि नारद जी बीड़ा बजाते हुए। देखा प्रभु रो रहे हैं ना तो आगे हाथ जा रहा है ना पीछे पैर जा रहा है क्योंकि बीच में टंग है मोटी डेरी नंद बाबा की आसपास देखा साष्टांग दंडोत में बोले प्रभु हटा दे आपको अरे बोले चलो ये तुम्हारे लिए नहीं है ये मैया के लिए है चुपचाप खड़े रहो दूर जाके वही दूर दूर जाके नारद जी खड़े रोना मैया रोना सुनकर भागती हुई आई अरे मेरे लाला दासियों ियों को डांटा देख नारद जी ने कहा महाराज क्या लीला है आनंद की ढहरी नहीं ला पा रहे वहां वामन अवतार में इतना बड़ा प्रभु बड़े विचित्र खिलाड़ी अब ये दोनों खिलाड़ी कृष्ण और बलराम धीरेधीरे घुटनों के बल चलने लगे जब ये घुटनों के बल चलते हैं तो मैया ने कमर में करधनी बांधी और पैरों में घुंघरू ऐसी ऐसी रुझुन रुझुन आवाज होती है ऐसे श्याम गौर जोड़ी दोनों बाबा के आंगन में खेलते हैं।
मानो बाबा हर समय परमानंद में और दोनों एक दूसरे को देखकर खिलखिला कर हंस देते हैं। एक दिन नंद नंदन बाबा के मणिजतित खंभ की तरफ धीरे से सहारे से पकड़ के उठे। देखा तो वैसे ही लाला तो वह भी अंगुली रखता है। यह मुस्कुराते वह भी मुस्कुराता है। ये ऐसे कर रहे तो वो भी मुस्कुरा रहे और मैया छुप के ये लीला देख रही। बाबा के मण जटित खंबे जो आंगन के उन लाल विविध प्रकार की बाल लीलाओं से वो परमानंद यशोदा मैया को प्राप्त हो रहा है जो ब्रह्मा आदि को भी नहीं प्राप्त हुआ।
चलते चलते किसी के पीछे लग लेते हैं और जब वो इनको गोद में लेने को चलता है तो अरे फिर दौड़ के पीछे घुटनों के ऐसे और यशोदा मैया रोहिणी मैया ये देख देख के आनंदित हो रही माताओं का हृदय वात्सल्य स्नेह से भरा हुआ है कभी-कभी अब ये घर के बाहर चलने लगे घुटनों के बल और ब्रज रज लगाए हुए जब लौटते तो बड़ी सुंदर शोभा होती। माताएं उन्हें गोद में ले लेती, स्नान कराती, नए वस्त्र धारण कराती, स्तनपान कराती। जब ये दूध पीते ना तो बीच-बीच में ऐसे मुस्कुरा देते। मंदमंद मुस्कुराहट और दूध के दांत छोटे-छोटे।
क्या अद्भुत शोभा मैया आनंद के समुद्र में डूब जाती। बलराम और श्याम अब धीरे-धीरे खड़े होकर चलने लगे। अब ये ब्रज के गलियों में भीड़ लग जाती गोपियों की। श्याम बलराम आए। दौड़ दौड़ करके सब इनकी शोभा को देखती। यह बड़े खिलाड़ी जैसे ब्रज में तो बछड़े घूमते तो बछड़े की पूछ पकड़ लेते और जब बछड़े भागते तो और जोर से पकड़ लेते और उनके पीछे दौड़ते। गोपियां सब अपना काम धंधा छोड़ के बाल गोविंद की यही लीलाएं देखती और लोटपोट होकर परमानंद में मग्न रहती। कृष्ण बलराम ये दोनों बड़े चंचल खिलाड़ी।
एक कभी गाय धोने का समय के पहले सारे बछड़े छोड़ दिए। सब बछड़े दूध पी गए। कभी सींग वाले पशुओं से खेलते कभी जो स्वान कुत्ते हां परमानंद दास को ठाकुर ले आए पीला ऐसा उसमें पद आया है ठाकुर जी और क्या ब्रज के कुत्ते परमहंस है बड़े-बड़े सिद्ध संत है ठाकुर जी गोद में ऐसे उठाते पीने को और जब घर में ले तो मैया कहती है अरे तुम ऐसे ऐसे कैसे कर रहे हो? बड़े चंचल खेल खेलते बड़े खिलाड़ी कभी मोह राज पक्षियों से ये सब ब्रज के महान संत हैं। माताओं को हृदय में डर लगा रहता।
कहीं कुछ ऐसा ना कर ले जिससे इनका अनिष्ट हो जाए। इसलिए माताएं तो घर के काम कर ही नहीं पाती। सदैव इनहीं को देखती रहती। इन्हीं के बचाने की चिंता में रहती। अब यह यशोदा और रोहिणी के लाल घुटनों के बिना सहारे के ये चलने लगे। अब पहली शुरुआत की अपने घर से कृष्ण बलराम ने जितने माट रखे थे कमरे में सब फोड़ दिए और सब दही नवीन वाले नहीं जो एक दिन पहले के थे सब फोड़ करके बहुत सी गोपियां घर आई हुई थी मैया ने कहा इनको डांटना पड़ेगा कृष्ण बलराम को तो वह जो कान पकड़ा रहे जो भयभीत गोपियां देखती कि काश विधाता मेरी आस ऐसी पूरी होती ये हमारे भी घर आते हमारे भी माट फोड़ते चोरी चोरी ऐसा करते फिर मैं इनको पकड़ती फिर हमारे सामने ये कान पकड़ते ऐसा ऐसा सौभाग्य कैसे मुझे प्राप्त होगा अंतर की
बात ठाकुर जी प्रेमी जनों की सुनते यह जो माखन चोरी लीला है इसको यह मत समझो बाबा के यहां कुंडों में थे दही दूध लाला दिन भर डुबकी लगाए फिर भी पार ना पावे ऐसे दूध दही माखन के थे ये गोपियों की जो आकांक्षा थी ना कि जैसा यशोदा मैया को सुख मिल रहा है वैसा मुझे मिले तो भगवान तत भगवान कृष्णो वस ब्रज बालक सारा ब्रज स्त्री श्री राम चक्री जनयन मुदम उनको आनंद देने के लिए सखा मंडली भगवान के अष्ट नित्य सखा जो अष्ट सखा है ये सब और भी ब्रजवासी और ब्रज के बंदर जिस घर में जाना होता ना पहले से ब्रज के बंदर दूर से देखते हो जहां नंदन नंदन घुसे सब खिड़कियों में लग जाते क्योंकि पता है अभी माखन बाहर पवाया जाएगा प्रभु अब घर घर ब्रजवासियों को सुख देने लगे।
श्री चरणों में नपुर बंधे रुझुन रुझुन करके नंद नंदन और श्याम और उनके सखा और गोपी माट व्यवस्था सब करके छुप जाती थी और पूरी लीला देखने के बाद फिर हम पकड़ेंग शेष चर्चा आ गई श्री राधा वल्लभ लाल की
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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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