ऐसा कुछ कमा लो जो मृत्यु के बाद भी साथ जाएगा / गोकुल में नंदलाला का जन्म // 21/09/26
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
पूरा प्रवचन
वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हृदपितम मधुपते स्मरता मुगम निर्वाय परम शीतल माश्रयाम परम शीतल माश्रयाम कृष्णााय वासुदेवाय देवकी नंदनाय च नंद गोप कुमारय गोविंदाय नमो नमः कृष्णााय वासुदेवाय हरे परमात्मने प्रणत क्लेश नाशाय गोविंदाय नमो नमः नमः पंकज नाभय नमः पंकज मालिने नमः पंक पंकज नेत्राय नमस्ते पंकजा है परम सच्चिदानंद घन प्रेमानंद स्वरूप नवनि निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाडले युगल सरकार प्राणा आराध्य प्राण प्रिय प्रिया प्रीतम जो समस्त सहचरी वृंद खग मृग पशु पंछी तरुल लता यमुना रस रानी रज रानी समस्त ब्रजवासी परिककर कोटिष नमन कोटिष प्रणाम उपासना उपास्य देव की समीपता का प्रतिफल अनुभव करना है हमारे इष्ट हमारे संग है प्रतिपल ऐसा अनुभव ही उपासना है उपासन अपने आराध्य देव के समीप रहना भाव देश में निरंतर नाम जप आठों पहर प्रगट सेवा वाणी से मौन या लीला गायन नाम कीर्तन श्रवण इंद्री संभाल के इधरउधर की बातें ना सुने नेत्र संभाल के दोष दर्शन ना करें
तो श्री जी की कृपा से भाव देह का निर्माण होने लगता है जब निज मंत्र गुरु कृपा और प्रगट सेवा तो फिर भाव देह बनने लगता है। उपासना में भाव देह के द्वारा ही निरंतर सानिध्य का अनुभव होता है। छिन छिन बिहरत संग छिन छिन निरखत प्रेम भरी छिन जस कहत अभंग यह जो कृपा हरिवंश की प्रतिपल अपने उपास देव के संग ही रहना प्रतिपल उपास देव को निरखते रहना यह बहुत दुर्लभ स्थिति है। यह सहज नहीं है। बहुत दुर्लभ स्थिति है। पर सहज उसके लिए हो गई जिसको वृंदावन वृंदावन के रसिक महापुरुष वृंदावन की रसमय उपासना अब दुर्लभ नहीं है।
अब सहज हो गया हमारे लिए। बस हमको जितनी सामर्थ्य प्रभु ने दी है वो इधरउधर ना खर्चा करके केवल अपने लक्ष्य में लगाएं। इधरउधर खर्चा करने का मतलब नेत्रों से दोष दर्शन देखो वाणी से पराई निंदा करो दोष वर्णन करो प्रपंच की बातें करो प्रपंच की बातें सुनो प्रपंच का चिंतन करो यह सब अपनी शक्ति को नष्ट करना है जो इसे संचय कर लेता है और लक्ष्य में लगा देता है वो बहुत जल्दी आनंद का अनुभव करने लगता है जिसको भगवनंद का अनुभव होने लगता है। फिर विषयंद मलवत हो जाता है।
बमनवत हो जाता है। विषवत हो जाता है। चलना है। प्रियाल के पास चलना है। रहना नहीं देश विराना है। यहां रहना नहीं है। कोई अपना नहीं है। कुछ अपना नहीं है। सब सपना है। अंदर से मान लो सत्य वस्तु एकमात्र परमात्म चिंतन है। जितना करोगे उतने धनी बन जाओगे। कबीरा सब जग निर्धना धनवंता नहीं कोई धनवंता सोई जानिए जाके राम नाम धन होए। सब में जो रमा है वही प्रभु कृष्ण है वही हरि है वही शिव है वही राम है। नाम अनेक है तत्व एक है। उपासना उपास्य देव के चिंतन में तन्मया सब कुछ भूल गए।
केवल एक याद रह गया इष्ट देव अपनी सुना रही एक रहो नंदलाल ये तन्मया स्थिति है। इसी स्थिति के लिए हमारा मानव जीवन हमें सुंदर सौभाग्य मिला है। इस समय कोई सत्संग चार सवा चार बजे सत्संग अरे सब भगवान की माया निद्रा में सो रहे हैं। कोई बिरले ही जग के साधन परायण वृत्ति को धारण करते हैं। आपको जबरदस्ती बैठना है। ये कृपा नहीं क्या है? कृपा अपार कृपा हमारे लाडली लाल की भक्तम वृंदावनगत फलम लोभनम य परस्या पक्तम वा तति हर महा मंगलम नाम तस दृष्टम कििंचित त हत दग स्पष्टम श्यांग कर्ष स्तोत तुम शक्त का इतान भाग्य पुंज मोलीन कल आपने सुना कि वृंदावन की वायु यमुना जी का स्पर्श करके लताओं का स्पर्श करके बिहारी बिहारिन के महल का स्पर्श करके प्रेमी जनों के श्री अंग का स्पर्श करके रजरानी को साथ लेकर जो बहती है यहां की वायु यम यम देशम सर पवना शुद्ध सचित स्वरूपम जिसजिस को यह वायु स्पर्श कर गई वृंदावन की निष्पाप होने लगता है।
उसका मन पवित्र होने लगता है। आज वर्णन कर रहे हैं भक्तम वृंदावन गत फलम वृंदावन की भूमि में प्रकट हुआ कोई भी खाद्य पदार्थ अन्न है फल है कुछ भी यदि पा लिया जाए जो वृंदावन की भूमि में और वृंदावन से प्रकट हुआ जल पिया जाए जो वृंदावन की भूमि से प्रकट हो रहा है और वृंदावन के किसी वासी का स्पर्श हो जाए भगवत प्रेमी महात्मा देख ले स्पर्श कर दरस परस अग बास निज संग करो दिन तिन मुख हरिजस सुनत श्रवण मानो न तृपित छिन तो कल अभद्र वर्णत सहस जितने कलयुग के हजारों दोष हैं वो सब नष्ट हो जाते हैं।
ब्रजवासी वृंदावन वासी किसी महाभागवत का स्पर्श हो जाए वह हमें छू दे किसी प्रकार से यहां की वायु स्पर्श हो जाए यहां का कोई फल अन्न जो इस भूमि में प्रकट हुआ है यहां का जल तो कह रहे लोभनम यही परस्याक्तम हुआ तति हरम महा मंगलम नाम तस जिसका महा मंगलमय नाम ही है। वह प्रभु उसके प्रति लुभायमान हो जाते हैं। जो वृंदावन का अन्न पाता है। वृंदावन का जल पीता है। वृंदावन की रज में वास करता है। वृंदावन की वायु शरीर में लगती है। जो बाहर का वृंदावन वासी का स्पर्श दर्शन संभाषण प्राप्त कर लेता है।
उसके प्रति प्रभु लुभायमान हो जाते हैं। यह मेरा जन है। जिसके करण रसायन पर यह नाम गूंज गया। वृंदावन वृंदावन वृंदावन वृंदावन प्राण वृंदावन जीवन वृंदावन सर्वस्व वृंदावन जय वृंदावन जय वृंदावन जय वृंदावन जय वृंदावन जय वृंदावन जय जय वृंदावन जय वृंदावन श्री वृंदावन प्राण वृंदावन जीवन वृंदावन सर्वस्व वृंदावन श्रीन प्राण वृंदावन जीवन वृंदावन सर्वस्व वृंदावन जय वृंदावन जय वृंदावन जय वृंदावन जय वृंदावन जय वृंदावन जय वृंदावन जय वृंदावन जय वृंदावन वृंदावन का पावन नाम जिसके कान में पड़ गया वो नर्क नहीं जाएगा और जिसने वृंदावन के ठाकुर को लुभायमान
दृष्टि से देखा वो बांके बिहारी राधा वल्लभ लाल राधा साधारण ओ मेरे जीवन धन एक बार प्यार से प्रभु की तरफ देखा दृष्टम कििंचित तद अपतम दृग स्पष्टम श्यांग कर्ष आ एक बार दृष्टि से बिहारी जी को देखा एक बार वृंदावन का अन्न फल पाया एक बार वृंदावन का जल पिया एक बार वृंदावन के स्पष्टम श्यांग कृषि किसी महापुरुष किसी ब्रजवासी का स्पर्श प्राप्त कर लिया तो स्तुम सप्ता का इतान भाग्य पुंज मौलीन बड़े-बड़े महान भाग्यशाली उसकी स्तुति करते हैं जो ऐसा लाभ प्राप्त कर लेता है।
बड़े-बड़े देवता उसको नमस्कार करते हैं जिसको यह लाभ प्राप्त होता है। अब आप विचार करो आप वृंदावन वासी जो अखंड वास कर रहे हैं उनके सौभाग्य का कौन वर्णन करें। अगर इस पर भी आपको प्रियाल की कृपा नहीं दिखाई देती तो केवल बुद्धि भ्रष्ट है और कोई बात नहीं। बुद्धि अपने स्थान से गिर चुकी है इसलिए आपको कृपा का अनुभव नहीं होता। नहीं प्रतिपल कृपा ही कृपा हमारे ऊपर बरस रही है। श्रीपाद प्रबोधनांद जी महाराज कह रहे हैं अरे मूढ़ा प्राप्त विकलम किमनु निगम निगढ़ा श्री वृंदावन भूम माम न भजत पाद याता वृग कुरत वनम नाम भतम कथा शो श्रत मनो ध्यान निरतम ऐ मूढ़ अभी सावधान हो जा नहीं तो मृत्यु तेरा सर्वनाश कर देगी तेरे पास कुछ नहीं रहेगा कुछ कमा ले यहां कमाने ाने आया है अपनी स्वासे गवाने नहीं आया अरे मूढ़ा प्राद मवलम किमन निगम निगढ़ा तू इंद्रियों को प्राप्त करके भोगों के लिए विकल हो रहा है जो तेरा पतन है तू अपनी इंद्रियों को संयम
मिला और भगवत आराधना में लग वेदों में भी जो गुप्त है रसो वैशा वो रस यहां प्रकट खेल रहा है ब्रजभूमि वृंदावन में इसलिए इसलिए तू अपने चरणों से यात्रा कर ब्रजभूमि की और आ गिरिराज जी की परिक्रमा लगा बरसाने की परिक्रमा लगा वृंदावन की परिक्रमा लगा पादो यात्रा व्यग्र कुरत वदन नामतम और यहां आकर के निरंतर नाम जप कर कोई भी किसी की निंदा दोष दर्शन अपराध मत कर कथा प शो श्रत कानों से खूब भगवत चर्चा सुन मनो ध्यान निरतम मन को ध्यान में लगाओ जो प्रगट में प्रभु के श्री अर्चा विग्रह अवतार विराजमान है इनका ध्यान करो जैसे हरिवंश महाप्रभु आदेश करते हैं श्री राधा वल्लभ लाल को हृदय ध्यान मुख नाम हृदय में उनका रूप और मुख में नाम चरणों से परिक्रमा लगा रहे हाथों से यहां सेवा कर रहे खूब नाम चिंतन नाम कीर्तन निहाल हो जाओगे अरे मूढ़ा कुछ तेरे साथ नहीं जाने वाला।
यहां एकमात्र सच्चिदानंद भगवान का नाम रूप लीला धाम का जो अवगाहान किया वही तेरे साथ जाएगा। चलते हैं श्रीमद् भागवत महापुराण जिसमें हमारे प्राणाराध्य प्राणप्रिय लाडले जीवन धन श्री लाल जी महाराज का पावन चरित्र जो गायन और श्रवण मात्र से भगवत प्राप्ति कराता है। जो चित्त लगाकर श्रवण करता है उसके समस्त मलों का नाश होकर चित चोर के पासित पहुंच जाता है। प्रभु का वो प्रेमी हो जाता है। भगवत चर्चा सुनने वाला प्रसंग चल रहा है। श्री महा भागवत परम तपस्वी भगवान के विशेष कृपा पात्र वासुदेव जी जिनको पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
नंद गृह से योग माया रूपी कन्या को लेकर के कंस के कारागार के समीप आते हैं। सब बेशुद्ध पड़े हुए हैं। जे ही अंदर प्रवेश हुए दरवाजा बंद ताला लाक हो गया। पहरेदार जग गए। कन्या को देवकी जी की गोद में पधराया। गोद में पधराते ही कन्या रो पड़ी। नवजात शिशु की रोने की ध्वनि सुनकर पहरेदार चौंक गए। लड़खड़ाते हुए भागते हुए भोजराज कंस के पास गए और कहा देवकी को आठवीं संतान हुई है। बस इसी बात का इंतजार कंस कर रहा था। क्योंकि आकाशवाणी ने कहा था देवकी की आठवीं संतान तेरी मृत्यु का तेरे सर्वनाश का कारण बनेगी।
कंस बड़ी आकुलता और घबराहट के साथ द्वारपालों की बात सुनते ही कूद पड़ा। सूतिका ग्रह की ओर झपटा। मेरे काल का जन्म हुआ है। भयभीत होता जा रहा है। विकल होता जा रहा है। बाल बिखर गए। कई बार लड़खड़ा कर रास्ते में गिरा। बंदी गृह में पहुंचने पर देवी देवकी जी ने देखा ये राक्षस आ रहा है। जो हमारे हर बच्चे का काल हुआ है। कहने को तो ये भाई है पर ये राक्षस है। अपने मन के क्रोध को दबाकर हाथ जोड़कर कहा भैया मेरे तुम बड़े हितैषी हो। जब बचपन में हमने कोई बात कही तो आपने तुरंत उसकी पूर्ति की है।
मेरा क्या अपराध हो गया जो आप मुझे दुख पर दुख देते जा रहे हैं। हथकड़ी बेड़ियों से जकड़ दिया। मेरे लाडले पुत्रों को मार दिया। आकाशवाणी ने कहा था कि पुत्र होगा। देखो ये कन्या है। अभी तो बच्ची है। तुम्हें नहीं मारना चाहिए। भैया दवश तुमने बहुत से अग्नि के समान तेजस्वी बालक मेरे मार डाले। केवल कन्या बची है। मैं तुमसे भिक्षा मांगती हूं कि ये कन्या को मत मारो। मैं बहुत दीन हूं। तुम मेरे प्यारे समर्थ भाई हो और मुझे बहुत प्यार करते हो। मैं मंदभागिनी हूं। माना पर यह आखिरी संतान तो मुझे दे दो।
कन्या को अपनी छाती से लगाकर देवकी जी ऐसी विनय कर रही कंस से पर उस क्रूर कर्मा दुष्ट हृदय कंस के हृदय में कोई भी परिवर्तन नहीं कन्या का ऐसे पैर पकड़ा और जबरदस्ती ऐसे छीन लिया और एक चट्टान पर प्रहार किया पैर पकड़ कर कन्या का स्वार्थ ने अंधा कर दिया था परंतु कन्या कोई साधारण कन्या नहीं महाशक्ति है। हाथ से एकदम छोटी और आकाश में जाकर छा गई। बड़े-बड़े दिव्य आयुध लिए हुए अष्टभुजा दिव्य माला चंदन मणिमय आभूषण धनुष त्रिशूल बाण ढाल तलवार शंख चक्र गदा आठ आयुध सिद्ध चारण गंधर्व अप्सरा किन्नर नाग ये सब महादेवी की स्तुति कर रहे हैं।
उस समय मुस्कुराते हुए महादेवी ने कहा कि मया हतया मंद जाता खत कृत्रवा पूर्व शत्रु हिंसी कृपथा दुष्ट तू मुझे क्या मार सकता है? तेरे पूर्व जन्म का शत्रु तुझे मारने के लिए पैदा हो चुका है। तू निर्दोष बालकों की हत्या करता है। और एक क्षण में देवी अंतर्ध्य हो गई। कंस देवी की बात सुनकर आश्चर्य में पड़ गया। आठवां पुत्र होना था। कन्या हुई और यह देवी कह रही तेरे मारने वाला कहीं पैदा होगा और आकाशवाणी ने कहा था मेरे मारने वाला देवकी के गर्भ से पैदा होगा। बुद्धि काम नहीं कर रही।
फिर तो मैंने अपने बहन बहनोई देवकी वसुदेव जी को व्यर्थ में कष्ट दिया। जब मारने वाला कहीं और पैदा हो गया तो वसुदेव जी के सामने घुटने पर हो गया। हथकड़ी बेड़ी सब कटवा दी और कहा बहनोई जी बहन मैं बड़ा पापी हूं। मैं अपने स्वार्थ में अंधा होकर आपके बच्चों को मार डाला। मुझे बहुत खेद है। मैं इतना दुष्ट हूं कि करुणा का तो मेरे में लेस ही नहीं है। मैं कैसे बताऊं कि मैं कैसा कठोर हृदय का हूं। यह कभी-कभी दुष्ट आत्मा भी धर्मात्मा का नाटक करने लगते हैं। यह नाटक कर रहा है।
कोई दया नहीं, कोई शुद्धि बुद्धि की नहीं हुई। यह केवल नाटक कर रहा है। मैं दुष्ट हूं, मैं पापी हूं, मैं कठोर हूं। मुझे भले नरक जाना पड़े पर तुम मुझे क्षमा कर दो। पर मुझे यह समझ में नहीं आता कि विधाता कैसे झूठ बोलता है। आकाशवाणी ने कहा था देवकी के गर्भ में पैदा होगा मेरे मारने वाला। वो तो पैदा हो गया। गोकुल पहुंच गया। मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि सत्य है क्या? तुम दोनों महात्मा हो। मुझे क्षमा करो। तुम्हें मैंने पुत्र शोक दिया। ऐसा मानो कि तुम्हारे ही कर्म का फल था।
बड़ा ज्ञान बगा रहा है। कौन कहो के सुख दुख कर दाता निज कृत कर्म भोग सुनता। तुम्हारे कर्मों का फल था जो तुम्हारे पुत्रों को मारने के लिए मुझे निमित्त बनाया गया। देखो वासुदेव जी मिट्टी के बने हुए पदार्थ जो बनते हैं वह बिगड़ते भी हैं। हां शरीर बनता बिगड़ता है और जीवात्मा तो अजर अमर है। कितना सुंदर ज्ञान बगा रहा है कंस। ऐसे ज्यादातर ज्ञान सबके है पर उसका प्रयोग वसुदेव जी जो लोग तत्व ज्ञानी नहीं है ना वो शरीर को आत्मा मान बैठते हैं शरीर के सुख दुख को अपना सुख दुख मान लेते हैं शरीर का आना जाना जन्म मृत्यु अपना मान लेते हैं जो तत्व ज्ञानी नहीं ये तत्व ज्ञानी है बड़ा ज्ञान है लोगों में यही है पर उपदेश कुशल बहु तेरे दूसरों को उपदेश करने में बहुत कुशल लोग मिलेंगे।
लेकिन अपने मन को चेला बना ले। ऐसा कोई बिरला योगी होगा जो अपने मन को उपदेश देकर के सही रास्ते पर चलावे। वही उपदेश वही गुरु। प्यारी बहन देवकी जी मैंने तुम्हारे पुत्रों को मार डाला। तुम शोक मत करना। क्योंकि प्राणियों को विवश होकर अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता। तुम्हारे पुत्रों के कर्म थे उनको भोगना पड़ा। देखो वसुदेव जी दोनों को समझो जिसको अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं है ना वो अपने को जन्मने वाला मरने वाला या मारने वाला किसी को समझता है। जिसको तत्व ज्ञान है वो ऐसा नहीं समझता है।
ना कोई किसी को दुख देता है। ना कोई किसी को सुख देता है। अपने कर्मों का ही भोग भोगना होता है। फिर भी मैं आप दोनों से क्षमा मांगता हूं। आप साधु स्वभाव के हो। आप मुझे क्षमा करो और बहन और बहनोई आप अपने महल में जाओ। सुख पूर्वक आनंद। वसुदेव देवकी को कैद से छोड़ा। केवल दिखावटी बाहरी प्रेम अंदर उसके बड़ा आग लगी हुई है। वासुदेव जी तो निर्मल आत्मा है। जिनके भगवान पुत्र रूप में प्रकट हुए। उनका मनस्वी कंश आपने जो वर्णन किया ठीक ऐसा ही है। जीव अज्ञान के कारण ही शरीर को मैं मान बैठता है और शरीर में अहंकार होने के कारण वह पाप और पुण्य कर्म करता है जिसका परिणाम सुख और दुख होता है।
ये शोक, हर्ष, भय, द्वेष, लोभ, मोह, मद ये सब अज्ञान के लक्षण है। आप निश्चिंत रहिए। हम आपसे बिल्कुल नाराज नहीं। वसुदेव जी ने कहा कंश दोनों को नमस्कार करके वहां से अनुमति लेकर चला और समस्त मंत्रियों को आदेश किया सब सभा विराजमान की जाए। कंस के मंत्री भी दुष्ट स्वभाव के राक्षस ही थे। दैत्य स्वभाव साधु महात्मा गौ ब्राह्मण देवता इन सबके प्रतिकूल द्वेष भाव रखने वाले सब सभा एकत्रित हुई कंस ने कहा मेरे मारने वाला पैदा हो चुका है देवकी के आठवें गर्भ से पुत्र होना था कन्या कैसे हो गई वो मंत्रियों ने आपको उदास होने की बात है इसमें।
ब्रज 84 कोस के नगर गांव अहीरों की बस्तियां जितने भी हैं आज से ही शुरू हो जाएगा हमारा काम। आज से 10 दिन पहले की जो संतान है वो सब मार दी जाएगी। ब्रज में कोई भी 10 दिन के अंतर्गत पैदा हुआ नवजात शिशु जिंदा नहीं बचेगा। आप निश्चिंत हो जाइए। देवता गण आपसे क्या करेंगे महाराज? जब आप धनुष की टंकार करते हैं तो कांच खोलकर, चोटी खोलकर आपके चरणों के सामने देवता धनुष डाल के बैठ जाते हैं। हमने देखा है आप महाबली हो। आप देवताओं से भयभीत जाओ ना। और महाराज ये देवता लोग तो वही अपना बस दिखाते हैं जहां कोई वीर ना हो।
और विष्णु से डरना विष्णु से तो बिल्कुल नहीं डरना क्योंकि उसके गौ संत महात्मा भगत यही सब है उनके और भगवान शंकर ये तो ध्यान ही में मगन रहते हैं। उनसे डरने की जरूरत नहीं। और अल्पवीर देवराज इंद्र ये क्या और ब्रह्मा जी तो सृष्टि की ही चिंता में बने रहते हैं। कोई आपसे जोड़ नहीं है। ये है मंत्री। सचिव वैद गुरु तीन जो प्रिय बोले भयास राज धर्म तन तीन कर हो बेगह नाश। अगर मंत्री मूछ ऊपर ही बोलने लगे तो राजा का नाश हो जाएगा। और अगर बीमार मनुष्य के अनुकूल चलने लगे वैद्य तो वो बीमार परेशान हो जाएगा।
नष्ट हो जाएगा। और अगर शिष्य के अनुकूल गुरु चल दे तो शिष्य का पतन हो जाएगा। शिष्य गुरु के अनुकूल चले। मंत्री मंत्रणा जो नीति है उसके अनुकूल चले। डॉक्टर अपने सिद्धांत के अनुसार चले। मरीज के अनुसार नहीं। यहां सब उल्टा है। महाराज मेरी एक प्रार्थना है कि आप ऐसे विश्वास पात्र सेवकों को नियुक्त कीजिए। जहां भी देवताओं के धर्म के जहां भी भागवतिक कार्य होते हैं सब विध्वंस मचा दिया जाए। यह गलत सलाह परीक्षित एक तो कंस की बुद्धि स्वयं बिगड़ी हुई थी। वैसे पापी लोग सहयोगी मिल गए।
अब तो क्या कहना हिंसा प्रेमी राक्षसों को संत महापुरुषों की हिंसा गौ और ब्रह्म ऋषियों की हिंसा और नवजात शिशुओं की हिंसा करने का आदेश जो बिल्कुल महा अपराध है। यह तो मथुरा का हाल हुआ। चलते हैं वासुदेव जी जहां लाला को पधरा करके आए हैं। श्री यशोदा मैया को तो कुछ शुद्ध ही नहीं है। कुछ हुआ बस इतना भान हुआ था और आनंद में समाधस्त है। मूर्छा तो नहीं कह सकते। आनंद में समाधिस्थ है क्योंकि आनंद सिंधु पधारा तो कोई शुद्ध नहीं है। रोहिणी जी जो जहां है योग माया ने वही सबकी चेतना हरण कर ली।
वो दीवाल के सहारे ऐसे अब योग माया चली गई। प्रभु पधारे सबसे पहले नेत्र खुले रोहिणी जी के। बलराम जी की मैया उनको चेतना हुई। देखा सब दासियां बेशुद्ध है। यशोदा मैया के समीप गई तो देखा परम ब्रह्म परमात्मा तेजोमय नीलमणि कांत छोटा सा शिशु यशोदा मैया के समीप बड़ी जोर से चीख के कहा परिचारिकाओं दासियों देखो यशोदा जी के लाला हुआ है। सब एक साथ चेतना में हो जाती है। यशोदा की क्रूड में संलग्न सच्चिदानंद भगवान शिशु रूप में छोटे-छोटे चरण कमल कर कमल ऐसे। क्या अद्भुत शोभा।
आवाज देकर रोहिणी जी तो नेत्रों से पान कर रही। सबसे पहले अवतार में रोहिणी जी ने पान किया रूप का लाल जी के क्योंकि जैसा सेवा का दासत्व का भाव शेष भगवान के अंतर्गत आचार्य हैं। यह दासत्व के आचार्य हैं भगवान से और उनकी मां का सौभाग्य मिला रोहिणी जी को तो सबसे पहले यशोदा मैया को भी दर्शन का सौभाग्य नहीं यशोदा जी को तो चेतना रोहिणी जी ने दिलाई सबसे पहले नेत्रों के द्वारा जो पान किया लाल जी के रूप को श्री रोहिणी जी ने पान किया। ऐसा लग रहा है कि प्रेम चिदानंद सुधार सरोवर में अभी-अभी एक नील कमल खिला है अभी-अभी नवनीनतम नील पद्म नीलकमल अभी पर अभूतपूर्व अरविंद है।
अरविंद माने कमल अभूतपूर्व ऐसा कमल कभी इस भूमंडल पे नहीं खिला और अभी अभी ये खिला है किसी भवरे ने अभी पराग ले लिया अनाघतम भंग रनत सौगंध मन रनत्पन्नम नीरेशत मूर्मी कण भर एक भी अभी पराग का पान किसी प्रेमी भंवर ने इस नीलकमल का नहीं किया है अचिंत लीला महाशक्ति की प्रेरणा से यशोदा मैया परिचारिकाएं सब चेतना युक्त हुई इंद्र नील द्वितीय शिशु का सौंदर्य जो देखता है वह सब भूल जाता है जो दासी आती देखते ही भूल गई कोई शुद्ध नहीं जो देखे सब बेशुद्ध हो जाए किसी को क्या करना है कोई शुद्ध नहीं है।
भगवान बाल लीला करते करते कभी-कभी थोड़ा रो देते हैं। जैसे बालक होता है वो असफुट क्रंदन मतलब स्पष्ट रोना नहीं असफुट कंदन ऐसे थोड़ा सा जब वो रोए तो फिर सब कुछ चेतना हुई। रोहिणी जी बोली री तू सब देख क्या रही है कोई दौड़ कर जाओ और ब्रजेश्वर नंद बाबा को सूचना दो तुम्हारा परम सौभाग्य उदय हुआ है। परिचारिकाएं जिसको आदेश करती है उसकी हिम्मत नहीं हो रही कदम हटाने की। ऐसा सुंदर बाल गोविंद का रूप है। रोहिणी जी झकझोरती सुना नहीं। फिर चेतना आती है। ऐसा लगता है ये क्यों आदेश कर रहे अभी तो पान करने देते रूप का।
अरे प्रभु है जन्मजन्म से जिस आनंद की खोज हम विषयों में कर रहे आज तक सुनने के सिवा कुछ नहीं। हाथ लगा। कुछ नहीं। कोई अंक नहीं हाथ लगा कि हां एक परसेंट दो परसेंट 10% हमने सुख भोगा। कुछ नहीं वही तृष्णा वही मलिन आज नेत्रों को वो सुख मिला जिसकी खोज जन्म जन्मांतर से हो रही थी। फिर क्या था कोलाहल मच गया। एक दासी दौड़ती हुई कि जितनी जल्दी सूचना देकर लौट के आऊं फिर रूप का पान करूं। बृजेश्वर को सूचना देने गोष्ठी की ओर दौड़ी। इधर एक दासी दाई मां को बुलाने के लिए गई और यह दाई मां जीवन में कभी किसी का नाला नहीं छेदन किया केवल नाम जप और इंतजार था कि जब परम ब्रह्म परमात्मा बाबा के यहां अवतरित होंगे उन्हीं का नाल छेदन करूंगी।
हर समय भजन में रहती थी। दासी दौड़कर दाई मां को बुला के लाई। उपनंद की पत्नी आसपास की सब बड़ी बूढ़ी ब्रज गोपियों को जो दास थे बिना बाबा की आज्ञा के शहनाई वालों के पास गए और कहा जल्दी चलो और बाबा के द्वार पर शहनाई बजाओ बाबा के नंदलाला हुआ है नंदलाला नंद जो प्रतिपल आनंद आनंद उत्पन्न करते ऐसे प्रभु आनंद से ये कैसे जिन्होंने नेत्रों से उस रूप का पान किया कैसे सौभाग्य अनंत जन्मों से हम भटक रहे उन्हीं की खोज कर रहे हैं। पर विषयों में एक भी जन्म हमने भगवान को नहीं दिया।
यह जन्म अवसर मिला है भगवान को देने का। थोड़ा बजाओ। के नारायण नारायण नारायण सुंदर बधाई बज रही है। आसपास की सब बड़ी बूढ़ी ब्रज युवतियां भागी आ रही है। बाबा के महल की तरफ दौड़ती हुई और सब सूतिका गृह में प्रवेश किया। यशोदा मैया की तो हालत ही कुछ और है। आंखों से अश्रु बह रहे हैं आनंद के और कुछ शुद्ध नहीं। क्या करना कुछ सुध ले भाव समाधि में निमग्न अरे जिसके परम ब्रह्म परमात्मा पुत्र बनकर के समीप लेटे हुए उनकी दशा क्या होगी जब भगवान शंकर आदि के ध्यान में प्रभु पधारते हैं तो उन्मत्त अवस्था हो जाती है।
उपनंद की पत्नी आई और यशोदा मैया से कहती शुद्ध में आओ देखो ना तो ये रूप तो वो बहुत समय से देख रही थी स्वप्न में कभी-कभी भाव दशा में जब ये प्रकट भी नहीं हुए थे ऐसा ही बाबा को स्वप्न आता था तो जो रूप पास देखती है वही वही स्वप्न में पुरुष से देख रही थी। फिर आंख मूंद जाती है। फिर समाधि में जो ब्रज की बूढ़ी बूढ़ी गोपियां है वो आकर उनको ब्रज रानी ब्रज रानी सावधान देखो तुम्हारे घर में भीड़ लग रही सब ब्रज युवतियों की और आप आंख मूंद लेती हो। धीरे-धीरे आंख खुला प्रभु से प्रार्थना की कि मुझे सामर्थ्य दो कि मैं आपका उत्सव मनाऊं क्योंकि प्रेम उत्सव में भाव सवादी में मैया डूबी हुई मुख मंडल पर अद्भुत शोभा श्री लाल जी के चिकने अभी कपोल नीलमणि जैसे अरविंदाक्ष बड़े-बड़े नेत्र जिधर खोल के देख लेते लट्टू हो कहता है कितना सुंदर बालक शिशु के श्याम अंगों को इतने तेजोमय कि जो देखता है अपनी प्रतिबिंब दिखाई देता है।
लाल जी के श्री अंग में अपना प्रतिबिंब दिखाई देता है। माता जे दर्शन किया तो देखा एक अपना प्रतिबिंब तो उन्होंने कहा ये क्या? अभी अभी तो बालक प्रकट हुआ है। यह कौन सी माया जागृत हो गई? किसी योगिनी की छाया तो नहीं अधिक प्रीति मन भा संदेहा उनकी प्रति छाया को अपनी ही छाया को मैया बेशुद है वही नरसिंह भगवान कोई भी ऐसा नहीं मैं सोच भी नहीं सकती कि किसी भी तरह की कोई छाया मेरे लाला पर हे नरसिंह आप कृपा करो हमारे लाला और जे हटी सो छाया हट गई हां नरसिंह भगवान ने खप कर दिया छाया हटा दी जो और ब्रज बूढ़ी की गोपी गोप जन है मैया तू बावरी हो गई तेरी तो छाया पड़ रही थी कौन सी योगिली की छाया है व्याकुलता भरी दृष्टि प्रेम की सबकी नंद रानी कभी बाए झे कहीं कहीं दाएं झुक कहीं सीधे लाला को देख कर के यशोदा मैया फिर अपने पुत्र को पहली बार गोद में उठाया छाती से लगाया सामर्थ था ये जे ही छाती से लगाया तो पहला अभिषेक अश्रुओं का हो रहा है वात्सल्य से भरे हुए अश्रु नंद नंदन अखिल लोक चूड़ामणि प्रभु का अभिषेक एक माता अपने अश्रु ये सब महान प्रेमी जन है जो सौभाग्य प्राप्त किए।
दूसरा अभिषेक दुग्ध से हो रहा है। अपने आप स्तनों से दुग्ध वात्सल्य में जल रहा है और लाला का अभिषेक हो रहा है। मानो माता ने पहला पूजन प्रभु का किया। राज्य छाया हुआ है। इधर भागती हुई दासी सेविका गई। बाबा की जय हो। बाबा दो बजे से गौ सेवा में उपस्थित हो जाते थे। लाखों सेवक हैं सब सुंदर पहले उनके लिए हरा हरा चारा फिर बक्षों को खोलना और गौ दोहन लाखों गया है तो सूर्य उदय होते तक ये दोहन क्रिया होती रहती थी दो बजे से बाबा की जय हो क्या हुआ क्योंकि बृजेंद्र आधी रात ढलते ही गोष्ठ में जाते थे गायों की संभाल करते थे और एक हाथ में माला रहता था नारायण नारायण नारायण श्री हरि श्री हरि श्री हरि बाबा बाबा लाला हुआ है लाला हुआ क्योंकि पहले भाव में डूबते हुए बाबा को एक बार लाल जी ने जो प्रकट हुए हैं यही दिखाया था कि मैं स्वयं आपका पुत्र होने तो जैसे दशरथ जी ने सुनाना लाला डाला हुआ जाकर नाम सुनत शुभ होई मोरे गृह आवा परबह्म परमात्मा हमारे यहां पुत्र रूप में आए बाबा खड़े हो गए शरीर कंपायमान हो गया प्रेम की जो स्थिति है उसमें कंपरी कंपायमान हो गया चलने की सामर्थ्य नहीं रह गई बाबा लड़खड़ा रहे प्रभु आए पुत्र रूप में हे दासी तूने आज मुझे वह अमृत शब्द सुनाए जिसकी पूरी जीवन भर चाह थी।
तुझे क्या दे सकता हूं? इसके बदले में तू कुछ देने लायक है ही नहीं। जो सुंदर सुंदर बाबा हार धारण के साथ दासी को प्रदान कर देते हैं। प्रविष्ट इव अमृत महारणवेश आलिंगित इवानंद मंदाकिन्या मानो ब्रजराज को महानंद ने आलिंगन कर लिया हो बांध दिया हो कानों में मानो अमृत डाल दिया गया हो लाला हुआ है बाबा बाह्य ज्ञान खोकर अंत चेतना में एक अतीत चिंतन में ब्रज रानी अब बाबा समाधि में खड़े हुए हार दिया फिर एक वही चिंतन जो पूर्व चल रहा ब्रज रानी मैं जानता हूं तुम्हारे पुत्र रूप में कौन आएगा मुझे स्वप्न में बताया है जो बड़ी-बड़ी बड़ी यज्ञों के अनुष्ठानों की सफलता से भी असंभव है।
बड़ी-बड़ी तपस्या से भी जिसको प्राप्त करना असंभव है। वो तुम्हारे पुत्र रूप में आएगा। बड़े-बड़े ऋषि मुनि जिनका ध्यान करता है। कैसे अनंत ब्रह्मांडों का स्वामी पधारा एक अनोखा तू बता मेरे इष्ट देव नारायण की मेरे ऊपर कितनी कृपा है। असंभव भी संभव हो गया। अरे जिसको मैं अपनी भावना में देखता था मेरा पुत्र बनकर आ गया। श्याम चंचल चार दीर्घ नयनो बालवाले दुगो पयो धरेटस क्रीडनया लोकते स्वप्न किम जाग किम वेते न निश्चते सत्यम रूह सधणीत किम सोयं तवांतरे भाव में यशोदा मैंने देखा था तुम्हारा दुग्ध पान कर रहा है इंद्र नील मणि का परम ब्रह्म परमात्मा मैं अब जागृत रहूं या सोऊं या स्वप्न में वही छाया है क्या तुम्हें भी ऐसा लगता है बाह्य ज्ञान शून्य बाबा ऐसे बात करने लगे अंतर में यशोदा दादी जी से दासी ने कहा बाबा बाबा लाला के दर्शन परिचारिका फिर चेतना लग चलो मैं आ रहा हूं बाबा लड़खड़ाते हुए चल दासी तो भाग पड़ी फिर लाला की रूप माधुरी का पान करने के लिए बाबा एक एक कदम लड़खड़ा क्या सचमुच वही परम ब्रह्म परमात्मा आया है?
क्या मैं आज भर नेत्र उसको साकार रूप में साक्षात देखूंगा? बाबा बैठ जाते हैं। फिर यह तो वही गति जानता है जिसके सिर बीते और कोई बाबा की आंखों के सामने वही लाला और बस अस्त्रुधारा कंपायमान हो जाना, लड़खड़ा के बैठ जाना। ब्रजराज का मन भाव समाधि में डूब रहा है और बार-बार भगवान नारायण की स्मृति करके प्रणाम कर रहे हैं। आज अनादि सिद्धि मुझे प्राप्त हो गई। कितना आनंद उमगन बाबा के गए जी घर में वो सब बड़े बूढ़े गोपियों से भरा हुआ जो प्रधान दासियां थी बाबा के हटो हटो नंद राय जी पधार रहे हैं सब हटो आसपास पर्दा है।
ब्रज गोपियां खड़ी। बड़ी बूढ़ी ने कहा नहीं अभी नहीं बाबा देख सकते। बाबा अभी दर्शन नहीं कर सकते। बृजराज क्यों नहीं दर्शन कर सकता? नहीं। जब तक नाल छेदन नहीं होता आप दर्शन नहीं कर सकते। आप यही खड़े रहिए। अल्हादे समम ज्ञ बाल किम किम शव एवं विवेक तुम नंदस नाश मति मति मति प्रसतििका गृह के आंगन में खड़े हैं बाबा बड़ी उत्कंठा लिए खड़े कब लाला के दर्शन हो देखो इनको भी दर्शन की उत्कंठा में इंतजार करना पड़ता है प्रसूतिका ग्रह को घेरे हुए हैं। बूढ़ी बूढ़ी ब्रज गोपियां उपनंद सनंद की सब पत्नियां पड़ोस की गोपियां बृजेंद्र के हृदय में कितनी व्याकुलता हो रही कैसे लाला के अरे भाई दर्शन करा दो तो घूंघट करके बूढ़ी ब्रज गोपिया खड़े रहो अभी बाबा अभी नहीं फिर व्याकुलता बढ़ती है अरे थोड़ा रास्ता दे दो नहीं हम जबरदस्ती घुस जाएंगे प्रसुति काग्रह में और लाला के दर्शन करेंगे।
तदंतर एक बूढ़ी गोपी ने इशारा किया और थोड़ा सा रास्ता बताया। थोड़ी सी जगह दी। कहा अंदर तो नहीं जा पाओगे। यहां से उछक के देख लो। वो लाला पड़ा यशोदा मैया के पारश्व में। ही देखा वही है वही है जो मेरे जागृत में स्वप्न में मेरे भाव में यह वही है सचमुच उस गोपी ने एक ऐसा छिद्र सा भीड़ में बना दिया कि एक झांकी कर पाए बाबा और बस छिद्र बंद हो गया गोपियों से बृजराज की आंखें बंद हो गई आश्चर्यमय महा प्रेम में बाबा वही शिशु कुशु म चिरतर समय समुतन कल्प महहा रामस फलव सकलोनिषद कल्प लता विते आज हमें उपनिषदों का परम फल प्राप्त हो गया बाबा अनंत जनार्जित पुण्य रास मेरी सफल हो गई आज मेरे जीवन के उद्यान का पुष्प फलीभूत हो गया प्रभु यही जीवन का परम लाभ है।
भगवत साक्षात्कार उधर रूपनंद जी सनंद जी सब मिलकर के समयोचित व्यवस्था कर रहे हैं। ब्रज के समस्त विद्वत ब्राह्मणों को बुलाया गया। ब्राह्मण लोग आकर के स्वस्त वाचन कर रहे हैं। हरि ओम स्वस्त इंद्रो वृद्धवा स्वस्त विश्व वेदा स्वस्ताक्षर स्वस्थो बहस्प धातु प्रदवा प्रमाथ जगमया अग दूर चक्ष सोवे देवा आसाम भदम शणो या देवा भदम पक्षत रंग मह देवह जदा शो शदो अ देवा जतरा चो नाम पुत सो जत ो भव मानो मता माता पिता सम्रा देवा अदिति जना अजित शमक्ष श पृथ्वी शरा श रोधया श वनस्पताया शांति विष्णुवे देवा शांति ब्रह्मा शांति सर्व शांति शांति रे शांति सा श यतो यत सम ततो अभयम गुरु श गुरु प्रजा पशु हरि ओम सुशांत भवतु ओम शांति शांति शांति नगारे बज रहे हैं।
ब्राह्मणों की वेद ध्वनि होने लगी। बाबा स्नान करके वस्त्र आभूषण धारण करके ब्रह्म ऋषियों का पूजन कर रहे हैं। फिर मात्र का पूजन हुआ। नंदी मुख साद्र संपन्न हुआ और ब्रह्मणों के साथ सूतिका गृह में प्रवेश किया। विधिवत जात कर्म संस्कार आरंभ हुआ। नित्य जन्मा परब्रह्म परमात्मा का जात कर्म संस्कार हो रहा है। आ जिनके एक एक रोम कूप में अनंत ब्रह्मांड विराजमान है। उन प्रत्येक ब्रह्मांड पति ब्रह्मा शिव विष्णु अलग-अलग ब्रह्मांडों में और उन सबके स्वामी प्रभु इनका जात कर्म संस्कार है।
लीला बिहारी मुनि मनहारणी धन्य है इनकी लीला भूस्त इत्यादि मंत्रों का पाठ शिशु के बिंब विडंबित अधोष्ट को खोल के स्वर्ण संयुक्त अनामिका अंगुली से घृत का एक कण चटाया गया आयुष क्रिया करते हुए ब्राह्मण देवता शिशु के दक्षिण कर्ण में अग्नि आयुष्मान इत्यादि मंत्र बोल रहे ब्राह्मण जन जो मंत्र कान के समीप बोले उनके शरीर में कंपायमान प्रेम सब ब्राह्मण आश्चर्यचकित है कि हमारे अंग क्यों कांप रहे हैं इतना आनंद क्यों प्रकट हो रहा है आज तक ऐसा आनंद नहीं इसके बाद दिवस पर आदि मंत्र से बालक का स्पर्श कर रहे हैं।
फिर भूमि अभिमंत्रित की गई। एक एक अंग को पुनः प्रक्षालन किया गया। अंत में कुंचित केश कलाप मंडित मस्तक पर आपो देवशु ऐसे जल पात्र से जल छिड़क करके जात संस्कार कर वाच स्वस्तम जात करात्म जस कार मास विधि पित देव्चनम तथा ब्राह्मणों का कार्य पूरा हुआ दाई जो दाई मां नाल छेदन करती है यशोदा मैया ने कहा जल्दी करो बाबा बहुत व्याकुल है गोद में लेने के लिए नाल छेदन करो सोचो किनका नाल छेदन जिनकी नाल से कमल प्रकट हुआ और उसमें ब्रह्मा ब्रह्मा से सारी सृष्टि जाके नार आदि ब्रह्मादिक सकल विश्व आधार सूरदास प्रभु गोकुल प्रगटे मेटन
भू को भार ताको नारी छीन ब्रज युवती बांट तगा सो बांधो किनकी जिन्होंने अपने नाल से ब्रह्मा को प्रकट किया है चलो दाई मां जल्दी नाल छेदन करो नहीं करूंगी हरि को नार ना छीनो माई क्यों पूरा जीवन हो गया इसी बात का इंतजार करते आज तक किसी का नाल छेदन नहीं किया यही नियम लिया था कि बाबा के यहां तब नाल छेदन करूंगी मुझे पता है ये कौन पधारे हैं क्योंकि रात दिन इनहीं के भजन में ब्रज में और कौन सब ये महा प्रेमी जन अपने मन को भयो ले हो जो तो हमने भावना में आज प्रकट मैं पूरे जीवन भर इंतजार करती रही उसी दिन का हे मोती हीरा जवाहरात सोना चांदी अपने मन को भयो लेहु फिर मोतिन थाल भराई यह अवसर कब होई है फिर के पायो देव मनाई हरि को नार न छीनो माई रोहिणी जी ने कहा क्या चाहिए तुझे ये ले मेरा हार ले तुझे और क्या चाहिए बस ये मांगती हूं कि मैं जब आपके घर आऊं मुझे रोका ना जाए बस लाला को गोद में उठाऊं छाता से लगा हूं बस यही चाहिए हमें ये हीरा जरा सोना चांदी पूरा जीवन हो गया इसी बात का इंतजार करते हुए कि परम ब्रह्म
परमात्मा की नाल छेदन का सौभाग्य मुझे मिलेगा पहले वचन दो यशोदा मैया ने कहा आप सबके आशीर्वाद से ही तो लाला हुआ है आप जब चाहो चली आओ कोई रोक-टोक नहीं उठी रोहिनी परम आनंदित हार रतन ले आई और यशोदा मैया ने वचन जब दे दिया तो नारी छीन तब सुर श्याम को हंसी हंसी देत बधाई जाके नार भए ब्रह्मादिक सकल जोग व्रत साध्यो ताको नारी छीन ब्रज ज्योति बांट तगा सो बांध्यो नाल छेदन हुआ बड़ा सौभाग्य है ब्रज का बड़ा सौभाग्य जो सुख ब्रजवासियों को मिला ना तो कभी ब्रह्मा को मिला ना कभी बड़े-बड़े योगियों को मिला।
अब कह रही मिट जो गयो संताप जन्म को नाल छेदन वाली दाई मां क्या कह रही मिट जो गयो संताप जन्म को देखो नंद दुलारो बहुत दिनन की आशा लागी झगरिन झगरो कीनो यह मेरा सौभाग्य है कहां देखो आप विचार करो मुनि मन ध्यान धरत नहीं पा और वह अपने हाथ से भगवान का नाल छेदन करके तागा बांधते क्या क्या सौभाग्य ब्रजवासी परिकरों का अब तो नंद रानी ने गले का मुक्ता मणहार रोहिणी जी ने अपना हार बहुत ब्रज बूढ़ी जो युवतियां और सब सब लाद दिया रत्नों से सोने के हारों से नाल छेदन वाली को सब अरे नौ तो नंद ही है और कितने प्राण प्यारे ब्रजवासी सब सब न्योछावर कर रहे बूढ़ी बूढ़ी जो ब्रज गोपियां ब्रजेश्वरी शिशु को अपनी ओर नाल छेदन हो गया बाबा बोले अब काहे की विलंब है आवाज दूर से मारी कहा अभी रुको अभी रुको अभी एक और संस्कार बकाया है स्तनदान माता ने कहा अभी अभी लाला भूखा है अभी नहीं देंगे सबसे पहले जो जात कर्म संस्कार आदि के बाद मैया ने अपने वक्षा स्थल का अमृत परम ब्रह्म परमात्मा का पहला भोग लग रहा है कैसा सौभाग्य कैसा सौभाग्य
बड़े-बड़े योगेंद्र मुनिंद्र जिनके लिए तरसते रहते तड़पते रहते देते हैं। छाती से लगे छोटे-छोटे चरण चला रहे और मैया का दुग्ध पान परम ब्रह्म परमात्मा भगवान कर रहे हैं। वात्सल्य की धार बह रही है। धार बरे माता ब्रजराज अब नहीं सह पाए और सबको हटा हटो सब हटो ये होगा अभी ये होगा बहुत इंतजार हो गया और मैया की छाती से छीन लिया लाला को और अपनी छाती पर लगा रहे ब्रजराज कितने कोमल अरुण अध छोटे छोटे अरुण नीलकांत विशाल नेत्र वात्सल्य रस में डूबाए हुए माता ने अभी दुग्ध पान करा तो कुछ दुग्ध ऐसे ऐसे कर क्या सुंदर शोभा परम ब्रह्म परमात्मा जब ब्रजराज अपने क्या सुख उनको हो रहा होगा बार-बार छाती से लगाते बार-बार चूमते हैं फिर छाती से फिर देखते हैं बहुत मैया ने कहा हो गया बस मैया ने छीन लिया ज्यादा देर इतने महा सुख को इतनी देर कैसे हिम्मत की बृजराज 20 लाख गौएं स्वर्ण से अभिषिक्त करके के जो स्वस्थ वाचन करने वाले ब्राह्मण थे जात कर्म करवाने वाले उनको प्रदान किया।
गायों के सींग में स्वर्ण पत्रों से खुर रजत पत्रों से प्रत्येक के कंठ में बहुमूल्य मणियों की माला संपूर्ण अभी जितनी गौए सब नौ ब्याही हुई और सात पर्वत तिल के और उन पर्वतों पर रत्न बिछा हुआ है। सुनहरे वस्त्रों से ढके हुए सात पर्वत और अन्न के ये सब ब्राह्मणों को दान किए बाबा इस समय जो मांग लेता है वही हम भी मांगते हैं अपने लाला के चरणों का प्रेत चित्तवृत्ति कभी चूक कर भी कहीं ना जाए केवल आप में लगी रहे अब तो दल के दल ब्रजवासियों के 84 कोस ब्रज भूमि है दल के दल भगवान का चिदानंदमय प्रकाश हुआ तो बाबा का आंगन चिदानंद में है।
चिदानंद पूरा विश्व आ जाए तो भी खाली रहेगा। नहीं कितना बड़ा आंगन हो सकता है आप विचार करो कितना बड़ा आंगन ब्रज 84 को उसके सब ब्रजवासी जन कोई नहीं बचा। बड़ा बूढ़ा युवती बच्चा सब बाबा के यहां आए। समस्त ब्रज मंडल के ब्रजवासी गृह द्वार प्रांगण सब सजाया हुआ है। जगह-जगह कलश बंधनवार इत्र छिड़का गया है। आम्र पल्लव टंगे हुए हैं। हरिद्रा धूप अक्षत दधी कुमकुम इससे मार्ग छिड़का गया है। स्थान स्थान पर मोतियों के चौक पूरे हुए। ब्रजेश के ऐसे सजे हुए त्वरण द्वार पर कुछ ब्राह्मण बैठकर के मंगलाचरण कर रहे हैं।
सूत मागत बंदी जन ये जस गान कर रहे हैं। वृदावली का गान कर रहे हैं। संगीतज्ञों के दल बैठे हुए हैं। वीणा मृदंग नाना प्रकार के वाद्य बज रहे हैं। राजपथ में किनारे पर गौओं को सजाकर खड़ी किया गया है और मध्य में गोपों की गोपियों की भीड़ उमड़ी चली आ रही बाबा की यहां अब तो कोई पूरे शरीर में हल्दी तेल लगाए हुए आ रहा ब्रजवासी कोई गेरू आदि से धातु से अपनी रचना किए कोई मोर पिच्छ बांधे हुए कोई पुष्पों की माला से सजाए हुए कोई स्वर्ण से श्रृंगारित अंगखा बहुमूल्य वस्त्र आभूषण पगड़ी और कोई कावरों में भर भर के घी दूध दही ये भेंट के लिए ला रहा है।
समस्त ब्रजवासी जन बाबा के यहां एकत्रित हो रहे हैं। अब तो सबसे पहले लाला का दर्शन की मांग होती है सब ब्रजवासियों को। कैसे सबको कैसे दर्शन हो स्वयं नंद राय जी जाते यशोदा मैया की गोद से लाला को लेते और एक ऊंचे स्थान पर आंगन पर खड़े होके सबको ऐसे दर्शन कराते हैं लाला सब ब्रजवासी जन आनंद में मगन है और बधाई गाते हैं अपने भी एक दो बधाई गाते हैं लाला के प्रादुर्भाव की जी आज ब्रज मंगल मोद भयो आज ब्रज मंगल मोग भयो आज ब्रज मंगल मोयो आज ब्रज मंगल मोशुमति कुख कमल ते प्रगटे यशुमति कमल ते प्रगटे यशुमति कुख कमल से प्रगटे यशुमति कमल से प्रगटे हे मोहन जन्म लो मोहन जन्म लो आज
ब्रज आज ब्रज आज ब्रज मंगल मोद भयो आज ब्रज मंगल मोद भयो आज ब्रज मंगल मोद भयो आज ब्रज मंगल मोद भयो बधाई हो जैसे पूर्ण सश प्राची उड़न जुत उदयो जैसे पूर्ण शशि प्राची उड़न उदयो हां जैसे पूर्ण शशि प्राची उड़न उदयो जैसे पूर्ण उड़न दुख बधाई है बधाई है बधाई है बधाई हो बधाई है बधाई है बधाई है बधाई है हां जैसे पूर्ण सचि प्रा उड़गन जुत उदयो जैसे पूर्ण स उग जुत उदयो हे आनंद किरण प्रकाशतिहर आनंद किरण प्रकाशतिहर आरण किरण आनंद किरण प्रकाशतिहर आनंद किरण प्रकाशतिहर त्रिभुवन ताप गयो आज ब्रज आज ब्रज आज ब्रज मंगल मोद भयो आज ब्रज मंगल मोद भयो हे आज ब्रज मंगल मोद भयो आज ब्रज मंगल मोद भयो हे आज ब्रज मंगल मोद भयो आज ब्रज मंगल मोद भयो आज ब्रज आज ब्रज आज ब्रज मंगल मोद भयो आज ब्रज मंगल मोद हे नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की आनंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की हे नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की हे नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की हे नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की आनंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की हे हाथी जी ने
घोड़ा जी ने और जीने पाल की हाथी जी ने घोड़ा जी ने और पाल की नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की आनंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की आज ब्रज मंगल मोद भयो आज ब्रज मंगल मोद भयो आज ब्रज मंगल मोद भयो आज ब्रज मंगल मोह भयो सी प्रेम सुधा नर नारी अमर विमान छयो प्रेम सुधा नर नारी अमर विमान छयो अमर विमान छयो अमर विमान छयो श्री रूप लाल हित ललित त्रिभंगी रूप लाल हित ललित त्रिभंगी श्री रूप लाल हित ललित त्रिभंगी रूप लाल हित ललित त्रिभंगी रंगी रंग नयो रंगी रंग नयो आज ब्रज जय हो आज ब्रज आज ब्रज मंगल हो भयो आज ब्रज मंगल मोद भयो आज ब्रज मंगल मोद भयो आज ब्रज मंगल मोद बधाई हो हां आज बधाई को दिन को आज बधाई को दिन को हां आज बधाई को दिन को आज बधाई को दिन को नंद घर सुमति जायो है नंद घर जसुमति जाो है नंद घर जस सुमति जाो है नंद घर जसुमति जाो है लाल भाव तो जी को लाल भाव तो जी को हां लाल भाव तो जी को लाल भाव तो जी को हां आज बधाई तो दिन को आज बधाई तो दिन आज बधाई को दिन को आज बधाई को दिन को हो हां पंच शब्द बाजे बाजत हां
पंच शब्द बाजे बाजत हां हां पंच शब्द बाजे बाजत हां पंच शब्द बाजे बाजत बाजे बाजत बाजे बाजत बाजे बाजत बाजे बाजत तेरी पंच शब्द बाजे बाजत घर ते आयो टीको पंच शब्द बाजे बाजत घर से आयो टीको हे घर से आयो टीको घर घर से आयो टीको तेरी मंगल कलश लिए ब्रज सुंदरी मंगल कलश ब्रज सुंदरी हां मंगल कलश लिए ब्रज सुंदरी मंगल कलश लिए ब्रज सुंदरी और ग्वाल बनावत छीको ग्वाल बनावत छीको ग्वाल बनावत छीको ग्वाल बनावत छी को आज बधाई को दिन को आज बधाई को दिन को आज बधाई को दिन आज बधाई को दिन दे शीश सकल ब्रज सुंदरी सकल ब्रज जीवो कोटि बरी सो जीवो कोटि बरी सो लाला जीवो कोटि बरी सो लाला जीवो कोटि बरी सो परमानंद दास को ठाकुर परमानंद दास को ठाकुर हे परमानंद दास को ठाकुर परमानंद दास को ठाकुर गोपवेश जगदीशो उपवेश जगदीशोवेश जगदीशो उपवेश जगदीशो आज बधाई हो दिन नी को आज बधाई दिन को आज बधाई हो दिन आजाई पश्य सखी कुल गोकुल राजम पुत्रोत्सव मन खेला भाजम उदध प्रद समव देशम परितो घित मंद वेशम मध्य धटी फणराज कृष् हद सुती हष्टम मध्य मध्य दुर्लभ
दानम ददतम ददतम विस्मय भानम एकम पुनरल पूर्वम अजनी विधुर यदि पूर्वम नंद बाबा आंगन में खड़े सब ब्रजवासियों के गले लग रहे बड़ा उत्साह एक नाचत करत कुलाहल छिरकत हरद दही मानो बरसत भादो मास नदी घत दूध बही जो ब्रजवासी आता है पूरा माट कमाट बाबा के ऊपर दही का डाल लेता है कोई दूध का कोई आपस में उसको उठा के दूध दही के कुंड में डाल रहे जाको जहां जहां चित जाए कौतुक तं त रस आनंद मगन ग्वाल काहु बदत नहीं एक धाई नंद पे जाए पुनि पुनि पाए परे एक आप ही माझ हंसी हसी अंक भरे एक अंबर सबह उतार देत निशंक खरे एक ददी रोचन दूवन के शीश धरे बड़ा आनंद कुलाल मचा हुआ है कोई कोई आनंद में इतना मगन है कि सब आभूषण वस्त्र उतार के दान दे रहे हैं कोई एक दूसरे पर दही दूध घी आदि आद डाल रहे हैं।
कोई दूरवा अंकुर से छिड़क रहे हैं। गोप का आनंद उन्माद उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है। बूढ़े ब्रज बाबा नंद को कर लिया और आसपास से दही दूध घृत और मक्खन के ऊपर से ऐसे अभिषेक बाबा का फिर उसी आंगन में सब लूट रहे हैं। एक दूसरे के ऊपर छिड़क रहे हैं। मानो यहां दुग्ध सागर की चंचल तरंगे बृजेंद्र के घर में मानो दूध का भारी सरोवर दूध दही का हो गया एक दूसरे को उसी में डुबो रहे खेल रहे बाबा के घर में आनंद उत्सव मचा हुआ है और द्वार पर उपनंद सुनंदा आदि जो है ये रत्न राशियां लिए बैठे हैं जो चाहे जितनी चाहे ले जाए आज नंदराज के घर आठों सिद्धियां नौ निधियां कोई कमी नहीं जितना बांटो उतना और बढ़ता जा रहा है।
कोई ऐसा नहीं जो वहां से पूर्ण काम होके नहीं जो गया सब पूर्ण काम अपने लोग भी तो आए हैं। भाव के द्वारा आज हम बाबा के ही तो आंगन में हैं। बृजेंद्र के यहां इतनी संपत्ति लुटी कि लेखाजोखा ही नहीं हो सकता। क्या हो जब अनंत पधारे तो लेखाजोखा सीमा में कैसे रहे आश्चर्य की बात कि इतने बटने पर भी भंडार में कोई कमी नहीं अनंत असीम भंडार विश्व की समस्त संपत्ति की स्वामिनी स्वयं महालक्ष्मी जी विराजमान है नंद बाबा के घर क्योंकि उनके प्रीतम विराजमान है। प्राकृत भंडार की सीमा नहीं, अप्राकृत सुख की सीमा नहीं।
दोनों बातें प्राकृत अप्राकृत बृजेश का अद्भुत वैभव देखकर सब आश्चर्यचकित हो रहे हैं। आज बाबा ने कह दिया है कि किसी को भी रोकना नहीं है। कोई भी आ सकता है और कोई भी जो चाहे वह ले सकता है और इसका फल अनेन प्रियताम विष्णु स्थान में सुते शिवम भगवान नारायण प्रसन्न हो और मेरे पुत्र का मंगल हो मेरे पुत्र का शिवम कल्याण हो बाबा के वात्सल्य ये जो भी उसका फल मिले कि नारायण प्रसन्न हो और मेरे पुत्र का शिवम हो मंगल हो कल्याण हो खूब आनंद उत्सव हो रहा है गोपियां गो चिरजीवो यशोदा नंदन पूरन काम करी धन्य धन्य दिवस धन रात धन ये पहर घरी चिर जी यशोदा नंदन पूरन काम करी धन्य धन्य महिकी कुखी भाग सुहाग भरी जिन जाो एसो पूत सब सुख फलन फरी थिर थापो सब परिवार मन की सूर पाह पाह चिरम ब्रजराज कुमारम पाह पाह चिरम ब्रजराज कुमारम समस्त ब्रजवासियों की एक दिन उत्सव नहीं हो रहा है प्रति पल प्रतिदिन महा उत्सव चल रहा है।
संपूर्ण ब्रज मंडल आनंद में डूबा हुआ है। बाबा को याद आए कि ये पांच दिन से महा महोत्सव तो लाला का चल रहा है। कंशु को पता चलेगा कि कोई उत्सव मनाया जा रहा है तो कहीं कोई अमंगल रचना ना रच दे। बड़ा दुष्ट स्वभाव का है। तो बाबा ने समस्त गोप गोपियों को उस आनंद उत्सव में लगाया और बड़े बूढ़े गोपों को भार सौंपा और बहुत सी रत्न राशि भेंट लेकर मथुरा कंस के पास जाने का विचार किया। सब फिट करके खूब ढेर सारे रत्न राशि ला दे गाड़ियों में छकड़ों में मथुरा पहुंचे और कंस को समर्पित किया क्या है ये ब्रज का कर है जो गौएं चराते हैं जो दुग्ध और घी वो कर उसके सोचने की जगह नहीं कि आनंद उत्सव क्यों मनाया गया ये सूचना ना पहुंच जाए सूचना की जरूरत नहीं थी पहले से लगा दिए गए थे राक्षस श्लोक पीछे सुना आपने रात्रि में बैठक बैठा ली थी और कहा था 10 दिन के अंदर के ब्रजवासी ब्रज में जितने भी बालक हुए सब मार डाले जाए ठेका मिला था गोकुल का पूतना को वासुदेव जी को जब मालूम हुआ कि नंद बाबा आए हैं कर देने घबरा गए ये बहुत इससे किसी भी तरह राजी नहीं किया जा कंस को अपने सेवक को भेजा कि नंद बाबा से कहो एकांत में हमसे मिले जो एकांत स्थान था वहां जब वसुदेव जी को देखा दौड़ के वसुदेव जी नंद बाबा से मिले क्योंकि दोनों पुत्र यही है दोनों पुत्र यही है ना नंद बाबा के पास बलराम जी और श्री कृष्ण चंद्र जी नंद बाबा को भी ऐसा लगा जैसे अपने प्राण से मिला जाता है वासुदेव जी से मिले नंद बाबा प्रेम विभल है।
वसुदेव जी ने कहा बहुत आनंद झलक रहा है। बोले नारायण की कृपा से बहुत सुंदर पुत्र इंद्र नीलम वसुदेव जी तो उनके हृदय की कौन कहे जो लेटा करके तो वही आए हैं ना और सुख वो बाबा ले रहे हैं। वसुदेव जी ने कहा भगवान की बड़ी कृपा। अच्छा ब्रज में सब ठीक है। यह बढ़िया खबर सुनाई। आपकी अवस्था हो गई थी। आपको बड़ा सुंदर पुत्र हुआ। बड़े सौभाग्य का विषय, बड़े आनंद का विषय है। और आज आप हमें दर्शन दिए। ये हमारे सौभाग्य का विषय क्योंकि प्रेमी जनों का मिलना बड़ा दुर्लभ है।
देखो नंद बाबा ये संसार चक्र ऐसा है कि इसमें अगर हम प्रेमी जन दोबारा मिलते हैं तो पुनर्जन्म ही समझो नहीं पता नहीं कब कौन बिछड़ जाए। ये नदी का प्रवाह जैसा है। एक तिनका मिला फिर कब ना मिले। सब प्रारब्ध कर्म के अनुसार अलग-अलग हम थोड़ा प्रार्थना करना चाहते हैं आपसे कि इस समय वायुमंडल ठीक नहीं है। कंस के द्वारा जो फैलाया हुआ जाल है बड़ा भयंकर है। और आपको पता ही होगा कि मेरा पुत्र आपके पास है। नंद बाबा ने कहा हां रोहिणी पुत्र बलराम हां सुख पूर्वक है कृपा है नारायण की कृपा है मुझे भय लग रहा है तुम यहां से जाओ क्योंकि ये कंस बड़ी नीच बुद्धि का है।
कहीं कोई षड्यंत्र ना रच दे। आपने इतने हीरा जहारा रत्न समर्पित किए हैं और उसको सूचना मिलेगी पुत्र उत्सव हुआ है। कोई ना कोई खतरा हो जाएगा। मुझे बहुत भय लग रहा है। बस देव जी ने कहा नंद बाबा ने कहा हां भाई तुम्हें भय लगना ही चाहिए क्योंकि देवकी के कितने पुत्र मार डाले इस दुष्ट कंस ने। एक कन्या बची थी। उसको भी संदेह नहीं कि महान दुष्ट है। वसुदेव जी ने कहा भाई कर चुका चुके। हमसे मिल चुके। अब एक क्षण मत ठहरो। मेरा हृदय बहुत व्याकुल हो रहा है। आप तुरंत गोकुल की तरफ जाओ और हे भगवान कोई उत्पात ना होने पावे।
जानते थे कि वसुदेव जी एक महापुरुष हैं। नंद बाबा को घबराहट पैदा हो गई कि वसुदेव जी का इस तरह कहना कोई भारी विपत्ति ब्रज में पड़ना है। हे नारायण हे भगवान हे भग और इधर भाई ठेकेदार पूतना उसने विचार किया ऐसा सुंदर रूप रखूंगी कि कोई भी मुझे देखकर के होश में ही नहीं रहेगा। नंद बाबा के घर ऐसे प्रवेश करूंगी। पूछने की हिम्मत ही किसी की नहीं रहेगी। बना लो रूप आज कल पटक के मारेंगे ला। श्री राधा लाल की जय
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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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