॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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Amogh Lila Prabhu और पूज्य महाराज जी के बीच क्या वार्तालाप हुई ?

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पूज्य महाराज जी के श्रीमुख से युगल लीला का रस — ऊपर वीडियो में सुनें।

पूरा प्रवचन

जी महाराज जी की जय पहना राधा रानी का है आपके दर्शन हुए महाराज कार्तिक मास में बहुत बड़ा सौभाग है महाराज आप कृपा करके दर्शन देने आए हैं प्रभु हम अधम हम कहीं जा नहीं सकते तो जो प्रभु मोह अनुग्रह कीना तो तुम्हारी दरस अति दीना भगवान अपने निज जनों को तभी भेजते हैं जब कृपा होती है तो भगवान की कृपा हुई कृष्ण कृपा से कृष्ण दासों का दर्शन होता है महाराज आप तो शुद्ध भक्त है राधा रानी के और आपके दर्शन करना हमारा सौभाग्य है हमने आपकी तस्वीर देखी आपका स्वास ठीक नहीं रहा था वहां बड़ी-बड़ी चिंता हुई हां थोड़ा किडनी फेल है ना तो अब वो डायलिसिस होता है तो कभी पानी बढ़ बढ़ जाता है तो सूजन आ जाती है।

कभी ऐसी परेशानियां होती पर वो भगवान की कृपा से सब ठीक है। भगवान की कृपा पिछले मैं चरण दूष भी लेके आया था आपके लिए कि आपका ऐसा स्वास्थ रहे और आपसे सबको इतनी प्रेरणा मिलती है। पूरा जगत आपके द्वारा जो है लाभान्वित हो रहा है। आपके संग से आपकी वाणी से बहुत-बहुत धन्यवाद। मतलब हजारों लाखों नहीं करोड़ों लोग हैं जो कि आपसे प्रेरणा ले रहे हैं। करोड़ों लोगों का कल्याण हो रहा है और मेरी बड़ी इच्छा थी कि आपके मैं दर्शन करूं और जाने जाने मेरे से कोई अगर अपराध हुआ है आपके चरणों में मैं आपसे क्षमा मांगने के लिए आया था।

अपराध की तो कोई संभावना ही नहीं। वैष्णव से अपराध कैसे बन सकता है? जो निरंतर भगवान में लगा है अपराध बनने वही राधा है। वही कृष्ण है। कृष्ण अपने आप में खेलने के लिए वो राधा रूप बनाए हैं। दूसरा रसो या परमानंद एक दुधा सदा श्री राधा कृष्ण रूपाभ्याम तस तस्मै नमो नमः वो रस स्वरूप परमात्मा अपने खेलने के लिए अपने आप को ही राधा रूप में प्रकट किया भगवान का जो आल्हाद है भगवान की जो आत्मा है वही तो प्रियाजु है। श्री कृष्ण ही प्रियाजु है। प्रियाजु ही श्री कृष्ण है।

पर प्रियाजु की कृपा से ही श्री कृष्ण प्रेम प्राप्त किया जा सकता है। क्यों? क्योंकि सांद्रानंद घन प्रेम मूर्ति किशोरी श्री कृष्ण का सांद्रानंद घन जो स्वरूप है प्रेममय स्वरूप है वो किशोरी जो है अगर श्री कृष्ण का कोई रसास्वादन कर सकता है वो है किशोरी जू और किशोरी जू की कृपा से ही श्री कृष्ण का रसास्वादन हो सकता है जैसे पूर्णिमा के चंद्र का यदि हम दर्शन करना चाहे तो सिर्फ पूर्णिमा को ही कर सकते हैं। प्रतिपदा को नहीं, द्वितीया को नहीं। ऐसे ही अगर हमको श्री कृष्ण प्रेम प्राप्त करना है तो किशोरी जी का कृपा कटाक्ष अत्यंत आवश्यक है।

बिना राधा कृपा कटाक्ष के श्री कृष्ण के प्रेम का अवगान हो ही नहीं सकता। जैसे हमारी पूज्य महामहिम गोपी जन तो आधा मूर्धन यदा पुरदार गोप्या काम्यम पदम प्रिय गु रपच्छ मले भावत्सवेन भजता रस काम धेनु तम राधिका चरण रेणु महामरामि श्री जी की चरण रज के प्रभाव से अनंत अनंत सौंदर्य माधुर निधि श्री कृष्ण को रिझा लिया गोपियों ने यत पाद पद्म नख चंद्र मण छटाया विजितम किमप गोप वधशी पूर्ण अनुराग रस सागर सार मूर्ति साराधिका म कदापि कृपाम करोत वो किशोरी जो हम पर कृपा करें इनकी नख चंद्र मणि की छटा का लेश मात्र प्रभाव गोपी जनों पर पड़ा तो गोपी प्रेम की ध्वजा हो गए तो श्री कृष्ण का पूर्ण रसास्वादन सिर्फ लाडली जो कर सकते हैं लाडली जो अगर कोई कर पाया तो राधा भाव से अगर कोई पूर्ण रसास्वादन कर पाया तो राधा भाव से तो राधा भाव मिलेगा कहां से राधा किशोरी जी से ही तो मिलेगा।

तो जब हम राधा बोलते हैं तो श्री कृष्ण मुस्कुराकर आसक्त हो जाते हैं हमसे। जय हो। और लाडली जो जब देखती है श्री कृष्ण इस पर आसक्त है तो वो हम पर कृपा कर देती है। इसलिए कहीं पक्ष नहीं है। जी जो राधा और कृष्ण में पक्ष स्थापित करते हैं। अभी वो समझ नहीं पाए। हमारी दोनों आंखें हैं। लेकिन दृष्टि एक है। आंखें दो हैं। दृष्टि एक है। तन दो है, प्राण एक है, मन एक है, स्वभाव एक है, वह एक है, रुचि एक है, क्रीड़ा एक है। हमारे राधा कृष्ण की तन दो है, लेकिन मन एक है, रुचि एक है, स्वभाव एक है, दृष्टि एक है, उय एक है, क्रीड़ा एक है, रस रास एक है।

उनहीं का है। वो दो है ही नहीं। दो है आप कृष्ण बोले तो हमारा मन आपके चरण चूमने को करेगा। जब कृष्ण बोले तो लगा मेरी प्रिया जी को बहुत सुख मिलेगा क्योंकि कृष्ण बोलता है। जब हम राधा बोलते हैं तो लाल जी को सुख मिलता है। इसीलिए प्राय वैष्णो जन राधा कृष्ण बोलते राधा कृष्ण तो कोई भेद नहीं। प्यार में जब हम उतरते हैं तो भेद खत्म हो जाता है। प्रेम गलिय साकरी तामे दो न समाए। प्रेम में दो नहीं होते। इतनी साकरी गली है दो नहीं। ब्रह्म नहीं माया नहीं जीव नहीं काल अपनी ही सुधि ना रही।

एक रहो नंदलाल एक प्यारे के रूप में एक प्यारी के रूप में जहां प्यारे हैं वहां प्यारी हैं। जहां प्यारी है वहां प्यारे हैं। ये दोनों अलग नहीं रह सकते। नहीं रह सकते। नहीं रह सकते। जय हो। मेरी ना सिस्टर आई थी और मेरी माता श्री आई हम आशीर्वाद दे देंगे हमारा नाम भजन में मन लगे कहां है माता ये मेरी दोनों बहने हैं और वो मेरी माता श्री पीछे माता जी धन्य है आप मां जिनके ऐसा पुत्र प्रकट हुआ जो भगवन नाम प्रचार प्रसार करके कलयुग में सोए हुए जीवों के हृदय में भगवन नाम जागृत कर रहे हैं।

भगवान की महिमा स्थापित कर रहे हैं। देवालयों की भगवत विग्रहों की पूजा सेवा की महिमा स्थापित कर रहे हैं। धन्य वही जननी धन्य वही पिता धन्य जिसके ऐसे पुत्र प्रकट हो। प्रणाम है आपको आपसे आप जिस महापुरुष से मिलके आज मैं बिल्कुल धन्य हो गई। मैं बिल्कुल उनके पीछे पड़ी थी। मुझे उनको मिलना है। मुझे मिलवा दो। जी। उन्होंने बहने बहुत चाहती थी आपके दर्शन करने के लिए। और आपके अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं। हमने आपकी जब तस्वीर देखी ना इंटरनेट पे तो बहुत हम दुखी हो गए थे।

तो बस भक्ति का आशीर्वाद दे दीजिए बस महाराज हमारा भजन मन लगे हम भक्ति में आगे बढ़े हमारा राधा रानी के चरणों में रति हो महाराज एक बार फिर से क्षमा प्रार्थी महाराज अरे कैसी बात करते आप हमारी आत्मा हो आप हमारी आत्मा हो आप बिल्कुल आप हमारी आत्मा हो आप ऐसा ऐसा बिल्कुल नहीं आप महान महाराज राधा रानी शुद्ध भक्त है आप हमारी आत्मा हो आप क्षमा धन्यवाद प्रेमानंद जी महाराज जी की जय श्रीमती राधा रानी की जय है।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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