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क्या स्वरूप बोध के बाद आत्मा और परमात्मा एक हो जाते हैं? निकुंज में एक होकर सेवा कैसे होगी?

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पूज्य महाराज जी के श्रीमुख से युगल लीला का रस — ऊपर वीडियो में सुनें।

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अरविंद जी राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी जब जीव अपने स्वरूप का बोध कर लेता है तो आत्मा और परमात्मा एक हो जाते हैं या अलग रहते हैं शीशा ऐसे रख देते हैं तो हम दो हो गए ना शीशा रख दिया तो हम दो हो गए एक हम और एक प्रतिबिंब और शीशा पलटा दिया एक बचे ना तो जब तक देह भाव जीव किसे कहते हैं देह भाव को प्राप्त हुआ और जहां देह भाव मुक्त हुआ आत्म स्वरूप को प्राप्त हुआ तो माया रूपी दर्पण हटा तो बचा कौन एक उसे आत्मा कहो या परमात्मा कहो या ब्रह्म कहो इसीलिए वेद कहता है ब्रह्मविद ब्रह्मव भवती जो ब्रह्म को जान लेता है वो ब्रह्म स्वरूप हो जाता है क्योंकि वह ब्रह्म स्वरूप था वो ब्रह्म स्वरूप है वो ब्रह्म स्वरूप रहेगा पर अपने स्वरूप को भूल के माया के प्रतिबिंब में फंस गया।

अब सब ईमानदारी से बताओ अपने को यही मानते हैं कि नहीं मानते? तो यही है प्रतिबिंब। ये हटा कि आप वही देखो गोस्वामी जी बड़ी प्रवीणता से लिख रहे हैं स्वई जानह जेह देहु जनाई जानत तुमह तुम ही हुए जाई हे प्रभु जिसको आप जाना चाहते हो वही जान पाता है और जो आपको जान पाता है वो आपका स्वरूप हो जाता है वो ब्रह्म स्वरूप रूप हो जाता है तो फिर वहां दो नहीं रहते। सवाल हल तभी माना जाएगा जब एक रहेगा। चाहे भक्ति से चलो, चाहे कर्म योग से चलो, चाहे अष्टांग योग से चलो, चाहे सांख्य योग से चलो।

सवाल हल माना जाएगा जब एक एक को ब्रह्म द्वितीय नास्ति जब यह निर्णय तुम्हारा आएगा तो साधना सही है अगर निर्णय में दो है तो साधना सही नहीं है साधना का परिणाम एक एक ही है सोहम जहां दासोहम चाहे जिस मार्ग से चलो दासोहम से चले तो कई बार सुना चुके हैं ब्रह्म नहीं माया नहीं जीव नहीं काल अपनी ही सुधि ना रही एक रहो दासोहम में मैं का विस्मरण है और सोहम में तू का विस्मरण है और माया में मैं तू का स्मरण है मैं तू मैं और मोर तोर ते माया और मैं शुद्ध मैं ब्रह्म और मैं का विस्मरण शुद्ध केवल तू ही तू जित देखता उस तू ही तू तो यहां भी तू तू ही तू बचा एक मैं तू नहीं जब तक मैं तू तब तक माया भक्ति प्रारंभ होती है तो भेद से होती है स्थिति जब होती है तो अभेद होती है ज्ञान अभेद से ही प्रारंभ होता है अभेद में स्थित होता है और भक्ति भेद से प्रारंभ होती है अभेद में स्थित हो जाती है बात समझ में आ रही है महाराज जैसे निकुंज में जाते हैं जैसे निकुंज में जाते हैं तो हां तो सेवा करते हैं ठाकुर जी की हां वो तो फिर दो अलग

ही हो गए ना जीव होके जाते हैं क्या नहीं नहीं वो तो तो उस समय की स्थिति को तुम जानते हो क्या एक एक वृंदावन एक प्रेम सहचरी का स्वरूप प्रेम प्रिया प्रीतम का स्वरूप प्रेम मैं श्यामा श्याम की सेवा कर रही हूं यह भाव नहीं रहता सेवा हो रही केवल श्यामा श्यामा श्याम मन श्यामा श्याम बुद्धि श्यामा श्याम तन श्यामा श्याम रोम रोम श्यामा श्याम मैं खो गया केवल श्यामा श्याम तभी तो कहते जब तक स्थिति नहीं तब तक बुद्धि से आकलन नहीं किया जा सकता बुद्धि एक सीमित प्राकृतिक है और प्रभु की लीला चिदानंदमय है तो प्राकृतिक बुद्धि चिदानंद का कैसे अनुमान कर सकती है वो तो जब उसमें प्रवेश पावे तब बात समझ में आएगी ना अब जैसे थोड़ा भाव देश में प्रवेश पावे तो हमारे इशारे को समझते चले जाएंगे।

ऐसा लगेगा ऐसा कैसे मैं सेवा कर रहा हूं और मुझे यह बोध नहीं कि मैं सेवा कर रहा हूं। यंत्रवत सेवा हो रही है। श्याम श्यामा विराजमान हृदय में श्याम श्यामा बुद्धि में विराजमान श्याम श्यामा मन में विराजमान श्याम श्यामा चित्त में विराजमान और ये माता-पिता जनित पैदा हुआ जो देह है ये श्याम श्यामा की सेवा योग्य नहीं है। वो भाव देह जो है वो चिदानंदमय होता है। जो श्यामा श्याम का चिदानंदमय श्री अंग वैसे ही सहचरी का श्री अंग होता है। वो सब वहां एक है। इतना समुदाय होने पर सब एक है।

खाग, मृग, पशु, पंछी, वृंदावन, प्रिया, प्रीतम, सहचरी सब प्रेम। तो, उनका ही विस्तार हुआ वह। बस वही प्रेम जो ठाकुर जी के हृदय का प्रेम है, वही किशोरी जो और किशोरी जो के रोम रोम से सब सहचरियों का प्रादुर्भाव और ठाकुर जी का प्रेम ही वृंदावन हो गया। सब कुछ प्रेम, प्रेम, प्रेम तो एक ही बचा ना प्रेम। वृंदावन प्रेम धाम है तो यहां सब कुछ प्रेम ही प्रेम है। यहां दो नहीं है। प्रेम गलियति सा तामे दो न समाए दो का प्रवेश नहीं है। समझ पा रहे हैं आप? श्रीपाद अनंत प्रभु देसाई जी राधे-राधे श्री राधे-राधे महाराज जी।

महाराज जी तीन साल से YouTube के माध्यम से आपसे जुड़ा हूं। महाराज जी आपका प्रश्न है कि परब्रह्म आत्म काम है। उनको कुछ भी इच्छा नहीं रहती। तो महाराज जी मैं अनेक हो जाऊं। ऐसी इच्छा सृष्टि के आरंभ में कैसे हुई? महाराज जी बात यह है कि उनके हृदय में इच्छा क्यों हुई? यह हम प्रश्न नहीं कर सकते क्योंकि वो स्वामी हैं। वो सृष्टि के रचयिता हैं। वो अपने आप से अपने आप में खेल रहे हैं। वो किसी और से खेलने की थोड़ी की इच्छा। अपने आप से अपने आप जब खेलने की इच्छा करता है तो सृष्टि रच जाती है और जब खेल करके शांत हो जाता है तो सृष्टि सब मिट जाती है।

उसे महाप्रलय करते हैं। इसीलिए उसने रचा वो खेल रहा है। वो खेल रहा है। अब वो क्यों खेल रहा है? अब ये प्रश्न तो नहीं हो सकता। उसने एक हम बहुत श्यामा ऐसा क्यों बोला? मैं एक से बहुत हो जाऊं। ऐसी इच्छा क्यों की? तो हम आपको बताएं झूठा है। उसने किया ही नहीं। उसने इच्छा की ही नहीं। वह बहुस्यामा हुआ ही नहीं। वह एक ही है। दूसरा है ही नहीं। आप हमारी बात को समझ पा रहे हो जहां से हम बोल रहे हैं। कैसे? जैसे स्वप्न में आप अनेक थे। आपका मन ही बाजार बना हुआ था। आपका मन ही शत्रु बना हुआ था।

आपका मन ही मित्र बना हुआ था। आपका ही मन दुख बना हुआ था। आपका मन ही सुख बना हुआ था। लेकिन जब आप जगे तो क्या था? आपके सिवा कुछ था क्या? बस आपके सिवा कुछ है क्या? यह सब माया कथन उमा कहूं मैं अनुभव अपना सत हरि भजन जगत सब सपना यह जो बहुत तुम देख रहे हो यह स्वप्न है। यह जो बहुत देख रहे हो वह स्वप्न है। उसी स्वप्न को मिटा दो तो एक ब्रह्मवि ब्रह्म भवती दूसरा कोई है ही नहीं। अगर दूसरा दिखाई दे रहा है तो स्वप्न है। जागृत अवस्था में आओगे तो वासुदेवा सर्वमति सर्वमति माया है केवल वासुदेव सर्वम खलमिदम ब्रह्म सर्वम ये माया है खलमिदम ब्रह्म वो केवल एक है वो एक ही अनेक रूपों में भास रहा है।

जैसे सूर्य एक है और एक करोड़ घड़े रखे हैं। तो एक करोड़ घड़े में एक करोड़ सूर्य भास रहा है ना कि सूर्य एक करोड़ हो गया। घड़े फोड़ देने पर सूर्य पर कोई फर्क नहीं पड़ता। वह एक ही है। सत्य बोध होने पर ऐसा अनुभव में आएगा। जब तक ऐसा अनुभव में नहीं आएगा तब तक प्रश्न उठ जाएगा। और वो नहीं है। यह है वो नहीं है। वो यह है जो तुम हो। तुमने ही अपनी इच्छा की इच्छा मिटा दो तो तुम वही हो। तुम दूसरे थोड़ी हो। तत तमाम तत जिसे तुम वह कह रहे हो तम अस तुम ही हो यह बात जब तक भजन नहीं करोगे साधना नहीं करोगे तो क्यों का अंत हो सकता है क्या हमें क्यों का अंत नहीं होता है इसलिए आप सुलझ करके समझिए वो परमात्मा ही जब खेलना चाहता है यह माया में शब्द है क्योंकि माया से युक्त होकर ही खेल होता है जब वो खेल खेलना चाहता है तो अपनी योग शक्ति से विस्तार कर लेता है।

जड़ चैतन अनंत ब्रह्मांड वो सब बन जाता है और जब वो शांत सहय करना चाहता है तो सबको समेट लेता है। यह भी मायामय उत्तर है। लेकिन माया मुक्त उत्तर यह है कि ऐसा कभी हुआ ही नहीं। अब हम जो शब्द बोलेंगे वो सबकी समझ में है। ये सृष्टि कभी हुई ही नहीं। योग वाशिष्ट यह सृष्टि कभी हुई नहीं। यह तुम्हें भास रही है। क्यों? क्योंकि अज्ञान से युक्त हो और ज्ञान से युक्त हो जाओ तो केवल ब्रह्म दूसरा है ही नहीं। एक को ब्रह्म द्वितीय नास्त। यह शास्त्रीय उत्तर

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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