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जब आप सब में भगवान को देखते हो तो किस रूप मे देखते हो और क्या वो लीला भी करते हैं?

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पूज्य महाराज जी के श्रीमुख से युगल लीला का रस — ऊपर वीडियो में सुनें।

पूरा प्रवचन

सुनीता जी राधे राम महाराज जी आपका प्रश्न है कि जो यद्यपि आपके लिए लिखा है बट कह रहे हैं कि जो भगवत साक्षात्कार महापुरुष जन होते हैं उनको जैसे वो सब में भगवान को देखते हैं तो किस भावना से देखते हैं कृष्ण स्वरूप में या उनके बाल स्वरूप अपने आराध्य अपने आराध्य अपने आराध्य में जो हमें गुरु ने आराध्य का स्वरूप बताया जैसे हमारे आराध्य देव है नौ किशोरी नौ किशोर श्री प्रिया प्रीतम 16 वर्ष की अवस्था अद्भुत सौंदर्य अद्भुत माधुर्य दोनों जुगल सरकार का तो हम जैसे आपके तो आपके हृदय रूपी मंदिर में मेरे प्रिया प्रीतम विराजमान है।

हम सब जगह जैसे गोस्वामी जी कहते सियाराम मैं सब जग जानी वो सब में सियाराम को देख रहे हैं। ऐसे हम सब में श्यामा श्याम को देखते हैं। छिदछिद लक्षणम सर्वम राधा कृष्णमयं जगत चेतन अचेतन सब राधा कृष्ण में है। सब में राधा कृष्ण विराजमान तो उपासक जिस भाव से उपासना करता है उसको अपने उपास देव का वही दर्शन होता है। अब हम देखते हैं नौ किशोरी नव किशोर प्रिया प्रीतम उन्माद पैदा हो जाए। इतने सुंदर हैं हमारे प्रिया प्रीतम पागलपन चढ़ अब इसी के तो जी रहे हैं ना नहीं किसी से कोई मतलब नहीं तो उन्हीं के बल से हर कदम हम चल पाते हैं।

उनकी तरफ उन्हीं के कृपा बल से चल पाते हैं। तो हम अपने भावना में जब देखते हैं तो सब में श्यामा श्याम विराजमान है। नौ किशोरी नौ किशोर। अब जो बाल भाव का उपासक वो बाल भाव का देखेगा। जो जिस भाव का उपासक है वो अपने इष्ट देव को उसी रूप में देखेगा। महाराज जी जैसे लीला करते हुए भी दिखते हैं यहां बैठे हुए लीला करते हुए तो बहुत आगे की बात है। जब भगवत साक्षात्कार हो जाता है प्रेम में तन्मयता होती है तो भगवान जब कृपा करते हैं तो अपनी लीला में प्रवेश दे देते हैं।

अब वो प्रतिपल भगवान की लीलाओं का दर्शन करता रहता है। जैसे कोई पद आया बस उसी पद में डूब गया। उसी पद के अर्थ की लीला में चला गया। जैसे मनो आवत श्री वृषभानु दुलारी रूप रासी अति चतुर शिरोमणि अंग अंग सुकुमारी अब चल वृषभानु नंदनी पधार रहे उसके ध्यान में श्री श्यामा पधार रहे अंग अंग से सुकुमारता टपक रूप की राशि है चतुर शिरोमणि वो पूरा झांकी देख रहा है जो पद में लिखा हुआ है वही वो झांकी देख रहा है वो सिद्ध पुरुष होता है उसे लीला में प्रवेश माना जाता है जो लीला में प्रवेश पा गया है वो ऐसे वो एक एक क्षण भगवान की दिव्य रूप माधुरी दिव्य कभी देख रहा है प्रिया प्रीतम की हंसी लीला कभी जल विहार लीला कभी झूला लीला कभी बसंत लीला कभी वर्षा ऋतु की वो अलग-अलग लीलाओं के भगवान भगवान का रसाद अरे इसीलिए तो महान सुख है।

भक्ति में कोई साधारण सुख है। सब संसार के सुखों का त्याग करके जो भगवान के मार्ग में चलता है वही तो उस रस को प्राप्त कर पाता है। जी भाई जी और राधा बाबा के प्रसंग में आता है कि 18 घंटे समाधि लगा तो वो उस लीला के अंदर उसी लीला में डूबे हुए शरीर का कोई भान नहीं है। 18 18 घंटे हां हां हां बिल्कुल बिल्कुल उसी लीला में बिहारीन देव जी तो दतून करने के लिए बैठे हैं। तीन दिन दतून ही करते रहे। तीन दिन दतून ही करते रहे। तो उन्होंने बिहारी जी को गोस्वामी परिकल को दे दिया कि अब हमसे सेवा नहीं होने वाली।

तीन दिन हो गए पर्दे नहीं खोला। अब उनकी लीला में ही डूबे रहे। तीन दिन हो गए। तो ऐसे भगवान की लीलाएं जब चलती बाहरी आदमी थोड़ी कोई जान पाता है। अब वो बैठे हैं तो तुम्हें लगा कि बैठे हैं। एक बार श्री स्वामी हरिदास जी यमुना किनारे बैठे हुए थे। तो कोई धनी मानी पुरुष उस समय आज के 5 600 वर्ष पहले 1 लाख का इत्र लाया बिहारी जी के लिए ₹1 लाख की वो शीशी में बड़ी अब वो ध्यान में बैठे थे और वो जाके इत्र दे दिया पूरी शीशी खोली और ऐसे मारी बालू में ऐसे पूरी बिखेर दी उसको बड़ा दुख हुआ कि 1 लाख का इत्र लाए और ये बालू में फेंक दिए तो स्वामी जी ने धीरे से आंख खोली और कहा जाओ निधिवन राज में बिहारी जी के दर्शन करो आज्ञा मानकर निधिवन राज में जो ही घुसा तो उसी इत्र की खुशबू और जब वहां गया तो बिहारी जी

पूरे भी हुए थे इत्र में तब वो स्वामी जी के चरणों में आकर दंडवत किया कि स्वामी जी हमें क्षमा कीजिए हमें दोष दृष्टि हो गई थी कि आपने एक लाख का इत्र बालू में फेंक बोले तुम नहीं समझते उस समय होली लीला हो रही थी और संयोग से लाल जी पकड़ में आ गए थे और प्यारी जी के पास रंग खत्म हो गया था तो तुमने इत्र दिया हमने प्यारी जी को पकड़ा प्यारी जी ने पूरा इत्र बिहारी जी के ऊपर डाल दिया अब ये लीला चल रही और बाहर दिखाई दे रहा है कि इत्र जो है बालू में फेंक दिया गया तो सिद्ध संतों की जो बाहरी लीला होती है वो हमारी समझ में नहीं आएगी तो आंतरिक लीला की तो बात जाने दो लीला में प्रवेश बहुत कठिनता से होता है ऐसे सहज में नहीं हो जाता कि दो चार वर्ष माला घुमाए लीला प्रवेश हो गया यह ऐसे

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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