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भगवदानंद, ब्रह्मानंद, समाधि और लीला-प्रवेश की अनुभूतियाँ क्या हैं?

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पूज्य महाराज जी के श्रीमुख से युगल लीला का रस — ऊपर वीडियो में सुनें।

पूरा प्रवचन

गोपाल चंद्र जय श्री हर महाराज जी भगवतानंद अनुभूति लीला में प्रवेश अनुभूति समाधि की अनुभूति ब्रह्मानंद की अनुभूति क्या है और इसे क्या शब्दों में यह अलग-अलग मार्गों से है आप जो उच्चारण किए अष्टांग योग से समाधि का अनुभव होता है और वेदांत से आत्मस्वूप ब्रह्म बोध अनुभव होता है और श्री कृष्ण चरणानुरागियों के संग से शरणागति से वैष्णव जनों को भगवान के लीला रस का रसास्वादन होता है। भगवान की नित्य लीला में प्रवेश होता है। ये आपने अलग-अलग अष्टांग योग और सांख्य योग और भक्ति योग ये तीनों के अलग-अलग परिणामों को आपने वर्णन किया।

जो ब्रह्मानंद है वो वेदांत दर्शी मार्ग से प्राप्त होता है। जो समाधि है वो अष्टांग योग से प्राप्त होता है। और जो लीला प्रवेश है ये भक्ति योग से प्राप्त होता है। जो भक्ति योग के सिद्ध महापुरुष है उनके जब हम चरणों की दासता स्वीकार करते हैं और वो अपने हृदय का मार्ग देते हैं। तब हम श्री कृष्ण लीला आसक्त चित्त होकर के स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर तीनों शरीरों के राग का त्याग करके भाव देह से लीला में प्रवेश पाते हैं। इन देहों से नहीं। वो देह सच्चिदानंदमय होती है।

चिदानंदमय देह होती है। जो गुरु प्रसाद से जैसे गोपी भाव या सखा भाव या सहचरी भाव। तो जो गोपी है या जो सहचरी है जो भगवान का सखा है वो चिदानंद स्वरूप होकर श्री कृष्ण से मिलता है ना कि इन पार्थिव शरीरों से पंचभूतों की सामर्थ्य नहीं कि श्री कृष्ण का आलिंगन कर ले वो चिदानंदमय देह तुम्हारी विगत विकार जान अधिकारी महाराज जी अगर क्या ब्रह्म ज्ञान ना हो तो वो अगर वह व्यक्ति स्वयं को अहम ब्रह्मास्मि बोलना चाहे तो अहम ब्रह्मास्म का यह गलत है। प्रधानमंत्री कहने से कोई प्रधानमंत्री मान लेगा क्या?

पावर भी तो होना चाहिए ना। समझ रहे हो? तो भाई इसीलिए सद्गुरु की महिमा है कि पावरफुल सदगुरु देव का आश्रय ले और उनसे अनुसंधान करें। देखो एक बात तुम्हें बता दें। विश्व के जितने ब्रह्म ऋषि हैं ये सब मिलकर के भी चाहे तो श्री कृष्ण जो करना चाहते हैं उसके विपरीत नहीं हो सकता। श्री कृष्ण श्री कृष्ण है। हम ब्रह्मास भी कह के तरंग समुद्र में लीन हो जाती है। वो मान सकते हैं। लेकिन कोई श्री कृष्ण नहीं बन सकता। श्री कृष्ण अद्वितीय है। पर ब्रह्म है। अद्वतीय है। उनकी समानता कोई नहीं कर सकता।

हां अभेद भाव की एक भक्ति है वेदांत दर्शन उसके द्वारा पर श्री कृष्ण अगर कोई ब्रह्म ऋषि अपने मुख में अग्नि को रख सके तो बताओ मुंजा टवी में आग लगी भगवान श्री कृष्ण बाल गोविंद ने पूरी आंख को अपने मुंह में रख लिया अपने सखाओं से कहा आंख मूंद लो पूरी आग को पी गए कालिया का जहर भरा दह कूद करके उसका मर्दन करके रमणक द्वीप भेजा कुछ सात दिन सात सात रात सात वर्ष के गोपाल जी ने ऐसे गिरिराज धारण किया। कोई भगवान के जैसा नहीं हो सकता। भगवत भाव करके हम भगवान में लीन हो सकते हैं जैसे तरंग समुद्र में लीन हो गए।

लेकिन समुद्र से ऐसी करोड़ों तरंगे निकलती हैं। लेकिन तरंग से समुद्र नहीं निकल सकता। श्री कृष्ण के प्रताप से करोड़ों महापुरुष हो सकते हैं। लेकिन श्री कृष्ण श्री कृष्ण है। वो अद्वती है। उनके जैसा कोई है नहीं। प्रकृति का परिवर्तन कर सकते हो। हमारे श्री कृष्ण ने जो विधान प्रकृति का रच दिया उसी के अंतर्गत आपको सहना पड़ेगा। हां यह भाव है। इस भाव के द्वारा अभेद श्री कृष्णात्मक अभेद एकत्व में श्री कृष्ण में लीन हो गए क्योंकि वही परबह्म की स्थापना है। वो बात गुरुजनों से सीखे जाके जो जिस मार्ग का अनुयाई है उस मार्ग में चले।

भगवान ने सांख्य योग, अष्टांग योग, कर्म योग, भक्ति योग इनकी स्थापना इसीलिए की है कि अलग-अलग भाव वाले लोग अलग-अलग भाव से उपासना करके उन्हीं भगवान श्री कृष्ण को प्राप्त होते हैं। ज्ञानी लोग जिन्हें ब्रह्म कहते हैं। योगी जिन्हें परमात्मा कहते हैं। भक्त जिन्हें भगवान कहते हैं। प्रेमी जिन्हें अपना लाडला कहते हैं। वो वही है। दूसरा कोई नहीं। तत्व एक एक ब्रह्म द्वितीय नास्ते वही है पर ऐसे हम शुरू कर दे कि अहम ब्रह्मास्म तो ऐसे नहीं गुरु के चरण शास्त्रीय आदेश है महापुरुषों की शरण में जाए उनसे ज्ञान योग का मार्ग सीखे और फिर उसके अनुसार चले और भगवान कृपा करें तो वो सिद्धि को प्राप्त हो जो निर्विघ्न मार्ग निर्वाह कर लिया जाए वो केवल परम पद प्राप्त कर लेता है और श्री कृष्ण की सेवा मात्र में इतना सुख कि दमान ग्रहण विना मत सेवन जना ये बड़े-बड़े मोक्ष कैवल्य आदि देने पर भी भक्त स्वीकार नहीं करता।

भगवान की चरण दासता में वो सुख है। तो हमें लगता है कलयुग है अहम ब्रह्मास्म तो सिद्ध होना बड़ा कठिन है। हमें लगता है कि अगर श्री कृष्ण दासत्व ले लिया जाए प्रिया जी का दासत्व ले लिया जाए तो पार हो जाएंगे। क्योंकि करो सदा तिनके रखवारी जिन बालक राखे महतारी इसमें भगवान रक्षा करते हैं और ज्ञान में स्वयं आप ब्रह्म है तो जो ज्ञानन कर चित अपर बरियाई विमोह बस करे माया इतनी विचित्र है इतनी प्रचंड है कि शिव विरंचिका मोह को है बुराण तो हमें लगता है बच्चा कृष्ण कृष्ण कहो राधा राधा कहो प्रभु की दासता में रहो प्रभु की कथा सुनो प्रभु का चिंतन करो प्रभु के भक्तों की शरण में रहो तो हमें लगता पार हो जाओगे माया से ब्रह्म चिंतन बहुत कठिन हो गया है ऐसा नहीं वो मार्ग है मानते मार्ग है लेकिन बहुत कठिन है बच्चा जो निर्विघ्न पंथ निर्वाही सो कैवल्य परम पद लाई यहां हम छोटी छोटी चीजों में तो आसक्त हो जाते हैं संपूर्ण चराचर जगत से वैराग्य होना लोक परलोक से अपने शरीरों से वैराग्य होना शरीरों से वैराग्य होना शरीरों से तीन शरीर है स्थूल सूक्ष्म काल तीनों शरीरों से वैराग्य होना।

तब आत्म स्वरूप का बोध गुरु कृपा से होना। ये बड़ा कठिन मार्ग है। हमें लगता है अगर राधा राधा कृष्ण कृष्ण कहे तो अभी प्राण निकल जाए तो अभी परम पद मिल जाएगा। अजामिल ने पुत्र के बहाने से नारायण बुलाया तो उसे परम पद मिल गया। जीवन भर गलत आचरणों में रहा लेकिन अंतिम समय नारायण भगवान का मंगलमय नाम निकल गया। तो हमें लगता है कि कलयुग में नाम महाराज की जय है। इसलिए नाम को पकड़ लो तो मंगल हो जाएगा। हरि नाम हरि नाम हरि नाम केवलम कल नास्ते नास्ते नास्ते गत अनता तो चाहे राधा बोलो शिव बोलो राम बोलो हमारी दृष्टि में सब एक ही है वही हरि है उन्हीं के विविध नाम है जो नाम प्रिय लगे खूब जपो मंगल हो जाएगा का है।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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