Indresh जी ने सुनाई विवाह से पूर्व गिरधर लाल जी की लीला और महाराज जी द्वारा सुंदर चर्चा
पूज्य महाराज जी के श्रीमुख से युगल लीला का रस — ऊपर वीडियो में सुनें।
पूरा प्रवचन
हां महाराज जी धन्यवाद जय जय श्री राधे जय जय श्री राधे अब राधा गिरधर हो गए जी महाराज सब परिकर को महाराज जी आ के वहां सुख प्रदान कर गए मैंने एक बार महाराज जी को हां राधा के लाल राधा तीनों लोग जी की लाल जी तो महाराज जी श्री जी सहित ही हैं। तो पूरी जो ब्यावला की जो पूरी प्रक्रिया भाई वो घर के हमारे सेवा श्री राधा माधव प्रभु हैं। पिताजी महाराज के गुरुदेव के सेवा के ठाकुर जी तो उनकी पूरी जो व्यवस्था थी तो जयमाल की फेरान की हल्दी की मेहंदी की रंग महल की वो सब सेहरा हां किसके बंध वो उनहीं के बंधो अच्छा युगल हां युगल ठाकुर जी मध्य में विराज थे प्रक्रिया युगल की हां पूर्ण इनहीं में चित्त जोड़ना है बसित को सबसे ज्यादा ठाकुर जी को जो पसंद है वह अपनापन पसंद है।
प्रियता भजन क्रिया उसका फल है। तपस्या उसका फल है। सब अलग-अलग है। लेकिन एक अपनापन अब महान भक्तों में देखा गया। बड़े भक्तों में देखा गया। प्रियता मेरे ठाकुर बस वो जहां भावता उठा वो ठाकुर जी तक पहुंच गया और वही ठाकुर जी को आकर्षित करता है भावोत्सवेन भजताम रस कामधेनु तम राधिका चरण रेणु महाम्मरामि जो हमारा भाव उत्सव उठता है जैसे मेरे गिरधर का ब्याह हो रहा है ये जो भाव उत्सव उठ रहा है इसी में प्रेम छुपा हुआ है इसी में आसक्ति छुपी हुई है मेरे ठाकुर का हो रहा है तो इस आसक्ति से भगवान का जो हम कृपा प्रसाद प्राप्त कर सकते हैं वह किसी साधना से नहीं।
इसीलिए ऐसे भक्तों को रसिक संज्ञा दी गई जो साधना क्रिया तपस्या क्रिया आदि आदि से बिल्कुल दूर है। रसिक तब पहचानिए जाके यह रस रीति छिन छिन ही में उपजे लाल लाडली प्रीति प्रतक्षण वर्धमान नवीन नवीन प्रेम जैसे हमारे प्यारी जी और प्यारे जी का सब कुछ नया ही रहता है। प्रतिपल नए रहते हैं। इसीलिए नवल किशोरी और नवल किशोर है नयो नेह नव रंग नयो रस नवल श्याम वृषभान किशोरी नौ पीतांबर नवल चुनरी नई नई बूंदन भजत गोरी नव वृंदावन हरित मनोहर नव चातक बोलत मोर मोरी नव मुरली जो मल्हार नई गति श्रवण सुनत आए घनघोरी नव भूषण नव मुकुट विराजत नई नई उरप लेत थोरी थोरी जय श्री हरिवंश आशीष देत मुख चिर जीव भूतल हजोरी अपने नवीन युगल सरकार का नवीन वृंदावन नवीन वैभव देखकर हित सजनी जीव के हृदय में आनंद नहीं फुला इतना आनंद समा नहीं रहा है इतना आनंद कि वो आशीष दे रहे चिर जीवो भूतल हजरी अपनापन अपनापन उसी बात को प्रमाणित करने के लिए अपने जनों के लिए कह रहे रहो को काू मनह दिए मेरे मेरे प्राणनाथ श्री श्यामा शपथ करो तण छिए रहो को काहु मन दिए जो श्यामा जी के चरणों की प्रियता है उससे लाल जो बिक जाते हैं और जो लालू के चरणों की प्रियता है इससे श्यामा जी का कृपा प्रसाद प्राप्त होता है लाल रंगीलो गाइए ताते प्रीत रंगीली पाइए और ललित रंगीली गाइए ताते प्रेम रंग रस पाइए तो प्रीतम और प्यारी ये दो हमारे नेत्र हैं।
इनमें कौन प्रिय है कहा नहीं जा सकता क्योंकि दो देखने में दृष्टि एक है। ऐसे ही हमारे प्यारी जो प्यारी जो एक है श्री हरिवंश सुरीत सुनाऊं श्यामा श्याम एक संग गाऊं छिनिक कबहु ना अंतर होई प्राण सु एक देह है दोई राधा संग बिना नहीं श्याम श्याम बिना नहीं राधा ये रह ही नहीं सकते रह ही नहीं सकते ये एक ही संग है अगर वो श्री कृष्ण बपू में केवल दिखाई दे रहे तो प्रियाजू विराजमान है अगर प्रियाजू दिखाई दे तो लालजू विराजमान है ये रह ना सकत एक पल के लिए भी अंतर अंतर में नहीं रह सकते।
यह एक ही है। तो वो बड़ी कृपा होती है जब हमारे हृदय में इनके सुख की चाह प्रकट होती है। इनसे अपने सुख की चाह करने वाले तो लाखों भक्त हैं जो धन्यवाद के पात्र हैं। लेकिन इनके सुख की चाह यह बहुत बड़ी बात है। और ये अपनेपन में होती है। अपने लाल जी को आज ये हार पहनाना अपने लाल जी को पोशाक आज लाल जी को ये भोग पवाना है। प्यारी जी के बस यही भाव मगन रहे ना तो इस सीधे श्री जी की सेवा प्राप्त होती है। सीधे लाल जी की सेवा प्राप्त होती है। सेवा प्राप्त होना कठिन है।
कल्याण हो जाना, मोक्ष हो जाना ये तो सब प्रभु देते रहते हैं। अपने श्री अंग की सेवा उसी को देते हैं जो बिल्कुल अपनापन। मतलब प्राणों से भी अपनापन नहीं। प्राणों से भी उतना अपनापन नहीं। अगर मांगे जाए तो एक क्षण में प्राण दे दे। हां लेकिन वो हमारे प्राणनाथ हैं। हमारे प्राणों के प्राण हैं। इतना प्यार हो जाए। प्रभु से प्यार होना कठिन बात है। प्रभु से प्यार हो जाए। वो प्यार के लिए ही ये अर्चा विग्रह रूप धारण किए हुए नहीं तो हम कैसे प्यार कर पावे? क्योंकि अव्यक्त हैं।
तो अर्चा विग्रह में इतनी आसक्ति हो जाए हमारी कि उठते बैठते चलते इस समय लालजू हमारे क्या पाएंगे? इस समय लालजू को हमें क्या पहनाना है। इस समय लाल वो अंदर चलता रहे। कहीं भी जा रहे हैं कोई भी अच्छी चीज देखिए। ये लाल जी के लिए ठीक रहेगी। ये हमारा हमारा चिंतन उनके प्रति बन जाए। बस ये खास बात है। प्रियता हो जाए अपनापन हो जाए। बहुत कृपा है। बहुत कृपा है श्री जी की आपके ऊपर कृपा पात्र तो है ही। खूब निरंतर बस ऐसे रति करते रहिए और भगवान की चर्चा गान करते हुए कभी कोई आशा मत रखें।
जो प्रभु दे दे जैसे प्रभु रखें। बस भगवान की चर्चा भगवान की प्रसन्नता के लिए गाइए तो यह जीवन प्रेममय हो जाएगा। श्री पूज्य रामचंद्र डोंगरे जी केवल भगवान की चर्चा भगवान के लिए अपने लाल जी को सामने रखते तो आंसुओं की माला पहनाते रहते थे। अश्रु चलता रहता भगवान की चर्चा जीवन धन्य यही है। अर्थ तो कितना लोगों के बैंकों में जमा है, कितना घरों में जमा है, उसका कोई महत्व नहीं। अर्थ कोई महत्व नहीं रखता। भगवान के सामने अर्थ कोई महत्व नहीं रखता। आज भगवान की कथा को गड और अर्थ को मुख्य माना जाता है।
नहीं भगवान की कथा को मुख्य अर्थ तो गौड वस्तु है तो पीछे आपके दास की तरह डोलेगी। जो वैभव ऐश्वर्य है वो तो दास है। भगवान के चरणों की सेवा में जब आप हो तो आपकी सेवा में लगे रहेगा। तो अर्थ की प्रधानता न रखते हुए भगवान की अद्भुत महिमा का गान करते हुए स्वयं उसमें प्रफुल्लित होते हुए हमारा जीवन व्यतीत हो। यही गिरधर लाल से प्रार्थना है कि उन्हीं में आसक्ति हो। उन्हीं का चिंतन हो। उन्हीं का गान हो और उन्हीं में हमारा शयन हो जाए। जो आखिरी चिर शयन है वो उन्हीं के चिंतन में हो जाए।
तो हमारा जीवन सार्थक हो गया। क्या सेवा करें आपकी? नहीं महाराज जी बस बाबा से बात हुई। मैं तो बहुत दिन से तड़प रहा हूं। मैंने कि महाराज जी के दर्शन करने हैं हमको। तो बस अभी कथा के लिए निकल रहा हूं। अब लाल जी अब राधा गिरधर लाल जी आवेंगे। पहले तो गिरधर लाल जी पधारे थे। तो जब लाल जी आवेंगे तो अब हम भी चतुर्भुज हो गए तो आपका ब्याह हो गया महाराज। हां नहीं नहीं ठीक है ठीक है जी कि महाराज जी हर वर्ष हम पर्ची डालें ठाकुर जी के आगे जी कि अगला उत्सव कहां कराएंगे जी तो चार स्थानों के नाम रखते हैं जी तो गत वर्ष नाथद्वारा में था जी तो भाव था कि गोवर्धन वृंदावन बरसानो या फिर एक बाहर को स्थान रखो कहीं तो मन में भाव आयो कि अगर बरसाने की पर्ची आ जी तो ठाकुर जी के आगे डाले जो सबसे समीप जावे वो को माने कि ये ठाकुर जी आज्ञा कर मैंने कहा अगर बरसानो आयो तो समझ जाएंगे कि ठाकुर जी को ब्याला होना जी तो
नाथद्वारा में जब पर्ची डाली तो जो सबसे समीप गई तो उठाई तो श्री बरसाना धाम तो ठाकुर जी बोले ब्याह होएगो लेकिन महाराज जी बीच वर्ष में ही ठाकुर जी बोले कि पहले ब्याह मेरो होएगो मतलब मेरो ब्याह करवे से पहले तू एक सेवा लिया अकेलो मेरो ब्याह करेगो तो फिर कैसे अकेलो संभालेगो तो बीच में योजना ऐसी बनाई कि पहले दास को हैगो और एक महीना में ठाकुर जी को लेकिन महाराज जी जितनो मन में उमंग और आनंद और उत्साह ठाकुर जी के ब्याहला को भयो जी कैसे भी ठाकुर जी को ब्याह
हो मधुर हो आनंदमय हो तो एक बार और मैं लाल जी के सहित जी कृपा कीजिएगा दर्शन करेंगे जरूर तब आऊंगा और बाकी संग में भी लाऊंगा परिवार को तो सहित दर्शन कर आऊंगा एक चुनरी दे दो सखी को दे देंगे चुनरी आपको स्वास्थ्य अनुकूल है महाराज जी बस ये है कि श्री जी की कृपा से चल रहा है बस चल रहा है और बस लाडली जो सब संतों की कृपा है तो बहुत सुंदर चल रहा है हमें भगवत चर्चा करने को मिलती है। हमारी दिनचर्या चल रही पर इतनी बड़ी कृपा दिनचर्या चल रही सब तो हम राजी हैं। जितना कष्ट मिले उस पे कोई परेशानी नहीं।
दिनचर्या हमारे लिए बहुत माननीय है। जो जिसमें अब स्वयं की दिनचर्या और समाज की दिनचर्या दोनों का पालन हो रहा है। जो अपनी दिनचर्या साधना की वो चला रहे और जो भगवत सेवा समाज की है वो चल रही। इसलिए मन में उत्साह बना रहता है और आप सब का आशीर्वाद चलता ही रहेगा जब तक जीवन है। महाराज जी आप असंख्य वैष्णव और ब्रजवासिन के प्राण हैं। जी और श्री जी है सके महाराज जी कि हम सबन के ही कोई अपराध रहते होंगे ऐसे। नहीं नहीं नहीं इनके अपराधन को श्री जी सोचे कि ये तो बालक हैं।
यह कहां सहन कर पाएंगे? तो संभवत आपको सहन करने को पड़े पर श्री जी ऐसे अनुग्रह करें कि आप बिल्कुल स्वस्थ रह जाए। कोई आपको मन से बहुत स्वस्थ है। श्री जी की बहुत कृपा है। मन से बहुत स्वस्थ है। हर समय आनंद मतलब उनकी चरण रज का बना रहता है। इसलिए तन का प्रभाव नहीं पड़ता। नहीं तन का प्रभाव अगर पड़ जाए तो सैया से उठने लायक नहीं है। मन बहुत आनंदित रहता है। बस इसी से सब चलता रहता है। मन आनंदित है तो हर स्थिति में आनंद बना रहता है। चाहे जैसे शरीर की परिस्थिति हो वो मन तैयार रहता है।
अगर मन कहीं बीमार हो जाए तो गड़बड़ हो जाए। फिर ये मन आनंदित रहना चाहिए। दोबारा मुंह दिखाई में फिर देना। हा
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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