संतों की 6 अलौकिक लीलाएं
पूज्य महाराज जी के श्रीमुख से युगल लीला का रस — ऊपर वीडियो में सुनें।
पूरा प्रवचन
बहुत जन्मों की साधना के बाद यह अनुभव होता है कि एक भगवान ही सब रूपों में विराजमान है। मेरी आत्मा ही सब रूपों में विराजमान है। जो ऊंचे दर्जे के तत्वज्ञ ज्ञानी जीवन मुक्त महापुरुष होते हैं। वह अभिन्न भाव से देखते हैं। अभिन्न भाव से अखंड भाव से मेरी ही आत्मा है। वह अपने स्वरूप में रहते हैं। अगर हम आपको अपनी आत्मा ना मानते हो तो आपको हमसे प्यार ना हो। हम प्यार करते हैं तो आप हमसे प्यार करते हैं। हम प्यार ना करें तो आप हमसे प्यार कर ही नहीं सकते। श्री जी हमसे प्यार करती है इसलिए हम श्री जी से प्यार करते हैं।
श्री जी प्यार ना करें तो हम श्री जी से प्यार कर ही नहीं सकते। हमारी क्षमता ही नहीं है। जो जीवन मुक्त तत्व इसीलिए लिखा महा संग दुर्लभ हो दुर्लभ के बाद फिर लिखा है अगम्यो अगम्य माने निर्वाह करना कठिन है। अब उसी निर्वाह करने में अपनेपन का इतना हमारा बढ़ा हुआ स्वरूप होना चाहिए कि उनकी हर चेष्टा हमें आनंद देनी चाहिए। चेष्टा में दोष दर्शन या दुख नहीं होना चाहिए। कई बार हमने संदीपनी जी का चरित्र सुनाया कि उनको गुरुदेव ने फूंका मूता मारा पीटा सब लेकिन वो गुरुदेव के प्रति कभी दोष दर्शन नहीं किए और गुरुदेव की सेवा में लगे रहे।
उसका परिणाम यह हुआ कि और सब विद्यार्थी भाग गए। सबकी क्षमता तो एक जैसी होती नहीं तो और विद्यार्थी सब भाग गए। संदीपनी जी से पूछा तुम क्यों नहीं भागे कहा गुरुदेव आपको भिक्षा कौन पढ़ाता है स्नान कौन कराता आपकी सेवा को तो क्या तुम्हारे ऊपर हमने विरुद्ध बर्ताव किया तो कहा गुरुदेव ये तो सब आपका है ये जीवन आपका है विरुद्ध बर्ताव क्या किसे कहते हैं आप जो करें जैसे करें ये सब आप तो उनका कहा बेटा मैं तो अपने भजन के प्रभाव से परमधाम जा रहा हूं लेकिन लेकिन परमधाम वैुंठाधिपति सर्व लोकाधिपति भगवान स्वयं तुम्हारे शिष्य बनेंगे आके तो वही संदीपनी जो गुरु बने और भगवान द्वारिकाधीश उनके शिष्य बने ऊंचे दर्जे के जो तत्वज्ञ जीवन मुक्त महापुरुष होते हैं वे अभिन्न भाव से अखंड भाव से भगवान में स्थित होकर सबको अभिन्न देखते देखते है सबको अपना उनके जीवन से उनके दर्शन से उनके चिंतन से उनके शरीर से स्पर्श की हुई वायु ही जीव का परम कल्याण कर देती है।
जिनसे स्पर्श हो गया, जिनका दर्शन हो गया, जिनको संभाषण करने को हो गया, उस जीव का कल्याण हो जाएगा जो ऐसे महापुरुषों से [नाक से की जाने वाली आवाज़] बस दोष दृष्टि नहीं होनी चाहिए। जब हम भगवत मार्ग में चलते हैं और जहां जुड़ते हैं तो उस कनेक्शन को काटने के लिए माया आदमी लगाती है। वो आपके कान में आपको बात बता केवल गुरु भाव की दृष्टि में आपका कनेक्शन कट जाए जिससे आपकी दुर्गति हो जाए। वह तो खुद दुर्गति में जाने के लिए तैयार है। लेकिन हजारों सैकड़ों दशों जहां तक उसकी पहुंच होगी।
वो उस दुर्गति में ले जाने के लिए उनको काटेगा। अगम्य इसीलिए अगम्य लिखा है कि निर्वाह करना कठिन है। अमोगस यदि आपकी श्रद्धा परिपक्व बनी रही तो आप भगवत प्राप्ति निश्चित हो जाएगी। भगवान और भगवान में स्थित महात्मा में कोई अंतर नहीं होता। जगत के लोग संपूर्ण गुणों में पानी फेरकर किसी एक दोष की आभास मात्र को पहाड़ बना देते हैं। उसी में जो अज्ञानी और दुर्गति को प्राप्त होने वाले होते हैं उस पहाड़ में ढक जाते हैं। और जो सद्ञानी और भगवत प्राप्त होने वाले होते हैं वो अपने गुरु से ऐसे प्यार करते हैं जैसे माता से प्यार करते हैं।
मां बहुत कड़वी बोलने वाली है। मां तो मां है। मां बहुत बुरी है तो भी मेरी मां है। मां अच्छी है तो भी मेरी मां है। जैसे मेरी मां ऐसे मेरे गुरुदेव मेरे गुरुदेव मेरे परम ब्रह्म है। तुम यही नहीं जान पा रहे हो। मेरे हो। तुम अपने को अलग मान के मेरे को अलग मान के देख रहे हो। इसीलिए बस परमार्थ का स्वरूप खंडित हो रहा है। तुम हमारी आत्मा हो। जिन जिन को दोष दर्शन जहां जहां भी संतों पर हुए उन्होंने ना तो अपने आप को उनका माना ना अपने तन को माना ना अपने धन को माना केवल बाहरी मान्यता को दिखाकर के मैं इनका हूं।
आंतरिक मान्यता अगर होती तो इनका मैं हूं और मेरा सब कुछ इनका है। अब दूसरे कोटि के महात्मा पहले उच्च कोटि के महात्मा का स्वरूप वर्णन वासुदेवा वो अपने स्वरूप में अपनी आत्मा में रमण करते हैं। वो कभी बाहर नहीं होती। आत्म स्वरूप से उनकी चेष्टाएं कुछ भी हो स्थिति वासुदेवा सर्व में रहती है। अक्रूर जी से मंतक मणि लेकर भगवान से अलग हो गए तो क्या भगवत भाव उनका कम हो गया क्या? भगवान में तो स्थित ही रहना। उसी तरह भगवान में स्थित रहे। जिस तरह भगवान में मथुरा से वृंदावन आते समय एक बार स्थिति आ जाती तो क्या स्थिति हट जाती है?
क्या अंधकार थोड़ी छा जाता है? व्यवहार की चेष्टाओं से अध्यात्म में अंधकार का प्रवेश नहीं होता। अध्यात्म अपनी स्थिति में रहता है। अध्यात्म वह सूर्य है जिसमें कभी अस्त शब्द नहीं आया है। वो प्रकाशित रहता है। अब दूसरे जो महात्मा हैं जो मनुष्य उन महापुरुष की महिमा को नहीं जानते तो वो महात्मा जन पहले महात्मा है कि तुम मानो या उनको महात्मा ना मानो। दोष दर्शन करो या गुण दर्शन करो उनको तुमसे कोई लेना देना नहीं अपनी आत्मा में रमण करते हैं उनको जैसा व्यवहार जैसा दूसरे हैं कि जो उन महापुरुषों की महिमा को नहीं जानते उनके लिए वो अपनी स्थिति से नीचे उतरते हैं।
अपने भावों से नीचे उतरते हैं। फिर वो उनको उपदेश देते हैं। कह देते हैं। देखो तुम्हें ऐसा करना चाहिए। तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। तुम ऐसे चलो, तुम ऐसे चलो, तुम्हारा ऐसे आचरणों से चलो। वो अपनी स्थिति से उतर के बोल रहे हैं। मतलब हम पर विशेष कृपा कर रहे हैं। भगवत कृपा से जो उनके वचनों को उनके आदेशों को मान लेता है वो लाभ ले पाता नहीं तो अगम्यों तीसरे जब वो देखते हैं कि उपदेश से भी काम नहीं बन रहा। तब उससे भी नीचे उतरते हैं। पहली स्थिति से उपदेश नीची स्थिति है।
नीचे उतरे उपदेश कह दिया आज्ञा उपदेश किया। फिर तीसरी स्थिति में उससे भी नीचे और फिर वो स्पेशल आज्ञा देते हैं। आप ऐसा करो। उपदेश सार्वजनिक और आज्ञा पर्सनल होती है। आप हमारे लिए ऐसा करो। आप हमारी आज्ञा का ऐसा पालन करो हमारे लिए आप ऐसा करो आप ऐसा करो तो वह उसमें प्रसन्न होकर जब लगे तो वो वही पहुंच गए क्योंकि परम तत्व भगवान ही गुरु रूप में है तुम्हारी श्रद्धा या श्रद्धा से तुम्हारे अंदर फर्क पड़ेगा वहां थोड़ी कोई फर्क पड़ेगा हम कहते हैं आंख मूंद लिया राधा के कुंज नहीं है तो आपने आंख मूंद लिया तो आपकी दृष्टि में नहीं राधा के कुंज तो है ही तो गुरु साक्षात परम ब्रह्म वो तो है ही बोले हम नहीं मानते हां तो दुर्गति का मार्ग है दुर्गति का मार्ग वो प्रशस्त हो रहा है वो तो है ही परम ब्रह्म उसको तुम कैसे तुम [गला साफ़ करने की आवाज़] आंख मूंद लो तो क्या महल खड़ा है वो हट थोड़ी जाएगा शास्त्र परम ब्रह्म परमात्मा तत्व ही हमारे गुरुदेव अब तीसरी स्थिति में वो आज्ञा करते हैं ऐसा करो जो उनकी आज्ञा का पालन कर गया।
वो भगवत स्वरूप को प्राप्त हो गया। चौथी स्थिति में वो उसके साथ विधान रचते हैं। ऐसा विधान रचते हैं जैसे साधारण से साधारण स्थिति में आकर के साथ में रसोई मन करवाना। उड़िया बाबा को एक माई आई। बोला बाबा हमारे यहां भोजन पालो तो सबने दबकाया उसको महाराज जी आप क्या पाने जाएंगे महाराज जी ने दृष्टि डाली और एक को बुलाया पूछा इसका घर जानते हो बोले हां कमंडल उठाया थोड़ी देर बाद और कहां है सोच लगी है तो अरहर के खेत में पहले ऐसे जाना होता था तो अरहर के खेत में गए और जो शिष्य साथी बोले यही खड़े रहो जब तक सोच हो के ना आवे घुसे खेत से उधर गए गांव वाले उससे पूछा उसका घर कहां है वहां गए वहां गए तो बोले जल्दी ला रोटी।
बोले महाराज तैयारी तो कुछ है नहीं। बोले आटा हम लगा रहे हैं जल्दी तू चूल्हा जला और जब वो गए तो बाबा मसाला पीस रहे थे। वो लोग भी पता लगा के कि इतनी देर सोच में नहीं लगती। जरूर बाबा आ गए। मसाला पीस रहे थे। चौथी स्थिति में महापुरुष उतर के स्वयं वैसे आचरण करने लगते हैं। उनको अपनाने के लिए उनको अपना बनाने के लिए उनकी चित्त वृत्ति का अपहरण करने के लिए उनके मन का अपहरण करने के लिए। पांचवी स्थिति में वे इससे और नीचे उतर जाते हैं और एकदम उनके जैसे होकर के व्यवहार करने लगते हैं।
अज्ञानी पुरुष जैसा व्यवहार करने लगते हैं और उनको अपना संग देकर अपने रंग में धीरेधीरे रंगते हुए वो उठाकर वहीं पहुंचा देते हैं जहां उनकी स्थिति थी। इसलिए संतों की आज्ञा में, [गला साफ़ करने की आवाज़] संतों के सिद्धांत में, संतों के विचार में केवल आपके प्रति कल्याण की भावना भरी हुई है। आपके प्रति केवल मंगल की भावना भरी हुई है। उनकी आज्ञा पालन के बिना उनके सिद्धांत का पालन करने वालों का कल्याण जो उनके सिद्धांत का पालन नहीं कर उनकी आज्ञा का पालन नहीं कर सकते।
कैसे हो सकता है? महात्मा आज्ञा के रूप में जो कुछ कह दे उसमें एक विलक्षण शक्ति होती है। अगर आप दोष दर्शन उस बात पर ना करें जो आज्ञा कर रहे हैं। अब बड़ा विचित्र खेल है। श्रद्धालुओं का एक खेल है। चधर चिदरानी जी के प्रसंग में आता है जब चिदरानी जी ने अपना लहंगा बेच के एक वस्त्र ही पहने थी और सीता से चरी पीपा जी का स्वागत किया जब यह बात सीता से चरी पीपा जी को पता चली तो आप पढ़ के देख लो जो सुने होंगे और जानते होंगे उन्होंने कहा तुम नाचने वाली बनो तो उस पैसे से चर चिदानी जी की सेवा करेंगे एक जगह तो सीता सेचरी जी को सजाकर पीपा जी ले ही गए जब पहले संत सेवा की बात आई और ले गए थे कि नहीं ये जब हमारा भाव पक्का होता है कि मेरे गुरुदेव या वो तो संत सेवा के लिए गुरुदेव एक विलक्षण शक्ति होती है संतों के आज्ञा में उनके आचरण में उनके व्यवहार में यदि दोष दर्शन न किया जाए तो वही विलक्षण शक्ति कल्याण कर देती है वह उसको परम पद प्रदान कर देती है।
आप सोचो 10 पांच दिन कोई शरणागत हो 10 पांच दिन क्या हमें लगता है एक ही दो दिन हुए होंगे शरणागत हुए सुग्रीव जी को जब बाली ने कहा मुझे क्यों मारा तो भगवान ने कहा तुम जानते हो मेरा शरणागत है मेरा शरणागत है और तुम इसे मारना चाहते हो तो जो शरणागत का मित्र वो मेरा मित्र जो शरणागत का शत्रु मेरा शत्रु तो जब अपने लोग शरणागत है तो अपने अनाथ तो है नहीं कि जैसा चाहे वैसा करें। क्यों? परमात्मा भगवान सच्चिदानंदमय श्री जी रसमय श्री जी वो हमारी स्वामिनी है। वैसा जो प्यारो करे सोई भावे कब लाओगे कब लाओगे?
सुन सुन के कान गंदे मन गंदे तो पहुंचो गंदगी में और सुन सुन के कान पवित्र मन पवित्र मेरे परम ब्रह्म परमात्मा कब देखोगे प्रतिकूलता करे तब परबह्म परमात्मा देखो ऐसे तो परम ब्रह्म परमात्मा है ही प्रतिकूल आचरण करें और फिर पर ब्रह्म परमात्मा देखो तब तो बात समझ में आ जाएगी आज्ञा पालन करने वाला बिना परिश्रम के परम पद पर स्वाभाविक आरूढ़ हो जाता है जो संतों की आज्ञा का पालन करता है। छठव अब वो महापुरुष का छठा स्थिति का वर्णन कर रहे हैं। जो उनकी आज्ञा का पालन नहीं करते नीच दर्जे के साधक हैं।
उनको कहीं-क वो उनका कल्याण करने के लिए दो बातों का प्रयोग कर देते हैं। साफ [नाक से की जाने वाली आवाज़] या वरदान। देखा कि आचरण तो अनुकूल करने की चेष्टा करता है पर कर नहीं पाता है तो वरदान दे जाओ भगवान तुम्हें सामर्थ्य प्रदान करें तुम आगे बढ़ो और देखा है खुला विरोध करता है तो श्राप दे दिया जा तो ऐसे दंड को प्राप्त हो तो उससे उसका मार्जन होकर वो पवित्र हो गया जैसे यमलार्जुन को श्राप दे दिया जा तो जड़ वृक्ष की योनि को प्राप्त हो तो उनका उस साप से मार्जन हुआ और वो नंदालय के यमलार्जुन बने ने और भगवान श्री कृष्ण का साक्षात्कार हुआ।
मुनि का क्रोध मुक्ति दातार संतो का क्रोध भी मुक्ति को प्रदान करने वाला होता है। अच्छा इसमें यह नहीं होता कि आज ही आपको दंड मिल जाएगा। नहीं समय समय से हर चीज फलीभूत होती है। समय से फलीभूत होती है। इस परंपरा में छह संतों की स्थितियों का वर्णन हुआ। पहला अपने अखंड स्वरूप में स्थित। दूसरा अपनी महिमा को जलाने के लिए अपने भावों से नीचे उतरते हैं। तीसरा नीचे उतर के वह उपदेश देते हैं। चौथा वो आज्ञा देते हैं। पांचवा वो आचरण करते हैं और छठवा फिर वो शासन करते हैं।
साप या दंड के द्वारा पवित्र करते हैं। इस परंपरा से जब हम देखते हैं तो इन छहों में भगवत स्वरूप की स्थिति में कोई अंतर नहीं पड़ता। वो अपने स्वरूप बोध की स्थिति में रहकर के छ आचरण करते हैं। अपने निज स्वरूप में स्थित रहते हैं। जो कुछ नहीं करते वो निरंतर स्वरूप में स्थित रहते हैं। वो बहुत ऊंचे दर्जे के महापुरुष हैं। पड़े हैं अजगर की तरह। कुछ ना बोलना ना उपदेश करना ना किसी से कोई संबंध रखना जो कुछ इनसे उतर कर कृपा करते हैं वो शास्त्रों में ऐसा संत महात्माओं ने कहा इस तरह का संकेत करने लगते हैं और तीसरे संत महात्माओं की आज्ञा का पालन करना चाहिए ऐसा कह कर के वो आज्ञा देने लगते हैं।
चौथे ऐसा करना चाहिए और ऐसा नहीं करना चाहिए। पूरा विधान बताने लगते हैं। पांचवे तुमको ऐसा करना ही होगा। ऐसा कह करके उनको सत मार्ग में लगा। छठवा सात साप या वरदान आदि के द्वारा पवित्र करके उनको लगाना। इन सब दर्जों में वो महापुरुष अपने भाव से नीचे उतरते हैं ना कि उनके महापुरुषों में कोई कमी होती है। वो अपने भाव से नीचे उतर जैसे गिरा हुआ पुरुष पड़ा है तो वैसे ही गिरने का नाटक करके उठा के उसको ऊपर पर दोष दर्शन हुआ तो आप नष्ट हो जाओगे। फिर नहीं चढ़ पाओगे।
अगर दोष दर्शन नहीं हुआ आपको लगा कि ये हमारे गिरने की स्थिति में हमको उठाने के लिए झुके हैं ना कि ये स्वयं गिरे हैं। ये हमें उठाने के लिए झुके हैं। इसमें सबसे बड़ी दयालुता संतों की होती है जो हमको आज्ञा करते हैं। हमें उपदेश देते हैं। हमें अपना मानते हैं। ऐसा करो। ऐसा ना करो। हमें ताड़ना देते हैं। हमें दंड देते हैं। उन संतों का दर्जा यद्यपि नीचे की तरफ कहा जाएगा पर बहुत उच्च कोटि की स्थिति में होते हैं। उनका आध्यात्मिक कोई त्याग नहीं हो जाता। वो जीवो के उद्धार के लिए नाना प्रकार की चेष्टाएं करते।
उनका लेस मात्र भी कोई स्वार्थ नहीं होता। ऐसे भगवान भी अपने स्वरूप में नित्य निरंतर स्थित रहते हैं। जैसे भगवान नित्य निरंतर अपने स्वरूप में स्थित रहते हैं। जैसे महात्मा जन भी नित्य निरंतर अपने स्वरूप में स्थित रहते
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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