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गोपाल की मैया की कथा | भगवान रूठ गए?

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पूज्य महाराज जी के श्रीमुख से भक्त-चरित्र — पूरी कथा ऊपर वीडियो में सुनें।

पूरा प्रवचन

भक्त तो जो प्रभु से अपनापन करता है तो प्रभु सिर्फ अपनापन देखते हैं। सिर्फ अपनापन यही हमारी विजय है। यही हमारी विजय है कि प्रभु अपनापन को देखते हैं। अपने जन के दोष नहीं देखते। अगर वह हमारे दोष देखे तो हम कभी प्रभु की प्राप्ति कर ही ना पावे। प्रभु लायक ही नहीं है क्योंकि बहुत जन्मों से जगत से खेलने का स्वभाव बन गया है। मनोरंजन करने का स्वभाव बन गया है। तो हमारा मन जगत में ही खेलना चाहता है। भगवान के साथ नहीं खेलना चाहता ईमानदारी से। जबकि यह भगवान हमारे नित्य सखा है।

वह हमारे नित्य प्रिय है। उनके साथ खेलने में ही परम शांति, सुख और जीवन का लाभ है। लेकिन ये मूर्ख मन मानता ही नहीं संसार के साथ खेलना चाहता जो सब दगाबाज पाए जान जगत में सब जन कपटी कुटिल कलयुगी तंच कलयुग के द्वारा ग्रसित सबकी बुद्धि भगवान के साथ अपनापन कर लो तो टिकेगा। और जगत के साथ अपनापन करोगे तो भगवान के साथ जो अपनापन का भाव है वह भूल जाएगा और जगत का टिकेगा नहीं। अब कितने माता-पिता पूर्व जन्म में हम छोड़ चुके? कितने परिवार के सदस्य छोड़ चुके। बस यह वर्तमान के जगत को हम अपना मानकर फूले हुए हैं और भूले हुए हैं।

दूसरी बात उपासक भक्त में गुणों की कमी रहने पर भी भगवान की दृष्टि केवल अपनेपन पर रहती है। उसके गुणों पर नहीं। यह मेरा है। गुणों पर कमी नहीं रहती। क्योंकि भगवान जानते हैं ना मायाकृत गुण है। और भगवान की जब यह दृष्टि रहती है कि यह मेरा है। तो उसका निश्चित परम कल्याण हो जाता है। इसलिए सबको चाहिए प्रभु से अपनापन बढ़ाने के लिए। ये अपनापन तभी बढ़ेगा जब औरों से अपनापन छूट जाएगा। गुरुदेव भगवान एक दृष्टांत सुना रहे थे अपनेपन का कि गोपाल की मैया थी वृंदावन में।

वो ऐसे छाती पे ऐसे झूला बनाए हुए थे जिसमें गोपाल जी विराजमान थे। पूरे शरीर में दसियों जेब थी सिलाई हुई। किसी में टॉफी, किसी में ये, किसी में दूध, किसी में ठंडा जल, किसी में फल वो 10 मिनट में गोपाल को खाती। नाम जप करती विरक्त भाव से रहती। टाट पट्टी की लंगोटी टाट पट्टी लगाते। उन्होंने गोपाल को अपना बेटा माना था। गोपाल जी उनसे बात करते। रात में गोपाल जी बात करते। वह झोपड़ी बनाए हुए थे पानी घाट की तरफ तो वहां कुछ लोगों ने आकर जमन के उस पर हटाओ अपनी झोपड़ी जहां झोपड़ी नहीं और अकिंचन कहां झोपड़ी हटाए ये कथा मतलब प्रकट की वर्तमान की दो चार लोग दर्शन करने आते थे श्रद्धा करके उन्होंने कहा मैया आज उदास क्यों दिखाई देते हो ये माया जानते हो का कर डारी गयो सखी भोर शांत जल में कंकड़ फेंकना इस माया का कार्य है।

ऐसे फेंकना कंकड़ ऐसे फेंकना ये माया का कार्य है। काकर डार गयो सखी और वो शांत है। काकर डर अब वो काकर इसलिए डरवाते हैं आपकी स्थिति परिपक करने के लिए। जगत में ऐसा कोई तो पैदा ही नहीं हुआ है जो भक्त का बाल बांका कर सके। भक्त का बाल बांका कस ऐसा कोई पैदा नहीं हुआ रहे ना रावण सम अभिमानी हिरणा कश्यप सम वरदानी और तो ये तो सब भुनगा है भुनगो में मिटने में कितनी देर लगती है माया के सब रचित भुनगा है काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर अरे अखिल कोटि ब्रह्मांड नायक के दास है हम में जो अवगुण है हम में जो दोष है स्वामी ठीक करें स्वामी जाने सेम किचाप सके को तासु बल रखवा रमापति जासु पर उसी का आश्रय लेना है।

अब उन मैया से उन्होंने कहा मैया आज उदास दिखाई देती हो। तो कहा दो चार लोग आए थे। उन्होंने कहा कुटिया खाली कर दो। जगह यहां से हट हमारी जगह है। हमारी जगह से शाम तक कुटिया हट जानी चाहिए। हम कहां लाला को लेकर जाए? हमारे तो कुछ है नहीं। अकिंचन थी। उन्होंने कहा मैया चिंता मत करो। रुपए से शरीर से सबसे जो कुछ होगा हम देख लेंगे। कुटिया यहां से नहीं हटेगी। आप निश्चिंत हो जाओ। तो मैया ने कहा लाला तेरा ही भरोसा है। लाला तेरा ही भरोसा है। उन्होंने कहा निश्चिंत रहो तुम हम देख लेते हैं।

भाई अगर विपक्ष है तो पक्ष भी भगवान ही है। विपक्ष भी भगवान है तो पक्ष भी भगवान रूप धारण करके आते हैं। अब रात्रि में जब दूध पिलाए तो लाला को तो लाला बात ही नहीं किए। मूर्ति रूप बने रहे। जैसे मूर्ति पीतल की बस वैसे नहीं तो साक्षात बैठ के बात करते थे और वो तो विकल हो गई बहुत रोई कि लाला [गला साफ़ करने की आवाज़] क्या गलती हो गई हमसे जब बहुत विकल हो गए तो उन्होंने कहा अब तुम्हारे दूसरे लाला हो गए ना कहा कि लाला तेरा ही सहारा है तो उन्हीं का सहारा रखो हम नहीं बोलेंगे आपसे बोले गलती पड़ी अनन्य चिंतो मा भरोसा एकमात्र प्रभु का एकमात्र प्रभु का भरोसा जबान से भी दूसरे का भरोसा नहीं निकलना चाहिए कि तुम्हारा ही सहारा चाहे जितनी बड़ी विपत्ति हो बैठ जाओ चुपचाप शांत और श्री जी का सहारा है था रहेगा अब उनका म अपमान करवाने को तो भैया इतना सम्मान मिला तो थोड़ा अपमान भी अपमान में काहे को अगर किसी का सहारा ले लिया तो यही तो प्रश्न किया गया था कि तुम सहारा लोगे कि नहीं लोगे किसी का आप कोई ऐसा भक्त चरित्र बताओ जिसमें समस्याओं का जाल ना बिछा हो।

भक्तों के जीवन में समस्याओं का जाल माया बिछा देती है। अब निकल के दिखाओ इससे पर निकलना है केवल भगवत सहारे से किसी और का सहारा नहीं ले लेना नहीं और का सहारा फिर क्या मजा फिर क्या आया भक्ति का अगर किसी और का सहारा ले लिया अपबल तप बल और बाहुबल चौथो बल है दाम अपने परिचय का बल और सब बल का फिर वो भक्ति नहीं रह गई फिर तो बात अलग हो गई कमी है अवगुण है लेकिन अपनापन केवल प्रभु से श्री जी से कमी दूर करो या कमी के परिणाम में अपमान करवाओ या आपका कार्य है दूसरे से नहीं अपनी कमी को दूसरे से ना तो दूर करवाना है और ना दूसरे से बचाव पक्ष रखना है बने तो रघुवर बने और बिगड़े तो भरपूर तुलसी और बने ता धूल गुणों की कमी भगवान अपने पन में नहीं देखते हैं।

इसी से हमारा काम बनेगा। प्रभु का अपनापन दुष्ट से दुष्ट मनुष्य को भी दुष्ट से भी दुष्ट मनुष्य को भी परम पद में बैठा देगा। अपनापन यह बहुत बड़ी बात है। अपचे दुराचार भजते मानन भाग भगवान जो भक्तों से द्वेष करते हैं कहते उन नरा धम्म दुष्टों को मैं आसुरी योनियों में गिराता हूं। उनको उन पर भी कृपा करते हैं कि उनको आसुरी योनियों में गिराकर भक्त अपराध से पवित्र करते हैं। भक्त में दोष है तो मालिक नौकर से दोष बना है तो मालिक से शिकायत करो। तो कहते हैं ऐसे नधमों को मैं आसुरी योनियों में गिराता हूं।

भगवान अपनापन को बहुत जोर का मानते हैं। [गला साफ़ करने की आवाज़] देखो शबरी ने अपनापन से बेर खवा दिए। विदुरानी ने अपनापन से छिलके पवा दिए। अपनापन होने पर सुदामा के तंदुल भगवान ने सराह सराह के पाए। अपनापन। अपनापन संबंध यदि प्रभु से है और फिर कोई कामना भी है तो भक्त का मुख्य संबंध भगवान से है और गौर संबंध कामना से है। इस दृष्टि से भक्ति की विजय होगी। वह कामना उसे परास्त नहीं कर पाएगी।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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