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श्रीविट्ठलनाथ जी का जीवन चरित्र | महापुरुष को कष्ट देने का मिला भयंकर परिणाम

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

जो श्री विट्ठल नाथ जी थे यह श्रीमद वल्लभाचार्य जी के द्वितीय सुपुत्र है। आपका जन्म प्रादुर्भाव विक्रम 1572 में काशी के निकट चुनारगढ़ में हुआ। श्री आचार्य महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने प्रयाग में अड़ेल में आकर आपका जन्मोत्सव मनाया। बड़े शुभ संस्कार बचपन से ही आचार्य महाप्रभु जी के निरीक्षण में आपने समस्त शास्त्रों का सम्यक अध्ययन किया और गृहस्थ आश्रम में प्रविष्ट हुए आपकी दो पत्नियां थी रुक्मणी जी और पद्मावती जी श्रीमद वल्लभाचार्य महाप्रभु जी के गोलोक गमन के अनंतर उनके जष्ठ पुत्र श्री गोपीनाथ जी ये द्वितीय पुत्र से श्री विट्ठलनाथ जी गोपीनाथ जी आचार्य गद्दी पर बैठे परंतु थोड़े ही समय में वह गोलोकवासी हो गए और गोपीनाथ जी के जो पुत्र थे श्री पुरुषोत्तम जी वह अभी बाल्यावस्था को थे तो विट्ठलनाथ जी को ही सारा कार्यभार संभालने को मिला आचार्य गद्दी का ठाकुर जी की सेवा ठाकुर जी का सबश्वर्य श्री विट्ठलनाथ जी संभाले श्री विट्ठलनाथ जी संभाले तो पर कृष्णदास जी वल्लभाचार्य जी के शिष्य और ये संपूर्ण सेवा सामग्री के अधिकारी थे।

यहां एक बहुत सूक्ष्म विषय निकल के आता है कि कभी गुरु और गुरु वंशज के प्रति थोड़ा भी हे भाव ना कर ले नहीं तो दुर्गति पक्की है। चाहे जितना बड़ा उपासक हो। कृष्ण दास जी बहुत बड़े महापुरुष हैं। पूरे श्रीनाथ जी की सेवा के अधिकारी हैं। अधिकारी पदवी नहीं की है। अब किसी सेवा पद्धति को लेकर कृष्ण दास जी से श्री विट्ठलनाथ गोस्वामी जी ने तो कृष्ण दास जी असंतुष्ट हो गए। कभी ऐसा नहीं होना चाहिए। गुरु के समान ही गुरुवंशजों को समझना चाहिए। जैसे हमारे गुरुवंश के अगर बच्चा भी आ जाए तो हम उसके झुक कर चरण छुएंगे।

उसको गुरु के समान आसन पर बैठा लेंगे और नीचे उतर कर हम बैठेंगे। चैतन्य महाप्रभु ने ईश्वर पुरी जी के जब गांव में गए तो रज में लट लोट के कह रहे थे यहां के सब जीव जंतुओं की भी चरण रज हमारे लिए बंद नहीं क्योंकि यहां हमारे गुरुदेव भगवान प्रकट हुए ईश्वरपुरी जी के गांव में। यहां त्रुटि हो रही है कृष्ण दास जी से। कृष्ण दास जी ने क्या किया कि जो गोपीनाथ जी गोलोक गमन हो गया था तो उनकी पत्नी और उनके पुत्र पुरुषोत्तम जी अभी छोटे थे। उनसे बात की और गद्दी पर पूरा अधिकार कर लिया।

पुरुषोत्तम है ही क्योंकि उनके पिता गोपीनाथ जी अधिकारी थे और हटा दिया श्री विट्ठलनाथ जी को और हटा ही नहीं दिया। पूरी सेवा से हटा दिया। कृष्णदास अधिकारी जी ने। पुरुषोत्तम जी को गद्दी पर बैठाल दिया। उनकी मां को समझा बुझा के दस्तखत करवा लिए और श्री विट्ठलनाथ गोस्वामी जी को हटा दिया। श्रीनाथ जी की सेवा मतलब आना भी बंद करवा दिया। ऐसा नहीं करना चाहिए था। ये बहुत बड़ा अपराध बन गया। और बहुत बड़े महापुरुष हैं। कृष्ण दास जी कोई साधारण नहीं। आगे उनके कभी चरित्र का श्रवण करना।

इतने बड़े महापुरुष गोसाई जी को सब अधिकार छीन जाने का कष्ट तो नहीं हुआ पर सेवा छूट जाने का बहुत कष्ट हुआ और महापुरुषों के हृदय में किसी भी तरह का यदि कष्ट हो गया तो उसे फिर भगवान बर्दाश्त नहीं करते आपको बहुत क्लेश हुआ श्रीनाथ जी का दुलार छूट गया सेवा छुटवा दी कृष्णदास अधिकारी ने आप पाराशौली में जाकर रहने लगे पर बहुत दुखी अंदर से और दूर तक वहां तक आते जहां श्रीनाथ जी की ध्वजा दिखाई देती है। वहां से साष्टांग दंडवत करके बहुत एकाग्रता पूर्वक ऐसे देखते मंदिर की तरफ रोने लगते हैं।

श्री विट्ठलनाथ जी यह बहुत बड़ी हानि का विषय बहुत बड़ी हानि का विषय गुरुजनों से विरोध करने का मतलब है सर्वस्व का नाश। चाहे जितना बड़ा भी कोई तपस्वी भजनंदी हो। एक श्री रामदास जी भीतरिया जो ठाकुर जी की सेवा में रहते थे। वह श्री विट्ठलनाथ जी की स्थिति से परिचित थे। वह रोज गुप्त रूप से समय निकालते। यद्यप श्री कृष्ण दास जी ने उनको भी मना कर दिया था। पर वो जाते और गोसाई जी को श्री लाल जी का बीड़ा प्रसाद देते। बीड़ा प्रसाद आंखों से ऐसे रखकर के खूब रुदन करते श्री विट्ठलनाथ जी।

यह बहुत बड़ा अपराध है। बहुत बड़ा अपराध। गोसाई जी ठाकुर जी के लिए अपने कर कमल से एक फूलों का हार बनाते और कहते पहना देना जाके और रोज एक श्लोक दन्यता का लिखते और कहते ठाकुर जी को सुना देना जाके श्री रामदास जी नित्य प्रति आकर वो फूलों का हार और ठाकुर जी को एक श्लोक सुनाते ठाकुर जी को फूलों का हार पहनाते और ठाकुर जी रोज एक पान की बीड़ी देते जो उनको जाकर देते और उनको प्रणाम करते एक दिन ठाकुर जी ने संदेश संदेश में कहा कि गोसाई जी से कह दो मेघ तो समय पर बरसेगा।

तुम दुखी क्यों हो रहे हो? मेघ तो समय आने पर बरसेगा। तुम दुखी क्यों हो रहे हो? विट्ठलनाथ जी के सामने जब जाकर रामदास जी ने कहा मेघ तो समय पर बरसेगा। आप दुखी क्यों हो रहे हो? लालन ने ऐसा कहा है तो विट्ठलनाथ जी ने कहा कि मेघ तो समय पर बरसेगा पर चातक अपनी टेक पुकार क्यों छोड़ेगा? चातक तो रटता ही रहेगा। बहुत सुंदर बात अगर चातक अपनी रटन छोड़ दे तो चातक कैसा मेघ तो समय पर बरसेगा वो बरसे लेकिन चातक अपनी रटन नहीं छोड़ सकता मेरी रटन घटने वाली नहीं मैं तो रोरो कर आपको पुकारता ही रहूंगा चातक रटन घटे घट जाई बढ़े प्रेम सब भाति भलाई विट्ठलनाथ जी के इस दुख को अकबर बादशाह ने सुना उसने तत्काल आदेश किया और कृष्णदास जी को बंदी बनाकर जेल में डाल दिया और गोसाई जी को विरुद्ध आचरण किया इसलिए उनको कठोर दंड कृष्णदास जी को बादशाह अकबर ने जब गोसाई जी को ये पता चला तो गोसाई जी ने अन्न जल त्याग दिया और कहा जब तक सम्राट अकबर सादर कृष्ण दास जी को ये देखो महापुरुषों का हृदय सादर कृष्णदास जी को नहीं छोड़ते तब तक मैं अन्न जल भी नहीं पाऊंगा जब बादशाह अकबर को यह पता चला कि गोसाई जी ने अन्न अन्न जल त्याग दिया तो सादर कृष्ण दास जी को पुनः छोड़ दिया।

कृष्ण दास जी को जब यह पता चला कि गोसाई जी मेरे लिए अन्न जल छोड़ दिए तब गोसाई जी के पास आए और चरणों में गिरे और कहा मुझे आपके प्रभाव का पता नहीं था। क्षमा कीजिए। कृष्णदास जी ने पालाशोली में आकर गोसाई जी के चरण पकड़ लिए। गोसाई जी गंभीर हो गए। महापुरुष अगर डांट दें तो बच गए आप और गंभीर हो गए तो पिट गए आप। बस इतना समझ लो। गंभीर इसलिए हो गए कि तुमने लालन की सेवा छुड़वा दी। सब ठीक है। लेकिन लालन की से दूर रखा। दर्शन नहीं सेवा नहीं इसलिए गंभीर हो गए। विट्ठलनाथ गोस्वाई जी को पूर्व सेवाधिकार प्राप्त हो गया।

श्री कृष्ण दास जी का अंतिम लीला जानते हो कैसे हुई? कुआं में पैर फिसल गए और गिर के मरे और प्रेत बने। इसी अपराध के कारण बहुत सावधान इतने बड़े महापुरुष है उनका चरित्र है कृष्ण दास जी का बहुत बड़े महापुरुष है लेकिन अपने गुरु से अपराध बन गया गुरुवंश गुरु स्वरूप ही है अपराध बन गया तो प्रेत योनि को पैर फिसल गया कुएं में गिरे और उनके प्रेत योनि को प्राप्त हुए बहुत सावधानी की जरूरत है कि कहीं ऐसे अपराध नहीं तो चाहे जितना भजन हो भजन बाद में तो कल्याण करेगा लेकिन बीच में छूट जाएगा और बीच में हमारी दुर्गति हो जाए।

अंतिम तो मंगल ही होगा क्योंकि भगवान का जन कभी ना में भक्ता प्रणसति जब ये प्रेत बन गए थे तब भी उद्धार गोस्वामी विट्ठल नाथ जी के द्वारा ही इनका हुआ अकबर क्यों कृपालु था? क्यों श्रद्धा करता था विट्ठलनाथ जी गोस्वामी के ऊपर एक बार श्री यमुना जी में स्तोत्र का गायन का कंचन वर्ण तेज चमकता हुआ विट्ठलनाथ गोस्वामी जी का तो स्नान करके यमुना जी की आराधना कर रहे थे तो उधर नौका में जल विहार करते हुए इसके बादशाह की कोई हिंदू बेगम होगी तो वो दूर से देखा कि तेजस्वी तो भगवान के समान है नौका का समीप ले गई।

उतर कर चरणों में वंदन किया। विट्ठलनाथ गोस्वामी जी को देखकर उसे पक्का लगा कि यह जो आशीर्वाद दे देंगे तो पक्का। तो उन्होंने कहा कि आपसे मैं एक ही आशीर्वाद चाहती हूं कि मेरे बादशाह मेरे अनुकूल रहे। हर पत्नी यही चाहती है। आप कृपा करके कोई ऐसा जंतु बांध दीजिए, कोई मंत्र बता दीजिए, कोई उपाय बता दीजिए कि बादशाह सलामत हमारे बस में रहे। हमारे अधीन रहे। आपने मुस्कुरा दिया कि मैं एक जंतु देता हूं। इससे बादशाह तुम्हारे अधीन रहेंगे। और दोहा लिखकर के भुजा में बांध दिया।

यंत्र मंत्र और तंत्र को भूल करो जन को। पति कहे सो कीजिए वो आप बस होए। यह दोहा लिख के बांध दिया। दूर से गुप्तचर लगे रहते थे। गुप्तचर ने कहा कि विट्ठलनाथ गोस्वामी जी ने कोई जादू टोना करके आपकी हिंदू बेगम की बाह में जंतुर बांध दिया है। तत्काल आया जब वह महल तोड़ दिया जंतु और उसे कहा खोला जाए खोला गया और जब यह दोहा पढ़ा कि यंत्र मंत्र तंत्र को भूल करो जन कोए कोई उपाय मत करो ये यंत्र तंत्र मंत्र जंतर वाला पति की आज्ञा में रहो इसी से पति अधीन हो जाएगा जब ये दोहा पढ़ा कि पति की आज्ञा का पालन रूप परम बल है जो पति को अधीन कर लेता है बहुत प्रसन्न और कहा इसी समय मुझे विट्ठलनाथ गोस्वामी के चरणों में जाकर प्रणाम करना है और उनके दर्शन करने हैं।

तब से बहुत श्रद्धा विट्ठलनाथ गोस्वामी जी के ऊपर और वह आकर के गोकुल में और गोवर्धन में बहुत सी संपत्ति जमीन यह सब विट्ठलनाथ गोस्वामी जी को ने

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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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