एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1398
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
अजय मिश्रा जी पुणे महाराष्ट्र से राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी गुरुदेव मैं सभी देवताओं की पूजा करता हूं परंतु मेरी श्री राम जी में श्रद्धा है। मैं श्री राम जी के प्रति एकनिष्ठ होना चाहता हूं। परंतु दूसरे देवताओं की पूजा ना करने में मन में अपराध का भाव आता है महाराज जी ऐसे में दाल शाखा पत्ते पुष्प फल इनकी अलग-अलग पूजा करने से वृक्ष को सुख मिलेगा या मूल में जल डाल देने से मूल में तो उध मूल मधा शाखा मशतम प्राभ्यम भगवान ने गीता में 15 अध्याय में कहा मैं सबका मूल मूल हूं।
भगवान से ही सब है। जा पर कृपा राम की होई ता पर कृपा करे सब कोई। यदि हम भगवान की आराधना करते हैं तो भगवान में असंख्य ब्रह्मांड समस्त देवी देवता सब वास करते हैं। सबकी पूजा हो जाती है। एक भगवान श्री हरि की आराधना करने से सबकी पूजा हो जाती है। तो कोई भी देवी देवता कभी भी नाराज नहीं होगा क्योंकि भगवान ही सब देवी देवता बने हुए हैं। समझ रहे हो ना? तो यदि भगवान श्री राम के चरणों की अनन्य भाव से आराधना करते हो तो समस्त देवी देवताओं की आराधना अपने आप हो जाती है।
लेकिन किसी देवी देवता की आराधना से संपूर्ण आराधना नहीं होगी। क्योंकि आप उसे एक नाम धारी देवता केवल समझ रहे हैं। अगर उसमें भगवान भाव कर लो। जैसे गोस्वामी जी कह रहे हैं जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम मैं जानी। अब किसी की भी आराधना करो भगवान श्री राम की आराधना हो रही वो संपूर्ण आराधना है। भगवान की आराधना संपूर्ण आराधना है। भगवत भाव के द्वारा यदि कुत्ते की भी आराधना कर ली जाए तो भगवान की प्राप्ति हो जाएगी। लेकिन भाव भगवान का होना चाहिए कि इसके अंदर भी भगवान विराजमान है।
तो जैसे गीता जी में भगवान ने कहा कि देवता की आराधना करने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं। पितरों की आराधना करने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं। भूतों की आराधना करने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं। और मेरी आराधना करने वाले मेरे को प्राप्त होते हैं। तो फिर सब में भगवान है तो उनकी आराधना से भगवान को क्यों नहीं प्राप्त हुए? क्योंकि उन्होंने भगवत भाव नहीं किया। पितरों में पितर भाव किया। देवी देवताओं में देवताओं का भाव किया तो हमें चाहिए कि हम जैसे गोस्वामी तुलसीदास जी ने सबकी वंदना की विनय पत्रिका में लेकिन सबसे यही मांगा कि सियाराम के चरणों में प्रेम हो।
अगर हम किसी देवी देवता की आराधना करें भी तो हम उन्हें भगवान के भाव से देखें कि भगवान इस देवी के रूप में इस देवता के रूप में है और उनसे वरदान यही मांगे कि हमारे इष्ट में हमें प्रीति प्राप्त हो। जिनको हमने इष्ट माना राम श्याम शिव जो भी उनमें हमारी प्रीति प्राप्त हो कोई अपराध नहीं है। देवता स्वार्थी थोड़ी है। भगवान श्री राम की पूजा करने से समस्त ब्रह्मांडों की पूजा हो गई क्योंकि भगवान ही सब रूपों में विराजमान है। अर्जुन सिंह जी आगरा से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी हम लोग बहुत पुण्य करते हैं।
फिर भी बहुत कष्ट मिलते हैं। क्या यह गलत बात है। आपको अहंकार है कि हम लोग बहुत पुण्य करते हैं। सबसे पहला शब्द अहंकार का निकला आपका कि हम लोग बहुत पुण्य आत्मा हैं। नहीं बिना पाप कर्म किए दुख मिल ही नहीं सकता है। और अहंकार है इसलिए आपके पुण्य है ही नहीं। अहंकारी कभी पुण्य आत्मा नहीं होता। जैसे हमने आपको पानी पिलाया और मैंने चार लोगों को बता दिया कि बहुत प्यासा था। मैंने पानी पिलाया। कुछ नहीं बचा। ऐसे आपके मुख से निकला। मैं बहुत पुण्यत्मा हूं। ऐसा नहीं जो बहुत पुण्य आत्मा होता है उसे उसके मुख से निकलेगा मैं तो बहुत अधम जीव हूं नहीं आप तो बहुत पुण्य करते हैं वह तो भगवान की प्रेरणा से होता है मेरे में इतनी सामर्थ कहा मैं पुण्य कर सकूं वो तो भगवान करवाते हैं और वो गुप्त रखेगा पुण्य को तो पहले सुधार करो जो आपने कहा मैं हम लोग बहुत पुण्य करते हैं क्या करते हो पुण्य हमें बताओ लोगों की सेवा करना या सहायता करना ये ये तो धर्म है आपका।
मनुष्य धर्म है। कोई पशु थोड़ी हो। तो भगवान ने कृपा की कि आप अपने धर्म का पालन कर रहे हैं। तो पुण्य क्या हो गया उसमें? अपने बेटे को पवाते हुए पुण्य हो गया क्या? अपने खाते हुए पुण्य हो गया क्या? अपने परिवार को पवाते हुए पुण्य हो गया क्या? तो अपने देशवासियों की सेवा करते तो पुण्य हो गया क्या? हम ऐसे देखें जैसे हम एक छोटे से घर में अपने परिवार को खवाएं, पियाएं, कपड़ा लत्ता पहनाए, दवाई कराएं तो क्या वो पुण्य हो गया? क्या? क्योंकि मेरा घर है। तो यह मेरा देश है।
उदार चरितान वसुदेव कुटुंबकम। हम थोड़ा अपने परिवार का बड़ा स्वरूप ले लेते हैं। पूरा भारत पूरा विश्व मेरा परिवार है। तो हम विश्व की सेवा कर रहे हैं। तो हम अपने धर्म का पालन कर रहे क्योंकि हम मनुष्य हैं। मनुष्य धर्म है। परहित करना दूसरे का तो हमें अहंकार भी ना आएगा और हमारा हृदय भी पवित्र हो जाएगा। और जो हमें दुख मिलता है वह हमारे पाप कर्म का फल होता है। जैसे अभी आप संभाल के चल रहे हो लेकिन पीछे आपने इसी जन्म में देखो क्या आपसे पाप नहीं हुए? क्या आपसे गलती नहीं हुई?
आप इसी जन्म के जज बन जाओ और उस गलती का परिणाम राष्ट्रीय कानून से आप लो। तो देखो आपको कितना भारी दंड मिले। जब वो दंड नहीं मिला तो भागवतिक कानून से दंड मिलेगा। फिर इस जन्म का तो अभी कुछ मिलेगा ही नहीं। यह तो पूर्व जन्म का है। आपके पूर्व पुण्यों से आपकी सद्बुद्धि है और पूर्व पापों से दुख बुद्धि है। तो हमको चाहिए कि अभी जो हमारी नई खेती है बहुत अच्छी फसल तैयार कर लें। पीछे जो हमने बोया है उसे हम भोग लेते हैं। आगे चलकर हम आनंदित हो जाएंगे। वर्तमान में भगवान का नाम जप जरूर करें।
करते हैं ना हम जप। हां। दूसरों का परोपकार करना ये हमारा धर्म है क्योंकि हम मनुष्य हैं। हम पशु नहीं है। परहित शरीर धर्म नहीं भाई। दूसरे को सुख पहुंचाना कोई बीमार है। कोई एक्सीडेंट से परेशान स्थिति में है तो हम उसका सहयोग कर देते हैं। यह हमारा धर्म है। यह हमारा कर्तव्य है। जैसे हम अपने परिवार की सेवा करते हैं। ऐसे हम अपने देश की सेवा करते हैं। तो हमें यह गर्व नहीं आएगा कि हम लोग बहुत पुण्य करते हैं। ठीक है ना? हां। ऐसे शब्दों से अहम पुष्ट होता है और पुण्य नष्ट होते हैं।
जी मयंक सिंह जी राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी क्या भगवान शिव को मात्र ज्ञान के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। उनकी भक्ति में दास्य या सख्य जैसे भाव दशाएं लाई जा सकती हैं। लाई जा सकती हैं। क्यों? भगवान भगवान है। जब भगवान हम श्री हरि के प्रति ऐसा कह सकते हैं तो भगवान स्वयं शंकर जी दास्य भाव के आचार्य बनकर के हनुमान जी के रूप में राम जी की सेवा कर रहे हैं कि नहीं? भगवान शंकर जी तो हैं। हनुमान जी के रूप में दास्य भाव की सेवा कर रहे हैं।
श्री राम जी की प्रत्येक आज्ञा का पालन शिरोद्धार कर रहे हैं। तो राम जी रामेश्वर भगवान की स्थापना करके सेवा कर रहे हैं। भगवान शंकर को अपने स्वामी के रूप में देखें, अपने सखा के रूप में देखें, अपने प्रीतम के रूप में देखें, उसी भाव से हमें प्राप्त हो जाएंगे। हम जिस भाव से भगवान शंकर की आराधना करेंगे, उस भाव से हमको प्राप्त हो जाएंगे। यथामा प्रपद्यते ताथ भजाम्यम जो मुझे जैसे भाव से बजता है मैं उसको वैसे ही प्राप्त होता हूं। पर प्रायः भगवान शंकर के प्रति माता-पिता का भाव या स्वामी का भाव यही देखा गया है।
प्रायः भगवान शिव को प्रियतम पति रूप में तो जगदंबा जी ने भजन किया है और प्राय सब ने माता-पिता और स्वामी के रूप में भजन किया है और सख्य दास्य वात्सल्य कांता सहचरी ये प्रिया प्रीतम श्यामा श्याम के विषय में या श्यामा श्याम के ही स्वरूप सियाराम के विषय में बकाया भगवान शंकर को तो जगत माता-पिता या स्वामी के रूप में ही प्राय भजन किया प्रभु जब आप कहते हैं कि संत निंदा से पुण्य क्षीण होते हैं तब आपका आश्रय आचरण वाले संतों से होता है अथवा मात्र वेशधारी संतों से हम कह रहे किसी की क्यों कह रहे हैं हमें ठेका दिया गया है क्या किसी की निंदा करने का भगवान ने जिसकी जिसने क्षमता दी उतना ही चल पा रहा है अब हम अपनी कसौटी पर किसको कसे हम अपने को कसे तेरे भावे जो करे भलो बुरो संसार नारायण तू बैठ के अपनो भवन बहार आप अपने नेत्रों को ठीक ठीक करो।
जैसे आप देख रहे हो ये आदमी निंदनीय है तो आदमी नहीं उसमें परमात्मा है। आपने देखा नहीं देखा तो आपकी दृष्टि खराब है। विद्या विनय संपन्न ब्राह्मण गविस्तनी सुनी सुपाकेचा पंडिता दर्शना सच्ची दृष्टि ज्ञान की तो यह है कि सब में हम परम ब्रह्म परमात्मा को देखें। भगवान वासुदेव को देखें। यदि हम ऐसा नहीं देख पाते तो हमारी दृष्टि ही तो खराब है। सब में भगवान है। गोस्वामी जी कह रहे हैं जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम मैं जान बंद सबके पद कमल सदा जोर जुग पान तो हम किसी की कमियां क्यों देखें और संत को कैसे पहचान सकते हो?
बाहरी लक्षणों से क्या संत पहचाना जा सकता है क्या? उसकी आंतरिक स्थिति क्या है? क्या जानोगे आप? समझ रहे हो ना? बड़े-बड़ों से धोखा हो जाता है। एक बड़े स्थिति प्रज्ञ संत थे। समोसा बांट रहे थे तो समोसा खाया फिर खाया फिर तो समोसा बांटने वाला उनको दो बार ले चुके। तीन बार ले चुके और बार-बार समोसा तो एक संत थे। उन्होंने उनके मन में आया कि यार हम तो इनको बहुत अच्छे भजनंदी संत समझते थे। ये तो बहुत समोसा ही को बार-बार हाथ पाए। अब उनके विचारधारा को क्या जाने कि चार समोसा पा लेते हैं।
एकांत में 24 घंटा भजन करेंगे। उनकी विचारधारा को कौन जाने। अब वह जो हमारे गुरु जी के पास आए जो संत समोसा ले रहे थे उनके प्रति दोष दर्शन हुआ। तो गुरु जी ने कहा दुर्गंध आ रही है। तुम्हारे से दुर्गंध आ रही है। उन्होंने कहा महाराज जी हम साबुन नहीं लगाते। इसलिए बोले ये दुर्गंध नहीं है। ये संत अपराध की दुर्गंध है। तुम कोई संत अपराध करके आ रहे हो। तो उन्होंने कहा महाराज जी संत अपराध तो हम किसी से मिलते ही नहीं। तो संत अपराध क्या? नहीं बोले जरूर दे तो उनका महाराज जी अभी एक समोसा बांट रहा था और एक संत परिचय के थे बड़े भजनानंदी और बार-बार उससे समोसा मांग रहे तो हमारे मन में आया कि अरे बोले जाओ महाराज जी ने ₹50 दिए उस समय ये 20 वर्ष पहले की बात होगी और कहा समोसा खरीदो और उनको समोसा दो जाके और प्रणाम करके कहो कि मेरी दोष दृष्टि आपके प्लस हो गई क्षमा करो तो संतों की अब मान लो जैसे समोसा बट रहा है उनके मन में आया कि चार समोसा पा लेते हैं।
बाद मधुकरी नहीं मांगना है। एकांत में भजन करेंगे 24 घंटे। अब आप समोसा मांगते हुए तो देख रहे हैं। लेकिन उनकी आंतरिक वृत्ति को तो नहीं देख रहे हैं। देने वाला तो दे ही रहा है। अगर वो अपमानित भी कर रहा है तो अपमान सहना संतों का स्वभाव होता है। फिर धक्का खा के फिर संतों की महिमा को केवल संत ही जान सकते हैं। बाहरी विचार से नहीं जाना जा सकता। हम स्वयं देखी हुई बात करें। स्वामी परमानंद जी ब्रह्मानंद में मगन रहते थे और जहां कोई बहू बिटिया ऐसे सब जाती है ना दर्शन करने बिटिया तुम्हारे गाय है बोले हां स्वामी बोले रबड़ी बहुत दिन से नहीं पाया और ब्रह्मानंद में ऐसे छके रहते कि वस्त्र का भी शरीर के ध्यान नहीं रहता और अगर कोई बना के रबड़ी ले भी आया ना तो ऐसे छकते आ हा हा बहुत अब पा ले बच्चा तुम पा ले एक मुंह भी नहीं पाया और अब देखने वाले सभा में लोग क्या समझते और शरीर का भान नहीं ऐसे महापुरुष शरीर का तो हम संतों की बाहरी चेष्टा देखकर के हो सकता है दोष दर्शन कर ले तो हमें चाहिए कि हम आंतरिक भाव को जानने की चेष्टा करें।
संत के बाहरी लक्षणों से नहीं जाना जा सकता। बाहरी लक्षण तो नाटक वाला भी बहुत बढ़िया साधुता का करता है। नहीं जो नौटंकी नाटक ड्रामे में साधु का रोल करता है वो बढ़िया रोल कर लेता है ना। तो क्या रोल साधु होता है क्या? साधु तो स्थिति होती है और जो स्थिति होती है वह नाटक नहीं करता है। वह बालवत उसकी चेष्टाएं होती है। जैसे बालक खेल रहा है स्वतंत्र रूप से घरौदा बनाया फिर बिगाड़ दिया। बैलगाड़ी जा रही बैठ के जा रहा है। काफी दूर फिर पैदल वापस आ रहा है। उसे पूछो कि पैदल वापस आना था तो गाड़ी में क्यों बैठ के गए?
उसका कोई मतलब नहीं। खेल है बच्चे हैं। ऐसे ही संत जो महापुरुष होते हैं उनका बालवत चेष्टा होती है। तो हम देख के नहीं पहचान सकते। तो हम निंदा क्यों करें? सबको प्रणाम करें। हमको अपने हृदय के दोष देखकर निकालने हैं। दूसरे के नहीं। हां दूसरा कोई हमारा मित्र है और वो हमसे पूछता है तो हम बता देते हैं कि मुझे लगता है कि आप इस जगह गलत हो। अगर इसको ठीक कर लिया जाए तो ठीक है। वो भी सामने उसके पीछे नहीं तो निंदा हो जाएगी। उससे कहो डायरेक्ट उससे कहो। तब तो बात समझ या तुम्हें किसी संत पर दोष दर्शन हो तो हिम्मत है तो डायरेक्ट बात करो।
महाराज मैंने आपके प्रति दोष दर्शन किया। आप यह गलत कार्य कर रहे हैं। आप इसका उत्तर दीजिए कि यह गलत है या मेरी दृष्टि गलत है। तब तो बात सही मानी जाए। आप उसके पीछे उसकी निंदा करेंगे तो निंदा करने से आपके पुण्य नष्ट हो जाएंगे। पर निंदा के किएते आवत नहीं कछु हाथ। मूर्ख पर्वत पाप को ले चल अपने साथ। उसका पाप का ढेर लेकर के चला जाता है। अपने पुण्य नष्ट कर देता है। तो काहे को अपनी जबान से गंदगी बोले। अच्छी बात बोले विकास शर्मा जी निवराना से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मैं पूजा पाठ करता हूं और करवाता हूं कर्मकांड।
महाराज जी क्या हमें केवल नाम जप के सहारे चलना चाहिए या समय-समय पर श्रोत्र श्री सूक्त पुरुष सूक्त चालीसा इत्यादि का भी पाठ करना चाहिए? नहीं पांच बातें हमने बताई। एकांतिक में कई बार बताए कि सत्संग, स्वाध्याय, सुमिरन, सेवा, समाधि पांचों सकार हैं। थोड़ा समय हम सत्संग के लिए निकाले। वो भी भगवान का ही तो है ना। क्योंकि इकट्ठे हम नाम में अकेले मन लगावे तो नहीं लगेगा। इसको नवम नवम चाहिए। इसको कुछ बदलाव चाहिए। तो हम पांच भागों में अपने समय को बांट लेते हैं।
एक भाग सत्संग कुछ मिनट हम 30 मिनट 60 मिनट सत्संग के लिए दें। अगर हम सत्संग में रोज नहीं जा पाते हैं तो आजकल यंत्र है, मोबाइल है, सर्च करें। हमें जो अच्छा लगे जहां ऐसा समझ में आवे कि शास्त्र सम्मत सत्संग हो रहा है जिसका कोई ताल्लुक नहीं है शास्त्र से मतलब नहीं बस एक मनोरंजन वो वो प्रथम श्रेणी के जो एकदम बिल्कुल शून्य है उनके लिए तो चलो जिनको का नहीं आता स्कूल में तो पहुंच गए लेकिन जो सत्संगी हैं उनको तस्मा शास्त्रम प्रमाणम ते शास्त्र प्रमाणित बात होनी चाहिए ऐसे नहीं कि वो कुछ पूछ रहे हैं वो कुछ बोल रहे हैं वो कुछ उत्तर ऐसे नहीं तस्मा शास्त्रम प्रमाणम शास्त्र प्रमाणित बात होनी चाहिए तो सत्संग भी सुने तो ऐसे संतों का सुने जो निष्काम हो अर्थ की लोलुपता में अर्थ बदल जाता है शास्त्र कह रहा है कुछ और उसको बदल के बोल रहे हैं कुछ क्योंकि अर्थ की लोलुपता में अर्थ बदल गया शब्द का अर्थ बदल गया अर्थ माने धन धन की लोलुपता में शब्द का अर्थ बदल जाता बनावटी शब्दों का प्रयोग करके लोगों को लुभायमान करते हैं।
वह सत्संग नहीं होता। सत्संग होता है जो सर्व संगो पहिमाम सत्संगा जो समस्त विषयों का समस्त दुर्गुणों का समस्त संगों का त्याग करके भगवान से अनुराग पैदा कर दे उसे सत्संग कहते हैं। बिन सत्संग विवेक न होई और राम कृपा बिन सुलभ न सोई। भगवान की कृपा से ऐसा सत्संग मिलता है। तो पहला जैसे सत्संग अब दूसरा स्वाध्याय हनुमान चालीसा का स्वाध्याय श्री सूक्त का स्वाध्याय दुर्गा सरस्वती का स्वाध्याय और भी जो जो भी शास्त्र है उनमें जो पढ़ना चाहते हैं आप वो स्वाध्याय कर सकते हैं।
तो सत्संग स्वाध्याय अब सुमिरन नाम जप का सुमिरन मंत्र जप का सुमिरन गुरु के जो निकले हुए वाक्य हैं महावाक्यों का सुमिरन सेवा हमारे शरीर के द्वारा माता-पिता की सेवा अपने गुरुजनों की सेवा भगवान की सेवा प्राय हर गृस्थ अपने घर में भगवान विराजमान रखता है तो सेवा और फिर एक आखिरी बात है जो बहुत जोर की है समाधि समाधि का तात्पर्य होता है एकांत सुख मासताम एकांत में सुखासन में बैठकर के और मन की गति को देखना छोड़ दिया एकदम छोड़ दिया कहां जा रहा है जहां जा रहा है वहां देखो क्यों जा रहा है हटाओ उसको वहां से हटा के अपने लक्ष्य पर लगाओ चित्तवृत्ति का निरोध करके परमात्मा में लगाना ही योग कहा जाता है और धीरे धीरे धीरे धीरे शांत नींद ना आने पावे तंद्रा ना आने पावे इसीलिए जब समाधि शब्द आता है तो फिर आसन प्राणायाम आ जाते हैं कि प्राणों का संशोधन करके आसन पर बैठकर शांत और ना कुछ समाधि हो तो कम से कम नाम का ध्यान करें राधा राधा तो ये पांच बातें जैसे सत्संग सुमिरन स्वाध्याय सेवा और समाधि ये पांच बातें हैं ना तो
इन पांचों बातों में आप पांचों स्वीकार कर लीजिए तो आपका संपूर्ण भजन होने लगेगा। ठीक है? और पांडित्य करने में सावधानी रखिए कि जिसका अनुष्ठान जितना लीजिए उतना पूरा कीजिए। अगर जजमान को तो पता नहीं है और हमने अनुष्ठान का पैसा लिया अनुष्ठान पूरा नहीं किया तो फिर भगवान देख रहा है फिर वो आपकी बुद्धि पे हानि पहुंचाएगा आप भजनंदी तो आपके भजन को ले लेगा तो किसी का भी अनुष्ठान कीजिए तो उतना ही अनुष्ठान कीजिए जितना संकल्प लिया है संकल्प के अनुसार उसे पूरा करेंगे तो आपका भजन मार्ग पुष्ट होता रहेगा।
महक मवानी जी नई दिल्ली से राधे-राधे महाराज राधे-राधे महाराज जी महाराज जी आजकल हम जैसे युवा इतने तनाव और चिंता में रहते हैं कि वर्तमान में जीने की बजाय भविष्य की चिंता में खो जाते हैं जिससे डर और बेचैनी बनी रहती है महाराज जी कृपया बताएं कि इस आदत को कैसे बदला जाए वर्तमान नाम जप अगर हम नाम जप करेंगे तो हमारी बुद्धि प्रवीण होगी भविष्य की मुझे चिंता नहीं होगी क्योंकि भविष्य में मेरे भगवान मेरे साथ हैं। नहीं अगर हमारे अंदर नाम जब चल रहा है तो हमको ये विश्वास है कि मेरे भगवान मेरे साथ है और जब संपूर्ण सृष्टि बनाने वाला भगवान मेरे साथ है तो मैं भविष्य की चिंता या भूत की चिंता में अपना समय क्यों नष्ट करूं अपने मन को बार-बार नाम में लगाने से जो ओवरथिंकिंग है इस पर हम कंट्रोल कर सकते हैं शासन कर सकते हैं और नाम जप हुआ बहुत बड़ा पुण्य बहुत बड़ा पुण्य तो हम जो सोचेंगे वो भी हो जाएगा तो हमको विश्वास होता जाएगा कि मेरा नाम जप मेरी सामर्थ्य है।
मेरा नाम जप मेरी कामनाओं की पूर्ति का उपाय है। मेरा नाम जप मेरे भगवान को सानिध्य में रखने की बात है। तो इससे हमें बहुत बड़ा लाभ मिलेगा। जैसे आज के 15 वर्ष पहले हमारे पास ₹000 भी दवा के लिए प्रति महीने के नहीं थे। कोई एक आदमी पानी देने वाला नहीं था। दोनों किडनी हमारी खराब। समस्या ही समस्या थी। कोई स्थान एक इंच जगह नहीं। सब तरह से केवल भगवान के आश्रित लेकिन हम निराश नहीं हुए कि मुझे भरोसा है मेरे साथ भगवान है। तो भविष्य की चिंता का हमारे पास उपाय है ना भगवान तो हमें चिंता नहीं है।
नहीं हम परेशान ना हो जाए। तो मुझे लगता है भविष्य की चिंता से बचने के लिए भगवान को सानिध्य में रखने से जैसे हम आपको बता रहे निहाल कर दिया भगवान ने जहां एक आदमी पानी देने वाला नहीं था वहां हजारों नौजवान ऐसे खड़े हैं कि कोई पानी पिलाता है कोई रुमाल से मुंह पोछता है कोई हाथ पकड़ एक कदम भी ऐसा नहीं है जो मुझे साथ ना मिलता हो सोचो अपना बेटा भी अपने काम में नहीं आता है जब शरीर बीमार होता है तो अपना बेटा भी इतना साथ दवा ला के दे देगा पड़े रहो। लेकिन ये ऐसा नहीं है।
एक एक मिनट हर समय अलर्ट खड़े हुए हैं। ये कौन है? भगवान। तो हमें जो भविष्य की चिंता से बचा सकता है तो भगवान बचा सकता है। क्योंकि सर्वलोक महेश्वर है। वो सब कुछ कर सकता। कैसे किया? वही परमात्मा कर रहा है। वो अपने आप सारी व्यवस्था कर रहा है। हम भगवान को अपना माने हुए हैं और भगवान का नाम जप करते हैं तो हमें भविष्य की चिंता नहीं। तो इसलिए भविष्य की चिंता से बचने के लिए भगवान का नाम जप किया जाए और भगवान को अपने सानिध्य में देखा जाए। सो ही बच सकते हो। नहीं तो भविष्य एक गुप्त वस्तु है।
क्या होगा तुम्हें पता नहीं है। उसी के विषय में चिंतन कर कहीं ऐसा ना हो जाए। कहीं ऐसा ना हो जाए। कभी नेगेटिव कभी पॉजिटिव। तो प्राय पॉजिटिव चिंतन कम रहता है। नेगेटिव चिंतन ज्यादा रहता है। अब सोच के घबराहट पैदा हो गई। इतनी पढ़ाई की, इतने पापा ने पैसा लगाया। अगर फेल हो गई तो पापा क्या कहेंगे? दोस्त मित्र क्या कहेंगे? और अगर इस बार फेल हो गई तो एज भी तो बढ़ती जा रही है। अब क्या होगा? अब नेगेटिव सोचते सोचते वो परेशान है। फेल कब होना है? फेल अभी हो गए हो।
तो हम अगर भगवान का चिंतन करें तो तुरंत पॉजिटिव चिंतन है। यार भगवान पास भी तो करवा देंगे। अगर फेल भी हो गए ना तो भगवान कोई दूसरा रास्ता निकाल देंगे। तो हम भगवान को यदि साथ लिए तो हम परेशान नहीं होंगे और अगर भगवान को साथ नहीं लिए तो चाहे जितना पास हो जाए हम वास्तविक एक दिन फेल हो जाएंगे। संदीप जी जम्मू से राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी जब हम दुख दुखी होते हैं या हमारा खराब समय चल रहा होता है जब हमारा आर्थिक या शारीरिक नुकसान होता है तब हम अपने विश्वास को कैसे प्रभु पर बनाए रखें और आपने किसी के साथ गलत आचरण किया और हमारे यहां का कानून आपको बंदी बना के दंड दे रहा है तो उसमें भगवान का क्या दोष है हमने कर्म किया उसका भोग भोग रहे हैं ऐसे अनेक जन्मों से हमारे कर्म होते चले आ रहे हैं तो उसमें भगवान का विश्वा विश्वास अविश्वास थोड़ी अब वो तो विधान है वो तो कानून है तो ऐसे कान भगवान भी कानून के अंतर्गत है जो भगवान ने कानून बना दिया उस कानून के अंतर्गत भगवान भी है जैसे राष्ट्रपति हो या प्रधानमंत्री हो हमारे भारतीय संविधान के विरुद्ध आचरण बन जाए तो उनको भी जेल जाना पड़ेगा नहीं जाना पड़ेगा तो ऐसे भी भगवान ने व्याध की तरह छुपकर बाली को मारा तो कृष्णा अवतार में अंतिम समय व्याध ने भगवान के चरण में बाण मारा कानून के बाहर नहीं है।
जो कानून बना दिया उसके अंतर्गत है। तो हमारे लोगों के जन्म जन्मांतरों के पाप है जो हमें दुख विपत्ति संकट और हमारी जो उन्नति है उसमें वो बाधा पहुंचाते हैं। उन्हीं के नष्ट करने के लिए तो हम प्रार्थना करते हैं कि नाम जप करो। अच्छे कर्म करो। दूसरों को सुख पहुंचाओ जिससे तुम्हारे पाप कर्म तुम्हें परास्त ना कर पावे। अब भजन करोगे नहीं। अब जैसे बहुत से लोग हैं मुर्गा, बकरा मांस खाते हैं, शराब पीते हैं। पराई माता बहनों से व्यभचार करते हैं और जब उनको संकट आता है तो भगवान को कोसते हैं।
तो इससे भगवान क्या करें? आप हमें बताओ। तुम्हें खेती दे दी गई, बीज दे दिए गए। अब बंबूल बो कि दाग छुआारा बो ये तुम्हारी बुद्धि की बात है। अब बो बंबूल और चाहो दाग छुआारा तो ऐसा तो नहीं हो सकता। ऐसे ही करो कर्म असत पाप कर्म और फल चाहो सुख तो ऐसा नहीं हो सकता। अच्छे कर्म का फल अच्छा होता है। बुरे कर्म का फल बुरा होता है। वो बुरा कई रूप धारण कर लेता है। कभी अपमान रूप धारण कर लेता है। कभी असफलता रूप धारण कर लेता है। कभी विपत्ति रूप धारण कर लेता है। कभी विनाश रूप भी धारण कर लेता है।
उसी से बचने के लिए हम कहते हैं नाम जप करो। भगवान की आराधना करो। तो जैसे मुकदमे में हम हार गए और हमको फांसी की सजा मिली। अब कोई उपाय नहीं कि आपको फांसी से बचाया जा सके। तो एक उपाय है राष्ट्रपति से क्षमा याचना। तो ऐसे हमारे भगवान हैं। अगर हम भगवान से क्षमा याचना करें तो हमसे माना कि गलतियां हो गई। हमारा बिल्कुल पक्का अपराध है। हमें भोगना भी पड़ेगा। लेकिन भगवान चाहे तो क्षमा कर सकते हैं ना। तो उन्होंने कहा आम तम सर्व पाप मोक्षस्याम मासचा मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त करके पवित्र कर दूंगा तो हम भगवान की शरण में जाए कुछ ना कुछ हमसे पाप बनते रहते हैं तो वो पाप हमें सता ना पावे हमें दुख ना दे पावे आगे हमसे पाप ना बन पावे ऐसी हमारी बुद्धि शुद्ध रहे इसलिए हमें भगवान की शरण में जाना चाहिए भगवान का नाम जप करना चाहिए और दूसरों का परोपकार करना चाहिए परोपकार से हृदय बहुत जल्दी पवित्र होता है अगर अगर हम पशु पक्षी का भी परोपकार करने लगे तो हमारा हृदय बहुत जल्दी पवित्र हो जाएगा।
निष्पाप हो जाएगा। समझ पा रहे हैं आप? इसमें भगवान को कोसने की जरूरत क्या है? भगवान का आपसे कोई दुश्मनी है क्या? बस ऐसे एक ना बीच में थोड़ा सा वो आप अपने को कोसिए। भगवान को क्यों कोसते हैं? आप अपने को कोसेंगे तो अच्छे बन जाएंगे कि यार मेरे से कोई गलती हो गई है। अभी नहीं सही तो पूर्व जन्म में कोई ना कोई पाप बना है जिसका दंड मुझे भोगना पड़ रहा है। चलो भोग लेते हैं। आगे से गलती नहीं करेंगे। तो एक आत्मबल मिलेगा। आप पवित्र भगवान को कोसोगे तो तो भगवान को आप कुछ भी करो तो भगवान तक पहुंच पाएगा क्या?
वो तो बहुत महान है। बहुत महान देखो पूरे अनंत ब्रह्मांडों का सृजन करके सबके अंदर खेल रहा है। वो चींटी के अंदर भी आराम से सो रहा है। और समस्त ब्रह्मांडों को अपने एक रोम कूप में रखता है। इतना महान है महतो महयान कि अनंत ब्रह्मांडों को एक रोमप में रखता है। और इतना छोटा है अणु अणयान कि वो चीटी के भी हृदय में आराम से सहन कर रहा है। ऐसा वो महान परमात्मा है। अणु अणयान महतो महयान युमाम पसति सर्वत्र सर्वम चम पसति तस्याह न प्रणस्यामि सच में न प्रणसति जो सर्वत्र श्री भगवान को देखता है सबको श्री भगवान में देखता है वही वास्तविक देखता है सर्वत्र भगवान सबके हृदय में और सब भगवान के हृदय में वास करते हैं ऐसे भगवान को हम भला कोस करके क्या प्राप्त कर लेंगे इसलिए उनकी शरण में जाए उनका नाम जप करें और अपने को कोसे कि हमसे कोई गलती हो गई है जिसका परिणाम मुझे दंड रूप में प्राप्त हो रहा है।
दीपांशु जी कनाडा से राधेधे राधे-धे महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी अगर मुझे ईश्वर के बारे में सोचना है तो मुझे क्या भाव करना पड़ेगा उनका कैसा चिंतन करना पड़ेगा जैसे भाव के पहले नाम जप करना पड़ेगा नाम से ही पहले कुभावों का तो नाश हो जैसे स्त्री के प्रति मन जाता है पुरुष शरीर होने पर नाना प्रकार के भोगों का चिंतन होता है। रुपए का चिंतन होता है। मान प्रतिष्ठा ये कुभाव है। कुभावों का नाश हो तब भावोत्सवेन भजताम रस काम धेनु तम राधिका चरण रेणु महाम स्मराम कुभावों का नाश करने के लिए पहले नाम जप जितना नाम जप करोगे उतने कुभाव नाश होंगे नहीं चाहे जो भष बना लो चाहे जिस देश में रहो कोई परिवर्तन नहीं होने वाला सर्वत्र माया है माया का कोई एक गढ़ नहीं क्या यहां माया नहीं है धाम है भगवान का पर यहां भी माया है भजन करोगे तो तुम्हारा चश्मा अलग होगा तुम्हें अलग दिखाई देगा और भजन नहीं करोगे तो अलग चश्मा होगा अलग दिखाई देगा तो हमारे पहले कुभाव नष्ट हो तभी तो भाव आएंगे सद्भाव भावोत्सव वो तभी आएगा जब कुभाव नष्ट हो कुभाव नष्ट होगा भजन करने से जितना नाम जप अध्यात्म भजन पर टिका हुआ है कुछ भी बन जाओ नाम जप नहीं है ना तो सब ढोंग है नाम जप नहीं है ना तो पाखंड का बोलबाला है और निरंतर गुरु द्वारा दिया हुआ नाम चल रहा है।
फिर देख लो फिर जो आनंद की अनुभूति होगी वह बात अलग होगी। नहीं तो परमार्थी तो वही है जिसमें संसारी फंसा हुआ है। उनका त्याग करके अपने नियम संयम में परमात्मा के चिंतन में चलता है। तो यह तभी होगा जब नाम जप करोगे। भगवान की पक्की वाणी समझो। नानक नाम जहाज है। चढ़े से उतरे पार। हमारे जीवन में एक ही बात रह गई है। नाम नाम बस हर प्रश्न का उत्तर आपको नाम में मिलेगा और नाम जप लो और हर समस्या का समाधान ना हो जाए तो हमसे बता देना और नाम जप ना करो कुछ भी कर लो कुछ नहीं होने वाला ये नाम से ही सब कुछ है।
बड़े-बड़े महापुरुषों की, बड़े-बड़े संतों की और बचपन से लेकर अभी तक की अपनी भी अनुभूति नाम, खूब साधन, सांख्य योग, अष्टांग योग, कर्म योग, भक्ति योग इन चार योगों का तो भगवान की कृपा से ज्ञान है ही है और किए ही हैं। नष्टिक ब्रह्मचारी सन्यासी वह मार्ग और वैष्णव का शरणागत निज मंत्र यह मार्ग सब मार्ग देख के सब महापुरुषों की वाणी सुनकर एक बात समझ में आई जिसने नाम का भरोसा ले लिया वो पार हो गया और जो नाम छोड़ दे तो कुछ भी कर लो आप पार नहीं हो सकते ये पक्की बात हमारी क्योंकि नाम हर समय जैसे हम जप रहे हैं तो हर समय उसका तार है एक तार नाम जप तो उसको अवसर नहीं मिलता संसार के चिंतन का।
अब थोड़ी देर हम सोच लिया मैं ब्रह्म हूं और इसके बाद चिंतन संसार का तो ब्रह्म हूं कहते हुए भी घसीट के वो माया डाल देगी। शिव विरंच का मोह कोहे बुरा अस ज भजी मायापति भगवान माया बहुत प्रबल है। केवल मैं ब्रह्म हूं। इतने कहने से नहीं मानेगी। रात दिन नाम जप करो तब पार हो जाओगे। नाम जब छूटा माया घसीट लेगी। और आप समझ ही नहीं पाओगे माया किसे कहते हैं। घसीट करके उसके अनुसार भोग करोगे यह कृपा नहीं कृपा है जब ये अच्छा ना लगने लगे नहीं खानपान ते भावे है नहीं कोमल वसंत सुहावे है सब विषय लगे ते खारा है हरि आशिक का मग न्यारा है खानपान सुख चाहत अपने तिनको प्रेम छुवत नहीं सपने जो नाना प्रकार की विलासता तो इसलिए नाम जप सच्ची मानो सबके लिए प्रश्न का उत्तर है नाम जप राधा राधा कृष्ण कृष्ण शिव शिव राम राम राम राम वाहेगुरु वाहगुरु जो प्रिय लगे जो गुरुदेव ने दिया उसको खूब जपो निरंतर जपो बस हर प्रश्न का उत्तर है जब बड़े-बड़े सिद्धों को शरीर का भोग भोगना पड़ा तो तुम्हारे छू छा से किसी का भोग नष्ट हो जाएगा इसलिए किसी भी तरह की समस्या का समाधान भगवान का नाम जप है अन्य किसी तरह भटकने करने की कोशिश मत करो।
कोई तुम्हारे दुख को दूर नहीं कर सकता। सुनो भरत भावी प्रबल बिलख कहो मुनि हानि लाभ जीवन मरण जस अपजस विधिया बस भगवान के भरोसे रहो जो दुख सुख पड़े सह लो और नाम जप करो तो माया से मुक्त हो जाओगे और अगर नाम जप नहीं तो मेरी मेरी अनुभूति माया बखशेगी नहीं कहीं ना कहीं भ्रष्ट हो जाओगे और फिर अगला जन्म हो जाएगा और नाम जप चल रहा है तो पार हो जाओगे बिल्कुल सुदृढ़ बात सहज बात नानक साहब कह रहे नानक नाम जहाज है चढ़े सुरे पार नाम में चढ़ गए पार हो गए निरंतर नाम जप करो पार हो गए नाम एक ऐसा जहाज है जिस पर बैठने वाला आज तक डूबा नहीं कलयुग केवल नाम आधारा सुमिर सुमिर नरतरे तो खूब नाम जप करो तब भाव बन पाएंगे
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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