जिसका लक्ष्य भगवत् प्राप्ति होता है उसके क्या लक्षण होते हैं?
श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।
पूरा प्रवचन
रस शेखरी शरण जी वृंदावन से महाराज जी जिसका दृढ़ लक्ष्य भगवत प्राप्ति हो गया है उस साधक के क्या लक्षण है नारायण हरि भजन में पांचो न सुहात विषय भोग निद्रा हंसी जगत प्रीत बहु बात ये पांच पॉइंट बताए नारायण स्वामी स्वामी ने कि जिसको भजन मार्ग में रुचि हो गई है नारायण हरि भजन में तो उसको पांच बातें अच्छी नहीं लगती। निद्रा बहुत नींद लेना, हंसी मजाक करना, बहुत प्रपंच की घंटों खड़े बातें करना, बहुत स्वादिष्ट भोजन करना, नारायण हरि भजन में पाचन सुहाग विषय भोग में सब आ जाता है।
रस्द का विषय भोग स्वादिष्ट भोजन जनेंद्र का विषय भोग शरीर भोग नेत्रेंद्र का रूप श्रवणेंद्र के वचन ऐसे ही तग्द का स्पर्श आदि ये सब विषय भोग के अंदर आते हैं। जिसकी भजन में रुचि हो जाती है उसे विषय भोग अच्छे नहीं लगते। नींद अच्छी नहीं लगती। हंसी मजाक अच्छा नहीं लगता। उसके हृदय में सुमिरन की इतनी तार बंध जाती कि उसे किसी से बात करना अच्छा नहीं लगता और संसार के किसी से भी प्रेम करने की इच्छा नहीं होती उसके अंदर हाय हाय मच जाती है ब्रह्मादिक के भोग सब विषम लागत ताई नारायण ब्रज चंद की लगन लगी है जाए जिसे भगवत प्राप्ति की लगन लग जाती है उसको सब विषय भोग ब्रह्मा तक के उसे विश्वत लगते हैं।
इसलिए ऐसा वैराग्य ऐसी लगन लगाने के लिए हमें भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए। खूब नाम जप करना चाहिए और गंदी बातों को छोड़ना चाहिए जिससे हमारी ऐसी स्थिति आवे कि हम भगवान के लिए ब्रह्मलोक तक के भोगों का वैराग्य धारण करके उनके प्रेम में डूबे। महाराज जी जो आपने बोला इसकी लालसा तो हो रही है कि ऐसी स्थिति हो बट हम सब नए साधक हैं तो मतलब अभी ऐसा लगता है कि सारे लक्षण तो बहुत दूर की बात हां नाम जप से आ जाएगा जितना आप नाम जप करोगे भगवान के नाम जप में अपार सामर्थ्य है नाम जप के द्वारा आप पक्की बात समझ लो कि जो राम नहीं कह पाते थे राम नहीं पुकार सकते थे ऐसी स्थिति थी वही भाई ब्रह्म ऋषि हो गए।
उल्टा नाम जपत जग जाना। नाम का ऐसा प्रभाव है कि अपार सामर्थ्य नाम में यदि भगवान का नाम आप जपोगे तो जप कर देख लीजिए। आपके अंदर सुंदर ज्ञान सुंदर वैराग्य पवित्र बुद्धि बड़ी निर्मलता आने लगेगी। भगवान का नाम संकीर्तनम यस सर्व पाप प्रणाशनम सारे पापों को नष्ट कर देता है और हृदय में ज्ञान प्रकाशित कर देता है। तो संतों के प्रति कैसा भाव हो? क्या सावधानी रखें या क्या हमारे लिए कुछ विशेष भगवान भगवान श्री रघुनाथ जी कह रहे हैं सातों सम मोहि मैं जग देखा मोते अधिक संत कर लेखा मेरी सातवीं भक्ति है कि सबको भगवत स्वरूप देखें लेकिन संतों को भगवान से भी बढ़कर देखें मोते अधिक संत कर लिखा तो हम भगवान से अधिक अगर ना भाव कर पावे तो भगवान के निज स्वरूप है निज जन है चाहे जैसी उनकी लीला हो बाहरी कोई सतोगुणी लीला करते हैं कोई रजोगुणी लीला करते हैं कोई तमोगुणी लीला करते हैं संतों की लीलाएं होती हैं सब में हम निर्दोष भाव रखकर भगवत भाव रखकर उनके चरणों की वंदना करें इसी से हमारा परम मंगल होता है से
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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