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अगर एक नाम का इतना बड़ा फल है, तो निरंतर नाम क्यों जपें?

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

निखिल जी मुंबई से राधा वल्लभ श्री हरिव श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी एक नाम का फल पूरा त्रिभुवन से भी बड़ा है तो फिर निरंतर नाम जप क्यों कहा जाता है क्योंकि एक नाम जिसको कहा गया तो एक बार जिन नाम ली हित सो होए अति दीन शर्त है हित माने प्रेम और दैन्यता प्रेम और दैन्यता से आर भाव से एक पुकार एक बार पुकारे तो एक नाम त्रैलोक कह तारे जो न ले सो जन्म हारे पर उस उस एक बार नाम के लिए हम बार-बार प्रयास करते हैं कि हमारा अहंकार नष्ट हो हमारी मलिनता नष्ट हो हमारा राग नष्ट हो और हमारे अंदर प्रेम आवे दैन्यता आवे एक बार प्रेम और दैन्य युक्त होकर पुकार दे उसी समय भगवान प्रकट हो जाएंगे एक बार जिन नाम ली हित हित माने प्रेम हित सो होए अति दीन अति दीन तो ना हमारे पास दन्यता है और ना हमारे पास प्रेम है।

तो उसी के लिए हमें बार-बार जप करना पड़ता है कि नाम से प्रेम भी आएगा और अहंकार का नाश भी होगा और दैन्यता भी आएगी। तो प्रेम और दैन्यता से युक्त होकर एक बार नाम लेने से काम हो जाएगा। पर उस स्थिति को प्राप्त करने के लिए हम जीवन भर प्रयास करते हैं। निरंतर नाम जप करते हैं कि कभी हम प्रेम से अति दैन्य होकर एक बार हमारा नाम निकल जाए जिससे काम बन जाए। समझ रहे हो ना? डॉक्टर निराली शाह जी मुंबई से राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी मैं और मेरे पति जब से आपसे जुड़े हैं तब से नाम जप और आपके शब्दों से जीवन में अत्यंत सकारात्मकता आई है।

महाराज जी मेरा प्रश्न है कि मेरे पति और मेरी भावनाएं एक दूसरे से इतनी जुड़ी हुई है कि मैं खुश होती हूं तो वो खुश हो जाते हैं। अगर मैं परेशान हुई तो उनकी मनस्थिति भी अत्यंत बेचैन हो जाती है। हां हम पहली बात तो आप दोनों को धन्यवाद देते हैं और भगवान ऐसी कृपा करें कि आप पति पत्नी का ऐसा ही प्रेम बना रहे तो आजकल तो पति पत्नी के प्रेम में भी संशय होने लगा है। आपकी बात सुनकर मेरा हृदय शीतल हुआ कि कम से कम इतना तो है ना कि हमने संसार को स्वीकार किया तो हमारा संसार सजा हुआ तो है ना।

उजड़ा हुआ तो नहीं है ना। वो उजड़ा हुआ संसार है। पति किसी और की तरफ देख रहा है। पत्नी किसी और की तरफ देख रही। पति को अपने जीवन से संशय, पत्नी को अपने जीवन में संशय है। अगर ऐसा ऐसा गृहस्ती है तो वो बड़ा निंदनीय गृहस्ती। धन्यवाद। पहली बात तो आपके इस पति प्रेम को और धन्यवाद उस पति को जो आपको प्रेम कर रहे हैं। ऐसा ही होना चाहिए। हम यही चाहेंगे। इसीलिए हम गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड के सिद्धांत को निंदनीय मानते हैं। क्योंकि जब हमारी अभ्यास वृत्ति चार पुरुषों से मिलने की हो जाएगी।

चार लड़कियों से मिलने की हो जाएगी तो हमारा गृहस्थ धर्म नष्ट हो जाएगा। हम पति पत्नी प्रेम से नहीं रह पाएंगे। हमारी वृत्ति खराब हो जाएगी। व्यभिचार प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहे हो और ये प्रवृत्ति आपको एक में टिकने देगी क्या? नहीं टिकने दी तो आपका गृहस्थ धर्म नष्ट हो जाएगा। आपकी गृहस्ती बिखर जाएगी। कितना सुंदर गृहस्थ धर्म देखो कितनी सुंदर बात कही। अगर मैं मुस्कुरा देती तो मेरा पति मुस्कुरा देता है। वो आनंदित हो जाता है। ये बात होनी चाहिए। वो ड्यूटी से आ रहे हैं और आप मुस्कुराती हुई मिली।

उनकी सारी थकान मिट गई। आपकी मुस्कुराहट से अब वो ड्यूटी से आ रहे हैं। आप प्रपंच कर रहे हो। सांसारिक गलत आचरण वो हृदय जल रहा है। वो क्या गृहस्थ जिसका परिवार उसके अंडर में नहीं उसके प्रेम में नहीं। पहली बात तो हम धन्यवाद देते हैं। आप लोग ऐसे सुखी रहिए और खूब भजन कीजिए और सब हमारी समाज पत्नी पति को प्रेम करें, पति पत्नी को प्रेम करे। भगवान की आराधना करें। यही तो हमारा गृहस्थ धर्म है। अब गृहस्थ धर्म बिखर रहा है। आज जो ये लिविंग रिलेशन ये जो गर्लफ्रेंड बॉयफ्रेंड चल रहा है ये पहले कभी नहीं था।

40 वर्ष पहले हमने नहीं देखा। अब तो उसकी लहर चल रही है। जहां जीवन भविष्य राष्ट्र के लिए धर्म के लिए समर्पित करने के लिए हम विद्या अध्ययन कर रहे हैं। वहां व्यसन और व्यभचार की प्रवृत्ति बढ़ती चली जा रही है। यह तो बहुत आश्चर्य की बात है। कलयुग में पति पत्नी इतना प्रेम करें। धन्यवाद है। महाराज जी कल एक जने आए थे। उनके 19 वर्षीय बेटे ने आज कर ली। फांसी लगा ली। तो कारण तो किसी से रिलेशनशिप में था। वहां उसको धोखा मिला। सह नहीं पाया। वैसी अज्ञानता की स्थिति में उसने अपना शरीर पूरा कर लिया।

अल्प अवस्था है और समझ इतनी है नहीं है और छोटी सी भी प्रतिकूलता आने पे वो किसको बताए और फिर आत्म हां अब वो क्या होता है? दुर्गति हो गई। आ दुर्गति हो गई। कोई इसीलिए तो सत्संग की आवश्यकता है। अध्यात्म की आवश्यकता है जो हमें जीने की कला सिखाता है। अब मर जाना कोई समस्या का समाधान है क्या? मर जाने के बाद तो और समस्या हमारा कर्म बिगड़ गया। अब हम किस योनि में जाएंगे? प्रेत बनेंगे, सूअर बनेंगे, कुत्ता बनेंगे, क्या बनेंगे? मनुष्य बनकर तो हम अपना संभाल सकते हैं।

लेकिन अन्य योनियों में हम कोई कर्मुष्ठान थोड़ी कर सकते हैं। धर्मानुष्ठान नहीं कर सकते। कोई भजन नहीं कर सकते। केवल नियति के द्वारा नियत जो हमारा सुखदख है उसी को भोगते हैं। इसलिए की तो कभी नहीं सोचना चाहिए। किसी को नहीं सोचना चाहिए। अच्छा अब जैसे सरल चित्त होते हैं नई अवस्था के बच्चे 16 18 20 बिल्कुल सरल चित्त होते हैं। अब वह एक दूसरे को दिल दे दिया, मन दे दिया। अब उनको धोखा मिला। मान लो किसी को भी एक से। अब वो सह नहीं पाता। उसको दूसरा रास्ता नहीं दिखाई देता।

वो अपने मन की बात किससे कहे? माता-पिता से कह नहीं सकता। किसी से कह नहीं सकता। अब वो घुट घुट करके फिर मन इतना नेगेटिव हो जाता है कि चलो शरीर को ही शांत कर देते हैं सुसाइड कर लेते हैं। ये गलत बात है। अगर कोई ऐसा तुम्हारा दिल टूट गया तुम्हारे तो सबसे बड़ा दिलबर तो अभी विराजमान है ना भगवान उससे चित्त जोड़िए। वो आपको उससे अच्छा मिला देगा। उससे अच्छा दोस्त मिला देगा। आपको शरीर छोड़ने की जरूरत नहीं है। भगवान ने संसार में एक से एक रचा है। अगर एक जगह धोखा पाया है तो भगवान की आराधना कीजिए।

वो बहुत सुंदर मित्र मिला देगा। मरने की जरूरत नहीं है। नहीं हमारा मनुष्य जन्म बहुत कीमती है। इसको यथार्थ में भगवान की शरण में समर्पित करके हम हर लाभ ले सकते हैं। हर लाभ ले सकते हैं। देखो करदम जी ने भगवान की आराधना की और कहा हमें पत्नी चाहिए। तो महाराज सम्राट मनु की पुत्री देवूती जी मिली। अगर हमें मित्र भी चाहिए तो हम भगवान से मांगे कि हमें ऐसा मित्र दो। कितना सुंदर बात कही उसने कि हम मुस्कुरा देती तो मेरा पति खुश हो जाता है। पति खुश है तो मैं खुश हो गई।

यही तो जीवन है यार। यही तो जीवन है गृहस्ती का। गृहस्ती में तो कम से कम इतना सौभाग्य तो हो कि पति पत्नी में, पुत्र में, पिता में, माता में ये प्रेम हो। तो जो चार लोग परिवार के हैं वो प्रेम से जीना सीखें। लेकिन अध्यात्म के बिना प्रेम कहां छल कपट नाना प्रकार की वासनाएं भरी हुई है। इसीलिए सब कलह अशांति बनी रहती है। इसीलिए सत्संग की आवश्यकता है। अध्यात्म बहुत जीवन सुरक्षित कर देता है। इसलिए अध्यात्मवान बनो। सत्संगी बनो। गलत आचरणों का त्याग करो। भगवान सबकी बुद्धि स्वस्थ रखें।

शरीर स्वस्थ रखें और खूब नाम जप करो। इसी जीवन की सार्थकता

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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