॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1395

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

मीनाक्षी संदीप जी ऑस्ट्रेलिया से श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि नमन महाराज जी पुराने समय में संत महात्मा गृहस्थ जीवन का भी पालन करते थे और मोक्ष प्राप्ति करते थे तो महाराज जी वैराग्य की क्या आवश्यकता है वैराग्य की आवश्यकता या केवल कपड़ा उतार के बाहर चले जाने को ही वैरागी कहते हैं। क्या किसका प्रश्न है? हां, बात समझना है। केवल स्त्री संभोग ही गृहस्थ मार्ग थोड़ी है। केवल कपड़ा उतार के फेंक देना ही वैराग्य मार्ग थोड़ी है।

आसक्तियों का नाश किए बिना भगवत प्राप्ति जिसको हो गई हो हमें बता दो। किसी एक ब्रह्म ऋषि का नाम लो कि खूब भोगी और नाना प्रकार के विषयों का सेवन करने वाले और भगवत प्राप्त हुए। जिन महात्मा का नाम लोगी ना तो उनके घर में खाने को भी नहीं मिलेगा। निरंतर भगवदाकार अस्तमा रहे शरीरा और उनकी पत्नी देवी आठों पहर ऐसे तपस्वी पति की सेवा में और फिर उनसे जो संतान हुई वो ब्रह्म ऋषि तो ऐसे थोड़ी जीवन में एक दो बार संतान उत्पत्ति के लिए पत्नी का सहवास किया। 10 10 हजार वर्ष तक तपस्या करके तू पत्नी चाह रहे हैं।

करदम जी ने 10,000 वर्ष तपस्या करके तब भगवान जब प्रकट हुए तो उनसे कहा मुझे पत्नी चाहिए। तब देवभूति जी महाराज मनु की पुत्री पत्नी रूप में मिली। फिर तपस्या में संलग्न हो गए। फिर इसके बाद सेवा में देहूती जी कितने वर्षों तक रहे। फिर एक दिन देखा जी की तरफ तो मानो उन्होंने कहा कि प्रभु भावना में देखा कि देहूती जी कह तो नहीं पा रहे लेकिन मानो ये चाह रहे कि गृहस्थ धर्म का मुझे फल मिलना चाहिए तो अपने तपोबल से उन्होंने ऐसा विमान बनाया नौ खंड का और कहा स्नान करो सरोवर में तो दिव्य देव शरीर नौ रूप धारण करके करदम जी ने नौ कन्याएं प्रकट की और भगवान कपिल देव जी वहां प्रकट हुए जिन्होंने उपदेश देकर माता-पिता दोनों का परम मंगल किया तो इनको आप वैरागी कहेंगे या गृहस्थ कहेंगे आप विचार

करके देखो किस जिस ऋषि का नाम लो आप हमें बताओ अब हम लोगों के भाग्य में वैराग्य मार्ग लिखा है हम लोगों के भाग्य में भोग नहीं लिखा है तो हम इस मार्ग से चल के भगवान को प्राप्त कर रहे हैं आप लोगों के भाग्य में भोग है तो भोग को योग बनाते हुए भगवान की प्राप्ति करो ऐसा थोड़ी कि तुम मनमान माने भोग करो और भगवान को प्राप्त हो तुम भगवान को प्राप्त हो क्या इनमें कितने भगवान को प्राप्त है हमें बताओ भोग तो भोग रहे हो कितने भगवान को प्राप्त है तो वैरागी कितने भगवान को प्राप्त है और जो रात दिन भजन में लगा है और भगवान को भोग लगा के हर वस्तु भगवान नाथ सकल संपदा तुम्हारी मैं सेवक समेत सुत नारी वो गृहस्थ भगवान को प्राप्त हो जाएगा भगवान को जो भजेगा वो भगवान को प्राप्त होगा चाहे गृहस्थ हो चाहे विरक्त हो अब कहते बनने की क्या आवश्यकता है तो देखो भगवान की संपूर्ण सृष्टि है।

सबसे पहला भगवान का अवतार हुआ सृष्टि में जो सबसे पहला वो त्यागी और सन्यासी का ही हुआ। सनक, सनंदन, सनातन, सनत कुमार। सबसे पहले हमारे पूर्वज हैं। सृष्टि के चार ब्रह्म ऋषि प्रकट हुए। वैराग्य। हम लोग भजन अपने लिए नहीं करते हैं। तुम्हारे लिए करते हैं। सच्ची मानो ना हमारा भजन किसके लिए होता है? तुम्हारे लिए होता है। हम जिस परिवार में पैदा हुए उसका कल्याण। जिसका अन्न खाया उसका कल्याण। जिसका वस्त्र पहनते उसका कल्याण। जिसको देखा उसका कल्याण। जिससे बात की उसका कल्याण।

संत कल्याण का मूर्तिमान स्वरूप है। और आप अपना कल्याण कर लो। यही बड़े भाग्य की बात है। अगर गृहस्थ और विरक्त का भेद पूछो तो आप अपना कल्याण करने में नाको चना चबा लेंगे और वो सतर सतर सा लोकान तारति वो स्वयं तर जाता है। स्वयं तर जाता है और लोकों को तार देता है। मम भक्ति युक्त भवनम पुनातु त्रिभुवन को पावन करने की सामर्थ्य उस महात्मा में होती है जो काछवाच मन निश्चल राखे धन धन जननी तेरी रे नरसी मेहता जी कहते हैं जो लंगोटी का पक्का जीवन में कभी गलत आचरण नहीं किया जबान का पक्का और मन का पक्का वो भगवान का पक्का दास पूरे विश्व का कल्याण कर सकता है सर्वे भवंतु सुखिला सर्वे अब ये घर में लड़का बच्चा के बीच में रह के नहीं हो सकता हैं जब मन आया तब स्त्री भोग भोग लिया जब मनाया तब भोजन पा लिया और जब मन आया तब सो गए

जो भोग मन आया और यहां भूख लगी अब तो भोजन नहीं मिले तो भगवान को थोड़ी छोड़ा है किसी की याद थोड़ी आई कि केवल भगवान का प्यार चाहिए मुझे नहीं चाहिए किसी का प्यार आज तक एक दोस्त नहीं आप सही निकल गए उस टाइम कोई बॉयफ्रेंड गर्लफ्रेंड का पंगा नहीं था बहुत सही निकल गया तो सच्चे हमारे जो जमाना है हमारी जो पीढ़ी है जैसे हम बाहर घूमते रहते हैं ना तो बाबा जी ऐसे गर्लफ्रेंड नहीं है ना उसको सोचते हैं अरे कैसा इंसान है इसकी गर्लफ्रेंड नहीं है मतलब इसको गिनते ही नहीं है जैसे ही है बस कोई काम का नहीं है कोई दोस्त नहीं बनने का सोचे यार ये तो इसको दूर करो ये क्या वैसे हमारे समय में नहीं था ये बहुत ये जब स्कूल जाते थे तो ये मतलब ये कोई प्रपंच की बात ही नहीं थी नहीं है तो लोग हमसे कहते हैं तो कोई गर्लफ्रेंड ही नहीं है भगवान को बुलाओ यार इतना बढ़िया दोस्त है भगवान प्रिया प्रीतम विल से मस्त रहो देखो ऐसे हमें दोस्त मिल गए दोनों प्रिया प्रिया प्रीतम श्यामा श्याम कि पूछो मत हमें किसी की जरूरत नहीं ये तो भगवान ने

सेवा दी इसलिए आपके सामने बैठ के बात करते हैं। नहीं ऐसे बैठने में जो सुख है वो ऐसे बैठने में नहीं है। आप समझ रहे हो हमें भी आप हम अपने सुख का त्याग कर तभी कह रहे हैं कि वैराग्य लेने की जरूरत क्या है? अपने सुख का त्याग करके आपके लिए भजन करना। आपके लिए ज्ञानार्जन किए हुए जीवन की बातें आपको देना। नहीं तो हमें क्या आप कोई फीस देके आए हो क्या? नहीं। हां। आप अपना समय दो। आप हमारा समय लो। आप अपनी भिक्षा दो। हमारी शिक्षा लो। दोनों का कल्याण हो जाएगा। भिक्षा से हमारा भजन बन रहा है।

शिक्षा से तुम्हारा भजन बनेगा। दोनों को मंगल हो जाएगा। और दोनों जरूरत है। वो जब बालकों की तरह पूरे जगत को अपने उदार चरिता नाम वसुध कुटुंबकम। अब हम अच्छा आप सच्ची बताओ हमारे सामने बैठे हो। क्या हम आपको पराए लग रहे हैं? नहीं। एक बात बता रहा हूं। ऐसा नहीं लगता ना कि यह हमारे हैं। हमारे घर के हैं। तो क्या ऐसा गृहस्थ किसी गृहस्थ से कह सकता है? ऐसा देख सकता है। आप क्यों देख रहे हैं? क्योंकि हमारा कोई नहीं है आपके सिवा। आप सबके सिवा हमारा कोई नहीं। इसलिए आप सबको यह दिखाई देगा कि बाबा जी पर्सनल मेरे लगते हैं।

बाबा जी ऐसा लगता है कि मेरे हैं। नहीं लगता है क्योंकि हमारा कोई नहीं है और अगर हमारा कोई हो तो अभी ये बात लगना बंद हो जाएगी। इसलिए विरक्त अधिवाद है। बिना विरक्त के जगत कल्याण नहीं हो सकता। जगत मंगल नहीं हो सकता। समझ में आया? राजेंद्र कुमार जी श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी हमारे जो शरीर में जीवात्मा है वह हमें सही गलत करने का प्रेरित करती है या हमारा मन पहली बात तो ये अज्ञान की बात है आपकी हमारी जीवात्मा हमें प्रेरित कर रही है मतलब दो चीज हो गए इसमें जीवात्मा एक अलग हो गया और आप अलग हो गए नहीं हो गए देखो ना फिर प्रश्न करो महाराज जी जो हमारे जो शरीर में जीवात्मा है वह हमें सही गलत करने का प्रेरित करती है ना हमारा जीवात्मा अलग हो गई हमें अलग हो गए नहीं तुम ही हो जीवात्मा तुम ही हो जीवात्मा तुम और कोई नहीं क्यों कि कोई अंतर है सोचा शायद मिस्टेक हो रही हो हमसे जीवात्मा आप ही है ना तो अब आपको गलत सही का निर्णय आप ही दे रहे हैं कोई और दे रहा है क्या अब मानना ना मानना यह बुद्धि और मन के अंतर्गत की बात है।

तो आप मन बुद्धि नहीं है। आप जीवात्मा है। जब मन बुद्धि कोई गलत चाल चलना चाहता है तो अंदर से प्रेरणा होती है। गलत है। पर आप अपने स्वरूप को ना जानकर मन बुद्धि में तन्मय होने के कारण आप मन बुद्धि की बात मान लेते हैं। अपनी बात आप नहीं मानते। अपनी बात को ठुकराकर दूसरे की बात मान लेते हैं। मन बुद्धि की इसीलिए जेल भरी पड़ी है। इसीलिए नरक जाना पड़ता है। इसीलिए दुर्गति होती है। यदि आप अपनी बात मान ले और मन की बात ना माने तो किसी से पूछने की जरूरत नहीं। आप ब्रह्म ज्ञानी हो जाएंगे।

आप भगवत स्वरूप में स्थित हो जाएंगे। समझ पा रहे हैं आप? लेकिन हम अपनी बात को ठुकरा देते। बोले यार अंदर से आया था हमारे कि नहीं करना है पर हमने कर दिया तो अंदर से जो आया था वह आपकी बात थी बाहर से जो कह रहा है कि मुझे यही करना है यह मन की बात है मना कष्टान इंद्रण प्रकृति स्थान करति मन पांच ज्ञान इंद्रियों के साथ प्रकृति जन्य भोगों में जा रहा है और अंतरात्मा उसे मना करती है परमात्मा आनंद की प्राप्ति के लिए हमारा मानव जीवन हुआ है हम भोगानंद में मस्त स्त हो रहे हैं।

भोगानंद से हटे तो हमारा स्वरूप ही आनंदमय हमारा स्वरूप ही आनंदमय कोई और आनंद कहीं से आना थोड़ी है। जो आनंद सिंध सुख राशि हमारा अंशी है वही हमारा सुख राशि स्वरूप चेतन अमल सहज सुख राशि ईश्वर अंश जीव अविनाशी समझ पा रहे हो तो हम अपनी बात समझे वो हमारी बात जीवात्मा कौन है? हम ही तो हैं। हम अपनी बात ठुकराकर मन की बात मान लेते हैं तो मनमानी हो जाता है और मनमानी में दंड है। अगर हम आत्मा की बात माने, गुरु की बात माने, शास्त्र की बात माने तो हमारा कल्याण हो जाए।

पर हम मन की बात मान लेते हैं। मन फंसा रहा है पांच इंद्रियों के साथ भोगों में तो हमसे गलती हो जाती है। छोटे छोटे भोग में भी मन फंसता है। नाम लेने पर भी छोटे-छोटे भोगों में भी मन फसता नाम लेने पर बिल्कुल बिल्कुल मन का तो कार्य ही है वो छोटा-छोटा व्यसन बीड़ी तंबाकू चाय पानी छोटे-छोटे व्यसन हम नहीं छोड़ पाते कि संसार के और बड़े भोग तो भजन करो तो सब छोड़ सकते हो। कि नहीं यह नहीं करना है। अगर आप आप भजन और बढ़ाओ भजन की क्षमता बढ़ेगी तो भोग त्याग होता जाएगा।

और भोग त्याग अगर ना भी हो पाया तो बांध नहीं पाएगा। भजन में बहुत बड़ा बल है। देखो अपने पुत्र के लिए नारायण बुलाया तो भगवत प्राप्ति हो गई। हम जानबूझकर राधा राधा बोलेंगे तो हमें भगवत प्राप्ति नहीं हो जाएगी। तो हम खूब नाम जप करें। भोगों का चिंतन ही ना हो पावे। त्याग भाव से भी ना चिंतन हो पावे। उसका चिंतन ही करना खराब है। हम भगवान का चिंतन करें और [गला साफ़ करने की आवाज़] बिना भोगे शरीर चल नहीं सकता। यह भी बात समझो। शरीर के लिए पानी का भोग चाहिए, भोजन का भोग चाहिए, आवश्यक घी दूध चाहिए, आवश्यक फल फ्रूट चाहिए।

अगर ये नहीं जाएंगे तो शरीर नहीं चलेगा। चाहे जितना बढ़िया गाड़ी हो। अगर पेट्रोल नहीं डालोगे तो गाड़ी हवा में थोड़ी उड़ेगी। उसको पेट्रोल चाहिए। अब कह दे त्यागी हो जाए पेट्रोल की तो गाड़ी नहीं चलेगी। तो इस शरीर में कुछ भोग आवश्यक है। जैसे हमारे प्राण का पोषण वायु, जल, अन्न इनसे होता है। जरूरी है। अब अन्न जरूरी है ना कि स्वाद जरूरी है। अगर रोटी, दाल, सब्जी से हमारे प्राणों का पोषण हो रहा है तो बर्गर, पिज़्ज़ा और चााउमीन इनकी जरूरत क्या है? आप समझो। अब यह जो चाहत है यह हमें मिटा दे भगवान की कृपा से अगर घर में बढ़िया हमें दूध रबड़ी रसगुल्ला मिल रहा है तो जय जय आपकी और अगर नमक रोटी मिल रही है तो जय जय आपकी पर जरूरी है विषय प्राणों का पोषण करने के लिए अन्न वायु जल जरूरी है जैसे गाड़ी में पेट्रोल डलवाया जाता है तो एक और भी चीज पड़ती है ऐसे घी चाहिए घी दूध यह चाहिए।

अब नहीं है तो फिर केवल रोटी से भी काम नहीं चलेगा। समय-समय पर इसको विटामिन भी चाहिए। देखो गाड़ी स्वस्थ रखेंगे तो यात्रा सफलतापूर्वक हो जाएगी और गाड़ी साफ स्वच्छ और उसको खवाओ पियाओगे नई गाड़ी को तो फिर यात्रा कैसे होगी? तो हमें लगता है उचित भोगों का भोग अनिवार्य है। अब जैसे 50 वर्ष की आयु से ऊपर जो जा रहे चाय पिया गर्म हो गया शरीर शौच आदि की व्यवस्था की नहाया धोया अपने काम मिले। हमको यह नहीं देखना है। हमको देखना है हमारा शरीर चले और भजन बने। हम कह रहे हैं कोई भी विषय जो शास्त्र विरुद्ध है वह हमें नहीं छूना चाहे जितना हमें लाभ हो या हानि हो और जो धर्म युक्त है उस विषय का सेवन करते हुए हमें भगवान के मार्ग में चलना है तो इसलिए ऐसा नहीं कि सर्व विषय त्यागी कोई हो सकता है महाराज जी मन और आत्मा की बात में कैसे अंतर मन प्रकृति का और आत्मा चिदानंद है।

अंतर ही अंतर है। जैसे हम और हाथ में अंतर है ही अंतर है। हाथ ही पंचभूतों से बना है और हम चैतन्य घन सच्चिदानंद हैं। लेकिन हम अपने को भूल करके अपनापन इतना कर लिए कि मेरा हाथ मतलब मैं ही हूं ऐसा लग रहा है। नहीं लग रहा शीशा में देखते हो तो ये लगता है मेरा शरीर नहीं लगता है। मैं नहीं मैं नहीं लगता। यही अज्ञान है। आत्मा बहुत चिदानंदमय आप काम कोई कामना नहीं। और जो मन है यह कामना का घर है। यह बिना कामना के रह ही नहीं सकता। कामना हट जाए तो फिर मन रह ही नहीं जाएगा।

अमना हो जाएगा। कामना ही मन है। विषय चिंतन ही मन है। अगर विषय चिंतन हट जाए तो फिर मन क्या? इंद्रियाणा मनस्म वो तो साक्षात भगवान हो गया। कामनाओं का त्याग करना ही हमारी साधना है। तो जो आवश्यक है उसे कामना नहीं कहते। जैसे प्यास लगी है तो पानी पीना कामना नहीं है। ये आवश्यक है। भूख लगी है। भोजन लेना कामना नहीं आवश्यक है। लेकिन यह भोजन लेना ऐसा भोजन लेना। अब जैसे शरीर को कपड़ा ढकना है आवश्यक है। ये कामना नहीं। पर इस क्वालिटी का अब क्वालिटी तुम्हारी कामना है।

आवश्यकता वस्त्र धारण की है। आवश्यकता अन्न जलवायु की है। लेकिन उसकी क्वालिटी वो आपकी कामना है। अब कामना अगर ना करें तो स्वाभाविक आनंदमय जीवन बना रहे। लेकिन कामना में ही हम परेशान है। नहीं परेशान? ऐसा लगता है कि इतनी संख्या का अगर धन हो तो मेरा काम बहुत बढ़िया चल जाएगा। और ईमानदारी से सच्ची बात पूछो कि अगर उतनी संख्या का धन आ जाए तो आप और परेशान हो जाएंगे। यह कभी तृप्त होने वाली बात नहीं है कि इतना हो जाए तो हम तृप्त जैसे एक बार में हम पूछ दे बोलो एक कामना केवल बोलो और इसके बाद करना मत कुछ और कोई कामना तो आपके पास कोई हल नहीं है।

एक कामना केवल एक जगह कर लो वो है भगवान की प्राप्ति। जिनके प्राप्त होने के बाद फिर कोई कामना नहीं रह जाती। जिनके जान लेने के बाद फिर कोई जानकारी की जरूरत नहीं पड़ती। तो वह कामना केवल हम भगवान की प्राप्ति की पूर्ति के लिए मनुष्य जन्म में आए। पर हमें मन ऐसा फसा है कि वो भगवान पराए लगते हैं। और ये पराया शरीर और संसार अपना लगता है। इसीलिए पूरा जीवन व्यर्थ चला जाता है। खूब नाम जप करो। पवित्र भोजन पाओ। अच्छे आचरण करो। मनुष्य जन्म आनंद के लिए मिला है। डिप्रेशन में जाने के लिए नहीं मिला।

आनंद के लिए पशु पक्षी कर्म के अधीन है। हम लोग कर्म के अधीन केवल थोड़ी हैं। हम नया कर्म कर सकते हैं। हम हम ऐसा पुरुषार्थ कर सकते हैं कि अपने कर्मों को मिटाकर भगवान की प्राप्ति कर सकते हैं। पर हम लोग फंसे रहते हैं भोगों में। जहां शरीर रोग ग्रसित हुआ वृद्धावस्था की तरफ तो फिर भजन होता नहीं। फिर भजन नहीं होता। अगर पहले अभ्यास किया है तो बुढ़ापे में भजन हो जाएगा। अगर आपने अभ्यास भजन का नहीं किया तो आप भजन थोड़ी कर पाओगे और अगर अभ्यास किया है रामकृष्ण हरी जपने का तो आप भी जप लोगे तो अगर हमने पिस्तौल चलाना नहीं सीखा है तो हम अभी नहीं चला सकते और जो चलाना सीखा है तो फटाक से एक सेकंड में निशाना मार देंगे तो यह अभ्यास अगर भजन का अभ्यास हम जवानी से करें भोगों के त्याग का समझ रहे हैं भोग त्याग का मतलब होता है निषिद्ध का त्याग अब दूसरी बहन बेटी की तरफ गंदी दृष्टि यह त्याग करो जो निषेध है अधर्म का है वह मुझे नहीं चाहिए।

तो आप घर में रहते हुए भी महात्मा हैं। हमारे शास्त्रों में लिखा है एक पत्नी व्रत रखने वाला ब्रह्मचारी ही कहा जाता है। कितनी छूट दे दी। साधु महात्मा ब्रह्मचारी बनने के लिए आजीवन लंगोटी बंद रहते हैं। और आपको कितनी छूट दे दी कि आपको काम सताए तो केवल अपनी पत्नी पर भाव रखिए। अन्य माताओं बहनों पर भाव ना जाए तो आप ब्रह्मचारी ही माने जाओगे। कितनी बड़ी छूट शास्त्र दे रहा है। आप सब पूरे परिवार को चला रहे हैं तो आपको धन चाहिए। तो ईमानदारी से आप कमाए हुए धन से परिवार का पोषण करो।

आप महात्मा ही हो। परिवार में रहते हुए आप महात्मा हो कि धर्म के द्वारा कमाए हुए पैसे से हम अपने परिवार का पोषण करते हैं। धर्म से चलते हैं तो आप महात्मा ही हो। भगवान का सुमिरन कर रहे हो। तो जैसे हमें वैराग्य धारण करने से भगवान की प्राप्ति होगी। तो आपको गृहस्थ में रहते हुए भगवान की प्राप्ति हो जाएगी। ज्योति जी कानपुर से जी राधेधे राधे-धे महाराज जी महाराज जी प्रभु प्रेम क्या है और प्रेम का क्या स्वरूप होना चाहिए क्या प्रेम अपनी इच्छाओं के लिए करना चाहिए या भागवतिक आशीर्वाद समझकर हमें लगता है सबसे पहले को भजन करना चाहिए बिना भजन के बातें नहीं समझ में आएगी क्योंकि भगवान और भगवान का प्रेम ये दो नहीं है भगवान ही प्रेम स्वरूप है प्रेम ही भगवान है जो प्रीति है जो भाव है वही यही भगवान है।

जैसे आप भाव करोगे वैसे ही भगवान का आपको अनुभव होगा। जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी। अब प्रेम जो है ये कोई प्रवचन नहीं है। प्रेम हृदय का एक गुह विषय है। सूक्ष्म तरम जो नारद जी ने प्रेम की व्याख्या की तो सूक्ष्मतरम बड़ा सूक्ष्म है। अनुभव स्वरूपम केवल अनुभव में आने वाला है। अनिर्वचनीयम प्रेम स्वरूपम प्रेम का स्वरूप वाणी के द्वारा वर्णन नहीं किया जा सकता। जो किया जाता है वो बाहरी बात है। प्रेम का स्वरूप होता है जिससे हम प्यार करते हैं उससे कोई चाहत ना हो।

उसके लिए मैं हूं मेरे लिए वो नहीं। पहला लक्षण कामना रहितम प्रेम का। अब इसी में पहले में सब कट जाएंगे। प्रेमी जितने हैं। जिसे हम प्यार कहते हैं। यह स्वार्थ बुद्धि है। प्यार का पहला लक्षण कामना रहितम। हम उसके लिए हैं। वो हमारे लिए नहीं। अब इसमें तोल लो सब खत्म और स्थूल शरीर को देखकर प्रेम करते हैं। दूसरा कटिंग सूक्ष्म तर वो सूक्ष्मता का विषय है। और हम स्थूल देख के प्रेम करते हैं। गोरा है कि काला है, जवान है कि बूढ़ा है, मनोनुकूल है कि नहीं है। सूक्ष्म तर सूक्ष्मता तो हमने देखी नहीं।

उसके आंतरिक भगवत भाव को तो देखा नहीं। उसकी आत्मा को देखकर हम प्यार नहीं कर रहे। उसके शरीर को देखकर प्यार कर रहे हैं। और अनुभव स्वरूपम आपको देखा और आनंद में मगन हो गए। ऐसा तो नहीं है। क्रिया स्वरूपम आपका प्रेम क्रिया स्वरूपम और यहां प्यार क्या माना जाता है? बस देख लिया और देख के आंसुओं से पुलकित होकर के गदगद कंठ हो गए। उसी में लुठन हो रहा है। भूमि में रोमांच हो रहा है। प्रेम की दशाएं आ रही हैं। अनुभव स्वरूपम ये अनुभव स्वरूपम और ये क्रिया स्वरूपम और यह जो भागवतिक प्रेम है यह आत्मंदमय है।

इसमें किसी की जरूरत नहीं दूसरे की और इसमें दूसरे की जरूरत है। यह दो से होता है और यह एक से होता है। यह दो से एक करता है। यह एक में दो भाव आ जाते हैं। हम अपना भाव भूल करके स्त्री और पुरुष भाव में आ जाते हैं। और प्रेम गलियती साकरी तामे दो ना समाए ब्रह्म नहीं माया नहीं जीव नहीं काल अपनी सुधना रहो एक रहो नंदलाल यह प्रेम की स्थिति होती है। अब इस प्रेम को पाने के लिए पहले डट के भजन करो। भजन होगा नहीं तो प्रश्न उत्तरों से लाभ ज्यादा नहीं मिल पाएगा। भजन करो।

खूब नाम जप करो। करते हो नाम जप बहुत हां खूब नाम जप करो और इतना नाम जप करो कि नाम जपते जपते रोना आने लगे और भगवान से मांगो कि मुझे नाम जप दे दो नाम जप करते हुए नाम की इतनी भूख बढ़ जाए कि आपसे जैसे कोई पूछे नाम जप करते हो तो आप रुक जाओ कि वैसा तो नहीं होता जैसा होना चाहिए। उत्तर क्या होना चाहिए? जैसे उत्तर आया बहुत जप करते हैं। यह बताता है कि अभी नाम की चोट नहीं लगी। नाम की जब चोट लगेगी भजन की तो वैसे हो। एक लंबी सांस खींचोगे और कहोगे वह तो नहीं होता जैसे होना चाहिए।

जैसा होना चाहिए वैसा ये पूरे जीवन भूख बनी रहती है भजनानंदी की। पूरे जीवन रात दिन भजन करने पर भी एक पीड़ा है कि हमसे भजन नहीं होता। आश्चर्य मानोगे रात दिन भजन होने पर भी एक पीड़ा है कि हमसे वो भजन नहीं होता जो होना चाहिए। और वह इसी में विकल होकर के रोता है। इसी में प्रभु से मांगता है प्रभु मुझे भजन दे दो। रात दिन भजन में डूबा हुआ फिर भी भजन ये है सतार्ग भजन का। तो खूब नाम जप करो। भजन करो तब प्रेम को समझ पाओगे। तब भगवान को समझ पाओगे। पहले मैं भजन ज्यादा करता था लेकिन नाम जप से शुरू किया।

अब सिद्ध हो गए तो नाम जप अब इतना निकलता है इतना निकलता है कि कोई प्रश्न पूछता है ना कुछ मेरे से तो मेरे मुंह से राधा निकलता है देखो शांत जैसे हो गए अब क्या चल रहा है बस इसी को इतना बढ़ा दो कि हम क्रिया करते हुए भी बातचीत करते हुए भी चलते हुए भी बोलते हुए भी इसी में बने रहे तो आप इसका परिणाम देख लेना आप इसका परिणाम देख लेना मतलब बहुत कठिन है संसार में अगर अगर कुछ कठिन है तो वह है नाम जप आप देख लो सब लोग देख लो एक जहां यहां बैठे तो एक बैठे तो हम कहा सुनो अगर बहादुरी तुम में है तो पांच मिनट एक जगह मन को लगा के दिखा दो पांच मिनट हम कह रहे हैं राधा इसके सिवा याद नहीं आना चाहिए फेल हो जाओगे पांच मिनट नहीं लगा सकते 5 मिनट नहीं टिक सकते जहां हमें पूरा जीवन टिकाना है पूरा जीवन टिकाना है ऐसे बातें फ्राटेदार मारना अलग है।

शांत बैठकर के मन को भगवदाकार बना लेना बहुत कठिन बात है। उसी की तो प्राप्ति के लिए हम प्रयासरत है। तो केवल ज्ञान ना आत्मा प्रवचन लभ्या बहुत अच्छा प्रवचन कर लेता है तो भगवत प्राप्त थोड़ी हो जाएगा। बहुत प्रवचन सुन लेता है तो भगवत प्राप्त थोड़ी हो जाएगा। मैं मेध्या बहुत बुद्धिमान है तो वो थोड़ी प्राप्त हो जाएगा। भगवत भजन करने वाला, आत्मचिंतन करने वाला, निरंतर प्रभु में चित्त डुबोने वाला ही भगवान को प्राप्त करता है। जी रमेश जी, इंदु जी राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।

महाराज जी पिछले कुछ समय से आपका सत्संग एकांतिक वार्तालाप श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। महाराज जी महाराज जी उन्होंने काफी लंबा लिखा है। कह रहे हैं कि अब प्रौढ़ावस्था में हृदय रुधन होकर भी प्रभु भक्ति मांगता हूं। किंतु वो आवेग भाव जो बचपन में युवा अवस्था के प्रारंभ में था उतना अथा प्रेम नहीं है। महाराज जी अपने थोथे ज्ञान को लताड़ कर त्यागना ही चाहता हूं। प्रभु से प्रेम भक्ति और समर्पण की याचना करता हूं। प्रभु कृपा से किंतु ये दुष्ट ज्ञान और सूक्ष्म अहंकार अक्सर हावी हो जाता है।

महाराज नाम जप नाम जप प्रभु के नाम में चित्त को जोड़ दो सबसे बड़ी बात है। संसार का चिंतन छूटना ही साधना है। भगवान का चिंतन होना ही साध्य है। अब चाहे जितना ज्ञान हो भगवान का निरंतर नाम नहीं जप चल रहा। आपका प्रश्न है निरंतर नाम जप नहीं चल रहा तो ज्ञान किस काम का? भगवान का अनन्य चिंतन नहीं हो रहा तो फिर कौन ज्ञान का कोई महत्व नहीं रहा। भगवान बार-बार गीता जी में कई जगह कहा है मेरा अनन्य चिंतन करो। बार-बार कहा है भगवान ने कहा अनन्य चिंतो माम हे जन परिपासते अनन्य चेताम योमा स्मृति मन मनाभ मद भक्तो मा्याद माम मनो बुद्धि इन सब का अर्थ यही है मेरे में मन को लगा दो मेरे में बुद्धि को लगा दो कैसे लगाएं नाम जप के द्वारा राधा राधा कृष्ण कृष्ण राम राम जो नाम प्रिय हो बार-बार जपो कुछ जानने की जरूरत नहीं कुछ पाने की जरूरत नहीं अखंड चिंतन करने की जरूरत है मोक्ष कल्याण भगवत बहुत प्राप्ति सब अभी है इसी क्षण आपने राम कहा और शरीर छूट गया राम को मिल गए श्याम कहा श्याम को मिल गए राधा कहा प्रभु को अब हम अभी तो चिंतन कर रहे हैं कि ज्ञान का और शरीर छूट गया तो भगवान की प्राप्ति नहीं होगी क्योंकि स्वरूप बोध तो हुआ नहीं स्वरूप बोध होता तो चिंतन की जरूरत ही नहीं अचिंतनीय अवस्था प्राप्त हो गई तो अभी हमें वर्तमान में चाहिए नाम जप भगवान के नाम जप से बढ़कर कोई ज्ञान नहीं।

भगवान के नाम जप से बढ़कर कोई व्रत नहीं। भगवान के नाम जप से बढ़कर कोई दान नहीं। भगवान के नाम जप से बढ़कर के कोई विद्या नहीं। इसलिए नाम जप करो। अभी विश्राम मिल जाएगा। पायो परम विश्राम राम समान प्रभु नाय। हृदय चैन में आ जाएगा। अब चिंता नहीं क्योंकि अभी और चिंता मृत्यु की आएगी। श्रवण समीप भय श्रुत केसा मनोज जरठ पन अस उपदेशा अब इसके बाद मृत्यु दशा है। अब उस समय पीड़ा में अगर अभ्यास नहीं किया तो ज्ञान थोड़ी टिकेगा उस समय नाम टिकेगा। भगवान ने कहा कि मृत्यु या मूर्छा की अवस्था में जब मेरा भक्त होता है।

जिस समय वो मेरा स्मरण करने में असमर्थ होता है। उस समय मैं स्वयं उसका स्मरण बनकर के उसके हृदय में स्पित हो जाता हूं। हमको यह बात चाहिए कि अगर यही था महाराज कि बहुत ज्यादा आनंद आता था हम नहीं है क्यों खोया वो खोया क्यों भोगानंद भोगानंद विषय आनंद यही भगवत आनंद के ऊपर बाधक डालता है तो फिर ज्ञान क्यों नहीं मर जाता ज्ञान क्यों नहीं चला जाता ज्ञान कहते हैं जाए वो क्यों नहीं जाता अभी ज्ञान है ही नहीं आपको अगर ज्ञान हो जाए तुझे ही जाने जग जाएगे जथा स्वपन भ्रम जाई सोह जाने जेह देहु जनाई जानत तुमह तुम ही होए जाई कोई प्रश्न ही नहीं जब जान गए तो कोई प्रश्न नहीं ये संसार

फिर नहीं रहता फिर ब्रह्म अनुभूति होती है सर्वम खलदम ब्रह्म सिया राम में सब क्या सिर्फ कृपा दृष्टि से नहीं हो सकता आपके सब ज्ञान सब कृपा दृष्टि नाम में छुपी हुई है नाम जप अगर ना करो अगर संतों की कृपा से केवल बात बन जाए तो हम किसी को साधन पक्ष में लगने की बात ही ना कहे केवल ऐसे कह दे जाओ तुम्हारा कल्याण हो जाएगा लेकिन तुम अगर नाम जप नहीं करोगे अच्छे आचरण नहीं करोगे भगवत शरणागत नहीं होगे तो कहने से कल्याण हो जाएगा क्या आज तक किसी किसी भी ऋषि परंपरा में हमें बता दो कि साधन ना बताया गया हो और साध्य की प्राप्ति हो गई हो।

ऐसा नहीं होता। आपको साधन करना पड़ेगा। नहीं तो भगवान सामने खड़े हैं। क्यों कहते हैं अर्जुन से? मेरा चिंतन करो तब मेरी प्राप्ति होगी। सामने खड़े हैं। भाई हम तुम तो मान लो तुम हमें संत मानो। हम आपको गृहस्थ भक्त माने। लेकिन वहां तो भगवान स्वयं खड़े हैं और फिर कह रहे हैं मन मना भव मद भक्तो माद्यादि माम नमस्कार मेरे मन वाला बन मेरे में मन को लगा मेरे को नमस्कार कर मेरा चिंतन कर क्यों कह रहे हैं भाई ये तो करना पड़ेगा अगर आप भगवत चिंतन नहीं करेंगे तो आपके खाए पेट भरेगा आपके भजन करने से भगवत प्राप्ति होगी संत महात्माओं का संग भजन करने की पद्धति भजन का उत्साह भजन का बल यह प्रदान करते हैं और भगवत प्राप्ति भजन से होती है।

समझ पा रहे हैं आप? राहुल त्रिपाठी जी महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी मैं भारतीय सेना में कार्यरत हूं और श्री जी का प्रतिदिन नाम जब भी करता हूं। महाराज जी मेरा प्रश्न सिर्फ मेरा ही नहीं बल्कि देश के सभी जवानों का है। जब एक फौजी अपनी छुट्टी खत्म करके वापस ड्यूटी पर जाता है तब उसे घर की बहुत याद आती है। एक नन्ही सी बिटिया की आंखों के आंसू, पत्नी की तरसती हुई आंखें, मां की खाली झोली इसीलिए हम जैसे संत का सम्मान करते हैं ऐसे भारतीय सैनिक का सम्मान करते हैं कि कई कई महीनों तक वो अपने परिवार के वियोग में रहकर हमारे राष्ट्र की सेवा के लिए शरीर सुख की परवाह ना करके चाहे घोर बर्फबारी में लगा दिया जाए उसको चाहे गोलीबारी में लगा दिया जाए चाहे जहां लगा मान लो बर्फ वर्षा जहां हो रही है जहां निरंतर बर्फ गिर रही है जहां हम खड़े नहीं हो सकते वहां उसकी ड्यूटी लगी है और अपने प्रियजनों का वियोग सबसे ज्यादा कठिन कठिन होता है क्योंकि वह हम लोगों ने देखा है।

अब जिस दिन से घर से निकले थे जीवन में घर नहीं गए। हमने तो मिटा दिया। अब ये तो उसका राग रखे हुए हैं। कितना इनको हर बार जलना पड़ता है। मतलब हमने तो एक निपटा दिया कि हम भगवान के मार्ग के पति के हमें मिलना ही नहीं। अब क्या हो रहा है हमें मतलब नहीं। लेकिन इनको तो मतलब है ना और राष्ट्र के लिए ये अपने जीवन को पता नहीं दोबारा में आके बच्ची को गली लगा पाएंगे कि नहीं। कोई भरोसा है? अब कहां ड्यूटी लगा दी जाए और कहां से गोली आ जाए। तो इसीलिए हम राष्ट्र के सैनिकों से प्रार्थना करते हैं कि आप अगर बिना भजन किए भी शरीर छोड़ोगे तो आपको जो बड़े-बड़े यज्ञों का फल होता है स्वर्ग की प्राप्ति वो स्वर्ग की प्राप्ति होगी।

और अगर आप राधा राधा कहते हुए शरीर छोड़ोगे तो भगवत प्राप्ति होगी। जो बड़े-बड़े योगी तपस्या करके प्राप्त करते हैं। बस आपको राष्ट्र सेवा के लिए आपको अपने मोह का बलिदान देना होगा। आपको शहना होगा कि हम तिरंगे के लिए अपनी बेटी, अपने पत्नी, अपने मातापिता सबको त्याग करके तिरंगे की रक्षा के लिए अपने जान अर्पित करते हैं। अगर बची जान तो उनके लिए है नहीं तो तिरंगे को अर्पित करते हैं। सबसे ज्यादा भारत में सम्माननीय अगर कोई है तो त्यागी और वैरागी संत या सैनिक हम दो को देखते हैं।

मान लो आप बहुत बड़े पद में हो तो आपके साथ व्यवस्था है, अंगरक्षा है। आप अपने घर में चैन से अपने अनुकूल भोजन पा रहे हैं। समय पे सो रहे हैं। मनोरंजन कर रहे हैं। वह राष्ट्र का सैनिक उसको जो मिला खड़े-खड़े खा रहा है। जरूरत पड़ी तो गोली चला रहा है। और यह हर कष्ट सह रहा है। अपने परिवार से फोन से बात करने का भी समय उसको नहीं मिल सकता। अगर युद्ध क्षेत्र में लगा तो बात करने का भी समय और हो सकता है आखिरी उसका जीवन हो। इसलिए हम नमस्कार करते हैं। हम उसको सलूट करते हैं।

जो भारत का आर्मी का जन है, चाहे वो वायु, चाहे वो जल, चाहे वो पृथ्वी का लड़ाकू हो, उसको हम सम्मान देते हैं। और यही बलिदान आपको तिरंगे पे लपेटने का सौभाग्य देता है। हर भारतवासी सलूट करता है। हर भारतवासी प्रणाम करता है। हमारे सैनिक को यही बलिदान जो आप छोटे-छोटे बच्चों के आंसुओं को ना देखकर अपनी ड्यूटी पर लगे हुए हैं। इसलिए आप उसको भगवान का चिंतन करते हुए प्रधानता राष्ट्र सेवा की रखो और गौड परिवार को रखो। समय मिला जीवन बचा तो फिर मिलेंगे नहीं तो राष्ट्र के लिए बलिदान है हमारा।

तभी आपको सलाम करते तभी सलूट करते हैं आपको। महाराज जी अब हर प्रश्न का जवाब हो आप हर दर्द की दबाव हो आप। महाराज जी एक यही कहते हैं ना कि देश के सैनिक सिर्फ यही कमजोर खड़ी है। खाली महाराज जी को बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल अब ये कमजोरी तो मिटानी पड़ेगी। गुरु गुरु गोविंद सिंह के दोनों बच्चे दीवाल में चुने जा रहे हैं। लेकिन ना बच्चों ने तोबा बोला और ना गुरु गोविंद सिंह ने दीवाल में जिंदा चुन दिए गए बच्चे। आपके बच्चे तो भगवान की कृपा से सुरक्षित ही हैं। उनके बच्चे जिस लड़ाई में आप कदम रखे हुए हैं देश रक्षा के लिए तो राष्ट्र और देश और धर्म एक ही बात है।

धर्म रक्षा के लिए गुरु गोविंद सिंह के बच्चे दीवाल में चुने जा रहे हैं। लेकिन ना बच्चों में आह और ना गुरु गोविंद सिंह में आ। और चुन दिए गए लेकिन धर्म विरुद्ध रहे। ते बहादुर सिंह ने अपनी गर्दन कटवा ली। गुरु अर्जुन देव जी ने पूरे शरीर को जला दिया। उन दुष्टों ने लेकिन कहा तेरा किया मीठा लागे तो ये बहादुरों का मार्ग है आप बहादुर हो आप नॉर्मल इंसान नहीं हो आप राष्ट्र सैनिक हो तो नॉर्मल की तरह बर्ताव भी नहीं होगा आपका आपका सिंघवत बर्ताव होगा जब परिवार की तरफ जा रहे हैं तो इस समय पूरा प्यार परिवार को और जब परिवार से मिले तो जय हिंद अब हम जानते भी नहीं राष्ट्र के लिए हमारा जीवन समर्पित ऐसे वीर बहादुर बनो तो लोक परलोक सब तुम्हारे हाथ में रहेगा ये कोई साधारण बात नहीं है।

आप राष्ट्र सैनिक हैं। कोई भी ऐसा नहीं है जो सैनिकों के द्वारा सुरक्षित ना हो। अगर आप वहां ना हो तो हम यहां भजन नहीं कर सकते। आप वहां कष्ट सह करके तो हम यहां चैन से रजाई में सो सकते हैं। अगर आप वहां कष्ट सह कर सुरक्षा में जरा भी पोल कर दें तो यहां हजारों लाखों मारे जा सकते हैं। इसलिए आप हम सबका आशीर्वाद आपके साथ है। हम सबके पुण्य आपके साथ हैं और आपका परिवार भी सुरक्षित रहेगा और आप भी सुरक्षित रहेंगे। चिंता मत कीजिए। आप

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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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