॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1394

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

डॉक्टर हर्ष तिवारी जी फिरोजाबाद से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी इंद्रियों को वश में रखना सुख का मार्ग कहा गया है महाराज जी लेकिन जीवन शैली आजकल खानपान कुछ ऐसा हो गया है कि लोग तली हुई विषाक्त खाद्य पदार्थ जैसे कचौड़ी समोसा बड़ाई अन्य फार चलो शुद्ध पदार्थों से बने हो तो यह भी बात ठीक है। पता नहीं कौन सा तेल है, कौन सा घी है, चर्बी है कि क्या है और कई दिन का सड़ा बाजार की चीजें तो मुझे लगता है कि परमार्थिक साधक को तो खाना ही नहीं चाहिए क्योंकि वो बहुत ही अपवित्र और शरीर के लिए भी हानिकारक है।

वैसे सब लोग पसंद बाजारे का करते हैं। घर की रसोई करना पसंद करके होटल का ज्यादा पसंद करते हैं। गोलगप्पा यह सब दुनिया की चीजें ज्यादा पसंद करते हैं। मैं ना लंदन से आई थी और मैं जब से आई हूं तब से गोलगप्पे, छोले भटूरे, पाव भाजी ये सब खाने में लगी हूं क्योंकि खाते पीते और मैं मैं आपसे यही प्रश्न पूछने वाली थी कि मैं कैसे अपने आपने कहा है सत्संग में कि साधक को भोजन कम करना चाहिए। असल बात यह है ना कि जब भगवान की प्राप्ति की लगन लगती है तो नहीं खानपान ते भावे है नहीं कोमल वसंत सुहावे है सब विषय लगे ते खा रहा है हरि आशिक का मग न्या रहा है अभी शरीर में है ना आप आपको लगता है मैं शरीर हूं इंद्रिय मन की मांगे आप अपनी मांगे मान रहे हैं इसलिए आप इंद्रियों को शासन में नहीं ले पा रहे मगर थोड़ा सा ज्ञान हो जाए आप दृष्टा भाव में आ जाए ये तो इंद्रियों की मांग है मन और इंद्रिया मन कष्टान इंद्रण प्रकृति स्थान करति नहीं मुझे इसमें नहीं जाना देखो दो अंगुल की जीभ है बस इतना ही स्वाद है और यहां से गया तो सब बेकार ले घाटी नीचे माटी ये घाटी नीचे माटी केवल और अगर आपको सही बताएं इनकी प्रक्रिया बनाते हुए देख लो जलेबी जब बन के प्लेट में सामने आती है लेकिन वो जलेबी वाला सिरा देखो उसमें सैकड़ों मक्खी मरी पड़ी है।

वो बस निकाह ऐसे निकाल ले अपने घर में जो बनाओ गोलगप्पा खाना है तो अपने आजकल गूगल से सब आप सर्च करके जान सकते हैं। YouTube से गूगल से बढ़िया [गला साफ़ करने की आवाज़] अपने घर में बनाओ ठाकुर जी को पहले पवाओ और फिर आप पाओ तो बुद्धि शुद्ध रहेगी। तो हमें लगता है कि मन को चराने की इंद्रियों के साथ जो आदत है इसे धीरे-धीरे कंट्रोल करें। अनजाने में आप अपने को रोगों का शिकार बनाने की तरफ जा रहे हैं। शरीर में ज्यादा मांस बढ़ना, चर्बी बढ़ना यह हमारे अवयवों को कमजोर करता है।

लीवर, किडनी, दिल इनको कमजोर करता है। तो हमें तो आपसे प्रार्थना है कि 30-40 मिनट व्यायाम कीजिए। 20 मिनट प्राणायाम कीजिए और यह सब बाहरी चीजें छोड़िए और सात्विक भोजन कीजिए तो अभी आपका शरीर जो है ना वो परमार्थ और स्वार्थ लायक हो जाएगा। अब अपने शरीर को एक्टिव करना चाहे तभी तो हम स्वार्थ और परमार्थ लाए यावत स्वस्थ कलेवरम यावत चरे जरा जब तक हमारा शरीर स्वस्थ है इंद्रियां बलवान है तो हम भगवान का चिंतन कर सकते हैं हम लोगों का उपकार कर सकते हैं हम कोई क्रिया भी कर सकते हैं तो इसलिए पिज़्ज़ा बर्गर आइसक्रीम ये वो सब ये वेट बढ़ाने वाली चीजें हैं अरहर की दाल मूंग की दाल और रोटी अब ये किसको पसंद आएगा हर की तुरंत बना के दाल ठाकुर जी को भोग लगा के पाओ तो वह स्वादिष्ट है कि वह स्वादिष्ट है।

हमें लगता है जहां तक हो सके। अब जैसे कुछ समस्याएं बच्चों की बाहर पढ़ते हैं या सर्विस करते हैं। अब उनको तो होटलों का खाना ही पड़ेगा। लेकिन हम कहते हैं जिनको भगवान सुविधा दिए हैं बचो। बाजार और होटलों के भोजन से बचो। पहली बात अपवित्र और दूसरी बात स्वास्थ्य हानिकारक है। स्वास्थ्य के लिए पक्का हानिकारक है। तुरंत तुम्हारे लिए आटा लगा के नहीं बनता। कई कई दिन का आटा जमा होता है झका हुआ तुरंत आपको भोजन मिलेगा तो तुरंत आटा थोड़ी लगाया है तुरंत दाल थोड़ी उबाली कप का है आप बासी खाना पसंद करेंगे तो तमोगुण बढ़ जाएगा भजन में वृत्ति नहीं रहेगी तो भोजन सुधार तो भजन सुधार हो जाएगा भोजन सुधार तो हमारे कर्तव्यों का पालन करने की क्षमता आ जाएगी और ये आप कहते हैं जो बना रहा है उसके विचारों का भी बहुत प्रभाव पड़ता है बहुत प्रभाव पड़ता है वो गलत विचारों का तो वही प्रभाव बिल्कुल जब आप भोजन पाएंगे तो आपके अंदर गलत चिंतन चलने लगेगा।

देखो जैसे कुआं है ना कुआं का जल हमारे लिए जो पौष्टिक परमाणु चाहिए जीवाणु चाहिए वो मिलते थे। कुआं का पानी अब तो गया कुआं देखो कलयुग का कैसा प्रभाव मटके से भी मटके में पानी डाल दो तो वो भी शुद्ध हो जाता है। हां शुद्ध हो हां शुद्ध हो जाता है क्योंकि रज में रज में ऐसी क्षमता जल का दोहन भी बहुत लोग कर रहे हैं बर्बाद कर रहे हैं तो इसके लिए लताएं कटने के कारण जो वर्षा का अधिक हमको चाहिए पानी वो नहीं मिल पा रहा है। अगर लताएं हमारे वृक्ष लगे ना वृक्षारोपण हो तो कार्बन डाइऑक्साइड नष्ट हो ऑक्सीजन हमको अधिक से अधिक मिले और उससे वायुमंडल भी शुद्ध होता है और बादल भी बनते हैं जिससे वर्षा होती है जहां वृक्ष अधिक होंगे वहां वर्षा अधिक होगी जैसे कई ऐसे वृक्ष वाले स्थान है जहां बहुत अधिक वर्षा होती है और अब वृक्ष लोग काट डाले पहले तो कलयुग का प्रभाव जो आम के बड़े-बड़े पेड़ होते थे वो सब बड़े-बड़े पेड़ तो सूख गए और ये वर्ण शंकर आम चले हैं।

इतना बड़ा पौधा इतने इतने बड़े आम लगे नहीं चढ़े। अब ऐसे वर्ण शंकर चले जैसे विशाल वट वृक्ष है। विशाल पीपल का वृक्ष है। आम का वृक्ष है। नीम का वृक्ष है। ये हमारे प्रकृति के लिए बहुत आवश्यक है। हमें लगता है सबको एक-एक वृक्ष लगाना चाहिए। महाराज जी लगा भी दो ना तो लोग काट जाते हैं। [नाक से की जाने वाली आवाज़] अपनी जगह में लगाओ तो लोग क्यों काटेंगे आगे? अपने आंगन में लगा सकते। अपने घर में लगा सकते हैं। हां बहुत लगाए हुए महाराज नीम का पेड़ एक औषधि समझो नीम का पेड़ उसके जो फल गिरते हैं उससे जो गंध होती है बहुत रोगों को नष्ट करने वाली होती है।

नीम की जो वायु आती है वो शरीर के लिए सुखद होती है। नीम की छाया में बैठना लेटना ये बहुत गांव में तो ऐसे ही जग जाते थे और अब तो दर्शन नहीं खिड़की खोलो तो आसपास सब फ्लेट ही फ्लेट नजर आते हैं। वृक्ष तो नजर नहीं आते। रोहित त्रिपाठी जी मुंबई से राधा वल्लभ श्री हरि महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम हे गुरुदेव जैसे त्याग विरक्ति और उपति में अंतर होता है उसी प्रकार क्या श्री जी की दया कृपा और करुणा में भी कोई अंतर है श्री जी की दया कृपा और करुणा दया होती है अनुकूलता और कृपा होती है प्रतिकूलता और पतित के ऊपर करुणा होती है सबसे ज्यादा लाभ तो पतित लेता है।

जो अपने को दीन हीन पतित समझता है, वह करुणा का अधिकारी होता है। और भारी से भारी प्रतिकूलता श्री जी कृपा करके देते हैं। और अनुकूलता दुलार करके देते हैं। तो अनुकूलता दुलार प्रतिकूलता कृपा और अधमता अर्थात दैन्यता करुणा। दैन्य को करुणा का जो पतित भाव अपने में रखता है वह करुणा का अधिकारी होता है श्री जी की और भारी से भारी प्रतिकूलता में भी श्री जी की कृपा का जो अनुभव करता है वही महा भागवत होता है और जो अनुकूलता में उनके दुलार का अनुभव करता है वो भक्त होता है समझ रहे ना ये तो हमारे ऊपर अनुपम कृपा है उनकी बहुत करुणा है जब हमारे को अनुकूलता मिले तो करुणा देखें दुलार करके दे रही अनुकूलता और जब प्रतिकूलता मिले तब कृपा दिखे बहुत अपनापन है श्री जी का हमारे ऊपर कृपा है कि बिना हमारी इच्छा के अपनी इच्छा से हम हमारे ऊपर विधान किए प्रतिकूलता का और प्रतिकूलता सदैव भगवत प्राप्ति ही कराता है और श्री जी की अनुकूलता से जो करुणा कृपा का अनुभव होता है वो और उल्लास पूर्वक भजन कराता है कि कितनी कृपा है हर जगह अनुकूलता ही अनुकूलता स्वामिनी जो दिए और जब प्रतिकूल ूलता होती है तो उससे ज्यादा अनुभव होता है।

कितनी कृपा है श्री जी हर जगह राग हमारा नष्ट कर रहे हैं। अपमान निंदा तिरस्कार प्रतिकूलता कृपा ही कृपा है। और जब दैन्य होता है तो करुणा का उनकी दयालुता उनकी कृपालुता उनकी करुणा का सदैव भक्त अनुभव करता रहता है। ये सब तीनों भगत के जीवन में आती रहती हैं। कभी दयालुता कभी कृपा कभी करुणा आती रहती है। यही आशीर्वाद बनाए रखें। गुरुदेव की उनकी कृपा का अनुभव निरंतर होता रहे। बस हां बस उन्हीं का अनुभव होता रहे। यह बात है। उनकी दयालुता कृपालुता करुणा का अनुभव होता रहे।

हमें प्रतिफल की अनुकूलता आ रही तो उन्हीं की दयालुता है। प्रतिकूलता रही तो उन्हीं की कृपा है। और अधमता है तो उन्हीं की करुणा है। क्योंकि यही दरबार दीन को आदर रीति सदा चली आई। हमने पूज्य हरि बाबा की वाणी में पढ़ा कि जो अपने को अधम समझता रहता है उस पर भगवान की विशेष करुणा बरसती है। मैं बहुत नीच हूं। मैं अधम हूं। मेरे में कोई साधन बल नहीं। प्रभु आप ही करुणा। तो वो करुणा भगवान की करुणा उसको स्थिति देती है। कहीं ना कहीं जब तक साधन बल रहता है तब तक वह भगवान की करुणा का अधिकारी नहीं बन पाता।

जब साधन बल चला जाता है अपबल तपबल और बाहुबल चौथो बल है दाम सूर्य किशोर कृपा ते सब बल हारे को हरि नाम सुनेरी मैंने निर्बल के बल राम श्री दक्षिणा चक्रवर्ती जी कोलकाता से राधा वल्लभ श्री हरि श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी आशीर्वाद वरदान और कृपा में क्या फर्क है अंतर है आशीर्वाद हृदय प्रसन्न हुआ और तुम्हारे लिए शुभ मंगल कामना की वरदान तुमने तपस्या की साधना की और मांग की उसकी पूर्ति हुई और कृपा भगवान की तरफ से अहतु की होती है।

इसमें कोई हेतु नहीं होता है और कृपा का भीषण भी रूप हो सकता है। हाथ पैर भी टूट सकते हैं। आग में भी जलाए जा सकते हो। कृपा का यह भी स्वरूप हो सकता है। कृपा का भीषण और मृद दोनों स्वरूप हो सकता है। कुसुम से भी कोमल और वज्र से भी कठोर कृपा का स्वरूप हो सकता है। लेकिन आशीर्वाद मंगल वरदान अपनी साधना का फल और कृपा अहेतु की। पर जी प्रतिकूलता कृपा कैसे हो प्रतिकूलता इसलिए कृपा होती है क्योंकि अनुकूलता में बंधता है जीव और प्रतिकूलता में मुक्त होता है। प्रतिकूलता में राग का नाश होता है।

जब ऐसी परिस्थिति आ जाए कि आपके पास धन नहीं है और आपका शरीर भी अस्वस्थ है और आपसे कोई बात नहीं कर रहा। यह प्रतिकूलता ही तो है। तब किसकी याद आएगी? भगवान की। जब आपको बहुत प्यार करने वाले हैं। सब खानपान सामग्री तो किसकी याद आएगी? दोस्तों की, संसार की। भगवान की थोड़ी याद आएगी। प्रतिकूलता में भगवान की याद आती है और भगवान की याद आना मंगल है क्योंकि भगवान मंगल भवन है इसलिए कृपा प्रतिकूलता वो कृपा है जो बड़े-बड़े बंधनों को एक क्षण में काट देती है और काटकर भगवान से जोड़ देती है उसे प्रतिकूलता कहते हैं।

तिरस्कार, अपमान, निंदा, निर्धनता, सब सुखों की हानि हो जाना यह सब कृपा से होता है। क्योंकि इससे भगवान से चित्त जुड़ता है। और जब अनुकूलता, सम्मान, प्रतिष्ठा, धन बढ़ना इससे संसार से मन और संसार से मन जुड़ने का मतलब है संसार नाशवान। हमारा समय व्यर्थ गया और भगवान से मन जोड़ने का मतलब है अविनाशी। हमारा समय सार्थक हुआ। तो समय सार्थक हुआ, कृपा हो गई। समय व्यर्थ चला गया। हम कृपा से वंचित रह गए। इसलिए भक्तों ने संतों ने इसे कृपा कहा है। जी हम तो सम्मान यश प्रतिष्ठा और जो अपने मननुकूल होना इसी को कृपा मानते हैं।

पर इसको तो हम उस समय समझ ही नहीं आता। हां तो इसीलिए भगवान अपनी तरफ से देते हैं। तुम्हारी चाह थोड़ी करते हैं। अपनी तरफ से देते हैं। जब भगवान कृपा करते हैं तो उसके सारे बंधनों को काट देते हैं। जहांजहां उसका बंधन होता है वहीं वहीं वो कुल्हाड़ चला देते हैं। फिर आखिरकार रो के भगवान की तरफ चलना पड़ता है। सारे दरवाजे बंद कर देते हैं। अपना दरवाजा खुला कर देते हैं। ये कृपा है। अगर वह कृपा ना करें तो हम इसी में फंसे रहे। लेकिन मरोगे तो तुम्हारे साथ क्या जाएगा?

ना सम्मान ना नाम ना बैंक बैलेंस ना घर ना मकान तो धोखे में रहे कि नहीं रहे स्त्री पुत्र परिवार घर मकान बैंक बैलेंस सब आपका यही रह जाएगा आपके साथ कुछ नहीं जाएगा अगर कृपा हुई है तो दुख विपत्ति से पीड़ित होकर के आपने भगवान को पुकारा भगवान को अपना माना भगवान का भजन किया अब आपका जन्म जन्मांतर तक कल्याण होता चला जाएगा यह कृपा है भगवान की जो भगवान की याद दिलाती है बलिहारी है उस दुख की बलिहारी उस विपत्त त्ति की बलिहारी उस अपमान की जो भगवान से जोड़ दे और धिक्कार है उस सुख को जो भगवान को भुलवा दे तो सार्थक है कृपा भगवान की वही हमको भगवान की तरफ जोड़ती है सुनील तिवारी जी जयपुर से श्री हरिवंश गुरुदेव श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आपका प्रश्न है कि आपके शरीर के धर्मपत्नी और बच्चे दृढ़ भाव हो गया कि वो वृंदावन वास करना चाहते हैं।

बट इनके माता-पिता जयपुर या राजस्थान में निवास करते हैं। अब यह ऐसे धर्म संकट में वह इधर नहीं आना चाहते। यह उधर नहीं रहते। हां बात सही। समस्या तो आ ही गई है। ऐसी परिस्थिति में मैं क्या करूं? श्री जी से प्रार्थना करो। प्रिया जी से प्रार्थना करो। प्रियाल से प्रार्थना करो कि प्रभु इनकी बुद्धि तो ना बदले क्योंकि बहुत सच्चे मार्ग की बात कर रहे हैं। ये इनके प्रकारण धाम में पड़ी भजन के चार अंग हैं। धाम नाम रूप लीला लीला चिंतन नहीं हो रहा। रूप चिंतन नहीं हो रहा।

नाम जप नहीं हो रहा तो धाम में तो पड़े इनका मंगल हो रहा है। अच्छा माता-पिता अब वो अपनी पूर्वा शक्ति के कारण इधर आना नहीं चाहते नहीं तो उनको जरूर आना चाहिए क्योंकि यहां आने से उनका परम मंगल होगा। नहीं कुछ करेंगे। धाम में पड़े हैं। भगवान के कानों में चर्चा पड़ रही। जय जयकार सुनने को मिल रहा है। कहीं ना कहीं तो कथा वार्ता होती रहती। नाम की ये तो परम पावन धाम है। तो भगवान से प्रार्थना करो कि माता पिता की बुद्धि बदल दे। पत्नी और बच्चों का तो बहुत सुंदर निर्णय धर्ममय है।

माता-पिता का मोह वसात पूर्व संस्कारवश उनको अपना जन्म स्थान वो अपना कर्म स्थान यही पवित्र रखता है। अब इनको दीवालों को छोड़कर मैं मोह का कारण तो इसलिए भगवान से प्रार्थना कर क्या गुरुदेव? अकेला ही बैठा हूं मैं तो मतलब माता-पिता को भी नहीं छोड़ा जा सकता। बिल्कुल बिल्कुल ठीक बात है। और जब वह अपने हठ में रहे तो फिर अपने पक्ष को करो कि जब तक वह हैं तब तक उनकी सेवा करो और जब उनका शरीर पूरा हो जाए तो धाम वास महाराज जी वो अभी सक्षम है वो अपना कार्य खुद करते हैं सब कुछ तो हम ऐसा सोच रहे हैं कि हम यहां आ जाए और जब वो सक्षम ना रहे तो हम उनको फिर यहां ले हां ये भी बहुत सुंदर बात है अगर वो अपनी सेवा कर पा रहे हैं तो करने दीजिए रहने दीजिए जब ऐसा लगे तो बहुत सुंदर निर्णय करने कि उनको यहां ले आएंगे।

पहले सोचा गुरुदेव क्या था अभी बहन थी अभी दो महीने पहले शादी हुई उनके साथ छोटी बहन रह रही थी। अच्छा अच्छा तो अब दोनों चीज़ एक साथ हुई बहन का भी जा रहा वह भी अकेले हुए और इधर तो उनको आ जाना चाहिए ना बहू के साथ आना वृंदावन आ जाना और भगवान के ऊपर छोड़ दो गुरुदेव आप ही भगवान हो भगवान के ऊपर नहीं हम नहीं हम तो दोनों का पहले बताया ना कि इसका निर्णय बहुत उत्तम है धर्मप्र लेकिन तुम्हारा विचार करना भी धर्म युक्त है कि माता-पिता की सेवा परिचर्या के लिए अब चाहे जितना सक्षम हो आखिरकार तुम्हारे जैसा लड़का है तो वृद्धावस्था की तरफ तो जा ही रहे हैं।

नहीं जा रहे तो इस अवस्था में बना बनाया भोजन मिले। यह भी आपकी शरणागति के बाद ही विचार आने लगे हैं। गुरुदेव पहले इतना नहीं सोचते थे। बिल्कुल नहीं सोचते थे। तो आपसे शरणागति हुए डेढ़ साल हो गए। सोचिए और उनको मनाइए। और जब ना माने इसको वृंदावन रहने दीजिए और जब उनको परेशानी लगे तो उनको फिर वृंदावन ले आइए। क्योंकि वृंदावन में अगर शरीर छूटता है तो भगवान की कृपा प्राप्त होती है। कैसा भी पापी अगर वृंदावन में शरीर छोड़ दे तो उसका कल्याण हो जाएगा। पक्का समझ धाम है ना जैसे काशी पूरी है भगवान की पूरियों में शरीर छोड़ना भगवान के धाम में शरीर ये बड़ा मंगलमय कार्य है तो तुम्हारे माता-पिता को ये करना चाहिए कि धाम का आश्रय लेना चाहिए।

के लिए गुरुदेव एक छोटी सी फैक्ट्री चलाता हूं जयपुर में मैं हां कोई बात नहीं कोई बात नहीं। जैसे भगवान मान लो [नाक से की जाने वाली आवाज़] आप फैक्ट्री चलाते हो कोई कोई तो रिक्शा चलाता है तो अपने जीवन जीने के लिए वृंदावन वास करते हैं रिक्शा चला के बहुत जोर का भजन है दो चार घंटे रिक्शा चला लिए किराए के पैसे निकाल लिए और खूब वाणी पाठ और नाम कीर्तन और भजन कर रहे हैं पूरे परिवार के परिवार चल रहे थोड़ा-थोड़ा मेहनत करके कमा लेते हैं मान लो दो चार छह घंटे रिक्शे चला लिए दो चार ₹00 आ गए तो घर का खानपान सब चल रहा है बहुत हम उनको प्रणाम करते हैं रिक्शा वालों को जो ऐसे वृंदावन हमारी नजर में 25ों लोग हैं जो बाहर से आए यहां रिक्शा चला रहे हैं और केवल वृंदावन वास के लिए अपने सारी खेती और सब सुख छोड़कर वृंदावन वास कर रहे हैं।

मतलब वो फैक्ट्री बेच के आ सकते हैं ना मतलब सब उनके साथ रहूं या वहां पे भी रहूं। मतलब दोनों संभालना। यही तुम्हारी बुद्धिमत्ता है कि इनका सपोर्ट ना बिगड़ने पावे और उनकी सेवा ना छूटने पावे। अब ये तुम देख लो। जरूरत पड़े तो एक आदमी पैसे से रख लो वहां। जब ऐसी बात पड़े कि वृंदावन नहीं आना चाहते और इनकी वृंदावन में निष्ठा है तो अर्थ से कोई सेवक रख लो जिस दिन नातेदार की रख लो उसको पैसा देते रहो वो माता-पिता की सेवा करता है दोनों चाहिए है तुम्हारे पास धर्म संकट ही क्योंकि दोनों कार्य आपको करना ही चाहिए इसका सपोर्ट करना चाहिए क्योंकि ये धर्म युक्त है बिल्कुल अधर्म की बात नहीं और उनका सपोर्ट करना चाहिए क्योंकि धर्म युक्त अधिकार है उनकी सेवा करने का आपको आप पुत्र हो अच्छा दूसरा भाई कोई है नहीं इसलिए

ये सपोर्ट करो आप सभी प्रणाम मनीष राणा जी बिहार से श्री हरिवंश महाराज श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी मैं देखता हूं कि कोई आपको श्री जी का भजन सुना के कोई चित्रकारी करके कोई किसी कला से आपको प्रसन्न करता है महाराज जी क्या आपको ऐसा लगता है मैं प्रसन्न हो जाता हूं कोई हमको अपनी कला से प्रसन्न कर सकता है तो वो कला उसकी हमारी प्रसन्नता तक पहुंच सकती है आप बताओ ऐसा लगता है जब वो कला का नाटक कर रहा है तो हम प्रसन्नता का नाटक कर रहे हैं।

हम भी तो नाटक मंच पर बैठे हैं। नहीं वह अगर कला का प्रदर्शन कर रहा है तो मैं प्रसन्नता का प्रदर्शन कर रहा हूं। प्रसन्न नहीं हूं। प्रसन्नता तो जान पाओ तो बहुत कठिन विषय है। ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा प्रसन्नता तो ब्रह्म से है। प्रसन्नता तो भगवान से बाहरी नाटकों से चुटकुला से हम प्रसन्न होने वाले हैं क्या? पर जब तुम हमारे सामने नाटक मंच पर प्रसन्नता दिलाने का नाटक कर रहे हो तो हम प्रसन्न हैं। ऐसा हम भी नाटक कर रहे हैं। नहीं हमको ये कोई कॉमेडी की बात कह के कोई राग ध्वनि सुना के हमें प्रसन्न कर सकते।

हमारी प्रसन्नता को विषय प्रिया प्रियतम है। ये थोड़ी है सब। अब अगर नाटक कर अभी आपको महाराज जी मुझे एक कला आती है। मैं ऐसा कर सकता हूं। हां हां अच्छा तुमने ऐसा किया तो क्योंकि तुम नाटक कर रहे हो तो हम भी नाटक कर रहे हैं। अगर तुम सच्चाई से समझना चाहो तो हमारी प्रसन्नता का विषय कुछ नहीं है। केवल प्रभु है। हमारी प्रसन्नता ये हंसी मजाक नाटक गाना बजाना इससे होगी क्या? महाराज जी आप आपको प्रसन्न कैसे कर सकते हैं? बता रहे हैं हम तुम्हें रास बता रहे हैं। राधा राधा राधा इसे प्रसन्न करो।

अच्छे आचरण करो। खूब नाम जप करो और जो दुख सुख आवे उसे सह लो भगवान की शरण में रहो। यह देखकर हम प्रसन्न हो जाएंगे। महाराज जी कभी-कभी ऐसा लगता है कि अगर मेरे अंदर भी कुछ होती तो शायद मैं एक वजह बन पाता आपको वो अहंकार की पुष्टता का वजह बनता हमारी प्रसन्नता का नहीं। कभी-कभी लगता है भगवान ने मुझे पूरा खाली छोड़ दिया। ये बहुत बढ़िया किया। तभी तो भरेंगे प्रेम रस। भरेंगे महाराज। अरे भरना ना होता तो भेजते काहे को? साधु संग काहे को कराते हैं? भगवान को भरना है।

इसीलिए साधु संग करा रहे हैं। नहीं तो संसार के संग में भर के मलिन हृदय हो जाता। अब साधु संग करा रहे इसका मतलब कुछ अच्छा करना है उनको। मुझे बस लगता है कि मैं तो किसी योग्य नहीं हूं। बस इसी से हमारी प्रसन्नता होती है। जो आर भाव से कह देता है मैं किसी योग्य नहीं हूं। यह हमारी वास्तविक प्रसन्नता का विषय होता है। हमारे प्रभु को यही दरबार दीन को आदर रीति सदा चले आई। मैं हंसना खेलना है कोई प्रसन्नता नहीं। प्रसन्नता हृदय का विषय होती है। जब कोई आर भाव से कहता है हे प्रभु हे प्रियाजु मैं किसी योग्य नहीं मुझे स्वीकार कर लो तब हृदय एकदम गुदगुदाहट होती है।

हां ठीक है। सही मार्ग है। भगवान तुम पर कृपा करें। यही प्रसन्नता का रहस्य है। हां श्री जी का नाम जप करो। अच्छे आचरण करो। निश्चित श्री अगर मिलना ना होता तो हमें क्यों बुलाती क्यों सत्संग सुनाती क्यों वृंदावन का दर्शन कराती यह सब संयोग का मतलब वो मिलना चाहते हैं वो हम पर कृपा करना चाहते हैं महाराज जी ऐसे ऐसे जो आपके जो शरणागत हैं उनप आप प्रकट में आप कुछ भी रिएक्शन नहीं करेंगे महाराज जी कुछ भी प्रकट में आपका वो नहीं होगा उदासीन रहेंगे वहां ताकि उसको उस चीज का भी अभिमान हां बिल्कुल बिल्कुल अब जैसे मानो वो नाटक हंसाने का कर रहा हूं हम नहीं रहे नहीं वो हंसाने कर रहा हम हंस रहे हैं तो इससे लाखों प्रसन्न हो गए।

उसका भी नाटक और मेरा भी नाटक दोनों मिलकर के कितनों को खुश कर दिया। नहीं खुश कर दिया। हम संसारी लोगों को महसूस होता है कि आप खुश खुश है। हां ये होता है। बकाया सच्ची मानो तो हमारे अंदर की दशा जो देखोगे तो तुम्हें समझ में आएगा इनको कोई खुश नहीं कर सकता। प्रिया प्रीतम के सिवा कोई नहीं खुश कर सकता। हर समय रोता रहता है हृदय। हर समय हृदय कैसे तुम्हें बताएं ना बात करना अच्छा लगता है ना लोगों से मिलना अच्छा लगता है फिर भी लोगों से मिलते हैं बात करते हैं हंसते हैं बोलते हैं किसी को जानने नहीं देखते तुम तो जरा सा कह के रो गए अगर अभी हम शुरू हो जाए तो आंसू ही नहीं बंद होंगे बस हाय हाय मच जाके लगेगा बंद करो हम जा रहे हैं तो हम अपने कर्तव्य से फेल हो जाएंगे इसलिए चुप शांत बैठे हैं जब किसी कोई अच्छा शाबाश बहुत सुंदर गाया वाह और यहां का हम गाना सुनते हैं हमारा जो श्रवण है श्रवण इंद्री है वो दूसरी जगह लगी है गावत सुंदर हरि सरस धम पुलकित खग मृग बहत नवार प्रिया प्रीतम गान कर रहे हैं खग मृग पशु पंछी मौन परमहंस की तरह सुन रहे हैं अद्भुत वृंदावन अद्भुत तेजोमय प्रिया वहां हमारा मन है तो जैसे जैसा जब भगवान अवतार लेते हैं उनको कुछ कर्म चाहिए क्या?

उनको कोई फल चाहिए क्या? वो भी कर्म करते हैं। वैसे ही लीला करते हैं भगवान। तो हम लोग भगवान के दास हैं। वैसे कोई चाहता मैं महाराज जी को प्रसन्न करूं तो मैं प्रसन्न होकर दिखाऊंगा कि मैं प्रसन्न हो गया। वो संसारी आदमी है और वो आया है केवल इसी बात के लिए कि मैं इनको प्रसन्न करूं। तो हम अनजाने बनकर के उसके सामने ऐसा रोल करते हैं कि मैं बहुत प्रसन्न हुआ तुम्हारी सेवा से। समझ रहे? सर्वजीत जी कुरुक्षेत्र से राधा महाराज जी राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधे-राधे महाराज जी प्रभु के दर्शन के लिए विकलता का भाव होना चाहिए परंतु महाराज जी जब हृदय विकारों से घिरा हो तब ऐसा भाव कैसे जगे नाम जप नाम की जय घोष में कोई भी विकार टिक नहीं सकता सारे विकार भगवत विमुख अंतःकरण में अपना प्रभाव दिखाते हैं।

भगवत सन्मुख अंतःकरण में नहीं दिखा सकते। कोई भी विकार नहीं दिखा। जैसे अंगद जी के पैर को रावण के महाबली बलवानों की सभा में भी किसी की ताकत नहीं थी कि हिला दे। ऐसे भगवान के भक्त के हृदय में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर उसकी निष्ठा को डिगा दे। ऐसे किसी में पावर नहीं है। जहां अहंकार होता है वहां पतन होता है। जहां भगवत शरणागति होती है वहां निर्विकारता प्रतिपल बढ़ती रहती है। निर्विकारता और विकार स्थिति दोनों का खेल है। भगवत विमुख अंतःकरण में विकार का खेल होगा।

जहां अहम का स्वराज्य है। और जहां भगवत शरणागति है। निश्चिंत हो जाओ, निर्भय हो जाओ, निशोक हो जाओ। वहां भगवान स्वयं रखवाली करते हैं उस अंतःकरण की करो सदा तिनके रखवारी जिम बालक राखे महतारी जो भगवान की विशुद्ध भावना से शरणागति ले लिया उसकी भगवान स्वयं रक्षा करते हैं ये विकार विकार कुछ नहीं नासतो विद्यते भावना भाव विद्यते सता इनकी सत्ता ही नहीं है और भगवान की सत्ता है नाम जप [खांसने की आवाज़] जितना नाम जप होगा उतने आप निर्विकार होते जाएंगे जितना नाम जप होगा उतना ही दृढ़ विश्वास होता जाएगा।

जितना दृढ़ विश्वास होगा उतना ही भगवान की भक्ति महारानी हृदय में प्रेमित और जब प्रेम हो जाता है तो जिया नहीं जाता प्रभु के बिना विरह कमंडल कर लिए बैरागी दो नैन मांगत दरस मधु करी छके रहत दिन रहन सुने न काहू की कही कहे ना अपनी बात नारायण व रूप में मगन रहे दिन रात नेत्रों में प्रभु बस जाते हैं। प्रिय मूरति नैनन बसे तेह रस समाए यह लक्षण सुन प्रेम के और न कछु सुहाए और न कछु सुहाए फिरे अपने रस मातो कुटुंब देह ते जाए छूट सब विधि तो नहीं खानपान ते भावे है नहीं कोमल वसंत सुहावे है सब विषय लगे ते खारा है हरि आशिक का मग न्यारा है उसको कुछ अच्छा नहीं लगता नाम जी के प्रभाव से जब रूप का प्रादुर्भाव होता है और रूप के अंदर अंदर ऐसी ललक जागृत होती है कि अब मैं इन्हें साक्षात देखूं तब उसका रुदन प्रारंभ होता है क्योंकि भगवत दर्शन का एक ही मार्ग है

रुदन कबीरा हंसना छोड़ दे रोने से कर प्रीत बिन रोए किन पया प्रेम पियारा मीत जब गोपी जनों ने हर साधन करके देख लिया भगवान की लीला अनुकरण करके भगवान को पुकार करके और देखा भगवान प्रकट नहीं हुए तो रुद सुशम राजन कृष्ण दर्शन लालसा तो तासा महावीर भूत छोरी सम्मय मानुजा पीतांबर धरावी साक्षात मन मत मन तासा महावीर उनहीं के बीच में आविर्भाव हो गया तो रुद सुरम राजन कृष्ण जब रोना प्रारंभ होता है हे प्रियाजु हे नाथ हे करुणामय कैसे वो रुदन होता है सब अंतःकरण पिघला

पिघला घूमता है विकार सब नष्ट हो जाते हैं विकार की संभावना ही नहीं विकार की जैसे भुने हुए दाने में अंकुर होने की संभावना ही खत्म हो चुकी है ऐसे ऐसे भगवत अनुराग भरे अंतःकरण में विषय स्फूरण की संभावना ही खत्म हो जाती है। वहां तो केवल भगवान के लिए तड़पना होता है। भगवान जिस पर कृपा करते हैं यह बात उसी के हृदय में आती है कि एकांत में बैठकर के निर्जन स्थान में और भगवान का स्मरण करते हुए रो रहा है भगवान के लिए। सतर सतर सा लोकान तारति वो इतना पवित्र हो जाता है कि स्वयं तर जाता है स्वयं तर जाता है और लोकों को तार देता है मद भक्ति युक्त भवनम पुन जो एकांत में बैठकर अशुभ प्रवाह भगवान के लिए एक विकलता एक मतलब वाणी उस शब्द को नहीं कह पाती क्योंकि वो जो एक अंदर पीड़ा सी होती है शायद इसको ही इश्क कहते हो जैसे कोई दिल को मसला करे पूज्य भाई जी हनुमान प्रसाद पोदार जी ने प्रेम दर्शन में लिखा शायद शायद इसको ही शायद शब्द का प्रयोग इसलिए कह रहे कि अनिर्वचनीयम प्रेम स्वरूपम उसको प्रगट रूप में वचन में कहा नहीं जा सकता तो कह रहे शायद इसको ही उर्दू में इश्क कहते हैं हिंदी में उसे प्रेम कहते हैं।

शायद इसको ही इश्क कहते हैं। जैसे दिल को कोई मसला करे अपने प्यारे की याद में अजीब सी पीड़ा जो मैं ऐसा जानती प्रीति किए दुख होए तो नगर ढिंढोरा पीटती अजी प्रीति न करियो कोई एक अजीब और वो उस दर्द में वो सुख है कि ब्रह्मा के परमेष्ठी पद में भी वो सुख नहीं है जो भगवत विरह के विरह दुख में जो सुख है वो परमेष्ठी पद ब्रह्मा के भी उसमें नहीं और जिसको मिलन सुख प्राप्त हो गया हर समय प्रभु के संग नित छिन छिन बिहरत संग छिन छिन निरखत प्रेम भरी छिन जस कहत अभंग यह जो कृपा हरिवंश की जो प्रतिपल अपने आराध्य देव के संग विहरण कर रहा है।

प्रतिपल आराध्य देव की झांकी अवलोकन करके उनकी रूप माधुरी का पान कर रहा है। अब उसके सुख का वर्णन कौन करे? वही जान सकता है जो उस सुख को भोग रहा है। दूसरा कोई नहीं जान सकता है। भगवन नाम जप समस्त विकारों को नष्ट करके भगवान के चरणों की सहज प्रीति प्रदान कर देता है। भगवन नाम जप के अलावा कोई साधन नहीं। तत्व बोध चाहिए तो भगवन नाम जप करो। भगवत प्रेम चाहिए तो भगवन नाम जप करो। अगर नाम जप नहीं है तो हमारा विश्वास नहीं कि प्रेम प्रकट कर दे। कोई साधन नाम जप ही है।

नाम जप जितना करो और भगवत लीला कथा कानों को सुनाओ प्रपंच से रहित बातें हमारे कान में जाए भगवान की चर्चा कान में जाए और भगवत भक्तों के चरण रज का सेवन करें चरण रज से शरीर अभिषिक्त हो तो बहुत जल्दी प्रेम प्रकट हो जाए गणित तत तपसा नयाति न चेज्या न निरपणा गद् न छंदसा न जलांग सूर्य बिना महतद रजो अभिषेकम अन्य साधनों से ये ब्रह्म बोध या भगवत प्रेम प्रकट नहीं होता। ये महापुरुषों के चरण रज का अभिषेक करके निरंतर नाम जप करते हुए भगवत चिंतन संसार का चिंतन आने ना पावे और भगवत चिंतन छूटने ना पावे।

तदपिता अखिलाचारिता तद स्मरण परम व्याकुलते भगवान का जरा सा भी स्मरण हो जाए तो व्याकुलता आ जाए। हर आचरण भगवान को समर्पित है। उसके जीवन में प्रेम का प्रादुर्भाव हो जाता है। पर प्रेम चाहता भी कोई बिरला ही है। नहीं तो भगवान से मान प्रतिष्ठा रुपया पैसा अनुकूलता यही प्राया मांगे हो जाती है। कोई कंचन कामिनी कीर्ति से विजय प्राप्त करके भगवत अनुराग की भिक्षा मांगना ये तो कोई बिरला ही महापुरुष होगा। नहीं तो प्राय हम आखिरी में गिर जाते हैं। प्रतिष्ठा मान यश कीर्ति नाम महिमा अपनी इसमें चले जाते हैं।

प्रभु के प्रेम से वंचित हो जाते हैं।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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