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दैन्य पर ही कृपा बरसती है तो हमारे अंदर दैन्यता कैसे आए?

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

हरि ओम कश्यप जी कन्नौज राधा वल्लभ श्री राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि दंडवत प्रणाम। महाराज जी ब्रिज के रसिक संतों ने मुखारविंद से हमने सुना है कि हमेशा श्री जी की कृपा सभी के ऊपर समान रूप से बरसती है। किंतु दैन्यता रूपी पात्र ना होने के कारण हम उस कृपा को सहज नहीं पा पाते। हे गुरुदेव दैन्यता को अपने अंदर कैसे लाएं? रसिकों के संग से आती है। जब हम बड़े महापुरुषों को आदर्श मानकर भजन करते हैं उनकी आज्ञा से तो हमें लगता है कि हमारा भजन उनके आगे क्या है?

उनका समर्पण, उनका त्याग, उनकी निष्ठा तो हमारा अहंकार उनकी कृपा से, उनके यशगान से, उनके चरण रज से नष्ट हो जाता है। और जब हम अपने से नीचे जनों का संग करते हैं तो लगता है हम भजनंदी हैं। जब अपने से बड़ों का संग करते हैं तो हमारा अहंकार नष्ट हो जाता है। तो इनकी संगति रहत जाति कुल मद सब नस जो भगवत प्रेमी महात्मा हैं उनका संग करने से जाति का अभिमान कुल का अभिमान विद्या का अभिमान यौवन का अभिमान नाना प्रकार के जितने अभिमान है वो सब नष्ट हो जाते हैं। अभिमान नष्ट हो जाता है तो दन्यता आ जाती है।

ये दन्यता बड़ी दुर्लभ है। जो तणादप सुनी चेन यह दन्यता अपने को त्रन से नीच मानना दूसरों को सम्मान देना किसी से सम्मान ना चाहना यह भगवान के भगवत प्रेमी महात्माओं से ही प्राप्त होती है तो संतों के संग में हमारे अंदर के अहंकार का नाश होता है तो दो प्रकार से संतों का संग एक बाहर जैसे ऐसे बैठ के और एक भक्त माल ले गए और भक्तों के चरित्र पढ़े तो उससे हमारा अभिमान नष्ट होता है। भक्तों का संग प्रकट और भक्तों के चरित्र पढ़ना। भक्तों की कथाएं सुनना तो लगता है अब पांच वर्ष के प्रह्लाद जी उनका कितनी जोर की भक्ति कि कितना कष्ट दिया गया लेकिन भजन से विमुख नहीं हुए।

यहां जरा सी प्रतिकूलता आ जाए तो भगवान से श्रद्धा ही खत्म हो जाए। तो हमारी कहां भक्ति उस कोटि की है? तो जब हम भक्तों का चरित्र पढ़ते हैं तो हमारा अहंकार नष्ट होता है। जब हम भक्तों का संग करते हैं तो हमारा अहंकार नष्ट होता है। अकेले हम जब अपने को भजनानंदी समझते हैं विषय पुरुषों को देखकर तब अहंकार आता है। या किसी भी प्रकार का अहम तब आता है जब अपने से छोटों की तरफ देखते हैं। जब अपने से बड़ों की तरफ देखते हैं तो अहंकार नष्ट हो जाता है। जैसे किसी के पास ₹100 नहीं अपने पास लाख रुपया है तो अभिमान आ जाएगा।

लेकिन अरब वाले को देखो तो ही नहीं आएगा। तो यह जो संत हैं यह भजन के धनी हैं। यह त्याग, तपस्या, वैराग्य, प्रेम इसकी मूर्ति है। तो जब हम बड़े महापुरुषों को देखते हैं तो हमारा अभिमान नष्ट कि हम उनके आगे कहां हैं। जब बड़े महापुरुष रात-रात भर रो रहे हैं प्रभु की प्राप्ति के लिए उनके दर्शन। यहां तो पांच मिनट भी रोना नहीं आता। तो किस बात का अहंकार करें? तो ना भक्ति का फिर अहंकार रहता है ना ज्ञान का अहंकार रहता है। दन्यता आ जाती है। जब भगवत प्रेमी बड़े महापुरुषों का हम संग करते हैं।

महाराज जी इनका अगला प्रश्न है कि मानसिक नाम जप करते समय जब कोई बातचीत करने का प्रयास करता है तो स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाता है। महाराज जी स्थिति में सुधार कैसे लाए? हां बिल्कुल आ जाता है। आना भी चाहिए। साधक को अच्छा नहीं लगता है। पर सामने मेरे भगवान ही उस रूप में आए हैं। हम बहुत गंभीर से बोले बहुमान दे। अपने को यह जनाना नहीं कि मैं भजनानंदी हूं। बहुत सावधानी से प्रिय वाक्य बोलते हुए कम शब्दों में निपटा दे और फिर जो उतनी देर बात की उस समय को भी भगवान को समर्पित कर दे।

पर जो भजन में मानसिक चित्त लगाए है उसको इस बात से बहुत डर लगेगा कि आदमी आएगा हमसे बात करेगा। हमसे बात ना करे। अच्छा नहीं लगेगा। ये अच्छे साधक के लक्षण है। पर अपने को प्रकाशित नहीं करना कि मुझे बातचीत करना अच्छा नहीं लगता। मुझे मिलना अच्छा नहीं लगता। हमारा अगर संयोग भगवान की कृपा से होता है तो बहुत गंभीर शांत मृद शब्दों से सम्मान पूर्वक बात करें क्योंकि व्यवहार को भी परमार्थ ही बनाना है और बिना व्यवहार के चल नहीं सकता। माता-पिता परिवार घर के सदस्य अब जैसे किसी से बोलो ही ना तो सबको विक्षेप पड़ने लगेगा ना।

और जब सबको विक्षेप पड़ेगा तो आपको भी विक्षेप पड़ जाएगा। क्योंकि उनको दुखी देखकर आपका भी हृदय द्रवित होगा। चिंतन घसीटेगा तो हम ऐसा व्यवहार करें कि किसी को दुख ना पहुंचे हमारा अंदर भजन सुरक्षित चलता रहे तो हंसी बोले बहुमान दे प्रेम पूर्वक सम्मान पूर्वक मृदु शब्द कम शब्दों में निपटा दे सामने वाले को ज्यादा बोलने दे और अपना कम शब्दों में जी हां जी ऐसे अपना नाम चल रहा है और अगर को बोलना पड़े तो शास्त्र सम्मत सत्संग भगवत वाक्य बोले तो वो भी भजन माना जाता है।

ठीक है महाराज जी आपने एक बार बताया था कि जैसे आप जब भी वार्तालाप कर रहे होते हैं तब भी आपका राउंड राउंड राउंड नाम घूमता रहता है तो महाराज जी वो स्थिति पाने के लिए अभ्यास अब देखो बहुत लंबा अभ्यास हो गया ना अब बचपन से जैसे कल जैसे परिक्रमा करके आए तो आपके आज्ञा अनुसार मंत्र जप लगातार पूरे परिक्रमा में कहीं रुके नहीं लगातार चलता रहा तो कभी भी सोते वक्त मैंने मंत्र जप का अभ्यास कभी नहीं किया महाराज श्री लगा मान जब चल रहा था लगातार पता नहीं कब मैं स्विच कर गया मंत्र जब से अटके तुरंत नाम वो मंत्र शुरू हो गया नाम जप की जगह तो ये महाराज श्री मेरी कुछ भूल है कि क्या है नहीं इसमें देखना जैसे हम अपवित्र हैं तब हमें मंत्र में थोड़ा सावधानी रखनी और पवित्र अवस्था में अगर कभी नाम चल रहा है कभी मंत्र चल रहा है इसको रोका थोड़ी जाता है मन सदैव एक में नहीं लगता जब तक परिपक्व नहीं हो जाता तो उसका चंचल स्वभाव है तो बड़ी कृपा उसकी है कि चंचलता प्रभु में है कि कभी मंत्र जपने लगा कभी नाम जपने लगा कभी नाम

जपते जपते मंत्र चल गया कभी मंत्र जपते जपते नाम चल गया पर जब हम शौचालय में होते हैं लघु शंका कर रहे होते हैं हमें उस समय सावधान रहना है कि मंत्र हमारा ना चले नाम जप उस समय शेष समय तो समझ रहे हैं ना हां ये मन का नवम नवम चार्ट है तो बड़ी कृपा है कि उस संसार सार में ना जाकर मंत्र में जाता है, नाम में जाता है तो ये तो और अच्छी बात है। इसमें कोई गलत बात और देखो बच्चा पवित्रता अपवित्रता ये कुछ समय के लिए है। बकाया जब शरीर भाव खत्म हो जाता है तो पवित्रता अपवित्रता का कोई महत्व नहीं रह जाता।

भगवत चिंतन में वो निरंतर मंत्राकार वृत्ति बनी रहती है। ये तो वहां तक पहुंचने के लिए नियम है और जब वो पहुंच जाता है तो फिर इसका भी महत्व खत्म हो जाता है। तो खूब अच्छे से चलो कोई अपराध नहीं

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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