॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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एकांतिक वार्तालाप एवं दर्शन #1396

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

पुनीता जी चंडीगढ़ से राधा वल्लभ श्री हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी मैं ऐसा क्या करूं कि नाम जप में दिन प्रतिदिन ध्यान और गहरा होता जाए कभी मन बहुत लगता है और कभी जबरदस्ती लगाना पड़ता है नाम जप हूं सोच सोच विचार के गई भक्तन पद ओठ भक्तों के चरणों का आश्रय भजन न होई संग बिनु भजन बिना नहीं प्रेम छिनहु भजन न छाड़िए धरिए या ध्रु नेम बिना भजनानंदी संतों की कृपा के भजन में गाढ़ रति नहीं होती और बिना भजन में गाढ़ रति हुए प्रेम नहीं होता और बिना प्रेम के भगवान नहीं मिलते प्रेम ते प्रकट हो मैं जाना तो मूल बात है भक्तों का सुमिरन भक्तों की चरण वंदना भक्तों का आश्रय हरि को निज यश ते अधिक भक्तन यश पर प्राप्त तो आप भक्त नामावली का पाठ किया करें जो भक्तों की नामावली है जैसे ध्रुवदास जी की भक्त नामावली भगवत ऋषिक जी के द्वारा भक्त नामावली और भी जो भक्तों की नामावली हो तो नामावली को पाठ करें भक्तन की नामावली जो करी है चित लाए ताके भक्ति बढ़े घनी अरु हरि होए

सहाय ताके भक्ति बढ़े घनी अरु हरि होए सहाय गाढ़ भाव भगवान में आने लगेगा यदि भक्तों के चरित्र सुनोगे भक्तों के चरण रज माथे पर धारण करोगे और रोज भक्त नामावली का पाठ करोगे नामावली है आपके पास भक्त नामावली 42 लीला में ध्रुवदास जी ने लिखा है आप ले लीजिएगा वहां बहुत हमें लगता है 40 मिनट में हो जाएगी 30 40 फिर आप देखिएगा रोज आपका कैसे भजन बढ़ता है और भोजन सात्विक होना चाहिए भजन करने वाले का और भोजन प्रभु को अर्पित होना चाहिए प्रसादी भोजन पावे अमनिया भोजन ना पावे अमनिया समझ ली ना जो भोग नहीं लगाया गया उसे अमनिया कहते हैं और जो भोग लगा के पाया जाता है उसे प्रसादी कहते हैं भोग प्रसादी ही पावे अमनिया ना पावे और पवित्र आचरण करें और संतों का आश्रय रखें तो आप देखो नाम जप में प्रीति हो जाएगी।

पहले नाम जप अनर्थ का नाश करेगा। जितने पाप है पाप प्रवृत्ति है नाम जप उनका नाश करेगा तब आनंद की अनुभूति होगी। और जब नाम जप में आनंद आने लगता है तो मन हमारा अपने आप लगने लगेगा। आनंद नहीं आता तो मन विषयों की तरफ जाता है और नाम जप चल रहा है तो उसका मतलब है अभी मन मलिन है और जहां आनंद आया तो ये खूब अपने आप खुद मन वापस लौट आएगा संसार से आके भगवान के नाम में खूब आनंद है खूब आनंद समुद्र है भगवान जैसे मछली छोटे गड्ढे में चिंता युक्त हो जाती है पानी सूख जाएगा मर जाएगी और समुद्र में पहुंच गई तो किलोले करती है ऐसे संसार का हर सुख छूटने वाला है।

आप चाहे जिससे प्यार करो एक दिन वह मरेगा। एक दिन यह शरीर मरेगा। हर विषय यहां मर रहा है। इसका नाम मृत्यु लोक है। हर व्यक्ति प्रति क्षण मर रहा है। हर विषय यहां नष्ट हो रहा है। नाश की ओर सब जा रहे हैं। हमको क्या करना है? मनुष्य शरीर प्राप्त करके मृत्युमा अमृतम गम। हमारी दिशा मृत्यु लोक में मृत्यु से अमृत की तरफ और यहां सब मृत की तरफ जा रहे हैं। तो हमको किसी से यहां लगाव नहीं रखना। भक्तों से प्रेम करें, नाम से प्रेम करें, भगवान की लीला गुण श्रवण करें।

बढ़िया मंगल हो जाएगा। गाढ़ नाम जप में रुचि हो जाएगी। यदि भक्त नामावली का अर्चन वंदन करो। प्रभु जी जो आप कह रहे हैं भोग लगाना है। जब हम भोग बनाते हैं तो कई कहते हैं बिल्कुल भी मतलब देखिए मत नमक ठीक है, चीनी ठीक है। बिल्कुल वैसे ही लगा दें। नहीं हम चेक करते हैं। चेक कर सकते हैं ना? हां। पहले एक कटोरी में जरा सा निकाल के हम देखते हैं क्योंकि हमारी श्री जी को कैसा लगे। पहले हम पा लेते हैं कि बहुत बढ़िया है। फिर आचमन करते हैं हाथ धोते हैं फिर भोग लगाते हैं।

हम पहले कुछ श्री जी को नहीं पवाते। पहले हम पाते हैं। उसको चेक करते हैं। वो हमारे अब जैसे कोई फल है, खट्टा है, कैसा है? दाल में नमक ज्यादा है, कम है। हर चीज को हम चेक किया और फिर अपने प्यारे हैं ना। अपने प्यारे को तब पवाए जब हम पास कर लिए। हमको अच्छा लगा तो अपने प्यारे को भोग लगा के पवा देते हैं। वैसे संसार में प्राय यही रीति है कि जैसा जो कुछ है पहले भगवान को लगा दो। लेकिन अपने ब्रज में यह रीति नहीं है। ब्रज में है। पहले हम चख के देखेंगे। अगर वह ठीक है तो हम अपने प्रभु को पवाएंगे नहीं तो नहीं पवाएंगे।

यह यहां की रीति है। पर जी संसार में एक मान्यता है कि झूठा हो जाएगा। पहले नहीं झूठा नहीं होता। झूठा तब माना जाता है जब हम अपने लिए पा रहे हैं। हम चेक करने के लिए पा रहे हैं प्रभु के लिए कि उसमें कैसा पदार्थ हां बढ़िया है। अब आचमन किया हाथ धोया और प्रभु को पने जा रहे हैं। यह हमारी ब्रज की रीति है। हमारे जितने ब्रज के प्रेमी जन हुए हैं पहले स्वयं उसको निर्णय कर लिया है। हां सही है। तब प्रभु को भोग लगाते हैं। और वो भी ज्यादा नहीं है। थोड़े से हां वो केवल उसकी सामग्री अभी थोड़ी है।

हां कि मतलब आधी थाली पूरा परोस के पा लिया पिया वो तो होता है ना कटोरी में जरा से निकाल के चेक कर ले राजेंद्र कुमार अग्रवाल जी जय श्री हरि ओम साध्वी प्रिया शरण जी माता जी इनका महाराज जी प्रश्न है एक जैसा ये है महाराज जी ये कह रहे हैं कि माता जी कह रहे हैं कि इन्होंने 9 वर्ष की आयु में कहीं कोई संत भगवान घर में पधारे थे वहां से दीक्षा लिया पर जब युवावस्था आई तो एक जहां से इनको वेश मिला वहां से इन्होंने गोपाल महामंत्र का मंत्र मिला महाराज जी। महाराज जी अभी कह रहे हैं कि अभी यह मंत्र अभी इनको थोड़ा सचेत हुआ है कि पहले वाला जपे या अभी वाला जपे?

अब देखो आयु तो पूरी निकल गई। अभी रास्ते का ही तय नहीं किया। चौराहे पर खड़ी तो आयु तो पूरी निकल गई। महाराज की गोपाल महामंत्र जप करती हूं निरंतर। लेकिन पर संशय है ना तो सिद्धावस्था कैसे प्राप्त होगी? जब हमको मंत्र में संशय कि यह जपे कि वह जपे और पता नहीं यह लाभ देगा कि नहीं देगा तब तो हमारी सारी साधने चौपट हो गए। गुरु के वचन प्रतीत न जेही जब विरक्त हो गए तो पीछे का कोई दुनिया है ही नहीं। हां उसको पूर्व के मंत्र के लिए ही कहा कि करना चाहिए। अब करो जो अभी मिला है पूर्व का सब छोड़ दो और पूरी सिद्धि इसी में विराजमान है और गोपाल मंत्र को बड़ी श्रद्धा से और पवित्रता से जपो अब समय नहीं रह गया कोई जवान शरीर नहीं कि हम अभी साधना करें चुपचाप भगवत आश्रित हो जाओ कि हे भगवान मैं आपकी शरण में हूं मेरे बनाए ना बनेगी कोटि कल्प लो आपके बनाए बनेगी पल पाव में हे नाथ अब जितनी श्वासे हैं आपके सुमिरन में गुजार दूं और आपकी कृपा से मेरा कल्याण हो।

नहीं खूब जब मंत्र में मन लगे तो मंत्र में नहीं तो नाम जप करो। नाम जप है आपके पास मुझे सिर्फ गोपाल महा मंत्र ही मिला गुरु जिसने भेज दिया सिर्फ एक ही मंत्र आपने संप्रदाय का तिलक लगाए तो आपके पास नाम भी तो है राधेश्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे तो जब आपको मंत्र में रुचि हो तो मंत्र जपो और हर समय नाम जप करो ठीक है महाराज जी आपका इनका भी ऐसा ही था ये कह रहे थे कि इन्होंने प्रथम गुरु पहले बनाए तो जहां से नाम जप कर रहे थे।

फिर एक बार पुनः इन्होंने दीक्षा ले ली किसी के कहने पे कि गुरु तो कितने भी हो सकते हैं। शिक्षा गुरु चाहे 50 कर लो दीक्षा गुरु नहीं बदले जाते। 24 दत्तात्रेय जी ने गुरु शिक्षा गुरु बनाए ना कि दीक्षा गुरु एक-एक जितने भी उसमें पात्र हैं 24 गुरुओं में तो उन्होंने शिक्षा गुरु बनाए। तो शिक्षा हम 10,000 लोगों से ले सकते हैं। आपका एक वचन अच्छा लगा। आप हमारे शिक्षा गुरु हो गए। आपकी एक बात अच्छी लगी। आपकी बात स्वीकार बाण बनाने वाले से एकाग्रता की शिक्षा ली। जैसे बाण बनाने में तन्मय राजा की सवारी निकल गई और उसको पता भी नहीं चला बाण बनाने वाले को।

ऐसे साधक को अपने लक्ष्य पर एकाग्र रहना चाहिए। कबूतर अपने परिवार में आसक्त होकर जाल में फंसकर मर जाता है। उससे शिक्षा ली कि परिवार और अपने शरीर पर इतना आसक्त नहीं होना चाहिए। बाज मांस का टुकड़ा ले जा रहा है। कई बाज उस पर झपटे उसने मांस छोड़ दिया। उस पर बाज चले गए और स्वतंत्र हो गया। तो त्यागी वैरागी सन्यासी महात्मा को ऐसी कोई वस्तु नहीं रखनी चाहिए जिससे लोगों की उस पर नजर पड़े। अगर नजर पड़े तो वस्तु का त्याग कर देना चाहिए। हर एक बात से उन्होंने शिक्षा ली।

दीक्षा नहीं ली। ये गलत बात होती है कि कोई हमको कहे कि अब इनसे गुरु मंत्र ले लो। फिर उनसे गुरु मंत्र कोई बजारू चीज है। एक बार जो गुरु जी से ले लिया उसी का जीवन भर हम जप करते रहे। शिक्षा हम हजारों से ले सकते हैं। 24 से क्या हजारों जगह हम जाकर सत्संग सुन सकते हैं। हजारों महात्माओं से हम उनकी अनुभव की बातें सुन सकते लेकिन दीक्षा दीक्षा गुरु एक होना चाहिए। जी अमरेंद्र सिंह जी ऑस्ट्रेलिया से राधे-राधे महाराज जी। महाराज जी आप कह रहे हैं कि मोक्ष और आत्मज्ञान में क्या अंतर है महाराज जी?

आत्मज्ञानी को ही मोक्ष प्राप्त होता है। आत्मज्ञानी को ही मोक्ष प्राप्त होता है। समझ रहे हैं? आत्मज्ञान का मतलब क्या है जानते हो? अंतर्ज्ञान अपने आप का ज्ञान अपने आप कौन हैं? आत्मा है। तो आप अपने शरीर से प्यार नहीं करते। नहीं शरीर का इतना नहीं होता महाराज। नहीं होता। इसके बाद एक शरीर और है सूक्ष्म शरीर। हां जी। इसके बाद एक शरीर और है कारण शरीर। तीन शरीर है। तीन शरीरों का जब त्याग हो जाता है और अपने स्वरूप का बोध हो जाता है तो मुक्त पुरुष कहा जाता है।

मोक्ष कोई पदवी नहीं है। कोई वस्तु नहीं है। हम इसे पकड़े हैं। छोड़ दिया। इसने कभी हमें नहीं पकड़ा। जड़ शरीर ने आपको कभी नहीं पकड़ा। आपने जड़ शरीर को पकड़ा। मैं स्वस्थ हूं। मैं अश्वस्थ हूं। आप पकड़ रहे हैं ना मेरा मन आप पकड़ रहे हैं। मन ने आपको नहीं पकड़ा। आपने मन को पकड़ा। यह जो मेरे द्वारा पकड़ हो गई स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर की इसी का नाम बंधन है। और इससे हम अलग होकर के अपने स्वरूप का बोध हो गया। केवल जानकारी नहीं जैसे हलवा की जानकारी हो जाने मात्र से ना हम स्वस्थ होंगे ना पुष्ट होंगे ना तृप्त होंगे हलवा बना के खाना होगा हलवा बनाने की जानकारी का हमें पूरा ज्ञान है लेकिन हमने कभी हलवा बना के खाया नहीं तो जानकारी बेकार है ना आत्मज्ञान है लेकिन आत्मबोध नहीं है अनुभव नहीं है तो आत्मज्ञान किसी काम का नहीं आत्मबोध जो ज्ञान हुआ उसका अनुभव हुआ उसका साक्षात्कार हुआ जैसे हलवा बना के खाया तो अब पता चला दूसरे को तो बोल रहे 100 ग्राम पानी 100 ग्राम

चीनी इतना घी ऐसे ऐसे ऐसे लेकिन कभी खाया नहीं तो आत्मज्ञान शास्त्रों में वर्णन है हम उसको सीख करके बोल सकते हैं लेकिन अनुभव नहीं हुआ तो ना आत्मा प्रवचनेन लभ्या ये आत्म बोध प्रवचन करने वाले को भी नहीं प्राप्त होता ना बहुना श्रुतेन बहुत सुनने वाले को भी नहीं मिलता नधया बहुत बुद्धिमान को भी नहीं प्राप्त होता जो इसका अनुभव करता है अब अनुभव करने के लिए फिर संसार के भोगों का वैराग्य सत असत का विवेक इंद्रियों का दमन मन का निग्रह परम श्रद्धा गुरुदेव के चरणों में उनके द्वारा दिया हुआ भजन चित्त का लक्ष्य परिस्थित हो जाना मुमुक्षता मोक्ष के सिवा कुछ अच्छा ना लगना मैं मुक्त होना चाहता हूं।

फिर साधना के बल से जब उसे बोध होता है तो तीनों शरीरों का वह राग छूट जाता है। हमने पकड़ रखा है। हमने छोड़ दिया। बस इसी को मोक्ष कहते हैं। इसका राग छूट जाना और कोई वस्तु या सिद्धि नहीं है। सही पूछो तो बंधन था ही नहीं। हमने पकड़ा था। हमने किसी ने नहीं पकड़ा। जो जो हम छोड़ते जा रहे हैं उस उससे मोक्ष को प्राप्त होते जा रहे हैं। जितना अभी पकड़े उतना हम बंधन को है। सब छोड़ दो मुक्त हो गए। समझ रहे हैं ना? मारिया जी अमेरिका से राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी जब भी मैं ध्यान करने बैठती हूं तो नींद आती है बहुत।

और जब एकदम से आंख खुलती है तो ठंडा पानी रख लिया करो। ठंडा पानी अब उसका उपाय तो यह है तो खड़े हो जाओ। टहलने लगो या ठंडा पानी रख लो क्योंकि यह किसका है? हां। क्योंकि अब अब नींद अगर आ जाएगी तो फिर ध्यान क्या करेंगे? नहीं खानपान मांस खाती हैं आप? नो नहीं। वेजिटेरियन। नो नो नो बहुत सुंदर। बढ़िया। अंग्रेजी हमें नहीं आती लोगों समझ लेते मेरे साथ आए। अच्छा अच्छा हां पवित्र भोजन और पवित्र संग गंदा देखना नहीं, गंदा सुनना नहीं, गंदा बोलना नहीं, गंदा करना नहीं।

इससे हमारा हृदय पवित्र होने लगता है। और नाम जप नाम जप करते हैं आप? भगवान के किसी एक नाम जब वायगुरु कहते हैं राधा राधा कहते हैं वही वायगुरु वही राधा है वही कृष्ण है कोई कहने को विविध नाम है वो एक ही तत्व है तो निरंतरता निरंतरता का मतलब समझते हैं ना कंटिन्यूटी कंटिन्यूटी हां यार अंग्रेजी बढ़िया बोले कंटिन्यू यही बात है ना हम बोल भी नहीं पाएंगे यार निरंतरता हां अगर हम जैसे वाहेगुरु वाहेगुरु वाहेगुरु वाहेगुरु वाहे गुरु वाहेगुरु तो हमारा संसार का चिंतन छूटा और वाहेगुरु का चिंतन हुआ और बराबर वाहगुरु का चिंतन हुआ और गाढ़ चिंतन हुआ तो हम ध्यान में पहुंच जाएंगे।

पर रोज बहुत आता है। आई ट्राई राइट रोना बहुत आता है जब आंखें खुल वो हमको भी आता है। हमको भी आता है। इसके इसका इसका परिणाम यही है। जब हमारे अंदर आनंद आता है ना तो फिर रोना आता है। भगवान का जब आनंद आता है तो खुशी के रोने की बात आती है। कभी-कभी उनसे मिलन के लिए विरह के रोने के आंसू कि कब मिलोगे? कभी मिलने की चाह के आंसू होते हैं और कभी उनके आनंद के उनके नाम में उनके ध्यान में जो आनंद आता है उससे आंसू प्रवाह होता है। ये तो भगवान की कृपा से होता है। ये तो अच्छी बात है।

कोई बुरी बात नहीं है। ठीक है। जी संसारी व्यक्ति समझता है। पता नहीं क्यों दुखी है कितना ये रो रहा है। हां। किसी के सामने आंसू निकल जाए। अपने आप निकल जाते हैं बात करते-करते। हां वो पर वो कोई समझा करे तो अच्छा है ना। हमको कोई भगत ना समझे। इस हम जब वहां चाहते हो हित धाम में थे तो वहां एकांत ज्यादा सेवन था। जब भगवदाकार वृत्त में रोना आता तो वहां एक दो महात्मा भी थे आए। अरे रो रहे हो आप। कहा हां क्यों? वह किडनी में दर्द हो रहा है। कभी अपने को यह व्यक्त ना करें कि मैं भगवान के लिए रो रहे हैं।

अपने शरीर को साक्षी करके कोई ना कोई पॉइंट रख ले। वो बोले भगवान के उसमें तो फिर तुम्हारा रोना बंद हो जाएगा। फिर तुम्हारे प्रेम में कमी आ जाए। अपने प्रेम को छुपाना चाहिए। प्रेम जितना छुपाया जाता है उतना बढ़ता है। छपाने से नष्ट हो जाता है। अगर प्रेम को प्रकाशित कर दिया जाए तो प्रेम धीरे-धीरे दब जाएगा। महाराज जी चाहत नहीं होती। अपने आप ही रोना आता है। सांस पूछता है क्या हो गया तुझे? कोई बात नहीं। बता दूं सर में दर्द है। आंखों में जलन है। मन परेशान है इसलिए रो रहा हूं।

अब जरूरी है हम सत्य बात बता दे नहीं हम बता दो और कोई पूछे तो जरूरी है उत्तर दे चुपचाप चल दे अपनी मस्ती में जी महाराज जी इन राधा राधा वाहेगुरु नाम इसी को ही नाम कहा गया है या इसका जप करने से हम पर कृपा होती है और वह हमारे मन के अंदर नाम देते हैं जिसको गुरु गुरु मुख से मिला हुआ जो नाम है ना वो हमारे अंदर सिद्धावस्था प्रकट करता जैसे जब तक गुरु नहीं मिले तब तक किसी न किसी गुरु के मुख से तो निकला है ना वाहगुरु किसी न किसी के मुख से तो निकला है महापुरुष के मुख से राधा किसी न किसी महापुरुष के तो हम उन नाम जप करते हैं फिर हमें सदगुरुदेव की प्राप्ति होती है और सदगुरु देव के द्वारा जो प्राप्त होता है फिर उससे अगर सदगुरुदेव के द्वारा राधा ही मिला है तो दिव्यता आ जाएगी सदगुरु देव के द्वारा वाहगुरु ही मिला है तो दिव्यता आ जाएगी सभीज नाम गुरुदेव के द्वारा दिया होता है।

उससे बहुत जल्दी सिद्धावस्था प्राप्त होती है। इसलिए गुरुमुख की महिमा है। मनमुख चलो लेकिन पूर्णता गुरुमुख से होगी। समझ रहे हैं ना? हां जी। हां जी। गुरु जी ध्यान जब लगाते हैं ना तो मन विचलित होने के बाद भी फिर ध्यान आता है फिर वो उठ जाता है। हां तो अभ्यास करते रहो। बार-बार आए बार-बार चंचल मन जा रहा है तो अभ्यास योग युक्त चेतस ना्यगामिना अगर हम ऐसा अभ्यास करते रहे तो धीरे-धीरे टिकने लगेगा जैसे पहले टिकता नहीं था अब धीरे-धीरे टिकने लगा आपको पता चलने लगा कि ये गया और जहां आपने सोचा कि ये गया सो आ जाएगा उसको बुलाना नहीं पड़ता बस केवल जानना होता है ये गया मन सोई तुरंत आ जाएगा और आया आप कितने देर टिका पाते हो एक सेकंड दो सेकंड 10 सेकंड, एक मिनट, दो मिनट, आधा घंटा, 30 मिनट यह जब टिकने लगेगा तब ध्यान का आनंद आएगा।

लेकिन ध्यान का विषय क्या है आपके? हां। तो बस उसमें टिकाव बार-बार राधा राधा तो ज्यादा भागने को उसे चांस नहीं मिलेगा। अगर भाग भी जाता है तो फिर उसको लाओ। बार-बार ऐसा करोगे तो फिर दृढ़ भूमि हो जाएगी। अर्थात फिर हमारा ध्यान दृढ़ता पूर्वक होने लगेगा। समझ रहे हैं ना जी शाश्वत जी राधा वल्लभ श्री हरिवंश ममता जी जौनपुर से महाराज जी इन दोनों का एक जैसा ही प्रश्न है महाराज जी ममता जी कह रहे हैं कि महाराज जी भगवान ने इस दुखाल्यम की रचना ही क्यों की सबके दुख कष्ट देखकर मन में आता है कि यदि इस संसार की रचना भगवान के ऊपर क्यों है क्या भगवान के ऊपर क्यों रखा गया वो अपने आप से अपने आप में खेल रहे हैं आप भी तो वही हो आप अपने को भूल के स्त्री मान रहे हो।

आप अपने को भूलकर बच्चा मान रहे हो। आप अपने को भूलकर पुरुष मान रहे हो। आपकी भूल है। आइए आप अपने स्वरूप में देखिए। कोई खेल नहीं हो रहा। कोई दुख हालेल नहीं। स्वप्न में हो अभी इसलिए तुम्हें बहुत दुख सुख दिखाई दे रहा। जागो तो ना सुख सुख है ना दुख है। जेह जाने जग जाए हिराई। जागे जथा स्वपन भ्रम जाई। इस भ्रम से आप निकलना चाहो तो निकल सकते हो। आप फंसना चाहो तो फंस सकते हो। आप अपने जाल में फंस गए हो। आप अपने जाल से मुक्त हो जाओ। आप कौन हैं? किसका प्रश्न है?

आप कौन है? नहीं पता। बस यही पता लगा ले तो संसार का प्रश्न का समाधान हो जाए। जीव अविनाशी चैतन्य घन सुख स्वरूप संसार स्वप्निक भ्रम में अब भ्रम में फंसकर अपने स्वरूप को भूल जाना ही दुख है। अपने स्वरूप को जानकर के भ्रम का नाश हो जाना यही परम स्वरूप है। यही परम सिद्धि है। अब संसार को भगवान ने क्यों रचा? आप कौन है? आप वही हैं। तत्वम अश तत्वम अश तुम वही हो। अपने आप को भूलकर स्त्री और पुरुष मानकर जगत के व्यवहार को सत्य मानकर भोगों को सत्य मानकर इस पर भ्रमित हो रही हो।

इसलिए दुख हो रहा है। जैसे स्वप्न में किसी का गला काटा जा रहा हो तो चाहे जितना फोर्स लगा दो उसे बचा नहीं सकते आप। उसे बचाने का एक उपाय है जगा दो। क्यों? स्वप्न में तुम्हारा गला काटा जा रहा हो चाहे जितने बॉडीगार्ड लगा दो चाहे जितने आप फौज लगा दो कुछ बचा सकते हो क्या एक उपाय उसे जगा दो केवल स्वप्न में कोई समुद्र में डूब रहा है अब चाहे सैकड़ों जहाज लगा दो चाहे नौका लगा दो चाहे तैराक लगा दो आप उसे बचा नहीं सकते उसे एक ही उपाय है जगा दो ऐसे ही उमा कहूं मैं अनुभव अपना सत हरि भजन जगत सब स्वप स्वप्न में आप अपने को स्त्री मान रहे हैं, पुरुष मान रहे हैं, दुख मान रहे हैं, सुख मान रहे हैं।

यह एक स्वप्न है। भगवान ने अपने आप को ही त्रिगुण रूप में विस्तार कर दिया। सतोगुणी रूप, रजोगुणी रूप, तमोगुणी रूप, सृजन, पालन, संहार। वह अपने आप से आपका सृजन करते हैं। अपने आप से आपका पालन करते हैं। अपने आप से अपना संहार करते हैं। आप भी वही हो। जानो इस बात को तो जे जाने जग जाए जान गए तो यह संसार गायब हो जाएगा जैसे जगाने पर स्वप्न गायब हो जाता है अभी आप स्वप्न देख रहे हैं इसलिए सत्य लग रहा है भगवान ने बड़ी करुणा की है क्या बुरा रचा है हमें बताओ आंख दी अच्छा देखो जबान दी अच्छा बोलो कान दिया अच्छा सुनो हाथ दिया अच्छा करो अभी आनंद आनंद है कहां दुख है अब करो मनमानी आचरण तो और अपने स्वरूप को भूल करके तो फिर दुख तो है ही।

तो भगवान ने यह खेल अपने लिए रचा है। तुम्हारे लिए थोड़ी रचा है। तुम कौन हो? तो तत्वमश तुम वही हो। खत्म खेल। बस यही जाना जानना है तो जीवन मुक्त हो जा। अत्यंतिक प्रलय यही है। मोक्ष मोक्ष का मतलब क्या है? कभी बंधा ही नहीं तो मोक्ष क्या होना? भ्रम। भ्रम नष्ट हो गया। बात समझ में आ गई। भगवान आप प्रभु हो। आप ही प्रभु हो। अपने आप को भूलकर स्त्री मान रहे हो। अपने आप को भूलकर पुरुष मान रहे हो। और इस संसार को सत्य समझ रहे हो। भोगों को सत्य समझ रहे हो। ये सब मोह निशा सब सो निहारा देख स्वपन अनेक प्रकारा।

ये भगवान की माया का एक भ्रमात्मक स्वरूप रचा हुआ है। जो आपका है आप ही है वो। दूसरा कोई नहीं है। जेह जाने जग जाए हिराई। जब जान जाओगे तो संसार का महत्व खत्म हो जाएगा। अभी संसार का महत्व है ना शरीर का महत्व है ना इसलिए जान नहीं पा रहे हो। एक ब्रह्म द्वितीय नास्त दो है ही नहीं एक है आपको तो बहुत दिखाई दे रहे हैं स्त्री पुरुष जड़ चैतन्य एक मन जैसे स्वप्न में पूरी बाजार इकट्ठा कर देता है ना सत्य होते हुए भी जब तक जगोगे नहीं तब तक स्वप्न सत्य दिखाई देगा और जब जगोगे तब झूठा नजर आएगा।

ऐसे ही मोह में हो इसलिए संसार सत्य दिखाई दे रहा है। जब ज्ञान में होगे तो एक ब्रह्म के सिवा कुछ नहीं। सर्वम खलमिदम ब्रह्म एको ब्रह्म द्वितीय नास्ते दूसरा कोई नहीं। दुख की कोई गुंजाइश ही नहीं है। दुख है ही नहीं। आनंद ही आनंद है। अब आप स्वप्न में इसलिए आपको दुख सुख का अनुभव हो रहा है। ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा ब्रह्मानुभूति हो जाए तो प्रसन्न आत्मा सोचते नका समा सर्वेश भूते सुमद भक्ति लभते पराम पर इसीलिए तो साधना करनी है। अब साधना हो रही भोगों की साधना हो रही विषय की साधना हो रही संसार की तो संसार दुख सुख मिश्रित है।

ऐसा नहीं कि केवल दुख ही मिलता हो। दुख भी मिलेगा। सुख मिलेगा दोनों झूठे दुख सुख दोनों झूठे सत्य कुछ नहीं एक भ्रम है बोले इतना सुख भोगा कुछ है तुम्हारे पास सुख नाम की चीज कि मेरे को ये सुख मिला फिर वही फिर वही अतृप्ति फिर वही खालीपना फिर वही अकेलापना फिर एक खोज नए सुख की तो मन जिस सुख को खोज रहा है वो तुम्हारा ही सुख है तुम अविनाशी भगवान के अंश हो अर्थात भगवत स्वरूप हो वो भगवत स्वरूप सुख हो और तुम अपने स्वरूप को भूलकर स्त्री मानकर पार्थिव भोगों में तो कैसे सवाल का हल होगा?

सवाल का हल तो साधना से होगा। नहीं भगवान ने कुछ बुरा नहीं रचा। बहुत अच्छा रचा है भगवान ने। देखो ना सूर्य रचा, चंद्रमा रचा। इतनी बढ़िया रचना की। आंख दिए, नाक दिए, कान दिए। अब इनका हम दुरुपयोग करोगे तो फिर दुख भोगना पड़ेगा। सदुपयोग करो तो अभी आनंद है। आप मनाओगे भगवान बड़ी कृपा करके ये रचना रची कितना आनंदमय है। गुलाब जामुन खाते हो। गलत रचा भगवान ने। अब 50 गुलाब जामुन पा जाओ। गलत हो जाएगा ना? हां। तो अगर हम उचित व्यवस्था के साथ इस संसार को भगवान का बगीचा मानकर उचित व्यवहार करें तो दुख ना रहे।

अच्छा बताओ अगर भारत सरकार में ये दंड विधान ना हो तो सरकार अधूरी है कि नहीं है? भला कोई शासन में रहेगा दंड विधान ना हो तो जरूरी है दंड विधान जरूरी है ना? तो ऐसे वही हमारी सुरक्षा में है। अभी आप उनसे सुरक्षा मांगे आपको सुरक्षा दे देंगे और आप गलत करोगे तो मार डंडे आपको अंदर कर देंगे। तो भगवान हमारी सुरक्षा में भी हैं। जब हम गलत करते हैं तो वही दुख रूप आ जाते हैं और जब सही करते हैं तो वही सुख रूप आ जाते हैं। और जब ज्ञान हो जाता है तो दुख ना सुख अखंड प्रसन्नता बनी रहती है।

तो ऊपर उठो नाम जप करो भगवान के पावन चरित्र सुनो और संयम से रहो। कोई गलत काम मत करो तभी देखो आनंद आने लगेगा हृदय आनंदमय होने लगेगा महारा जी लौकिक खेल में महारा जी जो खेल होता है उसमें खिलाड़ी होते हैं और जीत और हार होती है और जीतने वाले को पुरस्कार मिलता है तो महारा जी भगवान की सृष्टि का जो खेल है महारा जी इसमें खिलाड़ी कौन है जीत क्या है हार क्या है और पुरस्कार आप ही खेल हैं आप ही खिलाड़ी हैं आप ही विजय हैं आप ही पराजय है आप ही बनने वाले हैं आप ही बनाने वाले हैं आप ही मिटने वाले हैं आप ही मिटाने वाले हैं।

कुछ द्वत है नहीं दूसरा है नहीं। अब कैसे समझावे? अब यह बात समझाने की तब हो जब साधना हो। अगर साधना नहीं होगी तो समझ में कैसे आएगा? ये अज्ञान की धरा में ब्रह्म ज्ञान की बातें भगवत ज्ञान की बातें थोड़ी समझ में आती है। अब क्योंकि आध्यात्मिक विषय है तो पहले जब राधा बाबा से कोई प्रश्न करता तो कहते रोज एक लाख नाम जप करो एक महीना दो महीना फिर हमसे बात करो आके तो तुम कुछ समझ पाओगे। नहीं अध्यात्म को कैसे समझ पाएगा जी यशपाल सिंह जी मथुरा से राधेधे राधे-राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम महाराज जी ऐसा भ्रम या शंका मन में उत्पन्न होती है कि जैसे कि मैं ग्रस्त हूं एवं सरकारी नौकरी करता हूं।

कहीं आध्यात्मिक मार्ग या भक्ति मार्ग पर चलने से अपने पारिवारिक व राजकीय दायित्व पूरा करने में समस्या ना आ जाए। बहुत बढ़िया होगा। आपका तो बहुत छोटा पद होगा। अमरीश जी चक्रवर्ती सम्राट थे। भागवत में पढ़कर देखिए। लो आप एक प्रांत का पद होगा वो तो पूरे चक्रवर्ती सम्राट राजाओं के ऊपर भी महाराजा बादशाह अमरीश जी और भगवान के महान भक्तों में सर्वश्रद्ध मतलब दुर्वासा जी फेल हो गए उनके आगे उनकी भक्ति की महिमा के आगे दुर्वासा जी का तप फेल हो गया अगर भक्ति अपने कर्तव्य से चित करती तो फिर यह कैसे हो सकता था भक्ति और बल देती है अपने कर्तव्य पालन में और प्रवीणता देती है।

यह बात हमको समझनी होगी। हम मां से ऐसे मां समझकर प्यार करते हैं। लेकिन जब भक्ति संबंध से प्यार करेंगे तो मां को भगवान समझकर प्यार करेंगे। पिता को ऐसे पिता मानकर प्यार करते हैं। और जब भक्ति भावना आएगी तो पिता को भगवान समझकर प्यार करेंगे। अभी राजकीय विभाग को राजकीय विभाग मान के कर रहे हैं। फिर आप भगवान की पूजा मान के करेंगे कि मेरी यही कर्तव्य पूजा है जो भगवान ने मुझे विभाग दिया है। नाम जप कर रहे हैं और धर्म पूर्वक अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं और परिवार का भगवान के भाव से पोषण कर रहे हैं।

बहुत बढ़िया भक्ति तो बहुत बढ़िया जीना सिखाती है। महाराज जी ब्रह्मश कभी-कभी ऐसा लगता है कि नहीं कहीं ऐसा ना हो। तो इसीलिए आप समझ लो कि आपके परिवार में दो चार 10 लोग होंगे। हमारे परिवार में हजार डेढ़ हजार लोग हैं। दो चार 10 बच्ची बच्चा होंगे। यहां देखो ना सैकड़ों की संख्या में बच्ची बच्चा सब अलग-अलग घरों से आए हुए हैं। तो मतलब आपको तो दो बच्चा संभालना मुश्किल पड़ जाएगा। अगर एक बच्चे से कहोगे मोबाइल नहीं तो तुम्हारी आज्ञा का उल्लंघन कर देगा। और यहां मोबाइल नहीं तो आजीवन टच नहीं करेगा।

सब पढ़े लिखे बच्चे हैं। है नहीं? अच्छा आपको जिम्मेवारी कितनी संभालनी है? हमारी दिमाग की जिम्मेवारी है। नहीं इसका दिमाग ना फेल हो, उसका दिमाग ना। हम दिमाग पर खेलते हैं। सबके दिमाग पर खेलते हैं। तुम बाहरी व्यवहार पर खेलते हो और हम तुम्हारे दिमाग पर खेलते हैं। आज के बाद यह नहीं करूंगा। अब ऐसा चलूंगा। अब ऐसा चलूंगा। बाबा ने ये बोला है। अब ऐसा चलूंगा। ये छोटे-मोटे कार्य थोड़ी यह भक्ति की महिमा है। भक्ति करने वाला वास्तविक कर्तव्य का पालन कर पाएगा। जैसे आपको कोई ₹100 दे हमारा एक काम कर दो तो आप भक्त हो तो आपके तुरंत आएगा नहीं भगवान के द्वारा जो राजकीय विधान से हमें मिलता है उसी से भरण पोषण होगा अगर तुम्हारा कार्य करने योग्य है तो मैं ऐसे ही कर दूंगा और करने योग्य नहीं तो तुम करोड़ों रुपया दो तो भी नहीं करूंगा यह तुम्हारी जिद्द हो जाएगी ऑफिसर आपसे कुछ गलत कराना चाहता है तो आप अभी इस्तीफा ले लीजिए मैं गलत नहीं करूंगा क्योंकि मैं भगवान का भक्त हूं मतलब एक आपका का अलग स्वरूप आ जाएगा।

अभी एक कि नौकरी छूट गई तो जिऊंगा कैसे? तो फिर आपके अंदर आएगा कि मैं भगवान का जन हूं। गलत नहीं करूंगा। चाहे भीख मांग के खाना पड़े गलत नहीं करूंगा। यह भक्ति आपको पुष्ट कर देगी। निर्भय कर देगी। निर्लोभिता कर्तव्य पालनता भक्ति बहुत बड़ा सद्गुण है। कर्तव्य का पालन अगर हमें भगवान ने कर्तव्य दिया तो हम आपको भगवान मानकर मेरे भगवान इतने रूपों में आए और उनसे प्रेम से बात करते हैं जो भगवान बुलवाते हैं उत्तर दे देते हैं। अपने अपने कर्तव्य का सम्यक रूप से पालन भक्ति सिखाती है।

भक्ति कर्तव्य छुड़वाती नहीं है। भक्ति पुष्ट करती है और भक्ति के पुत्र हैं ज्ञान और वैराग्य। यह भक्ति के ही पुत्र हैं। तो जितने ज्ञान से आपका काम चलना है, जितने वैराग्य से आपकी भक्ति पुष्ट होनी है, उतने ही भगवान देंगे। गृहस्थ एक से एक महान भागवत, एक से एक महान भागवत मतलब एक से एक महान भागवत गृहस्थ में हुए। हमें लगता है विरक्तों से ज्यादा गृहस्थ में महा भागवत हुए। भक्तमाल अगर पढ़ी जाए तो विरक्तों से ज्यादा गृहस्थ महान उत्तम स्थिति को प्राप्त हुए। पर बहुत जोर की भगवान की भक्ति उनके हृदय में चीर चिदानी जी नाम के एक भगत भक्त माल जी में आते हैं।

तो पीपा जी और सीता सहचरी जी उनके यहां दर्शन करने गए। उनकी भक्ति की महिमा सुनकर उनकी हालत यह थी कि संत जन आते रहते थे तो सब तो अर्थ नहीं रह गया था। घर में खाने को नहीं रह गया था। दरवाजा खिड़की नहीं रह गए थे। वो भी उखाड़ के बेच चुके। संत सेवा कर चुके थे। अब जब पीपाजी सीता से चली आई तब चीदर जी अपनी पत्नी से चिदरानी जी से कहा आज संत भूखा जाएगा क्योंकि कोई उधार देगा नहीं और घर में कुछ है नहीं जो बेच दे तो आज हमारा नियम टूट जाएगा कि संत कभी भूखा दरवाजे से नहीं जाना चाहिए और इतने बड़े संत पीपाजी सीता से चले उनकी पत्नी ने जानो क्या कहा भूखे नहीं जाएंगे हमारा एक वस्त्र है शरीर में कुछ देखने लायक है मतलब थोड़ा ठीक है क्योंकि चीदर जी की तो फटी द्रुपदी धोती लपटी हुई थी तन में उन्होंने अपना वस्त्र उतार दिया और कहा बाजार में बेच दो चना गुड़ तो मिल जाएगा कुछ तो मिल जाएगा भूखे तो नहीं जाएंगे भगवान की कृपा से वो बिक गया तो उसी का दाल चावल लाए बनाया और रज के पात्र में जब उनके सामने तो सीता सहचरी जी का भक्त आई इनको भी बुला लो यही तो उन्होंने कहा नहीं नहीं उन्होंने कहा नहीं मैं बुला के लाती हूं अंदर गई तो देखा रसोई में निर्वस्त्र बैठे हैं।

आंखों से आंसू चल रहा है। मुख से भगवान का नाम चल रहा है। सीता सहचरी समझ गई घर की हालत देख के और तो उन्होंने कहा सखी तुम निर्वस्त्र क्यों बैठी हो? तो उन्होंने आंख खोल के देखा कहा हमने तो सुना था आप द्वारिकाधीश का साक्षात्कार करके आई होगी। तो द्वारिकाधीश की चर्चा करोगी। क्या इस नाशवान शरीर की चर्चा शुरू कर दी। तो नंगा ही पैदा हुआ था। मरेगा तो ऐसे ही जल जाएगा। इसकी चर्चा क्या? भगवान की चर्चा कितने महान भक्त सीता सहचरी जी लौट के आई पीपा जी के पास कान में बताया कि हम तो समझते थे कि राज रानी है महल सब कुछ त्यागा लेकिन इनके त्याग के आगे हमारा किनका भी त्याग नहीं है।

अपने शरीर के वस्त्र को बेचकर ये भोजन आया है। भक्ति सर्वस्व त्याग सर्वस्व बलिदान और निष्ठा। तो आप अपने पद का अगर निष्ठा पूर्वक पालन करें तो बहुत बड़ी पूजा भगवान की होगी। जो भी आपको कर्तव्य कर्म मिला हो और नाम जप करते हुए अपने परिवार का पोषण करें। ये भगवान की भक्ति सिखाती है। भगवान की भक्ति ऐसा नहीं कि अपने कर्तव्य का त्याग सिखाती हो। कर्तव्य के लिए त्याग सिखाती है। अपने कर्तव्य के पालन के लिए प्राण भी दे दे हम। यह भक्ति सिखाते हैं।

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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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