॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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ताज़ा

॥ श्री हित स्फुट वाणी ॥

श्री हित हरिवंश महाप्रभु · 27 पद

महाप्रभु के फुटकर 23 पद और उपासना के 4 दोहे — अर्थ सहित।

पद 1

द्वादश चन्द्र, कृतस्थल मंगल,
बुद्ध विरुद्ध, सुर-गुरु बंक।
यद्दि दसम्म भवन्न भृगू-सुत,
मंद सु केतु जनम्म के अंक।।
अष्टम राहु, चतुर्थ दिवामणि,
तौ हरिवंश करत न संक।
जो पै कृष्ण-चरण मन अर्पित,
तौ करि हैं का नवग्रह रंक।। 1 ।।

पद 2

भानु दसम्म, जनम्म निशापति,
मंगल-बुद्ध शिवस्थल लीके।
जो गुरु होंय धरम्म-भवन्न के,
तौ भृगुनन्द सुमंद नवीके।।
तीसरौ केतु समेत बिधु-ग्रस,
तौ हरिवंश मन क्रम फीके।
गोविन्द छाँड़ि भ्रमंत दसौ दिस,
तौ करि हैं कहा नवग्रह नीके।।2।।

पद 3

ना जानों छिन-अंत कवन,
बुधि घटहीं प्रकाशित।
छुटि चेतन जु अचेत तेऊ,
मुनि भये बिस-वासित।।
पारासर सुर इन्द्र कलप,
कामिनी मन फंद्या।
परि व देह दुख-द्वन्द्व कौन,
क्रम-काल निकंन्द्या।।
इहि डरहि डरपि हरिवंश हित,
जिनव भ्रमहि गुण-सलिल पर।
जिहि नामन मंगल लोक तिहूँ,
सु हरि-पद भजु न विलंब कर ।।3।।

पद 4

तू बालक नहिं भरयौ सयानप,
काहे कृष्ण भजत नहिं नीके।
अतिव सुमिष्ट तजिव सुरभिन-पय,
मन बंधत तंदुल-जल फीके।।
(जै श्री) हित हरिवंश नर्क गति दुरभर,
यमद्वारें कटियत नक छिंके।
भव-अज कठिन, मुनिजन दुर्लभ,
पावत क्यों जु मनुज तन भीके ।।4।।

पद 5

चकई प्रान जु घट रहैं,
पिय बिछुरंत निकज्ज।
सर-अन्तर अरु काल-निशि,
तरफ तेज घन गज्ज।।
तरफ तेज घन गज्ज लज्ज,
तुहि वदन न आवै।
जल-विहून करि नैनं भोर,
किहिं भाय बतावै।।
(जै श्री) हित हरिवंश विचारि,
बाद अस कौन जु बकई।
सारस यह सन्देह प्राण घट रहै जु चकई ।।5।।

पद 6

सारस सर बिछुरंत कौ,
जो पल सहय शरीर।
अगिन अनंग जु तिय भखै,
तौ जानै पर-पीर।।
तौ जाने पर-पीर धीर,
धरि सकहि बज्र तन।
मरत सारसहिं फूट पुनि न,
परचौ जु लहत मन।।
( जै श्री) हित हरिवंश विचारि,
प्रेम विरहा बिनु वा रस।
निकट कंत नित रहत मरम,
कह जानै सारस ।।6।।

पद 7

तैं भाजन कृत जटित विमल,
चन्दन कृत इन्धन।
अमृत पूरि तिहि मध्य करत,
सर्षप-खल रिन्धन।।
अध्दुत धर पर करत कष्ट,
कंचन-हल वाहत।
बार करत पाँवार मन्द,
बोवन विष चाहत।।
(जै श्री ) हित हरिवंश विचारिकै,
मनुज-देह गुरु-चरण गहि।
सकहि तौ सब परपंच तजि,
कृष्ण-कृष्ण-गोविन्द कहि ।।7।।

पद 8

तातै भैया मेरी सौ कृष्ण-गुण सन्चु।
कुत्सित वाद विकारहिं परधन,
सुनु सिख मंद परतिय बंचु ।
मनिगण-पुंज ब्रजपति छाँड़त,
” हित हरिवंश ” कर गहि कंचु।।
पाये जान जगत में सब जन,
कपटी कुटिल कलिजुग-टंचु।
इहि-परलोक सकल सुख पावत,
मेरी सौ कृष्ण गुण संचु ।।8।।

पद 9

मानुष कौ तन पाइ भजौ ब्रजनाथ कौं ।
दर्बी लेकौं मूढ़ जरावत हाथ कौं।।
(जै श्री) हित हरिवंश प्रपंच, विषय-रस मोह के।
(हरि हां) बिनु कंचन क्यो चलें पचीसा लोहके ।।9।।

पद 10

तू रति-रंग भरी देखियत है री राधे,
रहसि रमी मोहन सौंव रैंन।
गति अति शिथिल, प्रगट पलटे पट,
गौर अंग पर राजत ऐन।।
जलज कपोल, ललित लटकत लट,
भृकुटि कुटिल ज्यो धनुष धृत मैन।
सुन्दरि रहव कँहव कंचुकि कत,
कनक कलश कुच बिच नख दैन।।
अधर-बिंब-दलमलित आरसयुत,
अरु आंनद सूचत सखि नैन।
(जै श्री ) हित हरिवंश दुरत नहिं नागरि,
नागर मधुप मथित सुख सैन ।।10।।

पद 11

आंनद आजु नंद के द्वार।
दास अनन्य भजन-रस कारन,
प्रगटे लाल मनोहर ग्वार।।
चंदन सकल धेनु तन मंडित कुसुम दाम रंजित आगार।
पूरन कुंभ बने तोरन पर बीच रुचिर पीपर की डार।।
युवति-यूथ मिलि गोप विराजत,बाजत पणव मृदङ्ग सुतार।
(जै श्री ) हित हरिवंश अजिर वन वीथिनु,
दधि मधि दूध हरद के खार ।।11।।

पद 12

मोहन लाल के रंग राँची।
मेरे ख्याल परौ जिनि कोऊ, बात दसौ दिसि मांची।।
कंत अनन्त करौ जो कोऊ, बात कहौ सुनि सांची।।
यह जिय जाहु भलै सिर ऊपर होंव प्रगट ह्वै नाँची।।
जागत शयन रहत उर ऊपर मणि कंचन ज्यों पांची।।
(जै श्री ) हित हरिवंश डरौ काके डर हौं नाहिन मति काँची।।12।।

पद 13

मैं जु मोहन सुन्यौ वेणु गोपाल कौ।
व्योम मुनि यानि सुर नारि विथकित भई,
कहत नहि बनत कछु भेद यति ताल कौ।।
स्रवन कुंडल छुरित रूरत कुंतल ललित,
रुचिर कस्तूरि-चंदन-तिलक भाल कौ।
चंद गति मंद भई निरखि छबि काम गई,
देखि “हरिवंश हित ” वेष नन्दलाल कौ ।।13।।

पद 14

आज तू ग्वाल,गोपाल सौ खेलि री।
छाँड़ि अति मान वन चपल चलि भामिनी,
तरु तमाल सौ अरुझ कनक की बेलि री।।
सुभट सुन्दर ललन ताप परबल दमन,
तूब ललना रसिक काम की केलि री।
वेणु कानन कुनित श्रवन सुंदरि सुनत,
मुक्ति सम सकल सुख पाइ पग पेलि री।।
विरह व्याकुल नाथ गान गुन युवति तव,
निरखि मुख काम कौ कदन अवहेलि री।
सुनत ” हरिवंश हित ” मिलत राधारवन,
कंठ भुज मेलि सुख-सिंधु में झेलि री ।।14।।

पद 15

व्रषभान नन्दिनी राजत है।
सुरत-रंग-रस भरी भामिनी,
सकल नारि सिर गाजत है।।
इत-उत चलत,परत दोऊ पग,
मद गयंद गति लाजत हैं।
अधर निरंग रंग गंडन पर,
कटक काम कौ साजत है।।
उर पर लटकि रही लट कारी,
कटिव किंकिनी बाजत हैं।
(जै श्री ) “हित हरिवंश ” पलटि प्रीतम पट,
जुवति जुगति सब छाजत हैं ।।15।।

पद 16

चलौ व्रषभान गोप के द्वार।
जनम लियौ मोहन हित स्यामा,
आंनद- निधि सुकुमार।।
गावत जुवति मुदित मिलि मंगल उच्च मधुर धुनि धार।
विविध कुसुम कोमल किसलय दल सोभित-बंदनबार।।
विदित वेद विधि विहित विप्रवर करि स्वस्तिनु उच्चार।
मृदुल मृदङ्ग मुरज भेरी डफ दिवि दुंदुभि रवकार।।
मागध सूत वंदी चारन जस कहत पुकारि-पुकारि।
हाटक हीर चीर पटाम्बर देत सम्हारि-सम्हारि।।
चंदन सकल धेनु तन मंडित चले जु ग्वार सिंगारि।
(जै श्री )”हित हरिवंश ” दुग्ध दधि छिरकत मध्य हरिद्रा गारि ।।16।।

पद 17

तरौई ध्यान राधिका प्यारी गोवर्द्धन धर लालहि।
कनक लता-सी क्योँ न विराजत अरुझी श्याम तमालहि।।
गौरी गान सु तान ताल गहि रिझवत क्यों न गुपालहि।
यह जोवन कंचन तन ग्वालिन सफल होत इहि कालहि।।
मेरे कहे बिलंब न करि सखि भूरि भाग अति भालहि।
(जै श्री )”हित हरिवंश” उचित हौ चाहत श्याम कंठ की मालहि।।17।।

पद 18

आरती मदन- गोपाल की कीजियै।
देव रिषि व्यास शुक दास कहत निज,
क्यों न बिनु कष्ट रस सिंधु कौ पीजियै।।
अगर करि धूप कुंकुम मलय रंजित,
नव वर्तिका घृत सौ पूरि राखों।।
कुसुम कृत माल नँदलाल के भाल पर,
तिलक करि प्रगट यस क्यों न भाखो।।
भोग प्रभु योग भरि थार धरि कृष्ण पै,
मुदित भुज दंड वर चँवर ढारौ।।
आचमन पान हित मिलित कर्पूर जल,
सुभग मुख वास, कुल ताप जारौ।।
शंख दुंदुभि पणव घन्ट कल वेणु रव,
झल्लरी सहित सुर सप्त नाचौ।।
मनुज तन पाइ यह दाय ब्रजराज भज,
सुखद हरिवंश प्रभु क्यों न यांचौ।।18।।

पद 19

आरति कीजै श्याम-सुन्दर की।
नंद के नन्दन राधिका-वर की।।
भक्ति करि दीप प्रेम कर बाती।
साधु संगति करि अनुदिन राती।।
आरती ब्रज जुवति जूथ मन भावै।
श्याम लीला(श्री) “हरिवंश हित ” गावै ।।19।।

पद 20

रहौ कोऊ काहू मनहि दिये।
मेरे प्राणनाथ श्रीश्यामा, सपथ करौ तृण छिये।।
जे अवतार कदंब भजत है धरि दृढ़ व्रत जु हिये।
तेऊ उमगि तजत मर्जादा बन बिहार रस पिये।।
खोये रतन फिरत जे घर-घर कौन काज ऐसे जिये।
(जै श्री) हित हरिवंश अनत सचु नाही बिनु या रजहि लिये ।।20।।

पद 21

हरि रसना राधा-राधा रट।
अति अधीन आतुर यद्दपि पिय, कहियत है नागर नट।।
संभ्रम द्रुम, परिरंभन कुंजन, ढूढंत कालिंदी तट।
बिलपत,हंसत,विषीदत,स्वेदत सतु सींचत अंसुअन वंसीवट।।
अंगराग परिधान बसन लागत ताते जु पीत-पट।
(जै श्री) “हित हरिवंश ” प्रसंसत श्यामा दै प्यारी कंचन घट ।।21।।

पद 22

लाल की रूप माधुरी नैननि निरखि नेकु सखी।
मनसिज मन हरन-हास, साँवरो सुकुमार रासि,
नखसिख अंग-अंगनि उमंगि सौभग सींव नखी।।
रँगमगी सिर सुरँग पाग लटकि रही वाम भाग,
चंपकली कुटिल अलक बीच-बिच रखी।
आयत दृग अरुण लोल कुंडल मंडित कपोल,
अधर दसन दीपति की छवि क्यों हूँ न जात लखी।।
अभयद भुज दंड मूल पीन अंस सानुकूल,
कनक निकष लसि दुकूल दामिनी धरखी।
उर पर मंदार हार मुक्ता लर वर सुढार,
मत्त दुरद गति तियनि की देह दसा करखी।।
मुकुलित वय नव किसोर,वचन रचन चित के चोर,
मधु रितु पिक साव नूत मंजरी चखी।।
(जै श्री) नटवत “हरिवंश “गान, रागिनी कल्यान तान,
सप्त स्वरन कल,इते पर मुरलिका बरखी ।।22।।

पद 23

दोऊ जन भींजत अटके बातन।
सघन कुंज के द्वारे ठाड़े अम्बर लपटे गातन।।
ललिता ललित रूप रस भींजी बूंद बचावत पातन।।
(जै श्री )”हित हरिवंश ” परस्पर प्रीतम मिलवत रति रस-घातन।।23।।

पद 24

सबसों हित निष्काम मत,श्री वृन्दावन विश्राम।
श्री राधावल्लभ लाल कौ,ह्रदय ध्यान मुख नाम।।1।।

पद 25

तनहि राख सत्संग मै,मनहि प्रेम रस भेव।
सुख चाहत हरिवंश हित ,श्री कृष्ण कल्पतरु सेव।।2।।

पद 26

निकस कुञ्ज ठाड़े भये,भुजा परस्पर अंश।
श्री राधावल्लभ मुख कमल,निरख नैन हरिवंश।।3।।

पद 27

रसना कटौ जो अनरटो, निरिख अनफुटो नैन।
श्रवण फुटौ जो अनसुनो, बिन राधा यश बैन।।